Tuesday, January 15, 2008

एक नूर से सब जग उपज्या


नुसरत की गुरबानी सीरीज़ को आप यहां और मोहल्ले पर पहले भी सुन चुके हैं। आज प्रस्तुत है उनकी आवाज़ में एक और गुरबानी : "अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बन्दे'।
(१३ मिनट ५० सेकेण्ड)



पांडुलिपियाँ

(कविता के बारे में कुछ सवाल। क्या कविता निजी होनी चाहिए या फिर सार्वजनिक? अगर ये एक निजी अनुभव है तो इसे सार्वजनिक क्यों बनाया जाये और अगर यह सर्व जन के लिए है तो कविता लिखने वाला (कवि नही, कविता लिखने वाला) इसे निजी उपक्रम क्यों माने? क्या कविता निजता में नही उपजती? जनगीत या प्रयाण गीत समाज की उथल पुथल के बीच से निकलते हैं मगर क्या कविता के बारे में भी यही बात कही जा सकती है? क्या वह हमेशा सर्वजन के लिए होनी चाहिए? विचार को ही लें। कुछ विचार नितांत निजी होते हैं, उसी तरह कविता भी नितांत निजी अनुभव क्यों नही होना चाहिए? यह सब लिख चुकने के बाद पंडा के उलाहने और दिपुली के उकसावे के जवाब में यह एकालाप:)

सहयात्रियों के साथ
बढ़ता था उस दिशा में जहाँ
सड़क अंतत:एक स्वप्न बन जाती है,
एक अनिश्चित अफ़वाह
या फिर एक अस्फुट,अर्थहीन मंत्र

देवताओं को तलाशता था
पेड़ों के तनों और
सूखी झाड़ियों के भीतर
पुरानी रंगीन थिगलियों को
हाथों में उठाए अचरज से सोचता
उनके निहितार्थ क्या रहे होंगे?

लकड़ी के प्राचीन बक्सों को खोलकर
कोई किवाड़,कोई कुंडी ढूँढता था
जहाँ किसी ने
सृष्टि के आरम्भ से अब तक
दस्तक न दी हो

एक कच्चा-सा विश्वास था मेरे भीतर
कि पुरानी पांडुलिपियों के नीचे
अवश्य दबा रहता होगा
किसी गुप्त सुरंग का प्रवेश द्वार
जहाँ से नदियों तक पहुँचा जा सकता हो

समय के प्रारम्भ में
लिखकर रख दिया था उन्हें
लगभग हर प्रवेश द्वार के आगे
उन्हें कोई छूता नहीं था
वे समय के अंत तक वहाँ रहीं
वृद्ध द्वारपालों की तरह

(लंदन,2001. नवंबर या दिसंबर में कभी)

Sunday, January 13, 2008

स्वामी विवेकानन्द को सुनिये


कल स्वामी विवेकानन्द का १३४वां जन्मदिन था। मैंने सोचा था कि उनकी आवाज़ को आप तक पहुंचा पाऊंगा पर औडियो अपलोड नहीं कर सका। अब जाकर जब यह अपलोड हुआ है तो दिन बीत चुका है।

यह सीडी मुझे मेरे प्रिय मित्र रविशंकर घोष ने दी थी। हालांकि शंकर ने चेताया था कि इस की वास्तविकता को ले कर अभी विवाद बना हुआ है पर यह तो कबाड़खाना है। यहां हर तरह की मेहनत का मोल है। अगर यह असली है तो क्या कहने। नकली है तो भी क्या कहने। आवाज़ की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती लेकिन मैं उम्मीद करता हूं सुधीजन माफ़ करेंगे। सुनिये १८९३ में अमरीका में स्वामी जी द्वारा दिए गए भाषण के हिस्से।





Sisters and Brothers of America, It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. l thank you in the name of the most ancient order of monks in the world; I thank you in the name of the
mother of religions; and I thank you in the name of the millions and millions of Hindu people of all classes and sects. My thanks, also, to some of the speakers on this platform who, referring to the delegates from the Orient, have told you that these men from far-off nations may well claim the honor of bearing to different lands the idea of toleration. I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true. I am proud to belong to a nation which has sheltered the persecuted and the refugees of all religions and all nations of the earth. I am proud to tell you that we have gathered in our bosom the purest remnant of the Israelites, who came to the southern India and took refuge with us in the very year in which their holy temple was shattered to pieces by Roman tyranny. I am proud to belong to the religion which has sheltered and is still fostering the remnant of the grand Zoroastrian nation. I will quote to you, brethren, a few lines from a hymn which I remember to have repeated from my earliest boyhood, which is every day repeated by millions of human beings:

"As the different streams having there sources in different places all mingle their water in the sea, so, O Lord, the different paths which men take through different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to Thee." The present convention, which is one of the most august assemblies ever held, is in itself a vindication, a declaration to the world, of the wonderful doctrine preached in the Gita:

"Whosoever comes to Me, through whatsoever form, I reach him;
all men are struggling through paths which in the end lead to
Me."

Sectarianism, bigotry, and its horrible descendant, fanaticism, have long possessed this beautiful earth. They have filled the earth with violence, drenched it often and often with human blood, destroyed civilization, and sent whole nations to despair. Had it not been for these horrible demons, human society would be far more advanced than it is now. But their time is come; and I fervently hope that the bell that tolled this morning in honor of this convention may be the death-knell of all fanaticism, of all persecutions with the word or with the pen, and of all uncharitable feelings between persons wending their way to the same goal.

I will tell you a little story. You have heard the eloquent speaker who has just finished say, "Let us cease from abusing each other," and he was very sorry that there should be always so much variance. But I think I should tell you a story which would illustrate the
cause of this variance. A frog lived in a well. It had lived there for a long time. It was born there and brought up there, and yet was a little, small frog. Of course, the evolutionists were not there then to tell us whether the frog lost its eyes or not, but, for our story's sake, we must take it for granted that it had its eyes, and that it every day cleansed the water of all the worms and bacilli that lived in it with an energy that would do credit to our modern bacteriologists. In this way it went on and became a little sleek and fat. Well, one day another flog that lived in the sea came and fell into the well.

'Where are you form?'

'I am from the sea.'

'The sea! How big is that?

Is it as big as my well?' and he took a leap how one side of the well to the other.

'My friend,' said the frog of the sea, 'how do you compare the sea with your little well?'

Then the frog took another leap and asked, 'Is your sea so big?'

'What nonsense you speak, to compare the sea with your well!'

'Well, then,' said the frog of the well, 'nothing can be bigger than my well; there can be nothing bigger than this; this fellow is a liar, so turn him out.'

That has been the difficulty all the while. I am a Hindu. I am sitting in my own little well and thinking that the whole world is my little well. The Christian sits in his little well and thinks the whole world is his well. The Mohammedan sits in his little well and thinks that is the whole world. l have to thank you of America for the great attempt you are making to break down the barriers of this little world of ours, and hope that, in the future, the Lord will help you to accomplish your purpose. ...

उनके लिये जिन्हें दुनियाँ पागल समझती है !!!

एक समय था जब हम कोई थियेटर वर्कशॉप किया करते थे और उस समय उस हॉल में जितने भी कलाकार थे उनकी ऊल जुलूल हरकतों को देखकर लगता था कि दिमागी रूप से खिसके कुछ लोगों का जमावड़ा है,कोई बाहरी देखे तो झट्के से वो इनसबको पागल तो समझ ही लेगा,वैसे भी ब्लॉग जगत में इस तरह के पागलों की कमी भी नहीं है, वैसे ये हमेशा से मेरे साथ तो कम से कम रहा ही है,कि किसी ऐसे व्यक्ति को जो गली मोहल्लों चौराहों ,इस नुक्कड़ से उस नुक्कड़ पर आपको, हमेशा दिख ही जाता है जो महीनों से नहाया नही है कुछ हाथ में एक गठरी है ,जिसमें उसके कुछ ज़रूरी सामान बंधे हैं,और नुक्कड़ के कूड़े से कुछ ना कुछ हरदम अपने लिये तलाशता,उसके बाल सुतलियों में बंटे,जिसकी कम से कम उसे परवाह नहीं,पता नहीं वो सोता भी है या नहीं पर ऐसे प्राणी को देखकर उनको जानने की उत्सुकता मन में हमेशा से रही है पर कभी सफल नहीं हो पाया,

कुछ ऐसा भी कि ऐसे आदमी को किसी भीड़ से अटे ट्रैफ़िक को बीच सड़क पर खड़े होकर संचालित करते देखा है, जाम हुए रास्ते में उसे कोई भाव भी नही दे रहा किसी को उसकी ज़रा भी चिन्ता नहीं ,जिसकी उसे चिन्ता भी नहीं है और वो अपनी तरफ़ से सब कुछ ठीक करने की कोशिश में लगा है, उसके चेहरे पर खीज भी झलक रही है

,अंग्रेज़ी बोलते पागल को तो अनेकों बार देखा ही है, और ऐसा आदमी किसी ढाबे पर खड़ा हो जाय तो तो खाने को कुछ मिल ही जाता है, और इसी तरह के व्यक्ति पर मोहल्ले के बच्चों को लिहो लिहो करते हुए अपने आपको बचाते हुए भी देखा है,

एक बार हम बनारस में किसी जगह नुक्कड़ नाटक कर रहे थे, नाटक खत्म करने के बाद हम दर्शकों से बात चीत में लगे थे थे,सब अपनी अपनी बातें रख रहे थे,उसी समय एक इसी तरह का मैला कुचैला आदमी, जो अपनी गोद में बठे कुत्ते को प्यार से सहला रहा था, उसने ज़ोर से कहा ’ कुछ नहीं होगा? मैने ये कहते सुन लिया था सो मैं उसके पास गया और मैने पूछा ’क्यों चचा, क्यों नही होगा ? आदमी कुछ भी ठान ले, तो वो उसे हासिल तो कर ही सकता है हां देर भले लग जाय.

तो उस आदमी ने कहा ,इस देश में ७४ का आंदोलन सही आंदोलन था, पर जो उस आदोलन को चला रहे थे उन्होने अपना झंडा जे पी को देकर गलत किया था,क्या हुआ उस आंदोलन का? आज जिनके खिलाफ़ लड़ रहे थे वही घूम फिर कर सत्ता पर काबिज़ हैं, तुम भी कम से कम जेपी जैसे लोगों को झंडा मत थमा देना, भईया इसीलिये मैं जानवर से बहुत प्यार करता हूं कम से कम ये धोखा तो नहीं देता उलटे इतना प्यार करते है कि मनुष्य इसकी बराबरी नही कर सकता, मैं ऐसे दीन हीन चेहरे से ऐसे शब्द सुनकर चौंक गया था,

मेरे दिमाग में उस समय कुछ सूझा भी नही पर आज कुछ ऐसे ही लोगों के बारे लिखते हुए मेरे कबाड़्खाने का ढ्क्कन खुल गया था और ये बात उसी कबाड़्खाने से है जो बरसों से बंद पड़ा था .

