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Friday, October 18, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – अंतिम

 सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – अंतिम 

(पिछली पोस्ट से जारी)

लेकिन कृष्ण की कहानियों में बहुत सी इंसानी मुश्किलों के हल हैं। उन पर सोच-विचार करके किसी भी मज़हब का आदमी अपनी मुश्किलें दूर कर सकता है। अब देखो उस चाँद को, मेरे दोस्त धीरु भाई कहते हैं, चाँद कृष्ण का बड़ा भाई आकाश में अपना फ़र्ज़ निभा रहा है। मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ। मुझे आसमान पर दो दोस्त अपनी दोस्ती का आनंद लेते नज़र आते हैं।’ यूँ ही बातें करते-करते वे मुझे हास्टल पर छोड़ने आए। कहने लगे कि ज़िंदगी हमेशा किसी प्लान पर नहीं चलती। आज हमारा यूँ अचानक मिलना इतनी ख़़ूबसूरत बात है कि उसको बयाँ नहीं कर सकता। ये कहकर उन्होंने अलविदा ली और जब मैंने पलट कर देखा तो वे अफ्रीका की रात में एकदम अकेले चले जा रहे थे। दिल में एक तूफ़ान उठा कि भाग कर उनके पास चला जाऊँ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उस रात के बरसों बाद यहाँ अमरीका की कोलराडो पहाड़ी पर कैम्पिंग करने गया। बर्फ़ जैसी ठंडी हवा सोने नहीं दे रही थी, सारा जिस्म काँप रहा था। ऐसी मुश्किल में अचानक मेरी निगाह आकाश की तरफ़ गई तो वैसा ही चाँद मैंने आकाश पर देखा। हवा चल रही थी कि नहीं, सर्दी थी कि नहीं मेरा बदन एकदम सहज हो गया। मैंने सकून महसूस किया।

इसी वर्ष ज़ंज़ीबार को भी आज़ादी मिली। लेकिन मैं वहाँ नहीं पहुँचा। 1964 में एक भयंकर कर्नल ओकेलो ज़ंज़ीबार में इंक़लाब लाए। कुछ ही रातों में हज़ारों अरब मर्द, औरतों और बच्चों को हलाक कर दिया गया। इस बदले में कि एक ज़माने में अरबों ने कालों को दास बनाया था। उन दिनों समुन्दर से आती हुई हवा में मुर्दों की बदबू आने लगी थी। फिर कर्नल ओकेलो ने ज़ोर ज़बर्दस्ती काले लड़कों की हिंदुस्तानी लड़कियों से सामूहिक शादियाँ करवाईं।

1964 में मुझे बी एस सी डिग्री मिली तो मैं टांगा में ही काले अफ्रीकियों के सैकेंडरी स्कूल में अध्यापक बन गया। नौकरी शुरू हुई ही थी कि फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन की स्कालरशिप पर अमेरिका आ गया। आने से पहले मैंने एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत ‘तुम हो साथ रात भी हसीन है, अब तो मौत का भी ग़म नहीं है’ इस रिकार्ड को अपने साथ लाने के लिए चुना। लेकिन जब पैक करने गया तो ख़़याल आया कि अमेरिका में इसकी क्या ज़रूरत पड़ेगी। मैंने रिकार्ड वहीं छोड़ दिया। जो बाद में मुझे अपनी ग़लती ही नहीं गुनाह महसूस होने लगा। नैरोबी से हवाई जहाज़ उड़ा तो ख़ुशी की जगह रिकार्ड के पीछे छूटने का ग़म हो रहा था जिससे मैं आज भी निजात नहीं पा सका हूँ।

तुम हो साथ रात भी हसीन है
अब तो मौत का भी ग़म नहीं है


इसके बाद अफ़्रीकाकी हालत और भी बिगड़ गई। 1966 में मारे डर के मेरी माँ दो बहनों को लेकर कराची चली गई। वहाँ से खत आया यहाँ सब कुछ ठीक है। मोहाजिर ज़्यादा है, पाकिस्तानी कम। यू पी के मोहाजिर के साथ हम अफ़्रीका के मोहाजिर एक दिन से दूसरे दिन में पहुँच जाते हैं। हमारे घर का पार्टिशन हो गया। सारे आदमी अफ़्रीका में और बाहर थे, औरतें और बच्चे पाकिस्तान में। इरादा तो यही था कि सब कुछ ठीक होने के बाद अफ़्रीका लौट आऐंगे। लेकिन ये मालूम नहीं था, वह घर हमारा नहीं रहा। सच तो यह था, भारत और पाकिस्तान के लोगों ने अफ़्रीका को अपना घर कभी बनाया ही नहीं। क्योंकि अगर साउथ एशिया को अपना घर समझते तो कभी छोड़ते ही नहीं और बाहर जाकर उसे भी अपनाया नहीं। साउथ एशिया में रहते बाहर के सपने देखते रहे और बाहर रहते हुए साउथ एशिया के। ऐसे लोग कितने डाँवाडोल होते हैं। 1967 में तंज़ानिया के प्रेसिडेंट नियरेरे ने अरूशा घोषणा के साथ अपने देश को समाजवाद के रास्ते पर लगा दिया। रातों रात राजनेता और बड़े सरकारी अर्दलियों के सिवा सब ग़रीब हो गए। जो हमारे लोग बचे, वे उन लोगों के साये में जी रहे हैं।

1972 में युगांडा के डिक्टेटर ईदी अमीन ने कुछ ही दिनों में मोहलत देकर एशियाई लोगों को निकाल बाहर किया। लेकिन इस बेरहम डिक्टेटर ने हमारे लोगों के साथ वह व्यवहार नहीं किया जो 1946-47 में पार्टिशन के समय हमने ख़ुद एक दूसरे के साथ किया। हमारी पाँच हज़ार साल पुरानी सभ्यता हमें ख़ून-ख़राबे से बचा नहीं सकी।

1983 में वाशिंगटन में एक बार जब मैं शाम को घर लौटा तो मेरे नाम एक ख़त था। हैंडराइटिंग देखकर जानी पहचानी लगी। लेकिन तुरंत कुछ भी याद नहीं आया। जब पढ़ा, तो ये ख़त मेरे भाई अय्यूब का था। उसमें छोटा सा संदेश था कि मैं तुम्हारी कुछ मदद चाहता हूँ। कुछ इन्फ़ोरमेशन। क्योंकि तुम मेडिकल स्कूल में पढ़ाते हो। तुम बता सकते हो, कभी-कभी मैं बिला वजह रोता हूँ, क्या इसका कोई इलाज है? आखि़र में लिखा संगीत निर्देशक सी रामचंद्र अपना ही ख़ून बहाकर चले गए। ज़माना अच्छा नहीं है। मैंने उन्हें जवाब दिया। लेकिन याद नहीं मैंने क्या लिखा था।

1985 में मेरे भाई अकरम जो टांगों में हमारी आखिरी निशानी थे, वे भी लंदन चले गए। इससे पहले उन्होंने अपने घर में दोस्तों को पार्टी दी। और वे सारे रिकार्ड उन्हें दे दिये जो हमने 1946 से इकट्ठे करके एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी बनाई थी। ये रिकार्ड हमारे सुख-दुख के साथी थे। इनके साथ उन दिनों की यादें जुड़ी थीं जो हमने एक साथ गुज़ारी थीं। वे सारे रिकार्ड मेरे भाई अकरम ने एक बहुत कड़वा घूँट पीकर दोस्तों को गिफ़्ट में दे दिये। हमारे परिवार ने बैंक बैलेंस नहीं बनाया था। हज़ारों रिकार्डों का ख़ज़ाना कुछ देर में ही लुट गया।

तुम भी भुला दो, मैं भी भूला दूँ
क्या भुला दें गुज़रे ज़माने...


दिसंबर 1985 में शुक्रवार की दोपहर की नमाज़ पढ़ते हुए हमारी माँ बेहोश होकर गिर पड़ीं। फ़ौरन उनको अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर ने बताया कि उनके दिमाग़ की नस फट गई हैं। आहिस्ता-आहिस्ता उनका दिमाग़ अपने ही लहू में डूबने लगा। हवा में बेबस चिराग़ की तरह यादें एक के बाद एक बुझने लगीं। कुछ ही घंटों में ज़िंदगी भर की यादें, जज़्बात, ख़़याल, उम्मीदें, एक लंबी चुप्पी में खो गईं। हम जिंदगी भर माँ को बेबे जी पुकारते थे। हमने इसी भूमिका में उन्हें जाना लेकिन उनका नाम रसूल बीबी था। रसूल बीबी कौन थीं, ये भेद उनके साथ ही चला गया। 1986 के नये वर्ष की रात, मेरी माँ को स्ट्रोक हुआ और वे गहरी नींद में सो गईं। उनकी मौत के साथ उनकी दो ख़्वाहिशें भी दफ़्न हो गईं। एक तो ये कि वो खडगपुर जाना चाहती थीं वो सपना कभी पूरा नहीं हुआ और दूसरा ये कि हज करें। जब मैं अपनी माँ के फ़्यूनेरल पर गया तो भाई अय्यूब से 22 वर्षों बाद मुलाक़ात हुई। मिलने के बाद ऐसे देख रहे थे, जैसे मैं कोई अजनबी हूँ। और कहने लगे, अगर मैंने सड़क पर देखा होता तो कभी नहीं कह सकता था कि तुम मेरे भाई हो। वक़्त ऐसा भी करता है। मुझे भी भाई में एक बहुत

बड़ा फ़र्क़ नज़र आया। उन्होंने चंद्रमोहन और सोहराब मोदी की स्टाइल छोड़ दी थी। अब वे दिलीप कुमार के देवदास और गुरुदत्त के काग़ज़ के फूल के सिनेमा के कैमरे के लिए तैयार थे।

ये भी एक रूप है...

ज़िंदगी का एक दौर वह होता है जब वक़्त हमें उड़ती कालीन पर बिठाकर एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक ले जाता है। फिर एक दौर आता है जब वक़्त एक भारी पत्थर की तरह ढोना पड़ता है। मेरे भाई की जिंदगी के उस दौर में थे।

कराची में जब मैं एक शाम उनके घर पर बैठा था और हम चाय पी रहे थे, मैंने अपने कोट में हाथ डाला तो एक कैसेट हाथ में आया। उसमें पचास के दशक के गीत थे। मैंने उनकी इजाज़त से टेप बजाया तो पहला गाना फ़िल्म आज़ाद का था, ‘जा री, जा री ओ कारी बदरिया’। उनके चेहरे से चिंता के बादल दूर हो गए। गाने के साथ झूमने लगे।

जा री जारी ओ कारी बदरिया
मत बरसो....


फिर एक के बाद एक गाने बजने लगे, तो बिना कुछ कहे ऐसा लगा कि हम फिर एक दूसरे के बहुत क़रीब आ गए हैं। कुछ गानों के बाद अचानक एक नया गीत बजा। वह था, ‘जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे’। सज्जाद हुसैन के संगीत में फ़िल्म खेल का गीत शुरू होते ही भाई एकदम भौंचक्के रह गए।

जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे

जब गीत पूरा हुआ तो उन्होंने टेप बंद कर दिया। एकदम आकर गले लगा लिया और कहा, ‘मैंने न तो भाई का और न ही दोस्त का फ़र्ज़ निभाया है। मैं वो वादा पूरा नहीं कर सका कि हम हाजीभाई को फिर से मिलने जाएँगे। मजबूरी की वजह से पूरा नहीं कर सके। कोई भी इंसान अपने आप में मुकम्मल नहीं है। अगर वो ऐसा है, तो वो फरिश्ता है।’ वो बैठ गए और मुझे ग़ालिब का ये शेर याद आया:

बस के दुश्वार है, हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना


माहौल में चुप्पी छाई हुई थी। मेरे दिमाग़ में आ रहा था, भाई की ज़िंदगी की मुश्किलों ने उन्हें एक अच्छा इंसान बनाया है। कुछ ही देर पहले उन्होंने जो कुछ कहा, वह इसका सबूत है। चुप्पी उन्होंने ही तोड़ी और कहा, इस गीत को ढूँढ़ने के लिए हम अफ़्रीका में कहाँ-कहाँ गए थे। लोगों ने वादा करने पर भी न सुनाया। लेकिन इन्हें उसका मलाल नहीं था। कहने लगे, ‘जिनके पास है, वह अपने ख़ज़ाने की क़ीमत जानते हैं।’ सज्जाद को फ़िल्म रुस्तम सोहराब के बाद किसी ने और मौक़ा नहीं दिया। फिर पूछा, ‘क्या तुम्हें मालूम है कि फ़िल्म दोस्त के गीत, ”कोई प्रेम का देके संदेसा“ इसके पीछे कौन-सा गीत था?’ तो, मैंने कहा, ‘आपके बग़ैर यह मालूम करना मुझे ठीक नहीं लगा, मुझे भी नहीं मालूम।’ मेरे दिमाग़ में एक बात उठी, मेरे भाई ने तो अपनी इंसानियत का सबूत दे दिया, मरे दिल में उनके लिए जज़्बात भर उठे। लेकिन जोश ने साथ नहीं दिया कि मैं भी उन्हें वैसे ही गले लगाऊँ जैसाकि उन्होंने किया था। कुछ ही पलों में वह सुनहरा मौक़ा हाथ से निकल गया। मेरी इंसानियत मेरे सामने थी लेकिन मैं उस तक नहीं पहुँच सका। बातें करते-करते शाम ढल गई। एक दिन हम कराची की सैर पर निकले। जो अचानक एक ऐसी सड़क पर आ गए जिसमें न इधर था, न उधर था। जब साइनबोर्ड देखा तो वो थी जिगर मुरादाबादी रोड। ये पढ़कर हम दोनों हँसने लगे। इतना हँसे कि पेट में दर्द होने लगा। फिर तो हमने पंजाब और इंडिया जाने का इरादा किया था छोड़ दिया। उनके मुँह से एकाएक जिगर मुरादाबादी का ये शेर निकला:

वही है ज़िंदगी लेकिन जिगर, ये हाल है अपना
जैसे कि जिंदगी से जिं़दगी कम होती जाती है


मैं अमरीका लौट कर आया। कुछ ही महीने बाद एक शाम घर लौटा तो एक टेलीग्राम था कि अय्यूब अब हमारे बीच नहीं रहे। जब मैंने तार पढ़ा तो वो साइसेल की धागे के हार की टूटने की आवाज़ आई। उसमें पिरोई यादें गर्द में बिखर गईं। घुटनों में ताक़त नहीं रही। वक़्त थोड़ी देर के लिए ठहर गया। बाद में पता चला एक मनहूस रात उन्हें छाती में दर्द हुआ। उनके बेटे अस्पताल लेकर गए। लेकिन रास्ते में ही वह उस रास्ते पर चल पड़े जहाँ कोई किसी का साथी नहीं होता। डाक्टर ने जब नब्ज़ देखी तो कहा ये तो कब के जा चुके हैं। उनका देहांत उनकी बेटी की शादी के एक सप्ताह पहले हुआ। शादी की तारीख़ बढ़ा दी गई। छह महीने बाद मेरे भाई असलम ने उनकी जगह खड़े होकर बेटी को विदाई दी। जिंदगी के दाम वक़्त से चुकाये जाते हैं। उनके हार्ट अटैक के वक़्त जब मेरे भाई ने जेब में हाथ डाला तो वे जेबें ख़ाली हो चुकी थीं। पहले वे पैसे से ग़रीब हुए फिर वक़्त से। उस समय उनकी उम्र 58 थी। जब मैं छोटा था, अगर किसी का हार्ट अटैक से देहांत होता तो बड़े लोग कहते, बनाने वाले की बड़ी मेहरबानी कि जल्दी उठा लिया। मेडिकल कालेज में आने के बाद जानकारी ये हुई कि इस रोग से जो भी मरता है, वह इस दुनिया में बेहिसाब पीड़ा झेलकर जाता है। मेरे भाई का ये अंजाम मुझे कभी-कभी बेबस कर देता है। तब मुझे उनकी कही बात याद आती है कि जिंदगी एक बहुत बड़ा तोहफ़ा है। जिसकी हर अच्छी और बुरी बात उससे अलग नहीं की जा सकती। इस जिंदगी के लिए ख़ुदा के शुक्र के सिवा और कुछ नहीं सोचना चाहिए।

राही कई अभी आएंगे
कई अभी जाएंगे...


