Tuesday, March 31, 2009

मायावती से भयभीत कौन?

इन दिनों जारी राजनीतिक गहमा-गहमी के बीच तमाम लोग एक अजब समस्या से जूझ रहे हैं। उन्हें डर है कि अगली लोकसभा के त्रिशंकु होने पर कहीं जोड़-तोड़ करके मायावती प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ना पहुंच जाएं। ऐसा सोचने वालों में सिर्फ राजनीतिज्ञ नहीं, बुद्धिजीवी, पत्रकार और जनता का एक मुखर भी हिस्सा है। हाल ये है कि एक सर्वे के जरिये ये भी बता दिया गया है कि देश की 74 फीसदी से ज्यादा लोगों को मायावती का प्रधानमंत्री बनना पसंद नहीं। उन्हें लगता है कि इससे देश की प्रतिष्ठा घटेगी। ये अलग बात है कि हिंदुस्तान अमेरिका नहीं कि 622 लोगों के बीच हुए ऐसे सर्वेक्षणों के जरिये जमीनी हकीकत का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जा सके। बहरहाल चिंता में दुबले हो रहे इन लोगों की समस्या के निदान के लिए जरूरी है कि मायावती के गुनाह और खतरे को समझा जाए।
मायावती को लेकर पहली चिंता ये है कि वे ऐसी दलित नेता हैं जो सामाजिक ताना-बाना को छिन्न-भिन्न करना चाहती हैं। लेकिन ये सब पुरानी बाते हैं। मायावती ने यूपी की सत्ता पर पहुंचते ही सर्वसमाज का नारा दिया था। और अगर डीएस-4 या बीएसपी के शुरूआती दौर में वर्णव्यवस्था को खत्म करने के इरादे रहें भी हों, तो मायावती इससे बहुत दूर निकल आई हैं। डा.अंबेडकर के ब्राह्मणवाद विरोधी अभियान से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम या नारा आज बीएसपी के एजेंडे में नहीं है। यही नहीं, दलितों को बौद्ध बनाने के अभियान को भुलाकर अब वे गणेश वंदना में व्यस्त हैं। “हाथी नहीं, गणेश है- ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” का नारा ही अब उस बीएसपी की पहचान है जो जातिव्यवस्था को तोड़कर नहीं, जातियों को जोड़कर वोटों का हिसाब करती है। बीएसपी के हर नेता के लिए एक ही फरमान है कि वो अपनी जाति को बीएसपी के पीछे गोलबंद करे। उसकी यही सफलता बीएसपी में उसके करियर ग्राफ को तय करता है। यानी, उन लोगों को डरने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है जो इस सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं।
मायावती पर दूसरा आरोप भ्रष्टाचार का है। कहा जाता है कि उन्होंने राजनीति के जरिये जमकर कमाई की है। पर इस आरोप से देश का कौन सा नेता या पार्टी बची है। क्या स्विस बैंक में रखे भारतीयों के 1456 अरब रुपयों में मायावती के उदय से पहले के राजनीतिज्ञों का योगदान नहीं है। छोटी पार्टियों को छोड़िये, क्या कांग्रेस या बीजेपी जैसी पार्टियां भी दावा कर सकती हैं कि वे जनता से चंदा मांगकर सारा खर्चा चलाती हैं। उनकी गाड़ियां और हैलीकाप्टर उसी के दम पर उड़ते हैं। आखिर उनके नेताओं की आलीशान जीवनशैली का राज क्या है? बीएसपी तो खेल के उन्हीं नियमों का पालन कर रही है जो इन पार्टियों ने तय किए हैं। आजादी के तुरंत बाद सामने आए जीप खरीद कांड से लेकर बोफोर्स और तहलका तक जो भी खेल हुए उसमें मायावती या बीएसपी का कोई योगदान नहीं रहा। वैसे, आयकर विभाग की ओर से 2007-2008 के लिए जारी शीर्ष आयकरदाताओं की लिस्ट में मायावती पहले 20 में और राजनेताओं में पहले नंबर पर हैं। 200 लोगों की इस लिस्ट में बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ तो छोड़िए, दुनिया के चुनिंदा अमीरों में शुमार किए जाने वाले मुकेश अंबानी या उनके भाई अनिल अंबानी भी नहीं थे।
तीसरा आरोप ये है कि मायावती अविश्वसनीय हैं। कब,कैसे,कहां, किससे गठबंधन कर लें कोई नहीं जानता। यही वजह है कि प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित न करने पर तीसरे मोर्चे को भी घास नहीं डाली। तो चलिए उस पार्टी को खोजिए जो विश्वसनीय हो। जो बता सके कि वो चुनाव बाद किन लोगों से हर हाल में दूर रहेगी, चाहे सत्ता मिले या ना मिले। जाहिर है, इस कसौटी पर कोई खरा नहीं उतरेगा। फिर चाहे चरण सिंह और चंद्रेशखर को तुरत-फुरत औकात बताने वाली कांग्रेस हो या मंडल से खीझकर वीपी सिंह से पीछा छुड़ाने के लिए मंदिर दांव खेलने वाली बीजेपी। वैसे, इन पार्टियों ने अतीत में मयावती से समर्थन लेने में कभी परहेज नहीं किया। उधर, आजकल बीएसपी के दुश्मन नंबर एक बने मुलायम सिंह ने तो राजनीति की दूसरी पारी ही बीएसपी के बल पर शुरू की थी। साथ मिलकर चुनाव लड़ा। सरकार बनाई, पर संबंध बिगड़े तो उनके गुर्गे मायावती की जान लेने पर उतारू हो गए। गेस्ट हाउस कांड को कौन भुला सकता है।
एक और गंभीर चिंता ये है कि मायावती प्रधानमंत्री बन गईं तो देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी। ये बड़ी दूर की कौड़ी लगती है। मायावती डा.अंबेडर की मूर्तियां लगाने का अभियान जरूर चला रही हैं लेकिन उनके विचारों के अनुरूप राजकीय समाजवाद या तानाशाही विहीन साम्यवाद की वे कतई प्रशंसक नहीं लगतीं। न उन्हें पूंजीपतियों से कोई तकलीफ है और न ही पूंजीवाद से। ये संयोग नहीं कि ‘जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है’ का नारा देने वाली बीएसपी अब उसे याद भी नहीं करना चाहती। वे उदारवाद या बाजारवादी अर्थव्यवस्था की वैसी ही समर्थक हैं जैसा मनमोहन, आडवाणी या कोई और। वैसे भी इसी व्यवस्था को थोड़े किंतु, परंतु के साथ समर्थन देकर अगर साढ़े चार साल तक वामपंथी सरकार चला सकते हैं तो फिर मायावती से भला क्या खतरा हो सकता है।
कुछ लोगों की ये भी शिकायत है कि मायावती लोगों से काफी दूरी बनाकर रखती हैं। यहां तक कि पत्रकारों को भी जल्दी समय नहीं देतीं। पर देश के जितने बड़े नेता हैं उन सबके साथ कमोबेश ऐसा ही है। सभी के इर्दगिर्द एक कोटरी है जिसकी कृपा से ही आप उन तक पहुंच सकते हैं। याद कीजिए, कुछ दिन पहले दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी के घर के बाहर हुआ तमाम पत्रकारों का हंगामा। वजह ये थी कि आडवाणी ने घरेलू समारोह में चुनिंदा पत्रकारों को ही न्यौता था। हो सकता है कि मायावती इस मामले में दूसरों से बीस हों, पर क्या इसी वजह से वे प्रधानमंत्री पद के अयोग्य हो जाती हैं?
अब थोड़ा उन बातों पर भी विचार कर लिया जाए जिसके लिए मायावती की तारीफ की जा सकती है। वे अकेली नेता हैं जिनकी वजह से करोड़ों दलितों में लोकतंत्र पर विश्वास जगा है। जो न कभी मायावती से मिले, न उन्हें देखा, फिर भी इस नाम पर वे आंख मूंद कर विश्वास करते हैं। उन्हें यकीन हुआ है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के हाथ में सत्ता की लगाम आ सकती है। दलित शीर्ष पर पहुंच सकता है। सदियों से सताए गए दलितों के अंदर ऐसा विश्वास भरना वाकई ऐतिहासिक काम है। फिर मायावती प्रधानमंत्री तभी बनेंगी जब सांसदों का गणित उनके पक्ष में हो। तराजू उनके पक्ष में भी वैसे ही झुक सकता है जैसे देवगौड़ा या गुजराल के पक्ष में झुका था। फिर, मायावती से डरने का मतलब क्या है। क्या इस वजह से कि उनकी शक्ल-सूरत ऐसी नहीं है जो किस्से-कहानी के राजा-रानियों की होती है। ये सही है कि टी.वी.पर उनके चेहरे में वैसा रक्ताभ सम्मोहन नहीं दिखता जैसा गांधियों या आडवाणियों में है, पर ओबामा पर बलिहारी जाने वालों को इससे तकलीफ क्यों नहीं होनी चाहिए। मायावती उसी रूप रंग की हैं जो इस देश के नब्बे फीसदी लोगों को मिला है। और इसके लिए वे बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं हैं। कुरूप समझे जाने वाले मलिक मोहम्मद जायसी बहुत पहले लिख गए हैं.-“मोपे हंस्यो या हंस्यो कुम्हारा” (मुझ पे हंस रहे हो या कुम्हार पर जिसने मुझे रचा है यानी भगवान)।
तो क्या मायावती प्रधानमंत्री पद के सर्वाधिक योग्य हैं। कतई नहीं। वे उतनी ही योग्य या अयोग्य हैं जितना कोई गांधी, आडवाणी, वाजपेयी या यादव है। न कम न ज्यादा। मायावती समेत सभी इस व्यवस्था को बनाए रखने के हामी हैं। इसलिए मायावती को वही खारिज करे जो इस व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था का सपना देखता हो। जिसके पास कोई बड़ी लकीर खींचने का खाका हो। वरना माना जाएगा कि ‘मायावती विरोध’ दिमाग में जड़ जमाए बैठे ब्राह्मणवाद (ब्राह्मण नहीं) की खीज भरी चीख से ज्यादा कुछ नहीं है।

किस कदर सख़्त है रफ़्तारे-ज़माना कुछ सोच



हाल ही में कबाड़ी बने योगेश्वर सुयाल का लिखा यह परिचय और उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई यह सामग्री दुर्लभ और ऐतिहासिक है. अभी कुछ दिन पहले मुनीश भाई ने कुछ पुरानी अंग्रेज़ी कविताएं यहां लगाने का अनुरोध किया था. इत्तेफ़ाक देखिये यह सब कल ही मुझ तक पहुंच भी गया. हर लिहाज़ से यह पोस्ट भाई योगेश्वर की है.

कविता ढाई सौ साल पुरानी। तर्जुमा 1959 का। मूल कवि हैं विलियम कूपर। अनुवादक - रोलैंड लॉरेंस।

परिचय बस इतना कि लॉरेंस साब कभी मुरादाबाद की नाक रहे पारकर कालेज में करीब चालीस साल गणित पढ़ाने के बाद अब उसी के धोरे जॉर्डन बॉयज़्‌ होम कैंपस में अपनी पत्नी शीला वाजयेपी के साथ रहते हैं।

हमें भी यह कालेज छोड़ने के बाद ही पता चला कि लॉरेंस साब कविताएं भी लिखते हैं, वो भी उर्दू में। अभी पिछले दिनों मुरादाबाद जाना हुआ तो मुद्दत बाद उनके दर्शन हुए और लगे हाथ हम उनकी कुछ कविताएं देवनागरी में उतरवा लाए। सुनाई उन्हीं ने थी।


यह अंग्रेज कवि विलियम कूपर की एक कविता का भावानुवाद है। कवि को अपनी कज़न से प्रेम हो गया था मगर विवाह की इजाजत नहीं मिली। तब कवि ने उसे भावपूर्ण पत्र लिखे थे। ये उन्हीं का अनुवाद है। यह उनकी पुस्तक 'गाहे-गाहे' में संकलित है, जिसे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

देवनागरी में पहली बार इनका लिप्यंतरण पेश है.


तजदीदे-वफ़ा
(रिवाइवल ऑव फ़ेथ)

किस कदर सख़्त है रफ़्तारे-ज़माना कुछ सोच
इसके धारे पे मुसर्रत का गुजर भी तो नहीं
गमो-अन्दोह के तारीक घने सायों में
कहीं हम प्यार की घड़ियों को न जाया कर दें

अपनी सीमाबिए-फितरत से कनारा कर ले
चंद लम्हे हैं यही प्यार भरे अपने रफीक
इनको ठुकरा के हमें चैन न मिल पाएगा
दामने-गम का कोई चाक न सिल पाएगा

तेरी आंखें कि जिन्हें प्यार किया है हमने
जिन पे ठहरी हैं निगाहें मेरी अक्सर जाकर
मेरी जुर्रत पे न रूठेंगी यकीं है मुझको
उनके आंचल में कोई गम नहीं लहराएगा

मेरी बेबाकियां मालूम हैं मुझको ऐ दोस्त!
तुमको नफरत पे न मजबूर करेंगी हरगिज
आज भी तेरे करम पर है भरोसा मुझको
आज फिर तेरी इनायत का तलबगार हूं मैं

आ शबो-रोज को रंगीन बना लें कुछ देर
सारी बेकैफिए-अय्याम मिटा लें कुछ देर
तुझसे दूरी में तबाही के सिवा कुछ भी नहीं
एक शिकायत की सियाही के सिवा कुछ भी नहीं

जबकि आलाम-ओ-मसाइब है मुकद्दर अपना
दामने-ज़ब्त को हम हाथ से क्यूं जाने दें
वक्त ने हमको संभलने की इजाजत दी है
क्यूं गुजर जाएं जमाने से कनारा कर के।


विलियम कूपर (१७३१-१८००) अठारहवीं सदी के बड़े अंग्रेज़ कवि माने जाते थे. उनकी कविताएं साधारण जन के रोज़मर्रा दुख सुख के अनन्य दस्तावेज़ों में शुमार की जाती हैं. अंग्रेज़ी में मूल कविता इस तरह है.

Revival of Faith

Think, Delia, with what cruel haste
Our fleeting pleasures move,
Nor heedless thus in sorrow waste
The moments due to love.

Be wise, my fair and gently treat
These few that are our friends;
Think thus abus'd what sad regret
Their speedy flight attends!

Sure in those eyes I lov'd so well,
And wis'd so long to see,
Anger I thought could never dwell
Or anger aim'd at me.

No bold offence of mine I knew
Should e'er provoke your hate;
And, early taught to think you true,
Still hop'd a gentler fate.

With kindness bless the present hour;
Or oh! we meet in vain!
What can we do in absence more
Than suffer and complain?

Fated to ills beyond redress,
We must endure our woe;
The days allow'd us to possess,
'Tis madness to forego.

लॉरेन्स साहब द्वारा अनूदित कूपर की एक और कविता अगली पोस्ट में देखिये.

(सबसे ऊपर का चित्र: ब्रिटिश पेन्टर जॉर्ज फ़्रेडरिक वॉट्स (१८१७-१९१७) की कलाकृति 'होप')

Sunday, March 29, 2009

जीवन कितना भी बड़ा हो बायोडाटा छोटे ही अच्छे माने जाते हैं

शिम्बोर्स्का की कविताओं की सीरीज़ में फ़िलहाल में यह आख़िरी कविता लगा रहा हूं. दोबारा किसी उचित मौके पर उन पर एकाध और सीरीज़ यहां लगाने का विचार मन में पक्का किया हुआ है.



बायोडाटा लिखना

क्या किया जाना है?
आवेदनपत्र भरो
और नत्थी करो बायोडाटा

जीवन कितना भी बड़ा हो
बायोडाटा छोटे ही अच्छे माने जाते हैं.

स्पष्ट, बढ़िया, चुनिन्दा तथ्यों को लिखने का रिवाज़ है
लैंडस्केपों की जगह ले लेते हैं पते
लड़खड़ाती स्मृति ने रास्ता बनाना होता है ठोस तारीख़ों के लिए.

अपने सारे प्रेमों में से सिर्फ़ विवाह का ज़िक्र करो
और अपने बच्चों में से सिर्फ़ उनका जो पैदा हुए

तुम्हें कौन जानता है
यह अधिक महत्वपूर्ण है बजाए इस के कि तुम किसे जानते हो.
यात्राएं बस वे जो विदेशों में की गई हों
सदस्यताएं कौन सी, मगर किसलिए - यह नहीं
प्राप्त सम्मानों की सूची, पर ये नहीं कि वे कैसे अर्जित किए गए.

लिखो, इस तरह जैसे तुमने अपने आप से कभी बातें नहीं कीं
और अपने आप को ख़ुद से रखा हाथ भर दूर.

अपने कुत्तों, बिल्लियों, चिड़ियों,
धूलभरी निशानियों, दोस्तों, और सपनों को अनदेखा करो.

क़ीमत, वह फ़ालतू है
और शीर्षक भी
अब देखा जाए भीतर है क्या
उसके जूते का साइज़
यह नहीं कि वह किस तरफ़ जा रहा है-
वह जिसे तुम मैं कह देते हो
और साथ में एक तस्वीर जिसमें दिख रहा हो कान
- उसका आकार महत्वपूर्ण है, वह नहीं जो उसे सुनाई देता है.
और सुनने को है भी क्या?
-फ़क़त
काग़ज़ चिन्दी करने वाली मशीनों की खटरपटर.