अभी मै एक गीत आपको सुनाना चाहता हूं, जो शायद ऐसे लोगों पर लिखा इस तरह का अनूठा गीत है, मुश्किल मेरी ये है कि मैं भी भाव ही समझता हूं, , पर आप सुनिये और किसी समझदार व्यक्ति जो बंगला जानता हो उससे इसका अर्थ समझ लिजियेगा ये रचना कबीर सुमन की है जो पहले सुमन चक्रवर्ती के नाम से जाने जाते थे , कब अपना नाम बदल लिया मुझे मालूम नही,पर ये गाना उनको समर्पित जिन्हें दुनियाँ पागल समझती है !!!

पागोल साँप लूडो खेलेछे बिधातार शोंघे....{ कबीर सुमन }

Saturday, January 12, 2008

मनोहर श्याम जोशी की एक कविता और 'क्याप' का मूली फसक

(पोस्ट: सिद्धेश्वर सिंह)

मनोहर श्याम जोशी ने हिन्दी कथा साहित्य को न केवल 'कुरू-कुरू स्वाहा', 'कसप', 'हरिया हरक्यूलीज की हैरानी', 'टटा प्रोफेसर', 'क्याप' जैसे अद्भुत उपन्यास दिये हैं बल्कि हिन्दी पत्रकारिता को नई दिशा देने के साथ ही हिन्दुस्तानी टेलीविजन और सिनेमा की दुनिया को बनाने और बदलने का रास्ता भी दिखाया है। उनके समूचे लेखन को एक शब्द में समेटने की पाठकीय जुर्रत करूं तो मैं उसे एक असमाप्त 'फसक' (गप्प) कहना चाहूंगा. उनकी गप्प का एक दुर्लभ रूप उस समय देख्नने को मिला था जब म.गा.अं.हि.विश्वविद्यालय, वर्धा के 'हिन्दी कथा साहित्य और उपन्यास' वाले वर्कशाप (नैनीताल,११ जून से १ जुलाई २००२ ) में वे मेरे अध्यापक बने थे और खुद को 'वीर बालक' तथा हम प्रतिभागियों को 'दंड पेले हुए हिन्दी के मास्टर' कह-कह कर दो दिनों तक 'उत्तर आधुनिकता और हिन्दी उपन्यास' जैसे विषय को अपने अंदाज में पढाते रहे. इन दो दिनों में उन्होंने भारतीय मनीषा में उपन्यास की पड़ताल, उपन्यास और भारतीयता की अवधारणा, परम्परा और आधुनिकता का द्वन्द्व, आस्था और तर्क जैसे मुद्दों पर बोलते हुए इस पर जोर दिया था कि 'उत्तर आधुनिक कथा साहित्य का लक्ष्य किस्सागोई की वापसी है'.

जोशी जी ने शुरूआती दौर में (अपने अधिकांश समकालीनों की तरह) कवितायें भी लिखी थीं। आज अपने प्रिय साहित्यकार की 'आजकल' मासिक पत्रिका के जून १९५४ अंक में प्रकाशित एक कविता 'उद्जन -बम के युग में 'और 'क्याप' उपन्यास का एक चर्चित प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूं।

उद्जन -बम के युग में

इस तोतापंखी कमरे में नीलम-मोती बिखराते हम,
मोरपंख हिलाते हम और श्वेत शंख बजाते हम,
चांद डाल में,
चांद ताल में,
चांद-चांद में मुस्काते हम.
कभी,बहुत पहले कभी,
शायद यही छटा एक कविता बन सकती थी.

इसका वर्णन कर,
इसके कानों में रुपहले रूपकों के झूमर डालकर,
इसकी आंखॉं में अलंकार का काजर डालकर,
चिपकाकर मद्रासी बिंदिया इसके उन्नत भाल पर,
और आंखॉं ही आंखों में पूछे कुछ प्रश्नों के मूक उत्तर
इसकी फैली गदोलियों में थैली-झोलियों में भर-भर कर,
मैं कभी,
बहुत पहले कभी,शायद कवि बन सकता था.
मेरी काव्यकृति की प्रेरणा तू
शायद कविप्रिया बन सकती थी.
पर अब नहीं,नहीं अब नहीं,
क्योंकि धक धक धक दिल के टेलिप्रिंटर पर अक्षर कर
छप-छप जाती है यह फ्लैश खबर-

कि सवधान
लो! अब विराट घृणा के कुंचित ललाट का धीरज छूटता है!
लो! अब उद्जन के परम कण का सूर्य-सा शक्ति-स्रोत फूटता है!
हो सावधान!
ओ आधे-भगवानः इंसान!
अब दूर कहीं बहुत-बहुत दूर
शुरू होती है वह अनंत विध्वंस-प्रक्रिया-लड़ी
जिसमें न रह पाएगी यह अर्ध-चेतना की मीनार खड़ी,
जिसमें हो जायेंगे ये सब के सब कांच के सपने चकनाचूर!

खबरदार
आ रहा ज्वार!
ये आधे-आधे वादे सब बह जायेंगे!
ये पुंसत्वहीन इरादे सब धरे रह जायेंगे!


***

'क्याप' का मूली फसक

बाहर वालों को हमारी उस किस्म की गप्पें भी पसंद आयीं,जिनमें हम ऐसा जताते थे मानों गिनिस बुक आफ रिकार्ड में जा सकने योग्य सभी अद्भुत घटनायें और चीजें हमारे इलाके में होती हों । फर्ज़ कीजिये किसी ने जौनपुर की मूली का जिक्र किया कि वह बहुत ही बड़ी और भारी होती है. इस पर हमारी तरफ वाला बड़े विनम्र स्वर में कहता- 'महाराज, मैंने आपकी वो जौनपुर वाली मूली तो देखी नहीं ठहरी. अपने नाना जी के बाड़े में जो मूली होने वाली हुई उसके बारे में जरूर जानता हूं. एक दिन क्या हुआ मामी ने कहा-जा रे बाड़े में से एक मूली उखाड़ ला. साग के लिये और कुछ तो है नहीं आज . -अरे मामी - मैंने कहा- एक मूली का क्या होने वाला हुआ इतने बड़े परिवार में! मामी ने कहा- 'तू पहले जा के देख तो सही ! वहां जाकर देखा महाराज तो बाप रे बाप ! एक-एक हाथ तो जमीन के ऊपर निकली ठहरी मूलियां ! जमीन के भीतर का किसे पता ! और मोटाई पूछते हो तो मैनें अंगवाल डाली तो हाथ छोटे पड़ गए कहा .हिलाता हूं तो हिली ही नहीं. कुदाल से खोदना शुरू किया तो मेरी कबर-जसी बन गई, लेकिन मूली फिर भी नहीं निकली. तो मैंने अंगवाल डाल कर खूब जोर से हिलाया. थोड़ी हिलती-सी देखी तो पीछे को झुक कर जोर लगाकर खींचा. मूली तो निकल गई महाराज, लेकिन मैं उसके अंगवाल डाले-डाले ही ढिणमिणाते-ढिणमिणाते सीधा तल्ला गांव जा पहुंचा. अब मेरे को कितनी चोट लगी क्या बताऊं, लेकिन महाराज ,उस मूली को कुछ नहीं हुआ. फिर तल्ला गांव वालों ने मेरी दवा-पानी की और कुल्हाड़ी से मूली के चार टुकड़े किए एक-एक टुकड़े को दो-दो आदमी उठाकर ऊपर ले गये मल्ला गांव.

(मनोहर श्याम जोशी जी पर यह पोस्ट कबाड़ी सिद्धेश्वर ने तैयार की है। बदक़िस्मती से उन के नगर खटीमा में इन्टरनेट पिछले कुछ समय से परेशान कर रहा है। आशा करें कि उन का नेट ठीक काम करना शुरू कर देगा। ताकि हिन्दी साहित्य का वह अमूल्य कूड़ा जो उन के यहां धूल फ़ांक रहा है, जल्द ही कबाड़खाने में नज़र आए। )

हिन्दी ऐसी क्यों होती जा रही है?


राजकिशोर का ये लेख मैं नेट पर घूमते-घूमते पा गया. सोचा कबाड़ख़ाने में ठेल दिया जाए क्योंकि पिछले दिनों किन्ही अनाम महाशय ने इसी विषय पर कहना-न कहना, सब कह दिया. तब मैंने पंडा से कहा था कि चलो इसी बहाने कुछ बहस ही शुरू हो. आज राजकिशोर के इस लेख में वो नुक्ते हैं जिनपर बात आगे बढ़ाई जा सकती है. शायद. नेटवासियो, धीरज धरो. लेख कुछ अधिक ही विस्तृत बन पड़ा है.)


'प्रिंट मीडिया' को हम 'मुद्रित माध्यम' क्यों नहीं कहते? इस प्रश्न के उत्तर में ही जन माध्यमों में हिंदी भाषा के स्वरूप की पहचान छिपी हुई है। उसकी सार्मथ्य भी और उसकी दुर्बलता भी।

जब कलकत्ता से हिंदी साप्ताहिक 'रविवार' शुरू हो रहा था, उस समय मणि मधुकर हमारे साथ थे। कार्यवाहक संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह मीडिया पर एक स्तंभ शुरू करने जा रहे थे। प्रश्न यह था कि स्तंभ का नाम क्या रखा जाए। मणि मधुकर साहित्यिक व्यक्ति थे। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका था। उनसे पूछा गया, तो वे सोच कर बोले - संप्रेषण। सुरेंद्र जी ने बताया कि उन्हें 'माध्यम' ज्यादा अच्छा लग रहा है। अंत में स्तंभ का शार्षक यही तय हुआ। लेकिन सुरेंद्र प्रताप की विनोद वृत्ति अद्भुत थी। उन्होंने हंसते हुए मणि मधुकर से कहा, 'दरअसल, हम दोनों ही अंग्रेजी से अनुवाद कर रहे थे। आपने 'कम्युनिकेशन' का अनुवाद संप्रेषण किया और मैंने मीडियम या मीडिया का अनुवाद माध्यम किया।'

बदलती सोच

उस समय संप्रेषण और माध्यम एक ही स्थिति का वर्णन करने वाले शब्द लगते थे। आज वह स्थिति नहीं है। मीडिया के लिए आज कोई संप्रेषण शब्द सोच भी नहीं सकता। यह शब्द अब कम्युनिकेशन के लिए रूढ़ हो चुका है। मास कम्युनिकेशन को जन संप्रेषण कहा जाता है, मास मीडिया को जन माध्यम। जो बात ध्यान देने योग्य है, वह यह है कि 1977 में भी हिंदी पत्रकारिता पर अंग्रेजी की छाया दिखाई पड़ने लगी थी। कवर स्टोरी को आवरण कथा या आमुख कथा कहा जाता था। लेकिन आज कवर स्टोरी का बोलबाला है। जाहिर है कि अंग्रेजी अब अनुवाद में नहीं, सीधे आ रही है और बता रही है कि हम अनुवाद की संस्कृति से निकल कर सीधे अंग्रेजी के चंगुल में है। किसी टेलीविजन चैनल की भाषा कितनी जनोन्मुख है, इसका फैसला इस बात से किया जाता है कि उस चैनल पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कितना प्रतिशत होता है। ऐसे माहौल में अगर दूरदर्शन की भीषा पिछड़ी हुई, संस्कृतनिष्ठ और प्रतिक्रियावादी लगती है, तो इसमें हैरत की बात क्या है।

