Saturday, April 8, 2017

अथ गणित कथा

मित्र ललित मोहन रयाल भीमताल में रहते हैं. सरकारी सेवा में हैं. उनसे परिचय बहुत पुराना नहीं है अलबत्ता जितना भी है वह इस बात की तसदीक करने को पर्याप्त है कि उनसे लम्बी दोस्ती की खासी संभावना है. उम्दा क़िस्सागोई का मैं प्रशंसक हूँ और ललित मोहन रयाल इस कला में सिद्धगस्त हैं. इन दिनों वे 'खड़कमाफी की स्मृतियों से' शीर्षक एक संस्मरण श्रृंखला पर कार्यरत हैं. उन्होंने इस सीरीज में से इस टुकड़े को यहाँ पोस्ट करने की अनुमति दी है. उनका आभार. आनंद लीजिये! 


'गणित में विद्यार्थियों का हाथ तंग है' - प्रायः सुनने को मिलता था. गणित-फोबिया से कई छात्र पीड़ित रहते थे. तत्कालीन कालखंड में हमारे अंचल में गणित विषय का हाहाकार मचा रहता था. प्रथम प्रयास में मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास करना दुर्लभ समाचार होता था. प्रथम प्रयास में इस परीक्षा को उत्तीर्ण करना अभीष्ट भी नहीं माना जाता था. तीसरे से पाँचवें प्रयास तक को सहजता से लिया जाता था. प्रयासों की संख्या कितनी भी हो जाए, पास होना महत्त्व रखता था. पाँचवें प्रयास तक भी इस परिणाम के लिए उपयुक्त निगरानी व मार्गदर्शन की जरूरत महसूस की जाती थी.

'मैट्रिकुलेशन' शब्द की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी मीनिंग 'रजिस्टर' दी गई है. इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि पाश्चात्य शिक्षा- व्यवस्था में इस परीक्षा के अंक रजिस्टर में इंद्राज किए जाते हैं. इसके अंक रजिस्टर में 'एंट्री' किए जाने से ही इसे 'मैट्रिकुलेशन' कहा जाता है.

प्राच्य विद्वान पी. एन. ओक इस धारणा का खंडन करते हैं. उनका दृढ़ मत है कि रजिस्टर में तो अन्य परीक्षाओं के अंकों की भी प्रविष्टि की जाती है. 'गजट' भी तो रजिस्टर ही है. इस विधान से तो समस्त परीक्षाएं ही मैट्रिकुलेशन कहलानी चाहिए.

उनका मत है कि 'मैट्रिकुलेशन' प्राचीन संस्कृत शब्द 'मातृकुलीनेषु' का पाश्चात्य संस्करण मात्र है. इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद शिक्षार्थी को उच्चतर शिक्षा प्राप्त करनी होती थी. इस उद्देश्य से उसे 'मातृकुल' से दूर जाना पड़ता था.
ज्योमिट्री की क्लास थी. वृत्त का आरेख खींचने को कहा गया था. मैं भी वृत्त का आरेख खींच रहा था. आरेखण की प्रक्रिया में कंपास बार-बार फिसलता जा रहा था. ज्योमिट्री पेपर स्निग्ध (चिकना) था. अतः मैने कंपास पर बलाघात् किया व ज्योमिट्री पेपर के घूर्णन से आरेख खींच लिया था.

यह जुगत प्रक्रिया को सुकर बनाने के उद्देश्य से की गई थी. आरेखण के इस दुर्लभ-प्रदर्शन को संभवतः गुरुजी ने भी देख लिया था.

उन्होंने पीछे से आकर धौल जमाकर मुझे धराशायी कर दिया था. बड़े कष्ट में मैं उठा. तो उन्होंने दूषित तरीका अपनाने का कारण पूछा. हमने भी भोलेपन में कह डाला-" बन तो गया है गुरु जी. आम खाने से मतलब होना चाहिए. पेड़ गिनने से क्या होगा." प्रकारांतर से हमने साध्य पा लेने की धौंस दिखायी थी. व साधन की पवित्रता-अपवित्रता के फेर में न पड़ने की दुहाई भी दी थी. गुरु तो गुरु ही होता है. उन्होंने हमें दीवार के सामने खड़ा कर दिया और हमें आदेश दिया-"इस दीवार पर सर्कल का आरेख खींचो. दीवार घुमाकर खींचो. याद रहे, कंपास नहीं घूमना चाहिए." उसके बाद उन्होंने जो किया वह वर्णनातीत है.