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कबाड़ख़ाने पर विस्वावा शिम्बोर्स्का से सम्बंधित सारी पोस्ट्स देखने को यहां क्लिक करें.

(फ़ोटो: 'लिटरेरी लाइफ़' पत्रिका के दफ़्तर में विस्वावा शिम्बोर्स्का, जनवरी १९६१. १९५३ से १९८१ के दरम्यान शिम्बोर्स्का ने इस पत्रिका में बतौर कविता-सम्पादक और स्तंभकार कार्य किया)

क्या शानदार संख्या है पाई

दसवीं तक गणित पढ़े हर किसी शख़्स ने कभी न कभी पाई का इस्तेमाल करते हुए वृत्तों का क्षेत्रफल इत्यादि निकालने का काम किया होगा. वही पाई आर स्क्वायर वाले फ़ॉर्मूले से. पाई यानी २२/७ एक विकट संख्या है. गणित, विज्ञान और अभियांत्रिकी के कई महत्वपूर्ण फ़ॉर्मूले इस पर आधारित हैं.

पाई को दशमलव में तब्दील करने पर गणित पढ़ाने वाले गुरुवर एक ग़ज़ब बात बताया करते थे.

π = २२/७ = ३.१४१५९२६५३५८९७९३२३८४६२६४३३.........

यह दशमलव अनन्त तक खींचा जा सकता है और इसके अंक किसी भी नियमित पैटर्न को फ़ॉलो नहीं करते.

क्या पाई कविता का विषय बनाया जा सकता है? हां, अगर शिम्बोर्स्का चाहें तो वे कुछ भी कर सकती हैं:




पाई

क्या शानदार संख्या है पाई:
तीन दशमलव एक चार एक.
आगे के सारे अंक भी शुरुआती हैं
पांच दो नौ क्योंकि कभी खत्म नहीं होना इस संख्या को
एक निगाह में नहीं समझ सकते इसे आप छः पांच तीन पांच
न गणना से आठ नौ
न कल्पना से सात नौ
न तर्कशास्त्र से तीन दो तीन आठ या तुलना से
चार छः या दुनिया की किसी भी चीज़ से
दो छः चार तीन

करीब चालीस फ़ीट के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सांप
इस से हार मान लेता है.
इसी तरह किया करते हैं गाथाओं में आने वाले सांप -
अलबत्ता वे थोड़ा ज़्यादा देर तक ठहर पाते होंगे
पाई संख्या बनाने वाले अंकों का नृत्य
पृष्ठ के कोने पर पहुंच कर भी नहीं थमता
वह मेज़ से होता, हवा से गुज़रता हुआ
दीवार पर से, एक पत्ती, चिड़िया के घोंसले और बादलों से होता
सीधा आसमान में जा पहुंचता है
तमाम अतल स्वर्गों से गुज़र कर.
ओह, कितनी छोटी होती है पुच्छलतारे की पूंछ -
किसी चूहे या सूअर की पूंछ जितनी
कितनी कमज़ोर होती है एक तारे की किरण
जो शून्य में टकराते ही मुड़ जाती है!
जबकि यहां हमारे पास हैं - दो तीन पन्द्रह तीन सौ उन्नीस
मेरा फ़ोन नम्बर
तुम्हारी कमीज़ का साइज़
साल
उन्नीस सौ तिहत्तर और छ्ठी मंज़िल
लोगों की संख्या पैंसठ सैंट
कूल्हों की नाप, दो उंगलियां
एक गीत के बोल
एक कोड जिसमें हमें मिलते हैं "तुम्हारा स्वागत ओ फ़रिश्ते"
"चिड़िया तुम कभी नहीं थीं"
और इनकी बग़ल में "देवियो और सजानो, डरने की ज़रूरत नहीं"
और साथ ही "धरती और स्वर्ग दोनों ही गुज़र जाएंगे"
लेकिन पाई नहीं गुज़रेगी.
ना जी, कोई मतलब ही नहीं होता.
वह बनाए रखती है अपने उल्लेखनीय पांच को
अपने ख़ास आठ को
जो दूर रखता है आख़िरी सात को
कोहनी मारता
जारी रखता हुआ
एक अलसाई अनन्तता को.

Saturday, March 28, 2009

लंका चल्यो राम



दिल्ली में एक परिचित के सौजन्य से मुझे एक डॉक्यूमेन्ट्री प्राप्त हुई - 'खयाल दर्पण'. विभाजन के बाद भारतीय शास्त्रीय संगीत की परम्परा को कितने बदलावों और ग़ैरज़रूरी विभाजनों से जूझना पड़ा, यही इस फ़िल्म की मुख्य थीम है. फ़िल्म आपको आज के पाकिस्तान के संगीत परिदृश्य से परिचित कराती भी चलती है.

सन २००५ में दिल्ली में रहने वाले फ़िल्म निर्माता यूसुफ़ सईद ने पाकिस्तान में कोई छः महीने बिता कर संगीत से सम्बन्ध रखने वाले तमाम लोगों, विशेषज्ञों से मुलाकातें कीं और एक ज़बरदस्त दस्तावेज़ तैयार किया.

व्यक्तिगत रूप से मुझे इस फ़िल्म में क़व्वाल बच्चे घराना से सम्बन्ध रखने वाले उस्ताद नसीरुद्दीन सामी साहब की आवाज़ और अदायगी ने इस कदर प्रभावित किया कि मैं दिन -रात उनकी एक कम्पोज़ीशन के दो-ढाई मिनट के टुकड़े को सुनता रहता हूं. कुछ जुगाड़तन्त्र बना तो आपको तुरन्त सामी साहब की वह क्लिप दिखला रहा हूं. ज़रा बोल तो सुनिये:

लंका चल्यो राम
जीत लियो रणसमर
धूम मची जग में
बाज गयो डंका


video

( नसीरुद्दीन सामी साहब के फ़ोटो और वीडियो क्लिप के लिये जनाब यूसुफ़ सईद को कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए लगा रहा हूं यह पोस्ट)

Friday, March 27, 2009

आतंकवादी देखता है

किसी तेज़ फ़िल्म की तरह चलती है यह डरा देने वाली कविता. शिम्बोर्स्का की यह कविता दुनिया भर में अपने कथ्य की वजह से बहुत बहुत मशहूर हुई.

आतंकवादी देखता है

तेरह बीस पर बम फटेगा शराबख़ाने के भीतर
अभी बजा है बस तेरह सोलह.
अभी समय है कुछ लोग भीतर जा सकते हैं
कुछ आ सकते हैं बाहर.
आतंकवादी सड़क पार कर चुका है.
वह ख़तरे से पर्याप्त दूरी पर है और
क्या नज़ारा है! - बिल्कुल फ़िल्मों जैसा
पीली जैकेट वाली एक औरत - वह भीतर जा रही है
काला चश्मा लगाए वह आदमी - वह बाहर आ रहा है
जीन्स पहने लड़के बतिया रहे हैं
तेरह सत्रह और चार सेकेंड
तकदीर वाला है वह ठिगना - स्कूटर पर बैठ कर जा रहा है
और वह लम्बा वाला - वह भीतर जा रहा है.
तेरह सत्रह और चालीस सेकेंड.
वह लड़की - वह चहलकदमी कर रही है, उसके बालों में हरा रिबन
लेकिन तभी एक बस रुकती है उसके सामने.
तेरह अठारह.
अब नहीं है वह लड़की वहां.
क्या वह इतनी बेवकूफ़ थी!
पता नहीं वह भीतर गई या नहीं.
हम देख लेंगे जब उन्हें बाहर लाया जाएगा.
तेरह उन्नीस.
फ़िलहाल कोई नहीं जा रहा भीतर.
एक और मोटा-गंजा बाहर आ रहा है अलबत्ता.
एक सेकेंड, लगता है वह कुछ ढूंढ़ रहा है जेबों में
और तेरह बीस से दस सेकेंड पहले
वह भीतर जा रहा है
अपने घटिया दस्तानों के लिए.
ठीक तेरह बीस.
उफ़ यह इन्तज़ार! कितना लम्बा!
अब.
किसी भी पल.
नहीं.
अभी नहीं.
हां, अब.
बम फटता है.

Thursday, March 26, 2009

जोशिम को पुत्रशोक

अभी अभी आए एक एस एम एस ने मुझे भीतर तक तोड़ कर रख दिया है: "Kartik passed away in delhi day before yesterday night suddenly and peacefully. Manish"

प्रिय मित्र मनीष जोशी जिन्हें ब्लॉगजगत के लोग जोशिम के नाम से जानते हैं, का छोटा बेटा कार्तिक नहीं रहा. चट्टान जैसा कलेजा रखने वाले मनीष भाई ने लम्बे समय तक असाध्य रोग से ग्रस्त कार्तिक के बारे में जितना बतलाया था, उस से स्पष्ट था कि बच्चे के पास सीमित सांसें बची हुई हैं. उनके ब्लॉग पर यदाकदा लगने वाली उनकी बेचैन कर देने वाली कविताओं से सम्भवतः बहुत कम लोग अनुमान लगा पाते होंगे कि परदेस में रह रहा उनका पूरा परिवार कितने जीवट से एक अवश्यंभावी त्रासदी का इन्तज़ार किया करता था.

लेकिन अब जब होनी हो गई है तो मेरे गले में बहुत बड़ी फांस अटक गई है. टेलीफ़ोन पर बात करने की हिम्मत नहीं हो रही उनसे.

इसी ब्लॉगजगत के माध्यम से इस कदर संजीदा और ज़िन्दादिल इन्सान से परिचय हुआ था. मुलाकातें हुई थीं. इसी के माध्यम से आप सब को सूचित करना अपना फ़र्ज़ समझता हूं.

मनीष भाई के दुख में हम सब शामिल हैं.

और क्या कहा जा सकता है

हमारी साझा सम्वेदनाएं.

उफ़, मुक्केबाज़ नहीं बल्कि कवि होना

विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविताओं में एक अद्वितीय ह्यूमर भी पाया जाता है, जो उनकी कविताओं को महान बनाता है. ठोस वास्तविक चीज़ों की सतह के बस थोड़ा सा नीचे कितनी विद्रूपताएं छिपी रहती हैं, यह पहचानना उन्हें बख़ूबी आता है. ज़रा देखें जिस कव्यकर्म में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगाया, जिसके लिए उन्हें साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान दिया गया, उसे वे कितनी फ़र्क निगाह से देख पाने की आंख रखती हैं



काव्यपाठ

या तो आप एक मुक्केबाज़ हों या हों ही नहीं उस जगह
बस. हे कला की देवी! कहां है 'हमारी' जनता?
कमरे में बारह लोग, आठ सीटें ख़ाली -
समय हो चला है इस साम्स्कृतिक कार्यक्रम को शुरू किया जाए.
आधे लोग इसलिए भीतर हैं कि बाहर बारिश चालू है
बाक़ी रिश्तेदार हैं. हे कला की देवी!

यहां मौजूद स्त्रियों को चीख़ना और उत्तेजित होना अच्छा लगता,
पर वह मुक्केबाज़ी की चीज़ है. यहां उनका व्यवहार शालीन होना चाहिये.
दान्ते* की 'इन्फ़र्नो' इन दिनों रिंग के सबसे नज़दीक है
उसकी 'पैराडाइज़' भी. हे कला की देवी!

उफ़, मुक्केबाज़ नहीं बल्कि कवि होना,
जीवन में बामशक्कत कविताई करते जाने की सज़ा पा चुकना
मांसपेशियों की कमी के कारण दुनिया को यह जतलाने पर विवश कर दिया जाना
कि हाईस्कूल के कवितापाठ्यक्रम में तकदीर की मदद से उसकी कविता जगह पा लेगी.
ओ कला की देवी!
ओ नन्ही चोटी वाले फ़रिश्ते पेगासस**!

पहली पंक्ति में, एक प्यारा सा बूढ़ा हल्के ख़र्राटे ले रहा है,
वह सपने में अपनी पत्नी को दुबारा जीवित देख रहा है. इसके अलावा
वह उसके लिए उसका पसन्दीदा केक बना रही है.
भट्टी सुलग चुकी, पर ध्यान से - उसका केक मत जला देना! -
हम काव्यपाठ शुरू कर रहे हैं, हे कला की देवी!

[*.दान्ते (१२६५-१३२१) इटली के महान कवि थे. 'इन्फ़र्नो' और 'पैराडाइज़' उनकि कालजयी रचनाओं में शुमार हैं.
**.पेगासस: यूनानी गाथाओं में कला की देवियों का वाहन, उड़ने वाला घोड़ा जो अतिकल्पनाशीलता का प्रतिनिधि माना जाता है]


(पेन्टिंग का नाम है 'पोइट्री रिसाइटल'. १९५९ में जन्मे ईराकी मूल के कलाकार सट्टा हाशिम की रचना.)

Wednesday, March 25, 2009

सारे कैमरे जा चुके दूसरे युद्धों की तरफ़

महान कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविता- सीरीज़ की दूसरी कविता प्रस्तुत है.



अन्त और आरम्भ

-विस्वावा शिम्बोर्स्का

हर युद्ध के बाद
किसी न किसी ने चीज़ों को तरतीबवार लगाना होता है.
चीज़ें आख़िर
ख़ुद को उठा तो नहीं सकतीं.

किसी न किसी ने
मलबे को किनारे लगाना होता है
ताकि लाशों से भरी गाड़ियों के लिए
रास्ता बन सके.

किसी न किसी ने गुज़रना ही होगा
गंदगी और राख़,
सोफ़ों के स्प्रिंग,
कांच के टुकड़ों
और ख़ून सने चीथड़ों से हो कर.

किसी न किसी ने लादना होंगे खंभे
दीवार खड़ी करने के वास्ते
किसी ने साफ़ करना होगा खिड़की को
और चौखट में जमाना होगा दरवाज़ों को.

न कोई ध्वनियां, न फ़ोटो खिंचाने के मौके
और यह करने में सालों लग जाने होते हैं
सारे कैमरे जा चुके
दूसरे युद्धों की तरफ़.

पुलों को दोबारा बनाया जाना है
रेलवे स्टेशनों को भी.
आस्तीनें मोड़ी जाएंगी
तार-तार हो जाने तलक.

हाथ में झाड़ू थामे एक कोई
अब भी याद करने लगता है कि यह कैसा था.
एक कोई सुनता है, हिलाता हुआ
अपनी खोपड़ी, जो फूटने से बच गई.
लेकिन आसपास कोलाहल मचा रहे लोगों को
यह सब
तनिक उबाऊ लगेगा.

समय समय पर किसी एक ने
खोद निकालना होगा एक ज़ंग-लगा तर्क
किसी झाड़ी के नीचे से
और उछाल फेंकना होगा उसे मलबे की तरफ़.

उन्होंने
जो इस को तफ़सील से जानते हैं,
रास्ता बनाना होगा उनके लिए
जिन्हें बहुत कम मालूम है.
या उससे भी कम.
और अन्ततः कुछ नहीं से भी कुछ कम.

किसी न किसी को लेटना होगा यहां
घास पर
जो ढंके हुए है
कारणों और परिणामों को
मक्के के पत्ते से छांटा गया तिनका दांतों में दबाए
किसी मूर्ख की तरह बादलों को ताकते हुए.

हिटलर का पहला फ़ोटोग्राफ़


आज से मैं अपनी प्रियतम कवियों में से एक नोबेल पुरुस्कार प्राप्त पोलिश कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का की चुनिन्दा/ पसन्दीदा कविताओं की एक सीरीज़ शुरू कर रहा हूं. आशा है आप को आनन्द आएगा.

हिटलर का पहला फ़ोटोग्राफ़

और कौन है ये बच्चा - इत्ती सी पोशाक में?
अडोल्फ़ नाम है इस नन्हे बालक का -
हिटलर दम्पत्ति का छोटा बेटा!
वकील बनेगा बड़ा होकर?
या वियेना के ऑपेरा हाउस में कोई गायक?
ये बित्ते से हाथ किसके हैं, किसके ये नन्हे कान, आंखें
और नाक?
हम नहीं जानते दूध से भरा किसका पेट है यह.
-छापाख़ाना चलाने वाले का, डाक्टर का, व्यापारी का
या किसी पादरी का?
किस तरफ़ निकल पड़ेगा यह मुन्ना?
बग़ीचे, स्कूल, दफ़्तर या किसी दुल्हन की तरफ़?
या शायद पहुंच जाएगा मेयर की बेटी के पास?
बेशकीमती फ़रिश्ता, मां की आंखों का तारा,
शहदभरी डबलरोटी सरीखा!
साल भर पहले जब वह जन्म ले रहा था
धरती और आसमान में कोई कमी नहीं थी शुभसंकेतों की -
वसन्त का सूरज, खिड़कियों पर जिरेनियम,
अहाते में ऑर्गन वादक का संगीत
गुलाबी काग़ज़ में तहा कर रखा हुआ सौभाग्य
सपने में देखा गया
कबूतर अच्छी ख़बर ले कर आता है -
अगर वह पकड़ लिया जाए तो कोई बहुप्रतीक्षित अतिथि
घर आता है,
खट्‌‍ खट्‌
कौन है
अडोल्फ़ का नन्हा हृदय दस्तक दे रहा है.
बच्चे को शान्त कराने को चीज़ें, लंगोटी, खिलौना,
हमारा तन्दुरुस्त बच्चा, भगवान का शुक्र करो, भला है
हमारा बच्चा, अपने लोगों जैसा
टोकरी में सोये बिल्ली के बच्चे सरीखा
श्श्श! रोओ मत मिठ्ठू!
अभी क्लिक करेगा कैमरा काले हुड के नीचे से -
क्लिंगर का स्टूडियो, ग्राबेनस्ट्रासे, ब्राउनेन!
छोटा मगर बढ़िया शहर है ब्राउनेन -
ईमानदार व्यापारी, मदद करने वाले पड़ोसी.
ख़मीर चढ़े आटे की महक, सलेटी साबुन की महक,

भाग्य की पदचाप पर भौंकते कुत्तों को कोई नहीं सुनता
अपना कॉलर ढीला करके
इतिहास का एक अध्यापक जम्हाई लेता है
और झुकता है होमवर्क जांचने को.