आजकल अखबारों में मीडिया की चर्चा बहुत ज्यादा होती है, हालांकि ज्यादातर इसका मतलब टीवी चैनलों से लगाया जाता है। अखबारों में अखबारों की चर्चा लगभग बंद है (पहले भी ज्यादा कहां होती थी?), क्योंकि प्रायः सभी अखबार एक ही राह पर चल रहे हैं और इस राह पर आत्मपरीक्षण के लिए इजाजत नहीं है। बहरहाल, इस तरह के स्तंभों के लिए माध्यम शब्द नहीं चलता, मीडिया का शोर जरूर है। इस बीच अखबारों को चिह्नित करने के लिए प्रिंट मीडिया शब्द चल पड़ा है। चूंकि मीडिया शब्द पहले से चल रहा था, इसलिए उसमें प्रिंट जोड़ देना आसान लगा। मुद्रित माध्यम या मुद्रित मीडिया लिखना अच्छा नहीं लगता -- इस तरह के संस्कृत मूल के या खिचड़ी शब्दों से हम अब बचने लगे हैं (क्योंकि यह पिछड़ेपन का प्रतीक है) और सीधे अंग्रेजी पर्यायों का इस्तेमाल करते हैं। 'रविवार' के समय भी मीडिया के लिए हिंदी का कोई मौलिक शब्द खोजने का श्रम नहीं किया गया था, लेकिन इतनी सभ्यता बची हुई थी कि अंग्रेजी शब्द के अनुवाद से काम चलाया गया।

हिंदी की दुकान

स्पष्ट है कि जो लोग हिंदी के उच्च प्रसार संख्या वाले दैनिक पत्रों में काम करते हैं, वे हिंदी की दुकान लगभग बंद कर चुके हैं और अंग्रेजी के हाथों लगभग बिक चुके हैं। लेकिन इसमें उनका कसूर नहीं है। जब मालिक लोग हिंदी पत्रकारिता का कायाकल्प कर रहे थे (वास्तव में यह सिर्फ काया का नहीं, आत्मा का भी बदलाव था), उस वक्त काम कर रहे हिंदी पत्रकारों ने अगर उनके साथ आज्ञाकारी सहयोग नहीं किया होता, तो उनमें से प्रत्येक की नौकरी खतरे में थी। आज भी कुछ घर-उजाड़ू या नए फैशन के स्वर्णपाश में फंसे हुए पत्रकारों को छोड़ हिंदी का कोई भी पत्रकार अंग्रेजी-पीड़ित हिंदी अपने मन से नहीं लिखता। उसे यह अपने ऊपर और अपने पाठकों पर सांस्कृतिक अत्याचार लगता है। वह झुंझलाता है, क्रुध्द होता है, हंसी उड़ाता है, कभी-कभी मिल-जुल कर कोई अभियान चलाने का सामूहिक निश्चय करता है, लेकिन आखिर में वही ढाक के तीन पात सामने आते हैं और वह अपना काम दी हुई भाषा में संपन्न कर उदास मन से घर लौट जाता है। उसके सामने एक बार फिर यह तथ्य उजागर होता है कि जिस अखबार में वह काम कर रहा है, वह अखबार उसका नहीं है, कि जिस व्यक्ति ने पूंजी निवेश किया है, वही तय करेगा कि क्या छपेगा, किस भाषा में छपेगा और किन तसवीरों के साथ छपेगा। कार्यक्रम ऊपर से मिलेगा, पत्रकार को सिर्फ 'इंप्लिमेंट' करना है।

ऐसा क्यों हुआ? किस प्रक्रिया में हुआ? यहां मैं एक और संस्मरण की शरण लूंगा। नवभारत टाइम्स के दिल्ली संस्करण से विद्यानिवास मिश्र विदा हुए ही थे। वे अंग्रेजी के भी विद्वान थे, पर हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बिलकुल नहीं करते थे। विष्णु खरे भी जा चुके थे। उनकी भाषा अद्भुत है। उन्हें भी हिंदी लिखते समय अंग्रेजी का प्रयोग आम तौर पर बिलकुल पसंद नहीं। स्थानीय संपादक का पद सूर्यकांत बाली नाम के एक सज्जन संभाल रहे थे। अखबार के मालिक-इंचार्ज समीर जैन को पत्रकारिता तथा अन्य विषयों पर व्याख्यान देने का शौक है। उस दिनों भी था। वे राजेंद्र माथुर को भी उपदेश देते रहते थे, सुरेंद्र प्रताप सिंह से बदलते हुए समय की चर्चा करते थे, विष्णु खरे को बताते थे कि पत्रकारिता क्या है और हम लोगों को तो खैर समझाते ही थे। सूर्यकांत बाली की विशेषता यह थी कि वे समीर जैन की हर स्थापना से तुरंत सहमत हो जाते थे, बल्कि उससे कुछ आगे भी बढ़ जाते थे। आडवाणी ने इमरजेंसी में पत्रकारों के आचरण पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही कहा था कि उन्हें झुकने को कहा गया था, पर वे रेंगने लगे। मैं उस समय के स्थानीय संपादक को रेंगते हुए देखता था और अपने दिन गिनता था।

चाटुकार समाज

सूर्यकांत बाली संपादकीय बैठकों में हिंदी भाषा के नए दर्शन के बारे में समीर जैन के विचार इस तरह प्रगट करते जैसे वे उनके अपने विचार हों। समीर जैन की चिंता यह थी कि नवभारत टाइम्स युवा पीढ़ी तक कैसे पहुंचे। नई पीढ़ी की रुचिया पुरानी और मझली पीढ़ियों से भिन्न थीं। टीवी और सिनेमा उसका बाइबिल है। । सुंदरता, सफलता और यौन विषयों की चर्चा में उसे शास्त्रीय आनंद आता है। फिल्मी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों की रंगीन और अर्ध-अश्लील तसवीरों में उसकी आत्मा बसती है। समीर जैन नवभारत टाइम्स को गंभीर लोगों का अखबार बनाए रखना नहीं चाहते थे। वे अकसर यह लतीफा सुनाते थे कि जब बहादुरशाह जफर मार्ग से, जहां दिल्ली के नवभारत टाइम्स का दफ्तर है, किसी बूढ़े की लाश गुजरती है, तो मुझे लगता है कि नवभारत टाइम्स का एक और पाठक चस बसा। समीर की फिक्र यह थी कि नए पाठकों की तलाश में किधर मुड़ें। इस खोज में भारत के शहरी युवा वर्ग के इसी हिस्से पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने हिंदी के संपादकों से कहा कि हिंदी में अंग्रेजी मिलाओ, वैसी पत्रकारिता करो जैसी नया टाइम्स ऑफ इंडिया कर रहा है, नहीं तो तुम्हारी नाव डूबने ही वाली है। सरकुलेशन नहीं बढ़ेगा, तो एडवर्टीजमेंट नहीं बढ़ेगा, रेवेन्य कम होगा और अंत में वी विल बी फोर्स्ड टु क्लोज डाउन दिस पेपर। इस भविष्यवाणी को गंभीरता को बाली ने समझा और हमें बताने लगे कि हमें विशेषज्ञ की जगह एक्सपर्ट, समाधान की जगह सॉल्यूशन, नीति की जगह पॉलिसी, उदारीकरण की जगह लिबराइजेशन लिखना चाहिए। एक दिन हमने उनके ये विचार 'पाठकों के पत्र' स्तंभ में एक छोटे-से लेख के रूप में पढ़े। उस लेख को हिंदी पत्रकारिता के नए इतिहास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में स्थान मिलना चाहिए।

कोई चाहे तो इसे हिंदी की सार्मथ्य भी बता सकता है। हिंदी अपने आदिकाल से ही संघर्ष कर रही है। उसे उसका प्राप्य अभी तक नहीं मिल सका है। अपने को बचाने की खातिर हिंदी ने कई तरह के समझौते भी किए। अवधी, ब्रजभाषा, भोजपुरी, उर्दू आदि के साथ अच्छे रिश्ते बनाए। किसी का तिरस्कार नहीं किया। यहां तक कि उसने अंग्रेजी से भी दोस्ती का हाथ मिलाया। यह हिंदी की शक्ति है, जो शक्ति किसी भी जिंदा और जिंदादिल भाषा की होती है। इस प्रक्रिया में हिंदी हर पराई चीज का हिंदीकरण कर लेती है। अतः उसने अंग्रेजी शब्दों का भी हिंदीकरण किया। आजादी के बाद भी हिंदी अंग्रेजी शब्दों के हिंदी प्रतिशब्द बनाती रही। बजट, टिकट, मोटर और बैंक जैसे शब्द सीधे भी ले लिए गए, क्योंकि ये हिंदी के प्रवाह में घुल-मिल जा रहे थे और इनका अनुवाद करने के प्रयास में 'लौहपथगामिनी' जैसे असंभव शब्द ही हाथ आते थे। आज भी पासपोर्ट को पारपत्र कहना जमता नहीं है, हालांकि इस शब्द में जमने की संभावना है। लेकिन 1980-90 के दौर में जनसाधारण के बीच हिंदी का प्रयोग करने वालों में सांस्कृतिक थकावट आ गई और इसी के साथ उनकी शब्द निर्माण की क्षमता भी कम होती गई। उन्हीं दिनों हिंदी का स्परूप थोड़ा-थोड़ा बदलने लगा था, जब संडे मेल, संडे ऑब्जर्वर जैसे अंग्रेजी नामों वाले पत्र हिंदी में निकलने लगे। यह प्रवृत्ति 70 के दशक में मौजूद होती, तो हिंदी में रविवार नहीं, संडे ही निकलता या फिर आउटलुक के हिंदी संस्करण में साप्ताहिक लगाने की जरूरत नहीं होती, सीधे आउटलुक ही निकलता, जैसे इंडिया टुडे कई भाषाओं में एक ही नाम से निकलता है। 90 के दशक में जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया ने भारत की अंग्रेजी पत्रकारिता का चेहरा बदल डाला, उसे आत्मा-विहीन कर दिया, वैसे ही नए नवभारत टाइम्स ने हिंदी पत्रकारिता में एक ऐसी बाढ़ पैदा कर दी, जिसमें बहुत-से मूल्य और प्रतिमान डूब गए। बहरहाल, नवभारत टाइम्स का यह प्रयोग आर्थिक दृष्टि से सफल हुआ और अन्य अखबारों के लिए मॉडल बन गए। कुछ हिंदी पत्रों में तो अंग्रेजी के स्वतंत्र पन्ने भी छपने लगे।

