Tuesday, December 25, 2012

चार्ली की कहानी चार्ली की ज़बानी




आज चार्ली चैप्लिन की पुण्यतिथि है. इस अवसर पर उन्हें याद करते हुए उनकी आत्मकथा का शुरुआती हिस्सा पेश है. अनुवाद सूरज प्रकाश का है और किताब संवाद प्रकाशन से आई थी. सूरज जी का आभार -

मेरा जन्म ईस्ट लेन, वेलवर्थ में 16 अप्रैल 1889 को रात आठ बजे हुआ था. इसके तुंत बाद, हम, सेंट स्क्वायर, सेंट जॉर्ज रोड, लैम्बेथ में रहने चले गये थे. मेरी मां का कहना है कि मेरी दुनिया खुशियों से भरी हुई थी. हमारी परिस्थितियां कमोबेश ठीक-ठाक थीं. हम तीन कमरों के घर में रहते थे जो सुरुचिपूर्ण तरीके से सजे हुए थे. मेरी शुरुआती स्मृतियों में से एक तो ये है कि मां रोज़ रात को थियेटर जाया करती थी और मुझे और सिडनी को बहुत ही प्यार से आरामदायक बिस्तर में सहेज कर लिटा जाती थी और हमें नौकरानी की देख-रेख में छोड़ जाती थी. साढ़े तीन बरस की मेरी दुनिया में सब कुछ संभव था; अगर सिडनी, जो मुझसे चार बरस बड़ा था, हाथ की सफाई के करतब दिखा सकता था और सिक्का निगल कर अपने सिर के पीछे से निकाल कर दिखा सकता था तो मैं भी ठीक ऐसे ही कर के दिखा सकता था. इसलिए मैं अध पेनी का एक सिक्का निगल गया और मज़बूरन मां को डॉक्टर बुलवाना पड़ा.

रोज़ रात को जब वह थियेटर से वापिस लौटती थी तो उसका यह दस्तूर-सा था कि मेरे और सिडनी के लिए खाने की अच्छी-अच्छी चीज़ें मेज़ पर ढक कर रख देती थी ताकि सुबह उठते ही हमें मिल जायें - रंग-बिरंगे और सुगंधित केक का स्लाइस या मिठाई. इसके पीछे आपसी रज़ामंदी यह थी कि हम सुबह उठ कर शोर-शराबा नहीं करेंगे. वह आम तौर पर देर तक सो कर उठती थी.

मां वैराइटी स्टेज की कलाकार थी. अपनी उम्र के तीसरे दशक को छूती वह नफ़ासत पसंद महिला थी. उसका रंग साफ़ था, आंखें बैंजनी नीली और लम्बे, हल्के भूरे बाल. बाल इतने लम्बे कि वह आसानी से उन पर बैठ सकती थी. सिडनी और मैं अपनी मां को बहुत चाहते थे. हालांकि वह असाधारण खूबसूरत नहीं थी फिर भी वह हमें स्वर्ग की किसी अप्सरा से कम नहीं लगती थी. जो लोग उसे जानते थे उन्होंने मुझे बाद में बताया था कि वह सुंदर और आकर्षक थी और उसमें सामने वाले को बांध लेने वाले सौन्दर्य का जादू था. रविवार के सैर-सपाटे के लिए हमें अच्छे कपड़े पहनाना उसे बहुत अच्छा लगता था. वह सिडनी को लम्बी पतलून के साथ चौड़े कालर वाला सूट पहनाती, और मुझे नीली मखमली पतलून और उससे मेल खाते नीले दस्ताने. इस तरह के मौके आत्मतुष्टि के उत्सव होते जब हम केनिंगटन रोड पर इतराते फिरते.

लंदन उन दिनों धीर-गंभीर हुआ करता था. शहर की गति मंथर थी; यहां तक कि वेस्टमिन्स्टर रोड से चलने वाली घोड़े जुती ट्रामें भी खरामा-खरामा चलतीं और इसी गति से ही पुल के पास टर्मिनल पर गोल घेरे, रिवाल्विंग टेबल पर घूम जातीं. जब मां के खाते-पीते दिन थे तो हम भी वेस्टमिन्स्टर रोड पर रहा करते थे. वहां का माहौल दिल खुश करने वाला और दोस्ताना होता. वहां शानदार दुकानें, रेस्तरां और संगीत सदन थे. पुल के ठीक सामने कोने पर फलों की दुकान रंगीनियों से भरी होती. बाहर की तरफ तरतीब से रखे गये संतरों, सेबों, नाशपाती और केलों के पिरामिड सजे होते. इसके ठीक विपरीत, सामने की तरफ नदी के उस पार संसद की शांत धूसर इमारतें नज़र आतीं.

ये मेरे बचपन का, मेरी मन:स्थितियों का और मेरे जागरण का लंदन था. वसंत में लैम्बेथ की स्मृतियां - छोटी मोटी घटनाएं और चीज़ें. मां के साथ घोड़ा बस में ऊपर जा कर बैठना और पास से गुज़रते लिलाक के दरख्तों को छूने की कोशिश करना. तरह-तरह के रंगों की बस टिकटें, संतरे के रंग की, हरी, नीली, गुलाबी और दूसरे रंगों की. जहां बसें और ट्रामें रुकती थीं, वहां फुटपाथ पर उन टिकटों का बिखरा होना. मुझे वेस्टमिन्स्टर पुल के कोने पर फूल बेचने वाली गुलाबी चेहरे वाली लड़कियां याद आती हैं जो कोट के बटन में लगाने वाले फूल बनाया करती थीं. उनकी दक्ष उंगलियां तेजी से गोटे और किनारी के फर्न बनाती चलतीं. ताज़े पानी छिड़के गुलाबों की भीगी-भीगी खुशबू, जो मुझे बेतरह उदास कर जाती थी. और वो उदास कर देने वाले रविवार और पीले चेहरे वाले माता-पिता और उनके बच्चे जो वेस्टमिन्स्टर पुल पर पवन चक्की के खिलौने तथा रंगीन गुब्बारे लिये घिसटते चलते. और फिर पैनी स्टीमर जो हौले से पुल के नीचे से जाते समय अपने फनेल नीचे कर लेते थे. मुझे लगता है इस तरह की छोटी-छोटी घटनाओं से मेरी आत्मा का जन्म हुआ था.

और फिर, हमारे बैठने के कमरे से जुड़ी स्मृतियाँ जिन्होंने मेरी अनुभूतियों पर असर डाला.

नेल ग्वेन की मां की बनायी आदमकद पेंटिंग जिसे मैं पसंद नहीं करता था. हमारे खाने-पीने की मेज़ के लम्बोतरे डिब्बे जो मुझमें अवसाद पैदा करते थे और फिर छोटा-सा गोल म्यूजिक बॉक्स जिसकी ऐनामल की हुई सतह पर परियों की तस्वीरें बनी हुई थीं. इसे देख मैं खुश भी होता था और परेशान भी.

महान पलों की स्मृतियां : रायल मछली घर में जाना, मां के साथ वहां के स्लाइड शो देखना, लपटों में मुस्कुराती औरत का जीवित सिर देखना, 'शी' देखना, छ: पेनी की भाग्यशाली लॉटरी, सरप्राइज़ पैकेट उठाने के लिए मां का मुझे एक बहुत बड़े बुरादे के ड्रम तक ऊपर करना और उस पैकेट में से एक कैंडी का निकलना जो बजती नहीं थी और एक खिलौने वाले ब्रूच का निकलना. और फिर कैंटरबरी म्यूजिक हॉल में एक बार जाना जहां लाल आरामदायक सीट पर पांव पसार कर बैठना और पिता को अभिनय करते हुए देखना.

और अब रात का वक्त हो रहा है और मैं चार घोड़ों वाली बग्घी में ऊपर की तरफ सफरी झोले में लिपटा हुआ, मां और उसके थियेटर के और साथियों के साथ चला जा रहा हूं. उनकी चाल में रमा तथा हंसी-खुशी में खुश. हमारा बिगुल बजाने वाला अपनी शेखी में हमें केनिंगटन रोड से घोड़े की साज-सज्जा की सुमधुर रुन झुन और घोड़ों की टापों की संगीतमय आवाज़ के साथ लिये जा रहा था.