(फ़ोटो: हिटलर का पहला फ़ोटो)

Tuesday, March 24, 2009

कवि करता है और भी बहुत सारे काम

आज हमारे शीर्ष कबाड़ी उदय प्रकाश जी ने अपने ब्लॉग पर रूसी कवि आंद्रे वोज़्नेसेंस्की की एक कविता पोस्ट की है. सुबह उसे पढ़ने के बाद से मैं एक कविता को याद करने की कोशिश कर रहा था. कविता के बारे में बहुत ठोस कुछ याद नहीं आ रहा था. कागज़-पत्तर-कबाड़ इत्यादि के ढेरों को ख़ूब उलटने-पलटने के बाद वह अनुवाद मुझे हासिल हुआ. यह इत्तेफ़ाक़ है कि यह कविता भी राफ़ाल वोयात्चेक की ही है जिस पर कबाड़ख़ाने में पिछली पोस्ट लगी है.

फ़िलहाल यह रही कविता, जिसे मैं बहुत सम्मान के साथ अपने प्रिय कवि-कहानीकार-मनुष्य उदय प्रकाश जी के लिए ख़ास तौर पर पेश कर रहा हूं.


कवि के बारे में एक गीत

क्योंकि उसे हमेशा पीटा जाता है किसी बच्चे की तरह -
इस कला के बारे में कुछ न जानता हुआ कवि,
अपनी कविताओं की मुठ्ठी भींच लेता है और पीटना शुरू करता है.

वह एक स्त्री को पीटता है क्योंकि वह ख़ुद को साफ़ रखती है
अपने मुंहांसों को बढ़ने नहीं देती और मेकअप करती है.
वह अपनी पत्नी को पीटता है क्योंकि वह एक स्त्री है.

इसी वजह से वह अपनी मां को पीटता है.
वह अपने पिता को पीटता है क्योंकि वे उसकी मां के साथ हैं.
वह जल्दबाज़ उपमाओं के साथ थूकता है अधिकारियों पर.

अपने छन्दों से वह तोड़ डालता है खिड़कियां, और तनाव
की एक लात से वह गर्भ के भीतर एक भ्रूण के सिर को
घायल कर देता है, ताकि मां अपने बच्चे को
उसकी उस मूर्खता से न पहचान पाए जिसे लेकर वह पैदा होगा.

कवि करता है और भी बहुत सारे काम
मगर तब वह कवि नहीं होता.

-राफ़ाल वोयात्चेक

Monday, March 23, 2009

दुख ने मुझे भर दिया है साहस से : राफ़ाल वोयात्चेक की कुछ कविताएं और


कुच दिन पहले राफ़ाल वोयात्चेक (१९४५-१९७१) की चन्द कविताओं से आपका परिचय कराया था. उस पर आप लोगों का रेस्पॉन्स बहुत उत्साहवर्धक था. कुछ मित्रों की फ़रमाइश पर राफ़ाल की कुछ कविताएं और:

शब्दज्ञान

मेरा शब्दज्ञान इतना सीमित है! 'उम्मीद' का शब्द 'कल'
केवल तुमसे जुड़ा हुआ है
'प्रेम' नाम का शब्द मेरी जीभ को छका दिया करता है और
ख़ुद को 'भूख' शब्द के अक्षरों से नहीं बना पाता.

दुख ने मुझे भर दिया है साहस से, जाता हूं अब तुम्हारे ख़्वाबों को छोड़कर,
निराशा में मैंने अपने सपने को भींचा हुआ है अपने ही दांतों से
मुझे बतलाओ - क्या कुछ भी और करने को बचा हुआ है अब
जबकि खु़द 'मृत्यु' भी अपने कार्यों को ज़बान नहीं दे पा रही?

कितनी दराज़ें

कितनी दराज़ें हैं मृत्यु के पास! - पहली में
वह इकठ्ठा करती है मेरी कविताएं
जिनकी मदद से मैं उसकी आज्ञा का पालन करता हूं

दूसरी में तो निश्चय ही
उसने सम्हाली हुई है बालों की एक लट
तब से जब मैं पांच साल का था

तीसरी में - रात की मेरी
पहली दाग़दार चादर
और अन्तिम परीक्षा की मार्कशीट

चौथी में वह रखे है
निषेधाज्ञाएं और प्रचलित कहावतें
"गणतन्त्र के नाम पर"

पांचवीं में समीक्षाएं, विचार
जिन्हें वह उदासी के वक़्त
पढ़ा करती है

उसके पास निश्चय ही एक गुप्त दराज़ होनी चाहिये
जहां सबसे पवित्र वस्तु धरी हुई है
- मेरा जन्म प्रमाणपत्र

और सबसे नीचे वाली, जो सबसे बड़ी भी है
- उसे वह बमुश्किल खोल पाती है -
वह बिल्कुल मेरे नाप की होगी.

एक विशिष्ट स्थिति

स्पष्ट है, मेरे हाथ काटे जा चुके
मैं अपने दांएं ठूंठ पर
बंधी एक लकड़ी से लिखता हूं
मैं उस लकड़ी को डुबोता हूं भूरी स्याही में
मेरा कोई सिर नहीं
किसी ने मेरे लिंग के निशान धोकर
मेरी टांगों को छिपा दिया
हूं मैं, हां,
मैं तैर रहा एक स्नानागार में
अपने पशुओं के रक्त में.

ऑफ़ सीज़न

मैं समय पर नहीं आया
सीज़न अभी शुरू नहीं हुआ
और स्थानीय लोग कहते रहते हैं
यहां कुछ नहीं होगा

कल
मैंने देखा एक प्रोफ़ेसर को ले जाया गया
एक कूड़ेदान में - वह इतना नन्हा था -
हां सही है - यहां सिकुड़ जाया करते हैं लोग
भोजन और
ताबूत के तख़्तों के वास्ते पैसा बचाते हुए

वह प्रोफ़ेसर
वह प्रोफ़ेसर जो असल में पूरी शुरुआत था
वह घसीटता था अपनी टांगें
वह संकेत भर था अपनी नई रखैल का
एन्ड्रू नाम था उसका
हां सही है - यहां कुछ नहीं होगा

सही है, मैं समय पर नहीं आया
जो भी जीता है
जल्दी-जल्दी मर रहा है
एक कमरा अभी से स्टोर-रूम की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है
निश्चय ही, बहुत जल्दी
वे वहां से सलाख़ों को हटा देंगे

बिल्कुल सही है - अन्त आ चुका है
गलियारों में पोंछा लगाया जा रहा है
पॉलिश की जा रही है फ़र्श पर.

मैं, काफ़्का

दिल उग कर मुझ से बड़ा हो चुका
मैं जड़ बन चुका भीतर से
पूरा

मेरे होठों पर उगती हैं
सफ़ेद घासें

एक हिजड़े की
प्रशिक्षित बेटी, जूलिया,
हल चलाती है मेरी बीमारी पर.

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राफ़ाल की पिछली पोस्ट का लिंक:

मेरे सामने एक आदमी लाओ मैं उसकी महानता को पहचानूंगा

जल्द ही आपको राफ़ाल की कुछ और शानदार कविताओं से मिलवाऊंगा.

आज तेईस मार्च है - सरदार भगत सिंह सिंह की शहादत का दिन



... फांसी के बाद दिया गया गांधी का बयान पुनः जारी किया गया : "भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई. वे अमर शहीद हो गए. उनकी मृत्यु बहुत से लोगों के लिए निजी क्षति की तरह है. मैं इन युवकों की स्मृति को नमन करता हूं. परन्तु मैं देश के नवयुवकों को इस बात की चेतावनी देता हूं कि वे उनके पथ का अनुसरण न करें, हमें अपनी ऊर्जा, आत्मोत्सर्ग की भावना, अपने श्रम और अपने अदम्य साहस का इस्तेमाल उनकी भांति नहीं करना चाहिये. इस देश की स्वतंत्रता रक्तपात के जरिये नहीं प्राप्त होनी चाहिये."

... कांग्रेस अधिवेशन के तीन दिन पहले कराची में प्रेस से साक्षात्कार में उन्होंने कहा: "मैं भगत सिंह और उसके साथियों के मत्युदंड को निरस्त करवाने में असफल रहा, इसलिये युवावर्ग ने मुझे अपने क्रोध का निशाना बनाया. मैं इसके लिए तैयार भी था. वे मेरे ख़िलाफ़ बुरी तरह भड़के हुए थे, इसके बावजूद उन्होंने अपने क्रोध का प्रदर्शन काफ़ी सौजन्यपूर्ण ढंग से किया. वे मुझे शारिरिक चोट भी पहुंचा सकते थे और दूसरे तरीकों से मेरा अपमान कर सकते थे. लेकिन उन्होंने सिर्फ़ मुझे काले कपड़े में बंधे फूल देने का निश्चय किया, जो संभवतः इन तीनों देशभक्तों की अस्थियों के प्रतीक थे. वे ये फूल भी मुझ पर दूर बरसा या फेंक सकते थे, लेकिन उन्होंने इन्हें मेरे हाथ में देने का निश्चय किया, जिन्हें मैंने कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार किया. हां वे 'गांधीवाद हाय-हाय' और 'महात्मा गांधी वापस जाओ' के नारे ज़रूर लगाते रहे."

"मैं इसे उनके बहुत गहरे क्रोध की एक विनम्र अभिव्यक्ति के रूप में देख रहा था. मैं सिर्फ़ यह उम्मीद करता हूं कि वे अपने-आप पर थोड़ा नियन्त्रण रखते हुए - जैसा कि उन्होंने कल कांग्रेस की बैठक में भी किया - यह समझने की कोशिश करेंगे कि मेरा और उनका लक्ष्य एक ही है. सिर्फ़ मेरा रास्ता उनसे पूरी तरह भिन्न है. मुझे इस में ज़रा भी सन्देह नहीं है कि वक़्त के साथ उन्हें अपनी ग़लती का अहसास होगा. जो बात दूसरे देशों के लिए सत्य है, वह ज़रूरी नहीं कि हमारे देश के लिए भी सत्य हो. हमारे देश की आबादी और ग़रीबी को देखते हुए हिंसा का रास्ता पूरी तरह बेमानी है. आत्मदमन और लगभग कायरता को छूते दब्बूपन वाले इस देश में हम बहुत ज़्यादा साहस और आत्मत्याग की उम्मीद नहीं कर सकते. भगत सिंह की बहादुरी और त्याग के आगे किसी का भी सिर झुक जाएगा. लेकिन ऐसा कहते हुए मेरा अपने युवा मित्रों को भड़काने का कोई इरादा नहीं है - एक ऐसी बहादुरी जो किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाए बिना सूली पर चढ़ने को तैयार हो."

... (गांधी से) दूसरा प्रश्न था: 'क्या वे हज़ारों व्यक्तियों की हत्या करने वाली सरकार को क्षमा करना राजनीतिक दृष्टि से ठीक समझते हैं?

(गांधी ने उत्तर दिया) "मेरे सामने एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जहां क्षमादान किसी राजनीतिक उद्देश्य से जुड़ा होता है."

... ... ... ... ...

कुलदीप नैयर की किताब The Martyr Bhagat Singh: Experiments in Revolution के हिन्दी अनुवाद 'शहीद भगत सिंह : क्रान्ति के प्रयोग' (अनुवादक: आलोक श्रीवास्तव) से एक अंश.

शहीद-ए-आज़म को कबाड़ख़ाने की विनीत श्रद्धांजलि

Sunday, March 22, 2009

कितने पाकिस्तान!

जिनके पास सामान्य ज्ञान बढ़ाने का एकमात्र जरिया समाचार चैनल रह गए हैं, उनका हैरान होना लाजिमी है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि ये कैसा पाकिस्तान है। सड़कों पर लाखों की भीड़! हवा में जम्हूरियत और आजादी के तराने! स्वात में शरिया लागू होने की गरमा-गरम खबरों की बीच अचानक आजाद न्यायप्रणाली के पक्ष में ये तूफान कैसे उठ गया! बिना खड्ग-बिना ढाल, बस जुल्फें लहराकर काले कोट वालों ने ये कैसा कमाल कर दिया। सेना खामोश रही। पुलिस भी कभी-कभार ही चिंहुकी...और इफ्तेखार चौधरी चीफ जस्टिस के पद पर बहाल हो गए!
पाकिस्तान के इतिहास को देखते हुए ये वाकई चमत्कार से कम नहीं। आम भारतीयों को इस आंदोलन की कामयाबी की जरा भी उम्मीद नहीं थी। सबको लग रहा था कि लॉंग मार्च बीच में ही दम तोड़ देगा। जरदारी जब चाहेंगे आंदोलनकारियों को जेल में ठूंस देंगे। 16 मार्च को इस्लामाबाद पहुंचना नामुमकिन होगा। ये भी बताया जा रहा था कि लांग मार्च में तालिबानी घुस आए हैं। कभी भी धमाका हो सकता है। लॉंग मार्च में मानव बम वाली खबर भी अरसे तक चीखती रही। लेकिन गिद्दों की उम्मीद पूरी नहीं हुई। पाक सरकार के गुरूर ने जरूर दम तोड़ दिया। प्रधानमंत्री गिलानी को टी.वी. पर अवतरित होकर मांगे मानने का एलान करना पड़ा। साथ में सफाई भी कि पहले मांगें क्यों नहीं मानी गईं।
इस तस्वीर ने साफ कर दिया कि पड़ोसी पाकिस्तान के बारे में हमारी जानकारी कितनी अधूरी है। सरकारों और समाचार माध्यमों को जरा भी रुचि नहीं कि वे पाकिस्तान की पूरी तस्वीर जनता के सामने रखें। उनके लिए तो स्वात पूरे पाकिस्तान की हकीकत है। जहां हर आदमी कंधे पर क्लाशनिकोव उठाए निजाम-ए-मुस्तफा लागू करने के लिए जिहाद में जुटा है। जहां औरतें हमेशा बुरके में रहती हैं। गाना-बजाना बंद हो चुका है। बच्चों को आधुनिक स्कूलों में भेजना मजहब के खिलाफ मान लिया गया है और साइंस और मडर्निटी की बात करना भी गुनाह है। बताया तो ये भी जा रहा था कि तालिबान लाहौर के इतने करीब हैं कि भारतीय सीमा पर भी खतरा बढ़ गया है। वे जब चाहेंगे कराची पर कब्जा कर लेंगे और इस्लामाबाद को रौंद डालेंगे। पाकिस्तान की यही तस्वीर बेच-बेचकर गल्ले को वोट और नोट से भरा जा रहा था।
लेकिन पूरे पाकिस्तान से इस्लामाबाद की ओर बढ़ने वाले कदम तालिबान के नहीं, उस सिविल सोसायटी के थे जो पाकिस्तान की तस्वीर बदलने के लिए अरसे से तड़प रही है। इनमें मर्द, औरत, बूढ़े, जवान, यहां तक कि बच्चे भी थे। न इन्हें बंदूकों का खौफ था न ही भीड़ के बीज फिदायीन के घुसने की आशंका। काले कोट पहने नौजवान वकला की भारी भीड़ हर तरफ से उमड़ी आ रही थी। इनमें बड़ी तादाद में महिला वकील भी थीं। पुरजोश और इंकलाबी अंदाज से भरी हुई। सब झूम-झूमकर नारे लगा रहे थे और भंगड़ा डाल रहे थे। अखबार और न्यूज चैनल के पत्रकारों का जोश देखकर लग रहा था गोया कोई जंग जीतने निकले हों। ये अहिंसक आंदोलन आजादी के पहले के उस दौर की याद दिला रहा था जब लाहौर और कराची में 'करो या मरो' और 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' जैसे नारे गूंजते थे। न लाठियों का खौफ था और न गोलियों का। आज जिसे तालिबान का गढ़ कहा जाता है, उस सीमांत इलाके के पठान लाल कुर्ती पहनकर महात्मा गांधी की जय बोल रहे थे। जिन्हें हिंसक कबायली कहकर प्रचारित किया गया था उनके इस अहिंसक रूप को देखकर दुनिया दंग थी। तब वे खुदाई खिदमतगार कहलाते थे।
भारत में देश की व्यवस्था बदल देने का ऐसा जोश दशकों से देखने को नहीं मिला। 34 साल पहले इमरजेंसी के खिलाफ जनता ने अपने जौहर दिखाए थे। थोड़ी बहुत सुगबुगाहट वी.पी.सिंह ने भी पैदा की थी। लेकिन संपूर्ण क्रांति का नारा भ्रांति साबित हुआ और वी.पी.सिंह के सामाजिक न्याय का रथ जातिवादी कीच में धंसकर अपनी तेजस्विता खो बैठा। इसके बाद तो मनमोहनी अर्थशास्त्र ने ऐसा जादू चलाया कि राजनीति के हर रंग ने समर्पण कर दिया। उधर, इस जादू पर मुग्ध मध्यवर्ग देखते-देखते गले तक कर्ज में डूब गया। उसकी जिंदगी में किसी सपने के लिए जगह ही नहीं बची। इस खुमार के टूटने की शुरूआत अब हुई है जब मंदी का जिन्न दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
ऐसे में, पाकिस्तान में जनउभार देखना वाकई सुखद था। इसने फिर साबित किया कि जनज्वार के सामने बड़ी से बड़ी सत्ता बेमानी हो जाती है। टी.वी.पर इन दृश्यों को देखकर न जाने कितनी बार मुट्ठियां भिचीं और नारे लगाने का मन हुआ। पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि ये अपनी ही लड़ाई है। ये वो पाकिस्तान कतई नहीं है जिसके खिलाफ बचपन से जवानी तक घुट्टी पिलाई गई है। ये लोग जिस व्यवस्था के हक में खड़े हैं उसमें लड़कियों को पढ़ने की पूरी आजादी है, अल्पसंख्यकों और मानवाधिकार की सुरक्षा का वादा है, क्रिकेट और संगीत के लिए पूरी जगह है। फैज हैं, फराज हैं, मंटो हैं, नूरजहां हैं गुलाम अली हैं, मेहंदी हसन हैं। साइंस के इदारे है और मोहब्बत का जज्बा भी। हां गुस्सा भी है, अपने कठपुतली हाकिमों और उस अमेरिका के खिलाफ जिसने इस देश की संप्रभुता को तार-तार कर दिया है। (बची किसकी है?)
साफ है कि पाकिस्तान के हालात काफी जटिल हैं। इकहरी निगाह से हालात की हकीकत समझना नामुमकिन है। एक तरफ वहां बार-बार सत्ता पलट करने वाली सेना है तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार से देश को खोखला करने वाले राजनेता। मजहबी राज बनाने का सपना देख रहे कठमुल्लाओं की जमात है तो पाकिस्तान को आधुनिक स्वरूप देने की जद्दोजहद में जुटी सिविल सोसायटी भी। इस सबके बीच जम्हूरियत का जज्बा लगातार मजबूत हो रहा है। ये संयोग नहीं कि जनरल कियानी ने तख्ता पलट की जुर्रत न करके गिलानी और जरदारी को जनदबाव के आगे सिर झुकाने की सलाह दी। पाकिस्तान में हो रही इस नई सुबह को समझने की जरूरत है।
इसमें क्या शक कि भारत विरोधी भाव पाकिस्तान की वैसी ही सच्चाई है जैसे भारत में अंध पाकिस्तान विरोध। मुंबई में आकर मौत बरसाने वाले आतंकी पाकिस्तान की जमीन से ही आए थे। पर सवाल ये है कि पाकिस्तान में ऐसे आतंकी रक्तबीज की तरह क्यों बढ़ रहे हैं। पाकिस्तान में इनकी तादाद न बढ़े इसकी गारंटी सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान की सिविल सोसायटी कर सकती है। और मार्च 2009 में उसने जो तेवर दिखाया, उससे भरोसा जगता है कि उसके पास ऐसा करने का भरपूर माद्दा है। पाकिस्तानी न्यूज चैनलों ने जिस तरह पहले मुंबई हमले को लेकर कसाब की असलियत खोली और फिर लाहौर में श्रीलंका टीम पर हुए हमलावरों को बेनकाब किया, उसने एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज बनाने की तड़प को बार-बार साबित किया है। इसलिए जरूरत इस जज्बे को सराहने की है, सलाम करने की है। दोस्ताना हाथ बढ़ाने की है। जम्हूरियत की मजबूती ही उपमहाद्वीप को आतंकवाद से मुक्त कर सकता है।