भाषाई गरीबी

भाषा संस्कृति का वाहक होती है। प्रत्येक सांस्कृतिक बदलाव अपने लिए एक नई भाषा गढ़ता है। नक्सलवादियों की भाषा वह नहीं है जिसका इस्तेमाल गांधी और जवाहरलाल करते थे। आज के विज्ञापनों की भाषा भी वह नहीं है जो 80 के दशक तक होती थी। यह एक नई संस्कृति है जिसके पहियों पर आज की पत्रकारिता चल रही है। इसे मुख्य रूप से उपभोक्तावाद की संस्कृति कह सकते हैं, जिसमें किसी वैचारिक वाद के लिए जगह नहीं है। इस संस्कृति का केंद्रीय सूत्र रघुवीर सहाय बहुत पहले बता चुके थे -- उत्तम जीवन दास विचार। जैसे दिल्ली के प्रगति मैदान में उत्तम जीवन (गुड लिविंग) की प्रदर्शनियां लगती हैं, वैसे ही आज हर अखबार उत्तम जीवन को अपने झंग से परिभाषित करने लगा है। अपने-अपने ढंग से नहीं, अपने ढंग से, जिसका नतीजा यह हुआ है कि सभी अखबार एक जैसे ही नजर आते हैं - सभी में एक जैसे रंग, सभी में एक जैसी सामग्री, विचार-विमर्श का घोर अभाव तथा जीवन में सफलता पाने के लिए एक जैसी शिक्षा। अखबार आधुनिकतम जीवन के विश्वविद्यालय बन चुके हैं और पाठक सोचने-समझने वाला प्राणी नहीं, बल्कि मौन रिसीवर।

इसका असर हिंदी की जानकारी के स्तर पर भी पड़ा है। टीवी चैनलों में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है जो शुध्द हिंदी के प्रति सरोकार रखते हैं। प्रथमतः तो ऐसे व्यक्तियों को लिया ही नहीं जाता। ले लेने के बाद उनसे मांग की जाती है कि वे ऐसी हिंदी लिखें और बोलें जो ऑडिएंस की समझ में आए। इस हिंदी का शुध्द या टकसाली होना जरूरी नहीं है। यह शिकायत आम है कि टीवी के परदे पर जो हिंदी आती है, वह अकसर गलत होती है। सच तो यह है कि अनेक हिंदी समाचार चैनलों के प्रमुख ऐसे महानुभाव हैं जिन्हें हिंदी आती ही नहीं और यह उनके लिए शर्म की नहीं, गर्वित होने की बात है। यही स्थिति नीचे के पत्रकारों की है। वे शायद अंग्रेजी भी ठीक से नहीं जानते, पर हिंदी भी नहीं जानते। चूंकि अच्छी हिंदी की मांग नहीं है और संस्थान में उसकी कद्रदानी भी नहीं है, उसलिए हिंदी सीखने की प्रेरणा भी नहीं है। हिंदी एक ऐसी अभागी भाषा है जिसे न जानते हुए भी हिंदी की पत्रकारिता की जा सकती है।

त्रासदी उर्फ ट्रेजेडी

प्रिंट मीडिया की ट्रेजेडी यह है कि टेलीविजन से प्रतिद्वंद्विता में उसने अपने लिए कोई नई या अलग राह नहीं निकाली, बल्कि वह टेलीविजन का अनुकरण करने में लग गया। कहने की जरूरत नहीं कि जब हिंदी क्षेत्र में टेलीविजन का प्रसार शुरू हो रहा था, तब तक हिंदी पत्रों की आत्मा आखिरी सांस लेने लग गई थी। पुनर्जन्म के लिए उसके पास एक ही मॉडल था, टेलीविजन की पत्रकारिता। मालिक लोग भी कुछ ऐसा ही चाहते थे। संपादक रह नहीं गए थे जो कुछ सोच-विचार करते और प्रिंट को इलेक्ट्रॉनिक का भतीजा बनने से बचा पाते। नतीजा यह हुआ कि हिंदी के ज्यादातर अखबार टेलीविजन की फूहड़ अनुकरण बन गए। इसका असर प्रिंट मीडिया की भाषा पर भी पड़ा। हिंदी का टेलीविजन जो काम कर रहा है, वह एक विकार-ग्रस्त भाषा में ही हो सकता है। अशुध्द आत्माएं अपने को शुध्द माध्यमों से प्रगट नहीं कर सकतीं। सो हिंदी पत्रों की भाषा भी भ्रष्ट होने लगी। एक समय जिस हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्रपति, संसद जैसे दर्जनों शब्द गढ़े थे, जो सबकी जुबान पर चढ़ गए, उसी हिंदी के पत्रकार प्रेसिडेंट, प्राइम मिनिस्टर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगे। इसके साथ ही यह भी हुआ कि हिंदी पत्रों में काम करने के लिए हिंदी जानना आवश्यक नहीं रह गया। पहले जो हिंदी का पत्रकार बनना चाहता था, वह कुछ साहित्यिक संस्कार ले कर आता है। वास्तव में शब्द की रचनात्मक साधना तो साहित्य ही है। इसी नाते पहले हिंदी अखबारों में कुछ साहित्य भी छपा करता था। कहीं-कहीं साहित्य संपादक भी होते थे। लेकिन नए वातावरण में साहित्य का ज्ञान एक अवगुण बन गया। साहित्यकारों को एक-एक कर अखबारों से बाहर किया जाने लगा। हिंदी एक चलताऊ चीज हो गई -- गरीब की जोरू, जिसके साथ कोई भी कभी भी छेड़छाड़ कर सकता है। यही कारण है कि आब हिंदी अखबारों में अच्छी भाषा पढ़ने का आनंद दुर्लभ तो हो ही गया है, उनसे शुध्द लिखी हुई हिंदी की मांग करना भी नाजायज लगता है। जिनका हिंदी से कोई लगाव नहीं है, जिनकी हिंदी के प्रति कोई प्रतिबध्दता नहीं है, जो हिंदी की किताबे नहीं पढ़ते (सच तो यह है कि वे कोई भी किताब नहीं पढ़ते), उनसे यह अपेक्षा करना कि वे हिंदी को सावधानी से बरतें, उनके साथ अन्याय है, जैसे गधे से यह मांग करना ठीक नहीं है कि वह घोड़े की रफ्तार से चल कर दिखाए।

आगे क्या होगा? क्या हिंदी बच भी पाएगी? जिन कमियों और अज्ञानों के साथ आज हिंदी का व्यवहार हो रहा है, वैसी हिंदी बच भी गई तो क्या? लेकिन जो तमीज उतार सकता है, वह धोती भी खोल सकता है। इसलिए आशंका यह है कि धीरे-धीरे अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिंदी भी मरणासन्न होती जाएगी। आज हिंदी जितनी बची हुई है, उसका प्रधान कारण हिंदी क्षेत्र का अविकास है। आज अविकसित लोग ही हिंदी के अखबार पढ़ते हैं। उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में जाने लगे हैं। जिस दिन यह प्रक्रिया पूर्णता तक पहुंच जाएगी, हिंदी पढ़ने वाले अल्पसंख्यक हो जाएंगे। विकसित हिंदी भाषी परिवार से निकला हुआ बच्चा सीधे अंग्रेजी पढ़ना पसंद करेगा। यह एक भाषा की मौत नहीं, एक संस्कृति की मौत है। कुछ लोग कहेंगे, यह आत्महत्या है। मेरा खयाल है, यह मर्डर है।

Friday, January 11, 2008

इस काम भी तो आ सकता है धर्म

उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले में बहने वाली गगास नदी पिछले पांचेक सालों से गर्मियों में एक गीली लकीर भर रह जाती है। नतीजतन सारा इलाका जैसे जैसे गर्मियां काटता है और मानसून के आने की राह देखता है। इसी नदी की घाटी में मेरे पुरखों का गांव है। अंग्रेज़ों के समय से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की जो क्रूर परम्परा चली, सबसे पहले पेड़ उस की ज़द में आए। सारे के सारे कुमाऊं-गढ़वाल के ज़्यादातर जंगल काट डाले गए और आज़ादी आने पर इस क्रूरता में कमी आने के बजाए हमारे अपने वन-अधिकारियों ने औने पौने में जंगल कटा कर अपने घर भरने में अधिक रुचि दिखाई।


इधर के दिनों में थोड़ी बहुत 'चेतना' विकसित हुई है लेकिन तथ्य यह है कि कुमाऊं-गढ़वाल की ज्यादातर पहाड़ियां नंगी हैं। मेरे गांव का भी यही हाल है। गांव के धीरे धीरे उजाड़ होते घर के बाहर स्लेट के पत्थरों से बने बरामदे की चहारदीवारी पर बैठे पीतल के गिलास में चाय पीते इधर उधर के गांवों पर निगाह डालने पर दिल उदास हो जाता है। वृक्षहीन पहाड़ियों पर चरते मरियल मवेशियों को देख कर दिमाग सुन्न पड़ जाता है।


इस नैराश्य के बीच आंख पड़ती है गोल्ल देवता के जंगल पर। तब लगता है कि सब कुछ अभी ख़त्म नहीं हुआ है। यह जंगल एक पहाड़ी की चोटी पर करीब पांच वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और सुखद तरीके से गदबद हरा है। मान्यता है कि यह दैवीय जंगल है और यहां से एक पत्ता भी लाना पाप होता है। दरअसल यह हमारे पुरखों की दूरदृष्टि थी। वे समाज के भविष्य को देख रहे थे। उन्हें भान था कि लालच और आबादी को पेड़ों-जंगलों से दूर रखने के लिए धार्मिक विश्वास और उस से जुड़े नैसर्गिक भय का सहारा लेना ही होगा। यह अनायास नहीं था कि इन मान्यताओं को नकारने वालों को डराने के वास्ते झूठे-सच्चे किस्सों को गढ़ा गया। समूचे कुमाऊं-गढ़वाल में इस तरह के धार्मिक जंगल अब भी अस्तित्वमान हैं और यकीन मानिए पहाड़ों की नदियों में जो भी थोड़ा बहुत पानी गर्मियों में बच पाता है वह इन्हीं जंगलों की वजह से होता है।



इस तरह की परम्पराएं समूचे भारत के गांवों में किसी न किसी रूप में बची हुई हैं और तमाम तुग़लकी सरकारों और उन की नीतियों के बावजूद अपने हिस्से के जंगलों को बचाए हुए हैं। राम चन्द्र गुहा और माधव गाडगिल की किताब 'Ecology and Equity' में ऐसे कई जंगलों का ज़िक्र है।


आपको एक दिलचस्प वृत्तांत सुनाता हूं। १७०९ में उत्तरी कोलम्बिया में किसी को एक पेड़ की जड़ में वर्जिन मैरी की आकृति नज़र आई। इस महापुरुष का अन्धविश्वास कह लें या कुछ और, इस 'खोज' के कारण पक्षियों की दो दुर्लभ प्रजातियां Recurve-billed Bushbird और Perija Parakeet खत्म होते होते बच गए. इस महापुरुष के काम को वैटिकन ने पहचाना और इस जंगल को पवित्र घोषित कर दिया. तीन शताब्दियों तक यह इलाका वन्य अभ्यारण्य बना रहा और २००५ में चुनिन्दा पर्यावरणविदों के लिए खोल दिया गया. उसी साल करीब ४० साल के अंतराल के बाद Recurve-billed Bushbird को देखा गया. अपनी तनिक टेढ़ी चोंच के कारण 'मुस्कराने वाली चिडिया' कहे जाने वाले इस परिन्दे के पूरी तरह ख़त्म हो चुकने की अफ़वाहों को लगाम लगी.


