Tuesday, April 21, 2009

हिंदी बोलेंगे ओबामा, गर ठान लें...

अजब हंगामा बरपा है। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाने की बात क्या कही गई, तूफान मच गया। उन अंगरेजी अखबारों को तो छोड़िए, जिन्होंने 1857 के संग्राम को खुलेआम विरोध किया था या भारत की आजादी की खबर इस अंदाज में छापी थी जैसे कोई अनहोनी हो गई, हिंदी मीडिया का भी एक तबका छाती पीट रहा है। जैसे अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करना गैरकानूनी बात हो, या पहली बार कही जा रही हो। बाकी हिंदी समाज में भी इस हमले को लेकर एक खास तरह की उदासीनता है। दिमागी गुलामी का इससे बेहतर उदाहरण मिलना मुश्किल है।

इसमें शक नहीं कि मुलायम सिंह यादव हिंदी के लिए उतने ही प्रतिबद्ध हैं जितने कि समाजवाद के लिए। तीन बार देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद दोनों ही मसलों पर उनकी ओर से कोई ऐसी रचनात्मक और सकारात्मक पहलकदमी नहीं हुई जिससे कोई गुणात्मक फर्क पड़ता। लेकिन हिंदी का मसला उनका भी है जो मुलायम की राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। क्योंकि अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करके मातृभाषा को स्थापित करने की लड़ाई भावना का नहीं, जनतंत्र का प्रश्न है।

अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाना दरअसल संविधान का संकल्प है। आजादी के आंदोलन के दौरान हिंदी को अखिल भारतीय संपर्क और राजकाज की भाषा बनाने का सपना इसलिए देखा गया था क्योंकि गुलामी सिर्फ भौगोलिक और शारीरिक नहीं होती, सांस्कृतिक भी होती है। और आजाद भारत में हिंदी इसी सांस्कृतिक आजादी की अभिव्यक्ति के लिए चुनी गई थी। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये हिंदी पहले से मौजूद नहीं थी। बल्कि लगातार बनाई जा रही थी। हिंदी क्षेत्र में भी मातृभाषा तो अवधी, भोजपुरी, मगही, बघेली, बुंदेली जैसी बोलियां थीं जिन्हें पीछे छोड़ हिंदी की प्रतिष्ठा की जानी थी। ये स्वाभिमान का प्रश्न था। इसीलिए आजादी के बाद महात्मा गांधी ने बीबीसी के संवाददाताओं से अंग्रेजी में बात करने से इंकार करते हुए कहा था-दुनिया से कह दो, गांधी को अंग्रेजी नहीं आती। बाद में अरसे तक डा.लोहिया हिंदी को लेकर जूझते रहे और अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करना समाजवादी आंदोलन की प्रमुख मांग बनी रही

जाहिर है, आज जो अंग्रेजी की ओर उंगली उठने पर बौखला रहे हैं वे मन ही मन गांधी जी और डा.लोहिया को भी मूर्ख मानते होंगे। ये तबका बेहद शातिर है। उसने बड़ी चालाकी से अंग्रेजों की अनिवार्यता हटाने के वाक्य से "अनिवार्यता" शब्द को गायब कर दिया। और बताने लगे कि अंग्रेजी हटाने की बात करना 21वीं सदी में मूर्खता है। इससे देश पीछे चला जाएगा या फिर मुलायम के अपने बच्चे क्यों अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े,वगैरह-वगैरह। वैसे तो, महात्मा गांधी और डा.लोहिया ने भी विदेश जाकर अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई की थी। क्या इस तर्क पर हिंदी के बारे में उनके विचार गलत ठहराए जा सकते हैं।

दरअसल, ये सारे तर्क मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए हैं। बात सिर्फ इतनी है कि करीब 50 करोड़ हिंदी भाषी, अंग्रेजी न जानने के बावजूद कैसे तरक्की कर सकें। कैसे डाक्टर, इंजीनियर, मैनेजर बन सकें। जिन्हें अंग्रेजी पढ़ना हो पढ़ें, पर जिन्हें अंग्रेजी न आती हो, उन्हें खामियाजा न भुगतना पड़े। आखिर रूस, चीन, जर्मनी, जापान, फ्रांस, स्पेन जैसे देश बिना अंग्रेजी के तरक्की कर सकते हैं, तो हिंदी वाले क्यों नहीं। ये हक हिंदी ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं को मिलना चाहिए।