कोमल बिरवा काव्य कला का डालो पानी गेरो खाद

सब दोस्तन को नमश्कार - पुरसकार के बाद जे खबर देनी है कि आज भौत दिनन के बाद अपनी दुकान के कबाड़ का मौका - मुआयना करते - करते कबिता - सायरी जैसा कुछ बन गया है. क्या करें इसमें गल्ती हमारी ना है यह सब बिदवानों की संगत का असर हैगा....हमारी दुकान पै तरा - तरा का माल धरा है और सुना है कि सबके गिराक हैं.इस मारे उम्मीद है कि जे माल भी पसंद आवेगा. सो अल्लम - गल्लम को छोड़ के अब सीधे अपनी आज* ही बनाई कबिता को डिस्पिले करने की इजाजत चाय रिया हूँ. कुछ गल्त -सल्त होय तो एडवानस में हमका माफी दै दो ...तो लो साब पेस है जे कबाड़ कबिता -

संवदिया आवो करें संवाद .
यह जग रैन बसेरा भैया कौन चलेगा लाद .
बे-मसरफ का होय रिया अब देखो वाद - विवाद .
चलती रहे दुकान रे भय्यन ना हो जिनिस बरबाद .
अच्छा बेलो - अच्छा खेलो छोड़ो मती मरजाद .
जग में चार दिनाँ का दाना फिर क्यों दंग -फसाद .
हम तो मू्ढ़ कुमति के मारे कर रै जे बकवाद .
कोमल बिरवा काव्य कला का डालो पानी गेरो खाद .
'सिद्ध कबाड़ी' कविता लिक्खे बहुत दिनन के बाद .
गर यह ठीकठाक -सी लागे तो राय देवो उस्ताद ।

( * यह पोस्ट कल रात ही लिखी गई थी और फोन पर 'कबाड़खाना' के मुखिया अशोक पांडे जी को सुना दी गई थी . तभी बिजली रानी का साम्राज्य ध्वस्त हो गया था . अब से कुछ देर पहले ही उनका राज पुन: कायम हुआ है सो अब हाजिर है - कबाड़ कबिता. जय लोया पिलाट्टिक )

Friday, March 20, 2009

मंगलेश जी के खिलाफ़ अभियान पर जन संस्कृति मंच के महासचिव का वक्तव्य

यह वक्तव्य अभी अभी मुझ तक मेल द्वारा पहुंचा है. वक्तव्य महत्वपूर्ण है सो बिना देरी किये मैं इसे आपके सम्मुख रख रहा हूं.

मंगलेश जी के खिलाफ़ अभियान पर जन संस्कृति मंच के महासचिव का वक्तव्य

श्री मंगलेश डबराल के खिलाफ़ जिस निम्न स्तर पर उतरकर कुछ पत्रिकाओं और ब्लागों ने कुत्सा अभियान चला रखा है, उसे देखते हु मैं ज़रूरी समझता हूं कि इस अभियान की जन संस्कृति मंच की ओर से पुरज़ोर मज़म्मत करूं। मंगलेश जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं। ऎसा नहीं है कि जो लोग यह सब लिख-लिखवा रहे हैं, वे गंभीरता से ऊब कर कुछ सनसनीखेज़ मनोरंजन करा रहे हैं। ये सहजता से डरे हुए लोग हैं। ऎसा भी नहीं है कि इन्हें मंगलेश जी के जीवन-संघर्ष और बीच बीच में उनकी लम्बी चलने वाली बेरोज़गारी के बारे में कुछ पता नहीं है। एक अजीबोगरीब तर्क इन टिप्पणियों में यह आ रहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी जीविका के लिए किसी सरकारी या औद्योगिक/पूंजीवादी संस्थान में काम कर रहा है, तो उसे या तो काम छोड़कर भूखा मर जाना चाहिए ताकि वह अपने वैचारिक आग्रहों को सुरक्षित रख सके या फिर उसे सरकारों या संस्थानों का विरोध बंद कर देना चाहिए। इस नज़रिए का खोट यह है कि यह लेखक या मज़दूर की कमाई को उसकी मेहनत का नतीजा नहीं, बल्कि नौकरी देनेवालों की इमदाद मानता है, अत: शासकवर्ग का ही पक्षपोषण करता है। ये लोग खेत मज़दूरों से यह कहेंगे कि भूमिपति तुम्हें रोटी देता है, इसलिए उसका विरोध या अपनी मजूरी बढ़ाने का आंदोलन तुम्हें नहीं करना चाहिए। इससे अच्छा है कि तुम मजूरी करना बंद कर दो। ये लोग मल्टीनेशनल में काम करने वाले कर्मचारियों से कहेंगे कि तुम लोगों को ट्रेड यूनियन बनाने का हक नहीं है क्योंकि तुम लोग उसी मल्टीनेशनल की रोटी खा रहे हो। इनके अनुसार तो सरकारी कर्मचारियों को भी इसी तर्ज़ पर सरकार के खिलाफ़ न बोलना चाहिए, न लिखना चाहिए। यह किस तबके का नज़रिया है?

किसे इस पूंजीवादी लोकतंत्र में जीने के लिए अपना श्रम नहीं बेचना पड़ता? क्या इसीलिए वह अपना बुद्धि-विवेक, संघर्ष चेतना और आत्मा भी बेंच दे? मंगलेश ने तो बिहार सरकार का पुरस्कार विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए भी यही कहा कि इसे उन लोगों की अवमानना न माना जाए जिन्होंने यह पुरस्कार लिया है। फिर ऎसी हाय-तौबा क्यों? एक समय बिहार में हुए दलित जनसंहारों के लिए लालू सरकार को ज़िम्मेदार मानते हुए जन संस्कृति मंच ने उनके द्वारा घोषित पुरस्कारों के विरोध का अभियान ही चलाया था, जो कई लेखक मित्रों को नागवार गुज़रा था और उन्होंने जन संस्कृति मंच पर संस्कृति के क्षेत्र में राजनीति करने का आरोप लगाया था। मंगलेश जी ने तो कोई अभियान भी नहीं चलाया, बल्कि अपनी वैचारिक असहमति को व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्त किया। इससे किन लोगों को चोट पहुंची है? क्या है उनकी राजनीति और समझ?ऎसे लोग यह पूछ रहे हैं कि साहित्य अकादमी जब मंगलेशजी को प्राप्त हुआ तब भी केन्द्र में भाजपा थी, फ़िर तब क्यों ले लिया और अब क्यों नहीं? यह सवाल भोला नहीं है, इसमें मक्कारी भरी है। यह लोग साहित्य अकादमी और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद की संरचना और स्वरूप तथा दोनों में सरकारी हस्तक्षेप की भिन्नता को बखूबी जानते हैं और जान- बूझकर कर दोनों सम्मानों की तुलना कर भ्रम फैला रहे हैं। मंगलेश जी की आय का ब्यौरा देने वालों के लिए क्या यह उचित नहीं होता कि अपनी आय और उसके स्रोतों का भी ब्यौरा प्रकाशित कराते? उनपर व्यक्तिगत लांछन जो लोग लगा रहे हैं क्या कोई प्रमाण प्रस्तुत करेंगे या हम चरित्र-हनन को ही साहित्य की एक विधा मान कर संतोष कर लें?क्या कारण है कि हिंदी के सैकड़ों लेखक ऎसे हैं जिन्होंने मंगलेशजी से ज़्यादा विदेश यात्राएं की है, लेकिन दिखाई दे रही है सिर्फ़ मंगलेश जी की यात्रा? क्या ये लोग जिन्हें उनकी विदेश यात्राओं पर ऎतराज़ है, वे कुछ मध्यकालीन चिंतकों की तरह यह मानते हैं कि समुद्र के खारे पानी और मानव की त्वचा में बैर है इसलिए उसे सात समुंदर पार नहीं जाना चाहिए?क्या अपराध हो गया विदेश जाने से? क्या चोरी-डकैती करके विदेश गए थे? किसी लेखक-बुद्धिजीवी-अकादमीशियन को जब सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत कहीं बाहर बुलाया जाता है तो उसका व्यय बुलाने वाली या भेजने वाली संस्था ही उठाती है। हिंदी में गिने चुने ही लेखक होंगे जो अपने खर्चे पर महज घूमने फिरने कहीं विदेश जा पाते होंगे। सवाल है कि वे विदेश क्या करने गए थे? उस यात्रा का कोई सांस्कृतिक उद्देश्य था या मौज-मस्ती, कबूतरबाजी और स्मगलिंग करने गए थे? क्या कहना चाहते हैं ये लोग? मंगलेश की विदेशयात्रा पर एक मित्र यहां तक लिख गए कि वे अमरीका जाने से पहले एक अंडरटेकिंग दे कर गए थे कि उनका किसी कम्यूनिस्ट पार्टी से कोई रिश्ता न है न होगा। पढ़कर बहुत हंसी आई थी क्योंकि उसी के आस-पास मैं भी अमरीका गया था और मुझे तो बुलाया ही कम्यूनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि के बतौर गया था। जहां भी गया कम्यूनिस्ट पार्टी का बिल्ला लगाकर गया। आखिर क्यों ऎसी अपढ़्ता की बातें लिखकर हिंदी का कोई लेखक अपने को हास्यास्पद बनाता है, समझ में नहीं आता।

ब्लाग-लेखन जो किसी लेखक को यह स्वतंत्रता मुहैया कराता है कि वह अभिव्यक्ति के लिए किसी पत्रिका या प्रकाशन या संपादक का मुहताज नहीं है., बल्कि खुदमुख्तार है;उसी ब्लाग-लेखन की स्वतंत्रता का दुरूपयोग एक लेखक के चरित्र हनन के लिए किया जाना ब्लाग दुनिया के लिए भी चिंता की बात होनी चाहिए। मंगलेश कितने बड़े या छोटे कवि हैं इसका निर्णय उनपर व्यक्तिगत प्रहार से नहीं होगा। इतिहास तो सबसे बड़ा आलोचक है,कुछ उसपर भी छोड़िए। क्यों इतनी जल्दी में हैं ? वैचारिक दरिद्रता का ये आलम है कि पहाड़ी बनाम मैदानी का भी अंतर्विरोध मंगलेश पर हमले के काम में लाया जा रहा है। आश्चर्य है कि जो हिंदी-उर्दू समाज अभी मराठी अस्मिता के नाम पर ठाकरे खानदान के ज़ुल्म महाराष्ट्र में झेल रहा है, उसी के कुछ बुद्धिजीवी एक व्यक्ति को लांछित करने के लिए हिंदी-उर्दू क्षेत्र की इलाकाई अस्मिताओं का क्षुद्र स्वार्थों के लिए ऎसा घृणित इस्तेमाल करने से बाज़ नहीं आ रहे। मंगलेश हिंदी के कवि हैं और उनके चाहने वाले हर हिंदी प्रांत में हैं और उनपर होने वाले हमलों का जवाब भी देने वाले हर कहीं हैं, बिहार में भी। वैसे मंगलेश जी से इतना ज़रूर कहूंगा कि ईष्या-द्वेष, चरित्र हनन की निम्नपूंजीवादी प्रवृत्तियां इसी समाज की देन हैं और हिंदी साहित्य की दुनिया इससे कभी मुक्त नहीं रही है। ठनने को तो बड़े बड़ों में ऎसी ठनी कि सभी मर्यादाएं ताक पर रख दी गईं। याद होगा निराला- भुवनेश्वर विवाद। लेकिन साहित्य में दोनों का स्थान उनके लिखे ने तय किया उनके बीच अप्रिय विवाद के प्रसंग ने नहीं। मैं मंगलेश जी की तक्लीफ़ का अंदाज़ा लगा सकता हूं लेकिन जिनका धंधा ही यही सब करना है उनको लेकर इतना भी क्या सोचना? आखीर में यह कहना चाहता हूं कि 'पहाड़ पर लालटेन' महज प्रतीक नहीं है कि सर्चलाइट मज़ाक में ही सही उसका स्थानापन्न हो जाए। ऊंची-नीची पहाड़ियों के रास्ते पर जब आप रात में गुज़रें तो जो कूट कूट कर भरा हुआ अंधेरा होता है, उसमें दूर कहीं ऊपर जलती हुई लालटेन यह भरोसा दिलाती है कि उतनी उंचाई, उतने निर्जन पर भी मनुष्यता है, जिजीविषा है। कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ लेगा मंगलेश जी।

- प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

मैं उस व्यक्ति की तरह हँसा जो बस रोता रहा हो

मैं नहीं जानता प्रकृति क्या है
मैं उसे गाता हूं
मैं, पहाड़ की चोटी पर
सफ़ेदी किए हुए एक घर में रहता हूं
जो सबसे अलग है
और यही मेरी परिभाषा है




ये पंक्तियां पुर्तगाल के महाकवि फ़र्नान्दो पेसोआ की हैं. हाल ही में मैंने आपको उसकी कविताओं की एक बानगी दिखलाने की कोशिश की है. फ़र्नान्दो पेसोआ (१८८८-१९३५) का व्यक्तित्व जितना विराट था उस से कहीं ज्यादा विराट उसका कृतित्व है। साहित्य की हर विधा में कलम चलाने वाले इस जीनियस लेखक ने विश्व साहित्य को जितना समृद्ध किया वह बड़े बड़े लेखकों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है।

कुल मिलाकर पेसोआ ने छियासी नामों से रचनाएं कीं और अपनी मृत्यु के बाद जिन 27085 पाण्डुलिपियों को वह अपने सन्दूक में छोड़ गया उनके प्रकाश में आने के बाद से आज उसका शुमार सर्वकालीन महानतम कवियों में किया जाता है।

अपने सैंतालीस साल के संक्षिप्त जीवन में पेसोआ ने अपना कद किसी भी जीवित व्यक्ति से बड़ा बनाया और यह अकारण ही नहीं है कि आज पेसोआ को पुर्तगाल का सर्वकालीन महानतम कवि माना जाता है।


आज मैंने करीब दो पन्ने पढ़े

आज मैंने करीब दो पन्ने पढ़े
एक रहस्यवादी कवि की किताब से
और मैं उस व्यक्ति की तरह हँसा जो बस रोता रहा हो

बीमार दार्शनिक होते हैं रहस्यवादी कवि
और दार्शनिक पागल होते हैं

क्योंकि रहस्यवादी कवि कहते हैं कि फूलों को एहसास होता है
वे कहते हैं कि पत्थरों में आत्मा होती है
और नदियों को चाँदनी में उद्दाम प्रसन्नता होती है
लेकिन फूलों को एहसास होने लगे तो वे फूल नहीं रह जायेंगे-
वे लोग हो जायेंगे
और अगर पत्थरों के पास आत्मा होती
तो वे जीवित लोग होते, पत्थर नहीं,
और अगर नदियों को होती उद्दाम प्रसन्नता चाँदनी में
तो वे बीमार लोगों जैसी होतीं

आप फूलों, पत्थरों और नदियों की
भावनाओं की बात तभी कर सकते हैं
जब आप उन्हें नहीं जानते
फूलों, पत्थरों और नदियों की आत्माओं के बारे में बात करना
अपने बारे में बात करना है - अपने संदेहों के बारे में
शुक्र है खुदा का, पत्थर बस पत्थर है
और नदियाँ बस नदियाँ
और कुछ नहीं
फूल बस फूल

जहाँ तक मेरा सवाल है
मैं लिखता हूं अपनी कविताओं का गद्य
और मैं सन्तुष्ट हूं
क्योंकि मैं जानता हूं
कि मैं प्रकृति को बाहर से समझता हूं
मैं उसे भीतर से नहीं समझता
क्योंकि पृथ्वी के भीतर कुछ नहीं होता
वरना वह प्रकृति ही नहीं रह जायेगी.