वे ज्यामितीय तरीके से साठ अंश, पैंतालीस अंश, साढ़े बाईस अंश के कोणों का अभ्यास कराते थे. छोटे डिनोंमिनेटर्स के कोणों का अधिकाधिक अभ्यास कराते थे. फोबियाग्रस्त विद्यार्थी बहुतायत में थे. मुंशी प्रेमचंद जी तक को गणित हिमालय-सी ऊँचाई का लगता था.

हमारे एक सहपाठी अग्रज थे. स्कूल और घर दोनों स्थलों पर वे इस विषय के सताए हुए थे. एक दिन उनके फूफाजी आए हुए थे. फूफा जी ने उन्हें 'मल्टीप्लीकेशन' का सवाल हल करने को दिया. भाई ने सवाल पर निगाह डाले बिना ही हथियार डाल दिए थे. लानत-मलानत सुनकर वह हाँफते हुए बाहर आए. मित्रों को आपबीती सुना रहे थे-" यार! फूफाजी ने एक सवाल की 'मट्टी पलीद' करने को दी. तो हमारी ही 'मट्टी पलीद' हो गई."

हालांकि लॉन्ग जंप में इनका प्रदर्शन उत्कृष्ट रहता था. एक बार लॉन्ग जंप की प्रैक्टिस चल रही थी. ये कूदने के लिए खोदे गए अधिकतम स्ट्रेच मार्क से बाहर अर्थात् साढ़े तेईस फीट कूदकर फ्रैक्चर करवा बैठे थे. उत्तर प्रदेश का स्टेट रिकॉर्ड तत्समय चौबीस फीट था.

गुरुजी कक्षा में वृक्ष का समूल तना लेकर आते थे. उसको वे शस्त्र के रूप में प्रयोग करते थे. उनके इस शस्त्र से दुर्ग-द्वार भी आसानी से ढ़हाया जा सकता था. उनके दर्शन होते ही त्रेता युग की याद आने लगती थी. किष्किंधा के दंडधरों के हाथों में भी यही शस्त्र रहा करता था. उसी से वे लंका के परकोटे तोड़ने में सफल होते थे. छात्र डरे-सहमे-से रहते थे. उनमें यह भय व्याप्त रहता था कि पाठ्यक्रम समाप्ति से पूर्व गुरुजी हमें ही समाप्त न कर दें.

साप्ताहिक टेस्ट लिए जाते थे. परिणाम में कमतर प्रदर्शन वालों को वे पूर्ण शक्ति से बाहर फेंक देते थे. एक 'असवाल' सरनेम वाले सहपाठी भी थे. उनका हाथ अक्सर तंग ही रहता था. वह अक्सर प्रक्षेपित किए जाते थे. फेंकते समय गुरुजी यह अवश्य दोहराते थे कि -"तुम्हारा तो सरनेम की असवाल है.वह इसलिए है क्योंकि तुमको सवाल आते ही नहीं हैं." वे प्रायः छात्र को बस्ता-बही सहित उठाकर पलायन वेग से प्रक्षेपित कर देते थे. प्रक्षेपण-यान व मानव-शरीर की सीमा-सामर्थ्य में व्यापक अंतर बताया जाता है. इस अंतर से गुरुजी की इच्छा अपूर्ण ही रह जाती थी. उनका प्रक्षेपित शिष्य केले की सघन वृक्षों की जद तक ही पहुँच पाता था. यह कदली वन वहाँ पर था, जहाँ पर स्कूल की सीमा समाप्त होती थी. वे स्थानच्युत शिष्य को भी यहीं से उच्च स्वर में आदेश देते थे. उन्हें निर्मेय की रचना व प्रमेय का अभ्यास करने की छूट अवश्य दे देते थे. कदली वन के अभ्यासी छात्रों मे से कुछ गणित में मेधावी होकर निकले थे. कुछ गणित के योग्यतम शिक्षकों में लब्धप्रतिष्ठ हुए तो कुछ लोक सेवाओं में भी चुन लिए गए थे.  

अर्द्ध वार्षिक परीक्षाओं के उपरांत कक्षा में कापियाँ दिखाई जाती थी अर्थात् छात्रों का प्रदर्शन दिखाए जाने की प्रथा थी. अधिक स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो 'आइना दिखाने' का चलन भी था.

