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Friday, March 11, 2016

फ़ैज़ और एलिस - बरास्ते अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम ने एक बार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पत्नी एलिस का इंटरव्यू लिया था. पेश है -
बाएं से दाएं - फ़ैज़, सलीमा, मुनीज़ा और एलिस 


अमृता : एलिस ! क्या फ़ैज़ साहब से तुम्हारी पहली मुलाक़ात तुम्हारे ही देश इंग्लिस्तान (इंग्लैंड) में हुई थी?
एलिस : नहीं ! मेरी बहन हिन्दुस्तान ब्याही थी डॉक्टर तासीर के साथ. वे दोनों लंदन में मिले थे, 1938 में मैं अपनी बहन से मिलने हिन्दुस्तान आई थी.

तो हिन्दुस्तान को तुमने "फ़ैज़" के रूप में देखा?
हाँ, अमृतसर में मिली थी. अमृतसर हिन्दुस्तान बन गया और हिन्दुस्तान "फ़ैज़".

तुम उर्दू ज़ुबान नहीं जानती थीं. फिर "फ़ैज़" की शायरी से इश्क़ कैसे हुआ?
अमृता ! सच्ची बात तो यह है कि मैं आज तक "फ़ैज़" की शायरी की गहराई को नहीं जान सकी. ज़रा सी ज़बान को समझ लेना और बात है, लेकिन पूरी तहज़ीब को जानना और बात है...

तब "फ़ैज़" शायर को नहीं, "फ़ैज़" एक शख्सियत से प्यार किया था?
हाँ, वैसे तो शायरी शख्सियत का एक हिस्सा होती है, क्यूँकि एक शायर के साथ ज़िन्दगी बसर करनी होती है, इसलिए भी उसको बहुत कुछ जानना होता है, और मैंने उसे जाना.

मिलने के कितने अरसे बाद शादी की मंज़िल आई?
तकरीबन दो साल बाद और यह इंतज़ार इसलिए था कि फ़ैज़ के वालिदैन से मंज़ूरी चाहिये थी, क्यूँकि एक ख़ुशगवार माहौल के बग़ैर हम शादी नहीं कर सकते थे...

शादी की रस्म कहाँ अदा की गईं ?
कश्मीर में. महाराजा कश्मीर ने अपना गर्मियों का महल हमें निकाह की रस्म के लिये दिया था और शेख़ अब्दुल्लाह ने निकाह की रस्म अदा की थी.

क्या बारात लाहौर से आई थी?
हाँ, तीन आदमियों की बारात थी. एक "फ़ैज़", दूसरे उनके बड़े भाई और तीसरे उनके दोस्त नईम... जब तीनों आ गए, तो मैंने फ़ैज़ साहब से पहली बात पूछी... "ब्याह की अंगूठी ले कर आए हो कि नहीं?" "फ़ैज़" ने कहा - "अंगूठी भी लाया हूँ, साड़ी भी."

मैं हैरान हो गई कि अंगूठी का साइज़ "फ़ैज़" ने कहाँ से लिया है. पूछने पर कहने लगे - "मैं अपने साइज़ का ले आया था."
"फ़ैज़" जान गये होंगे कि दिल मिल जाये तो उँगलियाँ भी ज़रूर मिल जाती है.

अच्छा, एलिस ! यह बताओ, निकाह के वक़्त मुशायरा भी हुआ था?
हाँ, हुआ था. पहले शेख़ अब्दुल्लाह और उनकी बीवी के साथ खाना खाया. फिर मुशायरा हुआ. मजाज़ और जोश मलीहाबादी भी थे.

"फ़ैज़" के रिश्तेदारों से कब मुलाक़ात हुई?
कश्मीर में तीन दिन ठहरकर हम लाहौर आ गये. वहाँ दावत-ए-वलीमा (विवाह-भोज) की गई.

सास की बुज़ुर्गाना दुआएं कैसे लीं?
सिर झुकाकर, घूँघट निकल कर...

ईमान से ! सच ! घूँघट उठाने की रस्म भी हुई थी?
हाँ, अमृता ! चाँदी के रुपयों की सलामी मिली थी.

सास साहिबा ने तुम्हारे नाम नहीं तब्दील किया?
किया था और उन्होंने मेरा नाम कुलसूम रखा था, लेकिन मुझे पसंद नहीं आया.

उर्दू ज़बान कब सीखी?
घर में "फ़ैज़" के भतीजे से. मैंने उन्हें अंग्रेज़ी सिखाई और उनसे उर्दू सीखी.

उस वक़्त तक फ़ैज़ का पहला मजमुआ (काव्य-संकलन) नक्श-ए-फ़रियादी छप चुका था?
हाँ ! शायद एक साल पहले ही छपा था.

"फ़ैज़" ने अपने पहले इश्क़ कि दास्ताँ सुनाई थी, जिसके बारे में नक्श-ए-फ़रियादी में नज़्में लिखी थीं?
हाँ, अमृता, वह भी और उसके बाद की दोस्तियाँ भी, लेकिन मेरी ज़िन्दगी पर कुछ भी असर-अंदाज़ नहीं होता. "फ़ैज़" एक चट्टान हैं अपने-आप में. "फ़ैज़" की वफ़ा अपने साथ है - काग़ज़ और कलम के साथ.

यह सच है. जिसकी वफ़ा अपने साथ हो, अपने किरदार के साथ हो ,अपनी तख्लीक (सृजन) के साथ हो. उस जैसा वफ़ादार कौन हो सकता है?
तैंतीस बरस गुज़र गये हमारी शादी को.

पूरब और पश्चिम का यह मिलाप कैसा रहा?
यह ज़रूर कह सकती हूँ कि दो मुख्तलिफ़, इलहदा-इलहदा सर-ज़मीनों के मर्द और औरत जब शादी करते हैं, तो मेरा ख़्याल है, मर्द के लिये औरत के देश में रहना आसान नहीं, लेकिन औरत अपने मर्द के देश में रह सकती है. नई धरती, नये माहौल को अपनाने की उसमें ताकत होती है. मुख्तलिफ़ तहज़ीब के लोगों की शादी आसान बात नहीं.

तुम्हारे दो बच्चे हैं?
दो बेटियां सलीमा और मुनीज़ा. सलीमा चित्रकार हैं और मुनीज़ा टी. वी. प्रोड्यूसर ! दोनों ने दो पंजाबी भाइयों के साथ शादी की है. इसलिए इकट्ठी रहती हैं अपनी सास के साथ.

एलिस ! तुमने "फ़ैज़" की नज़्मों का अंग्रेज़ी में तर्जुमा किया होगा?
नहीं ! और लोगों ने किये हैं. तकरीबन पाँच साल पहले यूनेस्को की तरफ़ से एक तर्जुमा छपा था.

फ़ैज़ साहब को लेनिन पुरस्कार मिला था?
1962 में. "फ़ैज़" को हार्ट अटैक हुआ था. वह कुछ संभल चुके थे, लेकिन अभी बिस्तर पर थे, जब पाकिस्तान टाइम्स से फ़ोन आया था.

यह ख़बर सुनकर फ़ैज़ साहब के पहले अल्फ़ाज़ (शब्द) क्या थे?
वह चुप हो गये थे. शायद दिल भर आया था.

लोगों का क्या रवैया था?
यह कि "फ़ैज़" को यह पुरस्कार नहीं लेना चाहिये, लेकिन अयूब खां का तार आया कि वह प्राइज़ ले सकते हैं. इसी तरह के और तार भी मौसूल (प्राप्त) हुए. फिर दोस्त मुबारकबाद देने आ गये. फिर सवाल आया कि इस हालत में "फ़ैज़" मॉस्को का सफ़र कैसे कर सकते हैं ? डॉक्टर ने हवाई जहाज़ से सफ़र करना मना किया हुआ था. इसलिए बेटी को साथ लेकर "फ़ैज़" ने गाड़ी से लाहौर से कराची तक का सफ़र किया. फिर समुद्री जहाज़ से नेपेल्ज़ तक और फिर नेपेल्ज़ से गाड़ी के ज़रिये मॉस्को तक.