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*पेसोआ पर लगी हालिया पोस्ट्स के लिंक:

मेरी कविता हवा की उठान की तरह नैसर्गिक है
पर्याप्त अध्यात्म है बिल्कुल न सोचने में भी

Thursday, March 19, 2009

मेरे सामने एक आदमी लाओ मैं उसकी महानता को पहचानूंगा



आज आपका परिचय पोलैंड के एक कम चर्चित किन्तु अति प्रभावशाली कवि राफ़ाल वोयात्चेक से करवा रहा हूं. राफ़ाल का जन्म १९४५ में पोलैंड के एक सम्मानित परिवार में हुआ था. ११ मई १९७१ को मात्र छब्बीस साल की आयु में आत्महत्या कर चुकने से पहले राफ़ाल ने तकरीबन दो सौ कविताएं लिखीं, जिन्हें चार संग्रहों की शक्ल में प्रकाशित किया गया. कुछ कविताएं उसने छ्द्म स्त्रीनाम से भी लिखीं.

उसकी पढ़ाई बहुत बाधित रही और ताज़िन्दगी वह अल्कोहोलिज़्म और डिप्रेशन का शिकार रहा. उसने कविता लिखना तब शुरू किया था जब पोलैंड के युवा कवियों को यह भान हो गया था कि उनका देश एक झूठे और भ्रष्ट राजनैतिक सिस्टम में फंस चुका है.

राफ़ाल की कविताएं तत्कालीन पोलैंड की राजनीति और सामाजिक परिस्थिति को एक सार्वभौमिक अस्तित्ववादी त्रासदी के स्तर पर देखती हैं. मोहभंग, व्यक्तिगत भ्रंश, और मृत्यु के प्रति ऑब्सेशन उसकी कविताओं की आत्मा में है.

पोलैंड के मिकोलो क़स्बे में, जहां वह जन्मा था - हाल ही में उसके नाम पर एक संग्रहालय का उद्घाटन किया गया है, बीसवीं सदी की महान पोलिश कविता में जीवन भर अभिशप्त रहे इस उल्लेखनीय युवा कवि को बहुत लाड़ के साथ याद किया जाता है. आपके लिए ख़ास तौर पर पेश कर रहा हूं उसकी चार कविताएं.


१. अनुरोध

मुझे एक झाड़ू दो - मैं शहर के चौराहे की सफ़ाई करूंगा
या दो एक औरत, मैं उसे प्यार करूंगा और गर्भवान बना दूंगा
मुझे एक पितृभूमि दो, मैं उसके दृश्यों का
महिमागान करूंगा या उसकी सत्ता का अपमान
या करूंगा उसकी सरकार की प्रशंसा
मेरे सामने एक आदमी लाओ मैं उसकी महानता को पहचानूंगा
या उसके दुःख को
रोचक शब्दों में करूंगा मैं उनका वर्णन
मुझे प्रेमीजन दिखाओ और मैं भावनाओं में बह जाऊंगा
मुझे किसी अस्पताल में भेजो
या किसी सम्प्रदाय के कब्रिस्तान में
मेरे वास्ते सर्कस या थियेटर की व्यवस्था करो
किसी फ़सल में किसी युद्ध की - शहर में किसी उत्सव की
या मुझे गाड़ी चलाना या टाइप करना सिखलाओ
मुझे भाषाएं सीखने पर मजबूर करो
या अख़बार पढ़ने पर
और आख़ीर में दो मुझे वोदका
- मैं उसे पियूंगा
और फिर कै करूंगा
क्योंकि कवियों का इस्तेमाल होना ही चाहिये.

२. मैं जीता हूं

मैं जीता हूं तारों को न देखता हुआ
मैं बोलता हूं शब्दों को न समझता हुआ
मैं इन्तज़ार करता हूं दिनों को न गिनता हुआ

जब तक कि कोई आकर भेद न दे इस दीवार को.

३. कौन

कौन घूम रहा मेरे आईने में
न कोई औरत न कोहरे का बना आदमी कोई
पर वह इतनी क्रूरता के साथ वह ख़ुद है
कि दस्तावेज़ अब तक खाली पड़े हैं?

कौन है जो पी रहा मेरे गिलास से
हालांकि वह पियक्कड़ नहीं तो भी
पुलिस उसे कीचड़ से बाहर घसीट लाती है
उसे हमारी वृत्ति का सदस्य मान लिया जाता है?

कौन है जो मेरी कलम से
मेरी कविताएं लिख रहा है
और मेरी पत्नी को ले कर जा रहा बिस्तर पर?
कौन है जो अभी अभी यहां से गया है?

४. फांसी चढ़ा दिये गए आदमी की रखैल

फांसी चढ़ा दिये गए आदमी की रखैल -
उसकी आंखों में देखती है
वह ख़ुद को देखती है उसके ख़्वाबों में

फांसी चढ़ा दिये गए आदमी की रखैल
- शर्मसार -
उसके सिर के पास झुकी हुई
वह पेट से है
उसका चेहरा काला पड़ा हुआ

फांसी चढ़ा दिये गए आदमी की रखैल
जिसका चेहरा दर्द से काला पड़ चुका
बच्चे के दो टुकड़े कर देती है
- वह ख़ुद चूस रही अपनी छाती
उसके नाख़ून
ख़ुद अपनी देह खरोंचते

फांसी चढ़ा दिये गए आदमी की रखैल
उस आदमी के सपने में समूची की समूची है.

Wednesday, March 18, 2009

मंगलेश डबराल को पहचानिए !


(हमें सूचना के रूप में एक पत्र मिला है, जिसे हम यहां सार्वजनिक कर रहे हैं। मंगलेश डबराल पर उछाले जा रहे कीचड़ के बीच पाठक इस पत्र को पढ़ें और जानें कि साहित्य में विमर्श और ब्लागिंग में बहस के नाम पर कितनी जघन्यता बरती जा रही है और उसके बरअक्स प्रकारांतर से एक लेखक का ईमान क्या कहता है! मंगलेश जी की सचाई, विचार के प्रति समर्पण और घनघोर हिंसक समाज में भी अपनी ज़मीन पर खड़े रहने के उनके जीवट को हमारा सलाम - कबाड़खाना परिवार )
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मंगलेश डबराल
326- निर्माण अपार्टमेंट , मयूर विहार फ़ेज 1,

दिल्ली -92


आदरणीय प्रो0 सिंह,

आपके 13 फरवरी 2009 के पत्र के लिए धन्यवाद। यह रजिस्टर्ड पत्र मुझे बहुत देर से मिला और कुछ विलम्ब मुझे इसका उत्तर देने में भी हुआ। मैं आभारी हूं कि बिहार राष्ट्रभाषा परिषद और उसके निर्णायक मंडल ने वर्ष 2006-07 के इक्यावन हज़ार धनराशि के राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिकता सम्मान के लिए मेरे नाम का चयन किया है।

सबसे पहले यह सूचना मुझे नेशनल बुक ट्रस्ट के एक सहयोगी सम्पादक श्री कमाल अहमद के जरिए मिली जिन्हें इस वर्ष परिषद का एक साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ है। उनके माध्यम से मैंने यह संदेश आप तक पहुंचाया था कि मैं बहुत विनम्रता के साथ यह पुरस्कार लेने में असमर्थ हूं और पुरस्कार न लेने का कारण मैं इसकी औपचारिक सूचना प्राप्त करने के बाद सूचित करूंगा। अब जब यह लिखित सूचना मिल चुकी है, मैं इस पुरस्कार को ग्रहण न कर पाने के मुख्य कारणों का उल्लेख नीचे कर रहा हूं -

१-राजेन्द्र माथुर निश्चय ही आधुनिक हिंदी के उन बड़े पत्रकारों में थे जो ऊंचे लोकतांत्रिक मूल्यों, सम्पादकीय स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अगाध विश्वास करते थे और उनके लिए संघर्ष भी करते रहे। बिहार सरकार ने ऐसे पत्रकार की स्मृति में सम्मान की स्थापना करके एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। मैं यह भी जानता हूं कि मुझसे पहले अनेक महत्वपूर्ण पत्रकारों को यह पुरस्कार मिल चुका है। लेकिन यह पुरस्कार राज्य की ओर से दिया जाता है और इस समय बिहार शासन भारतीय जनता पार्टी नामक एक ऐसे दल के गठबंधन में चल रहा है जिसकी साम्प्रदायिक और हिंदूवादी विचारधारा से मेरी सहमति नहीं है। मेरा मानना है कि हमारे समाज के अनेक संकटों के लिए मुख्यत: यही विचारधारा जिम्मेदार है। इन विचारों का प्रतिनिधित्व करनेवाले राजनीतिक दल के सक्रिय सहयोग से चल रहे राज्य का पुरस्कार लेने में मैं असमर्थ हूं।

२- हिंदी प्रदेशों की तमाम राज्य सरकारें साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रति वर्ष कई दर्जन पुरस्कार देती हैं। वे कई बड़े व्यक्तित्वों के नाम पर स्थापित किए गए हैं लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर उनके वितरण से साहित्य और पत्रकारिता का कितना हित हुआ है, यह सोचने का विषय है। मेरी निजी राय है कि राज्य सरकारों को ऐसे एकमुश्त पुरस्कार देने के बजाए कुछ ठोस और सार्थक रचनात्मक कामों या परियोजनाओं के लिए आर्थिक सहयोग के रूप में ये राशियां देनी चाहिए। शायद यहां एक उदाहरण देना उचित होगा कि विश्व भर के साहित्य को आज हम जिन अंग्रेजी अनुवादों के कारण जानते हैं उनमें से ज्यादातर इसी तरह की आर्थिक सहायताओं के चलते सम्भव हो पाते हैं।

मेरा यह भी अनुरोध है कि मेरे निर्णय को किसी भी रूप में अपनी या निर्णायक समिति या पहले पुरस्कृत हो चुके लोगों की अवमानना के रूप में नहीं लेंगे । यह मेरा नितांत वैचारिक निर्णय है और सच तो यह है कि इस तरह के कुछ फैसले मैंने पहले भी किए हैं।

आशा है आप अच्छी तरह होंगे।
शुभकामनाओं के साथ
आपका

मंगलेश डबराल



प्रो0 रामबुझावन सिंह
निदेशक - बिहार राष्ट्रभाषा परिषद
मानव संसाधन विकास(उच्च शिक्षा) विभाग
बिहार सरकार
पटना- 800 004

मेरी कविता हवा की उठान की तरह नैसर्गिक है

फ़र्नान्दो पेसोआ की एक कविता मैंने कल पोस्ट की थी. दरअसल उनकी एक लम्बी कविता श्रृंखला है 'भेड़ों का रखवाला'. पिछली कविता और ये वाली कविता उसी का हिस्सा हैं. पेसोआ के बारे में मैंने पहले भी कबाड़ख़ाने में लिखा है और उनकी रचनाओं से आपका परिचय कराया है.

मुझे छंद की कोई परवाह नहीं

-फ़र्नान्दो पेसोआ



मुझे छंद की कोई परवाह नहीं
यह कभी-कभी ही हो सकता है
कि अगल-बगल के दो पेड़
बिल्कुल समान हों
मैं उसी तरह सोचता और लिखता हूं
जैसे फूलों में रंग होते हैं
लेकिन मेरी अभिव्यक्ति में कम सम्पूर्णता होती है
क्योंकि मेरे भीतर
सब कुछ हो पाने की
वह पवित्र साधारणता नहीं है

मैं देखता हूं और भावनाओं में बहने लगता हूं
मैं उसी तरह भावुक हो जाता हूं
जैसे ढलवाँ ज़मीन पर पानी बहता है
और मेरी कविता हवा की उठान की तरह नैसर्गिक है...

हम चीज़ों में जो कुछ देखते हैं वही वे हैं
हम एक ही चीज़ क्यों देखें जब वहाँ एक और भी है?
देखना और सुनना हमें क्यों भ्रमित करे
जबकि देखना और सुनना बस देखना और सुनना होता है?
ज़रूरी बात है देख पाने में महारत
और बगैर सोचे, अच्छी तरह देख पाना
और इस काबिल होना कि देखते वक़्त सिर्फ़ देखा जाए
जब देख रहे हों तो सोचें नहीं
और सोचते वक़्त देखें नहीं

लेकिन उसके लिए (बेचारे हम, जो अपनी आत्मा को
पूरे कपड़े पहनाए लादे फिरते हैं) - उसके लिए
बड़ा अध्ययन चाहिए
उस आश्रम की स्वच्छंदता पर अधिकार चाहिए
जिसके बारे में कविगण कहा करते हैं
कि सितारे अनन्त देव-कुमारियाँ हैं
और फूल, एक इकलौते दिन के लिए
संवेदनापूर्ण पश्चाताप करते लोग,
लेकिन जहाँ अन्तत: तारे और कुछ नहीं बस तारे होते हैं
और फूल कुछ नहीं बस फूल
- यह इसी कारण है कि हम उन्हें तारे और फूल कहते हैं

'धरती की सारी ख़ामोशी -फ़र्नान्दो पेसोआ की चयनित रचनाएं' (संवाद प्रकाशन)से साभार

Tuesday, March 17, 2009

पर्याप्त अध्यात्म है बिल्कुल न सोचने में भी



पर्याप्त अध्यात्म है बिल्कुल न सोचने में भी

-फ़र्नान्दो पेसोआ

पर्याप्त अध्यात्म है बिल्कुल न सोचने में भी
क्या सोचता हूं मैं दुनिया के बारे में?
मैं कैसे जान सकता हूं मैं क्या सोचता हूं दुनिया के बारे में?
- मैं सोचता अगर बीमार होता तो

चीज़ों के बारे में मेरे क्या विचार हैं?
कारक और प्रभाव के बारे में?
ईश्वर, आत्मा, संसार और सृष्टि की बाबत
मेरा चिन्तन क्या है?
-मुझे नहीं मालूम, इस सबके बारे में सोचना
मेरे लिए अपनी आँखें बन्द कर लेने जैसा है
न सोचने जैसा
अपनी खिड़कियों के परदे खींच लेने जैसा
(पर उनमें परदे नहीं है)

वस्तुओं का रहस्य?
कैसे जान पाऊँगा क्या है वह?
इकलौता रहस्य यही है कि कोई ऐसा भी है
जो रहस्य के बारे में सोच सकता है
ऐसा एक कोई जो धूप में खड़ा हो आँखें मूँद लेता है
यह जानना बन्द कर कि सूरज क्या है
वह तमाम गर्मीभरी चीज़ों के बारे में सोचने लगता है
फिर वह अपनी आँखें खोलता है और
सूरज को देखता है
- अब वह कुछ भी नहीं सोच पाता
क्योंकि सूरज की रोशनी
विचारों से कहीं अधिक मूल्यवान है
सारे दार्शनिकों, कवियों से कहीं अधिक मूल्यवान है
सूरज की रोशनी नहीं जानती वह क्या कर रही है
और इसलिए नहीं भटकती
और वह सभी के लिए है और अच्छी है

अध्यात्म?
क्या अध्यात्म है इन पेड़ों में सिवा इसके कि वे हरे हैं?
उनमें चोटियाँ और शाखाएँ हैं
और वे अपने समय पर फलते हैं -
जो नहीं है वह हमें सोचने पर विवश करता है
हम जो यह भी नहीं जानते
कि उनके बारे में सोचा कैसे जाए
लेकिन उनके अध्यात्म से बेहतर क्या अध्यात्म हो सकता है
जो जानते ही नहीं वे जीवित क्यों हैं
जो यह भी नहीं जानते कि वे नहीं जानते?
`चीज़ों की आन्तरिक संरचना...
ब्रह्मांड का गूढ़ रहस्य...`
यह सब असत्य है, निरर्थक है,
यह अविश्वसनीय है कि लोग
इस सबके बारे में सोच सकते हैं

