Monday, March 7, 2011

सात रंगों वाली रस्सी और योबूएनाहूआबोश्का

उम्मीद करता हूँ आपको यह सीरीज पसंद आई होगी. आज इसका अंतिम हिस्सा.



इन्द्रधनुष

जंगल में रहने वाले बौनों ने योबूएनाहूआबोश्का को घात लगा कर फंसा कर उसका सिर काट डाला था.

लुढ़कता हुआ सिर वापस अपने घर कशीनहूआ पहुँच गया.

हालांकि इस सिर ने प्रसन्न रहते हुए लुढ़कना सीख लिया था, बग़ैर शरीर के इस जिंदा सिर की किसी को भी ज़रूरत नहीं थी.

"मां, मेरे भाइयो, मेरी बहनों, मेरे साथियो" उसने दुःख व्यक्त करते हुए कहा "तुम मुझे क्यों अस्वीकार कर रहे हो? क्या तुम मेरी वजह से शर्मसार हो."

इस पचड़े से परेशान मां ने सिर से छुटकारा पाने की नीयत से सुझाव दिया की वह अपने को किसी भी चीज़ में बदल ले. लेकिन जिद्दी सिर ऐसी किसी भी चीज़ में बदलने को तैयार नहीं था जिसका पहले से ही वजूद हो. सिर ने बहुत सोचा और इस बाबत सपने भी देखे. चन्द्रमा का अस्तित्व नहीं था. और इन्द्रधनुष का भी नहीं.

उसने सात रंगों के उन के सात गोलों की मांग की.

उसने निशाना साधा और एक के बाद एक गोलों को आकाश की तरफ उछल दिया. गोले बादलों के ऊपर टंगे रहे और उन के धागों ने धीरे-धीरे धरती पर उतरना शुरू किया.

धागों को थामे सिर ने ऊपर उठने से पहले चेतावनी दी - "जो भी मुझे नहीं पहचानेगा उसे सजा दी जायेगी. जब भी तुम मुझे आकाश में देखो तुम्हें कहना चाहिए - वो रहा वीर और सुन्दर योबूएनाहूआबोश्का."

अब उसने सातों धागों को लटों में गूंथ कर रस्सी बनाई और आसमान में चढ़ गया.

उस रात पहली बार सितारों के बीच बड़ा सा एक सफ़ेद धब्बा दिखना शुरू हुआ. एक लड़की ने आँखें उठा कर उसे देखा और पूछा - "वो क्या है?"

उसके ऐसा कहते ही एक बड़ा सा तोता कहीं से आ गया और उसने लड़की की टांगों के बीच काट लिया. तभी से जब-जब चन्द्रमा चाहता है स्त्रियों को रक्तस्राव होने लगता है.

अगली सुबह आसमान में सात रंगों वाली एक रस्सी नज़र आई.

एक आदमी ने अपनी ऊँगली उस तरफ करके कहा - देखो, देखो! कैसी अजीब चीज़ है!"

ऐसा कहते ही वह नीचे गिर पड़ा.

धरती पर होने वाली यह पहली मौत थी.

Sunday, March 6, 2011

लड़की, बारिश और मेंढक

लातीन अमेरिकी मिथकों की सीरीज़ में अगला हिस्सा.


बारिश

उत्तर की विशाल झीलों वाले इलाके में एक लड़की को अचानक एहसास हुआ की वह जीवित है. संसार के चमत्कार उसके सामने खुलने लगे और वह उन्हें तलाशने निकल पड़ी.

मेनोमिनी राज्य में शिकारियों और लकड़हारों के छोड़े निशानों का पीछा करते हुए उसने अपने को लट्ठों से बने एक विशाल कमरे में पाया. कमरे में दस भाई और तूफ़ान लाने वाले कुछ विशाल पक्षी रहा करते थे. उन्होंने लड़की को रहने की जगह और भोजन प्रस्तुत किया.

एक दुर्भाग्यपूर्ण सुबह जब लड़की चश्मे से पानी लेकर आ रही थी, एक खौफनाक सांप ने उसे अपने चंगुल में फंसा लिया और अपने साथ चट्टानों के नीचे मौजूद एक गुफा में ले गया. वहां बहुत सारे और सांप भी थे. जैसे ही वे उसे अपना शिकार बनाने को थे, लड़की ने गाना शुरू कर दिया.

बहुत दूर उन विशाल पक्षियों ने उसके गीत को सुन लिया. उन्होंने चट्टानी पहाड़ पर धावा बोल दिया और साँपों को मार कर लड़की को आजाद करा लिया.

पक्षियों ने लड़की को एक पेड़ की शाखा पर छोड़ दिया.

"तुम यहीं रहना." उन्होंने लड़की से कहा "जब भी तुम गाओगी हम आ जाया करेंगे."

पेड़ की शाखा से जब भी एक नन्हा हरा मेंढक टर्राता है, तूफ़ान लाने वाले विशाल पक्षी उसे सुन लेते हैं और संसार पर बारिश गिरने लगती है.