श्रद्धांजलि

इस याद को ताज़ा करते हुए मुझे कहना पड़ेगा कि बच्चों की परवरिश में उनको यह सिखाया जाना बहुत ज़रूरी है कि वह जिनसे मोहब्बत करते हैं, अगर उसका उन्होंने खुलकर इज़हार नहीं किया तो यह ग़लती ही नहीं गुनाह है। मेरे कहने से भाई अय्यूब की ज़िंदगी नहीं बढ़ती लेकिन उनका हौसला तो बढ़ सकता था।

ये कैसी अजब दास्ताँ हो गई है
छुपाते-छुपाते बयाँ हो गई है


ये बेमिसाल गीत सुरैया के आखि़री गीतों में से है। यह रुस्तम सोहराब फ़िल्म का गीत है जो सज्जाद हुसैन की आखि़री फ़िल्म थी। इसके बाद वे अपनी इज़्ज़त आबरू लेकर फ़िल्मी दुनिया से दूर हो गए। किसी भी प्रोड्यूसर को ऐसा हौसला नहीं आया कि वे फिर उनको एक और मौक़ा देते। 1950 के दशक में लता मंगेशकर ने हिंदुस्तान के कोई पाँच-छह बढ़िया म्यूज़िक डाइरेक्टरों में सज्जाद हुसैन का ज़िक्र किया था। 1984 में फ़िल्मी गीत के पचास वर्ष होने पर एक मैगज़ीन में वही पुराना लेख दुबारा छापा गया था, लेकिन इस बार उसमें सज्जाद हुसैन का नाम नहीं था। तक़रीबन उसी समय यहाँ वाशिंगटन के गीतांजलि कार्यक्रम में ‘ये हवा, ये रात चाँदनी...’ गीत बजा तो एम सी ने कहा ये गीत मदनमोहन ने कंपोज़ किया था। ये वह मदनमोहन थे जिन्होंने आखिरी दाँव फ़िल्म में ‘तुझे क्या सुनाऊँ ऐ दिलरुबा’ में उसी गीत की कार्बन कापी बनाई। कहते हैं, जब सज्जाद हुसैन ने ये गीत सुना तो कहने लगे आजकल तो हम क्या हमारे साये भी उठकर चलने लगे हैं। ये कहकर वे फिर से ग़ायब हो गए। जब लता मंगेशकर के जीवन पर 1992 में वीडियो बना तो सज्जाद की झलक इस वीडियो में मिली जिसमें वह लता को आनर कर रहे हैं। दो-तीन मिनट में ऐसा दिखाई पड़ता है, उनका मुँह नहीं हाथ बोल रहा है। लेकिन उनकी जिंदगी में एक मिठास तो आ ही सकती थी।

ऐ दिलरुबा, नज़रें मिला... कुछ तो ...

1992 में यहाँ वायस आफ़ अमेरिका की ब्राडकास्टर विजयलक्ष्मी ने मुंबई में उनसे इंटरव्यू करने की बात कही तो लोगों ने कहा आप किसका इंटरव्यू करना चाहती हैं। सज्जाद हुसैन मिलनसार इंसान नहीं थे। लेकिन इतनी दूर से आए श्रोता को निराश नहीं कर सके, तो उनका आखि़री इंटरव्यू वायस आफ़ अमरीका ने लिया और उन पर तीन प्रोग्राम पेश किये। 1994 में वे हाथ जिसने इटली के मैन्डोलिन को हिंदुस्तानी गाना गाना सिखाया, इस साज़ से हमेशा के लिए दूर हो गए।

मेरे यहाँ से चल दिये
मेरा खु़दा भला करे
शौक़ से ग़म उठाब
शिकवे न लब पे लाएँगे


उनकी एक छोटी सी श्रद्धांजलि राजू भारतन ने स्क्रीन पत्रिका में दी लेकिन उसके इर्द-गिर्द के दूसरे आर्टिकल के शोरोग़ुल ने उसकी अहमियत को ढँक दिया। एक दिन मैं अपने एक छात्र को जो फ़िल्मी संगीत में दिलचस्पी रखते हैं, उनसे सज्जाद के गीत का ज़िक्र कर रहा था, तो उन्होंने पूछा, ये सज्जाद कौन था?

1988 में मेरे पिता की मृत्यु तंज़ानिया के इरिंगा शहर में हुई और उनको इरिंगा के उसी क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया जिसे वे दुनिया का स्वर्ग समझते थे।

बालूसिंह 1970 के दशक में अफ़रीक़ा में पाबंदी आने से पहले लंदन पहुँच गए और वहाँ वह वेल्फ़ेयर पर हैं। ख़बर आई कि कोयले के काम की वजह से उन्हें काले फेफड़े की बीमारी हो गई है जिसे एम्फ़ीज़ीमा कहते हैं। इसमें मरीज़ को लगता है, वह पानी में डूब रहा है। यहाँ हक़ीक़त ये थी कि आग से काम करने वाला पानी में डूब रहा था। हो सकता है वे अब तक डूब चुके हों।

सब कहाँ कुछ लाला-ओ गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक मे क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं


- मिर्ज़ा ग़ालिब

हाजीभाई एक रात ख़्वाब में मिले, बहुत जल्दी में थे, कहने लगे, बेटा, तुमने बहुत देर कर दी। सुना है, अमरीका में तुम्हें बहुत कामयाबी मिली, वक़्त बहुत कम है। एक बहुत ज़रूरी काम तुम मेरा कर सकते हो। चलो, जल्दी चलो। वह मुझे उलुगुरू पहाड़ में एक गुफा में ले गए। बहुत अंदर जाकर उन्होंने बत्ती जलाई, तो देखा, एक बहुत बड़े म्यूज़ियम में हैं जिसकी दीवारों पर तस्वीरों की तरह वह फ़िल्मी गीत फ्ऱेम में लगे हुए हैं जो अब गुल हो चुके हैं। उन्होंने एक चाबी दी और कहा, अब ये अमानत नयी पीढ़ी की है, उन तक पहुँचा देना। यह कह कर वह नज़रों से गुल हो गए।

आय हाय लूट गया...

सबक़

1952 में, एक दिन मैं अपने मास्टर बी एन नायक के साथ चाल्र्स डिकिन्स के नावेल डेविड कापरफ़ील्ड पर बात कर रहा था, तो उन्होंने बताया कि ये किताब आधी हक़ीक़त और आघा फ़साना है। ये कहानी डिकिन्स की अपनी जिंदगी पर आधारित है। तो, मैंने पूछा, ऐसा क्यों? तो, उन्होंने समझाया, डाक्यूमेंटरी हर समय इंसान को सच्चाई तक नहीं ले जा सकती। फ़साना भी उस तक पहँचने का मंसूबा है। तुम्हारी तरह जब मैं छोटा था, अपने देवताओं के बारे मे मुझे बहुत ख़राब लगता था कि गणेश जी आधे इंसान है, आधे हाथी। ये हमारे कैसे भगवान हैं। धड़ इंसान का, सिर हाथी का। मैं चूँकि वेस्टर्नाइज होने लगा, सोचता ये क्या चक्कर है। मैं सोचने लगा क्या गणेश जी हाथी की शक्ल में इंसान हैं या इंसान की शक्ल में हाथी! उस दौरान जिस चीज़ न मेरी ज़िंदगी काफ़ी बदली, ये समझ कि गणेश जी वो इंसान है जिनमें हाथी की विज़डम है। और इतनी है कि उतनी सामान्य इंसान में नहीं है। जिस आर्टिस्ट ने इस देवता की कल्पना की, सामान्य लोगों को समझाने के लिए हाथी का सिर बनाया कि उनमें बहुत ज्ञान है। गणेश जी की इस अक़्लमंदी की बुनियाद है हाथी की याददाश्त की शक्ति। इसके बगैर विज़डम का मंसूबा ही नहीं हो सकता। जिसको गए हुए कल का इल्म ही न हो, वह आने वाले कल में कामयाब हो ही नहीं सकता। गणेश जी हमें समझाते हैं, हम कितनी भी मुसीबत में क्यों न हों, अगर हमें ये याद रहे कि हम उस मुसीबत में किन रास्तों से होकर पहुँचे तो उन्हीं से होकर निकल भी सकते हैं। वे कहने लगे मैं मुसलमान नहीं हूँ। लेकिन मुझे मालूम है, आप लोगों को क़ुरान इक़रा से शुरू होता है। जिसका मतलब है, पढ़ो। अगर कोई सारा कु़रान शरीफ़ न भी पढ़े, सिर्फ़ इस शब्द को पढ़कर अक़्ल बढ़ती है। क्योंकि ये शब्द उस इंसान ने लिखवाया है जो पढ़ नहीं सकते थे। उन्होंने कहा, तुम होनहार बनने की कोशिश कर रहे हो, तुम कभी इन बातों पर सोचना।


हर इंसान के नाम में उसके माता-पिता की आशाएँ और उम्मीदें होती हैं। मेरा नाम अशरफ़ अज़ीज़। मैं यहाँ हावर्ड युनिवर्सिटी के मेडिकल स्कूल में प्रोफ़ेसर हूँ। इस संस्मरण में, मैंने जिन लोगों का ज़िक्र किया है, मैं उनका साथी हूँ। मैं अक्सर वाशिंगटन डी सी से न्यूयार्क जाता हूँ, तो डेलावेयर नदी के पुल के बायीं ओर डुपोंट कंपनी की फै़क्टरी मुझे साफ़ नज़र आती है। ये वह कंपनी है, जिसके नक़ली धागे ने साइसेल के असली धागे को सस्ता करके जिन लोगों की ज़िंदगियों का ज़िक्र कर रहा था बेकार कर दिया। मेरा एक भाई इसी कंपनी में था। लेकिन डुपोंट के व्यापार की उसे कोई जानकारी नहीं थी। मैं ख़ुद उस देश का नागरिक हूँ जिसके कारपोरेशन उन मुल्कों पर लगाम लगाये बैठे हैं जहाँ आज भी हमारे भाई-बहन कड़े संघर्ष में जी रहे हैं। मेरा नाम अशरफ़ अज़ीज़ है, अशरफ़ होने की गुंजाइश नहीं रही, लेकिन अज़ीज़ बनने की जद्दोजहद अभी जारी है।

हाय लूट गया... हाय लूट गया...

कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। उसका पहला दौर एक गंभीर नाटक है और दूसरा दौर तमाशा। दूसरे दौर को अर्थशास्त्रियों ने ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबल इकानोमी नाम दिया है। पिछली सदी का साम्राज्यवाद एक गंभीर नाटक की तरह गुज़र गया, अब जो तमाशा शुरू हुआ है उसका असर हमारे भाई बहनों पर क्या होगा, वो देखना अभी बाक़ी है।

आज भी बहुत से हिंदुस्तानी जिन्होंने थोड़ी बहुत पढ़ाई की है अपने आप को बुद्धिजीवी समझते हैं। वे न हिंदुस्तानी गीत और न ही लोक संगीत को वह इज़्ज़त देने को तैयार हैं ज® वे शास्त्रीय संगीत को देते हैं। साउथ एशिया की आज़ादी की पचासवीं वर्षगाँठ पर, मैंने एक ंिहंदुस्तानी फ़िल्मी गीत की क़ीमत क्या है, इसके जवाब में एक ऐसी आपबीती लिखी है, जिसमें कुछ लोगों की जानें ही चली गई होतीं। हो सकता है, इस संस्मरण को पढ़कर फ़िल्म संगीत की गहराई समझ में आए। इस लेख में ये भी ज़ाहिर है कि विकासशील देशों में फ़िल्म संगीत कितना बड़ा सहारा है। इसकी कितनी क़द्र की जाती है। 1985 में जब मैं दारेस्सलाम गया, तो वहाँ बहुत कम हिंदुस्तानी बचे थे। वहाँ पुराने एंबेसी सिनेमा के रास्ते पर भीड़ लगी हुई थी। जब थियेटर पर देखा, ‘मिस्टर इंडिया’ फ़िल्म लगी हुई थी। मैं कभी भी इंडिया नहीं गया। लेकिन फ़िल्मी गीतों ने मुझे हमेशा इंडिया से जोड़े रक्खा। मैं हिंदुस्तानी ज़बान अच्छी तरह बोल सकता हूँ, लिख नहीं सकता।

(समाप्त)

Thursday, October 17, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ९

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – ९

(पिछली पोस्ट से जारी)

बालूसिंह के घर जाते वक़्त उन्होंने फिर हमसे तकरार की कि फ़िल्मी गीतों ने हमें अंघा बना दिया है। फ़िल्म देखने जाते नहीं। फ़िल्म ने फ़ोटोग्राफ़रों ने जो काम किया है इसका कोई इल्म नहीं, कोई ज़िक्र नहीं। दूसरे दिन हम फिर से बस से वापस लौट रहे थे। बारिश की वजसे रास्ते कीचड़ से भरे थे। गाड़ी को धक्का देकर, कभी गाड़ी में बैठकर आगे बढ़ते रहे। तभी मुझे यह समझ आया कि अच्छी कंपनी में मुसीबतों का रंग कुछ अलग ही होता है। एक बात जो वापसी के सफ़र की याद रही, वह यह कि मैंने अपने भाई से सवाल किया था कि क्या फ़िल्मी संगीत में कोई ऐब या ख़़राबी भी है? उन्होंने कहा एक बहुत बड़ा नुक़्स है। फ़िल्म संगीत में हिंदुस्तान के लोगों में एकता लाने की संभावना पर काम नहीं किया गया है। ये इंडिया के टुकड़े होने से नहीं बचा सका। किसी भी लेखक और आलोचक ने इस प्रश्न को नहीं उठाया। उन्होंने ये भी कहा, ‘ये ख़ुदा की मेहरबानी है, पार्टीशन से पहले ही उन्होंने सहगल को उठा लिया।’

बिजलीवाला शाह, दहशत में एक छोटा चश्मा

जब हम घर लौटे तो दोनों को मच्छर के काटे का वरदान मिला। दस बारह दिन तक डाक्टरों की सूइयाँ खाते रहे। बिजलीवाला शाह हमारी कम्युनिटी में उन गिने चुने लोगों में थे, जिनका पढ़ाई-लिखाई किताबों से नाता था। हमारी कम्युनिटी में वह एक गहरी सोच वाले इंसान थे। अलीगढ़ में मुग़ल शायरों पर उन्होंने थीसिस लिखी थी। वह कहते मेरा दिमाग़, सोच-समझ, मेरे जज़्बात हमारी तारीख़ के एक वर्ष में क़ैद है, वह है 1857। इस बरस में हिंदुस्तान में क्या हुआ। अगर हम ठीक से इसे समझें तो हमारे भविष्य का दरवाज़ा खुल जाएगा। वह ख़ुद कहते कि वह उस वक़्त के आदमी नहीं है, उनका जन्म तो इस सदी में हुआ। एक लिहाज़ से वह भाई अय्यूब के उस्ताद थे।

