Saturday, May 31, 2008

सच्चाई गले नहीं उतरती हमारे आला अफ़सरान के

अभिनव कुमार उत्तराखण्ड में कार्यरत एक आईपीएस हैं. फ़िलहाल वे देहरादून स्थित पुलिस मुख्यालय में एस. पी. (लॉ एण्ड ऑर्डर) के तौर पर कार्यरत हैं. मगर यह कोई बड़ी बात नहीं है. इस देश में सैकड़ों की तादाद में आईपीएस कार्यरत हैं. अभिनव कुमार एक दुर्लभ प्रजाति के अफ़सर हैं. ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की डिग्री हासिल कर चुके अभिनव बरेली के एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते हैं जो ईमानदारी और आज़ादी की लड़ाई में अपनी शिरकत के लिये जाना जाता है.

बाहर से मस्तमौला मिजाज़ दिखने वाले अभिनव असल में भाषाओं के धनी हैं और उनके अध्ययन का दायरा असीमित है. अपने पूरे कार्यकाल में अभिनव को उनकी बेबाकी, ईमानदारी और हिम्मत के लिये जाना जाता है और वे एक लोकप्रिय अफ़सर हैं.

ऑक्सफ़ोर्ड में उम्बेर्तो एको और स्टीफ़न हॉकिंग जैसे विद्वानों की संगत पा चुके अभिनव अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर यदा-कदा इन्डियन एक्सप्रेस के लिये भी लिखते हैं. छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशों के आने के बाद उन्होंने मार्च और अप्रैल माह में इन सिफ़ारिशों से अपनी अस्वीकृति जताते हुए बहुत बेलौस टिप्पणियां कीं और आईएएस और आईपीएस काडरों को मिलने वाली सुविधाओं के मध्य भीषण विसंगतियों पर पाठकों का ध्यान खींचते हुए भारतीय अफ़सरशाही के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सामने रखा.

पुलिस की कार्यशैली के बिल्कुल अनछुए आयामों पर अभिनव की कलम लगातार चलती रही है और वे हमेशा सबसे ग़रीब, सबसे ज़्यादा उपेक्षित और सबसे ज़्यादा गाली खाने वाले मामूली सिपाही के पक्ष में खड़े नज़र आते रहे हैं. इस वजह से मैं उनके लेखन का प्रशंसक हूं. वेतन आयोग वाले उनके आलेख में जिस तरह उन्होंने हमारे सड़े शासनतन्त्र को उघाड़ कर रख दिया था, उसका परिणाम आज देखने को मिला.

आज के इन्डियन एक्सप्रेस में मुखपन्ने पर लगी खबर के मुताबिक केन्द्र सरकार के आला अफ़सरान इस बात से बुरी तरह बौखलाए हुए हैं और उन्होंने बाकायदा इस बात की शिकायत राज्य सरकार तक पहुंचा दी है. भारत सरकार के केन्द्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा जारी नोटिसनुमा चिठ्ठी में पहले तो अभिनव कुमार के दो लेखों का ज़िक्र है. उसके बाद एक पैराग्राफ़ में लेखों का पोस्टमॉर्टम करते हुए लिखा गया है:

"The writer has explicitly stated that the nation is presided over by a triad of politicians, businessman and bureaucrat kleptocracy. Kleptocracy is defined as a government or state in which those in power exploit natural resources and steal; rule by a thief or thieves. The term kleptocracy is used for high level corruption by senior officials. Therefore, the writer has implied that the nation is ruled by an evil triad of politicians bureaucrats and politicians and their rule is a rule of thieves. He has also stated that the politicians and the businessmen are even now shaping the rules of the game in a manner suited to their unending greed and that the IAS officers are helping them in this nefarious purpose. He has further made serious accusations by stating that the IAS is concerned only with ensuring its own primacy even at the cost of the national interest. "

यानी लेखक ने साफ़ साफ़ शब्दों में बताया है कि देश का नियन्त्रण राजनेताओं, व्यापारियों और चोट्टी अफ़सरशाही के त्रिकोण के पास है. उसके बाद 'Kleptocracy' का मायने भी बताती है यह चिठ्ठी. 'Kleptocracy' माने चोरों और ठगों का राज. 'Kleptocracy' शब्द का इस्तेमाल वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है वगैरह, वगैरह ...

इस लेख की कुछेक और तफ़सीलें मुहैय्या कराने के बाद यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि अभिनव कुमार ने किन किन लोगों पर लांछन लगाने का दुस्साहस किया है. ज़रा एक बानगी देखिये:

१. छठे वेतन आयोग के सभी मेम्बरान
२. कैबिनेट सचिव
३. गृह सचिव
४. रक्षा सचिव
५. व्यय सचिव
६. सचिव (कार्मिक व प्रशिक्षण)
७. सचिव (पेन्शन)
८. सचिव (डाक)
९. सचिव (विज्ञान व तकनीकी)
१०. रेलवे बोर्ड
११. डेपुटी कम्ट्रोलर एन्ड ऑडिटर जनरल
१२. सचिव (सुरक्षा)

इन महानुभावों के नाम पढ़ते-पढ़ते यदि अभिनव कुमार आपको भारतीय दण्ड संहिता की सारी धाराओं के तहत बहुत गम्भीर अपराध कर चुके लगने लगे हों तो कोई संदेह नहीं होना चाहिये. इस के बाद की चिठ्ठी बताती है कि अभिनव ने किन किन धाराओं का उल्लंघन किया है.

यह पत्र मुझे कहीं से हाथ लग गया था और इसे पढ़ते हुए मुझे 'अन्धेर नगरी' सरीखे किसी प्रहसन को पढ़ने की अनुभूति हुई. समूचे भारत की छोड़िये, अकेले उत्तराखण्ड में पिछले कुछ सालों में मुझे कम से कम चार ऐसे प्रकरण ज्ञात हैं जिनमें वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने भ्रष्टाचार की नई गाथाएं रचीं और वे साफ़-साफ़ छूट गये और हमारी सरकारों द्वारा बड़े से बड़े ओहदों पर प्रतिष्ठित किये गये.

जब अभिनव कुमार से एक्सप्रेस के संवाददाता ने इस बाबत पूछा तो उनका जवाब था: "एक आईपीएस अफ़सर के नाते मैं यह मानता हूं कि यदि मैं पुलिस के पेशे से ताल्लुक रखने वाले एक संकटपूर्ण मुद्दे पर सार्वजनिक बहस से बचता , तो अपने पेशे से न्याय नहीं कर पाता. और यदि भारत की जनता की आशाओं पर खरा न उतर पाने के लिये आईएएस और आईपीएस की निन्दा करना विक्टोरियाई ज़माने सिविल सर्विस कोड का उल्लंघन है तो मैं उतना ही अपराधी हूं जितना उपमन्यु चटर्जी हैं, जो एक कार्यरत आईएएस हैं और जिन्होंने अपने उपन्यासों में इसी तरह की निन्दा की है."

अभिनव कुमार ने बस इतना करना था कि चुपचाप बैठे रहते या अध्ययन करने सरकारी खर्चे पर ऑक्सफ़ोर्ड चले जाते. शायद आला दर्ज़े के अफ़सरों को इसमें कोई उज्र न होता. या वे नित लूटे जा रहे उत्तराखण्ड राज्य में दस पांच प्लॉट हथिया लेते. वरिष्ठ अधिकारियों को 'ब्लू लेबेल' की पार्टियां देना भी इस तरह की सेवाओं में मुफ़ीद माना जाता रहा है.

मगर अभिनव को सच लिखना था. सो उन्होंने लिखा.

हो सकता है उन्हें सस्पेंड कर दिया जाए, हो सकता है किसी पनिशमेन्ट पोस्टिंग पर भेज दिया जाय. कम पढ़े लिखे अफ़सरों के पर कतरने को सरकारें यही किया करती हैं ताकि 'त्रिकोण' सलामत बचा रहे. लेकिन अभिनव दुम हिलाने और रेंगने वाले उस काट और धज के अफ़सर नहीं हैं, जिनकी बड़े लालफ़ीताशाहों को आदत पड़ी रहती है. वे एक हिम्मती और समझदार व्यक्ति को अपनी खीझ और कुंठा का निशाना भर बना रहे हैं.

जो भी हो, हमें नाज़ है इस अधिकारी पर! बस. और हम उसके साथ हैं.

Friday, May 30, 2008

इस्लाह-ए-उस्तादाँ

(अजित साही बहुत पुराने मित्र हैं. लेकिन उनसे असली पहचान तब हुई जब उन्होंने मेरी डेस्क पर विजयदेव नारायण साही की ये कविता देखी:

दो तो ऐसी निरीहता दो,
कि इस दहाड़ते आतंक में
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इस बात की परवाह न हो कि
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा.

अब उन्होंने मुझे एक चिट्ठी भेजी है. मैं इस निजी दस्तावेज़ को सार्वजनिक करने की धृष्टता कर रहा हूँ. ताकि सनद रहे. अमेज़न रिपोर्ताज का वादा अपनी जगह पर. राजेश जोशी)


--

अजित साही की सलाह

अबे बांगड़ू, यहां आके आई लव माई इंडिया का गाना गाओगे? तुम भी किसी टीवी चैनल में बैठके ज्ञान बांटोगे क्या?

टीवी चैनलों का सेट ज्ञान (अगर इसके अलावा कोई और लाइन ली तो जल्द ही नौकरी नहीं बचेगी) --

1. राज ठाकरे -- कमीना है। साला कहता है नॉर्थ इंडियन्स मुंबई के बाहर निकलें। देश में हरेक को कहीं भी रहने की फ़्रीडम है। आफ़्टर ऑल, आर कांस्टीट्यूशन सेज़ दैट। और वैसे भी, बहुतेरे नॉर्थ इंडियन्स मुंबई में चालीस साल से रह रहे हैं। अब वो उनका घर है।

2. आदिवासी -- बिला वजह रोते हैं। पता नहीं साले क्यों नहीं जंगल-पहाड़ ख़ाली करते हैं। ये क्या बात हुई कि उन्हें सिर्फ़ इसलिए वहां रहने दिया जाए क्योंकि वो हज़ारों साल से वहां रह रहे हैं? घर-वर कुछ नहीं होता। डेवलेपमेंट नहीं चाहिए क्या?

3. एम्स के रेज़िडेंट डॉक्टर -- आरक्षण के ख़िलाफ़ हड़ताल करने वाले क्रांतिकारी डॉक्टर। जात की राजनीति करने वाले कमीने नेताओं के ख़िलाफ़ खड़े होने वाले अकेले वीर।

4. एम्स के रेज़िडेंट डॉक्टर -- अधिक पगार के लिए हड़ताल करने वाले कमीने डॉक्टर। देखो मोरादाबाद से आया बेचारा ग़रीब बीमार तीन दिन से फ़ुटपाथ पे लाइलाज पड़ा है।

5. एम्स डाइरेक्टर वेणुगोपाल -- बहुत सही हुआ सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी बहाल कर दी। ये क्या बात हुई कि सरकारी इंस्टीट्यूट है एम्स तो सरकार जब चाहे डाइरेक्टर को निकाल दे?

6. लेबर लॉ रिफ़ॉर्म -- प्राइवेट कम्पनियों को पूरी छूट होनी चाहिए कि जब चाहें जिसे नौकरी से निकाल दें। तभी इंडिया की इकनॉमिक ग्रोथ चाइना के बराबर होगी।

7. सुप्रीम कोर्ट -- ग्रेट इंस्टीट्यूशन। वेणुगोपाल की नौकरी बहाल करके इंसाफ़ किया है। लोकतंत्र की आख़िरी उम्मीद।

8. सुप्रीम कोर्ट -- डिसअपॉइंटिंग। ओबीसी आरक्षण का फ़ैसला बड़ा मायूसी वाला है।

9. सुप्रीम कोर्ट -- बकवास आदेश था कि दिल्ली में ग़ैरक़ानूनी दुकानें बंद की जाएं। आख़िर लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का क्या होता?

