बिली जोएल का यह गीत अर्सा पहले यहां पोस्ट किया गया था. आज एक मित्र ने इसे दोबारा लगाने की मांग की है क्योंकि कई अन्य पोस्ट्स की तरह इसके प्लेयर ने भी काम करना बन्द कर दिया है. पेश है -
सन १९९३ में बिली जोएल का संग्रहणीय अलबम 'रिवर ऑफ़ ड्रीम्ज़' रिलीज़ हुआ था. एक अर्से से बिली मेरे प्रिय गायक-संगीतकारों में रहे हैं. विश्व के सबसे प्रतिभाशाली पियानोवादकों में शुमार किए जाने वाले बिली अपने गीत ख़ुद लिखते हैं और उनका संगीत भी बनाते हैं. 'रिवर ऑफ़ ड्रीम्ज़' के गीतों का स्वर बहुत गम्भीर है. यहां प्रस्तुत किये जा रहे उनके गीत 'वी आर टू थाउज़ैंड ईयर्स' को सुनिये और देखिए बिली जोएल कितने साफ़ शब्दों में कितनी ज़रूरी चीज़ों को रेखांकित करते जाते हैं. ख़ास तौर पर कबाड़ख़ाने के श्रोताओं के लिए गीत का अंग्रेज़ी से अनुवाद भी प्रस्तुत है:
In the beginning
There was the cold and the night
Prophets and angels gave us the fire and the light
Man was triumphant
Armed with the faith and the will
Even the darkest ages couldn't kill
Too many kingdoms
Too many flags on the field
So many battles, so many wounds to be healed
Time is relentless
Only true love perseveres
It's been a long time and now I'm with you
After two thousand years
This is our moment
Here at the crossroads of time
We hope our children carry our dreams down the line
They are the vintage
What kind of life will they live?
Is this a curse or a blessing that we give?
Sometimes I wonder
Why are we so blind to fate?
Without compassion, there can be no end to hate
No end to sorrow
Caused by the same endless fears
Why can't we learn from all we've been through
After two thousand years?
There will be miracles
After the last war is won
Science and poetry rule in the new world to come
Prophets and angels
Gave us the power to see
What an amazing future there will be
And in the evening
After the fire and the light
One thing is certain: Nothing can hold back the night
Time is relentless
And as the past disappears
We're on the verge of all things new
We are two thousand years
----------------------------------------
प्रारम्भ में
बस ठंड थी और रात
पैगम्बरों और फ़रिश्तों ने हमें आग और रोशनी दी
मनुष्य विजयी हुआ
उसके पास विश्वास था और इच्छाशक्ति
जिन्हें सबसे अन्धेरे युग भी नहीं मार सके.
इतने सारे राज्य
धरती पर इतने सारे झंडे
इतने सारे युद्ध, इतने सारे घाव जिन पर मरहम लगाया जाना है
समय बड़ा क्रूर होता है
जिसमें बस सच्चा प्रेम ही बचा रह पाता है
बहुत दिन गुज़र गए पर अब मैं तुम्हारे साथ हूं
दो हज़ार सालों के बाद
यह हमारा क्षण है
हम खड़े हैं यहां समय के चौराहे पर
हम उम्मीद करते हैं कि हमारे बच्चे हमारे सपनों को आगे ले जाएंगे
उनमें बहुत पुरानापन है
कैसी ज़िन्दगी जियेंगे वे?
क्या हम उन्हें शाप दे रहे हैं या आशीर्वाद?
कभी मैं सोचता हूं
हम इतने अंधे क्यों हैं भाग्य को लेकर?
बिना प्यार के नफ़रत का कोई अन्त नहीं हो सकता
न ही दुःख का
जिनके पीछे होते हैं वही अन्तहीन भय.
हम क्यों नहीं सीखते उस सब से जो बीता है हम पर
दो हजार सालों बाद भी?
आख़िरी युद्ध के जीत लिए जाने के बाद
चमत्कार होंगे
आने वाले संसार में विज्ञान और कविता का राज्य होगा
पैगम्बरों और फ़रिश्तों ने
हमें यह देखने की शक्ति दी है.
क्या शानदार होगा वह भविष्य.
और शाम को
आग और रोशनी के बाद
एक बात तो तय है: कोई नहीं रोक सकता रात को
समय बहुत क्रूर होता है
और जैसे जैसे बीता हुआ कल अदृश्य होता जाएगा
हम लोग नई चीज़ों की देहरियों पर होंगे.
हम हैं दो हज़ार साल.
यहाँ से डाऊनलोड करें -
Two thousand years
Monday, September 26, 2011
Sunday, September 25, 2011
एक भटके हुए पक्षी की तरह मँडराती रहती है तुम्हारी कोमलता
आधुनिक पोलिश कविता की एक सशक्त हस्ताक्षर हालीना पोस्वियातोव्सका (१९३५ - १९६७) के जीवन और कविताओं से गुजरते हुए बार - बार निराला की पंक्ति याद आती है -' दु:ख ही जीवन की कथा रही.' । वह इधर के एकाध दशकों से पोलिश साहित्य के अध्येताओं की निगाह की निगाह में आई है और विश्व की बहुत - सी भाषाओं में उनके अनुवाद हुए हैं। हिन्दी में हालीना की कविताओं की उपस्थिति बहुत विरल है। ' 'कबाड़ख़ाना' पर उनके बहुत से अनुवाद उपलब्ध हैं। कुछ अनुवाद पत्रिकाओं में भी आए है / आने वाले हैं। आज इसी क्रम में प्रस्तुत है पोलिश कविता की समृद्ध और गौरवमयी परम्परा की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में विद्यमान हालीना पोस्वियातोव्सका की दो कवितायें :
दो कवितायें : हालीना पोस्वियातोव्सका
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )
०१- लालसायें
मुझे लुभाती हैं लालसायें
अच्छा लगता है
ध्वनि और रंगो के कठघरों पर सतत आरोहण
और जमी हुई सुवास को
अपने खुले मुख में कैद करना।
मुझे भाता है
किसी पुल से भी अधिक तना हुआ एकांत
मानो अपनी बाहों में
आकाश को आलिंगनबद्ध करने को तल्लीन।
और दिखाई देता है
बर्फ़ पर नंगे पाँव चलता हुआ
मेरा प्रेम।
०२- अकेलेपन में
यह जो एक विपुला पृथ्वी है अकेलेपन की
इस पर
एक अकेले ढेले की मानिन्द रखा है तुम्हारा प्रेम।
यह जो एक समूचा समुद्र है अकेलेपन का
इसके ऊपर
एक भटके हुए पक्षी की तरह
मँडराती रहती है तुम्हारी कोमलता।
यह जो एक संपूर्ण स्वर्ग है अकेलेपन का
इसमें वास करता है
एक अकेला देवदूत
....और भारविहीन हैं उसके पंख
तुम्हारे शब्दों के मानिन्द।
Saturday, September 24, 2011
जब चषक में ढाल दी जाती है शराब
निज़ार क़ब्बानी की पाँच कवितायें
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)
1 - कप और गुलाब
कॉफीहाउस में गया
यह सोचकर
कि भुला दूँगा अपना प्यार
और दफ़्न कर दूँगा सारे दु:ख।
किन्तु
तुम उभर आईं
मेरी कॉफी कप के तल से
एक सफेद गुलाब बनकर।
जब भी तुम
होती हो यात्राओं पर
तुम्हारी खुशबू प्रश्न करती है
तुम्हारे बारे में
एक शुशु की तरह जोहती है
माँ के लौटने की बाट।
तनिक सोचो
यहाँ तक कि खुशबू को पता है
कि किसे कहते हैं निर्वासन
और कैसा होता है वनवास।
3 -ज्यामिति
मेरे जुनून की चौहद्दियों के बाहर
नहीं है
तुम्हारा कोई वास्तविक समय।
मैं हूँ तुम्हारा समय
मेरी बाँहों के दिशासूचक यंत्र के बाहर
नहीं हैं तुम्हारे स्पष्ट आयाम।
मैं हूँ तुम्हारे सकल आयाम
तुम्हारे कोण
तुम्हारे वृत्त
तुम्हारी ढलानें
और तुम्हारी सरल रेखायें।
4 - बालपन के साथ
आज की रात
मैं नहीं रहूँगा तुम्हारे साथ
मैं नहीं रहूँगा किसी भी स्थान पर।
मैं ले आया हूँ बैंगनी पाल वाले जलयान
और ऐसी रेलगाड़ियाँ
जिनका ठहराव
केवल तुम्हारी आँखों के स्टेशनों पर नियत है।
मैंने तैयार किए हैं
कागज के जहाज
जो उड़ान भरते हैं प्यार की ऊर्जा से।
मैं ले आया हूँ
कागज और मोमिया रंग
और तय किया है
कि व्यतीत करूँगा संपूर्ण रात्रि
अपने बालपन के साथ।
5 -आशंका
मैं डरता हूँ
तुम्हारे सामने
अपने प्रेम का इजहार करने से।
सुना है
जब चषक में ढाल दी जाती है शराब
तो उड़ जाती है उसकी सुवास।
Wednesday, September 21, 2011
उन्मुक्त को बधाई दीजिये
अभी थोड़ी देर पहले बी सी सी आई ने उन्मुक्त यानी अपने लवी को भारत की अन्डर-१९ टीम का कप्तान घोषित किया है. विशाखापत्तनम में होने वाले चार देशों के टूर्नामेंट में उन्मुक्त देश की युवा टीम का नेतृत्व करेगा. उसके कप्तान बनने में एकाध तकनीकी दिक्कतें आईं मगर अब यह तय है.
बधाई बेटे! बधाई भरत दा! बधाई सुन्दर!
इसे भी देखें - लव यू लवी, ऑल द बेस्ट
Saturday, September 17, 2011
सिर गायब, टोपा सिलेगा
गुड़ मिलेगा
बाबा नागार्जुन
गूंगा रहोगे
गुड़ मिलेगा
रुत हँसेगी
दिल खिलेगा
पैसे झरेंगे
पेड़ हिलेगा
सिर गायब,
टोपा सिलेगा
गूंगा रहोगे
गुड़ मिलेगा
बाबा नागार्जुन
गूंगा रहोगे
गुड़ मिलेगा
रुत हँसेगी
दिल खिलेगा
पैसे झरेंगे
पेड़ हिलेगा
सिर गायब,
टोपा सिलेगा
गूंगा रहोगे
गुड़ मिलेगा
छतरी वाला जाल छोड़कर
समझदार को इशारा काफ़ी होता है और क़लम बाबा की हो तो क्या कहने -
छतरी वाला जाल छोड़कर
बाबा नागार्जुन
छतरी वाला जाल छोड़कर
अरे, हवाई डाल छोड़कर
एक बंदरिया कूदी धम से
बोली तुम से, बोली हम से,
बचपन में ही बापू जी का प्यार मिला था
सात समन्दर पार पिता के धनी दोस्त थे
देखो, मुझको यही, नौलखा हार मिला था
पिता मरे तो हमदर्दी का तार मिला था
आज बनी मैं किष्किन्धा की रानी
सारे बन्दर, सारे भालू भरा करें अब पानी
मुझे नहीं कुछ और चाहिए तरुणों से मनुहार
जंगल में मंगल रचने का मुझ पर दारमदार
जी, चन्दन का चरखा लाओ, कातूँगी मैं सूत
बोलो तो, किस-किस के सिर से मैं उतार दूँ भूत
तीन रंग का घाघरा, ब्लाउज गांधी-छाप
एक बंदरिया उछल रही है देखो अपने आप
छतरी वाला जाल छोड़कर
बाबा नागार्जुन
छतरी वाला जाल छोड़कर
अरे, हवाई डाल छोड़कर
एक बंदरिया कूदी धम से
बोली तुम से, बोली हम से,
बचपन में ही बापू जी का प्यार मिला था
सात समन्दर पार पिता के धनी दोस्त थे
देखो, मुझको यही, नौलखा हार मिला था
पिता मरे तो हमदर्दी का तार मिला था
आज बनी मैं किष्किन्धा की रानी
सारे बन्दर, सारे भालू भरा करें अब पानी
मुझे नहीं कुछ और चाहिए तरुणों से मनुहार
जंगल में मंगल रचने का मुझ पर दारमदार
जी, चन्दन का चरखा लाओ, कातूँगी मैं सूत
बोलो तो, किस-किस के सिर से मैं उतार दूँ भूत
तीन रंग का घाघरा, ब्लाउज गांधी-छाप
एक बंदरिया उछल रही है देखो अपने आप
Friday, September 16, 2011
नूर मुहम्मद `नूर’ की ग़ज़ल - 2
हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख
हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख
ऐब हम में देख पर बंधु! वफ़ादारी भी देख
हम ही हम अक्सर हुए हैं खेत, अपने मुल्क में
फिर भी हम ज़िंदा, यहीं हैं, ये तरफ़दारी भी देख
सरफ़रोशी की, लुटाया जिस्मो-जाँ, इल्मो-फ़ुनून
और बदले में ख़रीदा क्या, ख़रीदारी भी देख
लड़ रहे हैं और हम लड़ते रहेंगे तीरगी!
नूर के हिस्से का ये चकमक जिगरदारी भी देख
हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख
ऐब हम में देख पर बंधु! वफ़ादारी भी देख
हम ही हम अक्सर हुए हैं खेत, अपने मुल्क में
फिर भी हम ज़िंदा, यहीं हैं, ये तरफ़दारी भी देख
सरफ़रोशी की, लुटाया जिस्मो-जाँ, इल्मो-फ़ुनून
और बदले में ख़रीदा क्या, ख़रीदारी भी देख
लड़ रहे हैं और हम लड़ते रहेंगे तीरगी!