Perija Parakeet तो Recurve-billed Bushbird से भी अधिक दुर्लभ माना जाता था. इसे भी यहां देखा गया और माना जाता है कि विश्व में केवल यही जंगल है जहां ये पाए जाते हैं अलबत्ता इन की तादाद ४० से ५० के बीच आंकी गई है.


कोलम्बिया में प्राकृतिक संसाधनों को यूरोप के कई मुल्कों ने बेरहमी से दुहा लेकिन एक वेटिकन के कहने पर अगर कुदरत की कलाकारी का कोई भी हिस्सा बच सकता है तो किसी को भी किसी भी तरह के धर्म से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. खास तौर पर इस समय में जब इन्सान जैसी शै के अस्तित्व पर तमाम ख़तरे मंडरा रहे हैं.

और तीसरी कबाड़न मनीषा पाण्डेय का भी स्वागत

मनीषा मीडिया से जुड़ी हैं और बेदखल की डायरी ब्लाग की संचालिका भी। बेबाकी और तुर्शज़बानी उनके ब्लाग की खूबी है। आशा कर सकते हैं कि कबाड़ख़ाने में भी वे उसी स्वर के साथ प्रवेश करेंगी। साथ ही वे सक्षम अनुवादिका भी हैं। नारी-विमर्श से सही मायनों में जुड़ी मनीषा यहां आने वाली तीसरी कबाड़न हैं। उन के स्वागत में पेश है स्वीडिश मूल की पॉप गायिका एमीलिया रिडबर्ग का गाया मशहूर गीत 'Big Big Girl'। पुरुषप्रधान समाज में निश्छल प्रेम के लिए सहस्त्राब्दियों से प्रतीक्षारत और लगातार धोखा खाने वाली स्त्री के दुख को बेहद सादा शब्दों में बयान करता यह गीत १९९९ में लोकप्रियता के चरम पर था। आप लोगों की सुविधा के लिये गीत के बोल भी लगा रहा हूं।



I'm a big big girl
In a big big world
It's not a big big thing if you leave me
But I do do feel that I do do will miss you much
Miss you much...

I can see the first leaf falling
It's all yellow and nice
It's so very cold outside
Like the way I'm feeling inside

I'm a big big girl
In a big big world
It's not a big big thing if you leave me
But I do do feel that I do do will miss you much
Miss you much...

Outside it's now raining
And tears are falling from my eyes
Why did it have to happen
Why did it all have to end

I'm a big big girl
In a big big world
It's not a big big thing if you leave me
But I do do feel that I do do will miss you much
Miss you much...

I have your arms around me ooooh like fire
But when I open my eyes You're gone...

I'm a big big girl
In a big big world
It's not a big big thing if you leave me
But I do do feel that I do do will miss you much
Miss you much...

कबाड़ख़ाने के नए कबाड़ी विमल भाई का स्वागत


कबाड़ख़ाने में नये कबाड़ी विमल वर्मा आ गये हैं। वे छब्बीसवें कबाड़ी हैं। विमल भाई ठुमरी नाम का एक नायाब ब्लाग चलाते हैं और संगीत के गहरे जानकार हैं. उनकी दुकान में आपको कैरिबियाई चटनी संगीत मिलेगा तो आबिदा परवीन का गाया 'बाजूबन्द खुल खुल जाए भी'. रंगमंच और कला-संसार से लम्बे समय से जुड़े विमल फ़िलहाल बम्बई में एक टीवी चैनल से संबद्ध हैं. यहां स्वागत की रस्म निभाते हुए आइये कीर्तन करें और उम्मीद करें कि कबाड़वाद के प्रचार-प्रसार में वे अपना उल्लेखनीय योगदान देंगे।

Thursday, January 10, 2008

पढ़ने लिखने वालों को रसूल की सलाहें

रूस के उत्तरी काकेशिया में स्थित है एक छोटा सा मुल्क दाग़िस्तान. क़रीब पच्चीस लाख की आबादी वाले इस मुल्क की आधिकारिक भाषा रूसी है अलबत्ता इस में बसने वाली अवार लोगों की भाषा ने दुनिया को रसूल हम्ज़ातोव जैसा महाकवि दिया. रसूल ने अवार भाषा में ढेरों कविताएं रचीं. बाद के दिनों में उन्होंने 'मेरा दाग़िस्तान' नाम से एक शानदार संस्मरण लिखा जो शिल्प और भाषाई कौशल के हिसाब से एक अद्वितीय रचना है. यह किताब इतनी लोकप्रिय हुई कि पाठकों की मांग पर रसूल को इस का दूसरा भाग लिखना पड़ा. मेरा अपना मानना है कि इस किताब को हर समझदार इन्सान के घर में होना चाहिए और परिवार के लोगों के साथ इस का वाचन किया जाना चाहिए. किताब का एक हिस्सा पेश करने से पहले मैं 'मेरा दाग़िस्तान' की शुरुआत में आने वाली अवार भाषा के महाकवि अबूतालिब की एक पसंदीदा उक्ति आपको सुनाता हूं : "अगर तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे, तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा।"


नोटबुक से। हमारे साहित्य-संस्थान में ऐसे हुआ था। पहले वर्ष की पढ़ाई के समय बीस कवि थे, चार गद्यकार और एक नाटककार। दूसरे वर्ष में - पन्द्र्ह कवि, आठ गद्यकार, एक नाटककार और एक आलोचक। तीसरे वर्ष में - आठ कवि, दस गद्यकार, एक नाटककार और छ: आलोचक। पांचवे वर्ष के अंत में - एक कवि, एक गद्यकार, एक नाटककार और शेष सभी आलोचक।


ख़ैर यह तो अतिशयोक्ति है, चुटकुला है। मगर यह तो सच है कि बहुत-से कविता से अपना साहित्यिक जीवन आरंभ करते हैं, उस के बाद कहानी-उपन्यास, फिर नाट्क और उस के बाद लेख लिखने लगते हैं। हां, आजकल तो फ़िल्म सिनेरियो लिखने का ज़्यादा फ़ैशन है।


कुछ बाद्शाहों और शाहों ने अपनी मलिकाओं और बेगमों को इसलिए छोड़ दिया था कि उन के सन्तान नहीं हुई थी। मगर कुछ बीवियां बदलने के बाद उन्हें इस बात का यकीन हो गया कि इस के लिए वे बिल्कुल दोषी नहीं थीं; दूसरी तरफ़ कोई भी किसान ज़िन्दगी भर एक ही बीवी के साथ रहता है और उसी से एक दर्ज़न बच्चे पैदा कर लेता है।


मैं तो यह मानता हूं कि शराब पियो, मगर रोटी से मुंह न मोड़ो। गीत गाओ, मगर क़िस्से भी सुनो। कविताएं रचो, मगर सीधी सादी कहानी को दूर न भगाओ।


गद्य। एक वह भी ज़माना था, जब मैं पालने में लेटा रहता था और मेरी मां लोरी गाया करती थी; उन्हें सिर्फ़ एक ही लोरी आती थी। हमारे पिता जी बेशक जाने-माने कवि थे, अपने बेटों के लिए उन्होंने एक भी गीत नहीं रचा। वे हमें बड़े शौक से तरह-तरह के क़िस्से-कहानियां और घटनाएं सुनाते थे। यह उनका गद्य था।


पिताजी को अपनी कविताओं की चर्चा करना पसन्द नहीं था। मेरे ख़्याल में वे काव्य-रचना को गम्भीर काम नहीं मानते थे। उनके संजीदा काम थे - ज़मीन जोतना, खलिहान को ठीक-ठाक करना, गाय और घोड़े की देखभाल करना, छत पर से बर्फ़ साफ़ करना और बाद को गांव, यहां तक कि हलक़े के मामलों में सरगर्म हिस्सा लेना।


कविता रचने के बाद मेरे पिता इस बात की ख़ास चिन्ता नहीं करते थे कि वह कहां छपती है। केन्द्रीय समाचारपत्र हो या गांव के पायनियरों का दीवारी समाचारपत्र। इस बात की तरफ़ मेरा ध्यान गया था कि दीवारी समाचारपत्र में स्थान दिए जाने पर उन्हें ज़्यादा ख़ुशी होती थी।


वे अक्सर उन शब्दों को याद करते थे, जो प्यार के विख्यात गायक, कवि महमूद को उनके पिता अनासील मुहम्मद ने कहे थे। प्यार और प्यार के गीतों से बेहाल, भूखे और ज़र्द चेहरे वाले निखट्टू बेटे जैसे कवि महमूद ने जब घर आकर रोटी मांगी तो उनके पिता ने बड़े इतमीनान से जवाब दिया:


"कविता खाओ और प्यार पियो। मैं तुम्हारे लिये हल जोतता जोतता थक गया हूं!"


इसमें कोई शक नहीं कि गीत के बिना तो परिन्दा भी नहीं रह सकता। मगर परिन्दे का मुख्य काम तो है - घोंसला बनाना, चुग्गा हासिल करना, अपने बच्चों का पेट भरना।


पिताजी के लिये उनकी कविताएं परिन्दे के तराने के समान ही थीं - सुन्दर, सुखद, किन्तु अनिवार्य नहीं। वे उन्हें सुबह के वक़्त कहे जाने वाले "शुभ प्रभात" और रात को बिस्तर पर जाते वक़्त कहे जाने वाले "शुभ रात्रि" शब्दों, पर्व की बधाई या दु:ख के शोक-सन्देस की तरह ही मानते थे।


ऐसी धारणा है कि कवि इस दुनिया से कुछ निराले होते हैं - हर कोई अपने ही ढंग से। मगर पिताजी अपने स्वभाव और मानसिक संरचना की हिसाब से साधारण पहाड़ी आदमी थे। सबसे अधिक तो उन्हें मंडली में बैठकर, जब लोग एक-दूसरे को टोकते नहीं, मज़े से बातचीत करना, तरह-तरह के क़िस्से कहानियां और घटनाएं सुनाना यानी गद्य ही अधिक पसन्द था।


पिताजी ने विख्यात कवि महमूद को अपनी कविताएं दिखाईं। कवि को पिताजी की कविताएं देखकर हैरानी हुई और बोले कि वे उनकी समझ में नहीं आतीं और कुल मिला कर वे यह समझ ही नहीं पाते कि गऊ, ट्रैक्टर, कुत्तों और ख़ूंजह गांव की पगडंडी के बारे में कैसी कविताएं रची जा सकती हैं।


"तो किस बारे में कविताएं रची जाएं?" पिताजी ने नम्रता से पूछा।


"प्यार, केवल प्यार के बारे में! प्यार का महल बनाना चाहिए।"


- रसूल हम्ज़ातोव (१९२३-२००३)
(बाएं तस्वीर में रसूल अपनी पत्नी के साथ)

Wednesday, January 9, 2008

अजित वडनरेकर को जन्मदिन पर सप्रेम

अजित वडनरेकर का कल जन्मदिन है. भाई अशोक पांडे के आदेश पर उन्हें यह गीत सुनाया जाता है. साथ में बधाइयाँ भी पहुँचाई जानी चाहिये.