एलिस ! आपने कभी "फ़ैज़" की बायोग्राफी लिखने की सोची है?
मैं तो नहीं, अलबत्ता कराची में ज़फर-उल-हसन लिख रहे हैं, लेकिन सोचती हूँ, "फ़ैज़" को ख़ुद लिखना चाहिये. एक और काम अधूरा पड़ा है. "फ़ैज़" और सूफ़ी तबस्सुम मिल कर फ़ारसी शायरी का उर्दू तर्जुमा कर रहे थे. सूफ़ी तबस्सुम का इंतक़ाल हो गया, तो "फ़ैज़" बहुत उदास हो गये... यह काम भी करने वाला है और वह काम भी. दोनों काम ज़रूरी हैं.

हाँ, एलिस, और दोनों से बड़ा ज़रूरी काम "फ़ैज़" की ज़िन्दगी को बचाने का है.
हाँ, अल्लाह उनकी हिफाज़त करे ...

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[साभार: आजकल हिंदी पत्रिका - फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक, उर्दू से अनुवाद : हरपाल कौर]


Wednesday, September 11, 2013


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म, आवाज़ मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की-

मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग
मैंने समझा था के तू है तो दरख़्शां  है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का  झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में  बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है

तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ ना था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें हैं और भी हैं वस्ल की राहत  के सिवा

अनगिनत सदियों से तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-किमख़्वाब  में बुनवाये हुए
जा-ब-जा  बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों  से
पीप  बहती हुई गलते हुए नासूरों  से

लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग 

Friday, September 28, 2012

फ़ैज़ साहब


जिया मोहिउद्दीन सुना रहे हैं इब्ने इंशा जी की एक बेहद मज़ेदार रचना -

Monday, May 28, 2012

हम जहां पहुंचे कामयाब आये - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आपबीती – ५




(पिछली कड़ी से आगे)

कैंप डेविड समझौते के बाद अरब के लोगों का यह अनुरोध था कि उसका दफ़्तर काहिरा से कहीं और स्थानांतरित कर दिया जाये. लोटस का मुख्य संपादक जो संगठन का सचिव भी था, उसकी साइप्रस में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी. अब लोटस का संपादन करने वाला कोई नहीं था. इस समय एफ्ऱो-एशियाई साहित्यकार संगठन का दफ़्तर कहीं नहीं था. इस पत्रिका के संपादन के लिए मुझे आमंत्रित किया गया और यह भी फैसला हुआ कि संगठन का दफ़्तर बैरूत में स्थानांतरित कर दिया जाये. मैं अफ्ऱीकी एशियाई साहित्यकारों के संगठन और उसकी पत्रिका लोटस से चार साल तक जुड़ा रहा और फिर हमें इससे फ़ुर्सत मिल गयी.

बैरूत पर आक्रमण के एक महीने बाद मैं किसी-न-किसी तरह वहां से निकलने में सफल हो गया और पाकिस्तान पहुंच गया. यहां आते ही मैं एक बार फिर बीमार हो गया. अब जो यह एलिस के बारे में आप लोग पूछ रहे हैं तो मैं बताऊं. जब मैं कॉलेज में पढ़ाने लगा था तो जैसा मैंने बताया, मेरे कुछ साथी आक्सफ़ोर्ड से वापस लौटे तो वे मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक थे. उसी में एक साथी जो मार्क्सिस्ट था उसकी पत्नी जो अंग्रेज़ थी वह भी मार्क्सिस्ट थी. एक दिन उसने मुझसे पूछा, तुम उदास और निराश क्यों रहते हो, फिर स्वयं ही बोली, तुम्हें इश्क़ हो गया है क्या? तुम बीमार लगते हो. उसने कुछ किताबें मुझे दीं और कहा कि उन्हें पढ़ूं उसने स्पष्ट किया, तुम्हारा दुख बहुत कुछ व्यक्तिगत ढंग का है. ज़रा पूरे हिंदुस्तान पर नज़र डालो, अनगिनत लोग भूख और बीमारी के शिकार हैं. तुम्हारा दुख तो उनकी तुलना में कुछ भी नहीं है.

और तब प्रेम के विषय से मेरा ध्यान हट गया और मैंने व्यापक संदर्भों में सोचना आरंभ कर दिया. मेरी नज़्म ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’ इसी बदलते हुए सोच का परिणाम थी. मेरे मित्र जिनकी पत्नी का उल्लेख मैंने किया वह एक अच्छे साहित्यकार थे और एक कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे. उनके साथ शिक्षण के कार्य में व्यस्त हो गया. कोई तीन चार साल बाद मेरे मित्रा की अंग्रेज़ पत्नी की एक बहन उन लोगों से मिलने अमृतसर आयी, जहां मैं पढ़ा रहा था. मेरी उस महिला से जब मुलाक़ात हुई तो हम मित्र बन गये लेकिन उन्हीं दिनों युद्ध छिड़ गया और वह महिला अपने देश वापस न लौट सकी. मैं भी कैंब्रिज जाने वाला था मगर न जा सका और इस तरह हमारी मित्राता गहरी होती गयी और एक दिन हमने शादी कर ली. वह महिला एलिस थी.

जहां तक बैरूत में मेरे प्रवास का संबंध है तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं फ़िलिस्तीनियों का समर्थक था जिन्हें एक षड्यंत्र द्वारा अपने देश से निकाल दिया गया था. यह अजीब बात थी कि इज़राइली जिन्हें नाज़ियों के हाथों कठोर यातना झेलनी पड़ी थी, वे भी अब फ़िलिस्तीनियों को इसी प्रकार कष्ट देने के लिए उतारू थे, जबकि फ़िलिस्तीनियों ने इज़राइलियों का कुछ नहीं बिगाड़ा था. लेकिन शायद इज़राइलियों के अत्याचारी व्यवहार के पीछे हिंसक मनोग्रंथि काम कर रही थी. शक्तिशाली का साथ तो सब देते ही हैं क्योंकि उसमें कोई हानि नहीं होती. कमज़ोर का साथ देने वाले कम होते हैं और उसमें केवल हानि ही हिस्से में आती है. मैंने बैरूत प्रवास के दिनों में कमज़ोर का साथ देने को अपना रचनात्मक धर्म स्वीकार किया था.

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मुझसे पहली मुहब्बत मेरी महबूब न मांग 
मैनें समझा कि तू तो दरख्शां है हयात  
तेरा गम है तो गमे - दहर का झगडा क्या है 
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात 
तेरी आँखों के सिवा दुनियां में रखा क्या हैं ?

       तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं  हो जाये 
        यूँ न था , मैने फकत चाहा था यूँ हो जाये 

और भी दुःख है जमाने में मुहब्बत के सिवा 
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा 
अनगिनत सदियों के तारीक  बहीमाना  तिलिस्म 
रेशमो - अतलसो - कम ख्वाब में बुनवाये हुए 
जा - ब - जा बिकते कूचा - ओ - बाज़ार में जिस्म 
खाक  में लिथड़े हुए खून में नहलाये हुए 
        
       लौट  जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे 
       अब भी दिलकश है तेरा हुस्न , मगर क्या कीजे 

और भी दुख है जमाने में मुहोब्बत के सिवा 
राहतें और भी है वस्ल कि राहत के सिवा 
मुझसे पहली से मुहब्बत मेरे महबूब न मांग 

             
(दरख्शां - रौशन, हयात - जीवन, गमे दहर - जमाने का दुःख, आलम - दुनियां, सबात - ठहराव, निगूं होना- बदल जाना,  वस्ल की राहत - मिलन का आनंद, तारीक - अँधेरा, बहीमाना - पशुवत,  रेशमो - अतलसो - कमख्वाब - रेशम, अलतस और मलमल, जा - ब - जा  - जगह - जगह.)