(कल इस श्रंखला का आखिरी हिस्सा)

मेरे साथ मयाड़ घाटी चलेंगे ? -- 5



पटन घाटी के बोद और स्वाङ्ला

बीर सिंह जी बहुत बातूनी हैं. उन के क़िस्से सुनते हुए हम लोग कब तान्दी , ठोलंग , तोज़िंग गाँवों को पार करते हुए रङ्लिङ पहुँच गए, पता ही न चला. हम पटन घाटी में हैं. यह पीर पंजाल और ज़ंस्कर रेंज के बीच चन्द्र्भागा नदी के किनारे स्थित एक ऊर्वर भूभाग है. आधुनिक शिक्षा, आर्थिकी और अन्य भौतिक मानदंडों के आधार पर यहाँ का समाज काफी विकसित माना गया है. बहुत से लोग भारत सरकार के ऊँचे पदों पर नौकरियाँ कर रहे हैं. इधर काफी सारे लोग विदेशों में भी निकल गए हैं. ज़्यादातर घाटी से बाहर जा कर व्यवसाय कर रहे हैं.

यहाँ मुख्यत: दो समुदायों (जनजातियों) के लोग रहते हैं – स्वाङ्ला और बोद . स्वाङ्ला स्वयं को हिन्दू मानते हैं. और इन के जन्म, विवाह, मृत्यु आदि संस्कार भाट पुरोहितों द्वारा सम्पन्न होते हैं. ‘बोद’ लोगों मे अपनी पहचान को ले कर थोड़ी कंफ्यूजन है. मैं स्वयं इसी समुदाय से हूँ. लेकिन चूँकि इन के संस्कार लामा पुरोहितों द्वारा सम्पन्न होते हैं अत: प्राय इन्हे: बौद्ध धर्म के अनुयायी मान लिया जाता है. लेकिन लोक देवताओं और तीज त्यौहारों और रहन सहन, खान पान , बोली बानी, पहरावा आदि से सम्बन्धित तथा अन्य तमाम परम्पराएं दोनो समुदायों में प्राय: एक जैसी है. अंतर है भी तो नगण्य ही.

इस घाटी मे पटनी बोली व्यवहृत है. जो तिब्बती –बर्मी परिवार की मानी गई है, लेकिन इस पर ऑस्ट्रिक परिवार के गहरे इम्प्रेशन भी स्वीकारे गए हैं. इस के अतिरिक्त दो जातियाँ चाण तथा लोहार हैं. इन की अपनी अपनी बोलियाँ हैं जो सम्भवतय: आर्यभाषा परिवार की कोई प्राचीन बोलियाँ हैं. इन सभी समुदायों में परस्पर विवाह सम्बन्ध प्रायः मान्य नहीं है. लेकिन ये नियम बहुत सख्त भी नहीं हैं
( जारी)

ग्लूस्काबे के बाल

लातीन अमेरिकी मिथकों वाली कल की पोस्ट का अगला हिस्सा.


हवा

जब ईश्वर ने पहले वावेनौक इंडियनों की सृष्टि की, धरती की सतह पर थोड़ी मिटटी बच रही थे. इस बची-खुची गीली मिटटी से ग्लूस्काबे ने अपने आप को बना लिया.

ऊपर स्वर्ग से ईश्वर ने हैरत में आकर उससे पूछा - "तुम कहाँ से आए?"

"मैं अद्भुत हूँ." ग्लूस्काबे ने जवाब दिया "मुझे किसी ने भी नहीं बनाया."

ईश्वर ने नीचे उतरकर उसकी बग़ल में खड़े होकर अपने हाथ से ब्रह्माण्ड की तरफ इशारा किया और कहा - "मेरी रचना को देखो. अगर तुम इतने ही अद्भुत हो तो मुझे दिखाओ तुमने क्या-क्या रचा है."

"अगर मैं चाहूं तो मैं हवा का निर्माण कर सकता हूँ."

ऐसा कहकर ग्लूस्काबे ने अपने फेफड़ों की पूरी ताकत से फू-फू किया.

हवा बाहर निकली और तुरंत समाप्त हो गई.

"मैं हवा को बना तो सकता हूँ पर उसे हमेशा के लिए बनाये नहीं रख सकता." ग्लूस्काबे ने झेंपते हुए स्वीकार किया.

इस बार ईश्वर ने हवा बाहर निकाली और इतनी तेज़ कि ग्लूस्काबे ज़मीन पर गिर पड़ा और हवा में उसके सारे बाल उड़ गए.

(चित्र -कनाडा के नोवा स्कॉशिया के एक कचोटे से क़स्बे पार्स्बोरो में ग्लूस्काबे की मूर्ति. ग्लूस्कोबे पर एक ख़ासी बड़ी पोस्ट इस सीरीज़ के समाप्त होने पर)

Saturday, March 5, 2011

मेरे साथ मयाड़ घाटी चलेंगे ? -- 4

पहाड़ों की देवी ने अपना चूल्हा सुलगा दिया है
“सर, यहाँ कोई ढाबा –ढूबा होना चाहिए था. ...” -- सुबह के मटमैले आकाश को देखते हुए लेटे- लेटे ही मैं कहता हूँ .
सहगल जी स्थानीय हैं. बहुत अनुभवी और धैर्यवान. मुस्कराते हुए कहते हैं —“ लौटती बार यहीं चाय पियेंगे. इस दफा बरफ कर के नहीं लगा होगा ढाबा . वर्ना लग ही जाता है इन दिनों ” . फिर चौहान जी को हौसला देने लगे हैं —“ बस दो चार किलोमीटर की बात है. सुना है उस तरफ से BRO के ट्रक चले हुए हैं. उदयपुर तक लिफ्ट मिल ही जाएगी. आगे की आगे देख लेंगे.”