नूर के हिस्से का ये चकमक जिगरदारी भी देख
नूर मुहम्मद `नूर’ की ग़ज़ल -१
भारत और पाकिस्तान की समकालीन परिस्थितियों को केन्द्र में रख कर लिखी गई भाई नूर मुहम्म्द नूर की यह ग़ज़ल -
इधर पेच है तो मियाँ, ख़म उधर भी
इधर पेच है तो मियाँ, ख़म उधर भी
वही ग़म इधर भी वही ग़म उधर भी
है दोनों तरफ दर्दो-ग़म भूख ग़ुरबत
दवा बम इधर भी दवा बम उधर भी
उजाला यहाँ से वहाँ तक परेशाँ
वही तम इधर भी वही तम उधर भी
किसी से भी कोई न छोटा बड़ा है
वही हम इधर भी वही हम उधर भी
ज़रा-सी मुहब्बत ज़रा-सी शराफ़त
वही कम इधर भी वही कम उधर भी
उखड़ता हुआ नूर इंसानियत का
वही दम इधर भी वही दम उधर भी
इधर पेच है तो मियाँ, ख़म उधर भी
इधर पेच है तो मियाँ, ख़म उधर भी
वही ग़म इधर भी वही ग़म उधर भी
है दोनों तरफ दर्दो-ग़म भूख ग़ुरबत
दवा बम इधर भी दवा बम उधर भी
उजाला यहाँ से वहाँ तक परेशाँ
वही तम इधर भी वही तम उधर भी
किसी से भी कोई न छोटा बड़ा है
वही हम इधर भी वही हम उधर भी
ज़रा-सी मुहब्बत ज़रा-सी शराफ़त
वही कम इधर भी वही कम उधर भी
उखड़ता हुआ नूर इंसानियत का
वही दम इधर भी वही दम उधर भी
Wednesday, September 14, 2011
गोसाईं पवार - मृत्युंजय की लम्बी कविता
मृत्युंजय का मृत्युबोध नामक ब्लॉग संचालित करते हैं मृत्युंजय . युवा हैं, संगीत में खासा दखल रखते हैं. और प्रतिबद्ध राजनैतिक चेतना से लैस. कबाड़खाने के लिए उन्होंने ख़ास अपनी यह लम्बी कविता भेजी है.
तुम्हारा छोटा बेटा
एक विचित्र सपने में फंस चुका है
गोसाईं पवार.
उसने सीधी कर ली है हल की फाल
हरिस संभल नहीं रही है
उसकी रीढ़ पोरों में गड़ गई है
लोहे की मजबूत सइल मूठ तक दोनों कन्धों में पैवस्त है
गरुआये बोझ से गर्दन मुचड़ गई है
दहिनवारी जोत रहे हैं बाएं नाटे को मिस्टर च
पूँछ उमेठ कर तोड़ दी जा रही है
और छ जोड़ी हलवाहे एक ही फंदे में गर्दन फंसा रहे हैं.
एक सूखा कुवां उफना आया है लाशों से बेतरह
सारे पुराने पेड़ों से रस्सी के टुकड़े लटक रहे हैं
सल्फास की गोलियां बिखरी हैं सब तरफ
दिल्ली-मुंबई में बनाया गया है यवतमाल का पुतला
उसे जादुई आंकड़ों की कीलों से भेद रहे हैं मिस्टर म
और लाशें विदर्भ में चू रही हैं टप-टप
सूदखोरों के आँगन में
कफ़न की कपास में मुचड़ी हुई टोपियाँ.
'ठगिनी क्यों नैना झमकावे!'
आत्महत्या के बाद की सबसे जरूरी चीजें सहेजी जा रही हैं
पिता के पीछे कतार बाँध कर खड़े हैं बच्चा लोग
अंतिम विदाई से पहले
तैयारी में हैं गोसाईं पवार
उतरे हैं भेड़िये झुंड बाँध
सती प्रथा के नए मसविदे के साथ
मिसेज एस की मुहर के साथ
कारों की फ्लीट पर
बीस सूत्र का वारिस
महाकाल नरसिंह नाच रहा
जाँघों पर पटक रहा प्रिय मातृभूमि को
जगह-जगह चिटक गई देह
चीर रहा पेट, अति बर्बर नाखूनों से
खसखस सी ढाढी में पगड़ी पर
शोभती हैं बूँदें
लिप्सा से ताक रहे भेड़िये
सौम्य मुस्कान से बरजता है
रुको अभी
मिलने दो आंकड़े
आंकड़े...
आत्महत्या से लिपे-पुते दो लाख घरों की
कहाँ गईं
भागी हुई लडकियां?
देशी कपास के सांवले बीजों सी
पांच से पच्चीस साल, अजुगत सलोनी उमर
ब्रूनो की
लाखों अभागी वे बेटियां
कहां गईं?
कहां गए मुस्काते
और गाते नौजवान
रहने का जीने का मरने का जिनका
कोई नहीं था ठौर ?
धोती की फटी हुई लांग को समेटे हुए
बूढ़े किसान की आँखों में बिला गया सूरज
गुलशने बरार में
दो लाख लाशों की जैविक खाद है तयार
श्म सान उर्वर हुए
उर्वर हुई पार्लमेंट
लहलह कर लहक रही नई अर्थ-नीति
कारखाने फास्फोरस के हड्डी की ऊर्जा से लहक उठे
महक उठा दिग-दिगंत जलती हुई चर्बी से
धुवां धुवां
तुम्हारा छोटा बेटा
एक विचित्र किस्से में फंस चुका है गोसाईं पवार !
धरती के सीने में दस हाथ चौड़ी दरार में
लाशें दफना कर लौटा है रोज-रोज
दुनिया की आख़िरी बची हुई
सहूलियत है उसके लिए
मिट्टी सा कड़ा लाल
गड्ढों का चेहरा है
किधर जाए, करे क्या,
जूझ पड़े, मरे क्या
लड़े क्या?
लाशों की परत परत लहर लहर आती है सुबह
सीढ़ियों पर चढ़कर
और सरकार की ओर से अभी जारी
मुफ्त शताब्दी कैलेण्डर मेरी खोपड़ी में घुसड़ जाता है
कैलेण्डर में लाशों की तिथियाँ हैं
सत्तावन के आस पास नीम के विशाल वृक्ष से लटकी हैं तीन सौ लाशें
थोड़ी ही देर बाद अवध के नक़्शे पर लाशों की शतरंज बिछी पड़ी है
तेभागा में एक विराट बंदूक की संगीन से गूंथ दी गई हैं
पांच सौ जुझारू औरतें
और नक्सलबाड़ी है
एक युवा चेहरे को
सिगरेट के टोंटे की तरह मसलते बूटों के
तस्मे से लटकाई गई जुबान के माफ़िक
दो लाख लाशों को जमीन पर हमवार सुला दूं मैं
तो कितने गज जमीन की जरूरत होगी?
क्या इतनी लाशों से पाटा जा सकता है
संसद भवन ?
चार लाख आँखें क्या वित्तमंत्री के ब्रीफकेस में बंद
रक्षा बजट के कागज़ पर दर्ज अक्षरों को ढँक सकेंगी?
दो लाख लाशों की त्वचाओं के तम्बू में
कितना अनाज बच सकेगा?
दो लाख रीढ़ की चिमड़ी हड्डियों से
कोई हथियार बन सकेगा क्या?
राष्ट्रनायको,
चाहे सपने की इसी हकीकत में
गाड़ दो उसे
सात परतों में साढ़े तीन हाथ नीचे
काले पड़ रहे खून में डोब दो चाहे
पर अभी बख्श दो !
मत मारो !
अभी उसे गोसाईं पवारों का
कफ़न दफ़न करने जाना है.
तुम्हारा छोटा बेटा
एक विचित्र सपने में फंस चुका है
गोसाईं पवार.
उसने सीधी कर ली है हल की फाल
हरिस संभल नहीं रही है
उसकी रीढ़ पोरों में गड़ गई है
लोहे की मजबूत सइल मूठ तक दोनों कन्धों में पैवस्त है
गरुआये बोझ से गर्दन मुचड़ गई है
दहिनवारी जोत रहे हैं बाएं नाटे को मिस्टर च
पूँछ उमेठ कर तोड़ दी जा रही है
और छ जोड़ी हलवाहे एक ही फंदे में गर्दन फंसा रहे हैं.
एक सूखा कुवां उफना आया है लाशों से बेतरह
सारे पुराने पेड़ों से रस्सी के टुकड़े लटक रहे हैं
सल्फास की गोलियां बिखरी हैं सब तरफ
दिल्ली-मुंबई में बनाया गया है यवतमाल का पुतला
उसे जादुई आंकड़ों की कीलों से भेद रहे हैं मिस्टर म
और लाशें विदर्भ में चू रही हैं टप-टप
सूदखोरों के आँगन में
कफ़न की कपास में मुचड़ी हुई टोपियाँ.
'ठगिनी क्यों नैना झमकावे!'
आत्महत्या के बाद की सबसे जरूरी चीजें सहेजी जा रही हैं
पिता के पीछे कतार बाँध कर खड़े हैं बच्चा लोग
अंतिम विदाई से पहले
तैयारी में हैं गोसाईं पवार
उतरे हैं भेड़िये झुंड बाँध
सती प्रथा के नए मसविदे के साथ
मिसेज एस की मुहर के साथ
कारों की फ्लीट पर
बीस सूत्र का वारिस
महाकाल नरसिंह नाच रहा
जाँघों पर पटक रहा प्रिय मातृभूमि को
जगह-जगह चिटक गई देह
चीर रहा पेट, अति बर्बर नाखूनों से
खसखस सी ढाढी में पगड़ी पर
शोभती हैं बूँदें
लिप्सा से ताक रहे भेड़िये
सौम्य मुस्कान से बरजता है
रुको अभी
मिलने दो आंकड़े
आंकड़े...
आत्महत्या से लिपे-पुते दो लाख घरों की
कहाँ गईं
भागी हुई लडकियां?
देशी कपास के सांवले बीजों सी
पांच से पच्चीस साल, अजुगत सलोनी उमर
ब्रूनो की
लाखों अभागी वे बेटियां
कहां गईं?
कहां गए मुस्काते
और गाते नौजवान
रहने का जीने का मरने का जिनका
कोई नहीं था ठौर ?
धोती की फटी हुई लांग को समेटे हुए
बूढ़े किसान की आँखों में बिला गया सूरज
गुलशने बरार में
दो लाख लाशों की जैविक खाद है तयार
श्म सान उर्वर हुए
उर्वर हुई पार्लमेंट
लहलह कर लहक रही नई अर्थ-नीति
कारखाने फास्फोरस के हड्डी की ऊर्जा से लहक उठे
महक उठा दिग-दिगंत जलती हुई चर्बी से
धुवां धुवां
तुम्हारा छोटा बेटा
एक विचित्र किस्से में फंस चुका है गोसाईं पवार !
धरती के सीने में दस हाथ चौड़ी दरार में
लाशें दफना कर लौटा है रोज-रोज
दुनिया की आख़िरी बची हुई
सहूलियत है उसके लिए
मिट्टी सा कड़ा लाल
गड्ढों का चेहरा है
किधर जाए, करे क्या,
जूझ पड़े, मरे क्या
लड़े क्या?
लाशों की परत परत लहर लहर आती है सुबह
सीढ़ियों पर चढ़कर
और सरकार की ओर से अभी जारी
मुफ्त शताब्दी कैलेण्डर मेरी खोपड़ी में घुसड़ जाता है
कैलेण्डर में लाशों की तिथियाँ हैं
सत्तावन के आस पास नीम के विशाल वृक्ष से लटकी हैं तीन सौ लाशें
थोड़ी ही देर बाद अवध के नक़्शे पर लाशों की शतरंज बिछी पड़ी है
तेभागा में एक विराट बंदूक की संगीन से गूंथ दी गई हैं
पांच सौ जुझारू औरतें
और नक्सलबाड़ी है
एक युवा चेहरे को
सिगरेट के टोंटे की तरह मसलते बूटों के
तस्मे से लटकाई गई जुबान के माफ़िक
दो लाख लाशों को जमीन पर हमवार सुला दूं मैं
तो कितने गज जमीन की जरूरत होगी?
क्या इतनी लाशों से पाटा जा सकता है
संसद भवन ?
चार लाख आँखें क्या वित्तमंत्री के ब्रीफकेस में बंद
रक्षा बजट के कागज़ पर दर्ज अक्षरों को ढँक सकेंगी?
दो लाख लाशों की त्वचाओं के तम्बू में
कितना अनाज बच सकेगा?
दो लाख रीढ़ की चिमड़ी हड्डियों से
कोई हथियार बन सकेगा क्या?
राष्ट्रनायको,
चाहे सपने की इसी हकीकत में
गाड़ दो उसे
सात परतों में साढ़े तीन हाथ नीचे
काले पड़ रहे खून में डोब दो चाहे
पर अभी बख्श दो !
मत मारो !
अभी उसे गोसाईं पवारों का
कफ़न दफ़न करने जाना है.