10. सुप्रीम कोर्ट -- सही आदेश था कि कि नर्मदा घाटी के गांववाले बाहर निकाल दिए जाएं और उनके गांव बांध के पानी में डूब जाएं।

11. नारायणमूर्ति -- महान व्यक्ति हैं। अपना पाख़ाना ख़ुद साफ़ करते हैं। राष्ट्रपति होना चाहिए था।

12. अब्दुल कलाम -- महान व्यक्ति हैं। अपना पाख़ाना ख़ुद नहीं साफ़ करते हैं। क्या राष्ट्रपति थे।

13. मनमोहन सिंह -- बहुत ईमानदार आदमी हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि नेता नहीं हैं, बल्कि बिलकुल मिडिल क्लास जैसे हैं। पंद्रह साल पहले इन्होंने ही देश को कंगाल होने से बचाया था। आज अगर आप दिल्ली में रीड ऐंड टेलर के सूट ख़रीद सकते हैं तो इनको शुक्रिया कहिए।

14. मुकेश अम्बानी -- ज़बरदस्त आदमी हैं। जानते हो कितने अमीर हैं?

15. अनिल अम्बानी -- ज़बरदस्त आदमी हैं। जानते हो कितने अमीर हैं?

16. ग्लोबलाइज़ेशन -- भगवान की देन है। पागल तो नहीं हो इसकी बुराई कर रहे हो? देखो किस तरह रतन टाटा और लक्ष्मी मित्तल और सुनील मित्तल चौड़े से गोरों की कम्पनियां ख़रीद रहे हैं। गो इंडिया गो गो!!

17. न्यूक्लियर डील -- संसद से क्या लेना देना? सरकार को पूरा हक़ है कि वो जो चाहे फ़ैसले ले, चाहे संसद में उन फ़ैसलों का समर्थन अल्पमत में हो।

18. अरुंधति रॉय -- कुतिया है साली। इग्नोर करो।

19. आमिर ख़ान -- बहुत संजीदा एक्टर हैं। बहुत संजीदा आदमी हैं। कोका कोला की बात मत करो।

20. शाहरुख़ख़ान -- आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, लोगों को समझ में आएगा कि एसआरके को पीएम होना चाहिए।

21. अमिताभ बच्चन -- लेजेंड हैं। ये नहीं चली तो अगली फ़िल्म चलेगी।

22. आतंकवाद -- सबको गोली मार देनी चाहिए। फांसी पे लटका देना चाहिेए। मुसलमानों को चाहिए कि रोज़ आतंकवाद को कंडेम करें। पुलिस को जितने हथियार देने हैं दे दो। मुक़दमा चले ना चले, जो भी गिरफ़्तार हों सालों-साल जेल में रखे जाएं।

23. सिमी (या हूजी या लेट या कोई भी) -- अंडरग्राउंड है। इसके तार दूर दूर तक फैले हैं। शहर शहर में स्लीपर सेल्स हैं। इसीलिए पोटा चाहिए।

24. नक्सलवादी-- एंटी-डेवेलपमेंट हैं। बंदूक से बात मनवाने की बात जायज़ नहीं।

25. सरकार -- पूरा अधिकार है कि नक्सली इलाक़ों में (या एंटी़-डेवेलप्मेंट के लोग जहां भी हों वहां) बंदूक से अपनी बात मनवाए।

26. क्रिकेट -- नेशनल पैशन है। इंडिया की आबरू है। गो इंडिया गो गो!!

27. इंफ़्लेशन -- इट्स अ बैड थिंग। इट मे अफ़ेक्ट द चांसेज़ ऑफ़ द रूलिंग कोऑलिशन ऐट नेक्स्ट इयर्ज़ पोल्स।

28. पब्लिक सेक्टर प्राइवेटाइज़ेशन -- हैं?? अभी भी कुछ कम्पनियां बची हैं क्या??

29. अंग्रेज़ी -- इंडिया के ग्लोबल इकनामिक सुपरपावर बनने की वजह। जबतक बाक़ी बचे नब्बे करोड़ इंडियन्स अंग्रेज़ी नहीं बोलेंगे ये देश आगे नहीं बढ़ेगा। आई डोंट केयर कि बग़ैर अंग्रेज़ी अपनाए चाइना इंडिया का बाप बन चुका है; कि जर्मनी, फ़्रांस और ब्रिटेन से बाहर के बाक़ी योरोपीय देश, और अमेरिका के पिट्ठू जापान और दक्षिण कोरिया अपनी अपनी भाषाओं में डेवलेप्ड हुए हैं।

30. बाल कुपोषण (या जच्चा मृत्यु दर या किसान आत्महत्या) -- स्टोरी नॉट नीडेड।

31. बढ़ती ग़रीबी -- स्टोरी नॉट नीडेड। एक्चुली, इट्स नॉट ईवन ट्रू दैट पॉवर्टी इज़ इन्क्रीज़िंग। द रेट ऑफ़ ग्रोथ इन पॉवर्टी इज़ फ़ॉलिंग।

32. मुसलमान (या दलित) -- एक होमोजिनस यूनिट है। सभी मुसलमान एक जैसा सोचते हैं और करते हैं।

33. ओबीसी -- क्रीमी लेयर रिज़रवेशन का फ़ायदा उठाके असली पिछड़ों को आगे नहीं बढ़ने देता।

34. एफ़डीआई -- जब तक फ़िरंगी कम्पनियां इंडिया की हर चीज़ की मिल्कियत अपने हक़ में नहीं कर लेतीं इंडिया प्रोग्रेस नहीं कर सकता।

35. विदेशी गाड़ियां -- और बनाओ, और बेचो।

36. पब्लिक ट्रांस्पोर्ट -- इसमें तो नौकर चपरासी धोबी मोची चलते हैं। इसकी क्या बात करनी।

37. अमेरिका -- नेचुरल फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया। जो ये कहे कि हमें अमेरिका का पिछलग्गू नहीं होना चाहिेए एंटी-इंडिया है।

38. शराब -- पीने की उम्र कम होनी चाहिए। गली गली में ठेका खुला नहीं तो खुलना चाहिए। ये हमारा संवैधानिक अधिकार है।

39. गुड़गांव (या बैंगलोर या हैदराबाद) -- जैसा पूरे देश को बन जाना चाहिए। जहां ढेर सारी बड़ी बड़ी इमारतें हों।

40. गांव -- ख़ाली होने चाहिए क्योंकि खेती इतनी बड़ी आबादी की कमाई का रास्ता नहीं हो सकती। गांववालों को शहर आना चाहिए और सड़क किनारे बस के मज़दूरी करनी चाहिए।

41. लोकतंत्र -- अच्छी चीज़ है जबतक चुना हुआ हर नेता ग्लोबलाइज़ेशन को आगे बढ़ाने को तैयार है।

42. नंदीग्राम -- कमीने वामपंथी स्वाभिमानी गांववालों पे ज़बरदस्ती औद्योगिकरण थोपना चाहते थे।

43. कलिंगनगर (उड़ीसा) -- वहमी गांववाले बिलावजह औद्योगिकरण के ख़िलाफ़ हैं।

44. एसईज़ेड प्रोजेक्ट्स -- बहुत अच्छी चीज़ है ख़ासतौर से इसलिए कि वहां आम क़ानून वग़ैरह लागू नहीं होते और वहां बसी कम्पनियों की कोई अकाउंटेबिलिटी नहीं होती।

45. गुजरात -- क़ानून का दर्ज़ा वोट से नीचे है। नरेंद्र मोदी के सभी पाप चुनाव जीतने पे धुल गए। वैसे भी अब छोड़ो ना गुजरात-शुजरात।

अगर फिर भी इंडिया लौट के आना चाहते हो कमसेकम कुछेक चीज़ें कर लो --

क. हिंदी ठीक करो। फिर को फ़िर बोलो। दवाइयों को दवाईयों लिखो। ढाबा अब ढ़ाबा हो गया है, सीख लो।
ख. मन बना लो कि हर जगह सबसे पहले बोलोगे तुम बीबीसी बीबीसी बीबीसी बीबीसी बीबीसी बीबीसी में काम करते थे।
ग. आने से पहले इंटरनेशनल (अमेरिकी) उच्चारण की अंग्रेज़ी बोलने का कोर्स करो। जितना ऐकुरेट अमेरिकी एक्सेंट होगा उतनी गंभीरता से तुम्हारी बात ली जाएगी।
घ. माइकल जैकसन की तरह अगर पिगमेंट ऑपरेशन करवा सको तो बहुत ही बढ़िया है। गोरी चमड़ी का ज़बरदस्त मार्केट है यहां।
च. लंदन बैठे बैठे बीबीसी के नाम पर इंडिया के कुछेक बड़े लोगों से जान-पहचान करलो और उनके नम्बर अपने मोबाइल में सेव कर लो। बहुत काम आएंगे।

सोच लो। दूर बैठे बिलावजह इमोशनल होके इतनी बड़ी ग़लती मत कर लेना कि सिर्फ़ देशप्रेम में वापस चले आओ।

भूल गए कि गांधीजी ने कहा था क्विट इंडिया?

Thursday, May 29, 2008

इतना झीना जितना नशा, इतना गठित जितना षडयंत्र


ये अब्र पुराने हैं
बरसेंगे यहीं आकर
मेरा घर जाने हैं.

'माहिया' शीर्षक यह नन्हीं सी कविता अजन्ता देव की छोटी सी कविता-पुस्तिका 'एक नगरवधू की आत्मकथा' का हिस्सा है. जब से यह पुस्तिका मेरे पास पहुंची है, इसे दसियों बार पढ़ चुका हूं और हर बार इसमें नये अर्थ मिले हैं.

यूरोप से उधार लिये गये नारीवाद और उत्तर नारीवाद जैसे किताबी सिद्धान्तों की आड़ में युवतर कवयित्रियों की लगतार बढ़ती जाती जमात की एकांगी और रसहीन कविताओं की भीड़ में अलग से छिटक सामने आती है यह ज़बरदस्त पुस्तिका. पहली ही कविता है 'मेरा मिथ्यालय':

आमन्त्रण निमन्त्रण नहीं
अनायास खींच लेता है अपनी ओर
मेरा मिथ्यालय

श्रेष्ठ जनों के बीच
यहीं रचा जाता है
कलाओं का महारास

मेरे द्वार कभी बन्द नहीं होते
ये खुले रहेंगे
तुम्हारे जाने के बाद भी.

एक जड़ समाज की नब्ज़ पर उंगली रख कर हतप्रभ कर देने का यह क्रम अगली कविता 'विपरीत रसायन' में जारी रहता है:

स्त्रियां नहीं बन सकतीं शराबी
यह कहा होगा कवि ने
मेरे हाथ से पीकर
अगर बन जातीं स्त्रियां शराबी
तो पिलाता कौन

मेरे प्याले भरे हैं मद से
केसर कस्तूरी झलझला रही है
वैदूर्यमणि सी
कीमियागर की तरह
मैं मिला रही हूं
दो विपरीत रसायन
विस्फोट होने को है
मैं प्रतीक्षा करूंगी तुम्हारे डगमगाने की.

और आगे देखिये 'रामरसोई' शीर्षक कविता क्या कहती है:

तुम्हारी जिह्वा
ठांव-कुठांव टपकाती है लार
इसे काबू करना तुम्हारे वश में कहां
तुमने चख लिया है हर रंग का लहू

परन्तु एक बार आओ
मेरी रामरसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में नहीं
मेरे चूल्हे में भी है
यह पृथ्वी स्वयं हांडी बन कर
खदबदा रही है
केवल द्रौपदियों को ही मिलती है
यह हांडी
पांच पतियों के परमसखा से.

