Wednesday, May 12, 2010

जो न आई हंसी तो उसका नाम बॉम्बर वेल्स नहीं


बहुत समय नहीं हुआ जब क्रिकेट अपने महान खिलाड़ियों के अलावा कुछ ऐसे नामों के कारण भी बहुत लोकप्रिय था जो अपने जीते जी दूसरे कारणों से गाथाओं में बदल जाया करते थे। ऐसे ही एक खिलाड़ी थे ब्रायन डगलस वेल्स। इंग्लैंड की ग्लोस्टरशायर और नटिंघमशायर काउंटी की ओर से खेलने वाले वेल्स को उनके डीलडौल के कारण बॉम्बर वेल्स भी कहा जाता था।

उन्होंने कभी क्रिकेट को पेशे के तौर पर नहीं लिया। वे उसका लुत्फ उठाए जाने के हामी थे। वरिष्ठ क्रिकेट आलोचक माइकल पार्किन्सन के शब्दों में, 'उनके चेहरे पर हमेशा वसंत खिला होता था और आत्मा के भीतर ठहाका।' वे ऑफ ब्रेक गेंदबाजी करते थे और खासे सफल भी रहे। 1951 से 1965 के दौरान उन्होंने तीन सौ से ऊपर फर्स्ट क्लास मैच खेले और 998 विकेट लिए।

ग्लोस्टर में ब्लैकलिस्ट किए गए ट्रेड यूनियन लीडर के घर पैदा हुए इस खिलाड़ी को उनकी गेंदबाजी ने उतनी ख्याति नहीं दिलाई जितनी घटिया बल्लेबाजी और फील्डिंग ने। विकेट के बीच दौड़ने के दौरान उनसे संबंधित कहानियों की कोई गिनती नहीं है।

ग्लोस्टर काउंटी की ऑफिशल वेबसाइट पर उनके बारे में स्टीफन चॉक लिखते हैं, 'बल्लेबाज के तौर पर उन्हें केवल एक शॉट खेलना आता था। वे हर गेंद को घास काटने वाली शैली से मिडविकेट के ऊपर मारने की कोशिश करते थे। कभी उनका बल्ला सही लग जाता था, जो छक्का ही पड़ता था।' 423 पारियों में करीब ढाई हजार रन बना चुके बॉम्बर के तीस फीसदी से ज्यादा रन छक्कों से आए थे।

फील्ड में वे अक्सर बाउंड्री पर खड़ा रहना पसंद करते थे और दर्शकों से बातचीत का लुत्फ उठाते थे। एक बार किसी दर्शक ने उन्हें फील्ड करते समय चाय का प्याला थमा दिया। तभी बल्लेबाज ने गेंद उन्हीं की दिशा में उठाकर मारी। एक हाथ से चाय का प्याला संभालने की और दूसरे से कैच पकड़ने की कोशिश में संजीदगी से मुब्तिला बॉम्बर वेल्स की कहानियां आज भी चाव से सुनाई जाती हैं।

उनसे संबंधित सबसे मशहूर किस्सा अंपायर डिकी बर्ड ने 'फ्रॉम द पविलियन एन्ड' नामक किताब में लिखा है। वे बताते हैं कि बॉम्बर वेल्स ग्यारहवें नंबर पर बैटिंग करने आते थे क्योंकि उसके नीचे कोई जगह नहीं होती। डेनिस कॉम्पटन ने वेल्स की रनिंग बिटवीन द विकेट्स का कुछ इस तरह वर्णन किया था, 'जब वह यस कहते तो समझिए वह आगामी बातचीत की भूमिका भर बांध रहे हैं।' यह बात दीगर है कि स्वयं कॉम्पटन भी बदनाम रनर थे और उनके बारे में कहा जाता था कि 'यस' कहने के बाद सामने वाले खिलाड़ी से 'ऑल द बेस्ट' कहना नहीं भूलते थे।

एक बार यही दोनों विकेट पर थे। दोनों घायल हो गए। दोनों ने रनर मंगा लिए। स्ट्राइक बॉम्बर के पास था और शॉट मारने के बाद वे रनर को भूल गए। यही बात कॉम्पटन के साथ हुई। जाहिर है दोनों रनर्स भी दौड़ रहे थे। पहला रन जैसे-तैसे बन गया तो दूसरे की पुकार लगी।

'यस' 'नो' की चीख पुकार के बीच जब अंतत: पिच पर पागलपन समाप्त हुआ, चारों खिलाड़ी एक ही एन्ड पर थे। सारा दर्शक समूह हंसी से दोहरा हो गया था और यही हाल फील्डर्स का भी था। ऐसे में एक युवा फील्डर ने दूसरे एन्ड पर विकेट उखाड़ दिए। एलेक स्केल्डिंग मैच में अंपायरिंग कर रहे थे। वे चारों के पास पहुंचे और बोले, 'तुम कम्बख्तों में से एक आउट है, कौन आउट है मुझे पता नहीं। खुद ही फैसला कर लो और जाकर अभागे स्कोरर्स को बता आओ!'

4 comments:

VICHAAR SHOONYA said...

maja aya.

Rohit Singh said...

सुबह सुबह पढ़कर हंसी का योग करने की जरुरत ही नहीं पढ़ी...हंसाने का ठेका ले लें.....रोज ऐसी जानकारियां दिया करें...

G Maurya said...

is post ka lekhak vastav me kaun hai kyunki yahi post hu-ba-hu main indiatimes ki website par kafi pehle hindi me hi padh chuka hoon aur uska title bhi yahi tha.

Ashok Pande said...

घनश्याम जी लेख मेरा है. मैंने नवभारत टाइम्स के खेल पन्ने के लिए कोई साल भर एक साप्ताहिक कॉलम लिखा था. यह उसी कड़ी का एक हिस्सा है.