Tuesday, September 13, 2011
सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 10
(पिछली पोस्ट से जारी)
लेकिन कृष्ण की कहानियों में बहुत सी इंसानी मुश्किलों के हल हैं। उन पर सोच-विचार करके किसी भी मज़हब का आदमी अपनी मुश्किलें दूर कर सकता है। अब देखो उस चाँद को, मेरे दोस्त धीरु भाई कहते हैं, चाँद कृष्ण का बड़ा भाई आकाश में अपना फ़र्ज़ निभा रहा है। मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ। मुझे आसमान पर दो दोस्त अपनी दोस्ती का आनंद लेते नज़र आते हैं।’ यूँ ही बातें करते-करते वे मुझे हास्टल पर छोड़ने आए। कहने लगे कि ज़िंदगी हमेशा किसी प्लान पर नहीं चलती। आज हमारा यूँ अचानक मिलना इतनी ख़़ूबसूरत बात है कि उसको बयाँ नहीं कर सकता। ये कहकर उन्होंने अलविदा ली और जब मैंने पलट कर देखा तो वे अफ्रीका की रात में एकदम अकेले चले जा रहे थे। दिल में एक तूफ़ान उठा कि भाग कर उनके पास चला जाऊँ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उस रात के बरसों बाद यहाँ अमरीका की कोलराडो पहाड़ी पर कैम्पिंग करने गया। बर्फ़ जैसी ठंडी हवा सोने नहीं दे रही थी, सारा जिस्म काँप रहा था। ऐसी मुश्किल में अचानक मेरी निगाह आकाश की तरफ़ गई तो वैसा ही चाँद मैंने आकाश पर देखा। हवा चल रही थी कि नहीं, सर्दी थी कि नहीं मेरा बदन एकदम सहज हो गया। मैंने सकून महसूस किया।
इसी वर्ष ज़ंज़ीबार को भी आज़ादी मिली। लेकिन मैं वहाँ नहीं पहुँचा। 1964 में एक भयंकर कर्नल ओकेलो ज़ंज़ीबार में इंक़लाब लाए। कुछ ही रातों में हज़ारों अरब मर्द, औरतों और बच्चों को हलाक कर दिया गया। इस बदले में कि एक ज़माने में अरबों ने कालों को दास बनाया था। उन दिनों समुन्दर से आती हुई हवा में मुर्दों की बदबू आने लगी थी। फिर कर्नल ओकेलो ने ज़ोर ज़बर्दस्ती काले लड़कों की हिंदुस्तानी लड़कियों से सामूहिक शादियाँ करवाईं।
1964 में मुझे बी एस सी डिग्री मिली तो मैं टांगा में ही काले अफ्रीकियों के सैकेंडरी स्कूल में अध्यापक बन गया। नौकरी शुरू हुई ही थी कि फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन की स्कालरशिप पर अमेरिका आ गया। आने से पहले मैंने एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत ‘तुम हो साथ रात भी हसीन है, अब तो मौत का भी ग़म नहीं है’ इस रिकार्ड को अपने साथ लाने के लिए चुना। लेकिन जब पैक करने गया तो ख़़याल आया कि अमेरिका में इसकी क्या ज़रूरत पड़ेगी। मैंने रिकार्ड वहीं छोड़ दिया। जो बाद में मुझे अपनी ग़लती ही नहीं गुनाह महसूस होने लगा। नैरोबी से हवाई जहाज़ उड़ा तो ख़ुशी की जगह रिकार्ड के पीछे छूटने का ग़म हो रहा था जिससे मैं आज भी निजात नहीं पा सका हूँ।
तुम हो साथ रात भी हसीन है
अब तो मौत का भी ग़म नहीं है
इसके बाद अफ़्रीकाकी हालत और भी बिगड़ गई। 1966 में मारे डर के मेरी माँ दो बहनों को लेकर कराची चली गई। वहाँ से खत आया यहाँ सब कुछ ठीक है। मोहाजिर ज़्यादा है, पाकिस्तानी कम। यू पी के मोहाजिर के साथ हम अफ़्रीका के मोहाजिर एक दिन से दूसरे दिन में पहुँच जाते हैं। हमारे घर का पार्टिशन हो गया। सारे आदमी अफ़्रीका में और बाहर थे, औरतें और बच्चे पाकिस्तान में। इरादा तो यही था कि सब कुछ ठीक होने के बाद अफ़्रीका लौट आऐंगे। लेकिन ये मालूम नहीं था, वह घर हमारा नहीं रहा। सच तो यह था, भारत और पाकिस्तान के लोगों ने अफ़्रीका को अपना घर कभी बनाया ही नहीं। क्योंकि अगर साउथ एशिया को अपना घर समझते तो कभी छोड़ते ही नहीं और बाहर जाकर उसे भी अपनाया नहीं। साउथ एशिया में रहते बाहर के सपने देखते रहे और बाहर रहते हुए साउथ एशिया के। ऐसे लोग कितने डाँवाडोल होते हैं। 1967 में तंज़ानिया के प्रेसिडेंट नियरेरे ने अरूशा घोषणा के साथ अपने देश को समाजवाद के रास्ते पर लगा दिया। रातों रात राजनेता और बड़े सरकारी अर्दलियों के सिवा सब ग़रीब हो गए। जो हमारे लोग बचे, वे उन लोगों के साये में जी रहे हैं।
1972 में युगांडा के डिक्टेटर ईदी अमीन ने कुछ ही दिनों में मोहलत देकर एशियाई लोगों को निकाल बाहर किया। लेकिन इस बेरहम डिक्टेटर ने हमारे लोगों के साथ वह व्यवहार नहीं किया जो 1946-47 में पार्टिशन के समय हमने ख़ुद एक दूसरे के साथ किया। हमारी पाँच हज़ार साल पुरानी सभ्यता हमें ख़ून-ख़राबे से बचा नहीं सकी।
1983 में वाशिंगटन में एक बार जब मैं शाम को घर लौटा तो मेरे नाम एक ख़त था। हैंडराइटिंग देखकर जानी पहचानी लगी। लेकिन तुरंत कुछ भी याद नहीं आया। जब पढ़ा, तो ये ख़त मेरे भाई अय्यूब का था। उसमें छोटा सा संदेश था कि मैं तुम्हारी कुछ मदद चाहता हूँ। कुछ इन्फ़ोरमेशन। क्योंकि तुम मेडिकल स्कूल में पढ़ाते हो। तुम बता सकते हो, कभी-कभी मैं बिला वजह रोता हूँ, क्या इसका कोई इलाज है? आखि़र में लिखा संगीत निर्देशक सी रामचंद्र अपना ही ख़ून बहाकर चले गए। ज़माना अच्छा नहीं है। मैंने उन्हें जवाब दिया। लेकिन याद नहीं मैंने क्या लिखा था।
1985 में मेरे भाई अकरम जो टांगों में हमारी आखिरी निशानी थे, वे भी लंदन चले गए। इससे पहले उन्होंने अपने घर में दोस्तों को पार्टी दी। और वे सारे रिकार्ड उन्हें दे दिये जो हमने 1946 से इकट्ठे करके एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी बनाई थी। ये रिकार्ड हमारे सुख-दुख के साथी थे। इनके साथ उन दिनों की यादें जुड़ी थीं जो हमने एक साथ गुज़ारी थीं। वे सारे रिकार्ड मेरे भाई अकरम ने एक बहुत कड़वा घूँट पीकर दोस्तों को गिफ़्ट में दे दिये। हमारे परिवार ने बैंक बैलेंस नहीं बनाया था। हज़ारों रिकार्डों का ख़ज़ाना कुछ देर में ही लुट गया।
तुम भी भुला दो, मैं भी भूला दूँ
क्या भुला दें गुज़रे ज़माने...
दिसंबर 1985 में शुक्रवार की दोपहर की नमाज़ पढ़ते हुए हमारी माँ बेहोश होकर गिर पड़ीं। फ़ौरन उनको अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर ने बताया कि उनके दिमाग़ की नस फट गई हैं। आहिस्ता-आहिस्ता उनका दिमाग़ अपने ही लहू में डूबने लगा। हवा में बेबस चिराग़ की तरह यादें एक के बाद एक बुझने लगीं। कुछ ही घंटों में ज़िंदगी भर की यादें, जज़्बात, ख़़याल, उम्मीदें, एक लंबी चुप्पी में खो गईं। हम जिंदगी भर माँ को बेबे जी पुकारते थे। हमने इसी भूमिका में उन्हें जाना लेकिन उनका नाम रसूल बीबी था। रसूल बीबी कौन थीं, ये भेद उनके साथ ही चला गया। 1986 के नये वर्ष की रात, मेरी माँ को स्ट्रोक हुआ और वे गहरी नींद में सो गईं। उनकी मौत के साथ उनकी दो ख़्वाहिशें भी दफ़्न हो गईं। एक तो ये कि वो खडगपुर जाना चाहती थीं वो सपना कभी पूरा नहीं हुआ और दूसरा ये कि हज करें। जब मैं अपनी माँ के फ़्यूनेरल पर गया तो भाई अय्यूब से 22 वर्षों बाद मुलाक़ात हुई। मिलने के बाद ऐसे देख रहे थे, जैसे मैं कोई अजनबी हूँ। और कहने लगे, अगर मैंने सड़क पर देखा होता तो कभी नहीं कह सकता था कि तुम मेरे भाई हो। वक़्त ऐसा भी करता है। मुझे भी भाई में एक बहुत
बड़ा फ़र्क़ नज़र आया। उन्होंने चंद्रमोहन और सोहराब मोदी की स्टाइल छोड़ दी थी। अब वे दिलीप कुमार के देवदास और गुरुदत्त के काग़ज़ के फूल के सिनेमा के कैमरे के लिए तैयार थे।
ये भी एक रूप है...
ज़िंदगी का एक दौर वह होता है जब वक़्त हमें उड़ती कालीन पर बिठाकर एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक ले जाता है। फिर एक दौर आता है जब वक़्त एक भारी पत्थर की तरह ढोना पड़ता है। मेरे भाई की जिंदगी के उस दौर में थे।
कराची में जब मैं एक शाम उनके घर पर बैठा था और हम चाय पी रहे थे, मैंने अपने कोट में हाथ डाला तो एक कैसेट हाथ में आया। उसमें पचास के दशक के गीत थे। मैंने उनकी इजाज़त से टेप बजाया तो पहला गाना फ़िल्म आज़ाद का था, ‘जा री, जा री ओ कारी बदरिया’। उनके चेहरे से चिंता के बादल दूर हो गए। गाने के साथ झूमने लगे।
जा री जारी ओ कारी बदरिया
मत बरसो....
फिर एक के बाद एक गाने बजने लगे, तो बिना कुछ कहे ऐसा लगा कि हम फिर एक दूसरे के बहुत क़रीब आ गए हैं। कुछ गानों के बाद अचानक एक नया गीत बजा। वह था, ‘जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे’। सज्जाद हुसैन के संगीत में फ़िल्म खेल का गीत शुरू होते ही भाई एकदम भौंचक्के रह गए।
जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे
जब गीत पूरा हुआ तो उन्होंने टेप बंद कर दिया। एकदम आकर गले लगा लिया और कहा, ‘मैंने न तो भाई का और न ही दोस्त का फ़र्ज़ निभाया है। मैं वो वादा पूरा नहीं कर सका कि हम हाजीभाई को फिर से मिलने जाएँगे। मजबूरी की वजह से पूरा नहीं कर सके। कोई भी इंसान अपने आप में मुकम्मल नहीं है। अगर वो ऐसा है, तो वो फरिश्ता है।’ वो बैठ गए और मुझे ग़ालिब का ये शेर याद आया:
बस के दुश्वार है, हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना
माहौल में चुप्पी छाई हुई थी। मेरे दिमाग़ में आ रहा था, भाई की ज़िंदगी की मुश्किलों ने उन्हें एक अच्छा इंसान बनाया है। कुछ ही देर पहले उन्होंने जो कुछ कहा, वह इसका सबूत है। चुप्पी उन्होंने ही तोड़ी और कहा, इस गीत को ढूँढ़ने के लिए हम अफ़्रीका में कहाँ-कहाँ गए थे। लोगों ने वादा करने पर भी न सुनाया। लेकिन इन्हें उसका मलाल नहीं था। कहने लगे, ‘जिनके पास है, वह अपने ख़ज़ाने की क़ीमत जानते हैं।’ सज्जाद को फ़िल्म रुस्तम सोहराब के बाद किसी ने और मौक़ा नहीं दिया। फिर पूछा, ‘क्या तुम्हें मालूम है कि फ़िल्म दोस्त के गीत, ”कोई प्रेम का देके संदेसा“ इसके पीछे कौन-सा गीत था?’ तो, मैंने कहा, ‘आपके बग़ैर यह मालूम करना मुझे ठीक नहीं लगा, मुझे भी नहीं मालूम।’ मेरे दिमाग़ में एक बात उठी, मेरे भाई ने तो अपनी इंसानियत का सबूत दे दिया, मरे दिल में उनके लिए जज़्बात भर उठे। लेकिन जोश ने साथ नहीं दिया कि मैं भी उन्हें वैसे ही गले लगाऊँ जैसाकि उन्होंने किया था। कुछ ही पलों में वह सुनहरा मौक़ा हाथ से निकल गया। मेरी इंसानियत मेरे सामने थी लेकिन मैं उस तक नहीं पहुँच सका। बातें करते-करते शाम ढल गई। एक दिन हम कराची की सैर पर निकले। जो अचानक एक ऐसी सड़क पर आ गए जिसमें न इधर था, न उधर था। जब साइनबोर्ड देखा तो वो थी जिगर मुरादाबादी रोड। ये पढ़कर हम दोनों हँसने लगे। इतना हँसे कि पेट में दर्द होने लगा। फिर तो हमने पंजाब और इंडिया जाने का इरादा किया था छोड़ दिया। उनके मुँह से एकाएक जिगर मुरादाबादी का ये शेर निकला:
वही है ज़िंदगी लेकिन जिगर, ये हाल है अपना
जैसे कि जिंदगी से जिं़दगी कम होती जाती है
मैं अमरीका लौट कर आया। कुछ ही महीने बाद एक शाम घर लौटा तो एक टेलीग्राम था कि अय्यूब अब हमारे बीच नहीं रहे। जब मैंने तार पढ़ा तो वो साइसेल की धागे के हार की टूटने की आवाज़ आई। उसमें पिरोई यादें गर्द में बिखर गईं। घुटनों में ताक़त नहीं रही। वक़्त थोड़ी देर के लिए ठहर गया। बाद में पता चला एक मनहूस रात उन्हें छाती में दर्द हुआ। उनके बेटे अस्पताल लेकर गए। लेकिन रास्ते में ही वह उस रास्ते पर चल पड़े जहाँ कोई किसी का साथी नहीं होता। डाक्टर ने जब नब्ज़ देखी तो कहा ये तो कब के जा चुके हैं। उनका देहांत उनकी बेटी की शादी के एक सप्ताह पहले हुआ। शादी की तारीख़ बढ़ा दी गई। छह महीने बाद मेरे भाई असलम ने उनकी जगह खड़े होकर बेटी को विदाई दी। जिंदगी के दाम वक़्त से चुकाये जाते हैं। उनके हार्ट अटैक के वक़्त जब मेरे भाई ने जेब में हाथ डाला तो वे जेबें ख़ाली हो चुकी थीं। पहले वे पैसे से ग़रीब हुए फिर वक़्त से। उस समय उनकी उम्र 58 थी। जब मैं छोटा था, अगर किसी का हार्ट अटैक से देहांत होता तो बड़े लोग कहते, बनाने वाले की बड़ी मेहरबानी कि जल्दी उठा लिया। मेडिकल कालेज में आने के बाद जानकारी ये हुई कि इस रोग से जो भी मरता है, वह इस दुनिया में बेहिसाब पीड़ा झेलकर जाता है। मेरे भाई का ये अंजाम मुझे कभी-कभी बेबस कर देता है। तब मुझे उनकी कही बात याद आती है कि जिंदगी एक बहुत बड़ा तोहफ़ा है। जिसकी हर अच्छी और बुरी बात उससे अलग नहीं की जा सकती। इस जिंदगी के लिए ख़ुदा के शुक्र के सिवा और कुछ नहीं सोचना चाहिए।
राही कई अभी आएंगे
कई अभी जाएंगे...