यह तो ऐसा ही हुआ
जब सुबह के शुरू में किरणें आती हैं
और पेड़ों के किनारों पर
सुनहरी धुंधभरी चमक उतरना शुरू करती है अंधेरे को हटाती
और कोई उसके
कारण और परिणाम के बारे में सोचने लगे

वस्तुओं के आन्तरिक अर्थ के बारे में सोचने का अर्थ है
परिश्रम की बरबादी
या जैसे स्वास्थ्य के बारे में सोचना
या जैसे जलप्रपात के पास गिलास ले कर जाना

चीज़ों का आन्तरिक अर्थ यही है
कि उनका कोई आन्तरिक अर्थ नहीं होता
मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं करता
क्योंकि मैंने उसे कभी नहीं देखा
अगर वह चाहता होता कि मैं उस पर यकीन करूँ
तो निश्चित ही मेरे पास आता
और मुझसे कहता `यह मैं हूं`

(शायद यह उस व्यक्ति के कानों को हास्यास्पद लग रहा होगा
जो यह नहीं जानता
कि चीज़ों को कैसे देखा जाना चाहिए
जो उस आदमी को भी नहीं समझता
जो चीज़ों की बात उसी तरह करता है
जैसा उनका दिखाई देना
उनके बारे में सिखाता है)

लेकिन अगर पेड़, फूल
पहाड़ और चाँदनी और सूरज ही ईश्वर है
तो मैं उसे ईश्वर क्यों कहता हूं
मैं उसे फूल, पेड़, पहाड़, सूरज और चाँदनी ही कहता हूं
क्योंकि यदि
वह ख़ुद को मुझे दिखलाना चाहने के लिए
अपने आप को
सूर्य और चाँदनी और फूल और पेड़ और पहाड़ बनाता है
यदि वह मुझे
पेड़, पहाड़, चाँदनी
सूरज और फूल की तरह दिखाई देता है
तो सत्य यह है कि वह चाहता है
कि मैं उसे पेड़, पहाड़, फूल, चाँदनी और सूरज की तरह ही
समझूं और जानूं

लेकिन अगर फूल, पेड़, पहाड़ और सूरज
और चाँदनी ईश्वर है
तो मैं उस पर विश्वास करता हूं
तो मैं उस पर हर घड़ी विश्वास करता हूं
और मेरी पूरी ज़िन्दगी
आँखों और कानों के माध्यम से
लगातार की गई
एक प्रार्थना है

और इसीलिए मैं उसकी आज्ञा का पालन करता हूं
(मैं स्वयं कितना अधिक जानता होऊँगा
ईश्वर के बारे में,
जितना वह स्वयं को जानता होगा?)
मैं उसकी आज्ञा का पालन जी कर करता हूं
ऐसे व्यक्ति की तरह जो अपनी आँखें खुली रखता है
और देखता है
और मैं उसे चाँदनी, सूरज और पहाड़
पेड़ और फूल कहता हूं
और इस बारे में सोचे बग़ैर उसे प्यार करता हूं
और देख और सुनकर उसके बारे में सोचता हूं
और हर पल
मैं उसके साथ-साथ चलता हूं

'धरती की सारी ख़ामोशी -फ़र्नान्दो पेसोआ की चयनित रचनाएं' (संवाद प्रकाशन)से साभार

Sunday, March 15, 2009

क्या ईश्वर ख़ुद पर यक़ीन करता है?

एक दस साल की बच्ची़ से कुछ दिन पहले एसएमएस संवाद हुआ. उससे एक दावत में मुलाक़ात हुई और उसने मुझे यक़ीन दिलाना चाहा कि ईश्वर वास्तव में होता है. कुछ घंटे बाद घर लौटने पर उसका मैसेज मिला. इस एसएमएस आदान-प्रदान का अँग्रेज़ी से अक्षरशः अनुवाद प्रस्तुत है. पहला मैसेज भेजकर उसने सवाल कियाः

"तो अब तुम भगवान पर यक़ीन करते हो."

"हाँ, लेकिन मेरे भगवान का कोई धर्म नहीं है. तुम्हारे भगवान का क्या धर्म है?"

"हिंदू."

"तो क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा हिंदू ईश्वर मेरे नास्तिक ईश्वर से बेहतर है."

"बिलकुल. सबको मेरी ओर से नमस्ते."

(दो मिनट बाद फिर से एक मैसेज आता है)

"अगर तुम्हारा ईश्वर नास्तिक है तो वो ख़ुद पर भी विश्वास नहीं करता होगा... ये समझ से परे है."

"क्या ईश्वरों को अपने पर विश्वास करना ज़रूरी है? ... ये मैसेज अपनी माँ को दिखाकर उनसे पूछो."

"क़तई नहीं. वो व्यस्त हैं और सबको ख़ुद पर विश्वास करना होता है. ईश्वर को भी."

"मैं हार मानता हूँ. तुमने मुझे लाजवाब कर दिया है."

"शुक्रिया और शुभरात्रि."

Friday, March 13, 2009

मेरे प्रिय खेल: एक - दहल पकड़



खेल के नियम:

१. आपको कहीं जाने की जल्दी नहीं होनी चाहिए
२. ताश की गड्डी एक हज़ार साल पुरानी होनी चाहिए
३. चाय-पकौड़ी-समोसा इत्यादि की निर्बाध सप्लाई का इंतज़ाम पुख़्ता होना चाहिए

खिलाड़ियों की संख्या: चार

दर्शकों व सलाहकारों की संख्या: कोई सीमा नहीं

खेलने का तरीका:

आमने सामने बैठे खिलाड़ी आपस में एक-एक (यानी कुल जमा दो) टीमों का निर्माण करते हैं.

पहले गुलाम - पीस की जानी चाहिए. गुलाम - पीस क्या होती है, अगर आपको यह ज्ञान नहीं है तो आप स्वाभाविक रूप से इस खेल को खेलने हेतु पर्याप्त अर्हतारहित हैं और यह खेल आप के वास्ते नहीं है. पोस्ट को आगे न पढ़ें. पत्तों को एक बार पुनः गिन लें, वर्ना मज़ा किरकिरा हो सकता है.

तेरह-तेरह पत्ते बांटें. जिसे सबसे पहले पत्ता मिला हो वह पहली चाल देने का अधिकारी होता है. आपके सामने दो उद्देश्य होते हैं. पहला गड्डी के चारों दहले अपनी टीम के कब्ज़े में करने की कोशिश करना. दूसरा अपने पत्तों में से किसी एक रंग को जल्दी-जल्दी ख़त्म करने की कोशिश करना ताकि आप ट्रम्प (यानी तुरुप) खोलने का लुत्फ़ उठा सकें.

यदि आपको कोटपीस खेलनी नहीं आती तो इस पोस्ट को पढ़ने का कोई फ़ायदा नहीं है क्योंकि दहल पकड़ का आविष्कार कोटपीस खेलने वालों को ताश की तहजीब सिखाने के उद्देश्य से किया गया था.

हार-जीत तय करने के तरीके:

१. अधिक यानी तीन अथवा चार दहल पकड़ने वाली टीम विजेता मानी जाएगी.
२. यदि दोनों टीमों के पास दो-दो दहल हैं तो अधिक यानी सात या अधिक हाथ बनाने वाली टीम जीती मानी जाएगी.

खेल पुरुस्कार:

कोट : चारों दहल पकड़ने वाली टीम को दिया जाने वाला सम्मान.

असाधारण खेल पुरुस्कार:

गू-कोट: चारों दहल के साथ सभी तेरह हाथ पकड़ लेने वाली टीम द्वारा पराजित टीम को दिया जाने वाला अपमान.

(फ़ोटो देखकर विचलित न हों. दहल पकड़ के विशेषज्ञों से इस पोस्ट को समृद्ध करने हेतु प्रयास करने का विनम्र निवेदन.)

Tuesday, March 10, 2009

सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: अंतिम हिस्सा


सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: पांचवां हिस्सा

-शम्भू राणा

हाथरस आ पहुंचे. काका हाथरसी का शहर. शहर में पहुंचते ही घुटने-घुटने गड्ढे में जा घुसे. दुर्घटनावश नहीं जानबूझकर. क्योंकि कार उड़ नहीं सकती थी और हमें आगे जाना था. उन गड्ढों में इतना पानी था कि बच्चे तैरना सीख सकते थे. गाड़ी का निचला हिस्सा पानी के भीतर किसी चीज़ से टकराया, गाड़ी एक धचके के साथ आगे बढ़ी, लगा कि बला टल गई. आगे रेलवे क्रॉसिंग था. ट्रैफ़िक थमकर ट्रेन को गार्ड ऑफ़ ऑनर पेश कर रहा था. ट्रेन गुज़र गई, ट्रैफ़िक रेंगने लगा. हम जब पटरी के ऐन बीच में पहुंचे, गेयर बदलने के लिए जो मुदगरनुमा छड़ होती है, वह एक कर्कश आवाज़ के साथ तेज़ी से घूमी, केशव का बायां घुटना और कैसेट प्लेयर फ़ोड़कर थम गई. झन्न से कोई चीज़ सड़क पर गिरी और गाड़ी ठप्प. गेयर बक्सा टूट गया था.उसी का छड़ जैसा कोई हिस्सा नीचे आ गिरा था. पटरी तब तक पार कर चुके थे. गाड़ी बीच बाज़ार में खड़ी हो गई. गाड़ी रुकी तो पास में ही किसी मैकेनिक को होना था, जो कि था. एकाध घन्टा लगा, गाड़ी फिर चकाचक. इस बहाने मुझे और रज्जन बाबू को चाय पीने का मौका मिल गया.

गणेशजी की चमचागीरी अब तक बेनतीज़ा रही थी, आगे क्या फल देती. उन्हें जहां वे स्थापित थे उसी के बॉक्स में डाल दिया कि जाओ महाराज हमारी ओर से थाल भर खयाली लड्डू खाओ. तुम्हारे बस का कुछ नहीं.

दिन में एक-डेढ़ बजे के आसपास गाड़ी को कासगंज का एक वीरान इलाका भा गया इसलिए वह फिर रुक गई. हम समझ गए कि यकीनन आसपास कोई मैकेनिक होगा. केशव ने फिर एक बार हनुमान का रोल निभाया और एक जुगाड़ में लटक कर मैकेनिक नाम की संजीवनी लाने चला. मैकेनिक ने आकर दोएक पुर्ज़ों की मां-बहन से अपने अंतरंग संबंधों का हवाला दिया, तेल का पाइप खोल कर बोला - इसे आप चूसो, मेरा रोज़ा है. गाड़ी स्टार्ट. उसने तीन चीज़ों के पैसे लिए - दुकान से बाहर जाने के, आने-जाने में मोटरसाइकिल में जो तेल लगा उसके और अपने मेहनताने के - करीब तीनेक सौ रुपये. पूछा कि भाई पैसे तो तूने मनमाने के लिए मगर गारंटी क्या है. उस मुसल्ल्म ईमान वाले रोज़ेदार ने फ़रमाया - भाईजान मेरी दुकान तक गारंटी है, बाकी ख़ुदा के निज़ाम में दख़ल देने वाला मैं कौन होता हूं. वह मोटरसाइकिल से हमारे साथ साथ चला. दोएक किलोमीटर चलने के बाद गाड़ी फिर ठप्प. दुकान से लगभग आधा किलोमीटर पहले -गारंटी पीरियड में. अब बोल भय्ये, क्या कैरिया था?

बेचारी रज़िया गुंडों में घिर गई थी. समझना मुश्किल नहीं था कि जाहिलों के बीच में आ फंसे हैं. मैकेनिक की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था, बस वक्त बिताई हो रही थी. नमाज़ का वक्त हुआ और फिर देखते ही देखते रोज़ा खोलने का वक्त भी आन पहुंचा. मैकेनिक ने पेट्रोल का पाइप खोल रखा था और मोमबत्ती की रोशनी में उसका मुआयना कर रहा था. एक टॉर्च ख़रीदा गया और मोमबत्ती बुझवाई गई. अंत में मैकेनिक और उसके चेले-चांटे फिर नमाज़ को चले गए यह यकीन दिलाकर कि अब कोई दिक्कत नहीं आएगी. जहां तक मर्ज़ी हो जा सकते हो. दोएक सौ रुपए फिर झाड़ लिए - बावजूद गारंटी के.

दो-तीन किलोमीटर चलने के बाद कुत्ते की पूंछ फिर टेढ़ी. घना अंधेरा, वीरान इलाका, दूर तक किसी बस्ती का निशान नहीं, मदद की कोई संभावना नहीं. पीछे लौट कर जाना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी. ख़ुद ही टॉर्च की रोशनी में बोनट खोलकर थोड़ा छेड़खानी की, तेल का पाइप चूसा, गाड़ी चल पड़ी. हम सोच रहे थे कि कम से कम बदायूं तक तो पहुंच जाएं ताकि रात रहने के लिए कोई ढंग की जगह मिल जाए और सुबह को मैकेनिक. कासगंज-बदायूं की सरहद पर कहीं थे हम. पांचेक मिनट बाद ही गाड़ी का दम फिर फूल गया. लेकिन इस बार किसी बस्ती से २०-२५ मीटर पहले.गाड़ी धकेलते हुए पहले ढाबे तक पहुंचे. ढाबे के मालिक मुकेश सिंह ने हमारी हालत पर तरस खाकर रात वहीं रुकने की इजाज़त दे दी. हालांकि मुसीबत में फंसे लोगों को पनाह देने के उनके अनुभव अच्छे नहीं रहे थे. कोई उनका मोबाइल ले भागा तो कोई बरामदे में पाखाना कर चलता बना. मुकेश सिंह कुछ ही समय पहले तक किसी सिगरेट कम्पनी में नौकर थे. मालिक से तनख़्वाह को लेकर झगड़ा हो गया. सिंह साहब मालिक को जहां से आए हो वहीं घुस जाओ (मूल गाली का शाकाहारी अनुवाद) जैसी असंभव राय/गाली देकर घर चले आए और ढाबा खोल लिया.दुकानदारी जैसी चीज़ मुकेश सिंह जैसे खरे और मुंहफट लोगों के बस की चीज़ नहीं होतीं और न वह ढाबा चल ही रहा था. वह उनका बेकारी का दौर था. अब पता नहीं कहां, कैसे होंगे. पूरे सफ़र में यही एक आदमी सच्चा और मददगार हमें मिला. नीलकंठ गेस्ट हाउस वाले भय्याजी को नहीं भूला हूं मगर वो ज़रा अलग चीज़ थे क्योंकि गायछाप थे. रज्जन बाबू और मैं नारियल के रेशों वाली रस्सी से बुनी चारपाइयों पर बिना किसी ओढ़ने-बिछाने के सो गए. केशव ने गाड़ी की सीट को ईज़ी चेयर की तरह फैला लिया.

सुबह को मुकेश सिंह हमारे लिए कामचलाऊ सा (ट्रैक्टर का) मैकेनिक बुला लाए. गाड़ी को धक्का भी उन्होंने लगाया. सिर्फ़ खाने और चाय के पैसे लिए. चलते समय भरोसा दिलाया कि बदायूं पहुंचने से पहले कहीं दिक्कत हो तो मुझे फ़ोन कर लेना. मैं मोटरसाइकिल में मैकेनिक को लेकर आ जाऊंगा.

उस दिन न जाने क्या बात हुई कि गाड़ी का दिल किसी मैकेनिक पर नहीं आया! दो-चार बार जब कभी उसका दम फूला तो हमीं से संतुष्ट हो गई. शायद हमको भी मैकेनिक मान बैठी हो क्योंकि मैकेनिकों के देख-देख कर हम भी गाड़ी रुकने पर गाड़ी के साथ मैकेनिकों जैसी हरकतें करना सीख गए थे. बदायूं पार हो गया. धीरे-धीरे बरेली पास आता चला गया. बरेली में एक जगह फ़्लाईओवर बन रहा था, जिसकी वजह से यातायात को एक संकरी सी सड़क की ओर मोड़ दिया गया था. साइकिलें, रिक्शा, स्कूटर, कारें, बसें, पैदल लोग, गरज़ कि हर तरह की रेलमपेल. हर शख़्स दूसरे के सर पर पांव रख कर आगे जाने की जुगत में. हटो, बचो और हॉर्न की चिल्लपों. हर आदमी खार खाया हुआ. तनी हुई रस्सी पर चलने की सी एकाग्रता से चलना भी ज़रूरी. ट्रैफ़िक किसी सिविल के मुकदमे की तरह रेंग रहा था. युग बीत गए चलते-चलते. लगभग आधे घन्टे बाद निकलना हो पाया इस सब से. गाड़ी से सारी शिकायतें दूर हो गईं क्योंकि अगर उस रेलमपेल में गाड़ी कहीं रुकती तो हमारा पिटना तय था और गाड़ी को कबाड़ी भी लेने से मना कर देता. सांस में सांस आई. ऐसे ही प्राण उस दिन सुबह तब सूखे थे जब कासगंज-बदायूं सीमा पर बने कछला ब्रिज को पार किया था. उस दिन वह ब्रिज हमें दुनिया के सातों आश्चर्यों का कपड़छान ही लगा. कछला ब्रिज में रेल की पटरी सड़क के बीचोबीच चलती है. रोंगटे खड़े हो गए यह सोचकर कि आगे या पीछे से धड़धड़ाती रेल आ गई तो? गाड़ी छोड़ कर नदी में कूदने की भी फ़ुरसत शायद न मिलती. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. करीब एकाध किलोमीटर लम्बा ब्रिज गाड़ी फ़र्राटे से पार कर गई.