कारगा मेरे गाँव के ठीक नीचे मेरे बचपन के खेलने की जगह है. यह तान्दी संगम के पास स्थित है..जहाँ चन्द्र और भागा नदियाँ मिल कर चन्द्रभागा बनती है और पश्चिम की ओर उदयपुर, किलाड़, भद्रवाह, किष्तवाड़ होती हुई जम्मू पहुँचती है.आगे पंजाब जा कर यह सोहनी – महिवाल वाली ऐतिहासिक चिनाब नदी बन जाती है. गर्मियों की लम्बी छुट्टियों में हम यहीं मस्ती करते थे. हरी घास , घने पेड़ , खूब सारे पानी के सोते, और खुली जगह्..... लेकिन गर्मियों का यह स्वर्ग सर्दियों मे नरक से भी बदतर हो जाता है. 3000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस अधित्यिका के चारों ओर घाटियाँ खुलती हैं . खूब तेज़ हावाएं चलतीं हैं और जम कर बरफबारी होती है. आज भी चारों दिशाओं में झक्क सफेदी फैल रही है. ठेठ जाड़ों का मौसम प्रतीत हो रहा है. ब्यूँस की शाखें अभी तक गाढ़ी काली दिख रहीं हैं . साईबेरियाई हवाओं से जूझतीं, निपट नंगी ! उदयपुर यहाँ से 45 किलोमीटर दूर है.

हम चलने के लिए खड़े हुए हैं .अचानक मेरी नज़र कर्क्योक्स के पीछे वाले भव्य ग्लेशियर पर पड़ी है. उस के पूर्वी भाग पर सुनहली किरणों की बौछार हो रही है और पश्चिमी हिस्से से बर्फ का गुबार उड़ रहा है. आह ! पहाड़ों की देवी ने अपना चूल्हा सुलगा लिया है. ठहर कर आँख भर वह नज़ारा देख लेना चाहता हूँ. ..... “But I have promises to keep, and miles to go before I sleep”. हम कूच कर चुके हैं, लेकिन मैं मुड़ मुड़ कर पीछे देख रहा हूँ. बीर सिंह जी इसे भाँप कर बोलते हैं “ जनाब , कैमरा ही उठा लाते !”
अब मैं इन महाशय को कैसे समझाता कि मैं कैमरा क्यों नहीं रखता! और कैमरे की लेंस और नंगी आँखो की तासीर में फर्क़ क्या है?

सुमनम की तरफ जाती बिजली की लाईन पर उस पुराने खम्भे को देख कर घर की याद हो आई. वापसी पर ज़रूर घर जाऊँगा. जन्धर के सिरे पर ITBP का केम्प उसी पुरानी अदा में सो रहा है. नीचे संगम में काफी बदलाव आए हैं . संगम के बीचोंबीच एक टापू उभर आया है. दोनो नदियों की दो दो धाराएं बन रहीं हैं . घुषाल गाँव की तरफ काफी सारा सख्त गट्टों वाला किनारा नदी ने काट दिया है. घुषाल अब पुराने दिनों की तरह घने क्लस्टर में नही बसा है. ज़्यादातर घर छिटक कर दूर दूर हो गए हैं. जैसे ध्रुवीय प्रदेश में गर्मियाँ आने पर पेंग्विनो का झुण्ड छिटकता है. नए घर अब टीन की छत वाले ही बन रहे हैं. पहले ज़्यादातर फ्लेट रूफ मिट्टी के मकान होते थे.
(जारी)

अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है

चचा ग़ालिब एक जगह पूछते हैं -

सब्ज़ा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है


इतनी बड़ी कायनात को देखकर इंसान धरती पर आने के बाद से लगातार हैरत करता आया है.

उरुग्वे के मशहूर लेखक और पत्रकार एदुआर्दो गालेयानो की तीन पुस्तकों की एक शानदार ट्रिलोजी है "मेमोरीया देल फुएगो". इसका पहला खंड १९८४ में छपा था. सृष्टि के निर्माण पर आधारित लातिनी इंडियनों के कुछ दिलचस्प मिथकों को गालेयानो ने इस खंड के वास्ते इकठ्ठा किया था. इनमें से तीन मैं आपके सम्मुख पेश करने जा रहा हूँ. आज पहला हिस्सा बादल पर.



बादल

बादल ने एक स्त्री की देह पर पानी की एक बूँद को गिर जाने दिया. नौ माह बाद उसने दो जुड़वां लड़कों को जन्म दिया.