हमारे एक सहपाठी कक्षा में दुर्लभ आसन में विराजते थे. वे बिना हत्थे की कुर्सी पर, कुर्सी की पीठ से वक्ष हटाकर वह उसके ऊपर चिबुक टिकाकर बैठते थे. इस दुर्लभ आसन वाले सहपाठी का प्राप्तांक सौ में से चार अंक था.  इन अंकों को देखकर अकस्मात् उन्हें पितृ-स्नेह का स्मरण हो आया था. फिर किसी अज्ञात प्रेरणा ने उन्हें ढ़ाढ़स बँधाया था.

उन्होंने लाल रोशनाई से एक रचनात्मक कार्य करने की ठान ली थी. कॉपी के शीर्ष पर 'चार' अंक के सम्मुख 'एक और चार' टिका दिया था. वैसे तो यह साहसिक कृत्य था. पर इस रहस्य को उन्होंने रहस्य ही रहने दिया था.

इन अंको की ब्रॉड-शीट में एंट्री की जाती है. इस अवसर पर गुरुजी ने अपनी स्मरण-शक्ति पर सारा जोर लगा डाला था. तो भी उनके स्मृति-कोष ने उन्हें सूचना दी कि-"उन्होंने उच्चतम स्कोर चालीस तक ही तो लुटाए हैं. फिर ये चवालीस का चमत्कार कैसे संभव हो सकता है." इस झोल को वे कुछ-कुछ समझ चुके थे. उन्होंने कॉपी की पुन: संवीक्षा की. कूटरचना का अनावरण हो चुका था. इस उद्विग्नता में उन्हें रात भर नींद नहीं आई थी.

अगले दिन असेंबली हो चुकी थी. दुर्लभ आसन वाले शिष्य कक्षा की ओर जा रहे थे. सहसा उसने अपने हाथ में एक फंदा-सा महसूस किया था. वह रुका, मुड़ा, मुड़कर देखा तो गुरुजी उसका पाणि ग्रहण चुके थे. वे खींचते हुए उसे प्राचार्य कक्ष की ओर ले जा रहे थे. जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़कर प्राचार्य कक्ष के दरवाजे से वे अलक्षित हो चुके थे. भीतर प्राचार्य उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. प्राचार्य ने इससे बड़े प्रेम से पूछा, "घबराने की कोई बात नहीं है. अपने मतलब के लिए तो क्या-क्या नहीं करना  है." ये सटासट-सटासट अपनी कार्रवाई का सारांश बता चुके थे. गुरुजी की विजयी मुस्कुराहट प्राचार्य की सूझ-बूझ की प्रशंसा कर रही थी. संक्षिप्त अभियोग चला था. 'समरी ट्रायल' टाइप का.

उसके पश्चात् जूरी ने छापामार युद्ध संहिता का पैंतरा अपनाया था. संयुक्त आक्रमण कर शत्रु को धराशायी किया जा चुका था. वैद्य नें इन्हे सप्ताह भर का विश्राम सुझाया था. औषध-पथ्य का नियमित सेवन भी कराया था. अगले सप्ताह सहपाठी दुर्लभ आसन पर पुनः विराजे हुए थे.

किसी छोटी कक्षा में तो इससे भी बड़ा चमत्कार हुआ था. यह 'दुर्लभ में दुर्लभतम्' टाइप का नवाचार था. किसी छात्र का प्राप्तांक सौ में से एक अंक था. पितृ-स्नेह का स्मरण होने पर उसने दाईं ओर एक शून्य बढ़ा दिया. उसके हितेषी मित्र ने उसे समझाया, "जुर्म करने पर भी ये मार्क्स, पासिंग मार्क्स नहीं बने हैं." इन वचनों को सुनकर वह अत्यंत हर्षित हुआ. इस वाणी ने उसे नितांत कलात्मक प्रयोग के लिए प्रेरित किया था. अतः उसने एक ही झटके में एक और शून्य बना लिया था. इस प्रकार एक नवीन प्रतिमान स्थापित तो हो गया था. 'बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी.' इनकी बात भी बहुत दूर तक गयी थी. अत: अगले दिन इनका अभियोग फुल बेंच के द्वारा सुना गया था. सूत्रों के अनुसार इन्हें बारी-बारी से धोया गया था. परिणाम सुनकर यह कक्षा में आए. तो ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो चौदहवीं शताब्दी के हों और अभी-अभी उत्खनन में प्राप्त हुए हों.