वैसे भी, सिर्फ अंग्रेजी जानना ही विकास की गारंटी होती तो अमेरिका में लाखों लोग खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर नहीं होते। इक्कीसवीं सदी का एक चेहरा ये भी है कि अंग्रेजी जिस आर्थिक व्यवस्था के केंद्र में थी, वो दिवालिया हो गई है और जिस आउटसोर्सिंग का फायदा उठाने के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी माना जाता था, उसे बंद करने के लिए अमेरिका में जुलूस निकल रहे हैं। यानी, मनमनोहन सिंह का अंग्रेजी सिखाने के लिए आक्सफोर्ड जाकर अंग्रेजों को शुक्रिया कहना बेकार जा सकता है। वैसे भी, अंग्रेजी का सारा तूमार गलत तथ्यों के आधार पर बांधा गया है। अंग्रेजी पूरी दुनिया की नहीं, सिर्फ इंग्लैंड, अमेरिका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया और आधे कनाडा की भाषा है। यानी साढ़े चार देश। बाकी इन देशों के पूर्व उपनिवेशों के एक-आध फीसदी लोग इस भाषा का व्यवहार करते हैं।

दिमागी गुलामी को स्वर्ग का सुख मान रहे वर्ग की चिंता ये है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता हटते ही करोड़ों-करोड़ आम लोग तेजी से कुलीनतंत्र के शामियाने में घुसने की कोशिश करेंगे। तब आम और खास का फर्क ही मिट जाएगा। शासक वर्ग भी इस फर्क को बनाए रखना चाहता है। उसकी चिंता देश के दो-चार करोड़ अंग्रेजी जानने वालों को लेकर ही रहती है। ये वर्ग मुखर है और सत्ता प्रतिष्ठान के हर कोने में कब्जा जमाए हुए है।

देखा जाए तो, आग और पहिये के बाद भाषा मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है। और दुनिया भर के शिक्षाशास्त्री बताते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा से ही मेधा निखरती है। मौलिक अभिव्यक्तियां मातृभाषा में ही संभव होती हैं। जनतंत्र का तकाजा ये है कि जनता और शासन की भाषा एक हो, पर हिंदी समाज में मुंसिफ और मुल्जिम, मुवक्किल और वकील, डाक्टर और मरीज, अफसर और क्लर्क की भाषा अलग है। अंग्रेजी में निष्णात होने के प्रयास में हिंदी वाला पैर में पत्थर बांधकर दौड़ता है और अक्सर पिछड़ जाता है। ऐसे में जरूरत नए महाप्रयास की है। ये सही है कि ज्ञान-विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में हिंदी किताबे उपलब्ध नहीं हैं। पर ये कोई मुश्किल काम नहीं है। अगर ठान लिया जाए तो पांच साल में दुनिया का सारा ज्ञान हिंदी में उपलब्ध हो सकता है। वैसे भी, आईआईटी,कानपुर के वैज्ञानिक ऐसा साफ्टवेयर विकसित करने के करीब पहुच गए हैं जो बटन दबाते ही सटीक अनुवाद पेश करेगा। यानी तकनीक भी काम आसान कर रही है। जरूरत है, इरादे की। याद करिए, तुर्की के कमाल पाशा को। उसने विद्वानों से पूछा कि तुर्की लागू करने के लिए कितना वक्त चाहिए। जवाब मिला-दस साल। कमाल पाशा ने कहा-समझ लो दस साल इसी वक्त खत्म हो गए, और तुर्की भाषा लागू हो गई।

कवि त्रिलोचन शास्त्री कहते थे कि हिंदी वालों में अपनी भाषा को लेकर अनुराग नहीं है। बात सही है। अनुराग होता तो समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में अंग्रेजी की बात पर न कांग्रेस आलोचना करने की हिम्मत करती, न बीजेपी। लेकिन उन्हें पता है कि हिंदी के नाम पर वोट नहीं पड़ते। जाति और धर्म के नाम पर पड़ते हैं। सोचिए, हिंदी का मजाक उड़ाने वाले मराठी की बात आते ही कैसे मिमियाने लगते हैं। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां रातो-रात अपने बोर्ड मराठी में कर लेती हैं और मैकडॉनल्ड की दुकानों में बटाटा बड़ा बिकने लगता है। क्योंकि उन्हें राज ठाकरे जैसों के लट्ठ का डर है। पर हिंदी को न राज ठाकरे चाहिए न जूता चलाने वाले जरनैल। उसे तो जामवंतों की जरूरत है जो हिंदी वालों को उनकी ताकत का अहसास करा सके। 50 करोड़ जाग्रत हिंदी भाषियों के बाजार में घुसने के लिए तो ओबामा भी हिंदी सीख लेंगे।

14 comments:

परमजीत सिहँ बाली said...

हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि हमारे देश को ऐसे कर्णधार मिले जिन्होनें ऐसा माहौल तैयार किया जिस से हिन्दी भाषी दीन हीन नजर आने लगे।यदि देश मे हिन्दी को अनिवार्य कर दिया जाता तो आज दूसरों को हिन्दी सीखने के लिए मजबूर होना पड़ता। अभी भी कुछ बिगड़ा नही है,इन अग्रेजों की औलादों को देश के हित के बारे में सोचना चाहिए।

मुनीश ( munish ) said...

उनके कम्प्यूटर विषयक विचारों को भी स्पष्ट करें पंकज भाई ।

अनुनाद सिंह said...

बहुत सम्यक विचार प्रस्तुत किया है; सधुवाद।

वास्तव में भारत में अंग्रेजी राज के छोटे-बड़े बहुत से अंग थे। उसमें से एक अंग्रेज थे। इसके अलावा देशी(काले) अंग्रेज, अंग्रेजी, इसाई मिशनरियाँ, अंग्रेजी-कानून, मैकाले की शिक्षा-प्रणाली, जनता के शोषण के उद्देश्य से रची गयी ब्यूरोक्रैसी और पुलिस व्यवस्था, "फूट-डालो-और-राज-करो" की नीति से चलने वाली राजनीति आदि अन्य अंग थे।

दुर्भाग्य है कि हम केवल अंग्रेजों के चले जाने को "आजादी" मान बैठे हैं।

अनुनाद सिंह said...

और हाँ, मेरी उपरोक्त टिप्पणी में "आंवें में नाद" ही गायब हो गया।

भारत के अंग्रेजी के पेपर अंग्रेजी राज के प्रबल स्तम्भ थे। उन्हें समाप्त किये बिना भारत को आजाद मानना नादानी होगी।

pankaj srivastava said...

मुनीश भाई,

आपने हिंदी की बाबत कुछ न कहकर कंप्यूटर के बारे में राय 'उनके' विचारों पर मेरी राय जाननी चाही है। मैं मान लेता हूं कि हिंदी मुद्दे पर आप सहमत हैं। धन्यवाद।
वैसे 'उनके' बारे में मेरी राय इस लेख के दूसरे पैराग्राफ में स्पष्ट रूप से लिखी है। फिर भी, मेरी राय यही है कि कंप्यूटर बड़े काम की चीज है और ये अंग्रेजी भाषा का मोहताज नहीं है।
अगर बहस मशीन और मनुष्य को लेकर है तो गांधी जी के हिंद स्वराज के प्रकाशन के सौंवे वर्ष पर इसका होना प्रासंगिक होगा। हम जो सभ्यता रच रहे हैं, उस पर बात हो सकती है।
ये संयोग नहीं है कि जिस दिल्ली में हम और आप रहते हैं, वहां की जीवनदायी नदी यमुना की मौत हो चुकी है। पास ही गंगा भी मृत्युशैया पर है। पर किसी को फर्क नहीं पड़ता

विनय (Viney) said...

जबर लिखा है पंकज भाई!
भाषा की कृत्रिम सरहदों को टूटना ही होगा.
"पर हिंदी को न राज ठाकरे चाहिए...",
सही! भाषा को तो बस बोलने वालों का प्यार चाहिए होता है. जो लट्ठ के बल पर हांकते हैं विकृत मानसिकता के बोझ तले दबे होते हैं. बहरहाल, देहातों-कस्बों में तो बड़ी-बड़ी कम्पनियों के बोर्ड हिंदी में ही लिखे जाने लगे हैं. हिंदी, जो अपने आप में कितनी ही भाषाओँ का मेल है, और जिसका अस्तित्व स्वाभिमान और नयेपन का अद्भुत संगम है, कैसे आगे बढ़ती है, देखना मज़ेदार रहेगा. और इस सफ़र में आप के इस लेख जैसे सपष्ट विचारों के लेख ज़रूरी हैं!