तभी कुछ हुआ. ये एक महीने के बाद की बात भी हो सकती है या थोड़े ही दिनों के बाद की भी. अचानक लगा कि मां और बाहर की दुनिया के साथ सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. वह सुबह से अपनी किसी सखी के साथ बाहर गयी हुई थी और वापिस लौटी तो बहुत अधिक उत्तेजना से भरी हुई थी. मैं फर्श पर खेल रहा था और अपने ठीक ऊपर चल रहे भीषण तनाव के बारे में सतर्क हो गया था. ऐसा लग रहा था मानो मैं कुं की तलहटी में सुन रहा होऊँ. मां भावपूर्ण तरीके से हाव-भाव जतला रही थी, रोये जा रही थी और बार-बार आर्मस्ट्रंग का नाम ले रही थी - आर्मस्ट्रंग ने ये कहा और आर्मस्ट्रंग ने वो कहा. आर्मस्ट्रंग जंगली है. मां की इस तरह की उत्तेजना हमने पहले नहीं देखी थी और यह इतनी तेज थी कि मैंने रोना शुरू कर दिया. मैं इतना रोया कि मज़बूरन मां को मुझे गोद में उठाना पड़ा और दिलासा देनी पड़ी. कुछ बरस बाद ही मुझे उस दोपहरी के महत्त्व का पता चल पाया था. मां अदालत से लौटी थी. वहां उसने मेरे पिता पर बच्चों के भरण पोषण का खर्चा-पानी न देने की वजह से मुकदमा ठोक रखा था और बदकिस्मती से मामला उसके पक्ष में नहीं जा रहा था. आर्मस्ट्रंग मेरे पिता का वकील था.

मैं पिता को बहुत ही कम जानता था और मुझे इस बात की बिल्कुल भी याद नहीं थी कि वे कभी हमारे साथ रहे हों. वे भी वैराइटी स्टेज के कलाकार थे. एकदम शांत और चिंतनशील. आँखें उनकी एकदम काली थीं. मां का कहना था कि वे एकदम नेपोलियन की तरह दीखते थे. उनकी हल्की महीन आवाज़ थी और उन्हें बेहतरीन अदाकार समझा जाता था. उन दिनों भी वे हर हफ्ते चालीस पौंड की शानदार रकम कमा लिया करते थे. बस, दिक्कत सिर्फ एक ही थी कि वे पीते बहुत थे. मां के अनुसार यही उन दोनों के बीच झगड़े की जड़ थी.

स्टेज कलाकारों के लिए यह बहुत ही मुश्किल बात होती कि वे पीने से अपने आपको रोक सकें. कारण यह था कि उन दिनों शराब सभी थियेटरों में ही बिका करती थी और कलाकार की अदाकारी के बाद उससे उम्मीद की जाती थी कि वह थियेटर बार में जाये और ग्राहकों के साथ बैठ कर पीये. कुछ थियेटर तो बॉक्स ऑफिस से कम और शराब बेच कर ज्यादा कमा लिया करते थे. कुछेक कलाकारों को तो तगड़ी तन्ख्वाह ही दी जाती थी जिनमें उनकी प्रतिभा का कम और उस पगार को थियेटर के बार में उड़ाने का ज्यादा योगदान रहता था. इस तरह से कई बेहतरीन कलाकार शराब के चक्कर में बरबाद हो गये. मेरे पिता भी ऐसे कलाकारों में से एक थे. वे मात्र सैंतीस बरस की उम्र में ज्यादा शराब के कारण भगवान को प्यारे हो गये थे.

मां उनके बारे में मज़ाक ही मज़ाक में और उदासी के साथ किस्से बताया करती थी. शराब पीने के बाद वे उग्र स्वभाव के हो जाते थे और उनकी इसी तरह की एक बार की दारूबाजी की नौटंकी में मां उन्हें छोड़-छाड़ कर अपनी कुछ सखियों के साथ ब्राइटन भाग गयी थी. पिता जी ने जब हड़बड़ी में तार भेजा,"तुम्हारा इरादा क्या है और तुरंत  जवाब दो?" तो मां ने वापसी तार भेजा था,"नाच, गाना, पार्टियां और मौज-मज़ा, डार्लिंग!"

मां दो बहनों में से बड़ी थी. उनके पिता चार्ल्स हिल्स, जो एक आइरिश मोची थे, काउंटी कॉर्क, आयरलैंड से आये थे. उनके गाल सुर्ख सेबों की तरह लाल थे. उनके सिर पर बालों के सफेद गुच्छे थे. उनकी वैसी सफेद दाढ़ी थी जैसी व्हिस्लर के पोट्रेट में कार्लाइल की थी. वे कहा करते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में पुलिस से छिपने-छिपाने के चक्कर में वे गीले नम खेतों में सोते रहे. इस कारण से उनके घुटनों में हमेशा के लिए दर्द बैठ गया और इस कारण वे दोहरे हो कर चलते थे. वे आखिर लंदन में आ कर बस गये थे और अपने लिए ईस्ट लेन वेलवर्थ में जूतों की मरम्मत का काम-धंधा तलाश लिया था.


दादी आधी घुमक्कड़िन थी. यह बात हमारे परिवार का खुला रहस्य थी. दादी मां हमेशा इस बात की शेखी बघारा करती थी कि उनका परिवार हमेशा ज़मीन का किराया दे कर रहता आया था. उनका घर का नाम स्मिथ था. मुझे उनकी शानदार नन्हीं बुढ़िया के रूप में याद है जो हमेशा मेरे साथ नन्हें-मुन्ने बच्चों जैसी बातें करके मुझसे दुआ सलाम किया करती थी. मेरे छ: बरस के होने से पहले ही वे चल बसी थीं. वे दादा से अलग हो गयी थीं जिसका कारण उन दोनों में से कोई भी नहीं बताया करता था. लेकिन केट आंटी के अनुसार इसके पीछे पारिवारिक झगड़ा था और दादा ने एक प्रेमिका रखी हुई थी और एक बार उसे बीच में ला कर दादी को हैरानी में डाल दिया था.

आम जगह के मानदंडों के माध्यम से हमारे खानदान के नैतिकता को नापना उतना ही गलत प्रयास होगा जितना गर्म पानी में थर्मामीटर डालकर देखना होता है. इस तरह की आनुवंशिक काबलियत के साथ मोची परिवार की दो प्यारी बहनों ने घर-बार छोड़ा और स्टेज को समर्पित हो गयीं.

केट आंटी, मां की छोटी बहन, भी स्टेज की अदाकारा थी. लेकिन हम उसके बारे में बहुत ही कम जानते थे. इसका कारण यह था कि वह अक्सर हमारी ज़िंदगी में से आती-जाती रहती थी. वह देखने में बहुत आकर्षक थी और गुस्सैल स्वभाव की थी इसलिए मां से उसकी कम ही पटती थी. उसका कभी-कभार आना अचानक छोटे-मोटे टंटे में ही खत्म होता था कि मां ने कुछ न कुछ उलटा सीधा कह दिया होता था या कर दिया होता था.

अट्ठारह बरस की उम्र में मां एक अधेड़ आदमी के साथ अफ्रीका भाग गयी थी. वह अक्सर वहां की अपनी ज़िंदगी की बात किया करती थी कि किस तरह से वह वहां पेड़ों के झुरमुटों, नौकरों और जीन कसे घोड़ों के बीच मस्ती भरी ज़िंदगी जी रही थी.

उसकी उम्र के अट्ठारहवें बरस में मेरे बड़े भाई सिडनी का जन्म हुआ था. मुझे बताया गया था कि वह एक लॉर्ड का बेटा था और जब वह इक्कीस बरस का हो जायेगा तो उसे वसीयत में दो हजार पौंड की शानदार रकम मिलेगी. इस समाचार से मैं एक साथ ही दुखी और खुश हुआ करता था.

मां बहुत अरसे तक अफ्रीका में नहीं रही और इंगलैंड में आ कर उसने मेरे पिता से शादी कर ली. मुझे नहीं पता कि उसकी ज़िंदगी के अफ्रीकी घटना-चक्र का क्या हुआ, लेकिन भयंकर गरीबी के दिनों में मैं उसे इस बात के लिए कोसा करता था कि वह इतनी शानदार ज़िंदगी काहे को छोड़ आयी थी. वह हँस देती और कहा करती कि मैं इन चीज़ों को समझने की उम्र से बहुत कम हूं और मुझे इस बारे में इतना नहीं सोचना चाहिये.