यह एक बेबाक, ईमानदार कथन कहने की हिम्मत है जिसमें अजन्ता देव सारे समाज के सामने एक आईना रखती हुईं 'अन्य जीवन से' में कहती हैं:

किस लोक के कारीगर हो
कि रेशे उधेड़ कर अंतरिक्ष के
बुना है पटवस्त्र
और कहते हो नदी सा लहराता दुकूल

होगा नदी सा
पर मैं नहीं पृथ्वी सी
कि धारण करूं यह विराट
अनसिला चादर कर्मफल की तरह
मुझे तो चाहिये एक पोशाक
जिसे काटा गया हो मेरी रेखाओं से
इतना सुचिक्‍कन कि मेरी त्‍वचा
इतने बेलबूटे कि याद न आये
हतभाग्‍य पतझर
सारे रंग जो छीने गये हों
अन्‍य जीवन से

इतना झीना जितना नशा
इतना गठित जितना षडयंत्र


मैं हर दिन बदलती हूं चोला
श्रेष्ठ्जनों की सभा में
आत्मा नहीं हूं मैं
कि पहने रहूं एक ही देह
मृत्यु की प्रतीक्षा में.

"आत्मा नहीं हूं मैं" कह चुकने के साथ ही बहुत सारी जंज़ीरें यक-ब-यक खुलती चली जाती हैं. ज़रा 'कामकेलि' शीर्षक कविता को देखें:

क्या किया मैंने
शैशव से यौवन तक
किया जो भी
वह उपस्थित था धरती पर पहले से

चपल मुद्रा
चतुर स्वभाव
झीना छल
मिला सदैव अपने आसपास
वह जो साधा गया सायास
क्या नहीं था प्रकृति में अनायास

रंगों की इतनी छायाएं
ये प्राणवन्त प्रतिमाएं
फिर भी मेरी यह
दुर्दान्त धृष्टता

सृष्टि की आदिकला को
मैंने संवारा
कितने श्रृंगार
कितने कपट से
फिर भी अन्त में बच गई
केवल कामकेलि
मूक पशुओं से सीखी एक कला.

अजन्ता देव की कविताएं इधर लिखी जा रही सपाटबयानी के बीच किसी ख़ुशबूदार झोंके की मानिन्द आपको अपने लपेटे में ले लेती हैं. बहुत दिनों बाद मैंने भाषा में एक नया मुहाविरा, एक नया नैसर्गिक शिल्प और कहीं सूफ़ियाना तो कहीं मन्द्र मेघ जैसा स्वर देखा. यह एक बेहद संवेदनशील और बेहद चौकस रचनाकार है जो अपने समाज और परिवेश के दोमुंहेपन को एक पारदर्शी कौशल के साथ उघाड़ देने की हिम्मत रखता है. और भाषा के साथ वे अनन्त प्रयोग करती चलती हैं. अजन्ता देव की कविताओं का अन्डरस्टेटमेन्ट युवा कवियों के लिये मिसाल है. पुस्तिका से एक और कविता 'रंग है री':

कैसी आंधी चली होगी रात भर
कि उड़ रही है रेत ही रेत अब तक

असंख्य पदचिह्नों की अल्पना आंगन में
धूम्रवर्णी व्यंजन सजे हैं चौकियों पर
पूरा उपवन श्वेत हो गया है
निस्तेज सूरज के सामने उड़ रहे हैं कपोत

युवतियां घूम रही हैं
खोले हुए धवल केश
वातावरण में फैली है
वैधय की पवित्रता
कोलाहल केवल बाहर है
आज रंग है री मां! रंग है री!

(इस पोस्ट के लिये पहला शुक्रिया अविनाश का जिनकी मार्फ़त अजन्ता जी की इस पुस्तिका से परिचय हुआ. दूसरा शुक्रिया अजन्ता जी का जिन्होंने मुझे यह पुस्तक भेजी. पुस्तिका प्राप्ति का पता: कलमकार प्रकाशन, ६८/१७९, प्रताप नगर, सांगानेर, जयपुर -३०२०३० टेलीफ़ोन: ०१४१ ५१२२००६)

प्रिज़न ट्रिलॉजी : जोन बाएज़



जोन बाएज़ के कुछ गाने आप पिछले दिनों यहां सुनते रहे हैं. आज उन्हीं का एक और मशहूर गीत 'प्रिज़न ट्रिलॉजी' पेश है. यह गीत जोन ने १९७२ में रेकॉर्ड किया था.तीन क़ैदियों की दास्तान सुनाता यह मानवीय गीत मेरे सर्वप्रिय गीतों में है:



Billy Rose was a low rider, Billy Rose was a night fighter
Billy Rose knew trouble like the sound of his own name
Busted on a drunken charge
Driving someone else's car
The local midnight sheriff's claim to fame

In an Arizona jail there are some who tell the tale how
Billy fought the sergeant for some milk that he demanded
Knowing they'd remain the boss
Knowing he would pay the cost
They saw he was severely reprimanded

In the blackest cell on "A" Block
He hanged himself at dawn
With a note stuck to the bunk head
Don't mess with me, just take me home

Come and lay, help us lay
young Billy down

Luna was a Mexican the law called an alien
For coming across the border with a baby and a wife
Though the clothes upon his back were wet
Still he thought that he could get
Some money and things to start a life

It hadn't been too very long when it seemed like everything went wrong
They didn't even have the time to find themselves a home
This foreigner, a brown-skin male
Thrown into a Texas jail
It left the wife and baby quite alone

He eased the pain inside him
With a needle in his arm
But the dope just crucified him
He died to no one's great alarm

Come and lay, help us lay
Young Luna down
And we're gonna raze, raze the prisons
To the ground

Kilowatt was an aging con of 65 who stood a chance to stay alive
And leave the joint and walk the streets again
As the time he was to leave drew near
He suffered all the joy and fear
Of leaving 35 years in the pen

And on the day of his release he was approached by the police
Who took him to the warden walking slowly by his side
The warden said "You won't remain here
But it seems a state retainer
Claims another 10 years of your life."

He stepped out in the Texas sunlight
The cops all stood around
Old Kilowatt ran 50 yards
Then threw himself down on the ground

They might as well just have laid
The old man down
And we're gonna raze, raze the prisons
To the ground
Help us raze, raze the prisons
To the ground

Wednesday, May 28, 2008

अब एल्विस


रॉक एंड रोल के निर्विवाद बादशाह थे एल्विस प्रेस्ली. ८ जनवरी १९३५ को मेम्फिस के एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे एल्विस के संगीत पर तत्कालीन पॉप संगीत, लोकसंगीत और चर्चों में बजने वाली उदास धुनों का मिला जुला प्रभाव पड़ा. १९५४ में अपना पेशेवर संगीत - कैरियर शुरू करने के दो साल के भीतर वे एक अन्तर्राष्ट्रीय सनसनी बन गए थे. विविधतापूर्ण शैलियों से प्रभावित संगीत और अद्वितीय आवाज़ के संगम की मदद से एल्विस ने अमरीकी संस्कृति और कलाजगत में एक नये युग का सूत्रपात किया था.

एल्विस के रेकॉर्ड्स की बिक्री का कीर्तिमान अभी तक नहीं टूटा है. अपने जीवन में उन्हें संगीत से ताल्लुक रखने वाले सारे इनामात हासिल हो चुके थे. एल्विस ने फ़िल्मों में भी काम किया.

बेहद सुदर्शन व्यक्तित्व, अपार प्रतिभा और करिश्माई फ़ितरत के स्वामी एल्विस को चाहने वाले दुनिया भर में फैले हुए हैं. १९७७ में सिर्फ़ ४२ की वय में अपनी मृत्यु से पहले एल्विस प्रेस्ली बीसवीं सदी की पॉप कला के महानायक के तौर पर स्थापित हो चुके थे.

आज कबाड़ख़ाने में सुनें एल्विस की रेन्ज की बानगी प्रस्तुत करते तीन अलग-अलग मूड वाले गाने. 'रिटर्न टू सैन्डर' एक हल्का फुल्का चुहल भरा गीत है 'आर यू लोनसम टुनाइट' एक उदास प्रेमगीत है जबकि 'इन द गेटो' शिकागो के ग़रीब इलाकों के जीवन का बेहद मार्मिक वृतान्त है

boomp3.com

gave a letter to the postman,
He put it his sack.
Bright in early next morning,
He brought my letter back.

She wrote upon it:
Return to sender, address unknown.
No such number, no such zone.
We had a quarrel, a lovers spat
I write Im sorry but my letter keeps coming back.

So then I dropped it in the mailbox
And sent it special d.
Bright in early next morning
It came right back to me.

She wrote upon it:
Return to sender, address unknown.
No such person, no such so.

This time Im gonna take it myself
And put it right in her hand.
And if it comes back the very next day
Then Ill understand - the writing on it

Return to sender, address unknown.
No such number, no such zone.

boomp3.com

Are you lonesome tonight
Do you miss me tonight
Are you sorry we drifted apart
Does your memory stray to a bright
Sunny day
When I kissed you and called you
Sweetheart
Do the chairs in your parlor seem
Empty and bare
Do you gaze at your doorstep and
Picture me there
Is your heart filled with pain, shall I
Come back again
Tell me dear are you lonesome tonight

I wonder if you’re lonesome tonight
You know someone said that the
World’s a stage
And each must play a part
Fate had me playing in love with you as
My sweetheart
Act one was when we met
You read your line so cleverly, you

Never missed a cue
Then came act two, you seemed to
Change you acted strange
And why I’ll never know
Honey, you lied when you said you
Loved me
And I had no cause to doubt you
But I’d rather go on hearing your lies
Than to go on living without you
Now the stage is bare and I’m
Standing There
With emptiness all around
And if you won’t come back to me
Then they can bring the curtain down

Is your heart filled with pain, shall I
Come back again
Tell me dear are you lonesome tonight

boomp3.com

As the snow flies
On a cold and gray chicago mornin
A poor little baby child is born
In the ghetto
And his mama cries
cause if theres one thing that she dont need
Its another hungry mouth to feed
In the ghetto

People, dont you understand
The child needs a helping hand
Or hell grow to be an angry young man some day
Take a look at you and me,
Are we too blind to see,
Do we simply turn our heads
And look the other way

Well the world turns
And a hungry little boy with a runny nose
Plays in the street as the cold wind blows
In the ghetto

And his hunger burns
So he starts to roam the streets at night
And he learns how to steal
And he learns how to fight
In the ghetto

Then one night in desperation
A young man breaks away
He buys a gun, steals a car,
Tries to run, but he dont get far
And his mama cries

As a crowd gathers round an angry young man
Face down on the street with a gun in his hand
In the ghetto

As her young man dies,
On a cold and gray chicago mornin,
Another little baby child is born
In the ghetto

काली काली ज़ुल्फ़ों के फ़न्दे न डालो

मैंने कल रात बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ान की यह कव्वाली पोस्ट की थी पर कुछ तकनीकी कारणों से वह सुनाई देना बन्द हो गई थी. लीजिये फिर सुनिये. इस बार लगातार बजती रहेगी. गारन्टी!