श्रद्धांजलि
इस याद को ताज़ा करते हुए मुझे कहना पड़ेगा कि बच्चों की परवरिश में उनको यह सिखाया जाना बहुत ज़रूरी है कि वह जिनसे मोहब्बत करते हैं, अगर उसका उन्होंने खुलकर इज़हार नहीं किया तो यह ग़लती ही नहीं गुनाह है। मेरे कहने से भाई अय्यूब की ज़िंदगी नहीं बढ़ती लेकिन उनका हौसला तो बढ़ सकता था।
ये कैसी अजब दास्ताँ हो गई है
छुपाते-छुपाते बयाँ हो गई है
ये बेमिसाल गीत सुरैया के आखि़री गीतों में से है। यह रुस्तम सोहराब फ़िल्म का गीत है जो सज्जाद हुसैन की आखि़री फ़िल्म थी। इसके बाद वे अपनी इज़्ज़त आबरू लेकर फ़िल्मी दुनिया से दूर हो गए। किसी भी प्रोड्यूसर को ऐसा हौसला नहीं आया कि वे फिर उनको एक और मौक़ा देते। 1950 के दशक में लता मंगेशकर ने हिंदुस्तान के कोई पाँच-छह बढ़िया म्यूज़िक डाइरेक्टरों में सज्जाद हुसैन का ज़िक्र किया था। 1984 में फ़िल्मी गीत के पचास वर्ष होने पर एक मैगज़ीन में वही पुराना लेख दुबारा छापा गया था, लेकिन इस बार उसमें सज्जाद हुसैन का नाम नहीं था। तक़रीबन उसी समय यहाँ वाशिंगटन के गीतांजलि कार्यक्रम में ‘ये हवा, ये रात चाँदनी...’ गीत बजा तो एम सी ने कहा ये गीत मदनमोहन ने कंपोज़ किया था। ये वह मदनमोहन थे जिन्होंने आखिरी दाँव फ़िल्म में ‘तुझे क्या सुनाऊँ ऐ दिलरुबा’ में उसी गीत की कार्बन कापी बनाई। कहते हैं, जब सज्जाद हुसैन ने ये गीत सुना तो कहने लगे आजकल तो हम क्या हमारे साये भी उठकर चलने लगे हैं। ये कहकर वे फिर से ग़ायब हो गए। जब लता मंगेशकर के जीवन पर 1992 में वीडियो बना तो सज्जाद की झलक इस वीडियो में मिली जिसमें वह लता को आनर कर रहे हैं। दो-तीन मिनट में ऐसा दिखाई पड़ता है, उनका मुँह नहीं हाथ बोल रहा है। लेकिन उनकी जिंदगी में एक मिठास तो आ ही सकती थी।
ऐ दिलरुबा, नज़रें मिला... कुछ तो ...
1992 में यहाँ वायस आफ़ अमेरिका की ब्राडकास्टर विजयलक्ष्मी ने मुंबई में उनसे इंटरव्यू करने की बात कही तो लोगों ने कहा आप किसका इंटरव्यू करना चाहती हैं। सज्जाद हुसैन मिलनसार इंसान नहीं थे। लेकिन इतनी दूर से आए श्रोता को निराश नहीं कर सके, तो उनका आखि़री इंटरव्यू वायस आफ़ अमरीका ने लिया और उन पर तीन प्रोग्राम पेश किये। 1994 में वे हाथ जिसने इटली के मैन्डोलिन को हिंदुस्तानी गाना गाना सिखाया, इस साज़ से हमेशा के लिए दूर हो गए।
मेरे यहाँ से चल दिये
मेरा खु़दा भला करे
शौक़ से ग़म उठाब
शिकवे न लब पे लाएँगे
उनकी एक छोटी सी श्रद्धांजलि राजू भारतन ने स्क्रीन पत्रिका में दी लेकिन उसके इर्द-गिर्द के दूसरे आर्टिकल के शोरोग़ुल ने उसकी अहमियत को ढँक दिया। एक दिन मैं अपने एक छात्र को जो फ़िल्मी संगीत में दिलचस्पी रखते हैं, उनसे सज्जाद के गीत का ज़िक्र कर रहा था, तो उन्होंने पूछा, ये सज्जाद कौन था?
1988 में मेरे पिता की मृत्यु तंज़ानिया के इरिंगा शहर में हुई और उनको इरिंगा के उसी क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया जिसे वे दुनिया का स्वर्ग समझते थे।
बालूसिंह 1970 के दशक में अफ़रीक़ा में पाबंदी आने से पहले लंदन पहुँच गए और वहाँ वह वेल्फ़ेयर पर हैं। ख़बर आई कि कोयले के काम की वजह से उन्हें काले फेफड़े की बीमारी हो गई है जिसे एम्फ़ीज़ीमा कहते हैं। इसमें मरीज़ को लगता है, वह पानी में डूब रहा है। यहाँ हक़ीक़त ये थी कि आग से काम करने वाला पानी में डूब रहा था। हो सकता है वे अब तक डूब चुके हों।
सब कहाँ कुछ लाला-ओ गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक मे क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
- मिर्ज़ा ग़ालिब
हाजीभाई एक रात ख़्वाब में मिले, बहुत जल्दी में थे, कहने लगे, बेटा, तुमने बहुत देर कर दी। सुना है, अमरीका में तुम्हें बहुत कामयाबी मिली, वक़्त बहुत कम है। एक बहुत ज़रूरी काम तुम मेरा कर सकते हो। चलो, जल्दी चलो। वह मुझे उलुगुरू पहाड़ में एक गुफा में ले गए। बहुत अंदर जाकर उन्होंने बत्ती जलाई, तो देखा, एक बहुत बड़े म्यूज़ियम में हैं जिसकी दीवारों पर तस्वीरों की तरह वह फ़िल्मी गीत फ्ऱेम में लगे हुए हैं जो अब गुल हो चुके हैं। उन्होंने एक चाबी दी और कहा, अब ये अमानत नयी पीढ़ी की है, उन तक पहुँचा देना। यह कह कर वह नज़रों से गुल हो गए।
आय हाय लूट गया...
सबक़
1952 में, एक दिन मैं अपने मास्टर बी एन नायक के साथ चाल्र्स डिकिन्स के नावेल डेविड कापरफ़ील्ड पर बात कर रहा था, तो उन्होंने बताया कि ये किताब आधी हक़ीक़त और आघा फ़साना है। ये कहानी डिकिन्स की अपनी जिंदगी पर आधारित है। तो, मैंने पूछा, ऐसा क्यों? तो, उन्होंने समझाया, डाक्यूमेंटरी हर समय इंसान को सच्चाई तक नहीं ले जा सकती। फ़साना भी उस तक पहँचने का मंसूबा है। तुम्हारी तरह जब मैं छोटा था, अपने देवताओं के बारे मे मुझे बहुत ख़राब लगता था कि गणेश जी आधे इंसान है, आधे हाथी। ये हमारे कैसे भगवान हैं। धड़ इंसान का, सिर हाथी का। मैं चूँकि वेस्टर्नाइज होने लगा, सोचता ये क्या चक्कर है। मैं सोचने लगा क्या गणेश जी हाथी की शक्ल में इंसान हैं या इंसान की शक्ल में हाथी! उस दौरान जिस चीज़ न मेरी ज़िंदगी काफ़ी बदली, ये समझ कि गणेश जी वो इंसान है जिनमें हाथी की विज़डम है। और इतनी है कि उतनी सामान्य इंसान में नहीं है। जिस आर्टिस्ट ने इस देवता की कल्पना की, सामान्य लोगों को समझाने के लिए हाथी का सिर बनाया कि उनमें बहुत ज्ञान है। गणेश जी की इस अक़्लमंदी की बुनियाद है हाथी की याददाश्त की शक्ति। इसके बगैर विज़डम का मंसूबा ही नहीं हो सकता। जिसको गए हुए कल का इल्म ही न हो, वह आने वाले कल में कामयाब हो ही नहीं सकता। गणेश जी हमें समझाते हैं, हम कितनी भी मुसीबत में क्यों न हों, अगर हमें ये याद रहे कि हम उस मुसीबत में किन रास्तों से होकर पहुँचे तो उन्हीं से होकर निकल भी सकते हैं। वे कहने लगे मैं मुसलमान नहीं हूँ। लेकिन मुझे मालूम है, आप लोगों को क़ुरान इक़रा से शुरू होता है। जिसका मतलब है, पढ़ो। अगर कोई सारा कु़रान शरीफ़ न भी पढ़े, सिर्फ़ इस शब्द को पढ़कर अक़्ल बढ़ती है। क्योंकि ये शब्द उस इंसान ने लिखवाया है जो पढ़ नहीं सकते थे। उन्होंने कहा, तुम होनहार बनने की कोशिश कर रहे हो, तुम कभी इन बातों पर सोचना।
हर इंसान के नाम में उसके माता-पिता की आशाएँ और उम्मीदें होती हैं। मेरा नाम अशरफ़ अज़ीज़। मैं यहाँ हावर्ड युनिवर्सिटी के मेडिकल स्कूल में प्रोफ़ेसर हूँ। इस संस्मरण में, मैंने जिन लोगों का ज़िक्र किया है, मैं उनका साथी हूँ। मैं अक्सर वाशिंगटन डी सी से न्यूयार्क जाता हूँ, तो डेलावेयर नदी के पुल के बायीं ओर डुपोंट कंपनी की फै़क्टरी मुझे साफ़ नज़र आती है। ये वह कंपनी है, जिसके नक़ली धागे ने साइसेल के असली धागे को सस्ता करके जिन लोगों की ज़िंदगियों का ज़िक्र कर रहा था बेकार कर दिया। मेरा एक भाई इसी कंपनी में था। लेकिन डुपोंट के व्यापार की उसे कोई जानकारी नहीं थी। मैं ख़ुद उस देश का नागरिक हूँ जिसके कारपोरेशन उन मुल्कों पर लगाम लगाये बैठे हैं जहाँ आज भी हमारे भाई-बहन कड़े संघर्ष में जी रहे हैं। मेरा नाम अशरफ़ अज़ीज़ है, अशरफ़ होने की गुंजाइश नहीं रही, लेकिन अज़ीज़ बनने की जद्दोजहद अभी जारी है।
हाय लूट गया... हाय लूट गया...
कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। उसका पहला दौर एक गंभीर नाटक है और दूसरा दौर तमाशा। दूसरे दौर को अर्थशास्त्रियों ने ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबल इकानोमी नाम दिया है। पिछली सदी का साम्राज्यवाद एक गंभीर नाटक की तरह गुज़र गया, अब जो तमाशा शुरू हुआ है उसका असर हमारे भाई बहनों पर क्या होगा, वो देखना अभी बाक़ी है।
आज भी बहुत से हिंदुस्तानी जिन्होंने थोड़ी बहुत पढ़ाई की है अपने आप को बुद्धिजीवी समझते हैं। वे न हिंदुस्तानी गीत और न ही लोक संगीत को वह इज़्ज़त देने को तैयार हैं ज® वे शास्त्रीय संगीत को देते हैं। साउथ एशिया की आज़ादी की पचासवीं वर्षगाँठ पर, मैंने एक ंिहंदुस्तानी फ़िल्मी गीत की क़ीमत क्या है, इसके जवाब में एक ऐसी आपबीती लिखी है, जिसमें कुछ लोगों की जानें ही चली गई होतीं। हो सकता है, इस संस्मरण को पढ़कर फ़िल्म संगीत की गहराई समझ में आए। इस लेख में ये भी ज़ाहिर है कि विकासशील देशों में फ़िल्म संगीत कितना बड़ा सहारा है। इसकी कितनी क़द्र की जाती है। 1985 में जब मैं दारेस्सलाम गया, तो वहाँ बहुत कम हिंदुस्तानी बचे थे। वहाँ पुराने एंबेसी सिनेमा के रास्ते पर भीड़ लगी हुई थी। जब थियेटर पर देखा, ‘मिस्टर इंडिया’ फ़िल्म लगी हुई थी। मैं कभी भी इंडिया नहीं गया। लेकिन फ़िल्मी गीतों ने मुझे हमेशा इंडिया से जोड़े रक्खा। मैं हिंदुस्तानी ज़बान अच्छी तरह बोल सकता हूँ, लिख नहीं सकता।
(समाप्त)
लेकिन कृष्ण की कहानियों में बहुत सी इंसानी मुश्किलों के हल हैं। उन पर सोच-विचार करके किसी भी मज़हब का आदमी अपनी मुश्किलें दूर कर सकता है। अब देखो उस चाँद को, मेरे दोस्त धीरु भाई कहते हैं, चाँद कृष्ण का बड़ा भाई आकाश में अपना फ़र्ज़ निभा रहा है। मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ। मुझे आसमान पर दो दोस्त अपनी दोस्ती का आनंद लेते नज़र आते हैं।’ यूँ ही बातें करते-करते वे मुझे हास्टल पर छोड़ने आए। कहने लगे कि ज़िंदगी हमेशा किसी प्लान पर नहीं चलती। आज हमारा यूँ अचानक मिलना इतनी ख़़ूबसूरत बात है कि उसको बयाँ नहीं कर सकता। ये कहकर उन्होंने अलविदा ली और जब मैंने पलट कर देखा तो वे अफ्रीका की रात में एकदम अकेले चले जा रहे थे। दिल में एक तूफ़ान उठा कि भाग कर उनके पास चला जाऊँ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उस रात के बरसों बाद यहाँ अमरीका की कोलराडो पहाड़ी पर कैम्पिंग करने गया। बर्फ़ जैसी ठंडी हवा सोने नहीं दे रही थी, सारा जिस्म काँप रहा था। ऐसी मुश्किल में अचानक मेरी निगाह आकाश की तरफ़ गई तो वैसा ही चाँद मैंने आकाश पर देखा। हवा चल रही थी कि नहीं, सर्दी थी कि नहीं मेरा बदन एकदम सहज हो गया। मैंने सकून महसूस किया।
इसी वर्ष ज़ंज़ीबार को भी आज़ादी मिली। लेकिन मैं वहाँ नहीं पहुँचा। 1964 में एक भयंकर कर्नल ओकेलो ज़ंज़ीबार में इंक़लाब लाए। कुछ ही रातों में हज़ारों अरब मर्द, औरतों और बच्चों को हलाक कर दिया गया। इस बदले में कि एक ज़माने में अरबों ने कालों को दास बनाया था। उन दिनों समुन्दर से आती हुई हवा में मुर्दों की बदबू आने लगी थी। फिर कर्नल ओकेलो ने ज़ोर ज़बर्दस्ती काले लड़कों की हिंदुस्तानी लड़कियों से सामूहिक शादियाँ करवाईं।
1964 में मुझे बी एस सी डिग्री मिली तो मैं टांगा में ही काले अफ्रीकियों के सैकेंडरी स्कूल में अध्यापक बन गया। नौकरी शुरू हुई ही थी कि फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन की स्कालरशिप पर अमेरिका आ गया। आने से पहले मैंने एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत ‘तुम हो साथ रात भी हसीन है, अब तो मौत का भी ग़म नहीं है’ इस रिकार्ड को अपने साथ लाने के लिए चुना। लेकिन जब पैक करने गया तो ख़़याल आया कि अमेरिका में इसकी क्या ज़रूरत पड़ेगी। मैंने रिकार्ड वहीं छोड़ दिया। जो बाद में मुझे अपनी ग़लती ही नहीं गुनाह महसूस होने लगा। नैरोबी से हवाई जहाज़ उड़ा तो ख़ुशी की जगह रिकार्ड के पीछे छूटने का ग़म हो रहा था जिससे मैं आज भी निजात नहीं पा सका हूँ।
तुम हो साथ रात भी हसीन है
अब तो मौत का भी ग़म नहीं है
इसके बाद अफ़्रीकाकी हालत और भी बिगड़ गई। 1966 में मारे डर के मेरी माँ दो बहनों को लेकर कराची चली गई। वहाँ से खत आया यहाँ सब कुछ ठीक है। मोहाजिर ज़्यादा है, पाकिस्तानी कम। यू पी के मोहाजिर के साथ हम अफ़्रीका के मोहाजिर एक दिन से दूसरे दिन में पहुँच जाते हैं। हमारे घर का पार्टिशन हो गया। सारे आदमी अफ़्रीका में और बाहर थे, औरतें और बच्चे पाकिस्तान में। इरादा तो यही था कि सब कुछ ठीक होने के बाद अफ़्रीका लौट आऐंगे। लेकिन ये मालूम नहीं था, वह घर हमारा नहीं रहा। सच तो यह था, भारत और पाकिस्तान के लोगों ने अफ़्रीका को अपना घर कभी बनाया ही नहीं। क्योंकि अगर साउथ एशिया को अपना घर समझते तो कभी छोड़ते ही नहीं और बाहर जाकर उसे भी अपनाया नहीं। साउथ एशिया में रहते बाहर के सपने देखते रहे और बाहर रहते हुए साउथ एशिया के। ऐसे लोग कितने डाँवाडोल होते हैं। 1967 में तंज़ानिया के प्रेसिडेंट नियरेरे ने अरूशा घोषणा के साथ अपने देश को समाजवाद के रास्ते पर लगा दिया। रातों रात राजनेता और बड़े सरकारी अर्दलियों के सिवा सब ग़रीब हो गए। जो हमारे लोग बचे, वे उन लोगों के साये में जी रहे हैं।
1972 में युगांडा के डिक्टेटर ईदी अमीन ने कुछ ही दिनों में मोहलत देकर एशियाई लोगों को निकाल बाहर किया। लेकिन इस बेरहम डिक्टेटर ने हमारे लोगों के साथ वह व्यवहार नहीं किया जो 1946-47 में पार्टिशन के समय हमने ख़ुद एक दूसरे के साथ किया। हमारी पाँच हज़ार साल पुरानी सभ्यता हमें ख़ून-ख़राबे से बचा नहीं सकी।
1983 में वाशिंगटन में एक बार जब मैं शाम को घर लौटा तो मेरे नाम एक ख़त था। हैंडराइटिंग देखकर जानी पहचानी लगी। लेकिन तुरंत कुछ भी याद नहीं आया। जब पढ़ा, तो ये ख़त मेरे भाई अय्यूब का था। उसमें छोटा सा संदेश था कि मैं तुम्हारी कुछ मदद चाहता हूँ। कुछ इन्फ़ोरमेशन। क्योंकि तुम मेडिकल स्कूल में पढ़ाते हो। तुम बता सकते हो, कभी-कभी मैं बिला वजह रोता हूँ, क्या इसका कोई इलाज है? आखि़र में लिखा संगीत निर्देशक सी रामचंद्र अपना ही ख़ून बहाकर चले गए। ज़माना अच्छा नहीं है। मैंने उन्हें जवाब दिया। लेकिन याद नहीं मैंने क्या लिखा था।
1985 में मेरे भाई अकरम जो टांगों में हमारी आखिरी निशानी थे, वे भी लंदन चले गए। इससे पहले उन्होंने अपने घर में दोस्तों को पार्टी दी। और वे सारे रिकार्ड उन्हें दे दिये जो हमने 1946 से इकट्ठे करके एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी बनाई थी। ये रिकार्ड हमारे सुख-दुख के साथी थे। इनके साथ उन दिनों की यादें जुड़ी थीं जो हमने एक साथ गुज़ारी थीं। वे सारे रिकार्ड मेरे भाई अकरम ने एक बहुत कड़वा घूँट पीकर दोस्तों को गिफ़्ट में दे दिये। हमारे परिवार ने बैंक बैलेंस नहीं बनाया था। हज़ारों रिकार्डों का ख़ज़ाना कुछ देर में ही लुट गया।
तुम भी भुला दो, मैं भी भूला दूँ
क्या भुला दें गुज़रे ज़माने...
दिसंबर 1985 में शुक्रवार की दोपहर की नमाज़ पढ़ते हुए हमारी माँ बेहोश होकर गिर पड़ीं। फ़ौरन उनको अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर ने बताया कि उनके दिमाग़ की नस फट गई हैं। आहिस्ता-आहिस्ता उनका दिमाग़ अपने ही लहू में डूबने लगा। हवा में बेबस चिराग़ की तरह यादें एक के बाद एक बुझने लगीं। कुछ ही घंटों में ज़िंदगी भर की यादें, जज़्बात, ख़़याल, उम्मीदें, एक लंबी चुप्पी में खो गईं। हम जिंदगी भर माँ को बेबे जी पुकारते थे। हमने इसी भूमिका में उन्हें जाना लेकिन उनका नाम रसूल बीबी था। रसूल बीबी कौन थीं, ये भेद उनके साथ ही चला गया। 1986 के नये वर्ष की रात, मेरी माँ को स्ट्रोक हुआ और वे गहरी नींद में सो गईं। उनकी मौत के साथ उनकी दो ख़्वाहिशें भी दफ़्न हो गईं। एक तो ये कि वो खडगपुर जाना चाहती थीं वो सपना कभी पूरा नहीं हुआ और दूसरा ये कि हज करें। जब मैं अपनी माँ के फ़्यूनेरल पर गया तो भाई अय्यूब से 22 वर्षों बाद मुलाक़ात हुई। मिलने के बाद ऐसे देख रहे थे, जैसे मैं कोई अजनबी हूँ। और कहने लगे, अगर मैंने सड़क पर देखा होता तो कभी नहीं कह सकता था कि तुम मेरे भाई हो। वक़्त ऐसा भी करता है। मुझे भी भाई में एक बहुत
बड़ा फ़र्क़ नज़र आया। उन्होंने चंद्रमोहन और सोहराब मोदी की स्टाइल छोड़ दी थी। अब वे दिलीप कुमार के देवदास और गुरुदत्त के काग़ज़ के फूल के सिनेमा के कैमरे के लिए तैयार थे।
ये भी एक रूप है...
ज़िंदगी का एक दौर वह होता है जब वक़्त हमें उड़ती कालीन पर बिठाकर एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक ले जाता है। फिर एक दौर आता है जब वक़्त एक भारी पत्थर की तरह ढोना पड़ता है। मेरे भाई की जिंदगी के उस दौर में थे।
कराची में जब मैं एक शाम उनके घर पर बैठा था और हम चाय पी रहे थे, मैंने अपने कोट में हाथ डाला तो एक कैसेट हाथ में आया। उसमें पचास के दशक के गीत थे। मैंने उनकी इजाज़त से टेप बजाया तो पहला गाना फ़िल्म आज़ाद का था, ‘जा री, जा री ओ कारी बदरिया’। उनके चेहरे से चिंता के बादल दूर हो गए। गाने के साथ झूमने लगे।
जा री जारी ओ कारी बदरिया
मत बरसो....
फिर एक के बाद एक गाने बजने लगे, तो बिना कुछ कहे ऐसा लगा कि हम फिर एक दूसरे के बहुत क़रीब आ गए हैं। कुछ गानों के बाद अचानक एक नया गीत बजा। वह था, ‘जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे’। सज्जाद हुसैन के संगीत में फ़िल्म खेल का गीत शुरू होते ही भाई एकदम भौंचक्के रह गए।
जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे
जब गीत पूरा हुआ तो उन्होंने टेप बंद कर दिया। एकदम आकर गले लगा लिया और कहा, ‘मैंने न तो भाई का और न ही दोस्त का फ़र्ज़ निभाया है। मैं वो वादा पूरा नहीं कर सका कि हम हाजीभाई को फिर से मिलने जाएँगे। मजबूरी की वजह से पूरा नहीं कर सके। कोई भी इंसान अपने आप में मुकम्मल नहीं है। अगर वो ऐसा है, तो वो फरिश्ता है।’ वो बैठ गए और मुझे ग़ालिब का ये शेर याद आया:
बस के दुश्वार है, हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना
माहौल में चुप्पी छाई हुई थी। मेरे दिमाग़ में आ रहा था, भाई की ज़िंदगी की मुश्किलों ने उन्हें एक अच्छा इंसान बनाया है। कुछ ही देर पहले उन्होंने जो कुछ कहा, वह इसका सबूत है। चुप्पी उन्होंने ही तोड़ी और कहा, इस गीत को ढूँढ़ने के लिए हम अफ़्रीका में कहाँ-कहाँ गए थे। लोगों ने वादा करने पर भी न सुनाया। लेकिन इन्हें उसका मलाल नहीं था। कहने लगे, ‘जिनके पास है, वह अपने ख़ज़ाने की क़ीमत जानते हैं।’ सज्जाद को फ़िल्म रुस्तम सोहराब के बाद किसी ने और मौक़ा नहीं दिया। फिर पूछा, ‘क्या तुम्हें मालूम है कि फ़िल्म दोस्त के गीत, ”कोई प्रेम का देके संदेसा“ इसके पीछे कौन-सा गीत था?’ तो, मैंने कहा, ‘आपके बग़ैर यह मालूम करना मुझे ठीक नहीं लगा, मुझे भी नहीं मालूम।’ मेरे दिमाग़ में एक बात उठी, मेरे भाई ने तो अपनी इंसानियत का सबूत दे दिया, मरे दिल में उनके लिए जज़्बात भर उठे। लेकिन जोश ने साथ नहीं दिया कि मैं भी उन्हें वैसे ही गले लगाऊँ जैसाकि उन्होंने किया था। कुछ ही पलों में वह सुनहरा मौक़ा हाथ से निकल गया। मेरी इंसानियत मेरे सामने थी लेकिन मैं उस तक नहीं पहुँच सका। बातें करते-करते शाम ढल गई। एक दिन हम कराची की सैर पर निकले। जो अचानक एक ऐसी सड़क पर आ गए जिसमें न इधर था, न उधर था। जब साइनबोर्ड देखा तो वो थी जिगर मुरादाबादी रोड। ये पढ़कर हम दोनों हँसने लगे। इतना हँसे कि पेट में दर्द होने लगा। फिर तो हमने पंजाब और इंडिया जाने का इरादा किया था छोड़ दिया। उनके मुँह से एकाएक जिगर मुरादाबादी का ये शेर निकला:
वही है ज़िंदगी लेकिन जिगर, ये हाल है अपना
जैसे कि जिंदगी से जिं़दगी कम होती जाती है
मैं अमरीका लौट कर आया। कुछ ही महीने बाद एक शाम घर लौटा तो एक टेलीग्राम था कि अय्यूब अब हमारे बीच नहीं रहे। जब मैंने तार पढ़ा तो वो साइसेल की धागे के हार की टूटने की आवाज़ आई। उसमें पिरोई यादें गर्द में बिखर गईं। घुटनों में ताक़त नहीं रही। वक़्त थोड़ी देर के लिए ठहर गया। बाद में पता चला एक मनहूस रात उन्हें छाती में दर्द हुआ। उनके बेटे अस्पताल लेकर गए। लेकिन रास्ते में ही वह उस रास्ते पर चल पड़े जहाँ कोई किसी का साथी नहीं होता। डाक्टर ने जब नब्ज़ देखी तो कहा ये तो कब के जा चुके हैं। उनका देहांत उनकी बेटी की शादी के एक सप्ताह पहले हुआ। शादी की तारीख़ बढ़ा दी गई। छह महीने बाद मेरे भाई असलम ने उनकी जगह खड़े होकर बेटी को विदाई दी। जिंदगी के दाम वक़्त से चुकाये जाते हैं। उनके हार्ट अटैक के वक़्त जब मेरे भाई ने जेब में हाथ डाला तो वे जेबें ख़ाली हो चुकी थीं। पहले वे पैसे से ग़रीब हुए फिर वक़्त से। उस समय उनकी उम्र 58 थी। जब मैं छोटा था, अगर किसी का हार्ट अटैक से देहांत होता तो बड़े लोग कहते, बनाने वाले की बड़ी मेहरबानी कि जल्दी उठा लिया। मेडिकल कालेज में आने के बाद जानकारी ये हुई कि इस रोग से जो भी मरता है, वह इस दुनिया में बेहिसाब पीड़ा झेलकर जाता है। मेरे भाई का ये अंजाम मुझे कभी-कभी बेबस कर देता है। तब मुझे उनकी कही बात याद आती है कि जिंदगी एक बहुत बड़ा तोहफ़ा है। जिसकी हर अच्छी और बुरी बात उससे अलग नहीं की जा सकती। इस जिंदगी के लिए ख़ुदा के शुक्र के सिवा और कुछ नहीं सोचना चाहिए।
राही कई अभी आएंगे
कई अभी जाएंगे...