ग़ालिब, दाग़, सौदा, हाली, ज़फ़र इनकी शायरी पर घंटों बातें करते ताकि मेरे भाई और अच्छा गा सकें। लेकिन बिजली वाले शाह एक अजीब शाह थे। मुझे ताज्जुब होता था कि जिस आदमी की इतनी पढ़ाई-लिखाई हो वह इस तरह का काम क्यों करता है? कम्युनिटी वालों को सबसे बड़ा एतराज़ यह था कि शाह ने काली अफ़्रीकी से शादी की थी। इसलिए बहुत से लोग कहते थे कि ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई इंसान के लिए अच्छी चीज़ नहीं है। मेरे भाई ने एक दिन समझाया कि उन्हें बिजली वाले के हौसले पर रश्क होता है। वह दुनिया में कितने अकेले हैं। उनके घर वाली के लिए उर्दू हवा में उड़ती हुई बेमानी आवाज़ है। शाह साहब चारदीवारी में अपनी यादों के सहारे एक लम्हे से दूसरे लम्हे पहुँच रहे हैं। मैं उनकी हिम्मत की दाद देता हूँ। इसी मुलाक़ात में बिजली वाले शाह ने हमें नायलोन की ईजाद के बारे में बताया। उन्होंने अख़बार में पढ़ा है, अमरीका में नायलोन का धागा बन चुका है और यह साइसेल का चक्कर ख़त्म होने वाला है। तो मेरे भाई ने कहा कि शाह साहब हमें बीमारी में ठीक करने आए हैं कि और बीमार करने? वह हँसने लगे। नहीं-नहीं, यह बदलाव तो सौ साल बाद होगा, अभी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। उन्होंने कहा मैं यह इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि नायलोन की कहानी बहुत दिलचस्प है। 1937 में अमरीका की डुपौंट कंपनी ने हारवर्ड विश्वविद्यालय के एक होनहार प्रोफ़ेसर वॉल्स करदर्स को कंपनी में लिया ताकि वे नायलोन का धागा बनाये। वे कामयाब हुए। लेकिन पेटेंट मिलते ही अपनी ईजाद पर निराश होकर उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली। 1940 में इस धागे का स्टॉकिंग जब न्यूयार्क के मेसी स्टोर में बिका तो, औरतों ने हंगामा कर दिया। जिस चीज़ का फ़ायदा करदर्स को मिलना चाहिए था, वह कंपनी ले रही थी।

तबीयत ठीक होने पर भाई तो नौकरी पर चले गए और मैं मास्टर दया भाई के डंडे खाने की तैयारी करने लगा। स्कूल जाने के पहले बारबार मेरे दिमाग़ में आ रहा था, काश, समय पीछे चला जाए जब हम सफ़र करने की तैयारी कर रहे थे। कोई भी इंसान तवारीख़ के बाहर नहीं रह सकता। जो इसकी कोशिश करता है, उसको सज़ा मिलती है। अगस्त 1947 में महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना जो क्रांति लाए, तीसरी दुनिया के देशों में ब्रिटिश राज की लगाम ढीली पड़ने लगी। लेकिन ये आज़ादी दक्षिण एशिया में आई। अफ्ऱीक़़ा के हिंदुस्तानियों को अभी भी उसकी कोई ज़रूरत महसूस नहीं हुई। वे ब्रिटेन के वफ़ादार बने रहे। उनके लिए किपलिंग का गंगादीन खलनायक नहीं हीरो था। हालाँकि रेलगाड़ी हमारे बाप-दादाओं ने बनायी थी, लेकिन हमें सिर्फ़ सेकेंड क्लास में बैठने की इजाज़त थी और उसमें भी हम ख़ुश थे। थर्ड क्लास के डिब्बे में क्या हो रहा है, उससे हमें कोई मतलब नहीं था।

(अगली किस्त में समाप्य)

Wednesday, October 16, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ८

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – ८

(पिछली पोस्ट से जारी)

मुश्किल संगीत के मुश्किल फ़नकार


उन्होंने बताया कि एक दफ़ा सज्जाद हलचल फ़िल्म का गीत हारमोनियम पर बजा रहे थे। तो प्रोड्यूसर करीम आसिफ़ आए और धुन सुनते हुए बीच में ही सज्जाद को रोका और कहा, इसका स्वर थोड़ा सा बदल दीजिए। तो सज्जाद ने पूछा, आपको कौन सा स्वर चाहिए? तो आसिफ़ ने एक स्वर पर अपनी उंगली रख दी और कहा ये बहुत अच्छा चलेगा। सज्जाद ने उसी समय उस स्वर को उखाड़ कर दे दिया और कहा, ‘ये है आपका स्वर। हमारे बाजे में तो यह स्वर है नहीं। इसलिए हमारे गाने में यह नहीं लग सकता।’ और अपना काम बंद करके चले गए। सज्जाद हुसैन को हलचल से निकाल दिया गया और मोहम्मद शफ़ी को ले लिया गया। लेकिन उस फ़िल्म में सज्जाद का हर गाना अपने आप में एक ख़ज़ाना है।

आज मेरे नसीब ने मुझको रुला-रुला दिया
लूट लिया मेरा क़रार फिर भी...


दूसरी कहानी जो उन्होंने सुनाई वह इस प्रकार थी - एक दिन सज्जाद रिहर्सल कर रहे थे। सुबह बीती, शाम भी हो गई। गाना था कि बन ही नहीं रहा था। उन्होंने चपरासी को बुलाया और कहा, ‘दुकान से लंबी, तेज छुरी लेकर आओ।’ जब छुरी आ गई तो उन्होंने अपना बेटन रद्दी की टोकरी में फेंक दिया, छुरी से कंडक्ट करने लगे और उससे पहले आर्केस्ट्रा से कहा, ‘आप लोगों में बहुत ग़लतफ़हमी है। फ़िल्मी गीत जिंदगी और मौत का सवाल है, मनोरंजन का नहीं। अगर अब ये गीत ठीक से नहीं बना तो आज किसी का लहू बहेगा।’ उसके बाद गाने की रिकार्डिंग तुरंत हो गई।

कील, हथौड़ी और हाथ का संबंध

खाना खाते हुए हाजीभाई ने हमसे पूछा, ‘सिनेमा संगीत के सिवा आप और क्या करते हैं?’ मेरे भाई ने बताया, ‘हम बढ़ई और लोहार हैं।’ उन्होंने कहा, ‘आप तो अच्छी नस्ल के लोग हैं। ईसा मसीह भी यही काम करते थे। जिस सूली पर उन्हें चढ़ाया गया उसको बनाने की उन्हें अच्छी समझ थी।’ तब उन्होंने हमें कील, हथौड़ी और हाथ के रिश्ते नाते के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘इन तीनों के बगै़र कोई इमारत नहीं बन सकती। ब्रिटिश राज वह इमारत है जो इन्हीं मनसूबों से बनायी गई है। हिंदुस्तान में हम लोग कील थे, हथौड़ी थी, अंग्रेज़ों का मज़दूर वर्ग जो उनके इशारों पर चलता था और हाथ थे अफ़सर लोग। लेकिन अफ़रीक़ा में कील हैं अफ़रीक़ी भाई, और हम हैं हथौड़ी और अंग्रेज़ हैं हाथ। यह सिलसिला तो चलता रहेगा। लेकिन कभी-कभी अफ़सोस होता है और डर लगता है कि कील को हथौड़ी का एहसास है, लेकिन हाथ का नहीं।’ तब उन्होंने लालू भगत की कहानी सुनाई कि वह एक बार दारेस्सलाम गए थे, तो पता लगा कि वहाँ एक बहुत बड़ी म्यूज़िक पार्टी हो रही है जिसमें लालू भगत गाने वाले हैं। लालू भगत हिंदुस्तानी नहीं थे। वह जंज़ीबार के अफ़रीक़ी शिराज़ी थे। उनका यह नाम इसलिए रखा गया था क्योंकि वह लाल रंग की क़मीज पहनते थे। हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीतों से इतना लगाव था कि उन्होंने हमारा कल्चर अपना लिया था। वह एक्टर सुरेंद्र के गीतों की अच्छी कापी करते थे कि उन्हें अफ़रीक़ा का सुरेंद्र कहा जाता था। यह ख़बर मिलने पर कि पार्टी वह गाएँगे, सफ़र रोक कर मैं उस फ़ंक्शन में गया। वहाँ जब उनकी बारी आई तो उन्होंने अनमोल घड़ी फ़िल्म का ये गीत गाया:

क्यों याद आ रहे हैं गुज़रे हुए ज़माने

लोगों ने वाह-वाह ही नहीं की पैसों की बारिश की। इस तारीफ़ से जो हौसला मिला, उससे उन्होंने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती की। उन्होंने सज्जाद की मौसीक़ी में सुरेंद्र का एक और गीत गाया, तो सबने उन पर कचरा, जूते और काग़ज़ फेंकने शुरू कर दिये। उन्हें स्टेज से बाहर फेंक दिया गया। लालू भगत की हार देखकर मैं एकदम जोश में उठा, भीड़ से निकलकर देखा तो वह निराश होकर जा रहे थे। मैंने उन्हें गले लगा लिया और उनकी जुर्रत की दाद दी। लेकिन मुझे नहीं लगा कि मैं उनका दिल बहला पाया था। वापसी के सफ़र में इस हादसे के बारे में बहुत विचार आते रहे। मैं सोचने लगा कि कोई भी गै़र हिंदुस्तानी हमारी कोई चीज़ पसंद करता है, तो हमें उस पर ख़ुशी होनी चाहिए और उसे अपनाना चाहिए जिसने हमें अपनाया है। मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि कील को हथौड़ी का इल्म हैं, हाथ का नहीं। जो ज़ख़्म हथौड़ी ने कील पर लगाये हैं वह मरहम भी लगाये तो एक अच्छा भविष्य बन सकता है।

इस हादसे ने अफ़रीक़ा के भविष्य के प्रति संदेह पैदा कर दिया। जब इस बातचीत में मैंने जोश में आकर हाजीभाई से सवाल किया, सज्जाद हुसैन के गीत की रेडियो नैरोबी पर भी फ़रमाइश नहीं आती, तो फिर लोग क्येां इन संगीतकार को इतना महत्त्व देते हैं? और अगर कोई उनका गीत गाता है, तो उसे इस तरह का अंजाम भुगतना पड़ता है। हाजीभाई खाना बंद करके मेरी तरफ़ देखने लगे। मुझे रात का सन्नाटा सुनाई दे रहा था। मुझे लगा, वह मुझे तमाचा जड़ देगे। उन्होंने चुप्पी तोड़ी, सवाल करना बड़ों का काम है, जवाब देना छोटों का। तुमने काया पलट दी है। मैं तुम्हें सज़ा इसलिए नहीं दूँगा क्योंकि तुम्हारा सवाल बहुत अच्छा है। पहली बार किसी ने मजबूर किया है कि इस मुद्दे पर सोचूँ। अच्छा, खाने के बाद इसका जवाब दूँगा।

बाद में मैंने अपने भाई से पूछा, हाजीभाई की कहानी सच है या उन्होंने ख़ुद ही बना ली है? तो मेरे भाई ने समझाया, ‘सच्चाई तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते होते हैं। लालू भगत की कहानी में हक़ीक़ी हक़ीक़त है, बाक़ी में कविता की हक़ीक़त। लेकिन जो भी उन्होंने कहा वह सज्जाद हुसैन की सच्चाई को बयाँ करता है।’

सज्जाद हुसैन की कहानियाँ और हिंदुस्तानी फ़िल्म और उसके संगीत की देर तक बातें होती रहीं। आज जब उस रात की बातें याद आती हैं, तो लगता है हम सब एक ख़़ूबसूरत दुल्हन की गोद में बैठे हुए हैं और उसने काली चादर ओढ़ी हुई है। उस रात मैंने अपने आपको बड़ा रिलेक्स्ड महसूस किया। लगा, ऐसी सच्चाइयों में ही जिं़दगी है। रात ढल रही थी, मुझे अच्छा लगा कि बड़ों ने मुझे अपना लिया है। अपनी बैठक से अलग नहीं किया। आखिरकार हमने हाजीभाई से वादा करके जाने की इजाज़त माँगी कि हम उनसे फिर मिलने आएंगे। उन्होंने मुझसे पूछा क्या तुम भी आओगे? मैंने कहा, बिल्कुल ज़रूर आऊँगा। उस समय मैं तेरह बरस का था।

(जारी)

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ७

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – ७

(पिछली पोस्ट से जारी)

एक पुराने गीत से नयी मुलाक़ात


ये कहकर उन्होंने अपने एक मुलाज़िम को आवाज़ दी तो हुक़्क़ा आ गया। उन्होंने कहा, ‘सज्जाद हुसैन उस्ताद अली बख़्श (मीना कुमारी के पिता) के असिस्टेंट थे। अली बख़्श को एक नयी फ़िल्म का संगीत मिला वो थी दोस्त। एक दिन अली बख़्श बीमार होने की वजह से रिकार्डिंग पर नहीं आए। उनकी ग़ैर हाज़िरी में सज्जाद हारमोनियम में धुन बजाने लगे जिसे सुनकर नूरजहाँ वहाँ आ गईं। उन्हें वह धुन इतनी अच्छी लगी कि अली बख़्श को निकाल दिया गया और सज्जाद को ले लिया गया। हाजीभाई ने फिर मेरी तरफ़ घूर कर देखा और कहने लगे, ‘ऐसे इंसान को बड़ों का आशीर्वाद नहीं मिल सकता और उसके बग़ैर बात नहीं बनती। लेकिन हम दाद देंगे नूरजहाँ की। फ़िल्मी गीतों में एक क्रांति लाने में उनका हाथ था। कभी-कभी इंसान को ज़िंदगी का कारोबार बढ़ाने के लिए ग़लत काम भी करना पड़ता है।’ ये कहकर हाजीभाई उठ कर अंदर गए और चमड़े का एक अटैची केस उठाकर लाए। नौकर को आवाज़ दी, जो पहले एक छोटी टेबल लेकर आया, उस पर ग्रामोफ़ोन रखा। हाजीभाई ने उसमें चाबी भरी। नयी सूई लगाई और फिर बस्ते से एक रिकार्ड निकाला। उसको रखा और वह गाना जो हमने बरसों नहीं सुना था, ‘कोई प्रेम का देके संदेसा हाय लूट गया, हाय लूट गया’, फिर हमारे कानों तक पहुँचा।

कोई प्रेम का देके संदेसा हाय लूट गया, हाय लूट गया।



गाना ख़त्म होने पर उन्होंने कहा, ‘यह गाना है ही नहीं। यह ज़िंदगी की नाकामियों पर, इंसान की एक ठंडी साँस है। तो ये है सच्चाई।’ यह कहते हुए वह रिकार्ड उठाने लगे तो मैंने कहा, ‘इसके पीछे क्या है, वह भी बजाकर सुनाइये।’ तो उन्होंने मेरे गाल पर चुटकी काटी और कहा, ‘मैं तो हूँ चोर, तू डाकू बनेगा। यह सफ़र जो तुमने इस रिकार्ड की एक साइड सुनने के लिए किया, वह दोबारा करना तब हम दूसरी साइड सुनाएँगे।’ रिकार्ड को झोले में डालकर अटैची के अंदर रख लिया। रिकार्ड हमारी आँखों से ओझल हो गया जो आज तक ओझल है।

