Thursday, September 9, 2010

अल रबवेह - भाग दो

(पिछली किस्त से जारी)

हम वास्तव में किस धरातल पर बात कर रहे होते हैं जब हम अपने प्यारों का ज़िक्र करते हैं जिनकी हाल में मृत्यु हुई हो या जिनका क़त्ल कर दिया गया हो? हमारे शब्द उस वर्तमान क्षण में गूंजते प्रतीत होते हैं जो उस से ज़्यादा वर्तमान होता है जिसमें हम आम तौर पर जी रहे होते हैं. इसकी तुलना उन क्षणों से की जा सकती है जब हम प्यार कर रहे होते हैं, या कोई ऐसा फ़ैसला लेने वाले होते हैं जिसे बदला नहीं जा सकता, या टन्गो नाच रहे होते हैं. यह अनन्त के उस धरातल पर नहीं होता जिसमें हमारे शोकाकुल शब्द गूंज रहे होते हैं; ऐसा हो सकता है कि वे उस धरातल के किसी छोटे गलियारे में हों.

***

अब ख़ाली हो चुकी पहाड़ी पर मैंने दरवेश की आवाज़ को याद करने की कोशिश की. उनके पास किसी मधुमक्खी पालने वाले की फुसफुसाहट थी:

पत्थर का एक सन्दूक
जिसके भीतर जीवित और मृतक सूखी मिट्टी में टहला करते हैं
जैसे छत्ते में गिरफ़्तार मधुमक्खियां
और जब फ़न्दा कसता जाता है
वे फूलों की भूख हड़ताल पर बैठ जाती हैं
और समुद्र से पूछती हैं आपातकालीन प्रस्थान का रास्ता.

(जारी)