Friday, October 31, 2008

पहल का पटाक्षेप !

दोस्तों !

ये एक सूचना है जो मुझे अभी फोन पर कवि वीरेन डंगवाल ने दी। उन्हें ज्ञान जी ने पहले फोन पर बताया और अब इससे सम्बंधित पत्र भी उन तक पहुँच चुका है। ज्ञान जी ने लिखा है पहल ने 35 रचनात्मक वर्ष बिताये और उसे कई जनों का साथ मिला, लेकिन अब उसका पटाक्षेप होने जा रहा है ! पहल का अन्तिम अंक प्रेस में है। ज्ञान जी ने स्पष्ट किया कि पहल के बंद होने के पीछे कोई आर्थिक या रचनात्मक अभाव नहीं है। ज्ञान जी के अनुसार उनके सक्रिय रहने की एक सीमा है और अब वे विवश हैं। वीरेन डंगवाल ने फोन पर पहल से अपने जुडाव को याद करते हुए उसके इस तरह बंद हो जाने पर अफ़सोस व्यक्त किया। ज्ञान जी की किताब से अपने ब्लॉग का नामकरण करने वाला हमारा अगुआ साथी अशोक भी फोन पर इस खबर से काफी हैरान-परेशान दिखा! पहल के पन्नों में उसके किए अनुवादों का एक समूचा इतिहास दर्ज़ है।

मैं भी इस सूचना से हतप्रभ हूँ। पहल - ५८ में छपी कविताओं ने ही मुझे हिन्दी में पहली पहचान दी थी। ख़ुद को और अधिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं पाता !

उम्मीद है ज्ञान जी जल्द ही किसी और रचनात्मक भूमिका में सामने आयेंगे !
पहल को हमारा सलाम !

9 comments:

विजय गौड़ said...

अशोक भाई सच में यह खबर हैरान और परेशान करने वाली है। हिन्दी साहित्य में पहल की एतिहासिक भूमिका है। बल्कि कहें तो हिन्दी वालॊ के बीच वैचारिकी को बनाने में पहल की मह्त्वपूर्ण स्थिति है। उसका बंद हो जाना निश्चित ही परेशान करने वाली सूचना है। चाहे एक अंक बाद हो या दो और तीन अंक बाद। मेरी सूचना के मुताबिक पहल के अगले अंक को अंतिम अंक नहीं कहा जा सकता।

वर्षा said...

पहल के कुछ अंक ही मैंने पढ़े हैं। इसका बंद हो जाना वाकई परेशान करनेवाली ख़बर है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

दुःखद समाचार...! :(

बोधिसत्व said...

पहल का बंद होना वाकई दुखद है....ज्ञान जी के अवदान का हिंदी पर युगों तक ऋण रहेगा...

दिनेशराय द्विवेदी said...

दुखद सूचना है। साथियों में से किसी को चाहिए कि इस महत्वपूर्ण पत्रिका को गोद ले लें। वाकई पेंतीस वर्ष इसे चलाना एक महत्वपूर्ण काम था। इस का बंद होना बरसों सालेगा।

ravindra vyas said...

अरे कोई है? जो कहे कि यह खबर गलत है।

Ek ziddi dhun said...

शिरीष भाई, दो दिन पहले असद जैदी ने बेहद अफ़सोस के साथ ये खबर मुझे दी थी ki ज्ञान अपने दोस्तों को ख़त और फ़ोन से सूचना दे चुके हैं कि पहल का इस बार आखिरी अंक होगा. मैं यह सोचकर इसे ब्लॉग पर देने से बचा कि शायद ज्ञानरंजन को मना लिया जाय.
पहल हिंदी में अपनी मिसाल आप ही है. और कई पर्त्रिकाएं आयीं पर पहल बस पहल ही रही. प्रगतिशेल लेखक संघ की पत्रिका होते हुए भी यह कतई प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका नहीं रही. ये ज्ञानरंजन का अपना विस्तार था (समझ और संपर्क ka ) कि पहल हर सीमा का अतिकर्मन कर बेहतरीन पत्रिका बनी रही. इस बड़ी पत्रिका में पिछले काफी समय से एक धीमा-धीमा उतार भी निश्चय ही देखा जा रहा था. शायद उम्र ने ज्ञान जी को ये सोचमे पर मजबूर किया ho ki ve ise प्रेमचंद के हंस को राजेंद्र यादव की हंस बन जाने की तरह पहल को कोई दूसरी तरह की पहल ho जाने kee संभावनाओं se pahle hee band kar de. ये उनका हक़ बनता है कि वे इसे बंद कर den aur ye ham सबका फ़र्ज़ बनता hai ki उन्हें विश्वाश दिलाया jay ki ऐसे log hain ki jo ise उनकी see nazar aur unke se संपर्कों ke saath zinda rakh sakte hain. aao koi अभियान chalaya jay..

अजित वडनेरकर said...

साथी तय करें ....हम साथ हैं...
सब चाहते हैं तो कोई पहल अंतिम कैसे हो सकती है ?

Girish Billore Mukul said...

pahal ka antim ank dak men hai
vistrit jankaaree ke lie misfit/savysachi men post chhaap dee hai aaz hee gyaan ji se baatcheet hui hai