Sunday, May 27, 2012

हम जहां पहुंचे कामयाब आये - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आपबीती – ४




(पिछली कड़ी से आगे)

मैं मास्को के बाद लंदन चला गया और लंदन में दो वर्ष तक रहा. मैं लंदन से लाहौर आने के बजाय कराची लौट आया. कराची में मैं मिस्टर महमूद हारून के निवास स्थान पर ठहरा. उनकी बहन जो डाक्टर थीं और मेरी मित्रा थीं, उन्होंने मुझे लिखा कि श्रीमाती हारून बीमार हैं और आपको देखना और मिलना चाहती हैं. मेरे आने पर श्रीमती हारून ने मुझे बताया कि उनका जो फ़लाही फ़ाउंडेशन है उसके अधीन स्कूल, अस्पताल और अनाथालय चल रहा है. उनके लड़के के पास फ़ाउंडेशन चलाने के लिए समय नहीं है क्योंकि वह व्यापार तथा राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहे हैं. अच्छा होगा कि फ़ाउंडेशन की व्यवस्था मैं संभाल लूं. मैंने फ़ाउंडेशन के स्थान पर उसकी गतिविधियों का निरीक्षण किया तो देखा कि वह गंदी बस्ती का इलाक़ा था, जहां मछुआरे, ऊंट वाले, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति रहा करते थे. मुझे यह इलाक़ा अच्छा लगा, और हमने इस क्षेत्र में अपनी गतिविधि तेज़ कर दी. स्कूल को कॉलेज में परिवर्तित कर दिया, एक तकनीकी संस्थान भी स्थापित किया और अनाथालय की भी व्यवस्था की. इस प्रकार कोई आठ साल तक मैं शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़ा रहा. इस बीच 65 और 71 के युद्ध भी हुए. इन दोनों युद्धों के दौरान मैं अत्यधिक मानसिक तनाव से प्रभावित रहा. उसका कारण यह था कि मुझसे बार-बार देशभक्ति के गीत लिखने की फ़रमाइश की जा रही थी. मेरे इनकार पर यह ज़ोर दिया जाता कि देशभक्ति और मातृभूमि की मांग यही है कि मैं युद्ध के या देशभक्ति के गीत लिखूं. लेकिन मेरा तर्क यह था कि युद्ध अनगिनत व्यक्तियों के लिए मृत्यु का कारण बनेगा और दूसरे पाकिस्तान को इस युद्ध से कुछ नहीं मिलने वाला है. इसलिए मैं युद्ध के लिए कोई गीत नहीं लिखूंगा. लेकिन मैंने 65 और 71 के युद्धों के विषय में नज़्में लिखीं, 65 के युद्ध से संबंधित मेरी दो नज़्में हैं....

बांग्लादेश युद्ध के ज़माने में मैंने तीन-चार नज़्में लिखीं. लेकिन उन नज़्मों की रचना में युद्ध-गीतों का आग्रह करने वालों को मुझसे और भी निराशा हुई. परिणामस्वरूप मुझे सिंध में भूमिगत हो जाना पड़ा. युद्ध समाप्त हुआ तो पाकिस्तान के दो टुकड़े हो चुके थे.

चुनाव के बाद फ़ौजी सरकार समाप्त हो गयी थी और भुट्टो के नेतृत्व में पीपुल्स पार्टी की सरकार स्थापित हो चुकी थी. उनसे मेरे अच्छे संबंध थे उस ज़माने में जब वह विदेश मंत्राी थे और उस समय भी जब वह विपक्षी पार्टी के नेता थे. उन्होंने मुझे अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया. मैंने पूछा मेरा काम क्या होगा, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मैं पहले से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदार रह चुका हूं. क्यों न उसी क्षेत्रा में राष्ट्रीय स्तर पर कुछ काम करूं. मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और नेशनल कौंसिल ऑफ़ आर्ट्स (राष्ट्रीय कला परिषद्) की स्थापना की. इसके अतिरिक्त मैंने ‘फ़ोक आर्टस’ जो अब ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ोक हेरिटेज’ है, की स्थापना की. मैं इन परिषदों की देख-रेख में चार साल तक व्यस्त रहा कि सरकार फिर से बदल गयी. इस अवधि में मेरा गद्य और पद्य लिखने का क्रम लगातार जारी रहा. इसी अवधि में मेरी शायरी का अंग्रेज़ी, फ्ऱांसीसी, रूसी तथा अन्य दूसरी भाषाओं में अनुवाद होता रहा. ज़ियाउल हक़ के शासन काल में मेरे प्रभाव को नकार दिया गया. वैसे भी इस सरकार में संस्कृति का महत्व पहले जैसा नहीं रहा था, मैंने सोचा मुझे कुछ और करना चाहिए .

मैं एशियाई और अफ़्रीकी साहित्यकार संगठन के लिए कुछ-न-कुछ करता ही रहता था. उनकी गोष्ठियों में भी भागीदारी होती रहती थी. उस संगठन का दफ़्तर काहिरा में था जहां से उस संगठन की पत्रिका लोटस (Lotus) का प्रकाशन होता था.

(अगली किस्त में समाप्य)

Saturday, May 26, 2012

हम जहां पहुंचे कामयाब आये - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आपबीती – ३



(पिछली किस्त से आगे)

उस समय मेरे सामने दो रास्ते थे या तो विदेश सेवा से संबंद्ध हो जाता या फिर सिविल सेवा से. लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया. यह वह ज़माना था जब पाकिस्तान के लिए आंदोलन और भारतीय कांग्रेस का स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था. मेरे एक पुराने मित्रा जो एक बड़े ज़मींदार भी थे और जो पंजाब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहने के बाद मुस्लिम लीग में आ गये थे मुझसे कहने लगे कि मैं सिविल सेवा में जाने की इच्छा समाप्त कर दूं क्योंकि वह लाहौर से एक अंग्रेज़ी दैनिक निकालने की योजना बना रहे थे. उन्होंने उस अख़बार का संपादन करने का प्रस्ताव दिया जो मैंने स्वीकार कर लिया और मैंने जनवरी 1947 में लाहौर आकर पाकिस्तान टाइम्स का संपादन संभाल लिया. मैं चार साल पाकिस्तान टाइम्स का संपादक रहा. इसी अवधि में पाकिस्तान टेªड यूनियन का उपाध्यक्ष भी मुझे बना दिया गया. 1948 में नागासाकी और हिरोशिमा पर होने वाली बमबारी के बाद कोरियाई युद्ध भी छिड़ गया. इस बीच स्काटहोम से यह अपील आयी कि हम शांति-स्थापना के लिए आंदोलन चलायें. उस अपील के समर्थन में अमन कमेटी की स्थापना हुई और मुझे उसका संचालक बना दिया गया. अब मैं ट्रेड यूनियन, अमन कमेटी और पाकिस्तान टाइम्स तीनों मोर्चे पर सक्रिय था और सक्रियता तथा कार्यशैली के लिहाज़ से यह बहुत व्यस्त समय था. उसी ज़माने में आई.एल.ओ की एक मीटिंग में भाग लेने के लिए पहली बार देश से बाहर जाने का अवसर मिला. मैंने सन फ्ऱांसिस्को के अतिरिक्त जेनेवा में भी दो अधिवेशनों में भाग लिया और इस तरह अमेरिका और यूरोप से मैं पहली बार परिचित हुआ.