मुझे कभी भी इस बात का अंदाज़ा नहीं लग पाया कि वह मेरे पिता के बारे में किस तरह की भावनाएं रखती थी. लेकिन जब भी वह मेरे पिता के बारे में बात करती थी, उसमें कोई कड़ुवाहट नहीं होती थी. इससे मुझे शक होने लगता था कि वह खुद भी उनके प्यार में गहरे-गहरे डूबी हुई थी. कभी तो वह उनके बारे में बहुत सहानुभूति के साथ बात करती तो कभी उनकी शराबखोरी की लत और हिंसक प्रवृत्ति के बारे में बताया करती थी. बाद के बरसों में जब भी वह मुझसे खफा होती, वह हिकारत से कहती,''तू भी अपने बाप की ही तरह किसी दिन अपने आपको गटर में खत्म कर डालेगा."

वह पिताजी को अफ्रीका जाने से पहले के दिनों से जानती थी. वे एक दूसरे को प्यार करते थे और उन्होंने शामुस ओ'ब्रीयन नाम के एक आयरिश मेलोड्रामा में एक साथ काम किया था. सोलह बरस की उम्र में मां ने उसमें प्रमुख भूमिका निभायी थी. कम्पनी के साथ टूर करते हुए मां एक अधेड़ उम्र के लॉर्ड के सम्पर्क में आयी और उसके साथ अफ्रीका भाग गयी. जब वह वापिस इंगलैंड आयी तो पिता ने अपने रोमांस के टूटे धागों को फिर से जोड़ा और दोनों ने शादी कर ली. तीन बरस बाद मेरा जन्म हुआ था. मैं नहीं जानता कि शराबखोरी के अलावा और कौन-कौन सी घटनाएं काम कर रही थीं लेकिन मेरे जन्म के एक बरस के ही बाद वे दोनों अलग हो गये थे. मां ने गुज़ारे भत्ते की भी मांग नहीं की थी. वह उन दिनों खुद एक स्टार हुआ करती थी और हर हफ्ते 25 पौंड कमा रही थी. उसकी माली हैसियत इतनी अच्छी थी कि अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण कर सके. लेकिन जब उसकी ज़िंदगी में दुर्भाग्य ने दस्तक दी तभी उसने मदद की मांग की. अगर ऐसा न होता तो उसने कभी भी कानूनी कार्रवाई न की होती.

मां को उसकी आवाज़ बहुत तकलीफ दे रही थी. वैसे भी उसकी आवाज़ कभी भी इतनी बुलंद नहीं थी लेकिन ज़रा-सा भी सर्दी-जुकाम होते ही उसकी स्वर तंत्री में सूजन आ जाती थी जो फिर हफ्तों चलती रहती थी; लेकिन उसे मज़बूरी में काम करते रहना पड़ता था. इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी आवाज्ा़ बद से बदतर होती चली गयी. वह अब अपनी आवाज़ पर भरोसा नहीं कर सकती थी. गाना गाते-गाते बीच में ही उसकी आवाज्ा़ भर्रा जाती या अचानक गायब ही हो जाती और फुसफुसाहट में बदल जाती. तब श्रोता बीच में ठहाके लगने लगते. वे गला फाड़ का चिल्लाना शुरू कर देते. आवाज़ की चिंता ने मां की सेहत को और भी डांवाडोल कर दिया था और उसकी हालत मानसिक रोगी जैसी हो गयी. नतीजा यह हुआ कि उसे थियेटर से बुलावे आने कम होते चले गये और एक दिन ऐसा भी आया कि बिल्कुल बंद ही हो गये.

ये उसकी आवाज़ के खराब होते चले जाने के कारण ही था कि मुझे पांच बरस की उम्र में पहली बार स्टेज पर उतरना पड़ा. मां आम तौर पर मुझे किराये के कमरे में अकेला छोड़ कर जाने के बजाये रात को अपने साथ थियेटर ले जाना पसंद करती थी. वह उस वक्त कैंटीन एट द' एल्डरशाट में काम कर रही थी. ये एक गंदा, चलताऊ-सा थियेटर था जो ज्यादातर फौजियों के लिए खेल दिखाता था. वे लोग उजड्ड किस्म के लोग होते थे और उन्हें भड़काने या ओछी हरकतों पर उतर आने के लिए मामूली-सा कारण ही काफी होता था. एल्डरशॉट में नाटकों में काम करने वालों के लिए वहां एक हफ्ता भी गुज़ारना भयंकर तनाव से गुज़रना होता था.

मुझे याद है, मैं उस वक्त विंग्स में खड़ा हुआ था जब पहले तो मां की आवाज़ फटी और फिर फुसफुसाहट में बदल गयी. श्रोताओं ने ठहाके लगाना शुरू कर दिये और अनाप-शनाप गाने लगे और कुत्ते बिल्लियों की आवाज़ निकालना शुरू कर दिया. सब कुछ अस्पष्ट-सा था और मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या चल रहा है. लेकिन शोर-शराबा बढ़ता ही चला गया और मज़बूरन मां को स्टेज छोड़ कर आना पड़ा. जब वह विंग्स में आयी तो बुरी तरह से व्यथित थी और स्टेज मैनेजर से बहस कर रही थी. स्टेज मैनेजर ने मुझे मां की सखियों के आगे अभिनय करते देखा था. वह मां से शायद यह कह रहा था कि उसके स्थान पर मुझे स्टेज पर भेज दे.

और इसी हड़बड़ाहट में मुझे याद है कि उसने मुझे एक हाथ से थामा था और स्टेज पर ले गया था. उसने मेरे परिचय में दो चार शब्द बोले और मुझे स्टेज पर अकेला छोड़ कर चला गया. और वहां फुट लाइटों की चकाचौंध और धुंए के पीछे झांकते चेहरों के सामने मैंने गाना शुरू कर दिया. ऑरक्रेस्टा मेरा साथ दे रहा था. थोड़ी देर तक तो वे भी गड़बड़ बजाते रहे और आखिर उन्होंने मेरी धुन पकड़ ही ली. ये उन दिनों का एक मशहूर गाना जैक जोन्स था.

जैक जोंस सबका परिचित और देखा भाला
घूमता रहता बाज़ार में गड़बड़झाला
नहीं नज़र आती कोई कमी जैक में हमें
तब भी नहीं जब वो जैसा था तब कैसा था
हो गयी गड़बड़ जब से छोड़ा उसे बुलियन गाड़ी ने
हो गया बेड़ा गर्क, जैक गया झाड़ी में
नहीं मिलता वह दोस्तों से पहले की तरह
भर देता है मुझे वह हिकारत से
पढ़ता है हर रविवार वह अखबार टेलिग्राफ
कभी वह बन कर खुश था स्टार
जब से जैक के हाथ में आयी है माया
क्या बतायें, हमने उसे पहले जैसा नहीं पाया.

अभी मैंने आधा ही गीत गाया था कि स्टेज पर सिक्कों की बरसात होने लगी. मैंने तत्काल घोषणा कर दी कि मैं पहले पैसे बटोरूंगा और उसके बाद ही गाना गाऊंगा. इस बात पर और अधिक ठहाके लगे. स्टेज मैनेजर एक रुमाल ले कर स्टेज पर आया और सिक्के बटोरने में मेरी मदद करने लगा. मुझे लगा कि वो सिक्के अपने पास रखना चाहता है. मैंने ये बात दर्शकों तक पहुंचा दी तो ठहाकों का जो दौरा पड़ा वो थमने का नाम ही न ले. खास तौर पर तब जब वह रुमाल लिये-लिये विंग्स में जाने लगा और मैं चिंतातुर उसके पीछे-पीछे लपका. जब तक उसने सिक्कों की वो पोटली मेरी मां को नहीं थमा दी, मैं स्टेज पर वापिस गाने के लिए नहीं आया. अब मैं बिल्कुल सहज था. मैं दर्शकों से बातें करता रहा, मैं नाचा और मैंने तरह-तरह की नकल करके दिखायी. मैंने मां के आयरिश मार्च थीम की भी नकल करके बतायी.