रफ़ी / ऊंचे लोग (1965)
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जाग दिल-ए-दीवाना रुत जागी वस्ल-ए-यार की
बसी हुई ज़ुल्फ़ में आयी है सबा प्यार की - २
जाग दिल-ए-दीवाना

दो दिल के कुछ लेके पयाम आयी है
चाहत के कुछ लेके सलाम आयी है - २
दर पे तेरे सुबह खड़ी हुई है दीदार की
जाग दिल-ए-दीवाना ...

एक परी कुछ शाद सी नाशाद सी
बैठी हुई शबनम में तेरी याद की - २
भीग रही होगी कहीं कली सी गुलज़ार की
जाग दिल-ए-दीवाना रुत जागी वस्ल-ए-यार की
बसी हुई ज़ुल्फ में आयी है सबा प्यार की
जाग दिल-ए-दीवाना

Tuesday, January 8, 2008

उदय प्रकाश जी के लिए जन्मदिन का उपहार एक हफ़्ते बाद


१ जनवरी को उदय प्रकाश जी का जन्म दिन था। उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी कि इरफ़ान या मैं उन के लिये श्री ४२० का यह गीत यहां लगा दें . बदक़िस्मती से मैं उसी दिन पहाड़ों पर घूमने निकल गया . और अगले दिन इरफ़ान भी मेरे साथ आशीष कबाड़ी द्वारा संचालित हिमालयन विलेज, सोनापानी आ गए. ४-५ दिन टोटल मटरगश्ती में बीते. अब जाकर यह गीत लगा रहा हूं (इन दिनों लगातार तंग कर रहे lifelogger ने भी साथ दिया)। उदय जी के साथ आप सब सुनें.

१९५५ में बनी इस फ़िल्म के निर्माता निर्देशक थे राजकपूर. संगीत शंकर जयकिशन का था और स्क्रीनप्ले ख्वाजा अहमद अब्बास का था. शंकर शैलेन्द्र के लिखे इस कालजयी गीत को स्वर दिया है मन्ना डे ने.



आप की गर्ल फ़्रैंड कहां है: भारतीय कवि-लेखकों को एक सुझाव


बात बहुत पुरानी नहीं है. सन २००६ में फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले के दौरान मुझे आस्ट्रियाई रेडियो ओ. आर. एफ़. द्वारा एक इन्टरव्यू के लिए बुलावा आया. इस निमन्त्रण की वजह यह थी कि उक्त मेले में भारत को 'गैस्ट आफ़ आनर' का दर्ज़ा मिला था.

यह एक बेहद अनौपचारिक वार्ता थी जिस में मेरे साथ एक प्रौढ़ बंगाली साहित्यवेत्ता मौजूद थे. शुरुआती सवालों के बाद भारतीय साहित्य की 'एक्सपर्ट' इन्टरव्यू लेने वाली मोहतरिमा ने मुझसे सलमान रश्दी के उस वक्तव्य पर टिप्पणी करने को कहा जिसमें वे बताते हैं कि प्रभावी भारतीय साहित्य की रचना केवल अंगरेज़ी में संभव है।

इसके पहले कि मैं घबरा जाता मैंने उस से पूछा कि उसे हिन्दी में लिखने वाले कितने साहित्यकारों के नाम पता हैं। जाहिर है उस का सारा भारतीय साहित्य का ज्ञान रश्दी, अरुंधती, विक्रम, अमिताव, उपमन्यु और निस्संदेह टैगोर तक सीमित था। सवाल चालीस करोड़ लोगों की निर्धन भाषा का था सो मैंने डरते डरते निराला और मुक्तिबोध का नाम ले लिया। इन्टरव्यू को हवा में टंगता देख उन मोहतरिमा ने मुझी से इन महान कवियों के बारे में कुछ बताने को कहा।

निराला और मुक्तिबोध के बारे में तो मैंने उन्हें नहीं बताया, हां उन्हें यह राय ज़रूर दी कि वे अगली बार जब इन्डिया आएं तो हैबिटैट सेन्टर और अन्य भद्र केन्द्रों से बाहर जाकर भारत की तरफ़ रुख करें या अपना पेशा बदल लें। मुंह में सोने-चांदी के चम्मच ले कर पैदा हुए तथाकथित भारतीय लेखकों की ऐसी तैसी कर पाने की तो मेरी कूव्वत न थी पर भारत की आर्थिक - सामाजिक और साहित्यिक निर्धनता पर मैंने दो चार बातें बताईं।


लेकिन इन्टरव्यू का समय सीमित था। उक्त मोहतरिमा ने मुझसे 'इन शार्ट' यह बताने की गुज़ारिश की कि हिन्दी लेखक लोकप्रिय क्यों नहीं हैं। "क्योंकि हिन्दी के किसी भी 'बड़े' लेखक में इतनी कूव्वत नहीं कि पद्मा लक्ष्मी जैसी माडल को 'सैट' कर सके या न्यूयार्क के होटेल वाल्डोर्फ़ एस्टोरिया के व्यक्तिगत स्विमिंग पूल में तैरते हुए हाथ में फ़्रैंच वाइन थामे छ्त्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के नक्सलवाद पर दो घंटे का इन्टरव्यू दे सके।"

आप लोगों की क्या राय है?


120 साल और मूल निवासी टेस्ट क्रिकेटर सिर्फ 1 ...

... और शिकायत ये कि भारत में नीची जाति वालों को क्रिकेटर बनने का मौका नहीं दिया जाताये सच है कि भारतीय क्रिकेट टीम में कोई दलित नहीं हैइस समय तो कोई ओबीसी - बनिया भी नहीं हैआदिवासी भी कोई नहीं हैभारत की लगभग 75 फीसदी आबादी जिन समुदायों को लेकर बनती है, शायद किसी संयोग की वजह से, वो भारतीय क्रिकेट टीम में नदारद हैये एक ऐसी समस्या है जिससे भारत को निबटना ही होगाभारतीय विविधता का जीवन के अलग अलग क्षेत्रों में नजर आना खतरनाक है और ये हमारे समय की एक गंभीर गंभीर समस्या है

लेकिन आश्चर्यजनक बात ये है कि भारतीय क्रिकेट में जातिवाद की बात उस ऑस्ट्रेलया में चल रही है जहां क्रिकेट में नस्लवाद की जड़े बेहद गहरी हैंऑस्ट्रेलियाई मूल निवासी यूरोपीय पादरियों के आने के बाद से ही क्रिकेट खेल रहे हैं। 1868 में पहली बार मूल निवासियों की क्रिकेट टीम इंग्लैंड पहुंची और उसने 115 दिन विदेश में रहकर 47 मैच खेले१४ मैच जीते, 14 हारे और 19 ड्रॉ रहे। ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासियों के इस प्रदर्शन से लोग हैरत में थे। ऊपर उस टीम की तस्वीर आप देख सकते हैं।

लेकिन तब से लेकर आज तक सिर्फ एक मूल निवासी ऑस्ट्रेलया की नेशनल टीम में जगह बना पाया हैवो है जैसन गलेस्पी। गेलस्पी ने 71 टेस्ट मैच खेले और 259 विकेट लिएआठ बार उन्होंने 5 विकेट से ज्यादा हासिल करने का कारनामा कर दिखाया। मूल निवासी मजबूत काठी की वजह से अच्छे एथलीट माने जाते हैं और दूसरे खेलो में उनका प्रतिनिधित्व बढ़िया है। लेकिन एलीट खेल क्रिकेट में वो हमेशा से नदारद रहे हैं।

ऑस्ट्रलियाई क्रिकेट में मूल निवासियों की गैरमौजूदगी वहां की सरकार के लिए भी शर्मनाक स्थिति हैवहां की ह्यूमन राट्स कमीशन की रिपोर्ट - What's the score में इस बारे में चिंता जताई गई हैऔर फिर ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट का नस्लवाद सिर्फ मूल खिलाड़ियों को मौका देने तक सीमित नहीं हैऑस्ट्रेलिया दौरे पर जाने वाली टीम अगर गोरों की नहीं हुई तो उसे दर्शकों के तमाम तरह के ताने झेलने पड़ते हैं। 2003 में क्विंसलैंड में श्रीलंका के साथ वन डे मैच के दौरान आउट होने पर डैरेन लेहमैन ने ऊंची आवाज में एक भद्दी नस्लवादी गाली दी थी, जिसकी वजह से उसे पांच मैचों के लिए सस्पेंड भी किया गया थावहां के पूर्व क्रिकेटर और कमेंटेटर डीन जोंस ने अगस्त 2006 में दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेटर हाशिम अमला को मैच के दौरान आंतकवादी कहा थावो भी सिर्फ इसलिए कि अमला दाढ़ी रखते हैं

ऐसे ऑस्ट्रेलियाई, भारतीयों को क्रिकेट में सामाजिक समता का पाठ पढ़ा रहे हैं

-दिलीप मंडल

Monday, January 7, 2008

एक मसीहा का जाना


मुझे उम्मीद है सुधीजनों ने 'जयपुर फ़ुट' का नाम कभी न कभी ज़रूर सुना होगा। जी हां, दुर्भाग्यवश किसी वजह से जब किसी अपने-बेगाने के या उन के किसी परिचित-संबंधी को एक या दो पैर कट जाते थे तो आखिरकार लोग 'जयपुर फ़ुट' लगवाने की राय दिया करते थे। इस कृत्रिम पैर का आविष्कार डाक्टर पी के सेठी ने किया था। पद्मश्री और प्रतिष्ठित मैगासेसे सम्मान उन्हें नवाज़े जा चुके थे।

लाखों विकलांगों के जीवन में प्रकाश लाने वाले डाक्टर पी के सेठी का दिल के दौरे के कारण बीते शनिवार को देहान्त हो गया। वे अस्सी वर्ष के थे और लगातार काम में जुटे रहे. २३ नवम्बर १९२७ को जन्मे डाक्टर सेठी ने इंग्लैंड से FRCS की डिग्री हासिल करने के बाद १९६८ में जयपुर फ़ुट का निर्माण किया था.

रिटायर होने के बाद वे एक स्वयंसेवी संस्था से लगातार जुड़े रहे. इस सत्कर्म में उनके सहायक पं. रामचंद्र मिश्र जी (मास्टरजी के नाम से विख्यात) का योगदान भी अविस्मरणीय है.

दुनिया भर में करीब द्स लाख लोगों को इस महाकार्य का लाभ मिला.

इस महर्षि के अवसान पर कबाड़खाना उन्हें सादर याद करता है.