फिर कहने लगे, हर मुजरिम को अपने जुर्म का भार उठाने की थकान होती है, इसीलिए उसको अपना जुर्म बाँटकर हल्का करना होता है। आज रात वही हो रहा है। मैं आप लोगों का शुक्रगुजार हू, आप लोग भी इसे बाँट रहे हैं क्योंकि यह रिकार्ड मैंने चुराया था। मैं आपको पहले की कह चुका हूँ कि मैं सच्चा हाजी नहीं हूँ। लेकिन चोरी मेरा पेशा नहीं है। किसी बुज़ुर्ग को छोटों को नसीहत देने का कोई अधिकार नहीं, जब तक वह ख़ुद ऐसा अघिकार हासिल नहीं करना चाहता। और मुझे पास बुलाकर बताया कि ये चोरी उन्होंने कैसे की।

एक रात मोरोगरो स्टेशन पर एक गाड़ी देर तक रुकी। एक हिंदुस्तानी सज्जन उसी समय हिंदुस्तान से लौटे थे। वह तबोरा जा रहे थे। वक़्त था, उनसे मुलाक़ात हुई, बातें होने लगीं। उन्होंने बताया कि वह इंडिया से कुछ रिकार्ड लेकर आए हैं। इनमें से कुछ दारेस्सलाम में उन्हें सुनने का मौक़ा मिला। उन्होंने कहा, इनमें कुछ तो बहुत बेकार हैं जो उन्हें नहीं चाहिएँ। चूँकि उन्हें वज़न कम करना था, तो कहा, अगर आपको चाहिएँ तो ले लीजिए। मैंने रिकार्ड देखे। दिल ने कहा, उनसे कहूँ, आप ख़ज़ाना लुटा रहे हैं। जोश ने साथ नहीं दिया। और मैंने रिकार्ड जल्दी से उनसे ले लिये। ये गाना उन्हीं में से था। उन्होंने कहा, यह जानते हुए कि कोई चीज़ क़ीमती है, यह न बताना भी एक तरह की चोरी है। हाजीभाई अपने क़ीमती ख़ज़ाने को बस्ते में डालकर घर के अंदर जाकर रख आए। जब वापस आए तो संगीतकार सज्जाद के बारे में और भी कहानियाँ सुनाई।

(जारी)

Monday, October 14, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ६

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – ६

(पिछली पोस्ट से जारी)

हाजीभाई से मुलाक़ात: हिंदुस्तानी फ़िल्मी कहानी का अंतरा

बातों बातों में हम रेलवे शेड पहुँचे तो उन्होंने कारख़ाने के बाहर ही रुकने को कहा और अंदर जाकर एक बुजु़र्ग से बातें करने लगे। थोड़ी देर में उन्हें लेकर हमारे पास आ गए। हम लोगों से हाथ मिलाया और कहा, ‘मेरा नाम है, हाजीभाई। आप में ग़लतफ़हमी पैदा न हो, मैं कभी मक्का-मदीना नहीं गया। मेरे पिता जी गए थे। उनके अच्छे कामों का नाम मुझे मिल गया है।’ उन्होंने मेरे भाई से पूछा, ‘आप लोग क्या करते हैं?’ भाई ने कहा, ‘हम आधे मुसलमान हैं।’ ये सुनकर वह चैंके और कहा, ‘भई ये कैसे?’ भाई ने जवाब में कहा, ‘ख़ुदा को मानते हैं लेकिन डरते नहीं।’ उन्होंने कहा, ‘ये क्या चक्कर है?’ भाई बोले, ‘हम मस्जिद नहीं जाते, रोज़ा नहीं रखते। लेकिन ईद मनाते हैं।’ यह सुनकर हाजीभाई बहुत हँसे और बोले आज का खाना हमारे घर।


दोपहर का वक़्त गुज़ारने के लिए हमने बरसात फ़िल्म देखी। बालू सिंह ने पिक्चर की फ़ोटोग्राफ़ी पर लेक्चर पर लेक्चर दिये। शाम को हम हाजीभाई के घर पहुँचे। वह बाहर बरामदे में हमारे इंतज़ार में बैठे थे। फिर से सलाम दुआ हुई। कुर्सियाँ आईं और हमें बिठा कर ख़ुद घर के अंदर चले गए। थोड़ी देर में मुर्ग़े की चीख़ सुनाई दी। तब बालूसिंह ने कहा, ‘मुझे लगता है आपका काम बन जाएगा।’ इतने में हाजीभाई भी आ गए थे। बैठकर बातें होने लगीं। वे कहने लगे मुझे उन लोगों पर ताज्जुब होता है जो रूह की सच्चाई को नहीं मानते। मुर्ग़े के गले पर जब छुरी चलती है, तो वह उड़ने की कोशिश करता है। परों की आवाज़ रूह के उड़ने का सबूत है। फिर उन्होंने पूछा, ‘आज क्या किया?’ तो बताया, बरसात पिक्चर देख कर आए हैं। उन्होंने यह सुनते ही कहा, ‘पृथ्वीराज के बेटे की फ़िल्म तो...’ उन्होंने दो गालियाँ राजकपूर को दीं। बोले, इस नौजवान पर तो बड़ों का आशीर्वाद नहीं होगा जिसने राम गांगुली को निकाल दिया और शंकर जयकिशन को लिया। फ़िल्म आग का ‘न आँखों में आँसू, न होठों पे हाय’ (मजरूह सुलतानपुरी) जिसने ऐसा डायमंड गीत दिया उसके साथ ऐसी बेवफ़ाई तो हमने कभी नहीं देखी।

न आँखों में आँसू न होठों पे हाय
मगर एक मुद्दत हुई मुसकराये।


बोले, ‘शंकर जयकिशन में क्या है? ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म में लाल दुपट्टे की बात कर रहे हैं। इनकी मत मारी गई है। कौन इन पागलों को सुनेगा?’ ये सुनकर बालूसिंह अपना सिर हिलाने लगे। यह होता है नतीजा फ़िल्म को कान से सुनने का। हाजीभाई के घर के दरवाज़े के पीछे एक साया इधर-उधर जा रहा था। मैं समझ गया, वो एक कुएँ में गिर गए हैं। ये एक्सप्रेशन हमारे बुज़ुर्ग उन हिंदुस्तानियों के लिए करते थे जिनकी शादी काली अफ्रीकी औरतों से होती थी।


ज्यों ही शाम होने लगी कि लगा हाजीभाई अपने आप में इतिहास हैं। सिनेमा संगीत का इतना ज्ञान था, वह और मेरे भाई ऐसे बैठे मानो सिनेमा संगीत के महान ज्ञानी हों। उन्होंने बताया वह बहुत दिनों में इस पसोपेश में हैं कि उन्हें यह समझ में नहीं आता कि फ़िल्म बैजू बावरा में नौशाद कहना क्या चाहते हैं? लोक संगीत को क्लासिकल संगीत के ज़रिए महलों तक पहुँचाया जाए या शास्त्रीय संगीत को लोक संगीत की तरह सरल बनाकर आम लोगों तक पहुँचाया जाए। क्या बात सच है इसका जवाब न मिलने के कारण काम में भी मन नहीं लगता। मेरे भाई ने कहा, अंत में तो वही गीत है, ‘तू गंगा की मौज मैं जमना की धारा’ आप जो जवाब ढूँढ़ रहे हैं, वह इसी गीत में है। उन्होंने कहा, ‘ये तो आपने अच्छी बात सुझाई। हो सकता है कल मैं अपना काम ठीक से कर पाऊँगा।’ फिर कहने लगे, ‘अगर मरते वक़्त उनके कानों में ये गीत ”झूले में पवन के आई बहार प्यार छलके“ सुनाई पड़ेगा तो उन्हें लगेगा वह स्वर्ग छोड़ कर जा रहे हैं।’

झूले में पवन के आई बहार प्यार छलके


बातों-बातों में ही खाना आ गया। उससे पहले हाजीभाई ने कहा, ख़ुदा का शुक्र है उन्होंने मुर्ग़े को मुर्ग़ा और हमें आदमी बनाया, नहीं तो कौन जाने, कौन किसको खा रहा होता।

खाना ख़त्म हुआ। रात के लिए गैस का लैंप जला। चाय का एक दौर हुआ और फिर हाजीभाई कहने लगे, हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत का न तो लोक संगीत और न ही शास्त्रीय संगीत से ही कोई गहरा ताल्लुक़ है। यह हिंदुस्तान में नया इंक़लाब है। ये नयी बोतल में पुराना नशा नहीं, नयी बोतल में नया नशा है। यह इसलिए कि हर टेक्नोलाजी अपने आप में एक नया पैग़ाम है। पहले तो माइक्रोफ़ोन ने हमारी गायकी बदली। माइक्रोफ़ोन के बगैर तलत महमूद जैसे गायक अपना काम नहीं चला सकते थे। फिर 78 आरपीएम का रिकार्ड साढ़े तीन मिनट में जो कहना है, वो कह देता है। यह ऐसा गीत नहीं है जब मूड आया बना लिया। ये कहानी की सिचुएशन के लिए, कहानी को आगे बढ़ाने के लिए है। अगर हम फ़िल्मी गीत को सुनते हैं, तो उसमें धुन को बाँटा हुआ है। प्रिल्यूड और इंटरल्यूड वाले भाग में हमें आर्केस्ट्रा मिलता है और अगर वह सिर्फ़ धुन को दोहराये तो वह हिंदुस्तानी रहेगा। लेकिन विदेश से हारमनी और रंग को भी हमारे संगीतकारों ने प्रयोग किया। हमारा परंपरागत संगीत लकीर की तरह फ़्लैट है। हारमनी ने उस पर मंज़िलें बनाईं। उससे गीत को और भी ख़ूबसूरत बनाया जा सका, उसमें बारीकियाँ डाली जा सकीं। इसके पायनियर संगीतकार थे, आर सी बोराल और पंकज मलिक। ये वे नौजवान थे जो अपनी संस्कृति की बहुत इज़्ज़त करते थे। उन्हें पता था कि धुन पुरानी चीज़ है, उसमें विदेशी वाद्य, प्रिल्यूड और इंटरल्यूड में लगाये और धुन को साफ़ सुथरा रखा। आवाज़ में इंसान की रूह बोलती है। धुन को उससे जोड़ा, फिर बोलों ने कहानी को आगे बढ़ाया। आम गीत इसी स्ट्रेटेजी पर बने हैं।


संगीतकार सज्जाद हुसैन ने इस सिद्धांत को नहीं अपनाया क्योंकि वह ख़ुद वादक थे। सज्जाद हुसैन का नाम सुनकर हम चैंके। लेकिन बाहर से ज़रा भी उत्सुकता नहीं दिखाई ताकि उनको कोई शक न हो। हम हाजीभाई को धोखा देने में कामयाब रहे। हाजीभाई ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा सज्जाद हुसैन जानते थे कि एक माहिर कलाकार के हाथ में वाद्य भी गा सकता है और आवाज़ वाद्य भी बन सकती है। उनका कहना था कि जिन गीतों में बोल ऊँचे दर्जे पर हैं और साज़ नीचे, तो वह बराबर नहीं है। अब जब बोलती गाती फ़िल्म 1931 में आई तो हिंदुस्तान की आज़ादी का आंदोलन तेज़ी पर था। आज़ादी के बाद लोगों में एकता होगी, लोग बराबर होंगे। सज्जाद ने अपने गीतों में साज़ और आवाज़ में एकता पैदा की। जो लोग समाज में एकता और बराबरी नहीं चाहते उन्हें सज्जाद हुसैन का संगीत पसंद नहीं आएगा। जहाँ गौतम बुद्ध अपने इसी मक़सद में कामयाब नहीं हुए, तो सज्जाद हुसैन की क्या बिसात! एक शायर ने कहा है- ‘तम्हीदे ख़राबी की तकमील ख़राबी है’ - सीमाब। हाजीभाई ने कहा, ‘मैं इसकी कहानी बताता हूँ।

(जारी)

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ५

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – ५

(पिछली पोस्ट से जारी)


इन बातों ने ऐसा सुरूर पैदा किया कि हमें वक़्त और जगह का अहसास ही नहीं रहा। बाहर देखा तो लहर पर लहर दिखाई दे रही थी और शाम का सुर्मा फ़िज़ा पर छा रहा था। रात होते ही हम हंडेनी पहंच गए। हमारी बस बाज़ार के बीच रुकी। रात की वजह से सफ़र वहीं बंद हो गया और सबको बस में ही रहने की हिदायत दी गई। हम बस के बाहर निकले तो हज़ारों जुगनू सितारों की तरह उड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था एक आसमान हमारे नीचे है और एक ऊपर। भाई ने ऊपर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘यह जो चमकते हुए सितारे नज़र आ रहे हैं, करोड़ों बरस सफ़र करने के बाद इनकी रौशनी हम तक पहुँच रही हैं। जब इनकी रोशनी का सफ़र शुरू हुआ था, कृष्ण, राम, मूसा, ईसा, बुद्ध और मोहम्मद पैदा भी नहीं हुए थे। इस रोशनी ने सब दौर देखे हैं। हमें भी देख रही है।’ हम रात की यह ख़़ूबसूरती थोड़ी ही देर सराह सके। मच्छरों के लश्कर ने हम पर हमला कर दिया। फिर तो रात हमने बड़ी मुश्किल से गुज़ारी। एक घंटा भाई सोते तो मैं मच्छर उड़ाता और जब मैं सोता तो वह। हंडेनी के मच्छर दुनिया के सबसे ज़हरीले मच्छर हैं। सुबह शरीर पर लाल-लाल चकत्ते नज़र आ रहे थे। भाई ने कहा, ये थी पानीपत की लड़ाई जिसमें दो फ़ौजों ने एक दूसरे का ख़़़ून किया। लेकिन फ़र्क़ यह है कि हमारे बदन पर जो ख़़ून था वह अपना ही था। मुझे ताज्जुब हो रहा था, मैं तो मुसीबत में था, वह ख़ुश नज़र आ रहे थे। उन्होंने कहा बलिदान के बगै़र कुछ काम नहीं बनता। अब मुझे यक़ीन है कि हमें गाना सुनने को मिलेगा।

दूसरे दिन बस का सफ़र फिर शुरू हुआ। लेकिन शहर के कुछ मील बाहर पहुँचते ही देखा सिंगासी नदी में बाढ़ आई हुई है। पुल पानी में डूबा हुआ है। सारा दिन इंतज़ार में गुज़रा कि नदी का पानी कब जाए और बस आगे बढ़े। बस में, साथ जा रहे अफ्ऱीक़़ी लोगों की देहाती मासूमियत का सबूत मिलने लगा। उनके पास खाने पीने के लिए जो कुछ भी था, बाँटकर खाने लगे। हमें भी दिया। रंग, भेदभाव सब कुछ ख़त्म हो गया। सब लोग बस यही चाहते थे कि पानी उतर जाए तो बस पुल के पार हो। शाम तक नदी पुल के नीचे उतर गई। जब पानी से पुल निकला तो बड़ा डरावना लग रहा था जिसे आज भी सोचकर दहशत होती है। पक्का पुल तो पिछले साल टूट गया था। उसकी जगह बाँस का पुल साइसेल की रस्सी से लटकाया गया था। बस ड्राइवर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा। ये एक्सप्रेस बस है, रुक नहीं सकती। यही पुल पार करके जाएगी। अगर आप लोगों को यहीं जंगल में रुकना है, तो यहाँ के भूखे शेर, चीते देख रहे हैं, वह आप सबको हड़प जाएंगे। अब आप लोगों की मर्ज़ी रुकिए या चलिये। पाँच मिनट में बस में नहीं बैठे तो मैं समझ जाऊँगा कि आप लोगों को नहीं जाना है।


