Wednesday, April 20, 2011

ठीक उस जगह बैठा था एक पाषाण मानव !



मिस्टिक कविता ने मध्य कालीन भारत मे एक जन आन्दोलन का रूप ले लिया था . फिर वह धीरे धीरे फेशन बन कर रह गई. . रीति काल मे मिस्टिसिज़म की आड़ मे बहुत सारा प्रच्छन्न / छद्म मिस्टिक साहित्य सामने आया. असल रहस्यवाद गुमनामी के अँधेरे में खो गया. लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि रूहानी कविता की एक अविच्छिन्न अनतर्धारा इस पृथ्वी पर योजना बद्ध तरीक़े से ज़िन्दा रक्खी जा रही है और गत वर्ष हिन्दी कथा जगत को चौंकाने वाली रहस्य कन्या स्नोवा बॉर्नो उसी मास्टर प्लान का हिस्सा थीं. पुरानी मनाली के एक घुमक्कड़ लेखक से मिली स्नोवा की कुछ कविताएं मैंने अपने ब्लॉग पर कुछ दिन पूर्व लगाई थी. कुछ अन्य यहाँ पर आप लोगों की राय जानने के लिए लगा रहा हूँ. साथ लगी पेंटिंग कुल्लू की कवि कथाकार ईशिता आर गिरीश ने बनाई है।

दुई मुई

जहां हो
वहां महसूस करते हो मुझे
बिना आहट
बिना करवट
बिना हसरत

अगर जान गए
कि बहुत क़रीब हूं तुम्हारे
तो कैसे टिक सकोगे अपने पास
और कैसे मैं आ सकूंगी तुम्हारे द्वार...
तुम्हारे बा-वजूद

ताबीर

उस अजनबी मुसाफि़र को
क्यों पुकारा मैंने मन नही मन
दरख़्तों की ओट से देखा
वो ठिठका उस पगडण्डी पर
मुड़कर देखना चाहा उसने मुझे...
फिर वहीं बैठ गया

आज बरसों बाद
वहां से गुज़री तो
ठीक उस जगह बैठा हुआ देखा
एक पाषाण-मानव!
मेरी घुटी हुई चीख निकली
जब देखा
उसकी आंखों पर मेरी आंखें लगी थीं
और मेरा एक आंसू उसके गाल पर
पथराया हुआ चिपका था

अवतार

उस घड़ी न मन थे
न वसन
न तुम न हम
अवतरण कितना असमय होता है!
रचयिता कैसे निराकार कर देता है
हर क्षण को...
स्वयं साकार हो जाने के लिए!

कामना
तुम्हारी आवाज़ पर मुड़ कर देखा
कोई नहीं था
काफ़ीहाउस पहुंची और
आखिरी मेज़ पर तुम अकेले थे
आइए
तुमने मन ही मन कहा
और उठ कर चले गए

मैं तुम्हारी आवाज़ पहचानने लगी हूं

प्रेम

उसने मेरा हाथ पकड़ा
और होंठों से लगा लिया
उस दिन से भोजन के वक़्त
चम्मच लेना भूल जाती हूं
उसका हाथ दिन में कई बार
होंठों तक आता-जाता है
उसके होंठ रस बन कर
लहू तक पहुंचते हैं
मेरी रूह फलती है

9 comments:

बाबुषा said...

ये कुछ पहुंची हुयी मालूम पड़ती हैं ..!

Pratibha Katiyar said...

मेरी रूह फलती है...

अजेय said...

# बाबुषा , पहुँच कर वापिस लौटी है.

बाबुषा said...

@ अजेय जी ,लिख पा रही हैं इसका मतलब ही है पहुँच के लौटी हैं ! पहुंची ही रहतीं तो लिख न पातीं?

पर भला क्यों लौटीं ? क्यों न डूब गयीं ? क्यों न ठहर गयीं वहीं ? वही जाने , उनकी यायावरी है !
ये - मेरे हिसाब से सही 'वाद ' नहीं है ! 'रहस्य ' को 'वाद' के घेरे में नहीं लिया जा सकता ! लिख दिया गया , रोशनी डाल दी ,तो फिर काहे का रहस्य ? इसे जिसने भी जिया -वो लिख नहीं पाया ! रिन्झाई? डायोजनीज ? लाओत्से ? राबिया -अल -अदबिया ? लिखा जाना मुश्किल है पहुँचने के बाद ! या तो अँधेरा है या उजाला ! बीच की कोई गुंजाइश तो है नहीं 'रहस्य' में ! पता नहीं 'वाद' क्यूँ पैदा हुआ ? हुआ होगा ! क्या करना ? कौन कैसे घूम रहा है, कौन जानता है ?

अजेय said...

# बाबुषा जी, आप ने खुद ही उत्तर दे दिया है.फिर भी खुलासा करने का प्रयास करता हूँ . क़ायदे से( सिद्धांततः ) पहुँचने के बाद लौटना नहीं होना चाहिए, लेकिन हमेशा लौटना हुआ है. पहुँचने को जिस ने भी प्रमाणित किया है, और जायज़ भी ठहराया है; लौट कर ही तो.......और विडम्बना यह कि जिस ने भी लौट कर, जैसे ही एक शब्द भी कहा, 'वाद' शुरू हो गया. यद्यपि घुमा फिरा कर सबने यही कहा कि आगे कोई 'वाद' नही होगा. लेकिन आगे (आने) वाले कभी नही माने. उन्हो ने वाद बना ही डाला. पता नही स्नोवा खुद क्या मानती रही होगी(है) मैं तो इन मास्टर प्लानर्ज़ की मंशा भी एक वाद बना डालने की मानता हूँ. 'वाद' क्यों पैदा होता है, मेरी समझ मे उस के पीछे स्थूल भौतिक कारण होते हैं.क्यों कि किसी न किसी वाद के सहारे जीना आदमी के लिए कंफर्टेबल रहता है. लेकिन पहुँचने की प्यास क्यों पैदा होती है वह एक सूक्ष्म और गूढ़ (अमूर्त) पहेली है.
मेरे मोटे दिमाग मे रहस्यवाद की यही समझ बनती है कि *पहुँचना , और लौट कर यह बता नही पाना कि वहाँ क्या था ? फिर भी कोशिश करना ...* ठहरना तो वक़्फा लेने जैसा है. मूलतः गति ही जीवन स्वभाव है. नहीं ?

बाबुषा said...

अजेय जी !
ठीक बात है 'गति ' के सम्बन्ध में .
पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर 'अन्सुलझापना' ठीक सा लगता है . जितना डूबो, उतनी अनिश्चितता ..उतनी असुरक्षा....उतनी मस्ती..और उतनी ही परिभाषाओं के पार !
और कहीं पढ़ा था कि पहुँचने के बाद भी कोई थम जाने वाली बात नहीं है ! वहाँ की भी अपनी यात्रा है . अनंत है वो राह ! पता नहीं ..कहते हैं तो होगी शायद !
मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं 'रहस्य' के लिए ..! शायद ऐसा होता होगा ..शायद वैसा होता होगा ..क्या पता कैसा होता होगा !

आभार .

अजेय said...

सही कहा. थम जाने की बात ही नही है. और आगे, और आगे. क्या पता कैसा होगा ? यह अनसुलझापन , यह विस्मय ही तमाम *ठहरे हुएपन* तो डिस्टर्ब करती, ध्वस्त करती *ज़िन्दगी* के पास ले जाती है. !

अजेय said...

तो = को

अजेय said...

तो = को