Unknown said...

pankaj shrivaastav ji ke lekh mein anoothi maulikta, ek mazboot sundarta aur prakharta hai. bhasha ke sawaal par aazaad hue baghair ham sachche & sampoorna maani mein na samprabhu ho sakte hain, na utni tezi se vikasit ho paayenge, jiski hamen bhautik roop se samriddha & qhush-haal aur aatmik taur par udaatta & samvedanaksham hone ke liye saqhta zaroorat hai.
sirf itna dhyaan dene ki zaroorat hai-------haalaanki yah mahaz takneeki maamla hi hai -------ki gandhi ji ne kaha tha ki 'duniya se kah do ki gandhi angrezi bhool gaya hai.
doosari baat yah ki hindi -vaalon ko hindi se anuraag nahin hai-----yah baat sirf trilochan hi nahin kahte the, sabse zordaari se ise ab ashok vaajpeyi kahte hain aur aaj-kal to hindi ke zyaadatar yuva lekhak bhi is talqha haqeeqat ko bayaan kar rahe hain.
teesre, kamaal paasha ne hi nahin , hamaare padosi mulk china mein bhi mao ne turant maatribhasha ko laagu karne ka wah kraantikaari kaam kiya tha, jiski pankaj ji yaad dila rahe hain.
aqheer mein, is behatareen & beshqeemati aalekh ke liye pankaj shrivaastav ji ka behad shukraguzaar hoon.

-----PANKAJ CHATURVEDI
kanpur

मुनीश ( munish ) said...

Dear Pankaj Bhai,
I am not convinced at all by your argument against Angrezi. Let us differentiate between Angrezi and Angreziyat . I am against the latter,but sill a humble student of the former. I hate cricket,i don't love whisky either as these smell of a bloody Gymkhana where dogs and Indians were not allowed , but i can't give up wearing pants for a Dhotee . So, English language means nothing ,but convenience of having a bridge. We owe our freedom to those leaders who had a remarkable proficiency in this language.
English is the standard radio language. That means even French and Russians have to have a certain degree of proficiency in English if they want to fly an air craft beyond their country's air space or to enter International waters with their merchant navy or warships.
India needs soldiers who can operate modern gadgets of warfare in connivance with either Nato or China and this the ugly truth .Where will this man-power come from ? Villages! And they have to have their English right so that they can interact in an international environment. English means SURVIVAL.
And for heaven sake let us not compare India to France. In France u can't make Hindus out of Christians in mass conversions ,like u can do vice-versa here.
Anyone against English is against the well being of country's poor . Their children must be provided with the very best of Engish teachers right there in their villages free of charge. Thanks.

pankaj srivastava said...

मुनीश भाई,

न मैं अंग्रेजी के खिलाफ हूं और न उनके बारे में कोई गलत राय रखता हूं जो धोती की जगह पैंट पहनते हैं। ये भी मानता हूं कि अंग्रेजी में बहुत खूबियां हैं।
आपने बिलकुल ठीक कहा, अंग्रेजी मतलब 'सर्वाइवल'। और सारी समस्या यही है। जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती क्या उन्हें अस्तित्व रक्षा का हक नहीं। और सबसे बड़ी बात ये कि आजादी की जिस लड़ाई ने संविधान दिया। भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया, उसी ने लंबी बहस के बाद हिंदी को भारत की भाषा बनाने का संकल्प लिया था। अब कहने वाले तो ये भी कहते हैं कि अंगरेजों के राज में क्या बुरा था। या राजतंत्र लोकतंत्र से बेहतर प्रणाली है।
ये बात बिलकुल ठीक है कि आजादी के आंदोलन के हमारे नेता अंग्रेजी में निष्णात थे। पर क्या आपने सोचा है कि इसके बावजूद वो अगर हिंदी के पक्ष में खड़े हुए तो क्यों? क्या वे भारत को पिछड़ा बनाए रखना चाहते थे?
मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि जिन्हें अंग्रेजी में सहजता महसूस करते हों, वे जरूर अंग्रेजी में पढ़ें। लेकिन किसी के लिए ये बोझ न हो। हिंदीभाषी को अपनी भाषा में 'सर्वाइवल' का हक मिलना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि हिंदी को वोट की ताकत बनाया जाए। ये एक राजनीतिक लड़ाई भी है। इक्का-दुक्का लेख लिख देने या हिंदी सप्ताह मनाने से हिंदी का कोई भला नहीं होने वाला।
और आखिरी बात ये कि किसी की मां सुंदर हो तो उसे अपनी मां तो नहीं बना लेते न। मां कितनी भी बदसूरत हो उससे मिले ममत्व का न कोई विकल्प है न मोल। और इतिहास में कई उदाहरण हैं जब बेटों ने 'सर्वाइवल' की कीमत पर मां के मान की रक्षा की है।
आपने कई और विषय उठाए हैं, लेकिन वो मूल प्रश्न से भटकाने वाले हैं, जैसा कि हिंदी का मसला सामने आने पर अक्सर होता है। उन पर फिर कभी। धन्यवाद।