लगभग तीनेक बजे जब हल्द्वानी पहुंचे तो यकीन हुआ कि बच गए. पूना से जो पैंट-कमीज़ का कपड़ा हमको उपहार में मिला था, उसकी अब पैंट कमीज़ ही बनेगी. वरना नासिक के बाद दिमाग में एक ख़्याल बीएसएनएल के मोबाइल सिग्नल की तरह लगातार आ-जा रहा था कि कहीं नियति ने हमें कफ़न तो गिफ़्ट नहीं करवा दिया.

हल्द्वानी में कार का कायाकल्प होने में करीब तीसेक घन्टे लगे. उसका तेल टैंक सहित जाने क्या-क्या बदला गया. बिल लगभग पन्द्रह हज़ार रुपया. पूना से बागेश्वर पहुंचने में जितना ख़र्च हुआ होगा उतने में शायद नई कार भी आ जाती. ख़ैर साहब ख़र्चे मो मारिये झाड़ू. एक तो अपनी जेब से नहीं गया था और दूसरे ऐसे मौके पर रुपए पैसे की बात अच्छी नहीं लगती. हर चीज़ से बड़ी बात हमारे लिए यह थी कि सही सलामत हल्द्वानी पहुंच गए थे. मतलब कि फ़िलहाल दुनिया में कुछ दिन और दाना-पानी बाक़ी बचा था.

गाड़ी बेचारी जो थी हमारी वह दिल की मरीज़ निकली. पूना में गाड़ी बिना इस्तेमाल किए लम्बे अर्से से खड़ी थी जिसकी वजह से उसका तेल टैंक अंदर से जंग खा गया था. नासिक के बाद उसी जंग के ज़र्रे आ आकर तेल के पाइप में फंसते रहे और गाड़ी लकवाग्रस्त होती रही. गाड़ी को किसी हार्ट स्पेशलिस्ट की ज़रूरत थी जबकि इलाज जनरल फ़िजीशियन करते रहे. ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज़ बढ़ता गया. हमारी व्यथा जो कि अब कथा हो चुकी, को वही बेहतर समझ सकता है जिसने कभी सरकारी अस्पतालों में किसी गम्भीर रोग का इलाज करवाया हो और दुर्घटनावश ज़िन्दा रह गया हो.

चौबे जी गाड़ी की अगवानी के लिए अल्मोड़ा पहुंचे हुए थे. केशव को गाड़ी समेत उनके हवाले करके रज्जन बाबू और मैं वहीं पर उतर गए. गाड़ी केशव और चौबेजी खैरियत से उसी रात बागेश्वर पहुंच गए.

बाद में कई बार उस गाड़ी में सफ़र करने का मौका मिला तो अकसर पुराने सफ़र की यादें ताज़ा हुईं - मतलब कि गाड़ी अलग-अलग कारणों से ठप्प हुई. गाड़ी अभी चालू हालत में है और बागेश्वर शहर में टहलती हुई देखी जा सकती है. हां ज़ुकाम-बुख़ार जैसी छोटी-मोटी शिकायतें उसे आए दिन होती ही रहती हैं. दुआ करनी चाहिए कि उसे अच्छी सेहत और लम्बी उम्र मिले.

आमीन!

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'गोरिया कर के सिंगार' ... और... 'जोगीड़ा सारा रारा ...'


यह होली गीत या फगुआ भोजपुरी इलाके में कई रूपों में ( कुछ शब्दों के हेरफेर के साथ ) मिलता है लेकिन इसमें उल्लास और मस्ती सब जगह एक जैसी ही पाई जाती है. आज होलिका दहन या सम्मत (सम्मथ बाबा ) जलाने की बारी है. बचपन में हमलोग लौकार (मशाल ) बनाकर उसे भाँजते हुए इस जुलूस में शामिल होते थे- गोइंठा (उपले ) और उबटन की उतरन के साथ. हाँ , तब हम लोग होली पर पटाखे छोड़ते -फोड़ते थे दीवाली पर नहीं. यह सब स्मॄतियों के गलियारे में उतरने का उपक्रम है और विस्तार से लिखे जाने की माँग करता है. अभी तो अबीर - गुलाल वाली होली और जोगीड़ा सारा रारा का मौसम है सो कोई सीरियस बात नहीं बस मस्ती और मस्ती...

अभी आप जो कुछ भी सुनने जा रहे हैं उसमें मेरा कुछ नहीं है , यह लोक की थाती है - शताब्दियों से चली आ रही जिसके एक अणु मात्र से भी छोटे हिस्से के रूप में खुद को संबद्ध देखकर इतराने का मन करता है. ब्लाग पर तरह- तरह की दुनियायें खुली हैं - खुल रही हैं जो संगीत को सधे तरीके से प्रस्तुत करने के पुण्य कर्म में लगी हुई है.इन्ही में से एक ठिकाना है - 'इंडियन रागा' . यह गीत और चित्र वहीं से आभार सहित !



कबाड़ियों का हालचाल ठीक है.
आप बने रहें.
जी रौं लाख बरीस.
सदा आनंदा रहें यहि द्वारे .
होली पर बधाई - शुभम !

सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: पांचवां हिस्सा



सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: पांचवां हिस्सा

-शम्भू राणा

उस दिन का सफ़र घंटों तक धूल और गड्ढोंभरी सड़क में किया. धूल की वजह से शीशे चढ़े ही रहे. गाड़ियों की रफ़्तार बैलगाड़ियों जितनी होकर रह गई.. मुश्किल से कई घंटों बाद पक्की सड़क के दर्शन हुए. गाड़ी ने ज़्यादा तंग नहीं किया, ठीकठाक चलती रही. दिन के एक-डेढ़ बजे किसी जगह खाने के लिए रुके. वह मध्य प्रदेश का कोई शहर या कस्बा था. किसी अच्छे से मोटर मैकेनिक के बारे में पूछने पर पता चला कि आगे फ़लां जगह पर एक पीटर भाई है. हमें उसी रास्ते होकर जाना था.एकाध घन्टे बाद पीटर भाई के पास पहुंच गए. दो-एक घन्टे पीटर भाई गाड़ी की मरम्मत करते रहे. रज्जन बाबू और मैं चाय पीते रहे. हमने वहीं से १०० ग्राम प्याज़ का बीज भी ख़रीदा, जो कि नासिक का बताया गया. हो सकता है हो, पर उसने अल्मोड़ा में अंकुर नहीं दिए. पीटर भाई ने बकौल उनके गाड़ी एकदम फ़िट बना दी थी. उन्होंने बताया कि आगे एक जगह पर उनके भाई का गैराज है, आप फ़ोन नम्बर नोट कर लें. वैसे कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी लेकिन फिर भी.

चले तो केशव ने कहा कि हां अब ठीक है, गाड़ी पहले से ठीक चल रही है. स्टेयरिंग भी एकदम हल्का हो गया है. पीटर भाई हमें जानकार आदमी लगे और भले भी. शायद उन्होंने हमें ठगा भी नहीं. मोटर ठीक चलती रही. मैंने डैशबोर्ड पर बैठे गणेशजी से दोस्ती गांठनी शुरू कर दी कि हे दुनिया के पहले स्टेनोग्राफ़र, बाधाए हरो, सफ़र को स्मूथली चलने दो. क्यों हमारी कुकुरगत्त करवा रहे हो. पता नहीं उन्होंने सुना नहीं, मूड में नहीं थे या बात उनके बस के बाहर की थी कि गाड़ी को फिर ज़ुकाम की शिकायत होने लगी. दो-एक जगह चल के रुकी, मगर आख़िरकार एक पुल के ऊपर रुक गई. धकेल कर उसे पुल पार करवाया, किनारे खड़ी की. अब इससे ज़्यादा भद्दा मज़ाक परिस्थिति किसी के साथ और क्या करेगी कि आप पुल के ऊपर ठप्प पड़ी मोटर के साथ हैं और नीचे जो नदी बह रही है उसका नाम घोड़ा पछाड़ नदी है.

पीटर भाई का भाई कहीं व्यस्त था और देर में आने को कह रहा था. एकाध किलोमीटर की दूरी पर एक अनजान सी बस्ती नज़र आ रही थी. वहां एक मैकेनिक मिल गया - राजू मैकेनिक. गाड़ी वहां पहुंचाई गई. आगरा पहुंचने का सपना धरा रह गया. रात वहीं गुज़री. रज्जन बाबू और मैं किसी सस्ते से होटल या धर्मशाला की तलाश में निकले. एक धर्मशाला का कमरा पसन्द कर लिया गया. वह जगह, अगर ठीक याद कर पा रहा हूं तो शायद पचौर कहलाती थी. पचौर से मुझे अपने एक मित्र पचौलिया की याद आई थी, याद है.

सुबह को फिर चले. केशव ने पैंट-कमीज़ त्याग कर ठेठ लफ़ंगों का सा वेश धारण कर लिया - घुटनों से ज़रा ऊपर तक का कच्छा और बंडी. गर्मी काफ़ी थी और बार-बार गाड़ी को प्राथमिक उपचार देने में कपड़े काले भी हो रहे थे. दिन भर चलते रहे. उस दिन गाड़ी ने ज़्यादा परेशान नहीं किया. जहां भी गाड़ी रुकी, तेल का पाइप चूसते ही चल पड़ी. मैकेनिक की शक्ल नहीं देखनी पड़ी. ग्वालियर होते हुए शाम को आगरा पहुंचे. किसी सस्ते से होटल की तलाश में घूम रहे थे कि एक होतल के बाहर गाड़ी रुक गई. तेल चूसने वाला फ़ॉर्मूला नाकाम रहा. गाड़ी ने ज़िद्दी बच्चों की तर्ह पैर पटक दिए कि नहीं, इसी होटल में रहना है. ज़िद के आगे हार माननी पड़ी और उसी समय पता चला कि एक टायर भी पंक्चर हो गया है. पूरे सफ़र में पंक्चर होने की एकमात्र घटना थी.

होटल के बाहर हम गाड़ी में खचर-बचर कर रहे थे तो काफ़ी देर से बारह-चौदह साल का एक बच्चा साइकिल के सहारे टिक कर हमें देखे जा रहा था. हमने सोचा बच्चा है, यूं ही देख रहा है, पर वह मोटर मैकेनिक निकला. फिर गाड़ी उसी ने ठीक की. मैकेनिक की शक्ल देखे बिना दिन नहीं बीतना था सो नहीं बीता.

गाड़ी ठीक होने में काफ़ी समय लगा. जिस होटल के बाहर गाड़ी रुकी थी, वहीं एक कमरा ले लिया गया. सबसे सस्ता कमरा लिया और रूखा-सूखा खाया. फिर भी खाने का बिल कमरे के किराये से ज़्यादा आया. पैसे जो हमारे पास थे, वे तेज़ी से बिला रहे थे. हर दस-पन्द्रह किलोमीटर पर एक मैकेनिक हमारे ही वास्ते तो दुकान खोले बैठा था. गाड़ी जो हमारे पास थी, उसका दिल कब किस मैकेनिक पर आ जाए, कहना मुश्किल था. अभी काफ़ी लम्बा सफ़र बाक़ी था. कम से कम हल्द्वानी जब तक न पहुंच जाएं, घर पहुंचने का अहसास कैसे हो! रज्जन बाबू के एटीएम कार्ड का भरोसा था जिसमें पैसे नहीं थे. मगर भरोसा था, फ़ोन करके किसी से खाते में पैसे डलवाए जा सकते थे.

पहले से ही तय था कि ताजमहल देखेंगे. आगरा जाने पर ताजमहल देखने का एक रिवाज़ सा है. हम तीनों में से किसी ने भी पहले ताजमहल नहीं देखा था. मुखे व्यक्तिगत तौर पर ताज के लिए बहुत उत्सुकता नहीं थी. फ़िल्मों और तस्वीरों में देखा ही था. लड़कियां धागे से ताजमहल बुनती ही रहती हैं. ताजमहल मतलब सफ़ेद संगमरमर से बनी एक भव्य कब्र जिसे एक मुग़ल बादशाह ने अपनी बेग़म की याद में तामीर कराया था. इसके अलावा और क्या? देखा तो ठीक, न देखा तो भी ठीक. मगर जब ताजमहल एकाएक सामने आया तो मैंने अपनी राय चुपके से बेहद शर्मिन्दगी और माफ़ी के साथ वापस ले ली. ताज के सामने खड़े हो कर पल भर को मेरी घिग्घी सी बंध गई. मुझे नहीं लगता कि ताजमहल के बारे में मैं अपनी भावनाएं ठीक-ठाक व्यक्त कर पाऊंगा. ताज बस देखने से ताल्लुक रखता है.

खयाल आया कि प्रेम का प्रतीक यह इमारत बादशाह के ख़ौफ़ या उसके प्रति वफ़ादारी के बिना ऐसी बन पाती जैसी कि बनी? दुनिया के सारे ही आश्चर्य शायद इसी भय और वफ़ादारी के गारे से चिने गए हैं. दूर मत जाइए, अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई इमारतों को देख लीजिए. मान लीजिए आज कोई ठेकेदार वैसा ठोस काम करना चाहे तो क्या विधायक, साम्सद, छुटभय्ये नेता और इंजीनियर साहेबान उसकी हौसलाअफ़ज़ाई करेंगे? माफ़ कीजिए चौथे स्तम्भ का नाम तो छूट ही गया. सुना है कि वह भी कमीसनखोरी पर उतर आया है. इन महानुभावों की अपनी इमारतें जितनी भव्य और ठोस होती हैं. इनके द्वारा करवाया गया सरकारी काम उतना ही घटिया और क्षणभंगुर होता है. क्योंकि भय किसी का जै नहीं और ईमानदारी, नैतिकता, वफ़ादारी नाम की चीज़ें हनीमून अलबम की तरह न जाने कहां, किस अलमारी में पड़ी हैं, याद नहीं.

याद आया कि बिल क्लिन्टन ने ताजमहल को देख कर कहा था कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं - एक जिन्होंने ताजमहल देखा है, दूसरे जिन्होंने इसे नहीं देखा. दोमुंहा शायर 'साहिर' कहता है - एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल हम ग़रीबों का उड़ाया है मज़ाक और बनवा के हसीं ताजमहल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है. न जाने किस ने ताज को मोहब्बत के रुख़सार पर अटका हुआ आंसू कहा है. हमने ताजमहल के सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचवाई और बाहर निकल आए. शहर की भीड़भाड़ से बाहर निकलकर एक जगह रुक कर चाय पी और पंक्चर टायर ठीक कराया. इरादा आज शाम तक हल्द्वानी पहुंचने का था. पर गाड़ी का क्या इरादा था, किसे पता. इंसान की आंखें और चेहरा देखकर काफ़ी हद तक उसके इरादे का पता चल जाता है. मगर मोटरकार का न चेहरा, न आंखें. लगभग साढ़े नौ-दस बजे का समय, धूप में गर्मी आने लगी थी. आगरा से आगे का सफ़र शुरू हुआ. केशव का पारा बीच-बीच में चढ़ रहा था इसलिए मैंने उस के साथ बैठना शुरू किया. फिर मैंने गणेशजी को फुसलाना शुरू किया. गाड़ी ठीकठाक चल रही थी. कैसेट प्लेयर में गाने चल रहे थे. कैसेट हमारे पास दो ही थीं और गाने हमें लगभग याद हो गए थे. अचानक मेरा ध्यान एक चीज़ की तरफ़ गया - केशव ब्रेक को पम्प करने की तरह दबा और छोड़ रहा था. गाड़ी फ़र्राटे से भागी जा रही थी. बात समझ में नहीं आई. मैंने घबरा के पूछा क्या हुआ? केशव ने लापरवाही से जवाब दिया - कुछ नहीं. मैंने मान लिया. पीछे बैठे रज्जन बाबू को कुछ भी पता नहीं चल पाया. बाद में पता चला कि उस वक्त थोड़ी देर के लिए ब्रेक ने काम करना बन्द कर दिया था.

(अगकी किस्त में समाप्य)

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Monday, March 9, 2009

सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: चौथा हिस्सा

सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: चौथा हिस्सा

-शम्भू राणा



रज्जन बाबू और मैं वहीं बैठे रह गए. एक टहनीनुमा जो पेड़ था, उसकी छाया के साथ-साथ सरकते रहे और ट्रकों में लदा लाखों-करोड़ों का माल-असबाब इधर से उधर होते देखते रहे. दूर जो ढाबा था वह मुझे बार-बार इशारा कर रहा था. हमारे पास २४-२५ साल का एक नौजवान हाथ में नुकीला हंसिया लिए आन बैठा. वह बताने लगा कि हमारा गांव उस तरफ़ है ऊपर वहां. वह घर में कपड़े सीने का काम करता था. शादी उसकी अभी नहीं हुई थी. घास काटने आया था. नाम उसने कुछ बताया था अपना. बताने लगा कि हमारे बाबा जब कोई मोटर इसी तरह ख़राब हो जाती थी तो रात भर उसकी रखवाली करते थे, सौ-पचास रुपये लेते थे. काफ़ी देर हम उससे बतियाते रहे - खेती-बाड़ी, गाय-भैंस, न जाने क्या-क्या. ढाबे का बुलावा अनसुना करना अब मुमकिन नहीं रह गया था. मजबूरन गाड़ी बन्द की और जाकर चाय पी आए.