बाहर खड़ी रौशनी और पीटर कुरमान की दो कविताएं

पीटर कुरमान के बारे में मैं नहीं जानता। गूगल और विकीपीडिया से भी मदद नहीं मिलती। दरअसल रांची से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका देशज स्वर के बैक कवर पर पीटर कुरमान की दो कविताएं छपी हैं। इस बारे में पत्रिका के संपादक और “समर शेष है”, “मिशन झारखंड” और “टुंडी की ट्रेजेडी” जैसी किताबों के लेखक विनोद कुमार से बात हुई तो उन्होंने बताया कि छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के आंदोलन के दिनों में ये कविताएं उन्हें कहीं मिलीं और उन्होंने अपनी डायरी में उतार लीं। कविताएं आप भी पढ़ें। पीटर कुरमान के बारे में अगर आप जानते हैं तो जरूर बताएं।

कविता – एक

चाहे कुछ भी घटित हो : लिखो
...
अगर तुम्हारे शरीर में अंधकार घिर आता है
तो लिखो उस रौशनी के बारे में
जो बाहर खड़ी इंतजार करती है ...

कविता – दो

यहां हर चीज पेड़ों, टीलों और समुंदर जैसी है
एक निरंतर जड़-चित्र
लेकिन बताओ मैं क्या करूं
जिससे कि
समुंदर कविता में चला आए
और तुम जान सको कितनी नमकीन है यह

Tuesday, May 27, 2008

प्रीतम हम तुम एक हैं जो कहन सुनन में दो


कल विमल भाई ने सांसों की माला लगाकर तबीयत ख़ुश कर दी थी. मेरे पास इस क़व्वाली का एक बहुत बहुत लम्बा वर्ज़न रखा हुआ था पिछले करीब पन्द्रह साल से. मेरे याददाश्त के हिसाब से १९९० में सबसे पहले अपने रघु भाई ('बकर तोतला' फ़ेम रघुवीर यादव) ने मुझे यह सुनवाया था. वे तो सफ़र में आते - जाते एक थैले में बाबा नुसरत का अपना पूरा संग्रह बाकायदा साथ लेकर चलते थे.

इस को सुनते हुए मुझे हमेशा हरे चरागाहों पर अनन्त तक भागते चले जाने की इच्छा होती है.

ख़ैर, विमल भाई को मैंने कल ही तुरन्त फ़ोन लगाया कि मैं उन्हें यह वर्ज़न अपलोड करने के बाद भेज रहा हूं. साहब, यकीन मानिये मैंने करीब पांच - छः घन्टे इस काम में लगाए पर कुछ बात बनी नहीं. एक तो हल्द्वानी का अपेक्षाकृत धीमा ब्रॉडबैन्ड, ऊपर से करीब तीस एम बी की यह फ़ाइल. कल यह काम नहीं बन पाया. आज इन्टरनैट आर्काइव की फिर याद आई और आख़िरकार एक घन्टे में काम बन गया.

विमल भाई और उदय प्रकाश जी और दोस्त दीपक सांगुड़ी के साथ आप भी सुनिये यह दुर्लभ रचना।

बाबा नुसरत ज़िन्दाबाद!

* पता नहीं क्यों इन्टरनैट आर्काइव से यह फ़ाइल हटा दी गई है. इस का एक ट्रेलर भर लाइफ़्लॉगर पर अपलोड हो सका. फ़िलहाल उसी से काम चलाने का कष्ट करें. असुविधा के लिये माफ़ी.

Monday, May 26, 2008

साँसों की माला पे सिमरूँ..एक भजन....उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खाँ

उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खाँ साहब की गायकी के बारे में यही कहा जा सकता है कि एक बार भी सुन लीजिये इस आवाज़ को तो मुरीद हो ही जाएंगे,उनकी कव्वालियाँ तो हमने बहुत सुनी है और उनके साथ गार्बरेक से लेकर बहुत से नाम हैं जो हमेशा उनकी आवाज़ के साथ प्रयोग करते रहे.... जिसे सुनना हमेशा सुखद रहा है....पर आज मैं उनकी अलग सी रचना आपके लिये लेकर आया हूँ .... ये भजन है पर इस भजन को उस्ताद नुसरत फ़तेह अली साहब ने अपने ही चिरपरिचित अंदाज़ में गाया पर इस रचना में खास बात है कि ये हिन्दी में है....मुझे पता नहीं है कि ये किस अलबम से है दरअसल ये रचना अंतर्जाल पर तलाशते हुए मिली है..कुछ अधूरी भी है पर बेहतर रचना थोड़ा भी सुन लें तो आनन्द तो आ ही जाता है..तो सुनिये एक भजन कव्वाली के अंदाज़ में, उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खां साहब से.....
सांसों की माला पे सिमरूँ मैं पी का नाम....

Sunday, May 25, 2008

वो जंगल, वो नदी !

पूरे पखवाड़े बाद अमेज़न के जंगलों से लौटा हूँ. अमेज़न महानद में चार दिन, दिन-रात नाव पर यात्रा करते हुए हज़ारों वर्ग किलोमीटर भाँसी जंगल पार किए, बस्तियों से होकर गुज़रा, शहरों में टहला, लोगों से बतियाया, उनके गीत सुने, उनके सुख बाँटे, दुख जाने, चौवन मीटर ऊँची मीनार से अमेज़न के जंगलों का विहंगम दृश्य देखा. छोटी नाव पर भी यात्रा की. टुक्की टुक्की तक नदी में डूबे विशाल पेड़ देखे. रात के अँधेरे में जंगलों की चुप्पी को सुना, पिराना मछली के दाँत देखे, एक घड़ियाल के बच्चे की पीठ पर हाथ फेरा, नदी में हाथ बढ़ाकर सफ़ेद कमलिनी का फूल तोड़ा, उसकी मदहोश कर देने वाली भीनी भीनी सुगंध को अपने नथुनों में भरा, ब्राज़ील में कैपरीनिया के घूँट चखे, रियो दे जनेरो के कोपाकबाना साहिल पर लुटा और फिर लौटा. विस्तार का इंतज़ार करो कबाड़ियों. तस्वीरें भी होंगी.

राजेश जोशी

Saturday, May 24, 2008

रहें आज़ाद इस जग में हमको दुनिया से यारी क्या


परसों मेरे मेलबॉक्स में हरी मिर्च वाले मनीष जोशी जी के दो मेल थे. पहली वाली के मार्फ़त से मुझे पंडित भीमसेन जोशी का गाया कबीरवाणी वाला पूरा अलबम था. उस से दो हिस्से आप पहले सुन चुके हैं. दूसरी वाली में एक और ज़बर्दस्त चीज़ थी. २००६ में आशा भोंसले ने यूनीवर्सल रेकॉर्डस से 'कहत कबीर' संग्रह जारी किया था. आशा भोंसले की आवाज़ में कबीर को सुनना बहुत सुखद अनुभव था. इस संग्रह से आपको सुनवाता हूं अपना पसंदीदा पीस.

Friday, May 23, 2008

मत कर मोह तू

आज सुबह आपने पंडित भीमसेन जोशी के स्वर में कबीरदास जी का भजन सुना था. अब सुनिये उसी अलबम से एक और भजन.

आखिर मट्टी में मिल जाना: पं. भीमसेन जोशी


कबाड़ख़ाने पर आपने पंडित कुमार गन्धर्व जी को कबीरवाणी गाते हुए सुना है। कुमार जी के दिव्य स्वर में कौन ठगवा नगरिया लूटल हो, निरभय नुरगुन गुन रे गाऊंगा, झीनी चदरिया और अवधूत गगन घटा गहरानी जैसी रचनाओं के बाद आज मैं आपको सुनवाता हूं एक और महागायक पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ में कबीर।



(यह अलबम अमेरिका से चलकर हरी मिर्ची वाले मनीष जोशी जी के मार्फ़त मुझ तक पहुंचा है। जल्द ही आप को इस से कुछ और भी सुनाया जाएगा).

Thursday, May 22, 2008

गन्दी कोयले सरीखी चीज़ें हीरों में तब्दील हो चुकी होती हैं और चमकदार धातुएं जंग में

बॉब डिलन और जोन बायेज़

कहा जाता है कि जोन बाएज़ का गाया 'डायमंड्स एंड रस्ट' (१९७५) मशहूर गायक और गीतकार बॉब डिलन से प्रेरित और उन्हीं को समर्पित है. १९६० के दशक में बॉब से जोन का प्रेम-संबंध रहा था. हालांकि बॉब के अनुसार यह गीत जोन ने अपने पति डेविड हैरिस के लिये रचा था लेकिन स्वयं बाएज़ ने बाद के सालों में स्वीकार किया कि वास्तव में बॉब डिलन ही इस गीत की प्रेरणा थे. ख़ैर गीत का कुल सार यह है कि स्मृतियां अपने साथ हीरे और जंग लेकर आती हैं (गन्दी कोयले सरीखी चीज़ें हीरों में तब्दील हो चुकी होती हैं और चमकदार धातुएं जंग में). कला-समीक्षकों का मानना है कि यह गीत जोन बाएज़ की सर्वश्रेष्ठ रचना है.



Well I'll be damned
Here comes your ghost again
But that's not unusual
It's just that the moon is full
And you happened to call
And here I sit
Hand on the telephone
Hearing a voice I'd known
A couple of light years ago
Heading straight for a fall

As I remember your eyes
Were bluer than robin's eggs
My poetry was lousy you said
Where are you calling from?
A booth in the midwest
Ten years ago
I bought you some cufflinks
You brought me something
We both know what memories can bring
They bring diamonds and rust

Well you burst on the scene
Already a legend
The unwashed phenomenon
The original vagabond
You strayed into my arms
And there you stayed
Temporarily lost at sea
The Madonna was yours for free
Yes the girl on the half-shell
Would keep you unharmed

Now I see you standing
With brown leaves falling around
And snow in your hair
Now you're smiling out the window
Of that crummy hotel
Over Washington Square
Our breath comes out white clouds
Mingles and hangs in the air
Speaking strictly for me
We both could have died then and there

Now you're telling me
You're not nostalgic
Then give me another word for it
You who are so good with words
And at keeping things vague
Because I need some of that vagueness now
It's all come back too clearly
Yes I loved you dearly
And if you're offering me diamonds and rust
I've already paid

प्लीज़ कम टू बोस्टन


पिछली पोस्ट में किया गया वायदा निभा रहा हूं. पेश है जोन बाएज़ का गाया, डेव लॉगिन्स का लिखा गीत 'प्लीज़ कम टू बोस्टन'



Please come to Boston in the springtime
I'm stayin' here with some friends and they've got lotsa room
You can sell your paintings on the sidewalk
By a café where I hope to be workin' soon
Please come to Boston
I said, 'No, would you come home to me?'

And I said, 'Hey ramblin' boy now won't cha settle down?
Boston ain't your kinda town
There ain't no gold and there ain't nobody like me...
I'm the number one fan of the man from Tennessee'

Please come to Denver with the snowfall
We'll move up into the mountains so far that we can't be found
And throw 'I love you' echoes down the canyon
And then lie awake at night till they come back around

Please come to Denver
I said, 'No, boy, would you come home to me?'

And I said, 'Hey ramblin' boy why don't cha settle down?
Denver ain't your kinda town

There ain't no gold and there ain't nobody like me
'Cause I'm the number one fan of the man from Tennessee'

Now this drifter's world goes 'round and 'round
And I doubt that it's ever gonna stop
But of all the dreams I've lost or found
And all that I ain't got
I still need a clean to
Somebody I can sing to

Please come to LA to live forever
California life alone is just too hard to build
I live in a house that looks out over the ocean
And there's some stars that fell from the sky
Livin' up on the hill
Please come to LA
But I just said, 'No, boy, won't you come home to me?'