रिले . . रिले. . बच्चे को बहकाते रिले
रिले. . रिले. . मैं वो बच्चा जिसे बहकाते रिले
हो बड़ी या हो सेना छोटी
नहीं कोई इतना दुबला और साफ
करते अच्छे सार्जेंट रिले
बहादुर अट्ठासी में से रिले...

और कोरस को दोहराते हुए मैं अपने भोलेपन में मां की आवाज़ के फटने की भी नकल कर बैठा. मैं ये देख कर हैरान था कि दर्शकों पर इसका जबरदस्त असर पड़ा है. खूब हंसी के पटाखे छूट रहे थे. लोग खूब खुश थे और इसके बाद फिर सिक्कों की बौछार. और जब मां मुझे स्टेज से लिवाने के लिए आयी तो उसकी मौज़ूदगी पर लोगों ने जम के तालियां बजायीं. उस रात मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार स्टेज पर उतरा था और मां आखिरी बार.

जब नियति आदमी के भाग्य के साथ खिलवाड़ करती है तो उसके ध्यान में न तो दया होती है और न ही न्याय ही. मां के साथ भी नियति ने ऐसे ही खेल दिखाये. उसे उसकी आवाज़ फिर कभी वापिस नहीं मिली. जब पतझड़ के बाद सर्दियां आयीं तो हमारी हालत बद से बदतर हो गयी. हालांकि मां बहुत सावधान थी और उसने थ़ोड़े-बहुत पैसे बचा कर रखे थे लेकिन कुछ ही दिन में ये पूंजी भी खत्म हो गयी. धीरे-धीरे उसके गहने और छोटी-मोटी चीज़ें बाहर का रास्ता देखने लगीं. ये चीज़ें घर चलाने के लिए गिरवी रखी जा रही थीं. और इस पूरे अरसे के दौरान वह उम्मीद करती रही कि उसकी आव़ाज़ वापिस लौट आयेगी.

इस बीच हम तीन आरामदायक कमरों के मकान में से दो कमरों के मकान में और फिर एक कमरे के मकान में शिफ्ट हो चुके थे. हमारा सामान कम होता चला जा रहा था और हर बार हम जिस तरह के पड़ोस में रहने के लिए जाते, उसका स्तर नीचे आता जा रहा था.

तब वह धर्म की ओर मुड़ गयी थी. मुझे इसका कारण तो यह लगता है कि शायद उसे यह उम्मीद थी कि इससे उसकी आवाज़ वापिस लौट आयेगी. वह नियमित रूप से वेस्टमिन्स्टर ब्रिज रोड पर क्राइस्ट चर्च जाया करती और हर इतवार को मुझे बाख के आर्गन म्यूजिक के लिए बैठना पड़ता और पादरी एफ बी मेयेर की जोशीली तथा ड्रामाई आवाज़ को सुनना पड़ता जो गिरजे के मध्य भाग से घिसटते हुए पैरों की तरह आती प्रतीत होती. ज़रूर ही उनके भाषणों में अपील होती होगी क्योंकि मैं अक्सर मां को दबोच कर थाम लेता और चुपके से अपने आंसू पोंछ डालता. हालांकि इससे मुझे परेशानी तो होती ही थी.

मुझे अच्छी तरह से याद है उस गर्म दोपहरी में पवित्र प्रार्थना सभा की जब वहां भीड़ में से चांदी का एक ठंडा प्याला गुज़ारा गया. उस प्याले में स्वादिष्ट अंगूरों का रस भरा हुआ था. मैंने उसमें से ढेर सारा जूस पी लिया था और मां का मुझे रोकता-सा वह नम नरम हाथ और तब मैंने कितनी राहत महसूस की थी जब फादर ने बाइबल बंद की थी. इसका मतलब यही था कि अब प्रार्थनाएं शुरू होंगी और ईश वंदना के अंतिम गीत गाये जायेंगे.

मां जब से धर्म की शरण में गयी थी, वह थियेटर की अपनी सखियों से कभी-कभार ही मिल पाती. उसकी वह दुनिया अब छू मंतर हो चुकी थी और उसकी अब यादें ही बची थीं. ऐसा लगता था मानो हम हमेशा से ही इस तरह के दयनीय हालात में रहते आये थे. बीच का एक बरस तो तकलीफों के पूरे जीवन काल की तरह लगा था. हम अब बेरौनक धुंधलके कमरे में रहते थे. काम-धाम तलाशना बहुत ही दूभर था और मां को स्टेज के अलावा कुछ आता-जाता नहीं था, इससे उसके हाथ और बंध जाते थे. वह छोटे कद की, लालित्य लिये भावुक महिला थी. वह विक्टोरियन युग की ऐसी भयंकर विकट परिस्थितियों से जूझ रही थी जहां अमीरी और गरीबी के बीच बहुत बड़ी खाई थी. गरीब-गुरबा औरतों के पास हाथ का काम करने, मेहनत मजूरी करने के अलावा और कोई चारा नहीं था या फिर थी दुकानों वगैरह में हाड़-तोड़ गुलामी. कभी-कभार उसे नर्सिंग का काम मिल जाता था लेकिन इस तरह के काम भी बहुत दुर्लभ होते और ये भी बहुत ही कम अरसे के लिए होते. इसके बावजूद वह कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लेती. वह थियेटर के लिए अपनी पोशाकें खुद सीया करती थी इसलिए सीने-पिरोने के काम में उसका हाथ बहुत अच्छा था. इस तरह से वह चर्च के लोगों की कुछ पोशाकें सी कर कुछेक शिलिंग कमा ही लेती थी. लेकिन ये कुछ शिलिंग हम तीनों के गुज़ारे के लिए नाकाफी होते. पिता जी की दारूखोरी के कारण उन्हें थियेटर में काम मिलना अनियमित होता चला गया और इस तरह हर हफ्ते मिलने वाला उनका दस शिलिंग का भुगतान भी अनियमित ही रहता.

मां अब तक अपनी अधिकांश चीज़ें बेच चुकी थी. सबसे आखिर में बिकने के लिए जाने वाली उसकी वो पेटी थी जिसमें उसकी थियेटर की पोशाकें थीं. वह इन चीज़ों को अब तब इसलिए अपने पास संभाल कर रखे हुए थी कि शायद कभी उसकी आवाज़ वापिस लौट आये और उसे फिर से थियेटर में काम मिलना शुरू हो जाये. कभी-कभी वह ट्रंक के भीतर झांकती कि शायद कुछ काम का मिल जाये. तब हम कोई मुड़ी-तुड़ी पोशाक या विग देखते तो उससे कहते कि वह इसे पहन कर दिखाये. मुझे याद है कि हमारे कहने पर उसने जज की एक टोपी और गाउन पहने थे और अपनी कमज़ोर आवाज़ में अपना एक पुराना सफल गीत सुनाया था. ये गीत उसने खुद लिखा था. गीत के बोल तुकबंदी लिये हुए थे और इस तरह से थे:

मैं हूं एक महिला जज
और मैं हूं एक अच्छी जज
मामलों के फैसले करती ईमानदारी से
पर आते ही नहीं मामले पास मेरे
मैं सिखाना चाहती हूं वकीलों को
एकाध काम की बात
क्या नहीं कर सकती औरत जात.

आश्चर्यजनक तरीके से तब वह गरिमापूर्ण लगने वाले नृत्य की भंगिमाएंं दिखाने लगती. वह तब कसीदाकारी भूल जाती और हमें अपने पुराने सफल गीतों से और नृत्यों से तब तक खुश करती रहती जब तक वह थक कर चूर न हो जाती और उसकी सांस न उखड़ने लगती. तब वह बीती बातें याद करते लगती और हमें अपने नाटकों के कुछ पुराने पोस्टर दिखाती. एक पोस्टर इस तरह से था:

खासो-खास प्रदर्शन
नाज़ुक और प्रतिभा सम्पन्न
लिली हार्ले
गम्भीर हास्य की देवी,
बहुरूपिन और नर्तकी

जब वह हमारे सामने प्रदर्शन करती तो वह अपने खुद के मनोरंजक अंश तो दिखाती ही, दूसरी अभिनेत्रियों की भी नकल दिखाती जिन्हें उसने तथा कथित वैध थियेटरों में काम करते देखा था.