 गणित को भाषा में भी उच्च स्थान प्राप्त है. सद्भावना में एक और एक ग्यारह, दिन दूनी रात चौगुनी, चौदहवीं का चाँद का प्रयोग सुनने को मिलता है. विपरीतार्थक फेहरिस्त ज्यादा लंबी है. नौ दो ग्यारह होना, तीन में न तेरह में,  तिया-पाँचा करना, छत्तीस का आंकड़ा, दो और दो पाँच करना, आठ-आठ आँसू रोना व निन्यानबे के फेर में, बहुश्रुत उदाहरण है.

ललित मोहन रयाल 

Wednesday, April 5, 2017

आसमान हो गया

वर्षा में भीगकर
- इब्बार रब्बी

वर्षा में भीगकर
सहज सरल हो गया,
गल गईं सारी क़िताबें
मैं मनुष्य हो गया.
खाली-खाली था
जीवन ही जीवन हो गया,
मैं भारी-भारी
हल्का-हल्का हो गया.
बरस रही हैं बूंदें
इनमें होकर
ऊपर को उठा
लपक कर तना
पानी का पेड़
आसमान हो गया
वर्षा में भीगकर
मैं महान हो गया.



[1980]

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

दिलीप मंडल की फेसबुक वॉल से ली गयी यह पोस्ट नेशनल दस्तक से साभार ली गयी है. दोनों का शुक्रिया.


गरीब, अनपढ़, आदिवासी किसान के बेटे का जेएनयू में अध्यापन तक का सफरनामा
- गंगा सहाय मीणा

राजस्‍थान के सवाई माधोपुर जिले के सेवा गांव के एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुआ. मां-पिता अनपढ़ मेहनती किसान. आसपास के अधिकांश बच्‍चों की तरह मेरे भी जन्‍म की तारीख कहीं दर्ज नहीं की गई. बाद में पूछने पर थोड़ी याद, थोड़े तुक्‍के से बस इतना बताया गया कि बाजरा बोने जा रहे थे और उस दिन शायद दोज थी. दूसरा तुक्‍का फलां से एक महीने बाद में पैदा हुआ और फलां से 6 महीने बड़े हो. सब जोड़ घटाकर तुक्‍का इस तरह बना कि मेरा जन्‍म 1982 की जुलाई में हुआ होगा. बाद में जब 10 जुलाई 87 को पिताजी स्‍कूल में नाम लिखाने गए, उन्‍होंने कहा कि 'छोरा पांच साल को होगो'. इस तरह मास्‍टर जी द्वारा मेरी जन्‍मतिथि दर्ज की गई 10 जुलाई 1982.

शुरू से मैं एक सामान्‍य लड़का रहा हूं. बल्कि सामान्‍य से भी नीचे. मैं किसी चीज में कभी अव्‍वल नहीं रहा. किसी भी चीज में नहीं. न पढ़ने में और न खेलने में. बोलने में तो बिल्‍कुल नहीं. बल्कि मैं इतना संकोची रहा हूं कि गांव और स्‍कूल में भी बोलने से डरता था. मैं उस परिवेश से हूं जहां बच्‍चों की परवरिश को बहुत तवज्‍जो नहीं दी जाती. ज्‍यादातर लोग दो वक्‍त की रोटी के जुगाड़ में दिनभर खेतों में खटते रहते हैं इसलिए उनके पास अपने बच्‍चों के लिए पर्याप्‍त समय ही नहीं होता. फिर धीरे-धीरे इसकी आदत हो जाती है और समय होने पर भी यह प्राथमिकता में नहीं होता. मैंने तमाम बच्‍चों को ऐसे ही पलते देखा है. पहले मां के फटे-पुराने लहंगे में खाट पर गंदगी में लिपटे हुए. थोड़ा बड़ा होने पर खेत की डौड़ (मेड़) पर नीम या बबूल के पेड़ के नीचे मिट्टी में लेटे हुए. 