And I said, 'Hey ramblin' boy why don't cha settle down?
LA can't be your kinda town
There ain't no gold and there ain't nobody like me...
No, no, I'm the number one fan of the man from Tennessee'

बांग्लादेश का गीत: जोन बाएज़ की आवाज़

अपने समूचे जीवन में हिंसा और युद्ध का खेल खेलने वाली अमरीकी और अन्य राजसत्ताओं का प्रखर विरोध करने वाली अमरीकी लोकगायिका जोन बाएज़ ने मानवाधिकारों के हनन के ख़िलाफ़ अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल अनेक देशों में जाकर किया. उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता और उनके सरोकारों के दायरे उनके गीतों के माध्यम से आपके सामने आते हैं और आप एकबारगी हतप्रभ रह जाते हैं.

बाएज़ का जन्म ९ जनवरी १९४१ को स्टैटन आइलैण्ड, न्यूयॉर्क में हुआ था. उनके पिता अल्बर्ट वी. बाएज़ बहुत छोटी उम्र में मैक्सिको से अमेरीका आ गए थे जबकि उनकी मां मूलतः ब्रिटिश थीं. अल्बर्ट पेशे से भौतिकविज्ञानी थे. उनकी लातीनी रंगत जोन ने विरासत में पाई थी जिसके कारण बचपन में संभवतः उन्हें रंगभेदी टिप्पणियों से दो चार होना पड़ा था और जिसके परिणाम बाद में उनके संगीत में देखे गए. अपने माता-पिता की अतिधार्मिकता से ज़रा भी प्रभावित न होने का दावा करने वाली जोन बाएज़ मानती हैं कि सामाजिक सरोकारों के प्रति उन्हें उनके माता-पिता ने ही सजग किया.

बचपन से ही घर में उन्हें शास्त्रीय संगीत का माहौल मिला लेकिन पियानो की जगह उन्हें गिटार और रॉक एन्ड रोल ने ज़्यादा आकर्षित किया. जोन के पिता का पेशा कुछ ऐसा था कि परिवार को दुनिया भर के शहरों में घूमते रहना होता था. जब वे दस साल की थीं, उनके परिवार को एक साल के लिये ईराक में रहना पड़ा. ईराक में देखी निर्धनता और खराब राजनैतिक स्थिति उनके जेहन में बहुत देर तक ठहरी रहीं और उनके एक गीत का विषय बनीं.

जोन ने थोड़े समय के लिये बोस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाई की. इस दौरान उन्हें कुछ लोकगायकों से मिलने का मौका हासिल हुआ - यह संगीत की उनकी पहली आधिकारिक तालीम का दौर साबित हुआ. साधारण लोकगीत गाने के साथ साथ जोन बाएज़ ने तमाम देशों के लोकगीत, धर्मगीत और ब्लूज़ वगैरह गाने शुरू किये. गायन की तकनीक सीखने के साथ साथ बाएज़ ने कॉफ़ीहाउसों में गाना शुरू किया, जहां छात्रों के बीच वे बहुत लोकप्रिय हुईं. इसी दौरान दूसरे गायकों ने भी उन के गायन का नोटिस लिया और मशहूर कैरेबियन गायक हैरी बैलाफ़ोन्टे ने तो उन्हें अपने ग्रुप के साथ काम तक करने का प्रस्ताव दिया.

१९५९ की गर्मियों में बाएज़ को रोड आइलैण्ड में होने वाले न्यूपोर्ट लोक समारोह में गाने के लिये आमंत्रित किया गया. इस बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर गाने के बाद वे बाकायदा एक स्टार बन गईं और पीट सीगर समेत तमाम बड़े गायकों से उनकी मित्रता हो गई. हालांकि उन्हें रेकॉर्डिंग कम्पनियों की तरफ़ से कई प्रस्ताव भी मिले पर उन्होंने बोस्टन के कॉफ़ीहाउसों में गाना नहीं छोड़ा. १९६० में ही वैनगार्ड ने उनका पहला अलबम निकाला. 'जोन बाएज़' नाम के इस अलबम ने उन्हें सारे पश्चिमी जगत और ख़ासतौर पर युवा पीढ़ी का चहेता बना दिया.

वियतनाम युद्ध के बाद के सालों में अमरीकी नीतियों का सतत विरोध करने के एवज़ में उन्हें दो बार गिरफ़्तार भी किया गया. बाएज़ के पति डेविड हैरिस को भी सरकारी नीतियों का विरोध करने की वजह से बीस महीने जेल में काटने पड़े थे.

राजनीति और मानवाधिकार उनके सरोकारों में हमेशा सबसे ऊपर रहे. १९९३ में रिफ़्यूजीज़ इन्टरनेशनल द्वारा उन्हें बोस्निया-हर्ज़गोवीना के शरणार्थी शिविरों की दुर्दशा देखने के लिये विशेष न्यौता मिला. फ़िलहाल पिछले कई सालों से पर्यावरण भी उनकी चिन्ताओं में एक है.

कल मैंने जोन का एक गीत कबाड़ख़ाने में सुनाया था. उसके बाद दो टिप्पणियां मिलीं जिन्होंने मेरा काफ़ी उत्साह बढ़ाया.

एक टिप्पणी अमरीका से आई जिसमें बाएज़ का शानदार गीत 'Please Come to Boston' सुनवाने का आग्रह किया गया था. इत्तेफ़ाक से यह गीत भी मेरे कबाड़-संग्रह में है. यह गीत अब अगली पोस्ट में ज़रूर लगाया जायेगा.

श्री अफ़लातून ने बाएज़ की आत्मकथा 'Daybreak' (प्रकाशन:१९६८) का ज़िक्र किया. यहां मैं उन्हें विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि इस आत्मकथा के छपने के बीस साल बाद बाएज़ ने एक और आत्मकथा लिखी थी: 'And a Voice to Sing With'. आलोचक मानते हैं कि दूसरी वाली ज़्यादा प्रामाणिक है क्योंकि अपने दौर में बेस्टसेलर रह चुकने के बावजूद 'Daybreak'में साठ के दशक की रूमानियत थोड़ा ज़्यादा पाई जाती है. फ़िलहाल दोनों किताबें मैंने नहीं पढ़ी हैं.

जोन बाएज़ के बारे में मेरी सारी जानकारी उनके गीतों की सीडीज़ के एक सैट के साथ मिली छोटी सी पुस्तिका तक ही सीमित रह जानी थी यदि श्री अफ़लातून अपने एक ब्लॉग में उनका ज़िक्र न करते. इस लिहाज़ से यह पोस्ट मैं उन्हीं को समर्पित भी करता हूं. मेरे विचार जोन बाएज़ के कुछ गीत ज़रूर सुनने चाहिये, सो अगले एकाध दिन तक यहां यही आवाज़ सुनाई दे शायद कबाड़ख़ाने में.

अभी सुनिये बांग्लादेश की दरिद्रता पर लिखा और गाया बाएज़ का एक गीत 'सॉंग ऑफ़ बांग्लादेश:



Bangladesh, Bangladesh
Bangladesh, Bangladesh
When the sun sinks in the west
Die a million people of the Bangladesh

The story of Bangladesh
Is an ancient one again made fresh
By blind men who carry out commmands
Which flow out of the laws upon which nations stand
Which is to sacrifice a people for a land

Bangladesh, Bangladesh
Bangladesh, Bangladesh
When the sun sinks in the west
Die a million people of the Bangladesh

Once again we stand aside
And watch the families crucified
See a teenage mother's vacant eyes
As she watches her feeble baby try
To fight the monsoon rains and the cholera flies

And the students at the university
Asleep at night quite peacefully
The soldiers came and shot them in their beds
And terror took the dorm awakening shrieks of dread
And silent frozen forms and pillows drenched in red

Bangladesh, Bangladesh
Bangladesh, Bangladesh
When the sun sinks in the west
Die a million people of the Bangladesh

Did you read about the army officer's plea
For donor's blood? It was given willingly
By boys who took the needles in their veins
And from their bodies every drop of blood was drained
No time to comprehend and there was little pain

And so the story of Bangladesh
Is an ancient one again made fresh
By all who carry out commands
Which flow out of the laws upon which nations stand
Which say to sacrifice a people for a land

Bangladesh, Bangladesh
Bangladesh, Bangladesh
When the sun sinks in the west
Die a million people of the Bangladesh

Wednesday, May 21, 2008

उसका लौटना

उसका लौटना

अभी मैंने जाना उसका लौटना
वह जो हमारे मुहल्ले की सबसे खूबसूरत लड़की थी
अब लौट आयी है हमेशा के लिए
शादी के तीन साल बाद वापस

हमारे ही मुहल्ले में
उसे कहाँ रखे -समझ नहीं पा रहा है उसका लज्जित परिवार

उसके शरीर पर पिटने के स्थाई निशान हैं
और चेहरे पर
उतना ही स्थाई एक भाव जिसे मैं चाहूँ तो भी नाउम्मीदी नहीं कह सकता

जहाँ लौटी है
वह एक क़स्बा है जिसे अपने ही जैसे अनगिन हिन्दुस्तानी क़स्बों की तरह
शहर बनने की तीव्र इच्छा और हड़बड़ी है
हालांकि मालिक से पिटा ठर्रा पीकर घर लौटता एक मज़दूर भी
औरत के नाम पर
पूरा सामन्त हो जाता है यहाँ

तीन बरस दूसरे उपनाम और कुल-गोत्र में रहने की
असफल कोशिश के बाद
वह लौटी है
दुबारा अपने नाम के भीतर खोजती हुई
अपनी वही पुरानी सुन्दर पहचान

महान हिन्दू परम्पराओं के अनुसार कुल-गोत्र में उसकी वापसी सम्भव नहीं
तब भी उसने अपनाया है
दुबारा वही उपनाम
जिसे वह छोड़ गई थी अपने कुछ गुमनाम चाहने वालों की स्मृतियों में कहीं
आज उसे फिर से पाया है उसने
किसी खोये हुए क़ीमती गहने की तरह

जहाँ
डोली में गई औरत के अर्थी पर ही लौटने का विधान हो
वहाँ वो लौटी है
लम्बे-लम्बे डग भरती
मिट चुकने के बाद भी

उसके उन साहसी पदचिन्हों की गवाह रहेगी
ये धरती

हमारे देश में कितनी औरतें लौटती हैं
इस तरह
जैसे वो लौटी है बिना शर्मिन्दा हुए
नज़रें उठाए ?

वो लौटी है
अपने साल भर के बच्चे को छाती से चिपटाए
अपने बचपन के घर में

पहले भी घूमते थे शोहदे
हमारी गली में
लेकिन उनकी हिम्मत इतनी नहीं बढ़ी थी
तब वो महज इस मुहल्ले की नहीं
किसी परीलोक की लड़की थी

पर अब कोई भी उधेड़ सकता है सीवन
उसके जीवन की
कितने ही लालच से भरकर
राह चलते कंधा मार सकता है उसे
प्रतिरोध की कोई ख़ास चिंता किए
बग़ैर

कुछ उसके मृत पिता
और कुछ उसकी वापसी के शोक में निरूपाय-सी
अकसर ही बिलख उठती है उसकी माँ

पता नहीं क्या हुआ
कि अब मुहल्ले में उसके लिए कोई भाई नहीं रहा
कोई चाचा
कोई ताऊ
या फिर ऐसा ही कोई और रिश्ता

एक पुरुष को छोड़ते ही जैसे
कई-कई
पुरुषों से भर गई उसकी दुनिया

खेलती है अकसर
छोटी बहन के साथ बैडमिंटन अपने घर की खुली हुई
बिना मुंडेर वाली खतरनाक छत पर
तो सोचता हूँ मैं
कि यार आख़िर किस चीज़ से बनी होती है औरत !
आग से ?

या पानी से ?