जब बच्चे बड़े हुए, वे जानना चाहते थे की उनका पिता कौन है.

"कल सुबह उठकर तुम पूर्व की तरफ देखना. तुम्हारे पिता तुम्हें वहीं नज़र आएँगे - आसमान में किसी मीनार की तरह." माँ ने उन्हें बताया.

धरती और असमान से होते हुए जुड़वां भाई पिता की खोज करते करते जब बादल के पास पहुंचे तो बादल पक्का कर लेना चाहता था की वे उसी की संतानें हैं.

"कोई सबूत दो की तुम मेरे बच्चे हो."

एक भाई ने धरती की दिशा में कड़कती हुई बिजली रवाना कर दी. दूसरे ने तूफान. बादल को अब भी थोडा शक बचा हुआ था.

दोनों एक बाढ़ से होकर गुज़रे और बग़ैर गीला हुए बाहर निकल आये.

बादल ने अपनी बग़ल में उनके लिए जगह बना ली जहां अब वे अपने तमाम सगे और चचेरे भाईयों के साथ रहते हैं.


(अगली कहानी में हवा के बारे में एक दिलचस्प मिथक)

Friday, March 4, 2011

मेरे साथ मयाड़ घाटी चलेंगे ? --3

15 अप्रेल 1995. सुबह छह बजे हम अपने पिट्ठू – डण्डे उठाए केलंग से उदयपुर (मर्गुल) के लिए पद यात्रा पर निकल पड़े हैं . HRTC की बसें अभी चल नही रहीं . उदय पुर की तरफ से BRO (बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाईज़ेशन ) का डोज़र चल पड़ा है लेकिन केलंग की ओर से स्नो क्लीयरेंस का काम शुरू नही हुआ . हमें मयाड़ घाटी के दस्तकारों को वज़ीफे बाँटने हैं. साथ मे मेरे सीनियर सहगल जी और दफ्तर के केशियर चौहान जी हैं . लोक सम्पर्क विभाग के ड्राईवर बीर सिंह छुट्टी जा रहे हैं , वो भी हमारे साथ हो लिए. पतली सी भागा नदी बर्फ से ढँकी हुई है. घाटी में एक ठण्डा सन्नाटा पसरा है .रास्ता टेढ़ा मेढ़ा है. रास्ता क्या है, सड़क के बीचोंबीच ताज़ा बरफ में एक पतली लीक खिंची हुई है जिस की चौड़ाई इतनी कम है कि सामने से आते पथिक को रास्ता देने के लिए लीक से बाहर होना पड़ता है. तोक्तोक्च के पास हमे समतल रास्ता छोड़ कर पगडण्डी पर चढ़ना पड़ा. बरफ काफी ज़्यादा है और रास्ता ऊबड़ खाबड़ . हमारे पास साधारण स्पोर्ट्स और हंटिंग शूज़ हैं. तलुओं में जलन होने लगी है और गरम कपड़ों के भीतर हमारा बदन पसीने से भीग रहा है .
कारगा पहुँच कर हम ने कमर सीधी की. आठ किलो मीटर का सफर हम ने सवा घण्टे में तय किया है मैं तो बरफ में लेट ही गया. चौहान जी काँगड़ा की तरफ के हैं . शायद बरफ में पैदल चलने के आदी नही हैं और खासे परेशान नज़र आ रहे हैं . फर्लाँग भर की चढ़ाई ने उन की साँस फुला दी है . एक पत्थर पर उकड़ूँ बैठ कर वे एक सिग्रेट सुलगाते हैं . बड़े चाव से कश खींच रहे हैं . पूरे रम कर. मानो उन सुलगती चिनगियों की तपिश धुँए के साथ भीतर खींच लेना चाहते हों. यह देख कर मैं भी तृप्त हुआ जा रहा हूँ . अभी एक साल पहले तक मैं खुद भी चेन-स्मोकर था. बड़ी ज़ोर की तलब उठी है भीतर. और बमुश्किल रोक पाया हूँ खुद को.

रिपीट पोस्ट - सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

ये पोस्ट कोई साल भर पहले लगी थी एक सीरीज में. उस सीरीज में ये मेरी सबसे पसंदीदा है. दोबारा लगा रहा हूँ बुरा न मानियेगा.

और

जिसने नज़ीर नहीं पढ़ा उसने कुछ नहीं पढ़ा.