उस वक़्त मेरे भाई के मुँह से यह मिसरा पहली बार मैंने सुना, ‘क़दो गेसू में क़ैसो कोहकन की आज़माइश है’ (ग़ालिब)। उन्होंने कहा, इस पुल को साइसेल की रस्सी ने बाँघा है। इसी रस्सी के बल पर हम सब एक हैं। मुझे भरोसा है यह रस्सी टूटेगी नहीं। पुल को फिर से देखकर मेरे दिमाग़ में एक बादल सा उठा और एक ख़याल दिमाग़ में आया कि क्यों हम अफ्ऱीक़़ा के बियाबान जगहों में इंडिया से और भी दूर एक फ़िल्मी गाना ढूँढ़ने के लिए जा रहे हैं? अगर यह पागलपन नहीं है तो हमारे दिमाग़ के ढीले स्क्रू का सबूत ज़रूर है। ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। फ़ैसले के लम्हे सामने थे, यह ख़याल दूर हो गया।

जिस चीज़ ने हमें रोटी दी है अगर हम उसके वफ़ादार नहीं हैं तब हम न तो इंसान हैं, न आदमी। मेरे भाई को साइसेल पर भरोसा था और मुझे भाई पर। ज्योंही हम दोनों बस पर चढ़े सब काँपते-काँपते साथ हो लिये। बस पुल पर आ गई है और हिंडोेले जैसे पुल पर झूलते हुए आगे बढ़ने लगी। पुल के दूसरी ओर पहँुचने पर ड्राइवर ने गाड़ी रोककर ताली बजाई और कहा जब आप जैसे लोग सफ़र करते हैं तो लगता है हमारे साथ सेना है। आप लोगों ने हमारी लाज रख ली। आज तो आप लोगों ने एक नयी कहानी गढ़ी है। मैं अब ये बात सबको बताऊँगा कि हमने पुल कैसे पार किया। ड्राइवर ने कहा आज मेरी एक ग़लतफ़हमी दूर हो गई कि ये दो मुहिंदी (हिंदुस्तानी) जिनकी नस्ल को हम डरपोक व्यापारी समझते हैं ऐसा सोचना ग़लत है। मेरे भाई ने कहा, ‘मुझे आज फिर भरोसा हुआ कि साइसेल के बल पर हमारी ज़िंदगी का चक्कर चलता रहेगा और दुनिया इसे क्यों सुनहरा धागा मानती है। सुनहरी इनकी क़ीमत है। लेकिन इसमें स्टील की ताक़त है। सफ़र के दूसरी ओर पहाड़ियों की दीवार नज़र आई। भाई ने बताया वह उलूगरू पहाड़ है। उनकी गोदी में है मोरोगोरो शहर, जहाँ हम जा रहे हैं। थोड़े ही आगे जाने पर रेल नज़र आने लगी। ट्रेन देखते ही हमने इत्मीनान की साँस ली क्योंकि ट्रेन अफ्ऱीक़़ा में हिंदुस्तान की लकीर है।

मोरोगोरो में बालूसिंह से मुलाक़ात

दोपहर को हम मोरोगोरो पहुँचे। सीधे भाई के दोस्त बलवंत बालूसिंह के यहाँ गए। दो बच्चों के साथ वह घर के बाहर ही बैठे थे। देखते ही बड़ी ख़ुशी ज़ाहिर की। हम लोग नहाये, घोये। चाय नाश्ते के लिए तैयार हो गए। तब उन्होंने अपनी राम कहानी सुनाई। कहने लगे वक़्त बहुत ख़राब हो गया है। कभी भी उनकी नौकरी जा सकती है। वो दारेस्सलाम-टबोरा रेलवे लाइन में इंजिन के फ़ायरमैन थे। कहने लगे, ‘कोयले का इंजिन जाने वाला है और डीज़ल इंजिन आ जाएगा तो हमारी नौकरी चली जाएगी। अगर कहीं श्मशान घाट की कोई नौकरी हो तो बता देना। एक बहुत माहिर आग का काम करने वाला है।’ इस पर हम लोग बहुत हँसे। उन्होंने कहा, भाभी को नहीं बताना। हमने उन्हें कुछ ख़बर नहीं की है। मुझे लगा था, इन्हीं के पास वह गाना होगा। उनकी नौकरी जाने का मज़ाक़ खत्म हुआ तो वह बहुत गंभीर हो गए। कहने लगे, ‘मुझे नहीं लगता कि जिस गीत को सुनने के लिए आप आए हैं, वह काम पूरा हो जाएगा। क्योंकि हाजीभाई जिनके पास रिकार्ड है, शक्की भी हैं। तुम लोग एक दिन लेट आए हो। उनके मुताबिक़ अच्छा समय निकल गया। फिर भी चलो, कोशिश करके देखते हैं। कोशिश करना इंसान के हाथ में है।’ वह हमें रेलवे शेड में ले गए हाजीभाई से मिलने के लिए। जाते समय उन्होंने नसीहत दी, रिकार्ड का नाम मुँह पर न लाना। ऐसा कुछ भी हुआ तो ज़रा भी काम नहीं बनेगा। मैं बस कहूँगा, मेहमान आए हैं तो आपसे मिलाने के लिए ले आया। बाक़ी उन्होंने तो इंतज़ाम किया हुआ होगा। शेड की तरफ़ जाते समय रास्ते से गुज़रे तो वहाँ सिनेमा में फ़िल्म बरसात लगी हुई थी। बालूसिंह ने बताया ‘सब लोग शंकर जयकिशन के संगीत पर इस फ़िल्म को बारबार देख रहे हैं। लेकिन मैं फ़ाली मिस्त्री की जादूगरी देखने जाता हूँ। उन्होंने धूप और छाँव मिला कर एक रंगीन फ़िल्म बनाई है। गीत ”हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का“ जो फ़िल्म के ब्लैक एंड व्हाइट होते हुए भी लाल नज़र आता है और कोयला जब जलता है तो इसमें से कितने ही रंग निकलते हैं।’


हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का
ओ जी ओ जी...


वह ठीक कह रहे थे। फ़ाली मिस्त्री बहुत अच्छे कैमरामेन थे। फिर भाई और बलवंत में बहस हो गई। उन्होंने कहा, ‘अय्यूब, तुम्हें फ़िल्म संगीत अच्छा लगता है कि तुम कुछ और देखते ही नहीं। सिवाय नौशाद, सी रामचंद्र, शंकर जयकिशन के अलावा तुम्हें फ़िल्म में किसी और की कला नज़र ही नहीं आती। उनका विचार था फ़िल्म पहले आँख के लिए है, फिर कान के लिए है। संगीतकारों ने इंडियन पब्लिक को अंधा बना दिया है। वह फ़ाली मिस्त्री, आर डी माथुर, फ़रीदून ईरानी, जाल मिस्त्री इनकी कारीगरी पहचानते ही नहीं। भाई ने इसके जवाब में कहा, बालू यह तुम्हारी ग़लतफ़हमी है। हिंदुस्तानी फ़िल्म पहले कानों तक पहुचती है, फिर आँखों तक।

(जारी)

Saturday, October 12, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ४

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब

(पिछली पोस्ट से जारी)

1930-31 में जब हिंदुस्तानी फ़िल्मों में साउंड ट्रैक आया, उसके साथ ही इंसान की आवाज़ और भाषा का प्रयोग हुआ। मूक सिनेमा में लिमिटेसन्स थीं। चित्र के मतलब नहीं निकलते थे। इसलिए कहानी को समझाने के लिए बारबार लिखे हुए शब्दों का इंटरल्यूड परदे पर दिखाया जाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि एक आदमी स्क्रीन के एक और खड़ा होकर शब्दों में कहानी बताता। जैसे कि जीते-जागते इंसान को भाषा से अलग नहीं किया जा सकता, जब तक बोलते-गाते इंसान फ़िल्मों में नहीं आए, तब तक फ़िल्म इंसान के बारे में थी ही नहीं।

हिंदुस्तान एक खेतिहर देश है जिसमें ज़िंदा रहने के लिए गीत एक बहुत बड़ा ज़रिया है। लोकगीत में पुरानी पीढ़ी की विज़्डम डालकर नयी पीढ़ी तक पहुँचाई गई ताकि नयी पीढ़ी अपने बुजु़र्गों के तजुर्बे का फ़ायदा उठाये और उनकी याद भी ताज़ा रखे। सिनेमा अवाम का माध्यम है इसलिए उसमें शास्त्रीय संगीत उचित नहीं था। हिंदुस्तान का लोक संगीत ही फ़िल्म का आधार बना। सिनेमा मे गीत का उपयोग कैसे होना है, संगीतकार आर सी बोराल, मास्टर गु़लाम हैदर, केशव भोले, पंकज मलिक, तिमिर बारान, अनिल विश्वास इन लोगों ने इसका जवाब निकाला। वह यह कि फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ाने का ज़रिया बनाया जाए। आज भी सबसे सफल गीत वे हैं, जब उन्हें क्रमबद्ध ढंग से रखा जाए तो सारी कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद पता लग जाती है। गीत को किस सिचुएशन में आना चाहिए, इसका जवाब है जिसमें जज़्बा इतना बढ़े कि डाॅयलाग से काम न बनता हो, तो गीत लगाया जाए। कहानी में ऐसी सिचुएशन आती है जहाँ न तो तस्वीर और न संवाद काम करते हैं, वहाँ गीत उसे पूरा करता है। गीत कहानी को गहराई देता है। अच्छा डाइरेक्टर और संगीतकार वही है जो कहानी में गीत को पैबंद की तरह नहीं, ऐसे बुने कि वह अलग न दिखाई दे।

भाई ने एक बात और बताई कि फ़िल्मी गीत के साथ ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटोग्राफ़ी को रंगीन बनाने का मंसूबा संगीतकारों ने ही निकाला। वह था आरकेस्ट्रा। हमारे देशी संगीत में इतने वाद्य नहीं थे कि गीत को इंद्रधनुषी रंग दे सकते। पहले तो, उन्होंने पश्चिमी संगीत से वह साज़ लिये जो हमारे वाद्यों के स्वरों से मिलते-जुलते थे। जैसे, सरोद की जगह गिटार, वीणा की जगह स्लाइडिंग गिटार, बाँसुरी की जगह धातु का फ़्लूट, सारंगी की जगह वायलिन, हारमोनियम की जगह पियानो और एकोर्डियन, शहनाई की जगह ओबो और आवाज़ की जगह सेक्सोफ़ोन का इस्तेमाल किया। इन वाद्यों को अकेले बजाया जा सकता था और गीतों को रंगीन करने के लिए आरकेस्ट्रा की ज़रूरत थी। लेकिन आरकेस्ट्रा नोटेशन के बग़ैर काम में नहीं लाया जा सकता। इसलिए कलाकारों को पश्चिमी संगीत का एल्फ़ाबेट सीखना पड़ा। 1952 में जब महबूब ख़ान की रंगीन फ़िल्म 'आन' नोवल्टी सिनेमा में दिखायी गई तो भाई ने कहा, ‘आज हिंदुस्तानी फ़िल्म भद्दी हो गई। अच्छे गाने होते हुए टेक्नीकलर की ज़रूरत नहीं थी।


दिल में छुपाके प्यार का तूफ़ान ले चले
आज हम अपनी मौत का सामान ले चले ... 
मिटता है कौन देखिए उल्फ़त की राह में

उन्होंने कहा फ़िल्म को बाज़ारू कर दिया है। वह फ़िल्म आधी छोड़कर रीगल में हम लोग फ़िल्म देखने गए और शहर में ढिंढोरा पीट दिया कि हम लोग फ़िल्म आन से बेहतर है। लेकिन सच यह है कि मेरे भाई के अलावा फ़िल्म कोई छह लोगों ने ही देखी थी।

चली जा चली जा
आहों की दुनिया
यहाँ कोई नहीं अपना न घर अपना न दर अपना।

मेरे भाई उन गिने-चुने लोगों में थे जिनकी बातों में इतना दम था कि वह कभी भूलती नहीं थीं। भाई के साथ यह सफ़र चालीस साल पहले की बात है। लेकिन लगता है, सब कुछ कल ही हुआ है। रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में सिर्फ़ यह मालूम था कि उन्होंने बिना दरो-दीवार का स्कूल बनाया है। भाई की यह बातें सुनकर मैं यह सोचने लगा कि जिस स्कूल में मैं जाता हूँ वह तो जेल है और मेरे भाई ने चलती हुई बस को स्कूल बना दिया जिसमें मनोरंजन के साथ हम सीख भी रहे थे। वह अध्यापक थे और मैं उनका छात्र।
भाई ने बताया कि हर विदेशी वाद्य को अपने संगीत में अपनाने से पहले उसकी परीक्षा ली गई। क्या इन साज़ों में से वे बारीक स्वर निकाले जा सकते हैं जो हमारे संगीत को अभिव्यक्त कर सकें? उन्होंने कहा, बहुत से पढ़े-लिखे लोग फ़िल्मी गीत के आर्केस्ट्रा को पश्चिम का कटा-पिटा मिलावटी आरकेस्ट्रा समझते हैं। 1940 के दशक में ही हमारे संगीतकारों ने आर्केस्ट्रा का हिंदुस्तानीकरण कर लिया था। उसे अपना बना लिया था। इसकी जो दो मिसालें उन्होंने मुझे दीं वह आज भी याद है। उन्होंने अपने पार्कर पेन मुझे दिखाया और कहा, यह है विलायती लेकिन इससे मैं उर्दू लिख सकता हूँ, हिंदी लिख सकता हूँ, मैं जो भी चाहूँ लिख सकता हूँ। दूसरी मिसाल उस संगीतकार से जुड़ी है जिसके गाने की खोज में हम यह सफ़र कर रहे हैं। सज्जाद हुसैन इटली के मैंडोलिन में माहिर थे। हालाँकि मैंडोलिन में मींड नहीं है लेकिन उनमे यह क़ाबलियत थी कि वह मैंडोलिन के तार में से आधा, चैथाई स्वर निकाल कर हिंदुस्तानी संगीत दे रहे हैं।

यह कहते हुए उन्होंने थोड़ा-सा विषय बदला। अरे भाई, अगर हमने तुम्हें यह इंप्रेशन दिया है कि मोरोगोरो में हमें वह गाना सुनने को मिल जाएगा जिसे हम ढूँढ़ रहे हैं, हो सकता है नाकाम हो जाएँ। जिन्होंने अपना रिकार्ड संभाल कर रखा हुआ है वह हमें इतनी आसानी से क्यों सुनाएगा? उस समय उन्होंने वह बात कही जो मुझे आज भी याद है और आगे भी रहेगी कि हो सकता है, ख़ुदा ने इंसान को इसलिए बनाया है ताकि हमें इस बात का इल्म हो कि रूह को बचाने के लिए उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

(जारी)

Friday, October 11, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ३

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – ३

(पिछली पोस्ट से जारी)

फ़िल्म गीत है क्या? एक बार पूछने पर उन्होंने कहा था फ़िल्मी गीत धुन के लिफ़ाफ़े में एक पुराना पैग़ाम है जो हमारे पुरखों ने हम तक पहुँचाया है ताकि हम अपने को बेहतर बनायें। यह समझाते हुए उन्होंने आवारा फ़िल्म का ‘दम भर जो उधर मुँह फेरे ओ चंदा’ गीत लिए कहा, ‘ये धार्मिक, मज़हबी गाना है जिसमें राधा और हरि यानी कृष्ण की बातचीत हो रही है। राधा चाँद से, जो कि बलराम है, दरख़्वास्त कर रही है कि यदि वह कुछ देर के लिए बादलों की ओट में हो जाएं तो वह कृष्ण से प्यार का इज़हार कर ले।’