हो सकता है
वह बनी होती हो आग और पानी के मिलने से
जैसे बनती है भाप
और उसे बहुत जल्दी से अपनी ओर खींच लेते हैं

आकाश के खुले हुए हाथ

मैं सोचता हूँ तो वो मुझे
हाथ में रैकेट सम्भाले आकाश की ओर आती सांझ के
रंगीन बादलों सरीखा अपना आँचल फहराती
उड़ती दीखती है
दरअसल

एक अनोखे आत्मसम्मान से भरा
जीवन का कितना असम्भव पाठ है यह
जिसे मेरी कविता
अपने डूबते हुए शिल्प में
इस तरह
वापस घर लौटी एक लड़की से सीखती है !

संडे पोस्ट , २५ मई में प्रकाशित .....

जोन बाएज़ के स्वर में एक गीत



एक अमरीकी चर्च के पादरी चार्ल्स टिन्डली को १९०१ में इस मशहूर गीत को रचने का श्रेय दिया जाता था.हालांकि पीट सीगर इस गीत को रेकॉर्ड करने वाले पहले गायक थे लेकिन कई विशेषज्ञों ने बाद के सालों में इसकी शुरुआत १८०० के आसपास किसी अफ़्रीकी चर्च में खोज निकाली. १९६३ के बाद जोन बाएज़ ने तमाम कॉन्सर्ट्स और विरोध प्रदर्शनों में इसे गाया और बहुत लोकप्रिय बना दिया. यह लोकप्रियता सारी सरहदों को पार कर गई और १९७० और १९८० के दशकों में इस गीत को आयरलैण्ड, दक्षिण अफ़्रीका, तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया, हंगरी और अन्य देशों में गाया गया. भारत में इस गीत की धुन इस कदर पसन्द की गई कि इसके बोल हिन्दी, बांग्ला और मलयालम में लिखे गये. आज भी यह धुन गाहे बगाहे सुनाई दे जाती है. जी हां मैं "हम होंगे कामयाब" की बात कर रहा हूं. इसे देखिये और दुनिये जोन बाएज़ के स्वर में.




(काफ़ी कोशिशों के बावजूद मैं इसका ऑडियो अपलोड नहीं कर सका सो यूट्यूब की शरण लेनी पड़ी. जोन बाएज़ पर एक लम्बी पोस्ट और उनका एक और मशहूर गीत बहुत जल्द आपको कबाड़ख़ाने में नज़र आयेगा. संभवतः आज शाम तक ही.)

Thursday, May 15, 2008

बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं

अकबर इलाहाबादी साहब अपनी तुर्शज़बानी और हाज़िरजवाबी के लिये ज़्यादा जाने जाते हैं. इधर के वर्षों में उनकी शोहरत के लगातर बढ़ते जाने के बावजूद उनकी गम्भीर रचनाएं लगातार हाशिये में ही नज़र आती हैं. उनकी एक ग़ज़ल मुझे अति प्रिय है. कुन्दनलाल सहगल साहब की आवाज़ में सुनिये अकबर इलाहाबादी की वही रचना:

दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं

ज़िन्दा हूं मगर जीस्त की लज़्ज़त नहीं बाकी़
हरचन्द कि हूं होश में हुशियार नहीं हूं

इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊंगा बेलौस
साया हूं फ़क़त नक्श-ब-दीवार नहीं हूं

वो गुल हूं ख़िज़ा ने जिसे बरबाद किया है
उलझूं किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूं


खट खुट करती छम छुम करती गाड़ी हमरी जाये



'मदर इन्डिया' की याद है ना! मेहबूब ख़ान ने १९४० में स्वयं बनाई ब्लैक एन्ड व्हाइट फ़िल्म 'औरत' के मेगा - रीमेक के तौर पर इस बड़ी फ़िल्म को १९५७ में प्रस्तुत किया था. 'मदर इन्डिया' ऑस्कर के लिये नामांकित होने वाली पहली भारतीय फ़िल्म थी. सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म की श्रेणी में उस साल फ़ेदेरिको फ़ेलिनी की 'नाइट्स ऑफ़ कैबेरिया' बाज़ी मार ले गई थी.

मेहबूब ख़ान की यह फ़िल्म दर्शकों के मन में नर्गिस की फ़िल्म के रूप में ज़्यादा गहराई से अंकित हुई है. आप नर्गिस के बिना इस फ़िल्म की कल्पना ही नहीं कर सकते. भारतीय स्त्री की पीड़ा के सारे आयामों को छूने वाली यह फ़िल्म आज भी हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास में मील का पत्थर बनी हुई है.

सिने - जगत में इस फ़िल्म का प्रभाव इस क़दर गहरा था कि सन १९६० में रिलीज़ हुई 'कालाबाज़ार' (निर्देशक: विजय आनन्द) में देव आनन्द को 'मदर इन्डिया' के शो के टिकट ब्लैक करते हुए दिखाया गया.

इस फ़िल्म का संगीत भी शानदार था. शकील बदायूंनी के बोलों को नौशाद अली ने संगीतबद्ध किया था. सुनिये इसी फ़िल्म के दो गाने. शमशाद बेग़म का गाया 'पी के घर आज प्यारी दुलहनिया चली' मेरा ऑल-टाइम फ़ेवरेट है. उस के बाद गाड़ी वाला गाना (लन्दन में रहने वाले राजेश जोशी इस बात की तस्दीक करेंगे).



पी के घर आज प्यारी दुलहनिया चली



ओ गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक रे

Wednesday, May 14, 2008

केसर चुन्दरी रंगा दे पियवा

सुनिये शोभा गुर्टू की आवाज़ में चैती ताल में दीपचन्दी

धूमिल की डायरी के दो अंश


हिन्दी कविता में विशिष्ट स्थान रखने वाले कवि के तौर पर प्रतिष्ठित सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'को मुख्यतः उनके संग्रह 'संसद से सड़क तक' के लिये याद किया जाता है. आज़ाद भारत की भोथरी पड़ चुकी राजनीति से खिन्न हो कर उन्होंने एक दफ़ा लिखा था:

बीस साल बाद
सुनसान गलियों से
चोरों की तरह गुजरते हुए
अपने आप से सवाल करता हूँ
क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है?
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है ?


कल यूं ही पुरानी पत्रिकाएं पलटते हुए मेरी निगाह उनकी डायरी के कुछ अंशों पर टिक गई. एक जगह वे महान रचना की मूलभूत परिभाषा देते हैं और फिर उस परिभाषा की सान पर प्रेमचन्द के लेखन को परखते हैं :

"जिस लेखक का खलनायक जितना सशक्त होता है उसका लेखन उतना ही विस्तृत, गहरा और सक्षम होता है क्योंकि उस खलनायक के घेराव और पतन के किये अत्यधिक जागरूकता, समझ से भरी हुई साहसिकता और संघर्ष के सटीक और सही कौशल से भरी कारगर कल्पनाशीलता की ज़रूरत होती है. ये सारी बातें सर्जनात्मक स्तर पर सार्थक होकर एक 'महान' रचना बन जाती हैं.

प्रेमचन्द में, आप उनका समूचा लेखन देख जाइये, कहीं भी खलनायक पात्र के रूप में नहीं हैं. बनिये, ज़मींदार, ब्राह्म, सरकारी कर्मचारी, ये सब उनके यहां सामाजिक प्राणी हैं. ये खलनायक नहीं हैं बल्कि खलनायक के हथियार हैं. फिर खलनायक कौन हैं वहां? मेरे विचार से प्रेमचन्द के लेखन में हिन्दुस्तानी आदमी, हिन्दुस्तानी कौम के भीतर का दास मन है."

हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के अन्तिम दिनों और उनके शिष्य नामवर सिंह को लेकर उनके विचार बेबाक हैं और आप देख सकते हैं कि आज से छत्तीस साल धूमिल नामवर सिंह के 'नामवर' बने रहने की ट्रिक को ताड़ गये थे:

"डा. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी को लगातार इस्तेमाल होते रहने की लत पड़ गई है. जब उनका इस्तेमाल होता है यानी जब वे दो-चार आदमियों से घिरे रहते हैं वे बेहिसाब ठहाके लगाते हैं और गूंजते हुए बैठे रहते हैं. लेकिन जब उनका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा होता है, वे एक अजीब सी बेचैनी से भर जाते हैं छूछे घड़े में भरी हवा की तरह उनकी देह हाय-हाय करती हुई. वे तब एक पल भी बैठ नहीं पाते. तुम ध्यान से उन्हें कभी कभार सड़क की पटरी पकड़ कर जाते हुए देखो- ऐसा मृत मुख अधखुला और सांयसांय ... कि हाय! जैसे कोई मर गया है और चल रहा है.

नामवर के साथ अभी यह हुआ नहीं है. नामवर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उनके बाप तक ने उनका इस्तेमाल कर पाने में अपने को असमर्थ पा लिया है. इस्तेमाल से बचते रहना नामवर की आदत नहीं तरकीब का हिस्सा है. दिक्कत सिर्फ़ तभी होती है कि एक तरकीब से दूसरी तरकीब निकालते रहने की आदत का शिकार वे अकसर हो जाया करते हैं."

(इण्डिया टुडे साहित्य वार्षिकी १९९५-९६ से साभार. धूमिल का स्केच www.anubhuti-hindi.org से साभार)
संबंधित सामग्री इन जगहों पर भी देखें:
http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/dhoomil/index.htm
http://hindini.com/fursatiya/?p=129
http://hindini.com/fursatiya/?p=130

Tuesday, May 13, 2008

ओम अष्ट धातुओं के ईंटों के भट्ठे, ओम महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे

बाबा नागार्जुन (१९११-१९९८)

कांग्रेसी राजनीति की निन्दा करने वाले साहित्यकारों में सबसे मुखर स्वरों में एक था बाबा नागार्जुन का. उन्हीं दिनों की एक कविता है 'मंत्र कविता'. २००५ में रिलीज़ हुई संजय झा की फ़िल्म 'स्ट्रिंग्स: बाउन्ड बाइ फ़ेथ' से बाबा नागार्जुन की यही अतिविख्यात कविता (रचनाकाल: १९६९) सुनिये. गाने वाले हैं असमिया मूल के ज़ुबीन गर्ग. तब से अब तक हालात कितने बदले हैं आप ख़ुद जान जाएंगे.

जब से तूने मुझे दीवाना बना रक्खा है ...


आजकल मैं रत्ना बसु के संगीत का दीवाना बना हुआ हूं.कामकाज से जब भी फ़ुरसत मिलती है (जो कि आजकल बेहद कम ही मिल पा रही है) इस संगीत के साये में खुद को समर्पित कर देता हूं,और क्या कहू ! तो सुनते हैं- जब से तूने मुझे दीवाना बना रक्खा है ...

गिरफ़्तार हो जाना अलग बात है, ख़ास बात है आत्मसमर्पण न करना.

जेल में लिखी नाज़िम हिकमत की एक और कविता

इस तरह से

मैं खड़ा हूं बढ़ती रोशनी में,
मेरे हाथ भूखे, दुनियां सुन्दर

मेरी आंखें समेट नहीं पातीं पर्याप्त पेड़ों को -
वे इतने उम्मीदभरे हैं, इतने हरे.

एक धूप भरी राह गुज़रती है शहतूतों से होकर
मैं जेल-चिकित्सालय की खिड़की पर हूं.

सुंघाई नहीं दे रही मुझे दवाओं की गन्ध -
कहीं पास ही में खिल रहे होंगे कार्नेशन्स.

यह इस तरह है:
गिरफ़्तार हो जाना अलग बात है
ख़ास बात है आत्मसमर्पण न करना.