श्रद्धांजलि
इस याद को ताज़ा करते हुए मुझे कहना पड़ेगा कि बच्चों की परवरिश में उनको यह सिखाया जाना बहुत ज़रूरी है कि वह जिनसे मोहब्बत करते हैं, अगर उसका उन्होंने खुलकर इज़हार नहीं किया तो यह ग़लती ही नहीं गुनाह है। मेरे कहने से भाई अय्यूब की ज़िंदगी नहीं बढ़ती लेकिन उनका हौसला तो बढ़ सकता था।
ये कैसी अजब दास्ताँ हो गई है
छुपाते-छुपाते बयाँ हो गई है
ये बेमिसाल गीत सुरैया के आखि़री गीतों में से है। यह रुस्तम सोहराब फ़िल्म का गीत है जो सज्जाद हुसैन की आखि़री फ़िल्म थी। इसके बाद वे अपनी इज़्ज़त आबरू लेकर फ़िल्मी दुनिया से दूर हो गए। किसी भी प्रोड्यूसर को ऐसा हौसला नहीं आया कि वे फिर उनको एक और मौक़ा देते। 1950 के दशक में लता मंगेशकर ने हिंदुस्तान के कोई पाँच-छह बढ़िया म्यूज़िक डाइरेक्टरों में सज्जाद हुसैन का ज़िक्र किया था। 1984 में फ़िल्मी गीत के पचास वर्ष होने पर एक मैगज़ीन में वही पुराना लेख दुबारा छापा गया था, लेकिन इस बार उसमें सज्जाद हुसैन का नाम नहीं था। तक़रीबन उसी समय यहाँ वाशिंगटन के गीतांजलि कार्यक्रम में ‘ये हवा, ये रात चाँदनी...’ गीत बजा तो एम सी ने कहा ये गीत मदनमोहन ने कंपोज़ किया था। ये वह मदनमोहन थे जिन्होंने आखिरी दाँव फ़िल्म में ‘तुझे क्या सुनाऊँ ऐ दिलरुबा’ में उसी गीत की कार्बन कापी बनाई। कहते हैं, जब सज्जाद हुसैन ने ये गीत सुना तो कहने लगे आजकल तो हम क्या हमारे साये भी उठकर चलने लगे हैं। ये कहकर वे फिर से ग़ायब हो गए। जब लता मंगेशकर के जीवन पर 1992 में वीडियो बना तो सज्जाद की झलक इस वीडियो में मिली जिसमें वह लता को आनर कर रहे हैं। दो-तीन मिनट में ऐसा दिखाई पड़ता है, उनका मुँह नहीं हाथ बोल रहा है। लेकिन उनकी जिंदगी में एक मिठास तो आ ही सकती थी।
ऐ दिलरुबा, नज़रें मिला... कुछ तो ...
1992 में यहाँ वायस आफ़ अमेरिका की ब्राडकास्टर विजयलक्ष्मी ने मुंबई में उनसे इंटरव्यू करने की बात कही तो लोगों ने कहा आप किसका इंटरव्यू करना चाहती हैं। सज्जाद हुसैन मिलनसार इंसान नहीं थे। लेकिन इतनी दूर से आए श्रोता को निराश नहीं कर सके, तो उनका आखि़री इंटरव्यू वायस आफ़ अमरीका ने लिया और उन पर तीन प्रोग्राम पेश किये। 1994 में वे हाथ जिसने इटली के मैन्डोलिन को हिंदुस्तानी गाना गाना सिखाया, इस साज़ से हमेशा के लिए दूर हो गए।
मेरे यहाँ से चल दिये
मेरा खु़दा भला करे
शौक़ से ग़म उठाब
शिकवे न लब पे लाएँगे
उनकी एक छोटी सी श्रद्धांजलि राजू भारतन ने स्क्रीन पत्रिका में दी लेकिन उसके इर्द-गिर्द के दूसरे आर्टिकल के शोरोग़ुल ने उसकी अहमियत को ढँक दिया। एक दिन मैं अपने एक छात्र को जो फ़िल्मी संगीत में दिलचस्पी रखते हैं, उनसे सज्जाद के गीत का ज़िक्र कर रहा था, तो उन्होंने पूछा, ये सज्जाद कौन था?
1988 में मेरे पिता की मृत्यु तंज़ानिया के इरिंगा शहर में हुई और उनको इरिंगा के उसी क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया जिसे वे दुनिया का स्वर्ग समझते थे।
बालूसिंह 1970 के दशक में अफ़रीक़ा में पाबंदी आने से पहले लंदन पहुँच गए और वहाँ वह वेल्फ़ेयर पर हैं। ख़बर आई कि कोयले के काम की वजह से उन्हें काले फेफड़े की बीमारी हो गई है जिसे एम्फ़ीज़ीमा कहते हैं। इसमें मरीज़ को लगता है, वह पानी में डूब रहा है। यहाँ हक़ीक़त ये थी कि आग से काम करने वाला पानी में डूब रहा था। हो सकता है वे अब तक डूब चुके हों।
सब कहाँ कुछ लाला-ओ गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक मे क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
- मिर्ज़ा ग़ालिब
हाजीभाई एक रात ख़्वाब में मिले, बहुत जल्दी में थे, कहने लगे, बेटा, तुमने बहुत देर कर दी। सुना है, अमरीका में तुम्हें बहुत कामयाबी मिली, वक़्त बहुत कम है। एक बहुत ज़रूरी काम तुम मेरा कर सकते हो। चलो, जल्दी चलो। वह मुझे उलुगुरू पहाड़ में एक गुफा में ले गए। बहुत अंदर जाकर उन्होंने बत्ती जलाई, तो देखा, एक बहुत बड़े म्यूज़ियम में हैं जिसकी दीवारों पर तस्वीरों की तरह वह फ़िल्मी गीत फ्ऱेम में लगे हुए हैं जो अब गुल हो चुके हैं। उन्होंने एक चाबी दी और कहा, अब ये अमानत नयी पीढ़ी की है, उन तक पहुँचा देना। यह कह कर वह नज़रों से गुल हो गए।
आय हाय लूट गया...
सबक़
1952 में, एक दिन मैं अपने मास्टर बी एन नायक के साथ चाल्र्स डिकिन्स के नावेल डेविड कापरफ़ील्ड पर बात कर रहा था, तो उन्होंने बताया कि ये किताब आधी हक़ीक़त और आघा फ़साना है। ये कहानी डिकिन्स की अपनी जिंदगी पर आधारित है। तो, मैंने पूछा, ऐसा क्यों? तो, उन्होंने समझाया, डाक्यूमेंटरी हर समय इंसान को सच्चाई तक नहीं ले जा सकती। फ़साना भी उस तक पहँचने का मंसूबा है। तुम्हारी तरह जब मैं छोटा था, अपने देवताओं के बारे मे मुझे बहुत ख़राब लगता था कि गणेश जी आधे इंसान है, आधे हाथी। ये हमारे कैसे भगवान हैं। धड़ इंसान का, सिर हाथी का। मैं चूँकि वेस्टर्नाइज होने लगा, सोचता ये क्या चक्कर है। मैं सोचने लगा क्या गणेश जी हाथी की शक्ल में इंसान हैं या इंसान की शक्ल में हाथी! उस दौरान जिस चीज़ न मेरी ज़िंदगी काफ़ी बदली, ये समझ कि गणेश जी वो इंसान है जिनमें हाथी की विज़डम है। और इतनी है कि उतनी सामान्य इंसान में नहीं है। जिस आर्टिस्ट ने इस देवता की कल्पना की, सामान्य लोगों को समझाने के लिए हाथी का सिर बनाया कि उनमें बहुत ज्ञान है। गणेश जी की इस अक़्लमंदी की बुनियाद है हाथी की याददाश्त की शक्ति। इसके बगैर विज़डम का मंसूबा ही नहीं हो सकता। जिसको गए हुए कल का इल्म ही न हो, वह आने वाले कल में कामयाब हो ही नहीं सकता। गणेश जी हमें समझाते हैं, हम कितनी भी मुसीबत में क्यों न हों, अगर हमें ये याद रहे कि हम उस मुसीबत में किन रास्तों से होकर पहुँचे तो उन्हीं से होकर निकल भी सकते हैं। वे कहने लगे मैं मुसलमान नहीं हूँ। लेकिन मुझे मालूम है, आप लोगों को क़ुरान इक़रा से शुरू होता है। जिसका मतलब है, पढ़ो। अगर कोई सारा कु़रान शरीफ़ न भी पढ़े, सिर्फ़ इस शब्द को पढ़कर अक़्ल बढ़ती है। क्योंकि ये शब्द उस इंसान ने लिखवाया है जो पढ़ नहीं सकते थे। उन्होंने कहा, तुम होनहार बनने की कोशिश कर रहे हो, तुम कभी इन बातों पर सोचना।
हर इंसान के नाम में उसके माता-पिता की आशाएँ और उम्मीदें होती हैं। मेरा नाम अशरफ़ अज़ीज़। मैं यहाँ हावर्ड युनिवर्सिटी के मेडिकल स्कूल में प्रोफ़ेसर हूँ। इस संस्मरण में, मैंने जिन लोगों का ज़िक्र किया है, मैं उनका साथी हूँ। मैं अक्सर वाशिंगटन डी सी से न्यूयार्क जाता हूँ, तो डेलावेयर नदी के पुल के बायीं ओर डुपोंट कंपनी की फै़क्टरी मुझे साफ़ नज़र आती है। ये वह कंपनी है, जिसके नक़ली धागे ने साइसेल के असली धागे को सस्ता करके जिन लोगों की ज़िंदगियों का ज़िक्र कर रहा था बेकार कर दिया। मेरा एक भाई इसी कंपनी में था। लेकिन डुपोंट के व्यापार की उसे कोई जानकारी नहीं थी। मैं ख़ुद उस देश का नागरिक हूँ जिसके कारपोरेशन उन मुल्कों पर लगाम लगाये बैठे हैं जहाँ आज भी हमारे भाई-बहन कड़े संघर्ष में जी रहे हैं। मेरा नाम अशरफ़ अज़ीज़ है, अशरफ़ होने की गुंजाइश नहीं रही, लेकिन अज़ीज़ बनने की जद्दोजहद अभी जारी है।
हाय लूट गया... हाय लूट गया...
कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। उसका पहला दौर एक गंभीर नाटक है और दूसरा दौर तमाशा। दूसरे दौर को अर्थशास्त्रियों ने ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबल इकानोमी नाम दिया है। पिछली सदी का साम्राज्यवाद एक गंभीर नाटक की तरह गुज़र गया, अब जो तमाशा शुरू हुआ है उसका असर हमारे भाई बहनों पर क्या होगा, वो देखना अभी बाक़ी है।
आज भी बहुत से हिंदुस्तानी जिन्होंने थोड़ी बहुत पढ़ाई की है अपने आप को बुद्धिजीवी समझते हैं। वे न हिंदुस्तानी गीत और न ही लोक संगीत को वह इज़्ज़त देने को तैयार हैं ज® वे शास्त्रीय संगीत को देते हैं। साउथ एशिया की आज़ादी की पचासवीं वर्षगाँठ पर, मैंने एक ंिहंदुस्तानी फ़िल्मी गीत की क़ीमत क्या है, इसके जवाब में एक ऐसी आपबीती लिखी है, जिसमें कुछ लोगों की जानें ही चली गई होतीं। हो सकता है, इस संस्मरण को पढ़कर फ़िल्म संगीत की गहराई समझ में आए। इस लेख में ये भी ज़ाहिर है कि विकासशील देशों में फ़िल्म संगीत कितना बड़ा सहारा है। इसकी कितनी क़द्र की जाती है। 1985 में जब मैं दारेस्सलाम गया, तो वहाँ बहुत कम हिंदुस्तानी बचे थे। वहाँ पुराने एंबेसी सिनेमा के रास्ते पर भीड़ लगी हुई थी। जब थियेटर पर देखा, ‘मिस्टर इंडिया’ फ़िल्म लगी हुई थी। मैं कभी भी इंडिया नहीं गया। लेकिन फ़िल्मी गीतों ने मुझे हमेशा इंडिया से जोड़े रक्खा। मैं हिंदुस्तानी ज़बान अच्छी तरह बोल सकता हूँ, लिख नहीं सकता।
(समाप्त)
Monday, September 12, 2011
सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 9
(पिछली पोस्ट से जारी)
बालूसिंह के घर जाते वक़्त उन्होंने फिर हमसे तकरार की कि फ़िल्मी गीतों ने हमें अंघा बना दिया है। फ़िल्म देखने जाते नहीं। फ़िल्म ने फ़ोटोग्राफ़रों ने जो काम किया है इसका कोई इल्म नहीं, कोई ज़िक्र नहीं। दूसरे दिन हम फिर से बस से वापस लौट रहे थे। बारिश की वजसे रास्ते कीचड़ से भरे थे। गाड़ी को धक्का देकर, कभी गाड़ी में बैठकर आगे बढ़ते रहे। तभी मुझे यह समझ आया कि अच्छी कंपनी में मुसीबतों का रंग कुछ अलग ही होता है। एक बात जो वापसी के सफ़र की याद रही, वह यह कि मैंने अपने भाई से सवाल किया था कि क्या फ़िल्मी संगीत में कोई ऐब या ख़़राबी भी है? उन्होंने कहा एक बहुत बड़ा नुक़्स है। फ़िल्म संगीत में हिंदुस्तान के लोगों में एकता लाने की संभावना पर काम नहीं किया गया है। ये इंडिया के टुकड़े होने से नहीं बचा सका। किसी भी लेखक और आलोचक ने इस प्रश्न को नहीं उठाया। उन्होंने ये भी कहा, ‘ये ख़ुदा की मेहरबानी है, पार्टीशन से पहले ही उन्होंने सहगल को उठा लिया।’
बिजलीवाला शाह, दहशत में एक छोटा चश्मा
जब हम घर लौटे तो दोनों को मच्छर के काटे का वरदान मिला। दस बारह दिन तक डाक्टरों की सूइयाँ खाते रहे। बिजलीवाला शाह हमारी कम्युनिटी में उन गिने चुने लोगों में थे, जिनका पढ़ाई-लिखाई किताबों से नाता था। हमारी कम्युनिटी में वह एक गहरी सोच वाले इंसान थे। अलीगढ़ में मुग़ल शायरों पर उन्होंने थीसिस लिखी थी। वह कहते मेरा दिमाग़, सोच-समझ, मेरे जज़्बात हमारी तारीख़ के एक वर्ष में क़ैद है, वह है 1857। इस बरस में हिंदुस्तान में क्या हुआ। अगर हम ठीक से इसे समझें तो हमारे भविष्य का दरवाज़ा खुल जाएगा। वह ख़ुद कहते कि वह उस वक़्त के आदमी नहीं है, उनका जन्म तो इस सदी में हुआ। एक लिहाज़ से वह भाई अय्यूब के उस्ताद थे।
ग़ालिब, दाग़, सौदा, हाली, ज़फ़र इनकी शायरी पर घंटों बातें करते ताकि मेरे भाई और अच्छा गा सकें। लेकिन बिजली वाले शाह एक अजीब शाह थे। मुझे ताज्जुब होता था कि जिस आदमी की इतनी पढ़ाई-लिखाई हो वह इस तरह का काम क्यों करता है? कम्युनिटी वालों को सबसे बड़ा एतराज़ यह था कि शाह ने काली अफ़्रीकी से शादी की थी। इसलिए बहुत से लोग कहते थे कि ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई इंसान के लिए अच्छी चीज़ नहीं है। मेरे भाई ने एक दिन समझाया कि उन्हें बिजली वाले के हौसले पर रश्क होता है। वह दुनिया में कितने अकेले हैं। उनके घर वाली के लिए उर्दू हवा में उड़ती हुई बेमानी आवाज़ है। शाह साहब चारदीवारी में अपनी यादों के सहारे एक लम्हे से दूसरे लम्हे पहुँच रहे हैं। मैं उनकी हिम्मत की दाद देता हूँ। इसी मुलाक़ात में बिजली वाले शाह ने हमें नायलोन की ईजाद के बारे में बताया। उन्होंने अख़बार में पढ़ा है, अमरीका में नायलोन का धागा बन चुका है और यह साइसेल का चक्कर ख़त्म होने वाला है। तो मेरे भाई ने कहा कि शाह साहब हमें बीमारी में ठीक करने आए हैं कि और बीमार करने? वह हँसने लगे। नहीं-नहीं, यह बदलाव तो सौ साल बाद होगा, अभी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। उन्होंने कहा मैं यह इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि नायलोन की कहानी बहुत दिलचस्प है। 1937 में अमरीका की डुपौंट कंपनी ने हारवर्ड विश्वविद्यालय के एक होनहार प्रोफ़ेसर वॉल्स करदर्स को कंपनी में लिया ताकि वे नायलोन का धागा बनाये। वे कामयाब हुए। लेकिन पेटेंट मिलते ही अपनी ईजाद पर निराश होकर उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली। 1940 में इस धागे का स्टॉकिंग जब न्यूयार्क के मेसी स्टोर में बिका तो, औरतों ने हंगामा कर दिया। जिस चीज़ का फ़ायदा करदर्स को मिलना चाहिए था, वह कंपनी ले रही थी।
तबीयत ठीक होने पर भाई तो नौकरी पर चले गए और मैं मास्टर दया भाई के डंडे खाने की तैयारी करने लगा। स्कूल जाने के पहले बारबार मेरे दिमाग़ में आ रहा था, काश, समय पीछे चला जाए जब हम सफ़र करने की तैयारी कर रहे थे। कोई भी इंसान तवारीख़ के बाहर नहीं रह सकता। जो इसकी कोशिश करता है, उसको सज़ा मिलती है। अगस्त 1947 में महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना जो क्रांति लाए, तीसरी दुनिया के देशों में ब्रिटिश राज की लगाम ढीली पड़ने लगी। लेकिन ये आज़ादी दक्षिण एशिया में आई। अफ्ऱीक़़ा के हिंदुस्तानियों को अभी भी उसकी कोई ज़रूरत महसूस नहीं हुई। वे ब्रिटेन के वफ़ादार बने रहे। उनके लिए किपलिंग का गंगादीन खलनायक नहीं हीरो था। हालाँकि रेलगाड़ी हमारे बाप-दादाओं ने बनायी थी, लेकिन हमें सिर्फ़ सेकेंड क्लास में बैठने की इजाज़त थी और उसमें भी हम ख़ुश थे। थर्ड क्लास के डिब्बे में क्या हो रहा है, उससे हमें कोई मतलब नहीं था।
(अगली किस्त में समाप्य)
बालूसिंह के घर जाते वक़्त उन्होंने फिर हमसे तकरार की कि फ़िल्मी गीतों ने हमें अंघा बना दिया है। फ़िल्म देखने जाते नहीं। फ़िल्म ने फ़ोटोग्राफ़रों ने जो काम किया है इसका कोई इल्म नहीं, कोई ज़िक्र नहीं। दूसरे दिन हम फिर से बस से वापस लौट रहे थे। बारिश की वजसे रास्ते कीचड़ से भरे थे। गाड़ी को धक्का देकर, कभी गाड़ी में बैठकर आगे बढ़ते रहे। तभी मुझे यह समझ आया कि अच्छी कंपनी में मुसीबतों का रंग कुछ अलग ही होता है। एक बात जो वापसी के सफ़र की याद रही, वह यह कि मैंने अपने भाई से सवाल किया था कि क्या फ़िल्मी संगीत में कोई ऐब या ख़़राबी भी है? उन्होंने कहा एक बहुत बड़ा नुक़्स है। फ़िल्म संगीत में हिंदुस्तान के लोगों में एकता लाने की संभावना पर काम नहीं किया गया है। ये इंडिया के टुकड़े होने से नहीं बचा सका। किसी भी लेखक और आलोचक ने इस प्रश्न को नहीं उठाया। उन्होंने ये भी कहा, ‘ये ख़ुदा की मेहरबानी है, पार्टीशन से पहले ही उन्होंने सहगल को उठा लिया।’
बिजलीवाला शाह, दहशत में एक छोटा चश्मा
जब हम घर लौटे तो दोनों को मच्छर के काटे का वरदान मिला। दस बारह दिन तक डाक्टरों की सूइयाँ खाते रहे। बिजलीवाला शाह हमारी कम्युनिटी में उन गिने चुने लोगों में थे, जिनका पढ़ाई-लिखाई किताबों से नाता था। हमारी कम्युनिटी में वह एक गहरी सोच वाले इंसान थे। अलीगढ़ में मुग़ल शायरों पर उन्होंने थीसिस लिखी थी। वह कहते मेरा दिमाग़, सोच-समझ, मेरे जज़्बात हमारी तारीख़ के एक वर्ष में क़ैद है, वह है 1857। इस बरस में हिंदुस्तान में क्या हुआ। अगर हम ठीक से इसे समझें तो हमारे भविष्य का दरवाज़ा खुल जाएगा। वह ख़ुद कहते कि वह उस वक़्त के आदमी नहीं है, उनका जन्म तो इस सदी में हुआ। एक लिहाज़ से वह भाई अय्यूब के उस्ताद थे।
ग़ालिब, दाग़, सौदा, हाली, ज़फ़र इनकी शायरी पर घंटों बातें करते ताकि मेरे भाई और अच्छा गा सकें। लेकिन बिजली वाले शाह एक अजीब शाह थे। मुझे ताज्जुब होता था कि जिस आदमी की इतनी पढ़ाई-लिखाई हो वह इस तरह का काम क्यों करता है? कम्युनिटी वालों को सबसे बड़ा एतराज़ यह था कि शाह ने काली अफ़्रीकी से शादी की थी। इसलिए बहुत से लोग कहते थे कि ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई इंसान के लिए अच्छी चीज़ नहीं है। मेरे भाई ने एक दिन समझाया कि उन्हें बिजली वाले के हौसले पर रश्क होता है। वह दुनिया में कितने अकेले हैं। उनके घर वाली के लिए उर्दू हवा में उड़ती हुई बेमानी आवाज़ है। शाह साहब चारदीवारी में अपनी यादों के सहारे एक लम्हे से दूसरे लम्हे पहुँच रहे हैं। मैं उनकी हिम्मत की दाद देता हूँ। इसी मुलाक़ात में बिजली वाले शाह ने हमें नायलोन की ईजाद के बारे में बताया। उन्होंने अख़बार में पढ़ा है, अमरीका में नायलोन का धागा बन चुका है और यह साइसेल का चक्कर ख़त्म होने वाला है। तो मेरे भाई ने कहा कि शाह साहब हमें बीमारी में ठीक करने आए हैं कि और बीमार करने? वह हँसने लगे। नहीं-नहीं, यह बदलाव तो सौ साल बाद होगा, अभी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। उन्होंने कहा मैं यह इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि नायलोन की कहानी बहुत दिलचस्प है। 1937 में अमरीका की डुपौंट कंपनी ने हारवर्ड विश्वविद्यालय के एक होनहार प्रोफ़ेसर वॉल्स करदर्स को कंपनी में लिया ताकि वे नायलोन का धागा बनाये। वे कामयाब हुए। लेकिन पेटेंट मिलते ही अपनी ईजाद पर निराश होकर उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली। 1940 में इस धागे का स्टॉकिंग जब न्यूयार्क के मेसी स्टोर में बिका तो, औरतों ने हंगामा कर दिया। जिस चीज़ का फ़ायदा करदर्स को मिलना चाहिए था, वह कंपनी ले रही थी।
तबीयत ठीक होने पर भाई तो नौकरी पर चले गए और मैं मास्टर दया भाई के डंडे खाने की तैयारी करने लगा। स्कूल जाने के पहले बारबार मेरे दिमाग़ में आ रहा था, काश, समय पीछे चला जाए जब हम सफ़र करने की तैयारी कर रहे थे। कोई भी इंसान तवारीख़ के बाहर नहीं रह सकता। जो इसकी कोशिश करता है, उसको सज़ा मिलती है। अगस्त 1947 में महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना जो क्रांति लाए, तीसरी दुनिया के देशों में ब्रिटिश राज की लगाम ढीली पड़ने लगी। लेकिन ये आज़ादी दक्षिण एशिया में आई। अफ्ऱीक़़ा के हिंदुस्तानियों को अभी भी उसकी कोई ज़रूरत महसूस नहीं हुई। वे ब्रिटेन के वफ़ादार बने रहे। उनके लिए किपलिंग का गंगादीन खलनायक नहीं हीरो था। हालाँकि रेलगाड़ी हमारे बाप-दादाओं ने बनायी थी, लेकिन हमें सिर्फ़ सेकेंड क्लास में बैठने की इजाज़त थी और उसमें भी हम ख़ुश थे। थर्ड क्लास के डिब्बे में क्या हो रहा है, उससे हमें कोई मतलब नहीं था।
(अगली किस्त में समाप्य)
Sunday, September 11, 2011
सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - 8
(पिछली पोस्ट से जारी)
मुश्किल संगीत के मुश्किल फ़नकार
उन्होंने बताया कि एक दफ़ा सज्जाद हलचल फ़िल्म का गीत हारमोनियम पर बजा रहे थे। तो प्रोड्यूसर करीम आसिफ़ आए और धुन सुनते हुए बीच में ही सज्जाद को रोका और कहा, इसका स्वर थोड़ा सा बदल दीजिए। तो सज्जाद ने पूछा, आपको कौन सा स्वर चाहिए? तो आसिफ़ ने एक स्वर पर अपनी उंगली रख दी और कहा ये बहुत अच्छा चलेगा। सज्जाद ने उसी समय उस स्वर को उखाड़ कर दे दिया और कहा, ‘ये है आपका स्वर। हमारे बाजे में तो यह स्वर है नहीं। इसलिए हमारे गाने में यह नहीं लग सकता।’ और अपना काम बंद करके चले गए। सज्जाद हुसैन को हलचल से निकाल दिया गया और मोहम्मद शफ़ी को ले लिया गया। लेकिन उस फ़िल्म में सज्जाद का हर गाना अपने आप में एक ख़ज़ाना है।
आज मेरे नसीब ने मुझको रुला-रुला दिया
लूट लिया मेरा क़रार फिर भी...