दम भर जो उधर मुँह फेरे ओ चंदा

उन्होंने कहा, राजकपूर - एक इंसान - के लिए ये संभावना है कि वह हरि के रूप में आए।

मैं चोर हूँ काम है मेरा चोरी

क्योंकि हरि माखन चोर थे। वह माखन चुराकर अपनी सौतेली माँ के प्यार का इम्तहान लेते थे। इस गीत में वह हीरोइन से साफ़ कह रहे हैं कि मैं तो चोर हूँ, क्या तब भी मैं प्यार के क़ाबिल हूँ? जिसका जवाब है, बेशक। गाने का अर्थ यही है कि हम दुनिया में एक दूसरे की मोहब्बत के लिए आए हैं। यदि ख़ुदा को प्रेम की ज़रूरत नहीं होती तो वह भी हमें नहीं बनाता। हम जब ईमानदारी से एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो हम भी ख़ुदा के क़रीब आ जाते हैं। यही है फ़िल्म आवारा का पैग़ाम। ये फ़िल्म देखने के दूसरे ही दिन मेरे भाई मोंबासा गए और वहाँ के सलीम रोड के दर्ज़ी से सफ़ेेद गैबर्डीन का कोट और काला वूल ट्राउज़र सिलवाया। उसके साथ सिल्क का मफ़लर पहने सिगरेट पीते उमस भरी गर्मी में चले आ रहे थे राजकपूर की तरह, लेकिन टांगा में।

मैं चोर हूँ, काम है मेरा चोरी, दुनिया में हूँ बदनाम
दिल चुराता आया हूँ मैं, ये ही मेरा काम।


सेकिंड क्लास के डिब्बे में जो हिंदुस्तानियों के लिए था दो घंटे में साठ मील का सफ़र करके हम कोरोग्वे पहुँचे। ये रेलगाड़ी और बसों का जंक्शन था। पंगानी नदी के तट पर बसा ये छोटा सा शहर है। जब भी नदी में बाढ़ आती, तो लोगों के घरों और दूकानों को बहा ले जाती। नदी में बड़े-बड़े मगरमच्छ थे। इस शहर में हमारे बड़े मामू रहते थे। जब भी उनके घर जाते, खाने को आलू का बढ़िया पराँठा मिलता। लेकिन इस बार हम उनके घर नहीं गए। भाई साहब ने समझाया मामू दादा फ़ाल्के की फ़िल्म हरिश्चंद्र के ज़माने के हैं। साइलेंट फ़िल्मों के समय के। फ़िल्म संगीत का रस उन्हें नहीं मालूम। अगर हमने उन्हें बताया कि हम एक फ़िल्मी गीत सुनने के लिए इतनी दूर जा रहे हैं तो वह हमें मोरोगोरो से आगे डोडोमा भेज देंगे। वहाँ टांगानिका का सबसे बड़ा पागलख़ाना था जहाँ से कोई भी लौटकर नहीं आता। भाई ने मुझसे वादा ले लिया था कि इस सफ़र का ज़िक्र कभी किसी से नहीं करोगे। इस राज़ ने हमारे बीच एक नया रिश्ता क़ायम किया।

रेलवे स्टेशन से हम शहर में बस का पता लगाने के लिए करीम भाई के टी रूम में गए। वह भाई के दोस्त थे, ख़ुशी से मिले और बताया कि शहर में निराला फ़िल्म लगी हुई है। फ़िल्म आधी ही है, अभी सिर्फ़ दो रीलें आई हैं, बाक़ी रास्ते में है।

चाय पीते हुए वह मधुबाला के बारे में बात करने लगे। करीम भाई ने बताया, मधुबाला की खू़बसूरती ढलते दिन में, सूरज की आखि़री किरण के समान हैं। चूंकि इंसान किरण को वक़्त से बचा नहीं सकता, इससे इंसान की नाकामी का अंदाज़ा मिलता है। मेरे भाई साहब को फ़लसफ़ा नज़र आया। एक अच्छी बात का अच्छे शब्दों में जबाब देना, वह अपना फ़र्ज़ समझते थे। भाई अय्यूब ने कहा, निराला फ़िल्म के गीत ‘महफ़िल में जल उठी शमा परवाने के लिए’, इसमें जो मद्धम-मद्धम क्लेरेनेट बजता है, वह साज़ की आवाज़ नहीं, बुझते चिराग़ की आह है। सी रामचंद्र ने तीन मिनट में गाना नहीं जादू दिखाया है:

महफ़िल में जल उठी शमा परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में मर जाने के लिए


करीम भाई ने सी रामचंद्र के बारे में सुनते ही उनके सामने चाय का एक और कप रख दिया और कहने लगे, वह बहुत निराश हैं। सरकार शहर को ऊँचाई वाले इलाक़े में नये सिरे से बसाना चाहती है। जब पूछा इसमें ख़राबी क्या है, कहने लगे, ‘इस नदी और इसके सारे जीव-जंतुओं के साथ हमारा बचपन से नाता है। हम एक दूसरे के संगी साथी हैं। जब बाढ़ आती है तो नदी हमारी मेहमान होती है। नदी और इंसान को अलग-अलग करने से पता नहीं क्या-क्या खराबियां आएंगी।’ उनकी सोच हमें बड़ी अनोखी लगी। आसमान की तरफ देखा तो काले बादल लश्कर की तरह बढ़ते चले आ रहे थे। कोरोग्वे और मोरोगोरो का 170 मील का कच्चा रास्ता है जो बारिश में दलदल में बदल जाता है। उस ज़माने में यह बहुत लंबा सफ़र था, लेकिन संगीतकार सज्जाद हुसैन के गाने सुनने के लिए हम दोनों भाई किसी भी आँधी, तूफान का सामना करने के लिए तैयार थे क्योंकि यह गारंटी नहीं थी कि फिर कभी ये गीत सुनने को मिले या न मिले।

जब हम बस स्टेशन पहँुचे और ड्राइवर से पूछा सफ़र कब शुरू होगा, तो वह कहने लगा, ‘ये मोंबासा नहीं है और न ये समुंदरी जहाज़। ये बस बंबई नहीं जा रही है। ये जा रही है मोरोगोरो। शायद आप ग़लत रास्ते पर हैं।’ मेरे भाई ने कहा, ‘हम मोरोगोरो ही जा रहे हैं। बंबई से और भी दूर।’ ये सुनकर ड्राइवर सीटी में गीत गाने लगा:

मेरे दिल की घड़ी करे टिक-टिक
ओ बजे रात के बारह,
हाय तेरी याद ने मारा।


वह कहने लगा, ये है अफ्ऱीक़़ा। ये उस घड़ी पर नहीं चलता जिस पर आप चल रहे हैं। बस उस वक़्त चलेगी जब मेरी मर्ज़ी होगी। भाई ने कहा, ये है सच्चाई। अफ्ऱीक़़ी घड़ी में मिनट की सूई है ही नहीं। सिर्फ घंटे की सूई है। फिर वह गंभीर हो गए। कहने लगे, ‘ये बग़ावत है, अफ्ऱीक़़़ी विलायती घड़ी पर इसलिए नहीं चलता क्योंकि वह घड़ी उसके दास होने का प्रतीक है। इसलिए वह विलायती घड़ी को नहीं मानता। दोपहर दो बजे की बस में हम कोरोग्वे से आगे रवाना हुए। बस में फ़स्ट, सैकंड या थर्ड क्लास का कोई अंतर नहीं था। बस में इंसान, बकरियाँ, मुर्गि़याँ, छोटे, बड़े, बूढ़े सभी एक ही थे। चार पहियों पर एक गाँव साथ चला जा रहा था।

कोरोग्वे से मोरोगोरो तक - हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत का मुखड़ा

हम शहरी अफ्ऱीक़़ा से देहाती अफ्ऱीक़़ा जा रहे थे। उस इलाक़े में जहाँ हिंदुस्तानियों की फ़©लादी लकीरें नहीं थी। हालाँकि हमारा जन्म अफ्ऱीक़़ा में ही हुआ, देहात हमारे लिए अजनबी जगह थी। ऐसी बियाबान जगह में हमें हिंदुस्तानी ख़यालों के सहारे की ज़रूरत और भी महसूस हो रही थी। हल्की बारिश ने रास्ते को कोरा काग़ज़ बना दिया था जिस पर बस कभी दो, कभी चार लकीरें बनाती आगे चली जा रही थी। मैंने भाई से पूछा, ‘हिंदुस्तानी संगीत है क्या? कहाँ से आया है?’ उन्होंने बताया, ‘यह संगीत उसी सरगम से बना है जिससे क्लासिकल और फ़ोक बना है। सरगम संगीत का एल्फ़ाबेट है।’ जब मुझे यह समझ में नहीं आया तो उन्होंने मुझे एक केला खिलाया और कहा इसका स्वाद है, ‘स’। इसके बाद बस के हर पड़ाव पर मुझे अलग-अलग स्वाद के केले खिलाए और हम ‘स’ से ‘नि’ तक पहुँच गए। एक केले और दूसरे केले के बीच जो अंतर समय और जगह का था, उन्होंने कहा ये है श्रुति। पश्चिमी संगीत की भी सरगम है। हमारी सरगम और उनकी सरगम में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन श्रुति का उपयोग हमारे संगीत में बहुत अलग है। ‘हमारा गीत सुरों के इतने छोटे-छोटे हिस्सों में बँटा होता है कि हमें पता ही नहीं लगता कि हम एक स्वर से दूसरे स्वर पर कब पहुँच गए। स्वर नदी के पानी या कहें हवा की तरह आगे बढ़ जाता है। वेस्ट की घड़ी अटक-अटक कर चलती है इसीलिए एक स्वर से दूसरे स्वर की दूरी हमें साफ महसूस होती है। लेकिन हमारे संगीत में घड़ी लगातार एक ही रफ़्तार पर चलती है।’ हमारे संगीत में ऐसा क्यों है तो वह कहने लगे, ‘नेचर में वक़्त भी ऐसे ही चलता है, हमारा संगीत ये सिखाता है। यदि तुम जागे हुए नहीं हो तो तुम्हें पता नहीं लगेगा कि समय कब गुज़र गया और ये बहुत ख़तरनाक हो सकता है।’

उन्होंने कहा, जब बीसवीं सदी में हिंदुस्तान का इतिहास लिखा जाएगा, फ़िल्मी संगीत की ईजाद को इंडिया की एक इंक़लाबी कला का दर्जा मिलेगा। उनको इस बात का पूरा भरोसा था कि आर सी बोराल, पंकज मलिक, मास्टर ग़ुलाम हैदर, अनिल विश्वास, सी. रामचंद्र, नौशाद और सज्जाद हुसैन इनको एक दिन वही दर्जा मिलेगा जो तानसेन, बैजू बावरा, अमीर ख़ुसरो और स्वामी हरिदास का है। फ़िल्म में साउंड टेक्नोलाॅजी आने से पहले मूक सिनेमा था। आर सी बोराल जैसे संगीतकार साउंड आने से पहले लाइव आरकेस्ट्रा, जैसे आपेरा में होता है, स्क्रीन के पास बैठ के बजाते थे और यह संगीत फ़िल्म में जान डाल देता था। वर्ना सिर्फ़ तस्वीरें भूत जैसी लगती थी। हमारे लोक संगीत ने उसमें इंसानियत डाली। उनका विचार था, सही फ़िल्म संगीत रवींद्रनाथ टैगोर, नज़रुल इस्लाम, उत्तर प्रदेश के कोठों और नौटंकी से आया है। इसमें छोटे, बड़े सबका योगदान है। सिनेमा सामान्य लोगों के लिए है। इसमें शास्त्रीय संगीत नहीं चलता। रवींद्रनाथ टैगोर के लिए भी शास्त्रीय संगीत का उस्ताद रखा गया था। लेकिन उन्होंने तो सीखने से ही इंकार कर दिया। जब वह इंगलैंड गए तो उन्हें वहाँ का इंग्लिश और आयरिश सादा गीत बहुत पसंद आया। नज़रुल इस्लाम ने भी बंगाली लोक संगीत से प्रभावित होकर सादी कविता जिसे लोग समझ सकंे, सरल धुन में बाँधी जो कोई भी गुनगुना सके। उन्होंने कहा रवींद्र और नज़रुल ने फ़िल्म के लिए गीत तैयार नहीं किये, लेकिन हमारे संगीतकारों ने उनसे प्रेरणा ली कि अच्छे संदेश वाली कविता को सीधी-सादी सुंदर धुन में पिरोया जा सकता है जिससे लोगों को केवल आनंद ही नहीं कुछ सीखने को भी मिले। होशियार के लिए इशारा ही काफ़ी होता है। रवींद्रनाथ टैगोर और नज़रुल इस्लाम के गीतों से प्रेरणा लेकर हमारे संगीतकारों ने अपने गीत सजाए और फ़िल्म संगीत को इतिहास बना दिया। इसमें कोई शक नहीं कि सिनेमा एक टेक्नोलाॅजी है जिससे हिंदुस्तान की तस्वीर बनाई जा सकती थी। लेकिन फ़िल्म संगीत के बिना यह हिंदुस्तानी नहीं हो सकती थी। फ़िल्म संगीत ने इसे देशी बनाया। पुरानों धागों से नया कपड़ा बुना गया। मैंने उनसे पूछा, ‘फिर क्यों पढ़े-लिखे लोग हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत को घटिया समझते हैं?’ उनका जवाब था, ‘हर पढ़ा-लिखा आदमी अक़्लमंद नहीं होता। जो इस संगीत को घटिया कहते हैं, वे इस संगीत के बारे में नहीं अपने बारे में बता रहे होते हैं।’

(जारी)

Thursday, October 10, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – २

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – २

(पिछली पोस्ट से जारी)

साउथ एशिया की आज़ादी

हिंदुस्तान की आज़ादी ज़लज़ले की तरह आई जिसने हज़ारों मासूम लोगों को निगल लिया. हमारे यहाँ सियासी मामलों पर बात नहीं होती थी. लेकिन हिंदुस्तान के टुकड़े होने की बात चलती तो अय्यूब के चेहरे पर काले बादल छा जाते. वह कहते जिस इतिहास ने मास्टर ग़ुलाम हैदर, नूरजहाँ, खुर्शीद अनवर, फ़ीरोज़ निज़ामी, ए आर चिश्ती और रफ़ीक़ ग़ज़नवी को हिंदुस्तान से अलग कर दिया, उसमें कोई अच्छाई नहीं हो सकती. वह कहते हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत की मिठास हमेशा के लिए कम हो गई है और कम रहेगी.


साउथ एशिया की आज़ादी की ख़बर 1949 में उस दिन आई जब शहीद फ़िल्म का दो पार्ट का मार्चिंग गीत ‘वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हो’ आया. ये गाना सुनकर मेरे भाई कहने लगे, ‘लगता है वहाँ कुछ हुआ है.’ ये गीत मास्टर ग़ुलाम हैदर ने कंपोज़ किया था. हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत के वे पायोनियर संगीत निर्देशक थे जो नूरजहाँ, शमशाद बेगम, सुरेन्द्र कौर और लता मंगेशकर को फ़िल्मों में लाए. ये गीत बनाने के बाद हौसला हार कर वे पाकिस्तान चले गए. जब शहीद फ़िल्म अफ़रीक़ा में आई तो ब्रिटिश सरकार ने उसे बैन कर दिया.


भाई अय्यूब उन नौजवानों में थे, जिन्होंने थियेटर के बाहर हंगामा किया. नतीजा ये हुआ कि फ़िल्म को सेंसर कर दिखाया गया. उसमें से तिरंगा फहराने वाला दृश्य काट लिया गया. ये फ़िल्म देखने के बाद हमारे शहर के हर नौजवान की हेयर स्टाइल बदल गई थी. थोड़े ही वक़्त बाद पाकिस्तान से ख़बर आई कि ग़ुलाम हैदर चल बसे. मेरे भाई ने रात अफ़सोस में मैख़ाने में गुज़ारी.