Ashok Pande said...

बढ़िया सीधी बात! उम्दा आलेख है पंकज बाबू!

Dear Munish Bhai

Here are certian excerpts from our great Indian Constitution concering the official/unofficial status of Hindi and regional languages. I don't think one would need to underline the inherent reluctance that our governments have shown towards promotion of Hindi. KINDLY GIVE SPECIAL ATTENTION TO WHEREVER FIFTEEN YEARS ARE MENTIONED.:

The official language of India shall be Hindi in Devanagari script. The form of numerals to be used for the official purposes of the Union shall be the international form of Indian numerals.

Notwithstanding anything in clause (1), for a period of fifteen years from the commencement of this Constitution, the English language shall continue to be used for all the official purposes of the Union for which it was being used immediately before such commencement: Provided that the President may, during the said period, by order authorise the use of the Hindi language in addition to the English language and of the Devanagari form of numerals in addition to the international form of Indian numerals for any of the official purposes of the Union.

Notwithstanding anything in this article, Parliament may by law provide for the use, after the said period of fifteen years, of-

The English language, or

The Devanagari form of numerals, for such purposes as may be specified in the law.

Regional Languages:

Article 345. Official language or languages of a State:-

Subject to the provisions of articles 346 and 347, the Legislature of a State may by law adopt any one or more of the languages in use in the State or Hindi as the language or languages to be used for all or any of the official purposes of that State:

Provided that, until the Legislature of the State otherwise provides by law, the English language shall continue to be used for those official purposes within the State for which it was being used immediately before the commencement of this Constitution.

Article 346. Official language for communication between one State and another or between a State and the Union: -

The language for the time being authorised for use in the Union for official purposes shall be the official language for communication between one State and another State and between a State and the Union:

Provided that if two or more States agree that the Hindi language should be the official language for communication between such States, that language may be used for such communication.

Article 347. Special provision relating to language spoken by a section of the population of a State: -

On a demand being made in that behalf the President may, if he is satisfied that a substantial proportion of the population of a State desire the use of any language spoken by them to be recognised by that State, direct that such language shall also be officially recognised throughout that State or any part thereof for such purpose as he may specify.

Special Directives: -

Article 350. Language to be used in representations for redress of grievances: -

Every person shall be entitled to submit a representation for the redress of any grievance to any officer or authority of the Union or a State in any of the languages used in the Union or in the State, as the case may be.

Article 350A. Facilities for instruction in mother-tongue at primary stage: -

It shall be the endeavour of every State and of every local authority within the State to provide adequate facilities for instruction in the mother-tongue at the primary stage of education to children belonging to linguistic minority groups; and the President may issue such directions to any State as he considers necessary or proper for securing the provision of such facilities.

Article 350B. Special Officer for linguistic minorities: -

There shall be a Special Officer for linguistic minorities to be appointed by the President. It shall be the duty of the Special Officer to investigate all matters relating to the safeguards provided for linguistic minorities under this Constitution and report to the President upon those matters at such intervals as the President may direct, and the President shall cause all such reports to be laid before each House of Parliament, and sent to the Governments of the States concerned.

Article 351. Directive for development of the Hindi language: -

It shall be the duty of the Union to promote the spread of the Hindi language, to develop it so that it may serve as a medium of expression for all the elements of the composite culture of India and to secure its enrichment by assimilating without interfering with its genius, the forms, style and expressions used in Hindustani and in the other languages of India specified in the Eighth Schedule, and by drawing, wherever necessary or desirable, for its vocabulary, primarily on Sanskrit and secondarily on other languages

विनय (Viney) said...