वहां छोटे बच्‍चों को खाना खिलाने के लिए उनके पीछे नहीं भागना पड़ता बल्कि वे बच्‍चे खाने के पीछे भागते थे. खाना क्‍या? बाजरे की रोटी या राबड़ी. घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण हम ज्‍यादातर दूध बेच देते थे. उससे मेरी व भैया की पढाई का और घर का खर्च चलता था. बड़े होने पर पता चला कि देश के दूसरे हिस्‍सों के ज्‍यादातर आदिवासी दूध नहीं बेचते और न ही दूध पीते हैं क्‍योंकि वे मानते हैं कि उस पर सिर्फ बछड़े का हक है. हालांकि मेरी दूध पीने की आदत कभी विकसित नहीं हो पाई. चूंकि बचपन से नहीं पिया तो बाद में पीने पर पेट खराब हो जाता था इसलिए अब तक दूध से कोई रिश्‍ता नहीं बन पाया है. गेहूं की रोटी और सब्‍जी घर में रिश्‍तेदार आने पर ही मिलती थी. गेहूं महंगा था और पानी की कमी के कारण खेत में पैदा नहीं होता था इसलिए साल में कुल एक-दो महीने ही खाया जा सकता था. सब्‍जी के नाम पर ज्‍यादातर पड़ौस से मांगकर लाई गई छाछ से बनी कढ़ी या घर की (चना, सरसों आदि) कोई अन्‍य सब्‍जी. हर सब्‍जी रसेदार होती थी. पावभर पूरे परिवार को. खूब मिर्ची डाली जाती ताकि सब्‍जी खत्‍म हो जाने का कोई खतरा न हो. धीरे-धीरे उतनी मिर्ची खाने की आदत भी हो गई. जिस दिन सब्‍जी नहीं बनती उस दिन या तो कांदे (प्‍याज) को मुक्‍का देकर उससे रोटी खाते या साबुत लाल मिर्च को चकला (सिलबट्टा) पर पीसकर उससे रोटी खाते.

मैंने हमेशा सरकारी संस्‍थानों से ही पढ़ाई की. कभी किसी प्राइवेट संस्‍था से कोई संबंध नहीं रहा. पहली से पांचवीं तक राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सेवा (सरला); छठी से दसवीं तक राजकीय माध्‍यमिक विद्यालय, सेवा; 11वीं-12वीं- राजकीय उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय, गंगापुर सिटी और बी.ए. राजकीय महाविद्यालय, गंगापुर सिटी. एम.ए., एम.फिल. और पीएच.डी. JNU से. मास कम्‍युनिकेशन का डिप्‍लोमा केन्‍द्रीय हिंदी संस्‍थान से.

पढ़ने से भविष्‍य बदल सकता है, यह तो पिताजी को तथा अन्‍य घरवालों को पता था लेकिन घर में कोई पढ़ाई का माहौल नहीं था. सुबह अपने से गांव के कुएं पर नहाकर स्‍कूल जाओ. कुआं चारों तरफ से एकदम खुला था. सर्दियों में बड़ा मुश्किल होता खुले में ठंडे पानी से नहाना. ऐसा लगता कि जैसे सिर के अंदर खून जम गया है. दूसरी दिक्‍‍कत थी कि कुएं से पानी खींचते समय लगता कि अब गिरा, अब गिरा. तैरना आता था नहीं, इसलिए बहुत डर लगता था. इसके बावजूद सुबह लेज (रस्‍सी)-बाल्‍टी लेकर कुएं की ओर चल देने से ही दिन की शुरूआत होती. छीके में सूखी रोटी रखी रहती थी. स्‍कूल में रेस्‍ट (इंटरवेल) होने पर वही रोटी खाकर वापस चला जाता था. तब तक सारे लोग खेत में काम करने जा चुके होते थे. स्‍कूल से आकर फिर घर पर रहो या खेती के काम में मदद करो. अपने कपड़े खुद साफ करो. नहाने और कपड़े धोने का एक ही साबुन था- संसार सोप. एक रुपये से तीन रुपये की बीच की अलग-अलग साइज की साबुन की बट्टी आती थी. खुद ही होमवर्क करता था क्‍योंकि भैया की पढ़ाई में थोड़ी कम रुचि थी और ज्‍यादातर बाहर रहते. परिवार में अन्‍य कोई पढ़ा था नहीं. रात में थोड़ी देर कैरोसीन के दीये के उजाले में पढ़ता जिसमें रोशनी कम धुआं ज्यादा निकलता. यही दिनचर्या थी. एक संकोची सा. खुद से संवाद करने वाला. कुछ इसी तरह का बचपन था.

बहन मुझसे ढाई-तीन साल बड़ी है. इसलिए जो थोड़ा-बहुत खेलता था, उसी के साथ खेलता था. वहीं माटी में. हमारे पास कभी कोई खिलौना नहीं रहा. शायद उन दिनों खिलौने होते नहीं थे. होते होंगे तो हमने नहीं देखे. बेसरम के पौधे के फल में बबूल का कांटा लगा फिरकनी बनाते, बबूल के कांटे में ही आम का पत्ता लगा हवा के विपरीत कर घुमाते, एक घास या धागे में कंकड़ बांधकर ढोलापासी बनाते या फिर फटे-पुराने कपड़ों की लीर से गेंद बनाकर खेलते. आसपास के बच्‍चे कंचे खेलते, क्रिकेट खेलते, थो-गडा खेलते, आइस-पाइस खेलते, रामण बल्‍ला खेलते, पहली नमस्‍ते खेलते तथा और भी कई खेल खेलते लेकिन खेल में फिसड्डी होने के कारण या अन्‍य किसी वजह से वे मुझे अपने साथ नहीं खिलाते थे.

