Thursday, June 26, 2008

उमड़-घुमड़ घिर आयो रे: मेहदी हसन

मेहदी हसन साहब को ग़ज़लें गाते तो बहुत सुना होगा आपने. आज सुनिये उनके निखालिस शास्त्रीय गायन का एक नमूना: उमड़-घुमड़ घिर आयो रे सजनी बदरा. राग देस में इस पारम्परिक ठुमरी गाते हुए उस्ताद मेहदी हसन के साथ सारंगी पर उस्ताद सुल्तान ख़ान और तबले पर उस्ताद शौकत हुसैन ख़ान हैं. उनके पुत्र कामरान हुसैन हारमोनियम पर संगत कर रहे हैं।

4 comments:

सतीश पंचम said...

Nice one

sanjay patel said...

ख़ाँ साहब से मैने पूछा था उस्तादजी ये कोई बंदिश कैसे हिट हो जाती है...यथा..मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,चराग़े तूर जलाओ बड़ा अंधेरा है,गुलों में रंग भरे आदि...जवाब दिया:देखो ये सारी कम्पोज़िशन्स तो वो (ऊपरवाला)भेज देता है , मैं तो बस चूड़ीवाले बाजे पर अपनी आवास का रेकॉर्ड कर भर देता हूँ.फ़िर पूछा गाने के पहले कोई ख़ास तैयारी ? बोले तैयारी तो उस्तादों के आस्ताने पर जा जा कर की थी...उनके जूते सिर पर उठाए...क्योंकि जहाँ उस्तादों के जूते होते हैं वहाँ होती है उनके पाँवों की पाक़ ख़ाक पड़ी होती है और वहीं होते हैं करिश्मे.और जहाँ तक स्टेज पर जाने के पहले की तैयारी का मामला है तो भैया मैं तो बस बाजा लेकर अपने आप सुनाने बैठ जाता हूँ...कहाँ गा रहा हूँ,कौन सामने बैठा है,कितने पैसे मिलेंगे...इस सब से सारा वास्ता ख़त्म हो जाता है...और गले से गाने लगता है वो(समझ गए न)

अशोक भाई क्या उम्दा चीज़ लगाई आपने..मेरे शहार आज मेह बरसा है और ये बंदिश जैसे उसका ख़ैरमकदम कर रही है.मैने ऊपर जो अपने आपको सुनाने की बात कही उसके चलते ही तो आपने जो रचना आज जारी की वह मेहंदी हसन के गले से सध गई है.वरना कमर्शियल मार्केट में ग़ज़ल वाला ऐसी आलापचारी गाने बैठे तो गए काम से ...लेकिन यहीं आकर तो मेहंदी हसन महान मेहंदी हसन हो जाते हैं...शहंशाह ए ग़ज़ल.

Ashok Pande said...

हम तो आप के पैताने बैठे हैं संजय भाई. और क्या रश्क आप से होता है ... वल्लाह

पारुल "पुखराज" said...

...क्योंकि जहाँ उस्तादों के जूते होते हैं वहाँ होती है उनके पाँवों की पाक़ ख़ाक पड़ी होती है और वहीं होते हैं करिश्मे.badi sacchii baat hai ye SANJAY BHAYI..yahan share karney ka bahut shukriyaa.

ASHOK JI, post bahut munbhaayi..