जब फूल का सरसों के हुआ आके खिलन्ता
और ऐश की नज़रों से निगाहों का लड़न्ता
हमने भी दिल अपने के तईं करके पुखन्ता
और हंस के कहा यार से ए लकड़ भवन्ता

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

एक फूल का गेंदों के मंगा यार से बजरा
दस मन का लिया गुंथा, आठ का गजरा
जब आंख से सूरज के ढला रात का कजरा
जा यार से मिलकर ये कहा ए मेरे रजरा

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

थे अपने गले में तो कई मन के पड़े हार
और यार के गजरे भी थे एक धवन की मिकदार
आंखों में नशे मै के उबलते थे धुंआधार
जो सामने आता था यही कहता था ललकार

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

पगड़ी में हमारी थे जो गेंदों के कई पेड़
हर झोंक में लगती थी बसन्तों के तईं ऎड़
साक़ी ने भी मटके से दिया मुंह के तईं भेड़
हर बात में होती थी इसी बात पे आ छेड़

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

फिर राग बसन्ती का हुआ आन के खटका
धोंसे के बराबर वो लगा बाजने मटका
दिल खेत में सरसों के हर एक फूल से अटका
हर बात में होता था इसी बात का लटका

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

जब खेत पे सरसों के दिया जा के कदम गाड़
सब खेत उठा सर के ऊपर रख लिया झंझाड़
महबूब रंगीलों की भी एक साथ लगी झाड़
हर झाड़ से सरसों के भी कहती थी अभी झाड़

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

साथ लगा जब जो अजब ऐश का दहाड़ा
जिस बाग़ में गेंदों के गए उसको उजाड़ा
देखी कभी सरसों कभी नरगिस को उजाड़ा
कहते थे इसी बात को बन, झाड़, पहाड़ा

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

ख़ुश बैठे हैं सब शाहो वज़ीर आज अहा हा
दिल शाद हैं अदना ओ फ़क़ीर आज अहा हा
बुल्बुल की निकलती है सफ़ीर आज अहा हा
कहता यही फिरता है 'नज़ीर' आज अहा हा

सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता

Thursday, March 3, 2011

दो दिन सिर्फ़ कविता के साथ


कविता समय -2011 की रिपोर्ट

‘कविता समय’ 2011 से आयोजना की जिस शृंखला की शुरुआत हुई, उसे आमतौर पर भागीदारी कर रहे मित्रों ने ऐतिहासिक कहा, हांलाकि अशोक वाजपेयी ने हिन्दी में अधीरतापूर्वक ऐतिहासिकता लाद दिये जाने की प्रवृति से इसे जोड़ा लेकिन इस रूप में तो यह उन्हें भी ऐतिहासिक लगा कि लंबे समय बाद इतने कवि सहभागिता के आधार पर साथ बैठकर ‘कविता के संकटों’ पर बात कर रहे हैं। मदन कश्यप ने सार्वजनिक और व्यक्तिगत दोनों ही तौर पर ही कहा कि यह कार्यक्रम इसलिये भी ऐतिहासिक था कि पिछले बीसेक सालों से एक ऐसा माहौल बना है कि लेखक अपने ख़र्च पर किसी जगह जाने से बचते हैं…साथ ही इससे आगे यह कि लोग इस तरह से बुलाने से भी बचते हैं, इसका असर यह हुआ है कि हिन्दी का सारा विमर्श संस्थानों और अकादमिकता के उत्सवधर्मी आयोजनों में सिमट गया है लेकिन कविता समय ने इसे तोड़ा और इतने सारे कवि-आलोचक अपनी मर्ज़ी से यहां न सिर्फ़ आये बल्कि बिल्कुल आत्मीय माहौल में अपनी चिंतायें साझा कर रहे हैं। ऐतिहासिकता के किसी दावे से अलग हम इस आत्मीयता और साझेपन से अभिभूत हैं।




हड़बड़िये और अनुभवहीन स्थानीय आयोजक के चलते कार्यक्रम 12 बजे की जगह एक बजे शुरु हो पाया। पहला सत्र था ‘कविता और यूटोपिया’ जिसमें पैनल सदस्य थे बोधिसत्व, आशुतोष कुमार, मदन कश्यप, नरेश सक्सेना और अशोक वाजपेयी। नामवर सिंह अपनी अस्वस्थता के कारण नहीं आ पाये थे और उनके रेकार्डेड संदेश को शाम के सत्र में ही सुना जा सका। बोधिसत्व ने संयोजन समिति की तरफ़ से कविता के आरोप पत्र का पाठ करते हुए समकालीन कविता पर लगाये जाने वाले लगभग 30 आरोपों और दिये जाने वाले 10 सुझावों को सामने रखा और पूछा कि इन्हें आँख मूँद कर मान लेना चाहिये या फिर इनकी पड़ताल होनी चाहिये। मदन कश्यप ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज जब किसानों से ज़मीन, आदिवासियों से जंगल और नौजवान से रोज़गार छीना जा रहा है तो कविता का यूटोपिया समानता आधारित समाज की स्थापना ही हो सकता है। आशुतोष कुमार ने अपने लंबे लेकिन सुगठित वक्तव्य में कविता की जनपक्षधर होने की ज़रूरत को दृढ़ता से सामने रखा। नरेश सक्सेना जी ने अपने चुटीले अंदाज़ में समकालीन कविता के संकटों पर तमाम बातें रखीं। मंचों से अच्छी कविता के पलायन, प्रकाशकों की बदमाशियों से लेकर कवियों की समस्याओं और कमियों पर उन्होंने विस्तार से बात की। संचालक गिरिराज यूटोपिया की याद बार-बार दिलाते रहे लेकिन वक्ता संकट पर ही केन्द्रित रहे। अंत में अशोक वाजपेयी ने वही कहा जिसे वह वर्षों से कहते आ रहे हैं। कलावाद की प्रतिष्ठा स्थापित करते हुए उन्होंने सभी मोर्चों से प्रतिबद्धता पर हमला बोला। दोनों में अंतर बताते हुए उनका कहना था कि ‘हम जानते हैं कि कविता दुनिया नहीं बदल सकती, लेकिन फिर भी ऐसे लिखते हैं कि मानो दुनिया बदल जायेगी, जबकि प्रतिबद्ध लोग इस तरह लिखते हुए विश्वास करते हैं कि दुनिया बदल सकती है।’ अशोक जी के वक्तव्य से माहौल गरमा चुका था, तमाम युवा कवि सवाल पूछने को व्यग्र थे लेकिन साढ़े तीन बज चुके थे और लंच को और टाला नहीं जा सका।  



