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Wednesday, February 25, 2009

गुलज़ार की नज़्म जंगल और पेंटिंग


है सौंधी तुर्श सी खु़श्बू धुएं में,
अभी काटी है जंगल से,
किसी ने गीली सी लकड़ी जलायी है!
तुम्हारे जिस्म से सरसब्ज़ गीले पेड़ की
खु़श्बू निकलती है!
घनेरे काले जंगल में,
किसी दरिया की आहट सुन रहा हूं मैं,
कोई चुपचाप चोरी से निकल के जा रहा है!
कभी तुम नींद में करवट बदलती हो तो
बल पड़ता है दरिया में!

तुम्हारी आंख में परवाज दिखती है परिंदों की
तुम्हारे क़द से अक्सर आबशारों के हसीं क़द याद हैं!


(पेंटिंग ः रवीन्द्र व्यास)

Monday, October 6, 2008

गुलज़ार की नज्म दरिया और पेंटिंग



गुलज़ार
मुंह ही मुंह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता रहता है ये दरिया
छोटी छोटी ख्वा़हिशें हैं कुछ उसके दिल में-
रेत पर रेंगते रेंगते सारी उम्र कटी है,
पुल पर चढ़ के बहने की ख्वाहिश है दिल में!


जाड़ों में जब कोहरा उसके पूरे मुंह पर आ जाता है,
और हवा लहरा के उसका चेहरा पोंछ के जाती है-
ख्वाहिश है कि एक दफ़ तो
वह भी उसके साथ उड़े और
जंगल से गायब हो जाए!!
कभी कभी यूं भी होता है,
पुल से रेल गुजरती है तो बहता दरिया,
पल के पल बस रूक जाता है-
इतनी-सी उम्मीद लिए-
शायद फिर से देख सके वह, इक दिन उस
लड़की का चेहरा,
जिसने फूल और तुलसी उसको पूज के अपना वर मांगा था-
उस लड़की सूरत उसने,
अक्स उतारा था जब से, तह में रख ली थी!!
(पेंटिंग - रवीन्द्र व्यास)