Thursday, December 18, 2008

दफ़न का स्थान आरक्षित कर रखा था ज़फ़र ने

'१८५७ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी और बहादुरशाह ज़फ़र' पुस्तक का जिक्र मैंने ब्लॉग 'आज़ाद लब' में पिछले दिनों किया था, उसकी भूमिका है यह. पुस्तक के संकलनकर्ता और संयोजक डॉक्टर विद्यासागर आनंद ने यह भूमिका लिखी है. आपकी प्रतिक्रिया हमारे इस ब्लॉग पर उत्साहवर्द्धक रही है. इसी भूमिका की यह दूसरी कड़ी है- विजयशंकर चतुर्वेदी)



पिछली कड़ी से आगे...

...स्वतंत्रता-दीप प्रज्ज्वलित रखने के लिए राष्ट्र को संगठित व अनुशासित रखना आवश्यक था अतः देश के राजनैतिक व धार्मिक पथ-प्रदर्शकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आन्दोलन को भारत के कोने-कोने तक फैला दिया. इनमें कुछेक तो भारत से बाहर के अन्य देशों तक चले गए तथा वहाँ स्वतंत्रता-आन्दोलन को सुदृढ़ बनाने हेतु सहायता प्राप्त करने के प्रयत्न किए.

इस लंबे स्वतंत्रता-आन्दोलन का उद्देश्य अंततः नब्बे वर्ष बाद १५ अगस्त १९४७ को तब जाकर प्राप्त हुआ, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहादुरशाह ज़फ़र के पूर्वजों के लाल क़िले से स्वतन्त्र भारत की घोषणा की. उस ऐतिहासिक दिवस से अब तक साठ वर्ष का (भूमिका लिखे जाते समय) समय बीत चुका है लेकिन खेद की बात है कि इस बीच भारत के राजनेताओं ने इस स्वतंत्रता-संग्राम में देश के बाहर व भीतर शहीद होने वाले जियालों के सम्मान को बढ़ावा देने में ढिलाई बरती और उन्हें वह स्थान नहीं दिया जिसके वे अधिकारी थे.

यहाँ अधिक अफ़सोस की बात यह है कि स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ज़फ़र के अवशेष भारत लाने का समर्थन किया था पर नामालूम कारणों से इस दिशा में कोई क़दम नहीं उठाया गया. १ से ७ अक्टूबर के साप्ताहिक 'हमारी ज़बान' नई दिल्ली में इस विषय पर पंडित नेहरू का एक नोट प्रकाशित हुआ जिसके अनुसार उन्होंने तत्कालीन गृह मंत्री पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त को लिखा था:-
"मौलाना साहब (आशय मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से है) की राय है कि बहादुरशाह ज़फ़र की लाश को रंगून से लाकर हुमायूं के मक़बरे में दफ़नाया जाए क्योंकि स्वयं उनकी भी अन्तिम इच्छा यही थी. मैं इस विषय में अपनी कैबिनेट के कुछ मंत्रियों से बात कर चुका हूँ और उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है."

नेहरू जी ने इसी नोट में आगे लिखा:-

"संभवतः बर्मा सरकार को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी. मैं इस सुझाव के विषय में आपकी प्रतिक्रया जानना चाहता हूँ, तत्पश्चात् हम इस मामले की और अधिक तफ़्तीश कर सकते हैं."

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहादुरशाह ज़फ़र की अन्तिम इच्छा का उल्लेख करते हुए हुमायूं के मक़बरे में दफ़न होने की इच्छा बताई है जो किसी भ्रम के कारण है वरना तथ्य यह है कि ज़फ़र ने अपने दफ़न के लिए क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के निकट ही अपने पूर्वजों के पहलू में अपने लिए एक स्थान आरक्षित किया हुआ था. मिर्ज़ा फ़रहतुल्ला बेग अपने बहुचर्चित लेख 'फूल वालों की सैर' (सन् १९३४) में लिखते हैं:-

'देहली के बादशाहों ने आप (हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी) के मज़ार के चारों ओर संगमरमर की जालियाँ, फर्श और दरवाज़े बनवा दिए. दीवारों पर काशानी ईंटों का काम करवाया तथा आसपास मस्जिदें अदि बनवाईं... एक ओर तो संगमरमर की छोटी मस्जिद है और उसके पहलू में अन्तिम समय के बादशाहों के कुछ मज़ार हैं. बीच में शाहआलम द्वितीय का मज़ार है और उसकी एक ओर अकबरशाह द्वितीय की क़ब्र का एक पहलू ख़ाली था, उसमें बहादुरशाह ज़फ़र ने अपना 'सरवाया' (सुरक्षित स्थान) रखा था. विचार था कि मरने के बाद बाप-दादा के पहलू में जा पड़ेंगे, यह क्या मालूम था कि वहाँ क़ब्र बनेगी, जहाँ पूर्वजों का पहलू तो दूर की बात, कोई फ़ातिहा पढ़ने वाला भी न होगा.' (मज़ामीन-ए-फ़रहत (द्वितीय) लेख 'बहादुरशाह ज़फ़र और फूल वालों की सैर', प्रकाशक सरफ़राज़ प्रेस लखनऊ, पृष्ठ ४२).

प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम के एक सौ पचास वर्षीय जश्न के अवसर पर बहादुरशाह ज़फ़र के लाल क़िले (जिसका प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम से निकट का सम्बन्ध रहा है) के समकालीन व्यवस्थापकों को इस विषय पर एक संदेश भेजा गया. इसके अतिरिक्त भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों और प्रवासी भारतीयों से भी हमने संपर्क साधा तथा बहादुरशाह ज़फ़र के अवशेष वापस अपने देश में लाने की मांग पर ध्यान देने का निवेदन किया. हमें इसकी ख़ुशी है कि अनेक लेखकों, शायरों, इतिहासकारों, पत्रकारों तथा बुद्धिजीवियों ने हमारे निवेदन को सहर्ष स्वीकारते हुए हमें अपनी रचनाएं भिजवायीं. इसके साथ ही उन्होंने हमारी इस मांग का समर्थन भी किया कि बहादुरशाह ज़फ़र के अवशेष विदेश से वापस अपने देश लाये जाएँ.


अगली कड़ी में जारी...

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