इस बारे में अधिक जानने के लिए
http://www.jaipurfoot.org/ पर जाएं

क्रिकेट, जाति और नस्लवादी आखेट

-दिलीप मंडल

ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख अखबार सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड को लगता है कि भारतीय क्रिकेटरों के सेलेक्शन में जातिवाद चलता हैसिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड ने आज खत्म हुए टेस्ट मैच में खेलने वाले क्रिकेटरों की एक गलत-सही टाइप की लिस्ट छापी हैआप लोग भी देख लीजिए :

ब्राह्मण - अनिल कुंबले, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, सचिन तेंडुलकर, सौरव गांगुली, आर पी सिंह (?), इशांत शर्मा
जाट - युवराज सिंह
राजपूत - महेंद्र सिंह धोनी
मुसलमान - वसीम जाफर
सिख - हरभजन सिंह.

पूरी खबर के लिए सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड साइट के इस लिंक पर क्लिक कर लीजिएइसके साथ एक और लेख पढ़ लीजिए, जो है तो चार साल पुराना, लेकिन क्रिकेट की जाति चर्चा में इसका जिक्र रहा है

वैसे भारतीय क्रिकेट में जाति के आधार पर भेदभाव और दलित क्रिकेटर विनोद कांबली (54.20 का एवरेज और 227 का अधिकतम स्कोर) की सिर्फ 17 टेस्ट के बाद विदाई जैसी मार्मिक बातें छापने वाले सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड के संपादक को मैंने एक मेल डाला हैउसके कुछ हिस्से का हिंदी अनुवाद आपके लिए पेश हैं

- क्या ये सच नहीं है कि यूरोपीय लोगों के आने से पहले ऑस्ट्रेलिया में एक सभ्यता थी। 1788 में वहां साढ़े तीन लाख से लेकर साढ़े लाख मूल निवासी रहते थे

- यूरोपीय लोगों के आने के बाद उनकी संख्या घटने लगी और 1911 आते आते ये संख्या घटकर 30,000 रह गई
- ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया द्वीप में 1803 में 8,000 मूल निवासी रहते थेयूरोपीय लुटेरों के आने के 30 साल बाद उनकी संख्या 300 रह गई

- ऑस्ट्रेलिया के दो सौ साल के इतिहास में मूल निवासियों के 100 से ज्यादा बड़े आखेट हुए हैंउन्हें घेरकर, चुनकर हर तरह से मार डाला गयानरसंहारों की खत्म होने वाली लिस्ट देखें

- ये सिलसिला 1930 तक चला हैआदमी तब तक काफी सभ्य हो चुका थाऔर गोरे लोग तो खुद को सबसे सभ्य मानते हैं

- आज ऑस्ट्रेलिया की जनगणना के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश की आबादी में सिर्फ ढाई प्रतिशत मूल निवासी हैं

- लेकिन ऑस्ट्रेलिया की जेलों में 14 परसेंट लोग मूल निवासी हैं

- ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासी कम उम्र में मरता है, उसके बेरोजगार रहने के चांस ज्यादा हैंआंकड़े देखें

- इसलिए जाति का गणित कृपया हमें मत समझाइएजाति से हम लड़ रहे हैं, जीत लेंगेआप अपनी चिंता कीजिए

ये तो है मेरे पत्र के कुछ प्वायंटलेकन मुझे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से शिकायत हैउसमें दम नहीं हैवरना भारतीय टीम के प्रवक्ता को पूछना चाहिए कि ऑस्ट्रेलिया की टीम में कितने मूल निवासी हैंलेकिन लगता है कि हमारे अपने घर के कंस्ट्रक्शन में काफी शीशा लगा हैइसलिए पत्थर उछालने का जोखिम हम नहीं ले सकते

Friday, January 4, 2008

सफदर के मायने क्या समझाता

उदयप्रकाशजी की सफदर हाशमी पर लिखी पोस्ट कबाड़खाने में पढ़ी। पुरानी यादें ताजा हो गईं। सफदर नहीं रहे यह सुना था शायद बीबीसी पर या किसी और माध्यम पर, ठीक से याद नहीं। सन्नाटा खिंच गया था। न तब इफरात एसटीडी फोन होते थे और मोबाईल जैसी चीज़ों की तो बात ही क्या। मै नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण मे था तब। डेस्क की ड्यूटी के साथ ही शाम को रामनिवास बाग में रवीन्द्र भवन जाकर कल्चरल रिपोर्टंग करना मेरे शौकिया असाइनमेंट में शामिल था।
जयपुर में खूब थियेटर होता था तब। आज भी होता होगा। मगर सफदर की मौत पर कुछ नही हुआ। चटक कर एक तिलमिलाने वाली हैडिंग लगाई थी, रंगमंच ने खामोशी ओढ़ी...बड़ा बोल न मानें, मगर फिर जो पूरे सौ दिन तक सफदर का हल्ला बोल हम सभी साथियों ने खेला। नौकरी छोड़-छोड़ कर रोज़ इनोवेटिव रोल के लिए रवीन्द्र मंच पर पहुंच जाते ।
धरती बांटी ,सागर बांटा मत बांटो इन्सान को
सफदर की मौत के बाद शुरू हुई उस रंगमंचीय पहल को जयपुर वाले अब भूल गए होंगे मगर कृष्णकल्पित, अजंता चौधरी, अंजू ढ़ड्ढा मिश्र, डा सत्यनारायण , साबिर भाई , आलोक शर्मा, शकील अख्तर जैसे तमाम और दूसरे मित्र जो तब भी किसी न किसी रूप में मीडिया से ही जुडे थे और आज दिल्ली, जयपुर, भोपाल जैसे कोनों में अपना काम कर रहे हैं निश्चित तौर पर याद करते होंगे। देश भर में ऐसी अनूठी पहल नहीं हुई थी। पूरे सौ दिनों तक जयपुर के अलग-अलग इलाकों में हमने हत्यारे नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन किया था। साबिर भाई इसके निर्देशक थे, वे आज भी जयपुर में रंगकर्म कर रहे हैं। मुझे ध्यान आता है कि टीवी के व्यस्त कलाकार अनूप सोनी भी तब जयपुर में ही रंगकर्म में प्रवीण हो रहे थे।
उसके बाद हम लोग दिल्ली मे चल रहे आंदोलन में शामिल होने गए। मंडी हाऊस में बनाई गई मानव शृंखला में शामिल होने बालीवुड से भी लोग आए थे जिनमें शबाना, एके हंगल जैसे लोग खास थे।
आंदोलन लंबा चला था। पर मुझे यह भी याद है कि मेरी उस हेडिंग और राइटअप पर जो वहां के एक बड़े दैनिक के वरिष्ठ पत्रकार की प्रतिक्रिया क्या थी। वह थी - ये नाम तो कभी सुना नहीं, आप तो ऐसे हल्ला मचा रहे हैं जैसे ड्रामे का बड़ा आर्टिस्ट मर गया है। अब मैं उन्हें छोटे बड़े का क्या भेद समझाता। अलबत्ता आज तो उन्हें ये लिंक दे सकता हूं ताकि सफदर का सिर्फ शाब्दिक अर्थ वो जान सकें। - रंगमहल के दस दरवाज़े

Thursday, January 3, 2008

सफ़दर की याद


साल के पहले ही दिन दो दोस्त हमसे दूर चले गये थे। सफ़दर १९८९ मे और जसविन्दर १९९६ मेयह भी सच है कि मैने अशोक को बताया था कि मै अपना जन्म दिन नही मनाताकिसी कबाडी का कोई जन्म दिन होता भी नहीवी आर जस्ट बोर्न
मै आज से १७ साल पहले लिखी गयी वह कविता आपके हवाले करता हू जिसमे सफ़दर के लियॆ हम सबका प्यार हैयाद रखे अगर आज सफ़दर और जसविन्दर होते तो वो भी हमारे मोह्ल्ले या कबाड्खाने मे होते

वे यहीं कहीं हैं
(1 जनवरी 1990 में सफदर हाश्मी की स्मृति मे लिखी गई कविता)

वे कहीं गये नहीं हैं,
वे यहीं कहीं हैं
उनके लिए रोना नहीं।

वे बच्चों की टोली में रंगीन बुश्शर्ट पहने बच्चों के बीच गुम हैं
वे मैली बनियान पहने मलबे के ढेर से बीन रहे हैं
हरी पीली लाल प्लास्टिक की चीज़ें

वे तुम्हारे हाथ में चाय का कप पकड़ा जाते हैं
अखबार थमा जाते हैं
वे किसी मशीन, किसी पेड़, किसी दीवार,
किसी किताब के पीछे छुप कर गाते हैं

पहाड़ियों की तलहटी में गांव की ओर जाने वाली सड़क पर वे हंसते हैं
उनके हाथों में गेहूँ और मकई की बालियां हैं

बहनें जब होती हैं किसी जंगल किसी गली
किसी अंधेरे में अकेली
तो वे साइकिल में अचानक कहीं से तेज़-तेज़ आते हैं
और उनके आसपास घंटी बजा जाते हैं

वे हवा का जीवन, सूरज की सांस, पानी की बांसुरी,
धरती की धड़कन हैं
वे परछाइयां हैं समुद्र में फैली हुईं

वे सिर्फ़ हडि्डयां और सिर्फ त्वचा नहीं थे कि मौसम के अम्ल में गल जाएंगे
वे फ़क़त ख़ून नहीं थे कि मिट्टी में सूख जाएंगे
वे कोई नौकरी नहीं थे कि बरखास्त कर दिये जाएंगे

वे जड़े हैं हज़ारों साल पुरानी,
वे पानी के सोते हैं
धरती के भीतर-भीतर पूरी पृथ्वी और पाताल तक वे रेंग रहे हैं
वे अपने काम में लगे हैं जब कि हत्यारे खुश हैं कि
हमने उन्हें ख़त्म कर डाला है

वे किसी दौलतमंद का सपना नहीं हैं कि
सिक्कों और अशिर्फयों की आवाज़ से वे टूट जाएंगे

वे यहीं कहीं हैं
वे यहीं कहीं हैं
किसी दोस्त से गप्प लड़ा रहे हैं
कोई लड़की अपनी नींद में उनके सपने देख रही है
वे किसी से छुप कर किसी से मिलने गए हैं
उनके लिए रोना नहीं

कोई रेलगाड़ी आ रही है
दूर से सीटी देती हुई

उनके लिए आंसू ना-समझी है
उनके लिए रोना नहीं

देखो वे तीनों - सफदर, पाश और सुकांत
और लोरका और नजरुल और मोलाइसे और नागार्जुन
और वे सारे के सारे
ज़ल्दबाजी में आएंगे
कास्ट्यूम बदल कर नाटक में अपनी भूमिका निभाएंगे
और तालियों और कोरस
और मंच की जलती-बुझती रोशनी के बीच
फिर गायब हो जाएंगे

हां उन्हें ढूंढ़ना ज़रूर
हर चेहरे को गौर से देखना
पर उनके लिए रोना नहीं
रोकर उन्हें खोना नहीं

वे यहीं कहीं हैं ......
वे यहीं कहीं हैं ।।

Wednesday, January 2, 2008

हिन्दी ब्लाग का उद्भव (और विकास) - कुछ इतिहास , कुछ झक्कास

नामकरण :

बुझी को राख कहते हैं , जली को आग कहते हैं।
जहाँ से उठता ही रहे धुआँ,उसे तो ब्लाग कहते हैं।।

नाम-स्मरणः

पहिला सुमिरन अशोक का जो मेरा उस्ताद।
उन्नें मुझको राय दी सीखें ब्लागोत्पाद ।
मेरे ज्ञान के खेत में डाला पानी -खाद ,
हे कबाड़श्री धन्य हो धन्य-धन्य उस्ताद ।
नाम तिहारा लेय के लिक्खूं ब्लाग-प्रसंग,
पहिले माफी माँग लूँ यदि होवे कोई तंग ।

उपोदघात/प्रस्तावना/विषय प्रवेशः

यह एक कहानी है।बात बहुत पुरानी है.इतनी पुरानी कि बेचारा पुरानापन शरमा जाये और बेशरम नयेपन को शरम ना आये.मुझे तो बताना है इतिहास.कोई राज है इसमें खास.माई-बाप यह आप का करम है कि बन्दे की बकवास को झेलने जा रहे हैं.खैर ,अब हम हिन्दी ब्लाग का उद्भव (और विकास) नामक अध्याय ठेलने जा रहे हैं.सो एडवांस में थैंक्यू ,धन्यवाद और हे बहन! हे भाई! पुराने साल की विदाई और नये साल की बधाई!