अब आप ही बताएं की इतनी ज्ञानवर्धक और सटीक चर्चा के लिए हम कबाड़खाने पर ना आएं तो कहां जाएं!

सत्ता का एक कान राजनीति हैं तो दूसरा जनता! आदर्श रूप में यह होना चाहिए था की जनता की ही आवाज़ राजनीति गूंजाती, मगर, गुरु लोग कह ही चुके हैं कि ये प्याला होंठों को आसानी से छू जाए! ये हाकिमों को मंज़ूर नहीं. जब तक हम जनप्रतिनिधित्व का बेहतर तरीका नहीं खोज लेते ये बेवकूफियां जारी रहेंगीं.

भाषा का प्रश्न, जैसा की इस पोस्ट और उस पर आई टिप्पणियों से साफ़ है, ज़्यादातर और मुद्दों की तरह सिर्फ नीतिनिर्धारकों पर नहीं छोड़ा जा सकता. क्या इसे बाज़ार पर छोड़ा जा सकता है? शायद, जब तक बाज़ार को अपनी मातृभाषा का ही उपयोग करने वालों की अंटी से प्यार है. उसके बाद?
साफ़ है भाषा को न तो लट्ठ और न ही पैसा बचा सकता है. इसका खाद-पानी समाज से ही आएगा. इसके लिए ज़रूरी है कि भाषा को खुद में से गुज़रते हुए हम उसे उसकी खूबसूरती पाने दें. जब मैं यह टिपण्णी लिख रहा हूँ तो देख सकता हूँ कि भाषा कितनी सुगमता से अपना रास्ता तय कर रही है. समाज का वो वर्ग जो कला रच रहा है, चर्चाओं में भाग ले रहा है, मौलिक चिंतन कर रहा है, सामजिक सरोकारों से वाबस्ता है, और जिसके पास मातृभाषा में ये सब करने के ठोस कारण है, उस वर्ग को निरंतर इस विषय पर सोचना होगा.

स्वाभिमान का प्रश्न तो इतना बड़ा है ही की इस इसे 'सर्वाइवल' से ढका नहीं जा सकता! और ये बात मेरे-आपके स्वाभिमान कि नहीं एक समाज के स्वाभिमान कि है. इस में यह डर कि कल हम अकेले पड़ जायेंगे या औरों से पिछड़ जायेंगे, हमें भाषा(चाहे वो कोई सी भी हो) और उससे सधने वाले कामों में अविश्वास कि ओर ले चलता है.

सदस्य-असदस्य कबाडियों (आखिर कबाड़त्व तो एक जीवन पद्धति है!) से मेरा अनुरोध है कि मातृभाषा चिंतन भविष्य में जारी रख इसे सार्वजनिक सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएं! धन्यवाद!

विनय (Viney) said...

अब आप ही बताएं की इतनी ज्ञानवर्धक और सटीक चर्चा के लिए हम कबाड़खाने पर ना आएं तो कहां जाएं!

सत्ता का एक कान राजनीति हैं तो दूसरा जनता! आदर्श रूप में यह होना चाहिए था की जनता की ही आवाज़ राजनीति गूंजाती, मगर, गुरु लोग कह ही चुके हैं कि ये प्याला होंठों को आसानी से छू जाए! ये हाकिमों को मंज़ूर नहीं. जब तक हम जनप्रतिनिधित्व का बेहतर तरीका नहीं खोज लेते ये बेवकूफियां जारी रहेंगीं.

भाषा का प्रश्न, जैसा की इस पोस्ट और उस पर आई टिप्पणियों से साफ़ है, ज़्यादातर और मुद्दों की तरह सिर्फ नीतिनिर्धारकों पर नहीं छोड़ा जा सकता. क्या इसे बाज़ार पर छोड़ा जा सकता है? शायद, जब तक बाज़ार को अपनी मातृभाषा का ही उपयोग करने वालों की अंटी से प्यार है. उसके बाद?
साफ़ है भाषा को न तो लट्ठ और न ही पैसा बचा सकता है. इसका खाद-पानी समाज से ही आएगा. इसके लिए ज़रूरी है कि भाषा को खुद में से गुज़रते हुए हम उसे उसकी खूबसूरती पाने दें. जब मैं यह टिपण्णी लिख रहा हूँ तो देख सकता हूँ कि भाषा कितनी सुगमता से अपना रास्ता तय कर रही है. समाज का वो वर्ग जो कला रच रहा है, चर्चाओं में भाग ले रहा है, मौलिक चिंतन कर रहा है, सामजिक सरोकारों से वाबस्ता है, और जिसके पास मातृभाषा में ये सब करने के ठोस कारण है, उस वर्ग को निरंतर इस विषय पर सोचना होगा.