गाँधी, नेहरू और जिन्ना से क्या हुआ, भाई की उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्हें तो कलाकारों के बिछड़ने का ग़म था. उनकी फ़ेवरेट फ़िल्म राजकपूर की आग थी. वह बड़ी ख़ुशी से मुझे दिखाने के लिए ले गए थे. फ़िल्म में हीरो का चेहरा आधा जल जाता है और वह बदसूरत हो जाता है. उन्होंने कहा, "यह फ़िल्म हीरो - हीरोइन की नहीं, एक मुल्क की कहानी है":


जिंदा हूँ इस तरह कि ज़िंदगी नहीं
जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं.



"ये हीरो कोई नहीं वह हिंदुस्तान है जो पार्टिशन में आधा जल गया." हर फ़िल्म, हर गीत उनके लिए एक किताब थी. वह उनमें हर तरह से उनका सियासी अर्थ समझने की कोशिश करते. जुगनू फ़िल्म का मशहूर गीत, ‘यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई सिवा क्या है’ इसे वे रोमांटिक गीत नहीं सियासी गीत मानते थे. उनका कहना था, कौन किससे बेवफ़ा हुआ ये निर्भर करता है, कौन बॉर्डर के किस तरफ़ है:

यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है
इसी का नाम दुनिया है.



एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी गीत की खोज के सफ़र की इब्तिदा

1953 में मेरे भाई अय्यूब टांगा से क़रीब 80 मील दूर टांगा-मोशी रेलवे लाइन पर एक साइसेल स्टेट में काम करने चले गए. साइसेल अफ़रीक़ा अफ़रीक़ा का जूट था. उससे रस्सी और बोरियाँ बनाई जाती थीं. ये व्यापार ही उस इलाके की रोज़ी रोटी का ज़रिया था. हर काम साइसेल की फ़सल से जुड़ा हुआ था. अप्रैल में बारिश का महीना शुरू ही हुआ था. मैं उस समय करीम जी सैकेंडरी स्कूल में आठवीं क्लास में पढ़ता था. घर में हिसाब के टीचर मास्टर दया भाई के डंडों के डर से पाइथोगोरस की थियोरम बारबार दोहरा रहा था. लेकिन फिर भी याद नहीं हो रही थी. मास्टर दया भाई के जगत में बहुत कुछ था पर दया का नामोनिशाँ नहीं था. उसी समय भाई अय्यूब आए. घर में अचानक हलचल-सी मच गई. हम सब अपनी अपनी परेशानियाँ भूल गए. उन्होंने मुझसे कहा, ‘कल हम सफ़र पर चलेंगे.’ उन्होंने बताया, ‘मोरोगोरो शहर में, एक हाजी के घर में ”कोई प्रेम का देकर संदेशा“ गाना है, बहुत मुश्किल से हमने बात बनाई है कि हम वहाँ जाकर गीत सुन सकते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘यह सिनेमा संगीत की बात है, थियोरम की नहीं. वह तो तुम कल भी याद कर लोगे. अब या तो इतिहास से जुड़ जाओ या स्कूल जाओ. मास्टर जी को चिट्ठी मैं लिख दूँगा कि शादी ब्याह का मामला है, तुम्हें बाहर जाकर रहना पड़ रहा है.’ मेरे लिए ईद के दिन दिवाली हो गई. उसी रात तैयारी की. पोटली लेकर सुबह-सुबह हम दोनों ट्रेन पर चढ़ गए. आगे बढ़ती जा रही ट्रेन के दोनों ओर काजू के पेड़ों पर परिंदे मंडरा रहे थे. मुझे ऐसा लगा, ये भी काजू की ख़ू़बसूरती को एप्रीसिएट कर रहे हैं. एक के बाद एक स्टेट आते रहे. वे क़ब्रिस्तान आते रहे जिनमें हिंदुस्तान के वे सैनिक दबे थे जिनकी किसी को याद नहीं.

पढ़े फ़ातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाये क्यों
कोई लाके शम‘अ जलाए क्यों, मैं वो बेकसी की मज़ार हूँ ...

जो उजड़ गया वो दयार हूँ.


मेरे भाई समझाने लगे, "साइसेल को साइसेल न समझो. यह वह धागा है जिससे हमारी ज़िंदगी पिरी हुई है, अगर यह टूट गया तो हम बिखर जाएंगे."

उस जगह से बहुत दूर, कोरिया की जंग हो रही थी. उससे साइसेल की क़ीमत बहुत बढ़ गई. इसे सोने का धागा कहा जाने लगा. भाई कहते जब तक जंग चलेगी, हमारी ज़िंदगी का कारोबार भी अच्छा रहेगा. लड़ाई में कौन अपाहिज हुआ और कौन मर रहा था, इसकी उन्हें कोई फ़िक्र नहीं थी. उनको इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि पड़ोस के कीनिया में माउमाउ ग़दर के साथ वहाँ आज़ादी का आंदोलन शुरू हो गया है. जब वह बात कर रहे होते, तो फ़िल्मफेयर पर उनकी निगाह होती जिसमें उनके लिए सही ज़िंदगी थी. जानूवाला की दूकान से फ़िल्मफ़ेयर उन्होंने ख़रीदा था जो उसमें कुछ सिलवटें थीं. बारबार वह उन्हें निकालने की कोशिश कर रहे थे और जानूवाला को भला-बुरा कहते जाते कि वह फ़िल्म मैगज़ीन की इज़्ज़त नहीं करता. हर पन्ने की सिलवट जानूवाला के जु़ल्म का सबूत था. पहला फ़िल्मफेयर एवार्ड बैजू बावरा के संगीतकार नौशाद को फ़िल्म के मशहूर गीत ‘तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा’ के लिए मिला.


अकेले मत जाइयो, राधे जमुना के तीर ...
ओ जी ओ, तू गंगा की मौज, मैं जमुना का धारा.


मेरे भाई को गहरा अफ़सोस था. वह कहते, "बेशक बैजू बावरा के गाने बढ़िया हैं. रागों में हैं, लेकिन ये इनाम सी रामचंद्र को अनारकली के लिए मिलना चाहिए था. उस संगीतकार को जिसने आना मेरी जान, मेरी जान संडे के संडे गीत बनाकर जैज़ संगीत के दीपक से हमारे संगीत को उजला किया." आखि़र उन्होंने कहा, "जिंदगी और इंसाफ़ का कोई तालमेल नहीं. हमारे जीने का मक़सद यही है कि हम एक दूसरे को ताक़त दें कि वह ज़िंदगी की बेइंसाफ़ी समझ सके."


गुज़रती हुई ट्रेन के बाहर उड़ते हुए बादलों की छाया दौड़ रही थी. उन्होंने कहा, "काश हमारे साथ कोई कैमरामेन होता, एक ऐसा सीन बनाते जिसमें हीरो बादलों के पीछे भाग रहा है, इस तरह जैसे इंसान वक्त को पकड़ने की कोशिश में.... हाँ, इससे भी बेहतर सीन हो सकता है, बादल इंसान के पीछे भाग रहा है, वक़्त की तरह और उसे अपने शिकंजे में ले रहा है." इस सोच पर वह खूब हँसे कि भई ज़िंदगी भी क्या चीज़ है.


हमारे बुज़ुर्ग यह भी कहते, मेरे भाई की कहानी चार लफ़्जों में लिखी जा सकती है - सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब. मेरे भाई कहते, सिगरेट उनके अकेलेपन की साथी है. शराब थोड़ी देर के लिए गुनाहों से राहत दिलाती है और सिनेमा की कहानी ज़िंदगी को समझने में मदद करती है. सिगरेट पीना उन्होंने हॉलीवुड के अभिनेता हम्फ़्री बोगार्ट से सीखा था. उन्हें बोगार्ट इसलिए पसंद था कि वह कहते बोगार्ट के चेहरे में दो पैग़ाम हैं. एक तो यह कि ज़िंदगी का रिटर्न टिकट नहीं है, और दूसरा कि जिंदगी एक बेइलाज रोग है. वह बारबार उनकी फ़िल्में यह देखने के लिए जाते कि दोनों में से किस पैग़ाम में ज्यादा सच्चाई है. बोगार्ट को लोग प्यार से बोगी कहते थे. चालीस के दशक में उन्होंने हम्फ़्री बोगार्ट की मशहूर फ़िल्म कैसाब्लान्का देखी जो उनकी ज़िंदगी में दोहराती रही. कैसाब्लान्का में बोगी ने रिक का रोल अदा किया था. एक आदमी उससे पूछता है, भई तुम सहारा में क्यों आए हो? जबाब था, पानी ढूंढ़ने आए हैं. भाई कहते यह डायलॉग तो हॉलीवुड ने प्लेजराइज़ किया है. ये ख़याल तो इंडिया से आया है. ऐसी सोच तो हिंदुस्तान के लोगों में होती है. उसके बाद तो जब कभी सफ़र पर जाते तो, तो जब भी कोई उनसे पूछता आप कहाँ गए थे, तो उनका जबाब होता पानी ढूंढ़ने.

हालाँकि वह भाई थे, मुझे उनकी शक्ल आज भी साफ नज़र नहीं आती क्योंकि उनकी आधी शक्ल तो सिगरेट के धुएँ से ढँकी रहती थी. घुआँ उनके चेहरे तक पहुँचने में रोशनी का इम्तिहान लेता. हम्फ़्री बोगार्ट की जो भी फ़िल्म टांगा के मैजेस्टिक सिनेमा में आई, वह घायल हुई. वह फ़िल्म को अपने अफ़्रीकी दोस्त उम्टो के साथ देखते थे. अगर कोई सीन पसंद आ जाता तो उम्टो उसे वहीं रोक लेता, तो फ़िल्म जल जाती और वह हिस्सा काटकर, अनवर स्टूडियो ले जाते और बोगी के सिगरेट के अंदाज़ की फ़ोटो खिंचवाते. अनवर का उनसे वादा रहता कि वह किसी ओर की ऐसी तस्वीर नहीं लेंगे. बाद में हम्फ़्री बोगार्ट द अफ़्रीकन क्वीन बनाने के लिए अफ़्रीका आए. भाई को ज़िंदगी भर अफ़सोस रहा कि ज़ायर में जहाँ वह फ़िल्म बनी थी, वह जा नहीं सके.


शराब उन्होंने पी. सी. बरुआ की फ़िल्म देवदास से सीखी जिसके नायक के एल सहगल थे. शराब के साथ वह गाना भी गाते. उन्हें हमेशा गिला रहा कि सहगल अफ़्रीका नहीं आए. बाद में जब अय्यूब की जिंदगी के बात उठती तो बुजु़र्ग कहते, बचपन में वह मोंबासा में देवदास देखकर आया था, तो फ़िल्म को उसने हाथ की लकीर बना लिया. लोग उन्हें टांगा का सहगल कहते. ‘लाई हयात आई क़ज़ा, ले चले ले चले.अपनी ख़ुशी न आए, न अपनी खु़शी चले’ (ज़ौक) उनकी पसंदीदा ग़ज़ल थी. इसमें उन्होंने ज़िंदगी का अर्थ ढूँढ़ा.


वह बताते कि फ्रांस की अस्तित्ववाद की फ़िलासोफ़ी इसी गीत में से चुराई गई है. जो फ़्रांस के लिए नयी बात थी वह हिंदुस्तान में कब से चली आ रही थी. एक दिन मैंने पूछा, यह अस्तित्ववाद है क्या? तो उन्होंने मुझे यूनान के हीरो सिसिफ़स के बारे में बताया जब उसने यूनानी ख़ुदा ज़ूस से मुकाबला किया तो ज़ूस ने उसे यह सज़ा दी कि वह एक बहुत भारी पत्थर पहाड़ पर ले जाऐ. लेकिन पत्थर ऊपर ले जाने पर नीचे लुढ़क जाता. वह ज़िंदगी भर पत्थर ढोता रहा. मैंने उनसे पूछा जू़स ने सिसिफ़स को यह सज़ा क्यों दी? तो उन्होंने समझाया यूनान का ख़ुदा ज़ूस आसमान का ख़ुदा नहीं ज़मीनी ख़ुदा था. ऐसा जिसमें इंसानी कपट भी होता है. हुआ यह कि ज़ूस को नदी के देवता की बेटी से प्यार हो गया. उसे मालूम था कि लड़की का पिता उसे लड़की कभी नहीं देगा. तो ज़ूस ने उसे चुरा लिया. मैंने उनसे पूछा. सिसिफ़स ने ज़ूस का मुक़ाबला क्यों किया. उन्होंने कहा सिसिफ़स के दिल में एक इंसान का दिल धड़क रहा था. उसे एक बाप की पीड़ा सही माप था. लेकिन सिसिफ़स ने इसे सज़ा समझा ही नहीं. उसने यह समझ लिया कि यही जिंदगी है. इसे तो करना ही है. फिर शिकायत कैसी? सिसिफ़स ने सज़ा को अपनी आज़ादी का मंसूबा बना लिया. फ़्रांस के दार्शनिक आल्बेयर कामू के अस्तित्ववाद का अर्थ उन्होंने मुझे इस तरह समझाया था.

भाई साहब बड़ी किताबें नहीं पढ़ते थे. वह कहते बड़ी किताबें मुल्लाओं, पंडितों के लिए हैं, ऊँचे लोगों के लिए हैं. उनका माध्यम था, तस्वीरों वाली पत्रिकाएँ जो आम लोग पढ़ते हैं - लाइफ़, टाइम, लुक, इलस्ट्रेटेड वीकली आफ़ इंडिया, फ़िल्मफेयर, फ़िल्म इंडिया इत्यादि. यही उनका साहित्य था. हिंदुस्तानी फ़िल्म मैगज़ीन को वह सबसे ऊँचा दर्जा देते थे. जब कभी उनके दोस्त मिलने आते तो वे उन्हें मैगज़ीन देते हुए कहते ये है वक़्त, ये है ज़िंदगी और ये ठहरी झलक, अब ख़ुद फ़ैसला कर लो. उनकी नज़र में हिंदुस्तान की बोलती, गाती, नाचती फ़िल्म दुनिया की कलाओं में सबसे ऊँची थी. वह इसलिए कि कैमरा ज़िंदगी के हर पहलू तक नहीं पहुँच सकता. यह बात हिंदुस्तान के फ़िल्म बनाने वालों ने अच्छी तरह समझ ली थी. जो चीज़ें फ़िल्म में दिखाई नहीं देतीं उन्हें फ़िल्म में कैसे लाया जाए, यह अहम मुद्दा फ़िल्म डाइरेक्टरों ने हल किया. गीत फ़िल्म में वह पार्ट अदा करता है जो कैमरा नहीं दिखा सकता, वह है जज़्बात. ऐसी फ़िल्म में हर कला एक दूसरी कला से जुड़कर एक मुकम्मल पैग़ाम देती है, जो हिंदुस्तान की संगीत के उसूलों पर है. देवदास का एक गीत भाई को बहुत पसंद था: ‘बालम आय बसो मोरे मन में’. वह कहते यह गीत इतना खू़बसूरत है कि म्यूज़ियम में तस्वीर की तरह टाँगना चाहिए. यह गीत न तो बोलों में है और न ही स्वरों में. स्वरों के बीच जो मौन है, उसमें सहगल की जाती हुई रूह की आवाज़ है. बारबार गीत बजाकर सरोद के काले स्वरों के बीच-बीच में पूछते, कुछ सुनाई पड़ रहा है? जब मैं कहता यह तो साइलेंस है, तो वह कहते तुम बहरे हो. वह मानते थे कि फ़िल्म फ़ानी है, गीत अमर है.

बालम आय बसो मोरे मन में.