खण्डः एक-

बताने वाले बताते हैं कि हिन्दी ब्लाग का बीज तो आज से कई हजार साल पहले ही पड़ गया था और यह संयोगवश हो गया था, अनायास।क्यों न हो दुनिया के ज्यादतर अन्वेषण-आविष्कार संयोगवश ही तो हुए हैं.भले ही बाद में किसी ने उसका श्रेय ही नहीं बल्कि उसके नाम पर पुरस्कार भी झटक लिया हो.इस संयोग के निमित्त बने थे श्री मुखारविन्द खांण्डेय नामधारी एक जीवधारी जो आजकल विश्व के कुछ कुष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में दिव्य पुरुष के रूप में याद किये जाते हैं.उनकी स्मृति में जगह्-जगह मेले-ठेले-उत्सव आदि भी होते रहते हैं.आप ने देखे होंगे शायद!

अथ संयोग कथा :

एक बार प्रलय हुई।समूची पृथ्वी पर हाहाकार मच गया.सबकुझ समाप्त.सबकुझ खतम.सबकुझ खल्लास.बस बचा रह गया एक अनाम-बेनाम नगर जिसका नाम बाद में खैनीताल पड़ा.वह बचा शायद इसलिये कि वहां के निवासी बड़े ही पुण्यात्मा टाइप के लोग थे क्योंकि इस नगर का नाम खैनी यानी सुर्ती यानी चैतन्य चूर्ण के नाम पर पड़ा था.इस नगर के संस्थापक (प्रातः स्मरणीय) डी.बी. भाई खैनी खाते ही नहीं बल्कि उसके गुण भी गया करते थे,वह भी एक अबूझ सी भाषा में जिसका अर्थ या अनर्थ न समझते हुये लोग समझदारों की तरह मुंडी हिलाया करते थे.जब(प्रातः स्मरणीय) डी.बी. भाई अपना 'खैनियोपाख्यानचरित्सागर' नामक अखंड काव्य पूरा कर चुके तो उन्हें इस नश्वर संसार की नश्वरता का बोध हुआ और वे एक दिन अंतर्ध्यान हो गये.उड़ती-उड़ाती खबरों से पता चला कि (प्रातः स्मरणीय) डी.बी. भाई किल्मोड़ा वाले बद्री काका के साथ देशाटन पर चले गये हैं.तब उनके शिष्यों-प्रशंसकों ने मिलकर नगर का नाम खैनीताल करवा दिया और दे-दिवाकर नामांतरण से संबंधित महकमे से इस पर स्वीकृति की मुहर भी लगवा ली.अगर मेरी बात पर विश्वास न हो तो 'बुग्याल' वाले बड़्बाज्यू या' विलायती रेडियो'वाले राजेश जोशी दद्दा से तसदीक करवा सकते हैं कि मैं झूठ बोल्या?

खण्डः दो -

तो हे पाठक प्रवर! इसी विख्यात-कुख्यात खैनीताल नामक नगर में 'ब्रुकबिल खतरावास' नामक एक अजायबघर था (वह अब नहीं है लेकिन इतिहास और स्मृतियों के कबाड़खाने में तो है ही और रहेगा भी.) जिसमें तरह-तरह के जीवित जीव-जंतु रहा करते थे जिनमें से कुछ तो 'जीवित जीवाष्म' की श्रेणी में गिने जाने लायक हो गये थे. खतरावास के बाशिंदे निरंतर खतरे झेलते रहते थे,वे एक हद तक इसमें विशेषज्ञता प्राप्त कर चुके थे क्योंकि उनका 'वास' बहुत ही जीर्ण दशा में था.वह किसी जमाने में वह अस्तबल रह चुका था और अब उसमें प्रखर मेधावी 'खर' रहा करते थे और ऊपर से एक बवाल यह भी था कि नगर की सबसे ऊंची पहाड़ी 'टाइना टीक' से बड़े-बड़े बोल्डर लुढकते रहते थे और खतरावासी एस्बेस्टस की भयंकर ठंडी छतों के नीचे लेट-बैठकर करवट लिए, तसव्वुरे जानां किये हुए अपने शोल्डर बचाया करते थे. और हां, खतरावासी पढने-लिखने का काम भी करते थे.दरअसल उनका मुख्य काम वही था,वे उसी के लिये अलग-अलग जगहों से भेजे गये थे किन्तु प्राथमिकताओं की सूची में पढने-लिखने की एंट्री सबसे आखीर में दर्ज थी.

ब्रुकबिल खतरावास के खास और (क्रिकेट) खेले - ( दिल पे चोट) खाये खिलाड़ी थे श्री मुखारविन्द खांण्डेय (जिन्हें आगे 'मुखी भाई' कहा जायेगा)।वे ,यानी मुखी भाई रसायन विज्ञान में रस ले-ले कर पेंच.डी. उपाधि प्राप्त करने के उद्देश्य से शोध कर रहे थे जो आज तक पूरी नहीं हुई है और तमाशा यह देखो कि 'इनवरसिट्टी' वाले एडवांस मे डिग्री छाप के उनके पीछे-पीछे कई हजार सालों से डोल रहे हैं कि डाक्साब! ले लो ,ले ही लो.लेकिन डाक्साब मानें तब ना ! वे केवल अपने दिल की मानते हैं और उनका दिल उनके पास है नहीं. कहते हैं- धरे रहो,धरे रहो.अगली प्रलय के बाद लेंगे.

तो हे पाठक प्रवर! हिन्दी ब्लाग के उद्भव का श्रेय इन्हीं मुखी भाई को जाता है।उन्होंने आज से कई हजार वर्ष पहले खैनीताल के खतरावास मे क्रोध में आकर इन पंक्तियों के लेखक के समक्ष श्राप देते हुए भविष्यवाणी कर दी थी कि कलयुग में हिन्दी पत्रकारिता का ब्लागावतार होगा होगा और नौ दो ग्यारह होते हुए पतली गली तथा धाकड़ मोहल्ले से लेकर कबाड़खाने तक इसकी व्याप्ति होगी. सचमुच महापुरुषों की वाणी कभी वृथा नहीं जाती.


अथ श्राप कथा :

विस्तार के भय से इतना भर बताता हूं कि मुखी भाई को प्रेम हो गया था ।यह उस युग में बहुत कामन चीज थी,आज का कुछ कह नहीं सकते।सुना है कि कवियों-कलाकारों को अब भी होता है.मुखी भाई अपनी प्रेम कथा को अमर होते देखना चाहते थे.उनकी इच्छा थी कि उनकी प्रेमकथा को लेकर एक खंडकाव्य तो जरूर लिखा जाना चाहिए ताकि उनकी और उनकी रूपसी प्रेयसी (जो उस खतरावास मे वास करती थी जिसकी टीन की छतों पर रात के अंधेरे में मुहब्बत के भूखे भाई लोग अपना कलेजा निकाल कर फेंका करते थे लेकिन किसी चमत्कार के कारण वे छत तक पहुंचते-पहुंचते पत्थरों में तब्दील हो जाया करते थे ! ऐसा सुना था.) की कथा पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन सकें और विद्यार्थी सिर खपायें.इन पंक्तियों का लेखक तब भी कुछ लिखता था,उसके यार दोस्त भी लिक्खाड़ थे.मुखी भाई की इच्छा थी कि मैं उनकी प्रेमकथा को लिपिबद्ध करूं.ऐसा अनुरोध वे कई सालों तक करते रहे और मैं अपनी व्यस्तता या असमर्थता का बहाना बनाकर टालता रहा तब तक जब तक कि उनकी उसी रूपसी प्रेयसी से शादी की नौबत नहीं आ गई.शादी वाले दिन जब वे घोड़ी पर सवार होकर मानो कोई जंग जीतने जा रहे थे तो अपने मुखारविंद पर लटक रहे सेहरे को तनिक खिसका कर पूरे तपोबल को पुंजीभूत करते हुए उन्होंने हाथ उठाकर श्राप दिया था -'सुन ऐ लेखक-वेखक के बच्चे !आज तो मेरी प्रेमकथा का अंत होने जा रहा है और तूने उसे लिखा नहीं किंतु एक दिन ऐसा भी आएगा जब कौआ मोती खाएगा तब कलयुग में मेरा ब्लागावतार होगा और तेरे जैसे लेखक-वेखक कलम छोड़कर कंप्यूटर पकड़ेंगे और बेटा तू तो उसी ब्लाग के किसी कबाड़खाने में बैठकर मेरी प्रेमकथा लिखेगा.' ऐसी श्रापमय भविष्यवाणी कर मुखी भाई घोड़ी समेत अंतर्ध्यान हो गये.पता नहीं खाटिमपुर के झिल्लमिल्ल विहार के मकान नंबर ए-०३ में श्री मुखारविन्द खांण्डेय नाम से रहने वाले मास्साब कौन हैं. इस बारे में उनकी पत्नी और बच्चे भी मौन हैं.


तो हे पाठक प्रवर ! यह तो हुई श्रापकथा यानी ब्लाग कथा । प्रेमकथा फिर कभी ।

Tuesday, January 1, 2008

आज उदय प्रकाश जी का जन्मदिन है



सभी को नए साल की शुभकामनाएं।

इस के अलावा कबाड़ख़ाने से जुड़े नवीनतम कबाड़ी व हिन्दी के विख्यात लेखक श्री उदय प्रकाश का जन्मदिन भी है आज। आज उन्हें पचपन वर्ष पूरे हुए हैं। उनके और उनके रचनाकर्म के लिए यह वर्ष शुभ हो! हम सब की ओर से मुबारकें !!!