स्वाभिमान का प्रश्न तो इतना बड़ा है ही की इस इसे 'सर्वाइवल' से ढका नहीं जा सकता! और ये बात मेरे-आपके स्वाभिमान कि नहीं एक समाज के स्वाभिमान कि है. इस में यह डर कि कल हम अकेले पड़ जायेंगे या औरों से पिछड़ जायेंगे, हमें भाषा(चाहे वो कोई सी भी हो) और उससे सधने वाले कामों में अविश्वास कि ओर ले चलता है.

सदस्य-असदस्य कबाडियों (आखिर कबाड़त्व तो एक जीवन पद्धति है!) से मेरा अनुरोध है कि मातृभाषा चिंतन भविष्य में जारी रख इसे सार्वजनिक सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएं! धन्यवाद!

Syed Ali Hamid said...

Pankaj ji,

Aapki is post ke sandarbh mein maine apni ek Hindi kavita aaj, 23 April ko' apne blog par post ki hai. Kripya zaroor padhein.

TheQuark said...

बेहतरीन और बहुत उम्दा | यह लेख पड़ना जब मैं चालू किया तो लगा की फिर से वही घिसी पीती बात की जायेगी अँगरेज़ राज और अंग्रेजी की पर आपका तर्क जायज़ है "जिन्हें अंग्रेजी पढ़ना हो पढ़ें, पर जिन्हें अंग्रेजी न आती हो, उन्हें खामियाजा न भुगतना पड़े" | स्विट्जरलैंड में कुछ महीनों से रहते हुए मैंने देखा है की अपनी भाषा पे यहाँ लोगों को कितना गर्व है और सिर्फ कहने की बात नहीं है या फिर हठधर्मिता की बात भी नहीं है पर आम दिनचर्या के हर पहलू में लाने की बात है | मसलन यहाँ किसी भी पुस्तकालय या पाठशाला में जाता हूँ तो ज्यादातर किताबें जो मूलतः जर्मन में नहीं लिखी गयी उनका जर्मन संस्करण आसानी से उपलब्ध होता है |

मैं मानता हूँ की कोई भी भाषा स्थिर रह कर जीवंत नहीं रह सकती | दुनिया की नयी घटनाओं, आविष्कारों और बदलाव के साथ उसकी शब्दावली, व्याकरण और बोलचाल के उपयोग में ही बदलाव आना चाहिए | अब इन्टरनेट और कंप्यूटर जगत को ही ले लीजिये, इन्टरनेट को विश्व में जन्मे तो बहुत साल हो गए और भारत में भी आये हुए कम समय नहीं हुआ पर देवनागरी लिपि में टाइप करने के लिए मुझे गूगल की वेबसाइट का प्रयोग करना पड़ रहा है | तमाम ब्राउजर जैसे फायरफॉक्स अथवा इन्टरनेट एक्स्प्लोरर पे देवनागरी प्रदर्शन कितने सालों बाद आया है (हालांकि तमाम भारतीय संस्थानों पे शोध चल रहा है) |

इन्ही विचारों के कारण में समझता हूँ की कबाड़खाना खुद कितनी बड़ी उपलब्धि है जिसके कारण में हिंदी में लिख पढ़ पा रहा हूँ | आशा करता हूँ की यह प्रयास सिर्फ कबाड़खाने के कबाडियों और ब्लॉग जगत के निवासियों तक सीमित न रहे | फिल्म चुपके चुपके तो देखि हो होगी सब लोगों ने उसमे श्री डेविड जिन्होंने ने हरिपत भैय्या का किरदार निभाया था उनका एक संवाद याद आ गया (वे तब बोलते हैं जब धर्मेन्द्र का किरदार उनको बतलाता है की हिंदी भाषा का मज़ाक उड़ते हुए अच्छा नहीं लग रहा )

"तुम तो एक आदमी का मज़ाक उढा रहे हो | भाषा तो अपने आप में इतनी महान है की उसका मज़ाक नहीं उढाया जा सकता"