1950 में मेरी मुलाक़ात अपने एक पुराने मित्रा से हुई. यह जनरल अकबर ख़ान थे जो उस वक़्त फ़ौज में चीफ़ आफ़ जनरल स्टाफ़ नियुक्त हुए थे. जनरल अकबर ने बर्मा और कश्मीर के मोर्चे पर होने वाले युद्धों में बड़ा नाम कमाया था. मैं इस साल मरी में छुट्टियां बिताने गया हुआ था. वहीं उनसे भेंट हुई. बातों के दौरान उन्होंने कहा कि हम लोग फ़ौज में हैं. उन्होंने यह भी बताया कि जिन्होंने कश्मीर में हुई मोर्चेबंदी का सामना किया है वे देश की वर्तमान परिस्थिति से असंतुष्ट हैं और यह मानते हैं कि देश का नेतृत्व कायरों के हाथों में है. हम अभी तक अपना कोई संविधान नहीं बना पाये. चारों ओर अव्यवस्था और वंशवाद का चलन है. चुनाव की कोई संभावना नहीं, हम लोग कुछ करना चाहते हैं. मैंने पूछा क्या करना चाहते हो? उनका जवाब था हम सरकार का तख़्ता पलटना चाहते हैं और एक विपक्षी सरकार बनाना चाहते हैं. मैंने कहा यह तो ठीक है लेकिन उन्होंने मेरी राय भी मांगी. मैंने कहा यह तो सब फ़ौजी क़दम है. इसमें मैं क्या राय दे सकता हूं. इस पर जनरल अकबर ख़ान ने मुझे अपनी गोष्ठियों में आने और उनकी योजनाओं के बारे में जानकारी लेने की बात कही. मैं अपने दो ग़ैर-फ़ौजी दोस्तों के साथ उनकी गोष्ठी में गया और उनकी योजनाओं से अवगत हुआ. उनकी योजना यह थी कि राष्ट्रपति भवन, रेडियो स्टेशन वगै़रह पर क़ब्ज़ा कर लिया जाये और फिर राष्ट्रपति से यह घोषणा करवा दी जाये कि सरकार का तख़्ता पलट दिया गया है और एक विपक्षी सरकार सत्ता में आ गयी है. छह महीने के भीतर चुनाव कराये जायेंगे और देश का संविधान निर्मित किया जायेगा. इसके अतिरिक्त अनगिनत सुधार किये जायेंगे. इस पर पांच छः घंटे तक बहस होती रही और अंततः यह तय हुआ कि अभी कुछ न किया जाये क्योंकि अभी देश किसी भी ऐसी स्थिति से नहीं जूझ रहा है कि जिसके आधार
पर जनता को आंदोलित किया जाये. दूसरे, इस तरह की योजनाओं के क्रियान्वयन में ख़तरों का सामना करना पड़ता है. उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान थे. किसी तरह इस योजना की ख़बर सरकार के कानों तक पहुंच गयी.

मैं तो इस अवधि में उन सभी घटनाओं को भूल चुका था कि अचानक सुबह चार बजे मेरे घर को फ़ौजियों ने घेर लिया और मुझसे कहा गया कि मैं उनके साथ चलूं. मैंने कारण पूछा तो मुझे जवाब मिला कि मुझे गवर्नर जनरल के आदेश से गिरफ़्तार किया जा रहा है. चार महीने तक मुझे कै़द रखा गया और फिर मुझे मालूम हुआ कि मुझे क्यों क़ैद किया गया.

संवधिान सभा ने एक विशेष अधिनियम को पारित किया और उसे रावलपिंडी षड्यंत्र अधिनियम का नाम दिया गया. उस अधिनियम के तहत हम पर गुप्त मुक़द्दमा चलाया गया. अंग्रेज़ों के ज़माने से ही षड्यंत्र संबंधी क़ानून बड़े ख़राब थे. आप कुछ कर नहीं सकते थे. अगर यह सिद्ध हो जाये कि दो व्यक्तियों ने मिलकर क़ानून तोड़ने की योजना बनायी है तो उसे षड्यंत्र का नाम दे दिया जाता था और अगर कोई तीसरा व्यक्ति इसकी गवाही दे दे तो फिर अपराध सिद्ध मान लिया जाता था. सरकार ने अधिनियम बनाकर बचाव करने की सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया था. बनाये जाने वाले अधिनियम के तहत तो केवल सज़ा ही मिल सकती थी, भागने का कोई रास्ता भी नहीं था. यह मुक़द्दमा डेढ़ साल तक चलता रहा और हममें से हर एक के लिए उसके पद के अनुसार भिन्न-भिन्न दंड निश्चित किये गये. जनरल को दस साल, ब्रिगेडियर को सात साल, कर्नल को छः साल और हम सब असैनिकों को उससे कम यानी चार साल की क़ैद की सज़ा सुनायी गयी.

मेरी हिरासत का यही वह समय था जो रचनात्मक रूप से मेरे लिए बहुत उर्वर सिद्ध हुआ. मेरे पास लिखने-पढ़ने के लिए वक़्त ही वक़्त था, फिर मुझमें शासकों के विरुद्ध बहुत आक्रोश और क्रोध था, क्योंकि मैं निर्दोष था. इसी अवधि में मेरी शायरी के दो संग्रह, काल कोठरी के उस दौर में तैयार हो गये. एक तो हिरासत के दिनों में ही प्रकाशित हो गया था और दूसरा मेरी रिहाई के बाद प्रकाशित हुआ. जब आप को चार साल के क़रीब जेल में रखा गया हो और बंदी होने का दुख भी आपके हिस्से में आया हो, तो निश्चित रूप से बाहर की दुनिया में आपका मूल्य बढ़ जाता है. जब मैं जेल से बाहर आया तो मुझे अनुभव हुआ कि मैं पहले की तुलना में अधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय हो गया हूं. मैं दोबारा पाकिस्तान टाइम्स से जुड़ गया और मैंने अमन कमेटी तथा ट्रेड यूनियन से अपने संबंध फिर से स्थापित कर लिये. यह तीन चार साल का समय ऐसी ही गहमागहमी में गुज़र गया. पाकिस्तान में वामपंथी आंदोलनों पर पाबंदी लगा दी गयी. यही स्थिति तीन चार साल तक जारी थी कि देश में पहला मार्शल लॉ लागू हो गया और पहली सैनिक सरकार स्थापित हो गयी, जिसका अर्थ था कि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के गिरफ़्तार किया जा सकता है.

उस समय के मार्शल लॉ ने एक अत्याचार यह भी किया कि हर उस व्यक्ति को पकड़ना शुरू कर दिया गया जिसका नाम 1920 के बाद की पुलिस रिपोर्टों में दर्ज़ मिला था. इस तरह जेल में हमें नब्बे साल और अस्सी साल के बूढ़े मिले, कुछ की तपेदिक तथा अन्य बीमारियों के कारण जेल में ही मृत्यु हो गयी. मैंने लाहौर क़िला में डेढ़ महीने गुज़ारा और फिर चार पांच महीने के बाद मुझे रिहा कर दिया गया. मैंने फिर पाकिस्तान टाइम्स के दफ़्तर की ओर रुख़ किया और तब मैंने देखा कि उसका दफ़्तर पुलिस के घेरे में था. मेरे पूछने पर पता चला कि पाकिस्तान टाइम्स पर फ़ौजी सरकार ने क़ब्जा कर लिया है और इस तरह मेरी पत्राकारिता का अंत हो गया. मैं ऊहापोह में था कि क्या करूं. उन दिनों एक अमीर वर्ग जो मेरी शायरी को पसंद करता था, मेरी चिंता से अवगत था. उन लोगों ने पूछा आप क्या करना चाहते हैं? मैंने कहा मुझे नहीं मालूम तो किसी ने सुझाव दिया, क्यों न संस्कृति से संबंधित कोई गतिविधि आरंभ की जाये. मैंने कहा यह अच्छा विचार है और इस
प्रकार हमने लाहौर में ‘आर्ट कौंसिल’ की स्थापना की. कौंसिल एक पुराने और टूटे-फूटे घर में थी जो आज के आलीशान भवन जैसा आकर्षक नहीं था. कौंसिल का आरंभ हुआ और उसके भवन में प्रदर्शनियों, नाटकों और आयोजनों का तांता लगा रहता था. तीन चार साल तक यह गतिविधि चलती रही और मैं इसी अवधि में बीमार पड़ गया. पहली बार दिल का दौरा पड़ा.