आस्थावादी आदमी

पिछले दिनों आपने नाज़िम हिकमत की कुछ कविताएं पढ़ी थीं. आज नाज़िम की एक और कविता पढ़िये

आस्थावादी आदमी

बचपन में उसने कभी मक्खियों के पंख नहीं नोचे
बिल्लियों की दुम में टीन के डब्बे नहीं बांधे उसने
न माचिस की डिबिया में बन्द किये भौंरे
या रौंदी दीमकों की बांबियां

वह बड़ा हुआ
और ये तमाम काम उसके साथ किये गए

मैं उसके सिरहाने पर था जब वह मरा

उसने कहा मुझे एक कविता पढ़्कर सुनाओ
सूर्य और समुद्र के बारे में
परमाणु भट्टियों और उपग्रहों के बारे में
मनुष्य की महानता के बारे में.

Monday, May 12, 2008

उम्र-ए-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन

बहादुर शाह ज़फ़र की यह बेहद मशहूर ग़ज़ल गा रहे हैं जनाब हबीब वली मोहम्मद. हबीब साहब को आप कबाड़ख़ाने में पहले भी सुन चुके हैं. उनका परिचय जानने के लिये और उनकी गाई एक और ग़ज़ल यहां सुनी जा सकती है.

boomp3.com

ना नींद नैनां ना अंग चैना ना आप ही आवें ना भेजें पतियां

अमीर ख़ुसरो साहब की इस विख्यात रचना से मेरा पहला परिचय फ़िल्म 'ग़ुलामी' में हुआ था. जे. पी. दत्ता की इस मल्टीस्टारर फ़िल्म की बस एक ही याद बाक़ी है - 'ज़ेहाल-ए-मिस्किन ...' से शुरू होने वाला गीत. फ़िल्म जब आई थी तब मैं छोटा था और ज़्यादा चीज़ें समझ नहीं आती थीं. ज़ेहाल-ए-मिस्किन का मतलब समझ में नहीं आता था और जब थोड़ी बहुत जिज्ञासा हुई भी तो बताने वाला कोई न था. दस बारह साल पहले इसी मूल रचना को छाया गांगुली की आवाज़ में सुना तो आनन्द आया पर 'ज़ेहाल-ए-मिस्किन' का अर्थ जानने की इच्छा होने के बावजूद मैंने पर्याप्त कोशिशें नहीं कीं.

अभी तीनेक दिन पहले वही सीडी दुबारा से सुनना शुरू किया तो काफ़ी सारी स्मृतियां लौट कर आईं. इस बार मैंने कोताही नहीं दिखाई और कहीं से पहले तो मूल रचना खोजी. हिन्दी में तो अनुवाद नहीं मिला पर एक अनाम साहब द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद http://www.justsomelyrics.com/ पर मिल गया. पेश है छाया गांगुली की आवाज़ में यह शानदार रचना. पहले बोल देखिये और उसके बाद ख़ाकसार का अंग्रेज़ी से किया हुआ भावानुवाद:




ज़ेहाल-ए-मिस्किन मकुन तग़ाफ़ुल, दुराये नैना बनाए बतियां
कि ताब-ए-हिज्रां नदारम अय जां, न लेहो काहे लगाए छतियां

चो शाम-ए-सोज़ां चो ज़र्रा हैरां हमेशा गिरियां ब इश्क़ आं माह
ना नींद नैनां ना अंग चैना ना आप ही आवें ना भेजें पतियां

यकायक अज़ दिल बज़िद परेबम बबुर्द-ए-चश्मश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाएं प्यारे पी को हमारी बतियां

शबान-ए-हिज्रां दराज़ चो ज़ुल्फ़ वा रोज़-ए-वस्लस चो उम्र कोताह
सखी़ पिया को जो मैं ना देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां

(आंखें फ़ेरकर और कहानियां बना कर यूं मेरे दर्द की अनदेखी न कर
अब बरदाश्त की ताब नहीं रही मेरी जान! क्यों मुझे सीने से नहीं लगा लेता

मोमबत्ती की फड़फड़ाती लौ की तरह मैं इश्क़ की आग में हैरान-परेशान फ़िरता हूं
न मेरी आंखों में नींद है, न देह को आराम, न तू आता है न कोई तेरा पैगाम

अचानक हज़ारों तरकीबें सूझ गईं मेरी आंखों को और मेरे दिल का क़रार जाता रहा
किसे पड़ी है जो जा कर मेरे पिया को मेरी बातें सुना आये

विरह की रात ज़ुल्फ़ की तरह लम्बी, और मिलन का दिन जीवन की तरह छोटा
मैं अपने प्यारे को न देख पाऊं तो कैसे कटे यह रात)

ऊपर वाला प्लेयर काम न करे तो इस वाले को ट्राइ करें:

boomp3.com

Sunday, May 11, 2008

राजा और किले का किस्सा - शिरीष कुमार मौर्य

यह कविता 14 मई 1994 की रात लगभग बौखलाहट में लिखी, जब समाचार में सुना कि उमेश डोभाल के हत्यारे को सी0बी0आई0 की विशेष अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया है। इस कविता के कुछ पोस्टर भी बने और उत्तराखंड के कुछ शहरों की दीवारों पर दिखाई दिए। इस कविता से मेरा उमेश चाचा की वजह से एक भावात्मक लगाव है।

राजा और किले का किस्सा
उमेश डोभाल की स्मृति में

एक है राजा
राजा अमनपसन्द है और अदबपसन्द भी

राजा शांति चाहता है राजा चाहता है झुकी हुई गरदनें
बंधे हुए हाथ
वह चाहता है उसके सामने कोई मुंह न खोले जब उसकी मर्जी हो तब बोले !

राजा के पास है किला
जिसमें राजा की पूरी-पूरी सुरक्षा है
किला शहर से बाहर है
आदमी से दूर किले की अपनी भाषा है
अपना मुहावरा

किले में जब भी राजा का खून गरमाता है
वह दरबार लगाता है
एक दरबार खास होता है और एक आम होता है
एक दरबार में काम होता है
और दूसरे से नाम होता है

दरबार में होते हैं दरबारी
जी-हुजूरिये
जिनकी सहायता से राजा इंसाफ करता है
जिसे चाहे दंड देता है जिसे चाहे माफ करता है

दरबार से बाहर होती है प्रजा
प्रजा बेचारी दुखी रहती है
अपने दुखों में
बालू के ढेर-सी ढहती है

एक दिन
प्रजा के बीच से निकलता है
एक आदमी
और किले के सामने खड़ा हो जाता है
उसकी नजर किले के द्वार से सीधी टकराती है
जिस पर लगी लोहे की जंजीर
अपने आप खड़क जाती है

राजा
इस आदमी से बहुत डरता है
फौरन उसके कत्ल का हुक्म जारी करता है
फिर जब पूरे देश में होता है अंधेरा
और रात गहराती है
किले के पत्थरों से मारे गए आदमी की आवाज आती है

किले की नींव में
उस आदमी का खून सरसराता है
और राजा
रात भर सो नहीं पाता है

फिर आता है अगला दिन
और राजा एक और आदमी को किले के सामने खड़ा पाता है
इस आदमी को देखकर
किले की दीवारें बुरी तरह हिलती हैं

इस आदमी की शक्ल
मारे गए गए आदमी से हू-ब-हू मिलती है !

ग़ालिब हमें न छेड़


इक़बाल बानो का नाम ग़ज़ल प्रेमियों में विशिष्ट स्थान रखता है. पाकिस्तानी मूल की इस बेहतरीन गायिका ने बहुत सारी ग़ज़लों को स्वरबद्ध किया है. मिर्ज़ा ग़ालिब की संभवतः सबसे लम्बी ग़ज़ल है "मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए". मुझे याद पड़ता है किसी किताब या पत्रिका में मैंने फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' साहब का एक लम्बा लेख देखा था इस ग़ज़ल के बारे में. हमारे गुलज़ार साहब का बनाया, भूपिन्दर का गाया गीत "दिल ढूंढता है" इसी ग़ज़ल के एक शेर से 'प्रेरित' है.


इक़बाल बानो ने इस कालजयी ग़ज़ल के चन्द शेर गाये हैं. लुत्फ़ उठाइए.





मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए
जोश-ए-कदः से बज़्म चराग़ां किये हुए

करता हूं जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को
अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़गां किये हुए

फिर पुरसिस-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़
सामान-ए-सद-हज़ार नमकदां किये हुए

मांगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियह रुख़ पे परीशां किये हुए

चाहे है फिर किसी को मुकाबिल में आरज़ू
सुरमे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़गां किये हुए

इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह
चेहरा फ़रोग़-ए-मै से गुलिस्तां किये हुए

ग़ालिब हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहया-ए-तूफ़ां किये हुए

Saturday, May 10, 2008

अब ना बजाओ श्याम बांसुरिया

कल आपने पंडित छन्नूलाल मिश्र जी की आवाज़ में 'झूला धीरे से झुलाओ बनवारी' सुना था. आज सुनिये उसी अलबम से एक और रचना 'अब ना बजाओ श्याम बांसुरिया'. मैं तो इस आवाज़ में डूबा हुआ हूं.

कल वाली पोस्ट पर भाई संजय पटेल का बेहतरीन कमेन्ट आया : "... छन्नूलालजी को हमारे गुणी (?)संगीत समीक्षकों को बहुत अंडर एस्टीमेट किया है. एक तो पंडितजी प्रचार प्रसार और नये ज़माने के फ़ंडों से दूर रहने वाले और तिस पर म्युज़िक प्रमोशन के लिये चलती एक ख़ास किसिम की लॉबिंग.इसमें कोई शक नहीं कि ख़रज में डूबी छन्नूलालजी की आवाज़ की खरे पन में एक आत्मीय अपनापन है जैसे अपने गाँव के मंदिर के ओटले के अपने ही मोहल्ले के काका भजन सुना रहे हैं.वे शास्त्रीय संगीते की महफ़िलों में भी इसी सादगी के हामी हैं.पं.अनोखेलालजी के दामाद और जानेमाने युवा तबला वादक श्री रामशंकर मिश्र के पिता पं.छ्न्नूलालजी इलाहाबाद - बनारस की रसपूर्ण परम्परा के वाहक हैं और तामझाम से परे इस नेक और क़ाबिल स्वर-साधक को सुनवाने के लिये साधुवाद आपको." छन्नूलाल जी के संगीत और उनकी शख़्सियत के बारे में उनका यह अंतरंग कमेन्ट हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है.

कुमार गन्धर्व बज़रिये विष्णु चिंचालकर



प्रख्यात चित्रकार विष्णु चिंचालकर द्वारा बनाए कुमार गन्धर्व की भावमुद्राओं के रेखांकन .........


मनमोहन

उसकी थकान

यह उस स्त्री की थकान थी
कि वह हंस कर रह जाती थी

जबकि
वे समझते थे
कि अंततः उसने उन्हें
क्षमा कर दिया !

मनमोहन पिछले ४० बरस से कविता लिख रहे हैं और हिन्दी में सडियल रोग की तरह मौजूद उपेक्षा की हिंसक राजनीति के शिकार रहे है। उनकी ये छोटी सी कविता राजकमल से बमुश्किल अस्तित्व में आए उनके एकमात्र संकलन " जिल्लत की रोटी " से साभार !

धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे

अकेला तू तभी

वीरेन डंगवाल

तू तभी अकेला है जो बात न ये समझे
हैं लोग करोड़ों इसी देश में तुझ जैसे

धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे
दाना पानी देती है वह कल्याणी है
गुटरूं-गूं कबूतरों की, नारियल का जल
पहिये की गति, कपास के हृदय का पानी है

तू यही सोचना शुरू करे तो बात बने
पीड़ा की कठिन अर्गला को तोड़ें कैसे!

बैठा रहा अगर्चे इशारे हुआ किये:

यूनुस ख़ान साहेब के ब्लॉग पर तलत महमूद के कुछ गीत देख/सुन कर मन प्रसन्न हो गया.