दो-ढाई घन्टे बीत चुके थे केशव को गए. हमें फ़िक्र होने लगी. फ़ोन किया तो पता चला मैकेनिक मिल गया है, आ रहे हैं. धीरे-धीरे शाम घिरने लगी, अंधेरा गाढ़ा होता जा रहा था. मोटर गाड़ियों ने बत्तियां जला ली थीं. केशव जिधर गया था उस ओर से आने वाली हर गाड़ी को हम बड़ी उम्मीद से देख रहे थे. बड़ी देर बाद एक मारुति वैन हमारे पास आकर रुकी जिसमें से केशव और दो मैकेनिक बाहर निकले. मैकेनिकों ने पहले वैन के अन्दर ही रोज़ा खोला. गाड़ी को देखकर उन्होंने बीमारी बताई कि इसका फ़लां पुर्ज़ा जल गया है और पंखे में गड़बड़ी है. पुर्ज़ा हम बदल देते हैं, पंखे को सीधा बैटरी से जोड़ देते हैं. जब रुके तो इसे डिसकनेक्ट कर दें. बाकी सब खैरियत है. वैसे हम दुकान से बाहर जाते नहीं मगर आप परदेसी आदमी हैं ... रोग की पहचान और निदान में एक डेढ़ घन्टा और बीत गया. सात-आठ सौ रुपयों का बिल बना. आशीर्वादनुमा आश्वासन मिला कि भाईसाहब जहां तक मर्ज़ी हो जाएं, कोई दिक्कत नहीं होगी. यकीन न हो तो हम साथ चलें.

पांच-छः घन्टों के बाद फिर चल पड़े. अब सामना था गड्ढों भरी सड़क, दनदनाते फिरते ट्रकों और धुंध की तरह छाई धूल से. यह सब दिन में भी था मगर रात में ज़्यादा डरावना और परेशानी पैदा करने वाला होता है. ज़्यादातर ट्रकवाले सिर्फ़ एक हैडलाइट जला कर क्यों चल रहे थे न जाने! कन्डक्टर की तरफ़ वाली हैडलाइट जली होने और धूल की वजह से दूर से भारी-भरकम ट्रक किसी दुपहिये का धोखा दे रहा था -मतलब कि भिड़ंत की पूरी संभावना और उस पर तुर्रा ये कि सामने वाले की आंखें चुंधियाने से बचाने के लिए जो ज़रा रोशनी हल्की करने का नियम है उसका मानो किसी को पता ही नहीं. न चाहने के बावजूद जब भी रात का सफ़र करना पड़ा, एक दो ने ही इस नियम का पालन किया, बाकी के सब समरथ को नहिं दोष गुसांईं माननेवाले थे.

दर्ज़न भर पहियों वाले ट्रकों की रेलमपेल में मारुति ८०० कार की औकात हाथियों की भगदड़ में फंसे मॆंढक जितनी ही समझिये. ऐसे में अगर वह मेंढक सही सलामत अपने बिल में पहुंच जाए तो कहने वाले इसे भाग्य या संयोग कहेंगे, मैं बेहयाई कहना चाहूंगा. हम भी हयादार कहां थे.

दो-एक घंटे चलने के बाद तय हुआ कि अब और चलना ठीक नहीं गाड़ी एकाध बार संकेत भी दे चुकी थी कि तबीयत उसकी बहुत अच्छी नहीं. आगे न जाने कैसी जगह हो, कहां फंस जाएं. कहीं पर ठीकठाक सी जगह देख कर रुक लिया जाए. एक कस्बेनुमा जगह में वह रात बीती. उस जगह का नाम हम तीनों में से किसी को याद नहीं. हां गेस्टहाउस का नाम ज़रूर याद है क्योंकि जब बागेश्वर केशव के पास जाना हुआ, कई बार उसी नाम के गेस्टहाउस में रुके - नीलकंठ गेस्ट हाउस. जैसा कि पहले बताया वह दशहरे यानी त्यौहार मतलब छुट्टी का दिन था. शायद इसीलिए गेस्टहाउस वीरान पड़ा था. मात्र एक आदमी बैरा, मैनेजर, गाइड, स्वच्छक वगैरग के रोल निभा रहा था. वह नौजवान इस कदर सीधा/ उल्लू का पट्ठानुमा था कि लगता था बाकी स्टाफ़ ने त्यौहार के दिन ड्यूटी करने के लिए उसे बलि का बकरा बनाया गया होगा.

रज्जन बाबू के साथ जाकर वह बाहर से खाना पैक करा लाया. हमने कहा कि भय्याजी कमरे में केबिल तो है पर टीवी नहीं, तो वह जाकर टीवी उठा लाया. स्टार मूवीज़ में टाइटैनिक फ़िल्म चल रही थी. रज्जन बाबू ने बताया कि जब वे लोग खाना लाने बाहर गए तो भय्याजी ने कहा कि भय्याजी आपको दशहरे की बधाई. आपने घर फ़ोन करके बधाई कह दिया होगा. रज्जन बाबू ने उसका दिल रखने को कह दिया कि हां मैंने सुबह ही फ़ोन कर दिया था. उस आदमी का बोलना कुछ ऐसा था जैसे गुनाह करके माफ़ी मांगने आया हो. सोने से पहले हमने उससे कहा कि भय्याजी सुबह को जल्दी जगा देना और चाय पिलवा देना.

सुबह पांचेक बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई. मैंने उठकर दरवाज़ा खोला, भय्याजी चाय लाने चले गए. क़रीब दस मिनट बाद भय्याजी तम्बाकू की पिण्डी की तरह सुतली से बंधी तीन पुड़िया ले कर आए कि लीजिये भय्याजी नाश्ता कर लीजिये. पूड़ा लाया हूं, ताज़ा बन रहा था. पांच रुपये का एक है. मैंने तीनो पूड़े बैग में रख लिए ताकि उसे बुरा न लगे. इतनी सुबह कुछ भी खाने का मतलब ही नहीं था. पांचेक मिनट बाद भय्याजी फिर आकर बोले कि नाश्ता कर लिया? चाय वाले को मैंने बाहर बिठा रखा है ताकि आप आराम से नाश्ता कर लें. उसकी भलमनसाहत के कारण चाय थोड़ा ठण्डी हो गई थी. चलते वक़्त उन्होंने हमें फिर कभी ज़रूर आने को कहकर विदा किया.

(अगकी किस्त में जारी है)

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सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: तीसरा हिस्सा

सफ़रनामा पूना से मारुति ८०० कार बागेश्वर पहुंचाने का: तीसरा हिस्सा

-शम्भू राणा



मेडिकल कॉलेज के अन्दर गाड़ी ले जाने की इजाज़त बाआसानी मिल गई. बाबूजी आफ़िस जाकर पूछ आए कि इस नाम का जवान इधर किधर मिलेगा. हमारा दामाद है. बताया गया फ़लां ब्लॉक में. एक-डेढ़ घन्टे पूरे परिसर में गाड़ी घूमती रही पर बाबूजी के बेटी-दामाद मिलकर नहीं दिए. रज्जन बाबू ने निराश होकर कह दिया कि छोड़ो यार चलो, काफ़ी कोशिश कर ली. अब कोई अफ़सोस नहीं. गाड़ी का भी काम करवाना है, आगे भी बहुत दूर जाना है. बाबूजी बोले - "आए हैं तो मिलकर जाएंगे. ढूंढेंगे, कैसे नहीं मिलेगा, खोद कर निकालेंगे. हम भी एक्स आर्मी मैन हैं. ऑफ़िस चलो, रिक्वेस्ट करेंगे कि हमें एक जवान दो." सचमुच वहां से एक जवान मिला जो स्कूटर में बैठ कर हमें रास्ता दिखाता हुआ चला और ऐन दरवाज़े पर छोड़ गया.

मुलाकात बेहद छोटी रही. सिर्फ़ चाय भर पी सके. शुरू में ही जवान मिल जाता तो एकाध घन्टा बैठ सकते थे. मगर मजबूरी थी. बाद में कहीं रज्जन बाबू की बहन का फ़ोन आया कि ददा, तू सचमुच आया था या मैंने सपना देखा!

गाड़ी गैराज ले जाई गई. वहां हमें एक नौजवान मैकेनिक मिला जो काठगोदाम का रहनेवाला था. उस बेचारे को साल-डेढ़ साल के अन्दर कई काम करने थे. आई टी आई करनी थी, अंग्रेज़ी सीखनी थी और फिर ऑस्ट्रेलिया जाना था. दूसरे मैकेनिकों के साथ उसने भी गाड़ी पर हाथ आज़माए और कहा कि यूं तो गाड़ी एकदम फ़िट है मगर ५०-६० किलोमीटर पर इसे आराम देते हुए जाना. दिक्कत की कोई बात नहीं. वह मैकेनिक हमारे मेज़बानों का अच्छा परिचित था. गाड़ी की जो सर्विसिंग अभी हाल में हुई थी, उसका गवाह था. दो एक घन्टे गैराज में गुज़र गए.

लगभग एक-डेढ़ बजे बाबूजी और उनके बेटाजी मोहनदा से वहीं विदा ली. सास-बहू से सुबह घर पर ही विदा ले ली थी. हमें नासिक पहुंचना था. शहर से निकलकर जब शहर के मुकाबले कम भीड़ वाली सड़क पर आए तो पता चला कि गाड़ी का तो पिक अप ही ठीक नहीं. ऐसे में या तो कछुए की रफ़्तार से चलो या पास लेने की कोशिश में सामने वाले से जा भिड़ो. क्या कर सकते थे, चलते रहे. दोएक घन्टे बाद गाड़ी रवां हो गई. पिक अप ठीकठाक हो गया. जहां ज़रूरत हुई, वहां सौ की रफ़्तार से भी दौड़ी. गाड़ी हमारे मेज़बानों ने किसी फ़ौजी से खरीदी थी. शीशे में अभी भी बाईं तरफ़ आर्मी ही लिखा हुआ था. काफ़ी समय से पार्किंग में खड़ी थी. दौड़ना तो क्या उसकी चहलकदमी की आदत तक छूट चुकी थी. ऐसे में पिक अप की दिक्कत तो शुरू में होनी ही थी.

चारों ओर पहाड़, हरियाली और बीच-बीच में घुमावदार सड़क देखकर हमें हैरानी हुई. रास्ता एकदम अपरिचित सा नहीं लगा. पहाड़ में ही कहीं होने का अहसास होता रहा. हां पहाड़ वहां के हमारे पहाड़ों की तरह नुकीली चोटियों वाले नहीं सरकटे हैं - रेत का पहाड़ बनाकर उसका ऊपरी हिस्सा हथेली से थपथपा दीजिये. हमारे पहाड़ों को दूर से देखकर लगता है कि उनकी चोटी पर खटिया नहीं बिछाई जा सकती जबकि इन पहाड़ों की चोटियों को देखकर लगता है कि वहां फ़ुटबॉल खेली जा सकती है.

रात आठ-नौ बजे के करीब नासिक पहुंचे. बहुत देर तक किसी सस्ते होटल की तलाश करते रहे. बमुश्किल एक तथाकथित सस्ता होटल मिला. नहाया-धोया, खाया और तीनों चित्त. दूसरे दिन पांच बजे तड़के चले. अभी ठीक से उजाला भी नहीं हुआ था, हल्की ठंड महसूस हो रही थी. गाड़ी में तेल कम था पर अभी न तो कोई पेट्रोल पम्प खुला था न चाय का कोई ढाबा. एक पम्प के ऑफ़िस का दरवाज़ा खुला देखकर वहां रुके, भीतर दो-एक लोग सोए पड़े थे. आवाज़ देकर उन्हें जगाया तो उन्होंने हमें देखकर करवट बदल ली. यकीनन गाली भी दी होगी. होटल में उतनी सुबह चाय की सुविधा नहीं थी. चाय की बड़ी तलब लगी थी, खासकर रज्जन बाबू को और मुझे. डेढ़-दो घन्टे चलने के बाद एक चाय की दुकान नज़र आई. दुकानदार ने पूछा चाय चालू या स्पेशल? हम तीनों ने एक दूसरे की सूरत देखी और स्पेशल चाय बनवाई. उस समय तलब लगी थी इसलिए ठीक ही लगी. वर्ना चालू और स्पेशल का तज़र्बा हमें पूना और नासिक के बीच हो चुका था. तब हमने सोचा था कि अगर स्पेशल ऐसी है तो साली चालू कैसी होगी! तज़र्बे के तौर पर एकाध जगह हमने चालू चाय भी पी. दुकान में कोई कैसेट बज रहा था. ताबड़तोड़ शोरनुमा 'संगीत' के साथ गाने वाला न जाने क्या अलाय-बलाय गाए जा रहा था जिसे सुनकर हमें हंसी आ गई. पूर्वाग्रह रहित बिल्कुल स्वाभाविक हंसी. दुकानदार हमें घूरने लगा तो एकाएक हमारी समझ में आया कि हम गलत हंस रहे हैं. सुबह का समय है, शायद कोई भजन हो - रॉक और पॉप स्टाइल में. माता के आगे क्या है, पीछे क्या है जब हिन्दी में हो सकता है तो दूसरी भाषाओं में क्यों नहीं?

केशव का अनुमान था कि आज शाम तक हम आगरा पहुंच सकते हैं. ठीक है भय्ये, चल आगरा पहुंचा, अच्छा हो हमें अल्मोड़ा पहुंचा दे. तेरी मर्ज़ी. गाड़ी सिर्फ़ तुझे चलानी है. हम दोनों तो सिर्फ़ भार हैं गाड़ी में. हम से अगर अचानक पूछा जाए कि फ़ोर-व्हीलर में कितने टायर होते हैं तो हम घबरा के तीन-या पांच कह देंगे. कंडक्टर होने के लिए रूट की जानकारी होना ज़रूरी है वर्ना टिकट कैसे कटेगा. हम तो सिर्फ़ क्लीनर हो सकते हैं. हीरो तुझे बनना है कि पूना से गाड़ी चलाकर बागेश्वर पहुंचा हूं. हमारी तो स्थिति अपाहिजों सी है. स्लामत पहुंचे तो तेरी वजह से और नहीं पहुंच पाए तो भी तेरे कारण.

गाड़ी बढ़िया चल रही थी और माइलेज भी अच्छा दे रही थी. चलते रहे. जगह-जगह लोग मंदिर को आते-जाते, शोभायात्रा, झांकियां निकालते और अबीर-गुलाल से सूखी होली खेलते नज़र आए. दो तीन घन्टे बाद फिर चाय की तलब ने ज़ोर मारा. दुकानों में चाय के लिए पूछने पर जवाब मिला कि चाय नहीं है, आज छोकरा लोगों का छुट्टी है. उस दिन दशहरा था. फिर आगे एक जगह चाय मिली. चाय पी और ढेर सारा सामान ख़रीदा. जूस, मठ्ठा, रेज़र. सर ठंडा करने के लिए तेल और ऐसी ही न जाने क्या-क्या चीज़ें. उस दिन दोपहर का खाना खाया या नहीं, याद नहीं. काफ़ी आगे चलकर सड़क में एकाएक हल्की सी चढ़ाई शुरू हुई.वहीं एक जगह मंदिर में दशहरे का मेला लगा था. सड़क के किनारे लगी दुकानों में गांव-देहात की महिलाएं व बच्चे खरीदारी कर रहे थे, खा-पी रहे थे. मंदिर किसी देवी का था और देवी का नाम किसी भूतनी से मिलता-जुलता सा था, याद नहीं रह गया.

सफ़र अच्छा चल रहा था. जिसे कहते हैं सुहावना. कैसेट प्लेयर में गाने बज रहे थे. आपस में हंसी- मज़ाक, रज्जन बाबू बीच-बीच में पीछे की सीट पर झपकी ले लेते थे. तीनों जनों की आपस में अच्छी पुरानी ट्यूनिंग ... आदमी की औकात लम्बे सफ़र में और नशे में एक हद के बाद उभर कर सामने आती है. जैसा वह वास्तव में होता है - एक तरह का नरको-एनालिसिस. दोपहर डेढ़-दो बजे का समय था, फ़र्राटे से भागती गाड़ी एकाएक खंखार कर रुक गई. गाड़ी सड़क से उतार कर कच्चे में खड़ी की. लगा कि शायद गरम होने से बन्द हो गई. काफ़ी देर बोनट खोलकर इन्तज़ार करते रहे फिर केशव ने अपनी सीमित जानकारी के मुताबिक कुछ खचर-बचर की. कोई नतीज़ा नहीं. वीरान सा इलाका. ट्रक वालों का जो ढाबा मृगतृष्णा सा पास नज़र तो आ रहा , एक सवा किलोमीटर पीछे रह गया था. गाड़ी को हल्की ढलान के बावजूद ढाबे तक ले जा पाना मुमकिन न था. गाड़ी को धकेलते हुए सड़क क्रॉस करते हुए सेकेंड के हज़ारवें हिस्से में हमारी चटनी बन सकती थी या ट्रक पलट सकता था. इत्तेफ़ाक़न वहीं पर सड़क में मोड़ था, जिसके उस पार कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था जिस कारण दुर्घटना की संभावना और भी ज़्यादा थी. थक हार कर ढाबे में जाकर पूछा तो पता चला कि जिधर से हम आ रहे हैं उसी तरफ़ कुछ किलोमीटर पर मैकेनिक मिलेगा. केशव ने बिना बॉडी वाले एक दैत्याकार ट्रक में लिफ़्ट ली और मैकेनिक बुलाने चला गया.

(अगकी किस्त में जारी है)

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