और इसी बीच मुझे लेनिन विश्व शांति पुरस्कार दिये जाने की घोषणा हुई. किसी ने मुझे फोन पर ख़बर सुनायी तो मुझे विश्वास नहीं हुआ, मैंने जवाब में कहा बकवास मत करो, मैं पहले ही बीमार हूं. मेरे साथ ऐसा मज़ाक न करो. उसने उत्तर में कहा, मैंने टेलीप्रिंटर पर यह ख़बर ख़ुद देखी है, तुम्हारे साथ पुरस्कार पाने वालों में पिकासो और दूसरे भी हैं. जब मैं स्वस्थ हो गया तो मुझे पुरस्कार ग्रहण करने और मास्को आने के लिए आमंत्रित किया गया.

(जारी)

Friday, May 25, 2012

हम जहां पहुंचे कामयाब आये - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आपबीती – २



(पिछली किस्त से जारी)

मेरी उम्र 17-18 साल के आस-पास थी और जैसा कि होता है मैं बचपन से ही साथ खेलने वाली एक अफ़ग़ान लड़की की मुहब्बत में गिरफ़्तार हो गया. वह बचपन में तो सियालकोट में थी लेकिन बाद में उसका ख़ानदान आज के फैसलाबाद के समीप एक गांव में आबाद हो गया था. मेरी एक बहन की उसी गांव में शादी हुई थी. जब मैं अपनी बहन के पास गया तो उसके घर भी गया, वह लड़की तब पर्दा करने लगी थी. एक सुबह मैंने उसे तोते को कुछ खिलाते हुए देखा. वह बहुत ख़ूबसूरत लग रही थी. हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और एक दूसरे की मुहब्बत में गिरफ़्तार हो गये. हम छुप-छुप के मिलते रहे और एक दिन जैसा कि होता है उसकी कहीं शादी हो गयी और जुदाई का यह अनुभव छः-सात बरस तक मुझे उदास करता रहा. इस अवधि में मेरी शिक्षा भी जारी रही और शायरी भी. स्थानीय मुशायरे में तीसरी बार जब मुझे भाग लेने का अवसर मिला तो मेरी शायरी को काफ़ी सराहा गया और इस तरह लाहौर जैसे शहर की बड़ी साहित्यिक हस्तियां मेरी शायरी से परिचित हुईं और सबने मुझे अपना आशीर्वाद देना चाहा. मैं अब अच्छा ख़ासा शायर बन चुका था.

यही वह दौर था जब उपमहाद्वीप में उग्रपंथ के पहले आंदोलन का आरंभ हुआ. उस आंदोलन के प्रभाव हमारे कॉलेज के अंदर भी पहुंच रहे थे और मेरा एक अभिन्न मित्रा जिसे बाद में एक प्रसिद्ध संगीतकार ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के रूप में जाना गया, उस आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्त्ता था. वह बम बनाने के लिए कॉलेज की प्रयोगशाला से तेज़ाब चुराने के अपराध में गिरफ़्तार कर लिया गया. उसे तीन साल की सज़ा भी सुनायी गयी. वह कुछ समय तक ज़रूर जेल में रहा था लेकिन बाद में वह अपने प्रभावशाली पिता के रसूख के कारण छूट गया. मेरी बहुत सी जानकारियों का माध्यम वही था. वह अक्सर अपने आंदोलन का साहित्य मेरे कमरे में छोड़ जाता और जब कभी मैं उसे पढ़ता तो मेरे ऊपर जुनून सा छा जाता था, क्योंकि मेरे पिता अंग्रेज़ों के वफ़ादार और उपाधि प्राप्त थे लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि मैं उग्रपंथियों के आंदोलन और उसके बहुत से राजनीतिक समूहों से परिचित हो गया. मेरे ऊपर उसका कोई गहरा प्रभाव नहीं पड़ा लेकिन वह सब कुछ मेर लिए महत्वहीन नहीं था.

तीन चार साल बाद मैंने पहले अंग्रेज़ी में और फिर अरबी में एम०ए० कर लिया और फिर मैंने शिक्षण का कार्य अपना लिया. उससे मुझे काफ़ी सहारा मिला और खानदान को आर्थिक संकटों से उबारने में सहायता भी . इस अवधि में मेरे कॉलेज के ज़माने के दो साथी आक्सफ़ोर्ड से मार्क्सिस्ट होकर लौटे थे . उनके अलावा उच्च घरानों के कुछ और लड़के भी इंग्लैंड की यूनवर्सिर्टियों से कम्युनिस्ट विचार लेकर लौटे थे. उनमें से कुछ तो राजनीतिक दृष्टिकोण से व्यस्त हो गये, कुछ ने नौकरी के चक्कर में इस तरह के विचार को छोड़ दिया. लेकिन इसी टोली के नेतृत्व में साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन का आंरभ हुआ. यह साहित्यिक आंदोलन, कम्युनिस्ट या मार्क्सिस्ट आंदोलन नहीं था. वैसे उसमें सक्रिय भाग लेने वालों में कुछ कम्युनिस्ट भी थे और मार्क्सिस्ट भी. असल में प्रगतिशील आंदोलन साहित्य में सामाजिक यथार्थ को बढ़ावा देने से संबंध रखता था और रूढ़िबद्ध होकर कविता करने को बुरा समझता था. भाषा की कलाबाज़ी भी इस आंदोलन के लिए व्यर्थ थी. इस आंदोलन के प्रभावस्वरूप यथार्थवादी और राजनीतिक गीतों के चलन को बढ़ावा मिला. इस प्रकार का साहित्यिक चलन यूरोप और अमेरिका में भी फ़ासीवाद विरोधी साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में उभरा, जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक सरोकार वाले साहित्य का जन्म हुआ .

1932-35 के मध्य का यही वह समय था जब उस साहित्यिक, राजनीतिक आंदोलन से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ. मज़दूरों, श्रमजीवियों और किसानों के आंदोलनधर्मी गीत और राजनीतिक अभिव्यक्ति और नई-पुरानी काव्य-पद्धति के मिश्रण को लोगों ने सराहा और उन्हें पसंद भी किया. जब 1941 में मेरा पहला संग्रह प्रकाशित हुआ तो वह तेज़ी से बिक गया. फिर द्वितीय विश्व युद्ध की लहर आई लेकिन हम लोगों ने उसका ज़्यादा नोटिस नहीं लिया. हमारे विचार में उस युद्ध से ब्रिटेन और जर्मनी का सरोकार था मगर 1941 में जापान भी उस युद्ध में शामिल हो गया तो हमें कुछ आभास हुआ. क्योंकि उस समय अगर एक ओर जापानी भारत की सीमा तक आ गए थे तो दूसरी ओर नाज़ियों और फासिस्टों के क़द़म मास्को और लेनिनग्राद तक पहुंच गये थे और तभी हमने महसूस किया कि युद्ध से हमारा संबद्ध होना आवश्यक है. इसलिए हम फ़ौज में शामिल हो गये. मुझे याद है पहले दिन जनसंपर्क विभाग के निरीक्षक एक ब्रिगेडियर के सामने मेरी पेशी हुई. वह आपैचारिक रूप से फ़ौजी नहीं था, वह बहुत ज़िंदादिल आइरिश था और लंदन टाइम्स से संबंध रखने वाला एक पत्राकार था. मुझे देखकर उसने कहा तुम्हारे बारे में पुलिस की खुफ़िया रिपोर्ट कहती है कि तुम एक पक्के कम्युनिस्ट हो, बताओ हो या नहीं. मैंने कहा मुझे नहीं पता कि पक्का कम्युनिस्ट कौन होता है. मेरा यह उत्तर सुनकर उसने कहा मुझे इससे कोई मतलब नहीं, चाहे तुम फ़ासीवादी विचार ही क्यों न रखते हो, जब तक तुम हमें कोई धोखा नहीं देते; मैं समझता हूं तुम धोखा नहीं दोगे. मैंने समर्थन में सिर हिला दिया.