किसी नाटक को सुनाते समय वह अलग-अलग अंशों का अभिनय करके दिखाती. उदाहरण के लिए द' साइन ऑफ द' क्रॉस' में मर्सिया अपनी आंखों में अलौकिक प्रकाश भरे, शेरों को खाना खिलाने के लिए मांद वाले पिंजरे में जाती है. वह हमें विल्सन बैरट की ऊंची पोप जैसी आवाज में नकल करके दिखाती. वह छोटे कद का आदमी था इसलिए पांच इंच ऊंची हील वाले जूते पहन कर घोषणा करता: "यह ईसाइयत क्या है, मैं नहीं जानता लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूं कि..कि यदि ईसाइयत ने मर्सिया जैसी औरतें बनायी हैं तो रोम, नहीं, जगत ही इसके लिए पवित्रतम होगा." इस अंश को हास्य की झलक के साथ करके दिखाती लेकिन उसमें बैरेट की प्रतिभा के प्रति सराहना भाव ज़रूर होता.

जिन व्यक्तियों में वास्तविक प्रतिभा थी, उन्हें पहचानने, मान देने में उसका कोई सानी नहीं था. चाहे फिर वह नायिका ऐलेन टेरी हो, या म्यूजिक हॉल की जो एल्विन, वह उनकी कला की व्याख्या करती. वह तकनीक की बारीक जानकारी रखती थी और थियेटर के बारे में ऐसे व्यक्ति की तरह बात करती थी जो थियेटर को प्यार करने वाले ही कर सकते हैं.

वह अलग-अलग किस्से सुनाती और उनका अभिनय करके दिखाती. उदाहरण के लिए, वह याद करती सम्राट नेपोलियन के जीवन का कोई प्रसंग : दबे पांव अपने पुस्तकालय में किसी किताब की तलाश में जाना और मार्शल नेय द्वारा रास्ते में घेर लिया जाना. मां ये दोनों ही भूमिकाएं अदा करती लेकिन हमेशा हास्य का पुट ले कर, "महाशय, मुझे इजाज़त दीजिये कि मैं आपके लिये ये किताब ला दूं. मेरा कद ऊंचा है." और नेपोलियन यह कहते हुए खफ़ा होते हुए गुर्राया "ऊंचा या लम्बा?"

मां नेल ग्विन का विस्तार से अभिनय करके बताती कि वह किस तरह से महल की सीढ़ियों पर झुकी हुई है और उसकी बच्ची उसकी गोद में है. वह चार्ल्स II को धमकी दे रही है,"इस बच्ची को कोई नाम दो वरना मैं इसे ज़मीन पर पटक दूंगी." और सम्राट चार्ल्स हड़बड़ी में सहमत हो जाते हैं, "ठीक है, ठीक है, द ड्यूक ऑफ अल्बांस."

मुझे ओक्ले स्ट्रीट में तहखाने वाले एक कमरे के घर की वह शाम याद है. मैं बुखार उतरने के बाद बिस्तर पर लेटा आराम कर रहा था. सिडनी रात वाले स्कूल में गया हुआ था और मां और मैं अकेले थे. दोपहर ढलने को थी. मां खिड़की से टेक लगाये न्यू टेस्टामेंट पढ़ रही थी, अभिनय कर रही थी, और अपने अतुलनीय तरीके से उसकी व्याख्या कर रही थी. वह गरीबों और मासूम बच्चों के प्रति यीशू मसीह के प्रेम और दया के बारे में बता रही थी. शायद उसकी संवेदनाएं मेरे बुखार के कारण थीं, लेकिन उसने जिस शानदार और मन को छू लेने वाले ढंग से यीशू के नये अर्थ समझाये वैसे मैंने न तो आज तक सुने और न ही देखे ही हैं. मां उनकी सहिष्णुता और समझ के बारे में बता रही थी; उसने उस महिला के बारे में बताया जिससे पाप हो गया था और उसे भीड़ द्वारा पत्थर मार कर सज़ा दी जानी थी, और उनके प्रति यीशू के शब्द "आप में से जिसने कभी पाप न किया हो वही आगे आ कर सबसे पहला पत्थर मारे."

सांझ का धुंधलका होने तक वह पढ़ती रही. वह सिर्फ लैम्प जलाने की लिए ही उठी. तब उसने उस विश्वास के बारे में बताया जो यीशू मसीह ने बीमारों में जगाया था. बीमारों को बस, उनके चोगे की तुरपन को ही छूना होता था और वे चंगे हो जाते थे.

मां ने बड़े-बड़े पादरियों और महिला पादरियों की घृणा के बारे में बताया और बताया कि किस तरह से यीशू मसीह को गिरफ्तार किया गया था और वे किस तरह से पोंटियस के सामने शांत बने रहे थे. पोंटियस ने हाथ धोते हुए कहा था (मां ने बहुत ही शानदार अभिनय करके ये बताया)," मुझे इस आदमी में कोई खराबी ही नज़र नहीं आती." तब मां ने बताया कि किस तरह से उन लोगों ने यीशू को निर्वस्त्र कर डाला था और उसे ज़लील किया था और उसके सिर पर कांटों का ताज पहना दिया था, उसका मज़ाक उड़ाया था और उसके मुंह पर ये कहते हुए थूका था, "ओ यहूदियों के राजा ..."

जब वह ये सब सुना रही थी तो उसके गालों पर आंसू ढरके चले आ रहे थे. मां ने बताया कि किस तरह से साइमन ने क्रॉस ढोने में यीशू मसीह की मदद की थी और किस तरह भाव विह्वल हो कर यीशू ने उसे देखा था. मां ने बाराबास के बारे में बताया जो पश्चातापी था और क्रॉस पर उनके साथ ही मरा था. वह क्षमा मांग रहा था और यीशू कह रहे थे, "आज तुम मेरे साथ स्वर्ग में होवोगे", और क्रॉस से अपनी मां की ओर देखते हुए यीशू ने कहा था, "मां, अपने बेटे को देखो." और उनकी अंतिम, मरते वक्त की पीड़ा भरी कराह, "मेरे परम पिता, आपने मुझे क्षमा क्यों नहीं किया?"

और हम दोनों रो पड़े थे.

"तुमने देखा", मां कह रही थी, "वे मानवता से कितने भरे हुए थे. हम सब की तरह उन्हें भी संदेह झेलना पड़ा."

मां ने मुझे इतना भाव विह्वल कर दिया था कि मैं उसी रात मर जाना और यीशू से मिलना चाहता था. लेकिन मां इतनी उत्साहित नहीं थी, "यीशू चाहते हैं कि पहले तुम जीओ और अपने भाग्य को यहीं पूरा करो." उसने कहा था. ओक्ले स्ट्रीट के उस तहखाने के उस अंधेरे कमरे में मां ने मुझे उस ज्योति से भर दिया था जिसे विश्व ने आज तक जाना है और जिसने पूरी दुनिया को एक से बढ़ कर एक कथा तत्व वाले साहित्य और नाटक दिये हैं: प्यार, दया और मानवता.

चन्द्रकांत देवताले पर वीरेन डंगवाल


कोई तीन बरस पहले परम कबाड़ी कवि वीरेन डंगवाल ने हमारे समय के बड़े कवि चंद्रकांत देवताले पर कबाड़खाने के लिए एक एक्सक्लूसिव अन्तरंग आलेख लिखा था. साहित्य अकादेमी ने इस वर्ष अंततः इस बार का सम्मान देवताले जी को देने का निर्णय लिया. इस अवसर पर इस अड्डे पर देवताले जी की दो-तीन कवितायेँ हाल ही में लगाई गयी थीं.