लंच के बाद साढ़े पाँच बजे अलंकरण, विमोचन और कविता पाठ का सत्र शुरु हुआ। नामवर जी का रेकार्डेड संदेश सुनवाया गया जिसमें उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से न आ पाने का खेद व्यक्त किया था और कवियों को सलाह दी थी कि वे दूसरी विधाओं में भी लिखें। पूर्व घोषित सूचना के अनुसार चंद्रकांत देवताले जी को उनकी अनुपस्थिति में ‘कविता समय सम्मान-2011’ और कुमार अनुपम को ‘कविता समय सम्मान-2011’ दिया गया। देवताले जी ने अपने संदेश में कविता समय की टीम को शुभकामनायें भेजीं थीं और इस सम्मान को ‘युवाओं द्वाया अपने वडील को दिया गया स्नेह’ कहते हुए इसकी तुलना ‘पहल सम्मान’ से की। उन्होंने भी संक्षेप में कविता के संकट को जीवन के संकट से जोड़ते हुए प्रतिबद्धता से जनता के पक्ष में खड़े रहने की अपील की। अनुपम ने पूरे संकोच से दिये गये अपने वक्तव्य में ‘कविता समय’ के प्रति आभार व्यक्त किया। इसी क्रम में प्रतिलिपि प्रकाशन द्वारा 20 हिन्दी कवियों की कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद के संकलन ‘होम फ़्राम ए डिस्टेंस’ का विमोचन भी हुआ।


इसके बाद कविता पाठ का सत्र था जिसमें अशोक वाजपेयी, नरेश सक्सेना, मदन कश्यप, ज्योति चावला, प्रतिभा कटियार, पंकज चतुर्वेदी, प्रियदर्शन मालवीय, केशव तिवारी, अरुण शीतांश, निरंजन श्रोत्रिय, कुमार अनुपम, प्रांजल धर, विशाल श्रीवास्तव, रविकांत, सुमन केशरी सहित अनेक कवियों ने काव्यपाठ किया। संचालन अशोक कुमार पाण्डेय ने किया।

जो कुछ बच गया था वह डिनर के वक़्त हुआ। ख़ूब आत्मीय और अनौपचारिक बहस…अगले दिन के लिये माहौल तैयार था…

अगले दिन की शुरुआत समय से बस आधे घंटे देर से हुई। कार्यक्रम के आरंभ में अशोक कुमार पांडेय के सद्य प्रकाशित कविता संकलन ‘लगभग अनामंत्रित’  का विमोचन मदन कश्यप, सुमन केशरी, बोधिसत्व और तुषार धवल ने किया।