यही वह ज़माना था जब ब्रिटेन और मित्रा देशों के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं थे. उधर महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ कर दिया था, जो पूरे देश में आग की तरह फैल गया था. ब्रिटेन के सामने दो संकट थे. एक तो फ़ौज़ में लोगों की भर्ती और दूसरे सरकार के विरुद्ध ज़ोर पकड़ता हुआ जन आंदोलन. ब्रिटेन की फ़ौज के ब्रिगेडियर ने मुझसे इस आंदोलन के विषय में विचार-विमर्श करते हुए पूछा तो मैंने कहा कि ब्रिटेन अपने अस्तित्व के लिए भाग ले रहा है, जापान ब्रिटेन के लिए एक बड़ा ख़तरा है और अगर जापान तथा जर्मनी विजयी होते हैं तो ब्रिटेन को सौ-दो सौ साल तक गु़लाम  रहने का दंश झेलना होगा, और इसका मतलब यह है कि हमें अपने देश को इस कष्ट से सुरक्षित रखने के लिए ब्रिटेन की फ़ौज का हिस्सा बनकर लड़ना चाहिए. अंग्रेज़ अपने लिए नहीं लड़ रहा है वह भारत के लिए लड़ रहा है. मेरे इस तर्क को सुनकर उसने कहा तुम जो कुछ कह रहे हो ये तो सब राजनीति है मगर इस तर्क को फ़ौज के लिए स्वीकार्य कैसे बनाया जाये? मैंने कहा कि इस विचार को फ़ौज के लिए स्वीकार्य बनाने का तरीक़ा वही होना चाहिए जो कम्युनिस्टों का है. उसने चौंककर पूछा क्या मतलब? मेरा जवाब था, हम कम्युनिस्ट एक छोटी टोली बनाते हैं. फ़ौज के हर यूनिट में इस तरह की एक विशेष टोली बनाने के बाद हम अफ़सरों को यह बताते हैं कि फ़ासिज़्म क्या है और उन्हें यह भी समझाते हैं कि जापान और इटली वालों के इरादे क्या हैं. इसके बाद उन अफ़सरों से कहा जाता है कि वे उक्त टोली में बतायी जाने वाली बातों को अपने यूनिटों के सिपाहियों को जाकर समझायें और बतायें.

इस तरह हम इस रणनीति के तहत पहले फ़ौजी अफ़सरों को मानसिक रूप से सुदृढ़ करते थे और फिर उनके माध्यम से आशिक्षित सिपाहियों को भी एक दिशा देते थे. इस पद्धति का विरोध भी बहुत हुआ. बात वायसराय, कमांडर-इन-चीफ़ और फिर इंडिया आफ़िस तक पहुंची. मुझसे कहा गया कि मैं अपनी योजना को लिखित रूप में प्रस्तुत करूं. अंततः इस योजना को मंज़ूरी मिल गयी और हमने फिर ‘जोश ग्रुप’ बनाये जो बहुत सफल रहा और इसके परिणामस्वरूप मैं ब्रिटेन द्वारा सम्मानित किया गया और तीन सालों में कर्नल बना दिया गया. उस ज़माने में ब्रितानी फ़ौज में एक भारतीय के लिए इससे ऊंचा फ़ौजी पद कोई और नहीं था. उस ज़माने में मुझे फ़ौज की कार्य पद्धति और ब्रितानी सरकार को जानने का अवसर मिला. मुझे पत्राकारिता का अनुभव भी उसी ज़माने में हुआ, क्योंकि सभी मोर्चे पर भारतीय फ़ौज के प्रचार का काम मेरे ही जिम्मे था और मैं बहुत हद तक भारतीय फ़ौज के लिए राजनीतिक अधिकारी (पॉलीटिकल कमिश्नर) का काम करने लगा. युद्ध की समाप्ति पर मैं फ़ौज से अलग हो गया.

(जारी)

Thursday, May 24, 2012

हम जहां पहुंचे कामयाब आये - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आपबीती – १



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आपबीती – १

मेरा जन्म उन्नीसवीं सदी के एक ऐसे फक्कड़ व्यक्ति के घर में हुआ था जिसकी ज़िंदगी मुझसे कहीं ज़्यादा रंगीन अंदाज़ में गुज़री. मेरे पिता सियालकोट के एक छोटे से गाँव में एक भूमिहीन किसान के घर पैदा हुए, यह बात मेरे पिता ने बताई थी और इसकी तस्दीक गाँव के दूसरे लोगों द्वारा भी हुई थी . मेरे दादा के पास चूँकि कोई ज़मीन नहीं थी इसलिए मेरे पिता गाँव के उन किसानों के पशुओं को चराने का काम करते थे जिनकी अपनी ज़मीन थी. मेरे पिता कहा करते थे कि पशुओं को चराने गाँव के बाहर ले जाते थे जहाँ एक स्कूल था . वह पशुओं को चरने के लिए छोड़ देते और स्कूल में जाकर शिक्षा प्राप्त करते, इस तरह उन्होंने प्राथमिक स्तर की शिक्षा पूरी की . चूँकि गांव में इससे आगे की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी, वह गाँव से भाग कर लाहौर पहुँच गए. उन्होंने लाहौर की एक मस्जिद में शरण ली . मेरे पिता कहते थे कि वह शाम को रेलवे स्टेशन चले जाया करते थे और वहाँ कुली के रूप में काम करते थे . उस ज़माने में ग़रीब और अक्षम छात्र मस्जिदों में रहते थे और मस्जिद के इमाम से या आस-पास के मदरसों में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे . इलाक़े के लोग उन छात्रों को भोजन उपलब्ध कराते थे .

जब मेरे पिता मस्जिद में रहा करते थे तो उस ज़माने में एक अफ़गानी नागरिक जो पंजाब सरकार का मेयर था, मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आया करता था. उसने मेरे पिता से पूछा कि क्या वह अफ़ग़ानिस्तान में अँग्रेज़ी अनुवादक के तौर पर काम करना पसंद करेंगे, तो मेरे पिता ने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए अफ़ग़ानिस्तान जाने का इरादा कर लिया. यह वह समय था जब अफ़ग़ानिस्तान के राजमहल में आए दिन परिवर्तन होता रहता था . अफ़ग़ानिस्तान और इंग्लैंड के बीच डूरंड संधि की आवश्यकता का अनुभव भी उसी समय में हुआ और इसीलिए अफ़ग़ानिस्तान के राजा ने मेरे पिता को अँग्रेज़ों के साथ बात-चीत करने में सहायता करने के उद्देश्य से दरबार से अनुबंधित कर लिया. इसके बाद वह मुख्य सचिव और फिर मंत्री भी नियुक्त हुए. उनके ज़माने में विभिन्न क़बीलों का दमन किया गया जिसके परिणामस्वरूप हारने वाले क़बाइल (क़बीले का बहुवचन) की ख़ास औरतों को राजमहल के कारिंदों में वितरित कर दिया जाता था. ये औरतें मेरे पिता के हिस्से में भी आईं, मुझे नहीं मालूम कि उनकी संख्या तीन थी या चार .