अब मैं वीरेन डंगवाल का वही आलेख यहाँ दुबारा से लगाने जा रहा हूँ. ताकि सनद रहे –

-----------


आम का वह पेड़ भारी नहीं
उसकी कम घनी शाखों पर
फदकता दीख रहा है
कुछ बेडौल सी आवाज़ में बोलता
पहाड़ों का वह पक्षी.
जिधर से वह आया 
उधर ही मेरा घर भी था कभी.
एक नदी थी
दीखने में कृशकाय
मगर खूब भरी पानी से

यह कुछ अशालीनता सी भी लग सकती है - किसी अन्य, और बड़े कवि पर बात की शुरुआत ही अपनी कविता से करना, मगर 'पहाड़ों का पक्षी' शीर्षक उपरोक्त कविता कुछ वर्ष पहले इन पंक्तियों के लेखक ने लिखी ही चंद्रकांत देवताले की याद करते हुए थी. मेरी उनसे व्यक्तिगत और घनिष्ठ मुलाकातें ना के बराबर ही थीं. लिहाज़ा यह याद दरअसल उनकी कविताओं की, उनके प्रभाव की याद थी. मेरे तईं यह हिंदी के इस अनूठे कवि की कुल तस्वीर थी - थोड़ा अलग-थलग, अद्वितीय, और सारपूर्ण. उसमें करुणा का दयहीन पाखंड नहीं है, बल्कि आर्द्रता की एक मज़बूत लचीली डोर उसकी कुल रचनात्मकता को बांध कर रखती है. उसे बार-बार पंद्रह बरस के किसी भावुक किशोर की तरह आंसू छलछला आते हैं पर वह गुस्सा-भिंची मुठ्ठी से उन्हें पोंछता हुआ आंखें सुर्ख़ कर लेता है. थोड़ा फिचकुर फेंकता हुआ भी वह नाटकीय या झूठा नहीं लगता. उसका आवेश दरअसल प्रेम का ही एक बदला हुआ चेहरा है जिसे वह कभी स्त्री, कभी प्रकृति के आईने में देखता है, अक्सर समाज, संबंधों, और राजनीति के. परवर्ती कविताओं में तो देवताले आविष्ट से सुस्थिर-शांत होते हुए दिखने लगे हैं, लेकिन उनकी मूलभूत चिंतायें तथा मूल्यबोध, पूर्ववत और टिकाऊ हैं.

यह बात थोड़ा हैरत और अफसोस से भरने वाली है कि चार दशकों की सतत सक्रियता के बावजूद हिंदी कविता में चंद्रकांत देवताले की उपस्थिति को समुचित सम्मान नहीं मिला. यों तो उनका पहला संचयन 'हडि्डयों में छिपा ज्वर´´ 1973 में कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित और बहुचर्चित 'पहचान´ सीरीज़ में छपा था लेकिन वह उसके कहीं पहले से उस दौर की लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित होते आ रहे थे और अपने काफी नवेले, आक्रामक और एक आहिस्ता अराजक अंदाज़ से ध्यान भी खींच रहे थे.

मुसीबत के वक्त
खुलने वाले उत्तेजित दिनों
और बंद होने वाली
दहशत भरी रातों में 
अकेलापन टूट कर
हर जगह सम्मिलित हो गया था
तब जोड़ों के दर्द
और चमड़ी के खुश्क होकर
दरकने के लिये
एक भी क्षण नहीं था
दगाबाज़ों और काटने वालों को भी
हिफाज़त की घड़ी में 
विश्वस्त मानते हुए
उनके कंधों पर फिसलता हाथ 
दुश्मनी को भूलकर
कैसे अपनेपन की हवा में
भूला हुआ था
तब दीमक और
चूहों के प्रति बेखबर होते जाना
कितना करुण और स्मृति वंचित
नाटक था ...
यह जानते हुए भी
कि यह हाथ
आग तापने को उठा है
हमने तपाक से उसे
अपने हाथों में
कस लिया था
ओज के परदे पर
हिलती हुई गरदनों के
उस दृश्य में
नमक की बात
कितनी फूहड़ होती 


('हडि्डयों में छिपा ज्वर´ शीर्षक कविता से अंश)

देवताले की इस, और ऐसी तमाम दूसरी कविताओं में आप आठवें दशक की ज़मीन को पकते हुए देख सकते हैं - बावजूद उस वैयक्तिक स्वर, उस प्रबल 'मैं तत्व´ के - जो उनके सामाजिक अनुभव की भी कसौटी है और उनकी कविता में हमेशा बहुत मुखर है. इस अंतर्विरोध ने देवताले की रचनात्मकता में कई रंग जोड़े हैं.

एक मायने में देवताले परिधि के कवि हैं - हाशिये के नहीं, परिधि के. निम्न मध्यम वर्गीय जीवन, रोज़मर्रापन का सौंदर्य, वंचना का प्रतिरोध और सत्ता केंद्रों से भौतिक और आत्मिक दूरी, इन सबके कारण प्रचुर और वैविध्यपूर्ण रचनात्मकता के बावजूद, आलोचना के केंद्रमुखी समुदाय ने परिधि के इस कवि को खास तवज्जो नहीं दी. लगभत समवर्ती धूमिल, और तत्काल अग्रज रघुवीर सहाय की तुलना में देवताले की यह उपेक्षा इसलिये भी थोड़ी अटपटी है क्योंकि उनकी कविता भी स्वातंत्र्योत्तर भारतीय नागरिक और उसके समाज के जीवन की विडंबनाओं का बखान है. इस नागरिक के बाहरी और भीतरी, निजी और सार्वजनिक दोनों ही संसार - एक ही डाल के 'दो सुपर्णों´ की तरह देवताले की कविता में अपने पंख फड़फड़ाते हैं- कभी अलग-अलग, और कभी एक साथ; जैसे यहां 'राहत´ शीर्ष उनकी इस कविता के अंश में 

तुम अपनी खड़खड़िया सायकिल पर जाते हो
सोचते हुए आज बसन्त पंचमी है
और केरियर पर रखे कनस्तर में गेहूं उछलते हैं
जब तुम यह सोचते हो- देखो गेहूं के दाने
खनक रहे हैं, तभी तुम पुलिया में घुसने के पहले
देखते हो बांई की तरफ जाती मालगाड़ी
और उसी वक्त पेट्रोल भरी बड़ी गाड़ी से बचते
पुलिया के भीतर दैत्याकार आवाज़ों के बावजूद
अनजानी सी सुरक्षा की सांस लेकर
तुम पाते हो अकस्मात सड़क के बीचोंबीच बैठी दो बच्चियां
गंदे कागज़ों के चिन्दों को खोलकर तहाने में बेखबर
और तुम ट्रक के हार्न और टेम्पो-स्कूटरों की रफ़्तार के बीच
फिर से उन बच्चियों के साथ
बहुत सी चीज़ों की असुरक्षा से घिरने लगते हो...


बम्बई ने अभी मम्बई बनकर अपना लिंग परिवर्तन नहीं कराया है. सायकिल एक शानदार सवारी है. गेहूं पिसाने को केरियर से बंधे कनस्तर में दाने उछल कर खनकते हैं और एक लदी हुई मालगाड़ी महानगर की तरफ़ जा रही है. दिन वसंत पंचमी का है.

और इससे आगे हैं फिर ये पंक्तियां -


तभी तुम्हें याद आती है हंसती हुई भद्र महिला
जो गैस के लिए नंबर लगाने वाली लाइन में
ठीक तुम्हारे आगे खड़ी थी और अपने साथ आई लड़की से
पूछ रही थी - तेरी मम्मी ने क्या पकाया आज वसंत पंचमी के दिन


कैसा विलक्षण वृतांत है! इस घरेलू लगती तफसील से आप जैसे ही फारिग होते हैं, चक्की में पिसता हुआ गेहूं एक दूसरी ही मालगाड़ी पर लादकर आपको कहीं और पहुंचा देता है 

और चक्की गेहूं को आटे में तब्दील करते हुए
तुम्हें कहीं दूर पहुंचा देती है
जहां तुम सोचते हो कोई अदृश्य और विराट चक्की
तुम्हारे साथ भी ऐसा ही सलूक कर रही है
पर 'शब्दों से रोटी जैसी महक´ सोचते हुए
तुम उसी आवाज़ में अपने ही भीतर कुछ सुनने लगते हो
मित्रवत् जिससे तुम्हारे चेहरे पर आत्मीयता झलकने लगती है