पहले सत्र का विषय था – ‘कविता का संकट: कविता, विचार और अस्मिता’। बहस की शुरुआत करते हुए सुमन केशरी ने कविता की पहुंच, उसके वैचारिक कंटेट और उसके संकटों पर तमाम सवाल खड़े किये। उनका कहना था कि कविता में वैचारिक अति हो गयी है। उसे मध्यमार्ग पर चलना होगा। जितेन्द्र श्रीवास्तव ने बिंदुवार चर्चा करते हुए कविता से संप्रेषणीयता, विविधता का अभाव और लय के पलायन का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब तक कविता संप्रेषणीय नहीं होगी तब तक उसका पाठक तक पहुंचना मुश्किल होगा। बहस में हस्तक्षेप करते हुए ज्योति चावला ने कुछ विचारोत्तेजक सवाल उठाये। उनका कहना था कि अस्मिता के साहित्य पर आरोप लगाने वालों को यह सोचना चाहिये कि ऐसा क्या है कि साहित्य अकादमी से लेकर भारत भूषण पुरस्कार की सूची से महिलायें, दलित और मुसलमान ग़ायब हैं? उन्होंने आयोजकों को भी कटघरे में खड़ा करते हुए सवाल किया कि यहां इन वर्गों का प्रतिनिधित्व कम क्यूं है? उनका कहना था कि अस्मितावादी लेखकों पर केवल अपनी समस्याओं पर लिखने का आरोप तब तक बेमानी है जब तक दूसरे लोग उन पर नहीं लिखते। माहौल गर्मा चुका था…लोग प्रतिप्रश्न कर रहे थे, टिप्पणियाँ दे रहे थे लेकिन संचालक गिरिराज ने स्थितियों को संभालते हुए सवालों को बाद के लिये सुरक्षित कर लिया। नलिन रंजन सिंह ने अपने लिखित परचे में कविता के संकट को आज के वैचारिक संकट से जोड़ा। उनका मानना था कि आज की कविता में विविधता या संप्रेषणीयता कि इतनी भयावह कमी भी नहीं है। उन्होंने कहा कि आज हिन्दी में बहुत अच्छी कवितायें लिखी जा रही हैं लेकिन वे पाठक तक नहीं पहुंच पा रही हैं। इसके कारण कविता के बाहर भी ढ़ूंढ़ने होंगे। प्रियदर्शन मालवीय ने विजयदेव नारायण साही को कोट करते हुए साहित्य में वैचारिक खेमेबंदी की और इशारा किया। बोधिसत्व ने कबीर का दोहा उद्धृत करते हुए कहा कि साहित्य और राजनीति का मध्य मार्ग अलग-अलग होता है। पंकज चतुर्वेदी ने भी कुछ विचारोत्तेजक सवाल उठाते हुए वैचारिक प्रतिबद्धता पर ज़ोर दिया। उन्होंने कविता की सम्यक आलोचना के अभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि कविता समय इस स्पेस को भर सकता है। सत्र के अंतिम वक्ता मदन कश्यप अशोक वाजपेयी के सवालों से रु ब रु हुए और नुक़्ता ब नुक़्ता कलावाद के तर्कों की धज्जियां उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि कविता बंदूक नहीं चलाती, हड़ताल भी नहीं करती लेकिन वह वैचारिक लीद की सफ़ाई ज़रूर करती है। वह लोगों का अपने समय के सच से साक्षात्कार कराती है। जनपक्षधर कविता ने यह काम बख़ूबी किया है। चूंकि वह पूंजीवाद के ख़िलाफ़ खड़ी है, सांप्रदायिकता और व्यक्तिवाद पर हमला बोलती है इसलिये इनकी पैरोकार सरकारें तथा मीडिया इसे दबाने का भरपूर प्रयास करती हैं। अस्मिता के सवाल पर उन्होंने कहा कि हमें स्वीकारना होगा कि दलित, स्त्री और अल्पसंख्यक प्रश्न को हमने वह तवज्जो नहीं दिया जो देना चाहिये था, लेकिन ऐसा भी नहीं कि ये वर्ग मुख्यधारा के साहित्य से बहिष्कृत रहे। गुजरात और अयोध्या के दौरान लिखी गयी कविताओं का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दरअसल उत्तर आधुनिकता की लहर में अस्मिता के सवाल को बड़ी लड़ाई स्थगित रखने के लिये उठाया जा रहा है। इसके बाद ख़ुले सवाल जवाब हुए जिसमें तमाम सारी बातें सामने आईं।

लंच के बाद एक बार फिर कविता पाठ का सत्र था जिसमें बोधिसत्व, जितेन्द्र श्रीवास्तव, तुषार धवल, उमाशंकर चौधरी सहित बीसेक कवियों ने कविता पाठ किया। इसके बाद आगामी योजनाओं का सत्र था। यह तय किया गया कि इस आयोजन को हर साल किया जाये। वक्ताओं का कहना था कि अब कवियों को ख़ुद आगे आना होगा। कविता समय में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई है उन्हें प्रिण्ट तथा नेट दोनों माध्यमों से जनता के बीच ले जाना होगा। पंकज चतुर्वेदी, नलिन रंजन सिंह तथा विशाल श्रीवास्तव का कहना था कि कविता पाठ की जगह बहस को अधिक समय दिया जाये। यह तय किया गया कि कविता समय आगामी पुस्तक मेले के पहले कुछ प्रकाशन लेकर आयेगा। इसे सहभागिता आधारित कार्यक्रम बनाये रखने पर भी ज़ोर दिया गया और इस निर्णय का स्वागत किया गया कि किसी व्यक्ति से दस हज़ार और संस्था से 20 हज़ार से अधिक का सहयोग नहीं लिया जायेगा। संयोजन समिति की ओरे से गिरिराज किराडू ने अगले कुछ दिनों में अपनी प्रकाशन योजनायें तय कर जनता के सामने प्रस्तुत करने का वादा किया।