बहरहाल अफ़ग़ानिस्तान के राजमहल में पंद्रह साल सेवा करने के बाद वह तंग आ गए और उनका ऊब जाना स्वाभाविक भी था क्योंकि राजा के अफ़ग़ानी मूल के कर्मचारियों को एक विदेशी का दरबार में प्रभावी होना खटकता था. मेरे पिता को प्रायः ब्रितानी एजेंट घोषित किया जाता और जब उस अपराध के फलस्वरूप उन्हें मृत्युदंड दिए जाने की घोषणा होती तो नियत समय पर यह सिद्ध हो जाता के वह निर्दोष हैं और उन्हें आगे पदोन्नति दे दी जाती . लेकिन एक दिन उन्होंने फ़कीर का भेस बदला और अफ़गानिस्तान के राजमहल से फ़रार हो गए और लाहौर वापस आ गए . लेकिन यहाँ वापस आते ही उन्हें अफ़ग़ानी जासूस होने के आरोप में पकड़ लिया गया . मेरे पिता की तरह फक्कड़ाना स्वभाव रखने वाली एक अँग्रेज़ महिला भी उस ज़माने में डाक्टर के रूप में दरबार से जुड़ी थी. उसका नाम हैमिल्टन था. उससे मेरे पिता की मित्रता हो गई थी .


अफ़ग़ानिस्तान के राजा से उसे जो भी पुरस्कार मिला था उसे उसने लंदन में सुरक्षित कर रखा था . इस प्रकार जब मेरे पिता अफ़ग़ानिस्तान से निकल भागे तो उसने उन्हें लिखा ‘तुम लंदन आ जाओ’. इस आमंत्रण पर मेरे पिता लंदन पहुँच गए और जब ब्रिटेन की सरकार को उनके लंदन आगमन की सूचना मिली तो मेरे पिता को यह संदेश मिला कि चूँकि अब तुम लंदन में हो तो मेरे दूत क्यों नहीं बन जाते ? मेरे पिता ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. और साथ ही उन्होंने कैंब्रिज में अपनी आगे की शिक्षा का क्रम भी जारी रखा . वहीं उन्होंने क़ानून की डिग्री भी प्राप्त की. मेरे पिता का नाम सुल्तान था इसलिए मैं फ़ारसी का यह मुहावरा तो अपने लिए दुहरा ही सकता हूं कि ‘पिदरम सुल्तान बूद’ (मेरे पिता राजा थे).

क़ानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद मेरे पिता सियालकोट लौट आए. मेरी आरंभिक शिक्षा मुहल्ले की एक मस्जिद में हुई. शहर में दो स्कूल थे एक स्कॉच मिशन की और दूसरा अमरीकी मिशन की निगरानी में चलता था. मैंने स्कॉच मिशन के स्कूल में प्रवेश ले लिया . यह हमारे घर से नज़दीक था . यह ज़माना ज़बरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल का था . प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था और भारत में कई राष्ट्रीय आंदोलन आकर्षण का केंद्र बन रहे थे . कांग्रेस के आंदोलन में हिंदू और मुसलमान दोनों ही क़ौमें हिस्सा ले रही थीं लेकिन इस आंदोलन में हिंदुओं की बहुलता थी . दूसरी ओर मुसलमानों की तरफ़ से चलाया जाने वाला खि़लाफ़त आंदोलन था .

प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर परिदृश्य यह था कि तुर्क क़ौम ब्रितानी और यूनानी आक्रांताओं के विरुद्ध पंक्तिबद्ध थी परंतु उस्मान वंशीय खि़लाफ़त को बचाया नहीं जा सका और तुर्की अंततः कमाल अतातुर्क के क्रांतिकारी विचारों के प्रभाव में आ गया जिन्हें आधुनिक तुर्की का निर्माता कहा जाता है . एक तीसरा आंदोलन सिक्खों का अकाली आंदोलन था जो सिक्खों के सभी गुरुद्वारों को अपने अधीन लेने के लिए आंदोलनरत था . इस प्रकार लगभग छह-सात साल तक हिंदू, मुस्लिम और सिक्ख तीनों ही अंग्रेज़ के विरुद्ध एक साझे एजेंडे के तहत आंदोलन चलाते रहे .

हमारे छोटे से शहर सियालकोट में जब भी महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू और सिक्खों के नेता आते थे तो पूरा शहर सजाया जाता, बड़े-बड़े स्वागत द्वार फूलों से बनाए जाते थे और पूरा शहर उन नेताओं के स्वागत में उमड़ पड़ता था. राजनीतिक गहमागहमी का यह दौर हमारे मन पर अपने प्रभाव छोड़ने का कारण बना .

इसी दौरान रूस में अक्टूबर क्रांति घटित हो चुकी थी और उसका समाचार सियालकोट तक भी पहुँच रहा था. मैंने लोगों को कहते हुए सुना कि रूस में लेनिन नाम के एक व्यक्ति ने वहाँ के बादशाह का तख़्ता उलट दिया है और सारी संपत्ति श्रमजीवियों में बांट दी है .

स्कूल की पढ़ाई का यही वह ज़माना था जब शायरी में मेरी रुचि उत्पन्न हुई. इसके पीछे दो कारण थे. हमारे घर के पास एक नौजवान किताबें किराए पर पढ़ने के लिए दिया करता था. मैंने उससे किराए पर किताबें लेनी शुरू कर दीं और धीरे-धीरे मैंने उसकी ऐसी सभी किताबें पढ़ डालीं जो क्लासिक साहित्य से संबंधित थीं. मेरा सारा जेब ख़र्च भी किताबें किराए पर लेने में खर्च हो जाता था. उस ज़माने में सियालकोट का एक प्रसिद्ध साहित्यिक व्यक्तित्व अल्लामा इक़बाल का था जिनकी नज़्मों को बड़े शौक से सभाओं में गाया और पढ़ा जाता था. वहाँ एक प्राथमिक विद्यालय भी था जिसमें मैं पढ़ता था. वहाँ मुशायरे भी होते थे, यह मेरे स्कूल की शिक्षा के अंतिम दिन थे. हमारे हेडमास्टर ने हमसे एक दिन कहा कि मैं तुम्हें एक मिसरा देता हूँ, तुम इस पर आधारित पाँच छः शेर लिखो, हम तुम्हारे क़लाम (ग़ज़ल) को शायर इक़बाल के उस्ताद के पास भेजेंगे और वह जिस क़लाम को पुरस्कार का अधिकारी घोषित करेंगे उसे ही पुरस्कार मिलेगा . इस तरह मैंने शायरी के उस पहले मुक़ाबले में पुरस्कार के रूप में एक रुपया प्राप्त किया था, जो उस ज़माने में बहुत समझा जाता था . सियालकोट में दो साल गुज़ारने के बाद मैंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश ले लिया. सियालकोट से लाहौर आना रोमांच से भरपूर था. यूँ लगा जैसे कोई गाँव छोड़ के किसी अजनबी शहर में आ गए हों . उसकी वजह यह भी थी कि उस ज़माने में सियालकोट में न बिजली थी और न पानी के नल थे . भिश्ती पानी भरते थे या फिर कुओं से पानी भरा जाता था. कुछ बड़े घरों में पीने के पानी के कुएँ उपलब्ध थे . हम सब ही उस ज़माने में मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेनों की रौशनी में पढ़ते थे. यह लालटेन बड़ी ख़ूबसूरत हुआ करती थी. सियालकोट में मोटर कभी नहीं देखी . वहाँ के सभी अधिकारी बग्घियों में आते जाते थे. मेरे पिता के पास दो घोड़ों वाली बग्घी थी . जब मैं लाहौर आया तो हैरान रह गया . यहाँ मोटरें थीं, औरतें बिना बुर्क़े के नज़र आ रही थीं . और लोग अजनबी पहनावे अपने बदन पर पहने हुए थे . हमारे कॉलेज में आधे से अधिक शिक्षक अँग्रेज़ थे. हमारे अँग्रेज़ी के शिक्षक लैंघम (Langhom) थे, जो बहुत कड़े स्वभाव के थे, लेकिन शिक्षक बहुत अच्छे थे . मैंने अँग्रेज़ी के पर्चे में 150 में से 63 नंबर लिए तो सब दंग रह गए. कॉलेज में मेरा क़द बढ़ गया. और मुझे यह सलाह दी जाने लगी कि मैं इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी करूं . मैंने निश्चय कर लिया कि मैं परीक्षा में बैठूँगा लेकिन मैं इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी करने के बजाय धीरे-धीरे शायरी करने लगा. इस परिस्थति के लिए कई कारण ज़िम्मेदार थे. एक यह कि डिग्री प्राप्त करने से पहले ही मेरे पिता का निधन हो गया और हमें यह पता चला कि वह जो कुछ संपत्ति छोड़ गए हैं उससे कहीं अधिक कर्ज़ चुकाने के लिए छोड़ गए थे और इस तरह शहर का एक खाता-पीता ख़ानदान हालात के झटके में ग़रीब और असहाय हो गया .