तो यह है चंद्रकांत देवताले का तरीका - वसंत पंचमी के दिन, सायकिल पर गेहूं की चक्की के रास्ते, उस दूसरी अदृश्य चक्की तक ले जाना जो अनवरत हम सबका कचूमर निकालने के काम में लगी है, और इस जाने के क्रम में ही विराट दरिद्रता, मानवीय प्रेम और मैत्री का संधान भी कर लेना. इस नागरिक का प्रेम, उल्लास, क्रोध, आवेश, उसकी उग्र आदिवासियों जैसी प्रतिरोध रत चीख पुकार और बुखार भरी बर्राहटें, उसके आंसू - ये सब देवताले की कविता में स्पंदित होते हैं. यह कविता एक साथ बहिर्मुखी और अंतर्मुखी, सपाट और जटिल है. गो कि उसके पास मुक्तिबोध का नक्शा, उसकी भविष्य दृष्टि और निर्भ्रान्त विचारधारात्मक ज़मीन नहीं है पर यह कविता दौड़ती काफी आगे तक मुक्तिबोध की ही राह पर है क्योंकि वह अपने आंतरिक वर्गगत विवेक से मनुष्यता के शत्रुओं को पहचानती है. यह बात जरूर है कि कवि कई बार भाषा का 'ओवरयूज़´ करता लगता है - मसलन 'भूखंड तप रहा है´ शीर्षक लंबी और महत्वाकांक्षी कविता में , या 'आग हर चीज में बताई गई थी´ में संकलित 'हाइ पावर नंगे बस्तर को कपड़े पहनाएगा´ और 'सबसे जरूरी काम´ शीर्षक कविताओं में. कई जगह पूरी कविता ही 'क्लीशे´ तथा सामान्यीकरणों पर टिकी रहती है. 'थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे´ या 'प्राथमिक स्कूल´ सरीखी लोकप्रिय कवितायें, या 'एक नीबू के पीछे´ जैसी अभी तक असंकलित परवर्ती कविता इसके सटीक उदाहरण हैं. मगर यह गौरतलब है कि कवि की आवाज़ का सच्चापन भाषिक अतिरेक अथवा विषय की फार्मूलाबद्धता को भी ऊपर उठा लेता है. जैसा कि सुधी कवि और आलोचक विष्णु खरे भी जोर देकर कहते आए हैं, इस रूप में देवताले एक प्रतिबद्ध और राजनैतिक कवि हैं. यहां यह उल्लेख वाजिब रहेगा कि आलोचक समुदाय की विचित्र चुप्पी के बरक्स, पिछले कई दशकों से विष्णु खरे अपने इस कवि-मित्र की रचनात्मकता को रेखांकित करने में लगे रहे हैं. आखिर अब जाकर उनकी कोशिशें रंग लाती दिखाई दे रही हैं.

और देवताले की स्त्रियां! शोक और आह्लाद और उनके विलक्षण झुटपुटे का वह महोत्सव, जिसका एक छोर एक विराट अमूर्तन में है - पछीटे जाते कपड़ों, अंधेरी गुफा में गुंधे आटे से सूरज की पीठ पर पकती असंख्य रोटियों आदि-आदि में, गोया यह सब करती स्त्री स्वयं कर्मठ मानवता है. और दूसरा छोर है घर में अकेली उस युवती के निविड़ एकांत में जहां उसका अकेलापन ही उसका उल्लास, उसका भोग उसकी यातना, उसके भी आगे उसका स्वातंत्र्य है 

तुम्हारा पति अभी बाहर है, तुम नहाओ जी भर कर
आई
ने के सामने पहनो, फिर
आईने को देखो इतना कि वह
तड़कने-तड़कने को हो जाये...


क्या मज़ा है. जहां निविड़ता होनी चाहिये - सूरज की पीठ, पृथ्वी के स्तनों, और घास के गठ्ठरों में - वहां कतई शोरो-गुल है और जहां शोरो-गुल मुमकिन था 'घर में अकेली औरत के लिये´ में - वहां कत्तई सन्नाटा है. हालांकि उसके भीतर एक खामोश कोहराम भी है. यही कवि की महिमा है.

कवि के विधिवत पहले संकलन 'दीवारों पर खून से´ में है यह कविता, और स्त्री के साथ उसका यह नाता अब तक अटूट चला आता है, और इतने रंग हैं उसमें कि हैरानी होती है. 'औरत´, 'मां जब खाना परोसती थी´, 'दो लड़कियों का पिता होने पर´, 'उसके सपने´, 'बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियां´, 'मां पर नहीं लिख सकता कविता´, 'नहाते हुए रोती औरत´ - ये वे स्त्री विषयक कवितायें हैं जो अपनी मार्मिकता के साथ औचक स्मृति में बसी रहती हैं. इन्हीं की पूरक है 'प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता´ या 'मेरी पोशाक ही ऐसी थी´ - जैसी कवितायें जिनमें भीतर के एक कोमल प्रांतर के उद्घाटन, या फिर एक दूसरी विद्रूप सामाजिक सचाई के खोलने का निमित्त स्त्री ही बनी है. वैश्वीकरण की विडम्बनाओं के बावजूद भारतीय समाज के ताने-बाने में औरत की जो विचित्र, अद्वितीय और जटिल हैसियत है, और उससे भी ऊपर, पुरुष की सापेक्षता में उसका जो झुटपुटा और तिलिस्म है हिंदी में देवताले से ज्यादा उसे किसी कवि ने न समझा है, न लिखा है. इसे यह कवि खुद जानता भी है, तभी 'स्त्री का साथ´ शीर्षक कविता में वह लिखता है

सचमुच मैं भाग जाता चंद्रमा से फूल और कविता से
नहीं सोचता कभी कोई भी बात ज़ुल्म और ज़्यादती के बारे में
अगर नहीं होतीं प्रेम करने वाली औरतें इस पृथ्वी पर

...स्त्री के साथ और उसके भीतर रहकर ही मैंने अपने को पहचाना है 

... मुझे औरत की अंगुलियों के बारे में पता है
ये अंगुलियां समुद्र की लहरों से निकलकर आती हैं
और एक थके-मांदे पस्त आदमी को
हरे-भरे-गाते दरख़्त में बदल देती हैं
जिसे तुम त्वचा कहते हो वह नदी का वसंत है

... फिर भी सिर्फ एक औरत तो समझने के लिए
हजार साल की जिंदगी चाहिये तुमको
क्योंकि औरत सिर्फ माफ या बसंत ही नहीं है
एक सिम्फ़नी भी है समूचे ब्रह्मांड की...
 

Monday, December 24, 2012

बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना



रफ़ी साहब के जन्मदिन पर उनकी मखमल आवाज़ में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश है –


Sunday, December 23, 2012

प्‍यारी लड़कियो!




लड़कियो!

1- अपने घरों से बाहर निकलो.

2- पब्लिक स्‍पेस पर कब्‍जा करो. यकीन करो, धरती की हर इंच जगह तुम्‍हारी है और तुम्‍हें कहीं भी जाने-होने-रहने-जीने से कोई रोक नहीं सकता.

3- जान लगाकर पढो, टॉप करो और अपना कॅरियर बनाओ. (करियर टॉप प्रायोरिटी पर रखो.)

4- अपने पैसे कमाओ, अपना घर बनाओ. अपना कमरा और अपना स्‍पेस.

5- एक गाडी खरीदो, दो पहिया या चार पहिया, कुछ भी चलेगा. और उस पर सवार होकर पूरे शहर ... में घूमो, दूर दराज के शहरों में भी. चाहो तो पूरे देश भर में.

6- अपनी जिंदगी की जिम्‍मेदारी अपने हाथों में लो. अपने फैसले खुद करो.

7- अमीर पति का ख्‍वाब छोड दो. अमीर पति से मिलने वाली सुविधाओं के साथ गुलामी भी आती है. ये पैकेज डील है. सिर्फ एक चीज नहीं मिलेगी.

8- प्रेम करो, अपना सेक्‍चुअल पार्टनर खुद अपनी मर्जी से चुनो.

9- सजो-संवरो और सुंदर दिखो.

9- किताबें पढो और अच्‍छा सिनेमा देखो. (प्‍लीज लड़कियों, सलमान खान को देखकर आहें भरना बंद करो.)

10- अपने कमाए पैसे जमा करो और उस पैसों से पूरी दुनिया घूमो. सुंदरवन के जंगलों और कन्‍याकुमारी के समुद्र तट पर अकेले जाओ. मेरी यकीन करो, अगर हम समझदार, बुद्धिमान और आत्‍मविश्‍वास से भरे हैं तो हमारे साथ कुछ नहीं होगा. और यदि कुछ बुरा हो भी गया तो इसका ये मतलब नहीं कि अगली बार हम सुंदरवन नहीं जाएंगे.