मेरे साथ मयाड़ घाटी चलेंगे ? -- 2









केलंग में मेरा स्वागत भारी हिमपात से हुआ है . लाहुल यूँ तो मॉनसून के हिसाब से रेन – शेडो क्षेत्र मे स्थित है. मॉनसून पीर पंजाल को प्राय: पार नहीं कर पाता. लेकिन पश्चिमी विक्षोभ (western disturbances) के लिए कोई रुकावट नहीं. सर्दियों में ये बर्फीली हवाएं सीधी घाटी में घुस आती हैं और निकासी नही होने के कारण हफ्तों बरसती रहतीं हैं. उस रात को लगभग दो फीट बरफ पड़ी और अगले सात आठ दिन बादल छाए रहे. फिर एक दिन बढ़िया धूप निकल आई. छत पर निकल कर कस्बे को निहारने लगा हूँ . पूरब की ओर विहंगम लेडी ऑफ केलंग चोटी ताज़ा गिरी बरफ में छिप गई है . रङ्चा दर्रे के नीचे से बरबोग, पस्परग और नम्ची गाँवों को धमकाते हुए तीन चार एवलांश निकल गए हैं . ड्रिल्बुरी खामोश खड़ा है . पश्चिम मे गुषगोह के जुड़वाँ हिमनद मानों दो खाए अघाए बैल जुगाली करते अधलेटे पसरे हों. केलंग टाऊन मुझे कमोवेश वैसा ही दिख रहा है जैसा पन्द्रह साल पहले छोड़ गया था. सुबह उठने पर नथुनों में धुँए की वह चिर परिचित गन्ध घुसी रहती है . यह धुआँ जो कस्बे के ऊपर बादल सा छाया रहता, घरेलू चूल्हों और सरकारी भक्कुओं से निकलता था, तक़रीबन 11 बजे छँटना शुरू हो जाता और यही सरकारी बाबुओं के दफ्तर पहुँचने का समय भी होता. दफ्तरों में स्टीम कोल के भक्कू जलते . उन्ही के ऊपर अल्युमीनियम की केतलियों में चाय उबलती रहती. हिमपात के दिनों में घरों और दफ्तरों में सब से प्राथमिकता वाला काम होता है खुद को गरम बनाए रखना. बहरहाल, मेरी प्राथमिकता है मयाड़ घाटी की यात्रा.

Wednesday, March 2, 2011

मेरे साथ मयाड़ घाटी चलेंगे ?



28 मार्च 1995 . मेरी नियुक्ति हिमाचल सरकार के उद्योग विभाग में हो गई है और मुझे अपने ज़िला मुख्यालय केलंग में ड्यूटी ज्वाईन करने के आदेश हुए हैं. रोह्तांग बन्द है. मुझे हेलिकॉप्टर से जाना है . भूंतर एयरपोर्ट पर यह एक चमकीली सुबह है. चार दिनों की लगातार बारिश के बाद वातावरण साफ सुथरा लग रहा है. धुला-धुला और खुला-खुला सा. तो आज फ्लाईट मेच्योर हो ही जाएगी.. दोस्तों ने सलाह दी कि कहीं और एडजस्ट्मेंट करवा लो. ‘ट्राईबल’ में जा कर फँस जाओगे. लेकिन जन्म भूमि के लिए भीतर कुछ मचलता है. कोई परवाह नहीं. मै सोचता हूँ, आखिर किसी को तो वहाँ जाना ही है. तो फिर मैं ही क्यों नहीं? कुछ दोस्तों ने मोटिवेट किया. अरे ज़रूर जाओ यार , कैसी मस्त जगहें हैं वहाँ घूमने के लिए— स्पिति देख लो, मयाड़ घाटी की तरफ निकल जाओ घूमने !

स्पिति दो वर्ष पूर्व घूम आया था. लेकिन मयाड़ कभी नहीं. कितने ही विदेशी पर्वतारोही उधर जाते हैं ….. मेंतोसा, फोबरंग , थानपट्टन , कांग-ला. इन सब का केवल ज़िक़्र सुन रखा था. मयाड़ घाटी मेरी स्मृतियों में उन दो ‘दीदियों’ से सुने क़िस्सों के रूप में भी ज़िन्दा है , जो बचपन में हमारे घर पर रहतीं थीं. उन के लोकगीतों और कथाओं में मयाड़ की एक तिलस्मी छवि बनती थी.

हमारा हेलिकॉप्टर तान्दी संगम के ठीक ऊपर पहुँचा है. सामने अपना गाँव सुमनम दिखाई दिया है . शर्न के आँगन में मवेशियों को धूप तापते देख कर बहुत रोमांचित हुआ हूँ. भागा घाटी की ओर मुड़ने से पहले पीर पंजाल के दूसरी ओर ज़ंस्कर रेंज के सिर उठाए भव्य पहाड़ों की झलक मिली है . मैं अनुमान लगाता हूँ कि इन्हीं धवल शिखरों के आँचल में कहीं मयाड़ घाटी होगी. केलंग पहुँचते पहुँचते पक्का मन बना लिया है कि चाहे जो हो, मयाड़ घाटी ज़रूर जाना है.

(जारी)

Tuesday, March 1, 2011

जो गाह-गाह जुनूं इख्तियार करते रहे



हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी

हम देखेंगे
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी
उट्ठेगा अनल - हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो



 Iqbal Bano - Hum Dekhen Ge .mp3
Found at bee mp3 search engine
पुनश्च : माफ़ कीजिये, आप लोगों ने अगर ये कई बार सुना है | मेरे जैसों के लिए तो दुनिया अभी जादू का खिलौना ही है | आज ही सुना है और एक बार जो सुना तो पूरे दिन इसी को सुनता रहा, सो सुन लीजिये आप भी |