दूसरा जो मेरे और मेरे ख़ानदान की परेशानियों का कारण बना वह व्यापक आर्थिक संकट और मंदी था जिसके प्रभाव से उस ज़माने में कोई भी व्यक्ति सुरक्षित न रह सका . मुसलमानों पर इसका प्रभाव अधिक पड़ा, चूँकि उनमें बहुतायत खेतिहर लोगों की थी . मंदी का प्रभाव कृषि पर अधिक पड़ा था . नतीजा यह हुआ कि गाँव से शहर की ओर पलायन आरंभ हो गया क्योंकि छोटी जगहों में रोज़गार उपलब्ध कराने वाले संसाधन नहीं थे और ऐसे संसाधन पर प्रायः हिंदुओं का क़ब्ज़ा था . सरकारी नौकरी भी एक रास्ता था लेकिन चूँकि मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में काफ़ी पिछडे़ हुए थे इसलिए यहाँ भी उनके लिए अधिक अवसर नहीं थे . मेरे और मेरे ख़ानदान के लिए यह ज़माना राजनीतिक और वैयक्तिक कारणों से परीक्षा और परेशानियों का था . इस तनाव और सोच-विचार को अभिव्यक्ति के माध्यम की आवश्यकता थी सो यह शायरी ने पूरी कर दी.

(जारी. उर्दू से लिप्यान्तरण और अनुवाद - मोहम्मद ज़फर इकबाल)

Friday, May 6, 2011

फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों चलो


फ़ैज़ साहब का एक दुर्लभ वीडियो



चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं
तोहमते-इश्क़ पोशीदा काफी नहीं
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो

दस्त-अफ्शाँ चलो, मस्तो-रक़्सां चलो
खाक-बर-सर चलो, खूं-ब-दामाँ चलो
राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो

हाकिम-ए-शहर भी, मजमए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी, संग-ए-दुश्ना म भी
सुबह-ए-नाशाद भी, रोज़-ए-नाकाम भी

इनका दमसाज़ अपने सिवा कौन है
शहर-ए-जानां में अब बा-सफा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है

रख्ते-दिल बांध लो दिलफिगारों चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों चलो

आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो

यही रचना सुनिये नय्यारा नूर की आवाज़ में -

आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो


बहुत साल पहले एक फ़िल्म देखी थी "मुहाफ़िज़ (In Custody)". इस फ़िल्म में शशि कपूर ने एक बड़े उर्दू शायर नूर का रोल अदा किया था. फ़िल्म में ओम पुरी भी थे और शबाना आज़मी भी. शायर नूर के माध्यम से निर्देशक इस्माइल मर्चेन्ट ने परम्परावाद और आधुनिकता के बीच की खाई को रेखांकित करने का प्रयास किया था. नूर की शायरी दर असल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी है इस फ़िल्म में. फ़ैज़ साहब की एक विशेष रचना मुझे बरसों से हॉन्ट करती रही है और ख़ासतौर पर इस फ़िल्म में शायर नूर के जनाज़े के वक़्त इस रचना का फ़िल्मांकन. यूट्यूब पर खोज करते हुए मुझे यह वीडियो मिल गया. देखिये



चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं
तोहमते-इश्क़ पोशीदा काफी नहीं
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो

दस्त-अफ्शाँ चलो, मस्तो-रक़्सां चलो
खाक-बर-सर चलो, खूं-ब-दामाँ चलो
राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो

हाकिम-ए-शहर भी, मजमए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी, संग-ए-दुश्ना म भी
सुबह-ए-नाशाद भी, रोज़-ए-नाकाम भी

इनका दमसाज़ अपने सिवा कौन है
शहर-ए-जानां में अब बा-सफा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है

रख्ते-दिल बांध लो दिलफिगारों चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों चलो

आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो

इसी रचना को ख़ुद फ़ैज़ साहब की आवाज़ में इसे एक दुर्लभ वीडियो में देखिये अगली पोस्ट में.

Thursday, May 5, 2011

मत रो बच्चे

अभी शाम को लगाया था पॉल रोब्सन का गीत "ओ मा बेबी मा कर्ली हैडेड बेबी". इसे बारहा सुनते हुए मुझे हमेशा यह खयाल आता रहा कि उर्दू के दिग्गज शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इसी थीम पर एक नज़्म लिखी थी - एक फ़िलिस्तीनी बच्चे के लिए लोरी. पेशे-ए-ख़िदमत है:


फ़िलिस्तीनी बच्चे के लिए लोरी

मत रो बच्चे
रो रो के अभी
तेरी अम्मी की आँख लगी है
मत रो बच्चे
कुछ ही पहले
तेरे अब्बा ने
अपने ग़म से रूख़सत ली है
मत रो बच्चे
तेरा भाई
अपने ख़्वाब की तितली के पीछे
दूर कहीं परदेस गया है
मत रो बच्चे
तेरी बाजी का
डोला पराए देस गया है
मत रो बच्चे
तेरे आँगन में
मुर्दा सूरज नहला के गए हैं
चन्द्रमा दफ़्ना के गए हैं
मत रो बच्चे
अम्मी, अब्बा, बाजी, भाई
चाँद और सूरज
रोएगा तो और भी तुझ को रूलवाएँगे
तू मुस्काएगा तो शायद
सारे इक दिन भेस बदल कर
तुझसे खेलने लौट आएँगे

Tuesday, March 1, 2011

जो गाह-गाह जुनूं इख्तियार करते रहे



हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी

हम देखेंगे
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी
उट्ठेगा अनल - हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो



 Iqbal Bano - Hum Dekhen Ge .mp3
Found at bee mp3 search engine
पुनश्च : माफ़ कीजिये, आप लोगों ने अगर ये कई बार सुना है | मेरे जैसों के लिए तो दुनिया अभी जादू का खिलौना ही है | आज ही सुना है और एक बार जो सुना तो पूरे दिन इसी को सुनता रहा, सो सुन लीजिये आप भी |