(जारी)

Wednesday, October 9, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – १

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब - १

इधर तीन से लगी सज्जाद हुसैन वाली पोस्ट्स के बाद मुझ से कई मित्रों ने आग्रह किया है कि मैं ‘जलसा’ से साभार ली गयी कबाड़खाने में छपी एक सीरीज़ को दोबारा से पोस्ट करूं. सो यारों का आदेश सिर आँखों पर – आज से पुनः पढ़िए इस श्रृंखला को – 


जलसा का दूसरा अंक छप कर आ चुका है. निर्वासन इस अंक की थीम है और क्या शानदार सामग्री जुटाई है सम्पादक श्री असद ज़ैदी ने.

इस अंक में मुझे सबसे ज़्यादा आकृष्ट किया जनाब अशरफ़ अज़ीज़ के क़िस्सों ने. यह कबाड़ख़ाने के पाठकों की ख़ुशक़िस्मती है कि इस शानदार रचना को हमारे लिए असद जी ने न केवल पोस्ट करने की अनुमति दी बल्कि ख़ुद ही इस पूरे गद्य को यूनीकोड में कन्वर्ट करके मुझे भेजा. बहुत शुक्रिया उनका. लीजिए पेश है पहला हिस्सा -


(द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पूर्वी अफ़रीक़ा में मज़दूरी करने गए और फिर वहीं बस गए एक भारतीय परिवार में अशरफ़ अज़ीज़ का जन्म हुआ. हिन्दुस्तानी फ़िल्में और फ़िल्म संगीत बचपन और जवानी के साथी रहे - इन्हीं से उनने और उनके भाइयों ने अपनी हिन्दुस्तानी - बल्कि दक्षिण एशियाई - सांस्कृतिक पहचान हासिल की. तंज़ानिया और युगांडा में शिक्षाप्राप्ति के बाद वह छात्रवृत्ति पर अमरीका चले गए. वहाँ 1964 में उन्होंने विस्कॉन्सिन-मेडिसन विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में पी एच डी की. तब से वह वाशिंगटन के हॉवर्ड विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ़ मेडिसिन में शरीरविज्ञान पढ़ाते हैं. दक्षिण एशिया की पॉपुलर कल्चर पर उनका काम बहु-प्रशंसित है.

यह संस्मरणात्मक वार्ता रेडियो फ़ीचर के रूप में 1997 में वॉयस ऑफ़ अमेरिका की हिन्दी सेवा द्वारा प्रसारित की गई थी. इसे वयस ऑफ़ अमेरिका की विजयलक्ष्मी देसराम ने रिकार्ड किया. लिप्यान्तर और प्रसारण के लिए पाठ उन्हीं का तैयार किया हुआ है. रेडियो के इतिहास में ऐसी दिलचस्प और जादुई वार्ता - ख़ासकर हिन्दी-उर्दू में - शायद ही कभी सुनने को मिली हो. इसे छापने की अनुमति देने के लिए हम अशरफ़ साहब और विजयलक्ष्मी जी और पाठ की प्रति उपलब्ध कराने के लिए सिने-चिंतक जवरीमल पारख के आभारी हैं. 'जलसा' के नए अंक जलसा २०११ - निर्वासन में प्रकाशित इस वार्ता का मूल शीर्षक है : सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब उर्फ़ जाते हो तो जाओ हम भी यहाँ यादों के सहारे जी लेंगे यानी ईस्ट अफ़रीक़ा में हिंदुस्तानियों का सफ़र, हिंदुस्तानी संगीत के सहारे संगीतकार सज्जाद हुसैन की खोज में)


वो रात दिन वो शाम की गुज़री हुई कहानियाँ
जो तेरे घर में छोड़ दीं प्यार की सब निशानियाँ
- हसरत जयपुरी

साहित्य के बग़ैर इतिहास में कोई ज़िन्दगी नहीं है. वह बेमतलब की तारीख़ों की एक फ़ेहरिस्त है. फिर भी, जो इतिहास लिखा भी गया है, उसमें न तो जनता है और न जीते-जागते इंसान. शहंशाह हैं, राजा हैं, नवाब हैं या ठाकुर. लेकिन जो मुल्क को काँधे पर उठाये थे, वो बेनाम हैं. उनका नाम हमें लोक कला में मिलता है उनके लोक गीतों, पाक विद्या, उनके लिबास और उनकी कहानियों में. हिंदुस्तान का फ़िल्म संगीत उनके इंडिपिडेंस के साथ ही शुरू हुआ और इसे आज़ादी के संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता. मैं इतना दाना नहीं कि कहानी लिख सकूँ. हाँ, कहानी की शक्ल में अपनी कुछ पुरानी यादें साउथ एशिया की पचासवीं साल गिरह पर जागी हैं वह आप तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास है. शायद ये आपके कुछ काम आए.


1860 में हिंदुस्तानियों का पहला बनवास और उसके कारण

चाय, शक्कर, रेल और जंग हिंदुस्तान के हज़ारों लोगों की ग़ुलामी और कठोर ज़िदगी की देन बने. पिछली सदी में ब्रिटिश राज में शहंशाह बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून में बेबस जिंदगी जीने पर मजबूर करने के बाद भारत के उत्तर और दक्षिण दोनों इलाकों से हज़ारों की संख्या में लोगों की मज़दूरी के लिए जहाज़ों में भरकर करीबियाई द्वीप, दक्षिण अफ़रीक़ा, पूर्व अफ़रीक़ा, हांगकांग, मलेशिया, सिंगापुर और फ़िजी ले जाया गया. इस तरह बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून भेजा जाना हिंदुस्तानियों के भविष्य का संकेत बना.

हमारा परिवार ज़िला स्यालकोट से है. लेकिन मेरे माता-पिता का बचपन खडगपुर में बीता. मेरे दादा और नाना ब्रिटिश इंडिया रेलवे में कारीगर थे. मेरे दादा उस दौरान पूर्वी अफ़रीक़ा में, मोंबासा से वोई तक की सौ मील की पहली रेल पटरी डालने के लिए 1896 में पंजाब से मोंबासा गए और काम पूरा होने पर लौट आए.


हमारे बनवास का दूसरा दौर मेरे माता-पिता ने शुरू किया जो पहली जंग के बाद टांगानिका (तंज़ानिया) के टांगा शहर में बस गए. हिंद महासागर में एक छोटा सा बंदरगाह, जर्मन ईस्ट अफ़रीक़ा की राजधानी था. पहली लड़ाई में शहीद हुए हिंदुस्तानियों के निशान टांगा और मोशी के बीच बिछी रेलवे लाइन के दोनों ओर आज भी नज़र आते हैं. सेना में जो मुसलमान थे, उनके फिर भी क़ब्रों के निशान हैं लेकिन हिंदुओं और सिक्खों के वजूद तो अगरबत्ती की महक की तरह फ़िज़ा में गुल हो गए हैं. उनके बलिदान का सबूत है, ब्रिटेन की जीत.


न किसी की आँख का नूर हूँ,
न किसी के दिल का क़रार हूँ,
जो किसी के काम न आ सके
वो एक मुश्ते गु़बार हूँ.

हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत से पहली मुलाक़ात


पहली लड़ाई के बाद लीग ऑफ नेशन ने टांगानिका ब्रिटेन को सौंप दिया. फिर तो इस देश को आबाद करने के लिए और भी हिंदुस्तानी वहाँ पहुँचे. मेरे पिता टांगामोशी रेलवे के मुलाज़िम थे. इस तरह हमारी जिंदगी का कारोबार चलने लगा. मुझे इस बात पर आज भी ताज्जुब है कि वो धमाका जिसने हिरोशिमा और नागासाकी को राख बनाकर इतिहास को नया मोड़ दिया, उसकी मुझे कोई याद नहीं. लेकिन ये साफ़ याद है, 1945-46 में मेरे सबसे बड़े भाई मसूद कीनिया के सबसे बड़े पोर्ट शहर मोंबासा से एक ग्रामोफ़ोन और कुछ 78 आरपीएम रिकार्ड ख़रीद कर लाए. उस शहर में हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत ने पहला क़दम हमारे घर में रखा था. रात की दूधिया चांदनी में, घर के बरांडे में, पहला फ़िल्मी गीत जो मैंने सुना था, वह था नूरजहाँ का गाया फ़िल्म विलेज गर्ल का गीत, ‘बैठी हूँ तेरी याद का लेकर ये सहारा’. इंतज़ार के इस गीत में नूरजहाँ की आवाज़ मुझे बेहद सुरीली और जोश भरी लगी.


बैठी हूँ तेरी याद का लेकर ये सहारा 
आ जाओ कि चमके मेरी क़िस्मत का सितारा.


हमारे बड़े भाई ने तुरंत कहा, ‘भाई गीत नूरजहाँ गा रही है, लेकिन संगीतकार हैं, श्यामसुंदर.उस दिन दूसरा गीत जो उन्होंने बजाया वह फ़िल्म दोस्त का था, लेकिन आवाज़ नूरजहाँ की ही थी. संगीतकार थे, सज्जाद हुसैन. कोई प्रेम का देके संदेसा हाय लूट गया, हाय लूट गया.भाई साहब ने बड़े अंदाज़ से कहा, ‘जिस होनहार नौजवान संगीतकार ने संगीत दिया है, आने वाले समय में बहुत चमकेंगे.


आज मेरे दिल का शीशा 
हाय टूट गया, हाय टूट गया.

उस रात के बाद भाई जब भी मोंबासा जाते वहाँ की मशहूर सलीम रोड के शंकर दास एंड संज़ से रिकार्ड ले आते. टांगा और मोंबासा की दूरी लगभग 120 मील की है. उस ज़माने में रास्ते कच्चे थे. थोड़ी ही बरसात में कीचड़ से भर जाना आम बात थी. बारिश में वहाँ की लूंगा लूंगा नदी में पंटून (फ़ेरी) की आवाजाही बंद हो जाती. और फिर मोंबासा पहुंचने के लिए एक और फ़ेरी लिकोनी पर जाना पड़ता था. बचपन में लगता था, मोंबासा चांद के पार है. फ़िल्मी गीत वहीं से आते हैं.

सबसे बड़े भाई पिता समान थे. बहुत से कामों की शुरुआत उन्होंने की. ग्रामोफ़ोन और फ़िल्मों के गीत भी घर में वही लाए. उन्हें संगीत से लगाव था लेकिन उनसे छोटे भाई अय्यूब को तो फ़िल्मी संगीत और फ़िल्मों का जूनून था. जबकि मैं सोचता था कि हिंदुस्तानी फ़िल्मों और उनके गीतों को अलग नहीं किया जा सकता. हालाँकि अय्यूब सगे भाई थे, लेकिन मुझे लगता था कि वह आधे हमारे साथ हैं और आधे फ़िल्मों की स्क्रीन में हैं. क़द के छोटे थे, आवाज़ भारी और अदाओं की वजह से बडे़ भाई से भी बड़े लगते थे. वह पुरानी फ़िल्मों - पृथ्वी वल्लभ, सिकंदर और पुकार - का ज़िक्र करते समय एक साथ तीन-चार भूमिकाएँ करते. उन्हें इन फ़िल्मों का एक एक डायलॉग याद था. जो फ़िल्में मैंने नहीं देखी थीं, उनकी एक्टिंग से मुझे आज भी लगता है कि मैं उन्हें देख चुका हूँ. यह फ़िल्में उन्होंने बचपन में मोंबासा में देखी थीं. पुकार फ़िल्म में चंद्रमोहन और सोहराब मोदी की एक्टिंग और डायलॉग को वो सिनेमा की कला की हद मानते थे. उनका कहना था कि अभिनेताओं के बीच दो बातें नहीं हो रही थीं, तलवारें चल रही थीं. और उनके डायलॉग से कहानी आगे बढ़ रही थी. उनकी नज़र में मोतीलाल और अशोक कुमार ही सिनेमा के सही आर्टिस्ट थे क्योंकि इन दोनों की एक्टिंग बड़ी सधी हुई थी. लेकिन ये बड़ी दिलचस्प बात थी कि भाई स्वयं सोहराब मोदी और चंद्रमोहन की (पारसी) थियेटर वाली एक्टिंग करते थे. इस बारे में उनकी सोच थी कि अगर वे ख़ुद भी सिनेमा में होते तब वह मोतीलाल बनते.

ये मेरी खु़शकिस्मती है कि अय्यूब मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े थे, परंतु उनका हर छोटे, बड़े के साथ दोस्त का सा व्यवहार था. उनके साथ बैठकर कभी महसूस नहीं हुआ कि बड़े भाई के साथ बैठे हैं, बल्कि जिगरी दोस्त का एहसास होता.


हमारे शहर के पहले सिनेमाघर का नाम था मैजेस्टिक. ये पहले युद्ध के सिपाहियों के क़ब्रिस्तान के सामने था. भाई ने समझाया था, सिनेमा और क़ब्रिस्तान का गहरा संबंध है. सिनेमा इंसान की मौत का रिकार्ड है. कहते, सहगल चल बसे लेकिन देवदास फ़िल्म में हम उन्हें बारबार मरते देख सकते हैं. मैजेस्टिक में हमने पहली हिंदुस्तानी फ़िल्म रतन देखी थी. वो मुझे कंधे पर बिठा कर ले गए थे. शाम का समय था. ऊंचाई से मैंने देखा, क़ब्रिस्तान लोगों से भरा हुआ है. ये वह लोग थे जिन्हें फ़िल्म के टिकट नहीं मिले थे. वहाँ अच्छी खासी जंग चल रही थी. मुझे लगा, ऐसी हालत में आज तो फ़िल्म नहीं देख सकेंगे. भाई ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘हमने सब बंदोबस्त किया हुआ है.बड़े भाई अय्यूब की दोस्ती सिनेमा के प्रोजेक्शनिस्ट अफ़रीक़ी भाई उम्टो से थी. उन्होंने उम्टो को समोसे खिलाकर पहले ही टिकट लिये हुए थे. फ़िल्म रतन में करन दीवान और स्वर्णलता पर फ़िल्माए गीतों की याद आज भी ताज़ा है. अँखियां मिलाके, जिया भरमाके, चले नहीं जाना/ ओ, ओ चले नहीं जाना’. रतन के गीतों ने विलेज गर्ल और दोस्त के गीतों को धूमिल कर दिया. लेकिन ये गीत पुराने गीत जो चमड़े के ख़ूबसूरत बैग में संभालकर रखे हुए थे, हम लोग कभी कभी रात की तनहाई में बजाते.


अँखियाँ मिलाके...

संगीतकार सज्जाद अपनी बदमिज़ाजी की वजह से मशहूर होते रहे. उनके साथ के संगीतकार थोड़े ही वक़्त में एक के बाद एक सीढ़ियाँ चढ़ते आगे बढ़ गए. एक दिन मेरे भाई मसूद के एक दोस्त ने कोई प्रेम का देके संदेशारिकार्ड लिया, तो कभी लौटाया नहीं. हमारे यहाँ उसूल था कि कोई हमारे यहाँ से कोई चीज़ उधार लेकर गया है, तो वही लौटाएगा, हम उसे याद नहीं दिलाते. आज तक उस रिकार्ड के खोने का अफ़सोस पूरे परिवार को है. कभी-कभी भूली बिसरी याद की तरह उस रिकार्ड का ख़़याल आता तो हम उस रात की बातें करते जब हमने यह गीत पहली बार अपने घर में सुना था. सज्जाद के बारे में चर्चा होती कि वह क़ुदरत का ऐसा तराशा हुआ हीरा है, जिसका इल्म न तो हिंदुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री को, न ही फ़िल्म संगीत को चाहने वालों को है.

(जारी)

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