कल तलत साहब की बरसी थी. यह सूचना मुझे यूनुस भाई के ब्लॉग से ही मिली. उनका धन्यवाद.

तलत महमूद अपनी तरह के इकलौते फ़नकार थे. उनकी कांपती लहरदार आवाज़ का कोई तोड़ हिन्दी फ़िल्म जगत में नहीं.

उनकी बात चलती है तो मुझे हमेशा'शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूं ...' याद आता है. मजाज़ लखनवी का कलाम और तलत साहब की आवाज़ की जुगलबन्दी सुनकर सीपिया टोन वाली किसी पुरानी फ़िल्म का कोई दृश्य खु़द-ब-ख़ुद बनना शुरू हो जाता है ... रात, एक लैम्प पोस्ट, उड़ता कोहरा, एक पेड़ का ठूंठ, किसी वीरान पार्क की बेन्च पर हौले से थमता किसी सुदूर पेड़ से टूट कर उड़ता आया एक पत्ता ... और सतत ख़ुद्कुशी के बारे में सोचता एक शायराना आशिकमिजाज़ नायक ... पहले उसके जूते ... फिर ...

ख़ैर छोड़िये. मैं तो आपके लिये तलत महमूद साहब की कुछ गज़लें लाया हूं. पहली है अवतार अग्रवाल की लिखी 'चलता रहूं, चलता रहूं'. उसके बाद मिर्ज़ा ग़ालिब की 'उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किये' और अन्त में फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' की 'ख़ुदा वो वक़्त ना लाये कि सोगवार हो तू'.

(श्री संजय पटेल ने ध्यान दिलाया है कि पहले वाली रचना ग़ज़ल नहीं, गीत है. पाठकगण भूल के लिए क्षमा करें. संजय जी का धन्यवाद)







Friday, May 9, 2008

झूला धीरे से झुलाओ बनवारी : एक बार फिर पंडित छन्नूलाल मिश्र

पंडित छन्नूलाल मिश्र जी का गायन मैंने पहली बार अविनाश के मोहल्ले पर सुना था. 'मोरे पिछवरवा' सुनने के बाद मैं एकदम बौरा सा गया था. उसके बाद पंडिज्जी के संगीत को जमा करने का काम शुरू किया. अब मेरे पास उनका काफ़ी सारा संगीत है.

अविनाश को धन्यवाद कहते हुए मैं आज आपको सुनवा रहा हूं पंडित छन्नूलाल मिश्र के अलबम 'कृष्ण' से एक और रचना

सोचने वाली चीज

'ऐसी किसी भी सोचने वाली चीज पर भरोसा कभी मत करो, जिसके बारे में यह न पता हो कि उसका दिमाग कहां है।'- हैरी पॉटर ऐंड द चैंबर ऑफ सीक्रेट्स

(संदर्भ- यह सूक्ति जिनी वीज्ली (जो सात खंडों की श्रृंखला के छठें खंड में हैरी पॉटर की प्रेमिका और सातवें के अंत में पत्नी बनती है) के पिता आर्थर वीज्ली दूसरे खंड के अंत में बोलते हैं, जब सारा खेल खत्म होते-होते बाल-बाल बच गया है। होता यह है कि अपने बाप की ईमानदारी की सनक के चलते उपजी अपने परिवार की लाइलाज गरीबी से त्रस्त ग्यारह साल की जिनी वीज्ली के हाथ एक सादी डायरी लग जाती है, जिसपर कोई भी बात लिखने पर प्रतिक्रिया या जवाब अपने आप लिखा हुआ आ जाता है। खलनायक वॉल्डेमॉर्ट जिनी की इस ग्रंथि का फायदा उठाते हुए पचास साल पुरानी अपनी इस डायरी के जरिए उसी के हाथों महाविध्वंस को अंजाम देने में लगभग कामयाब हो जाता है। किताब पढ़ते वक्त यह डायरी मुझे चैटरूम या ब्लॉग की याद दिला रही थी।)

तुम क्या जानो प्रीत: पंडित अजय पोहनकर

पंडित अजय पोहनकर के स्वर में सुनिये राग सिन्ध भैरवी में ठुमरी




और राग बिलासखानी तोड़ी में एक कम्पोज़ीशन

तुम्हरि नगरिया की कठिन डगरिया

अभी कुछ नहीं बस एक करुणापूरित ईमानदार पुकार. कोई प्रस्तावना नहीं कोई परिचय नहीं. सुनिये क्यों अभी तक इतने आदरणीय बने हुए हैं कुन्दनलाल सहगल

मुमकिन नहीं अड़े रहना इस टेक पर कि सिर्फ एक ही रास्ता सही है

कुछ माह पहले मोहल्ले पर मैंने निकानोर पार्रा की एक कविता पोस्ट की थी

देखता हूं इधर के कुछ हफ़्तों/महीनों में कबाड़ख़ाने के ज़्यादातर कबाड़ी ख़ामोश बैठे हैं. बहुत ज़्यादा ऐसा कुछ हो भी नहीं रहा जो आत्मा को तसल्ली दे. मैं उसी कविता को सारे मित्रों को दुबारा से पढ़वाना चाहता हूं.

पाब्लो नेरुदा के बाद चिले के सबसे महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं निकानोर पार्रा (जन्म: 5 सितम्बर 1914). उनकी यह अति चर्चित आप सभों के लिए.

युवा कवियों से

जैसा चाहे लिखो
पसन्द आये जो शैली तुम्हें,
अपना लो
पुल के नीचे से बह चुका है इतना खून
मुमकिन नहीं अड़े रहना इस टेक पर
कि सिर्फ एक ही रास्ता सही है
कविता में हर बात की इजाज़त है
बस, शर्त है सिर्फ यही
कि तुम्हें कोरे कागज़ को बेहतर बना देना है


(नोट: मुझे इस कविता के अनुवादक का नाम मालूम नहीं है. वैसे इसका स्व हरजीत समेत कई कवि-लेखकों ने हिन्दी अनुवाद किया था. कॉलेज के दौर की एक डायरी में अचानक मिली इस कविता के अनुवादक का नाम लिखना भूल गया था. वैसे भी अनुवादक को ज्यादा याद रखने का हमारे यहां रिवाज़ कम है.)

Thursday, May 8, 2008

अमेरिका चलो तोहफ़े बांटते हैं आपस में

भारतीयों में अधिक खाना खाने की प्रवृत्ति के बढ़ने से 'चिन्तित' अमेरिका दशकों से कहां-कहां क्या-क्या कितना खा चुका है, यह विस्तार में जाने वाला मसला नहीं रह गया है। दुनिया भर में उसके दैत्यों ने सारा कुछ इस कदर साफ़ और अनावृत्त तरीके से किया है.

ईराक़ संभवतः अभी भी आप लोगों के जेहन में बचा होगा। और मवेशियों की तरह सद्दाम हुसैन का जबड़ा खुलवाये जाने के वीडियो की भी याद होगी. सद्दाम को फांसी दिये जाने का वीडियो तो अमरीकी नंगई का एक ट्रेलर भर था.

युद्ध की विभीषिकाएं लगातार झेलते रहने को अभिशप्त इसी ईराक़ ने आधुनिक साहित्य जगत को सादी यूसुफ़ जैसा महाकवि दिया। उनकी कुछ कविताएं आप पहले भी यहां देख चुके हैं. सादी की एक बहुत लम्बी कविता है 'अमेरिका! अमेरिका!'. अमरीकी महाकवि वॉल्ट व्हिटमैन की कविता शैली की याद दिलाती यह कविता आधुनिक समय का एक अति महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है. (प्रसंगवश बता देना उचित रहेगा कि सादी यूसुफ़ ने वॉल्ट व्हिटमैन का अरबी में अनुवाद भी किया है)

कविता बहुत लम्बी है और उसे यहां पूरा का पूरा दिया जाना संभव नहीं है। मैं उसका एक हिस्सा आपके सामने पेश कर रहा हूं जिसमें अमरीका की कारगुज़ारियों से आजिज़ आ चुका और तबाह कर दिया गया एक मुल्क अमरीका को आपस में तोहफ़े बांटने का प्रस्ताव देता है:

मुझे भी जीन्स, जैज़ और 'ट्रैज़र आइलैण्ड' अच्छे लगते हैं
और जॉन सिल्वर के तोते और न्यू ऑर्लियन्स के छज्जे.
मुझे प्यार है मार्क ट्वेन से, मिसीसिपी की स्टीम बोटों
और अब्राहम लिंकन के कुत्तों से.
मुझे प्यार है गेहूं, मक्का के खेतों और वर्जीनियाई तम्बाकू की महक से
लेकिन मैं अमरीकी नहीं हूं.
क्या यह बात काफ़ी नहीं तुम्हारे फ़ैण्टम पाइलट के लिये
मुझे वापस प्रस्तर - युग में पहुंचा देने को!


न मुझे तेल की ज़रूरत है, न स्वयं अमरीका की, न हाथी की न गधे की.
मुझे बख़्शो पाइलट, बचा रहने दो मेरे घर की छत को,
खजूर की पत्त्यों और लकड़ी के पुल को.
न मुझे तुम्हारा गोल्डन गेट चाहिये, न स्काइस्क्रेपर्स
न मुझे गांव चाहिये, न न्यूयॉर्क ...


इतनी दूर यहां बसरा तक तुम क्यों आये जहां हमारी देहलियों पर मछलियां तैरा करती थीं?
हमारे यहां सूअर तबाही नहीं मचाते.
मेरे पास बस ये भैंसें हैं - अलसाई हुईं, फूल चबाती हुईं
मुझे बख़्शो सिपाही
तैरती हुई मेरी झोपड़ी और मछली मारने वाला मेरा भाला छोड़ो.
मेरी सैलानी चिड़ियों और हरे पंखों को बख़्शो ...


मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं
मैं तो वह हूं जो धान के खेतों में घुटनों घुटनों पानी में चलता है.
मुझे अकेला छोड़ दे मेरे अपने अभिशाप के साथ
मुझे तुम्हारी क़यामत नहीं चाहिये ...


अमेरिका
चलो तोहफ़े बांटते हैं आपस में. तस्करी से लाई गई अपनी सिगरेटें ले लो
और हमें आलू दो
जेम्स बॉन्ड की सुनहरी पिस्तौल वापस ले लो
और हमें दो मर्लिन मुनरो की किशोरियों सी लज्जा.
पेड़ के नीचे धरी हैरोइन की सिरिंज ले लो
और हमें दो वैक्सीनें.
अपने मिशनरियों की किताबें ले लो
और हमें कागज़ दो ताकि हम तुम्हारी निन्दा में कविता लिख सकें.
हमसे वह ले लो जो तुम्हारे पास नहीं है
और हमें वह दो जो हमारे पास है.
अपने झण्डे की धारियां ले लो
और हमें दो सितारे.
अफ़गानी मुजाहिदीनों की दाढ़ियां ले लो
और हमें दे दो तितलियों से भरी
वॉल्ट व्हिटमैन की दाढ़ी.
सद्दाम हुसैन को ले लो
और हमें दे दो अब्राहम लिंकन
या हमें और कोई मत दो ...


(इस कविता के साथ लिंक लगाने की प्रक्रिया में मुझे खुद काफ़ी हैरत हुई कि कबाड़ख़ाने में काफ़ी पहले मैं सादी यूसुफ़ की एक दर्ज़न से ज़्यादा कविताएं पोस्ट कर चुका हूं. यदि आप पढ़ने के शौकीन हैं तो 'अपनी पसन्द का माल छांटें' शीर्षक के नीचे सादी यूसुफ़ वाले सैक्शन में तशरीफ़ ले जाएं)