दूसरी कहानी जो उन्होंने सुनाई वह इस प्रकार थी - एक दिन सज्जाद रिहर्सल कर रहे थे। सुबह बीती, शाम भी हो गई। गाना था कि बन ही नहीं रहा था। उन्होंने चपरासी को बुलाया और कहा, ‘दुकान से लंबी, तेज छुरी लेकर आओ।’ जब छुरी आ गई तो उन्होंने अपना बेटन रद्दी की टोकरी में फेंक दिया, छुरी से कंडक्ट करने लगे और उससे पहले आर्केस्ट्रा से कहा, ‘आप लोगों में बहुत ग़लतफ़हमी है। फ़िल्मी गीत जिंदगी और मौत का सवाल है, मनोरंजन का नहीं। अगर अब ये गीत ठीक से नहीं बना तो आज किसी का लहू बहेगा।’ उसके बाद गाने की रिकार्डिंग तुरंत हो गई।
कील, हथौड़ी और हाथ का संबंध
खाना खाते हुए हाजीभाई ने हमसे पूछा, ‘सिनेमा संगीत के सिवा आप और क्या करते हैं?’ मेरे भाई ने बताया, ‘हम बढ़ई और लोहार हैं।’ उन्होंने कहा, ‘आप तो अच्छी नस्ल के लोग हैं। ईसा मसीह भी यही काम करते थे। जिस सूली पर उन्हें चढ़ाया गया उसको बनाने की उन्हें अच्छी समझ थी।’ तब उन्होंने हमें कील, हथौड़ी और हाथ के रिश्ते नाते के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘इन तीनों के बगै़र कोई इमारत नहीं बन सकती। ब्रिटिश राज वह इमारत है जो इन्हीं मनसूबों से बनायी गई है। हिंदुस्तान में हम लोग कील थे, हथौड़ी थी, अंग्रेज़ों का मज़दूर वर्ग जो उनके इशारों पर चलता था और हाथ थे अफ़सर लोग। लेकिन अफ़रीक़ा में कील हैं अफ़रीक़ी भाई, और हम हैं हथौड़ी और अंग्रेज़ हैं हाथ। यह सिलसिला तो चलता रहेगा। लेकिन कभी-कभी अफ़सोस होता है और डर लगता है कि कील को हथौड़ी का एहसास है, लेकिन हाथ का नहीं।’ तब उन्होंने लालू भगत की कहानी सुनाई कि वह एक बार दारेस्सलाम गए थे, तो पता लगा कि वहाँ एक बहुत बड़ी म्यूज़िक पार्टी हो रही है जिसमें लालू भगत गाने वाले हैं। लालू भगत हिंदुस्तानी नहीं थे। वह जंज़ीबार के अफ़रीक़ी शिराज़ी थे। उनका यह नाम इसलिए रखा गया था क्योंकि वह लाल रंग की क़मीज पहनते थे। हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीतों से इतना लगाव था कि उन्होंने हमारा कल्चर अपना लिया था। वह एक्टर सुरेंद्र के गीतों की अच्छी कापी करते थे कि उन्हें अफ़रीक़ा का सुरेंद्र कहा जाता था। यह ख़बर मिलने पर कि पार्टी वह गाएँगे, सफ़र रोक कर मैं उस फ़ंक्शन में गया। वहाँ जब उनकी बारी आई तो उन्होंने अनमोल घड़ी फ़िल्म का ये गीत गाया:
क्यों याद आ रहे हैं गुज़रे हुए ज़माने
लोगों ने वाह-वाह ही नहीं की पैसों की बारिश की। इस तारीफ़ से जो हौसला मिला, उससे उन्होंने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती की। उन्होंने सज्जाद की मौसीक़ी में सुरेंद्र का एक और गीत गाया, तो सबने उन पर कचरा, जूते और काग़ज़ फेंकने शुरू कर दिये। उन्हें स्टेज से बाहर फेंक दिया गया। लालू भगत की हार देखकर मैं एकदम जोश में उठा, भीड़ से निकलकर देखा तो वह निराश होकर जा रहे थे। मैंने उन्हें गले लगा लिया और उनकी जुर्रत की दाद दी। लेकिन मुझे नहीं लगा कि मैं उनका दिल बहला पाया था। वापसी के सफ़र में इस हादसे के बारे में बहुत विचार आते रहे। मैं सोचने लगा कि कोई भी गै़र हिंदुस्तानी हमारी कोई चीज़ पसंद करता है, तो हमें उस पर ख़ुशी होनी चाहिए और उसे अपनाना चाहिए जिसने हमें अपनाया है। मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि कील को हथौड़ी का इल्म हैं, हाथ का नहीं। जो ज़ख़्म हथौड़ी ने कील पर लगाये हैं वह मरहम भी लगाये तो एक अच्छा भविष्य बन सकता है।
इस हादसे ने अफ़रीक़ा के भविष्य के प्रति संदेह पैदा कर दिया। जब इस बातचीत में मैंने जोश में आकर हाजीभाई से सवाल किया, सज्जाद हुसैन के गीत की रेडियो नैरोबी पर भी फ़रमाइश नहीं आती, तो फिर लोग क्येां इन संगीतकार को इतना महत्त्व देते हैं? और अगर कोई उनका गीत गाता है, तो उसे इस तरह का अंजाम भुगतना पड़ता है। हाजीभाई खाना बंद करके मेरी तरफ़ देखने लगे। मुझे रात का सन्नाटा सुनाई दे रहा था। मुझे लगा, वह मुझे तमाचा जड़ देगे। उन्होंने चुप्पी तोड़ी, सवाल करना बड़ों का काम है, जवाब देना छोटों का। तुमने काया पलट दी है। मैं तुम्हें सज़ा इसलिए नहीं दूँगा क्योंकि तुम्हारा सवाल बहुत अच्छा है। पहली बार किसी ने मजबूर किया है कि इस मुद्दे पर सोचूँ। अच्छा, खाने के बाद इसका जवाब दूँगा।
बाद में मैंने अपने भाई से पूछा, हाजीभाई की कहानी सच है या उन्होंने ख़ुद ही बना ली है? तो मेरे भाई ने समझाया, ‘सच्चाई तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते होते हैं। लालू भगत की कहानी में हक़ीक़ी हक़ीक़त है, बाक़ी में कविता की हक़ीक़त। लेकिन जो भी उन्होंने कहा वह सज्जाद हुसैन की सच्चाई को बयाँ करता है।’
सज्जाद हुसैन की कहानियाँ और हिंदुस्तानी फ़िल्म और उसके संगीत की देर तक बातें होती रहीं। आज जब उस रात की बातें याद आती हैं, तो लगता है हम सब एक ख़़ूबसूरत दुल्हन की गोद में बैठे हुए हैं और उसने काली चादर ओढ़ी हुई है। उस रात मैंने अपने आपको बड़ा रिलेक्स्ड महसूस किया। लगा, ऐसी सच्चाइयों में ही जिं़दगी है। रात ढल रही थी, मुझे अच्छा लगा कि बड़ों ने मुझे अपना लिया है। अपनी बैठक से अलग नहीं किया। आखिरकार हमने हाजीभाई से वादा करके जाने की इजाज़त माँगी कि हम उनसे फिर मिलने आएंगे। उन्होंने मुझसे पूछा क्या तुम भी आओगे? मैंने कहा, बिल्कुल ज़रूर आऊँगा। उस समय मैं तेरह बरस का था।
(जारी)
मुश्किल संगीत के मुश्किल फ़नकार
उन्होंने बताया कि एक दफ़ा सज्जाद हलचल फ़िल्म का गीत हारमोनियम पर बजा रहे थे। तो प्रोड्यूसर करीम आसिफ़ आए और धुन सुनते हुए बीच में ही सज्जाद को रोका और कहा, इसका स्वर थोड़ा सा बदल दीजिए। तो सज्जाद ने पूछा, आपको कौन सा स्वर चाहिए? तो आसिफ़ ने एक स्वर पर अपनी उंगली रख दी और कहा ये बहुत अच्छा चलेगा। सज्जाद ने उसी समय उस स्वर को उखाड़ कर दे दिया और कहा, ‘ये है आपका स्वर। हमारे बाजे में तो यह स्वर है नहीं। इसलिए हमारे गाने में यह नहीं लग सकता।’ और अपना काम बंद करके चले गए। सज्जाद हुसैन को हलचल से निकाल दिया गया और मोहम्मद शफ़ी को ले लिया गया। लेकिन उस फ़िल्म में सज्जाद का हर गाना अपने आप में एक ख़ज़ाना है।
आज मेरे नसीब ने मुझको रुला-रुला दिया
लूट लिया मेरा क़रार फिर भी...
दूसरी कहानी जो उन्होंने सुनाई वह इस प्रकार थी - एक दिन सज्जाद रिहर्सल कर रहे थे। सुबह बीती, शाम भी हो गई। गाना था कि बन ही नहीं रहा था। उन्होंने चपरासी को बुलाया और कहा, ‘दुकान से लंबी, तेज छुरी लेकर आओ।’ जब छुरी आ गई तो उन्होंने अपना बेटन रद्दी की टोकरी में फेंक दिया, छुरी से कंडक्ट करने लगे और उससे पहले आर्केस्ट्रा से कहा, ‘आप लोगों में बहुत ग़लतफ़हमी है। फ़िल्मी गीत जिंदगी और मौत का सवाल है, मनोरंजन का नहीं। अगर अब ये गीत ठीक से नहीं बना तो आज किसी का लहू बहेगा।’ उसके बाद गाने की रिकार्डिंग तुरंत हो गई।
कील, हथौड़ी और हाथ का संबंध
खाना खाते हुए हाजीभाई ने हमसे पूछा, ‘सिनेमा संगीत के सिवा आप और क्या करते हैं?’ मेरे भाई ने बताया, ‘हम बढ़ई और लोहार हैं।’ उन्होंने कहा, ‘आप तो अच्छी नस्ल के लोग हैं। ईसा मसीह भी यही काम करते थे। जिस सूली पर उन्हें चढ़ाया गया उसको बनाने की उन्हें अच्छी समझ थी।’ तब उन्होंने हमें कील, हथौड़ी और हाथ के रिश्ते नाते के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘इन तीनों के बगै़र कोई इमारत नहीं बन सकती। ब्रिटिश राज वह इमारत है जो इन्हीं मनसूबों से बनायी गई है। हिंदुस्तान में हम लोग कील थे, हथौड़ी थी, अंग्रेज़ों का मज़दूर वर्ग जो उनके इशारों पर चलता था और हाथ थे अफ़सर लोग। लेकिन अफ़रीक़ा में कील हैं अफ़रीक़ी भाई, और हम हैं हथौड़ी और अंग्रेज़ हैं हाथ। यह सिलसिला तो चलता रहेगा। लेकिन कभी-कभी अफ़सोस होता है और डर लगता है कि कील को हथौड़ी का एहसास है, लेकिन हाथ का नहीं।’ तब उन्होंने लालू भगत की कहानी सुनाई कि वह एक बार दारेस्सलाम गए थे, तो पता लगा कि वहाँ एक बहुत बड़ी म्यूज़िक पार्टी हो रही है जिसमें लालू भगत गाने वाले हैं। लालू भगत हिंदुस्तानी नहीं थे। वह जंज़ीबार के अफ़रीक़ी शिराज़ी थे। उनका यह नाम इसलिए रखा गया था क्योंकि वह लाल रंग की क़मीज पहनते थे। हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीतों से इतना लगाव था कि उन्होंने हमारा कल्चर अपना लिया था। वह एक्टर सुरेंद्र के गीतों की अच्छी कापी करते थे कि उन्हें अफ़रीक़ा का सुरेंद्र कहा जाता था। यह ख़बर मिलने पर कि पार्टी वह गाएँगे, सफ़र रोक कर मैं उस फ़ंक्शन में गया। वहाँ जब उनकी बारी आई तो उन्होंने अनमोल घड़ी फ़िल्म का ये गीत गाया:
क्यों याद आ रहे हैं गुज़रे हुए ज़माने
लोगों ने वाह-वाह ही नहीं की पैसों की बारिश की। इस तारीफ़ से जो हौसला मिला, उससे उन्होंने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती की। उन्होंने सज्जाद की मौसीक़ी में सुरेंद्र का एक और गीत गाया, तो सबने उन पर कचरा, जूते और काग़ज़ फेंकने शुरू कर दिये। उन्हें स्टेज से बाहर फेंक दिया गया। लालू भगत की हार देखकर मैं एकदम जोश में उठा, भीड़ से निकलकर देखा तो वह निराश होकर जा रहे थे। मैंने उन्हें गले लगा लिया और उनकी जुर्रत की दाद दी। लेकिन मुझे नहीं लगा कि मैं उनका दिल बहला पाया था। वापसी के सफ़र में इस हादसे के बारे में बहुत विचार आते रहे। मैं सोचने लगा कि कोई भी गै़र हिंदुस्तानी हमारी कोई चीज़ पसंद करता है, तो हमें उस पर ख़ुशी होनी चाहिए और उसे अपनाना चाहिए जिसने हमें अपनाया है। मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि कील को हथौड़ी का इल्म हैं, हाथ का नहीं। जो ज़ख़्म हथौड़ी ने कील पर लगाये हैं वह मरहम भी लगाये तो एक अच्छा भविष्य बन सकता है।
इस हादसे ने अफ़रीक़ा के भविष्य के प्रति संदेह पैदा कर दिया। जब इस बातचीत में मैंने जोश में आकर हाजीभाई से सवाल किया, सज्जाद हुसैन के गीत की रेडियो नैरोबी पर भी फ़रमाइश नहीं आती, तो फिर लोग क्येां इन संगीतकार को इतना महत्त्व देते हैं? और अगर कोई उनका गीत गाता है, तो उसे इस तरह का अंजाम भुगतना पड़ता है। हाजीभाई खाना बंद करके मेरी तरफ़ देखने लगे। मुझे रात का सन्नाटा सुनाई दे रहा था। मुझे लगा, वह मुझे तमाचा जड़ देगे। उन्होंने चुप्पी तोड़ी, सवाल करना बड़ों का काम है, जवाब देना छोटों का। तुमने काया पलट दी है। मैं तुम्हें सज़ा इसलिए नहीं दूँगा क्योंकि तुम्हारा सवाल बहुत अच्छा है। पहली बार किसी ने मजबूर किया है कि इस मुद्दे पर सोचूँ। अच्छा, खाने के बाद इसका जवाब दूँगा।
बाद में मैंने अपने भाई से पूछा, हाजीभाई की कहानी सच है या उन्होंने ख़ुद ही बना ली है? तो मेरे भाई ने समझाया, ‘सच्चाई तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते होते हैं। लालू भगत की कहानी में हक़ीक़ी हक़ीक़त है, बाक़ी में कविता की हक़ीक़त। लेकिन जो भी उन्होंने कहा वह सज्जाद हुसैन की सच्चाई को बयाँ करता है।’
सज्जाद हुसैन की कहानियाँ और हिंदुस्तानी फ़िल्म और उसके संगीत की देर तक बातें होती रहीं। आज जब उस रात की बातें याद आती हैं, तो लगता है हम सब एक ख़़ूबसूरत दुल्हन की गोद में बैठे हुए हैं और उसने काली चादर ओढ़ी हुई है। उस रात मैंने अपने आपको बड़ा रिलेक्स्ड महसूस किया। लगा, ऐसी सच्चाइयों में ही जिं़दगी है। रात ढल रही थी, मुझे अच्छा लगा कि बड़ों ने मुझे अपना लिया है। अपनी बैठक से अलग नहीं किया। आखिरकार हमने हाजीभाई से वादा करके जाने की इजाज़त माँगी कि हम उनसे फिर मिलने आएंगे। उन्होंने मुझसे पूछा क्या तुम भी आओगे? मैंने कहा, बिल्कुल ज़रूर आऊँगा। उस समय मैं तेरह बरस का था।
(जारी)
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