Thursday, June 27, 2013

मेरा है भैंस की खाल का मरा दिन

केदारनाथ अग्रवाल की यह दो कविताएँ कई दिनों से लगातार जेहन में गूँज रही हैं.


और का और मेरा दिन

दिन है
    किसी और का 
    सोना का हिरन, 
मेरा है
 
भैंस की खाल का
 
मरा दिन.
 
यही कहता है
 
    वृद्ध रामदहिन 
    यही कहती है 
उसकी धरैतिन
, 
जब से
 
    चल बसा 
    उनका लाड़ला.

मजदूर का जन्म

एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !
हाथी सा बलवान
,
जहाजी हाथों वालाऔर हुआ !
सूरज-सा इंसान,
तरेरी आँखोंवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!
माता रही विचारः
अँधेरा हरनेवाला और हुआ !
दादा रहे निहारः
सबेरा करनेवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !
जनता रही पुकारः
सलामत लानेवाला और हुआ !
सुन ले री सरकार!
कयामत ढानेवाला और हुआ !!

एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !

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