हम जो घरों से एक बार बाहर निकले हैं तो अब वहां लौटकर नहीं जाएंगे.

पत्थर की बैंच


पत्थर की बैंच
चंद्रकांत देवताले
पत्थर की बैंच
जिस पर रोता हुआ बच्चा
बिस्कुट कुतरते चुप हो रहा है
जिस पर एक थका युवक
अपने कुचले हुए सपनों को सहला रहा है
जिस पर हाथों से आँखे ढाँप
एक रिटायर्ड बूढ़ा भर दोपहरी सो रहा है
जिस पर वे दोनों
जिन्दगी के सपने बुन रहे हैं
पत्थर की बैंच 
जिस पर अंकित है आँसू, थकान
विश्राम और प्रेम की स्मृतियाँ
इस पत्थर की बैंच के लिए भी
शुरु हो सकता है किसी दिन
हत्याओं का सिलसिला
इसे उखाड़ कर ले जाया
अथवा तोड़ा भी जा सकता है
पता नहीं सबसे पहले कौन आसीन हुआ होगा
इस पत्थर की बैंच पर!

Saturday, December 22, 2012

सुनील शाह के दो फोटू


ये दो तस्वीरें अमर उजाला के हल्द्वानी संस्करण के सम्पादक व मित्र जनाब सुनील शाह ने खींचे हैं. पहला कुमाऊं के बागेश्वर-थल मार्ग पर पांगर के पेड़ों पर आए पतझड़ का है जबकि दूसरा रानीखेत और अल्मोड़ा के बीच कोसी के आसपास के सीढ़ीदार खेतों का -  



तुम मेरे इस जनम का अंतिम प्रेम हो


अंतिम प्रेम

चंद्रकांत देवताले


हर कुछ कभी न कभी सुन्दर हो जाता है
बसन्त और हमारे बीच अब बेमाप फासला है
तुम पतझड़ के उस पेड़ की तरह सुन्दर हो
जो बिना पछतावे के
पत्तियों को विदा कर चुका है
थकी हुई और पस्त चीजों के बीच
पानी की आवाज जिस विकलता के साथ
जीवन की याद दिलाती है
तुम इसी आवाज और इसी याद की तरह 
मुझे उत्तेजित कर देती हो
जैसे कभी- कभी मरने के ठीक पहले या मरने के तुरन्त बाद
कोई अन्तिम प्रेम के लिए तैयार खड़ा हो जाता है
मैं इस उजाड़ में इसी तरह खड़ा हूँ
मेरे शब्द मेरा साथ नहीं दे पा रहे 
और तुम सूखे पेड़ की तरह सुन्दर
मेरे इस जनम का अंतिम प्रेम हो.

Friday, December 21, 2012

तुम भी धीरे से कहना सीखो --दिस इज़ अनएक्सेप्टेबल. और फिर भूल जाओ


यह पोस्ट राजेश जोशी ने अहमदाबाद से बी बी सी के लिए लिखी थी. उन्हीं के इसरार पर इसे यहाँ लगा रहा हूँ.

प्रिय शरीफ़ा बीबी,  

तुमसे हुई उस छोटी सी मुलाक़ात के बाद अब भी मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा हूँ.

 तुम इतनी ज़िद्दी क्यों हो? जो कुछ हुआ उसे भूल जाओ ना !

दस साल गुज़र गए हैं. दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई. आठ साल के बच्चे अब अठारह साल के नौजवान हो चले हैं.

 देखों तुम्हारे शहर की सड़कें कितनी चौड़ी हो गई हैं. कितनी तो ऊँची ऊँची कॉलोनियाँ बन गई हैं. कारें, कितनी तो चमचमाती कारें हो गई हैं. और शॉपिंग मॉल्स?

अब तो लगातार तीसरी बार तुम्हारे रहनुमा तुम्हें विकास यानी तरक़्क़ी की राह पर ले जाने को तैयार हैं.

पर तुम हो कि अब भी हर आने जाने वाले को वही पुरानी कहानी सुनाती हो.

जैसे कि मुझे सुनाई तुमने अपनी रामकहानी कि कैसे उस सुबह तुम चाय पी के बैठी थीं और अचानक तुमने देखा कि टुल्ले के टुल्ले आ रहे थे. हथियारों से लैस लोगों की भीड़.

कैसे तुम और तुम्हारा आदमी पुलिस वालों के पास मदद माँगने पहुँचे और फिर पुलिस वालों ने तुम्हें ये कह कर भगा दिया कि आज तुम्हारा मरने का दिन है, वापिस घर जाओ.

अब ऐसी भारी भीड़ के सामने पुलिस वाले क्या कहते भला? बोर हो गया मैं तुम्हारी दास्तान सुनकर.

और अब तुम ये याद करके करोगी भी क्या कि जब तुम और तुम्हारे बच्चे जान बचाने को इधर-उधर भाग रहे थे, तुम्हारा सबसे बड़ा बेटा पीछे छूट गया?

ये याद करके भी क्या करोगी कि उसको भीड़ ने पाइप, लाठियों और तलवारों से मारा.

और ये याद करके भी क्या करोगी कि जब उसका कत्ल किया जा रहा था तो तुम जाली के पीछे से छिपकर देख रही थी और तुम्हारी आँखों के सामने ही भीड़ ने उसपर मिट्टी का तेल डालकर उसे जला डाला?

देखो सब आगे बढ़ गए हैं. तुम कब तक उन यादों में उलझी रहोगी. तुम लोगों की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि तुम भूल नहीं सकते.

ग़ुस्सा सबको आया था तब. आया था कि नहीं? सब पढ़े-लिखे अँग्रेज़ी बोलने वाले लोगों ने रुँधे गले से कहा था– दिस इज़ अनएक्सेप्टेबल.
फिर एक्सेप्ट कर लिया ना? 
अमिताभ बच्चन ने किया. अंबानी ने किया. रतन टाटा ने किया.
शरीफ़ा बीबी तुम बड़ी कि रतन टाटा? तुम बड़ी कि अंबानी और अमिताभ बच्चन? रहो अपनी ज़िद पर अड़ी हुई. अरे कहाँ इतने नामवर लोग और कहाँ तुम? कुछ सोचो.
अब देखो ना, अहमदाबाद में अपने होटल के कमरे में बैठकर जिस समय तुमको मैं ये ख़त लिख रहा हूँ, टेलीविज़न की स्क्रीन से पूरे देश का ग़ुस्सा फटा पड़ रहा है.

दिल्ली की एक बस में चार लोगों ने नर्सिंग की पढ़ाई कर रही 23 साल की एक लड़की के साथ चार लड़कों ने बलात्कार किया, लोहे के सरियों से उसके पेट पर इतने प्रहार किएकि उसकी आँते तक कुचल गईं. उस लड़की और उसके दोस्त के कपड़े उतारकर हमलावर उन दोनों को चलती बस से फेंक कर चलते बने. 

अभी फिर से सभी नेता और अभिनेता रो रहे हैं. कह रहे हैं कि दिस इज़ अनएक्सेप्टेबल. 

आज जिसे अनएक्सेप्टेबल कहा जाता है, पढ़े लिखे लोग कल उसे एक्सेप्टेबल मान लेते हैं या फिर उसका ज़िक्र ही नहीं करते.

तुम्हारी क्या मत्ति मारी गई है, शरीफ़ा बीबी?  तुम भी धीरे से कहना सीखो --दिस इज़ अनएक्सेप्टेबल. और फिर भूल जाओ. 

होश की दवा खाओ, शरीफ़ा बीबी, होश की दवा!

(नोट: शरीफ़ा बीबी एक काल्पनिक चरित्र नहीं है. कई मरने वालों ने मरने से पहले इन्हें अपनी आँखों से देखा है. ज़िंदा लोग अब भी उन्हें देख सकते हैं. आप भी अगर ज़िंदा हैं तो इस ज़िद्दी औरत से अहमदाबाद की नरोदा पाटिया बस्ती में मुलाक़ात कर सकते हैं.)

-राजेश जोशी