घर में हमेशा एक या दो भैंस, एक पडा या पडिया और एक गाय रही. खेती के लिए दो बैल भी रहे हैं. राजस्‍थान में, जहां चारे की बहुत समस्‍या है, इतने जानवर पालना बहुत मुश्किल होता था. आज की सोच का कोई व्‍यक्ति होता तो शायद इस झमेले में नहीं पड़ता. लेकिन उस वक्‍त ये जानवर किसान जीवन का अनिवार्य हिस्‍सा थे. अपने खाने को हो न हो, जानवर भूखे नहीं रहने चाहिए. जानवरों को पानी पिलाने भी बहुत दूर जाना पड़ता था. अक्‍सर मैं ही पानी पिलाने जाया करता था. बैल खेत जोतने के काम आते थे. काका (पिताजी) और भैया खेत जोतने का काम करते थे. अपनी 8-10 बीघा के आसपास की कुल जमीन को खुद ही जोत लेते थे. भैया की पढ़ाई में कम रुचि थी इसलिए उन्‍होंने शुरू से खेती का काम किया. मैं पढ़ाई में औसत था इसलिए मुझसे खेती का काम बहुत कम कराया. बहन निरक्षर रह गई. शायद एक दिन भी स्‍कूल नहीं गई, इसलिए उससे बहुत काम कराया. जीजी (माँ) और बहन ने मजूरी भी की- खासतौर पर नींदणी और लावणी में. जीजी ने तो मिस्टॉल में भी काम किया काफी दिन.

जब हम बहुत छोटे थे, 5-7 साल के, तो मैं और बहन गोबर बीनने जाते थे. हां, खेतों से गोबर बीनते थे, जलाने के लिए. शायद उन एक-दो वर्षों में हमारे घर में भैंस नहीं थी इसलिए जलाने के कंडे बनाने के लिए गोबर की जरूरत होती थी. पड़ौसी गांव जीवली के खेतों तक हम गोबर बीनते थे. एक बार तो हम गोबर बीनते-बीनते खो गए थे. अपना नाम-पता बताना भी ठीक से नहीं आता था. बड़ी मुश्किल से घर पहुंचे.

मालूम है हमारी सबसे बड़ी हसरत क्‍या थी- रोड के किनारे जाते वक्‍त बस या ट्रक से गिरा हुआ कोई लोहे का टुकड़ा मिल जाए, जिससे हम अमरूद या नाशपाती या फूट खरीद लें! मेरी एक दूसरी हसरत भी थी, जो व्‍यक्तिगत थी कि पर्वाई पौन (पूरब से चलने वाली हवा) हो जाए और कोई पतंग कटकर हमारे घर में आ जाए. घर से कभी पतंग खरीदने के लिए पैसे नहीं मिलने और पतंग लूटने में फिसड्डी होने की वजह से देवी मैया से यही प्रार्थना करता रहता कि पर्वाई पौन हो जाय. मैं बचपन में पूरा धार्मिक था.

बहन और मैं गोबर बीनने के अलावा सरसों भी बीनते थे. हां, सरसों कटने के बाद खेत में और खेत से खलिहान के रास्‍ते में सरसों की इक्‍की-दुक्‍की डालियां गिर जाती थीं. दिनभर उनको बीनकर कूटते और साफ कर बणिया की दुकान पर बेच आते. सामान्‍यतः वो सरसों पचास पैसे से डेढ़ रुपये के बीच की होती. उसका पापड़ (आज की आलू चिप्‍स जैसा कुछ होता था) या नमकीन खा आते. खलिहान उठने पर भी ऐसा ही करते. खलिहान उठना यानी खलिहान से सारा काम खत्‍म होने पर जब किसान सरसों बोरी में भरकर घर ले जाते हैं. तब हम सरसों की फांफरी और टांटे को साफ कर थोड़ी सरसों निकाल ही लेते थे. मूंगफली खोदने के बाद जमीन में से मूंगफलियां ढूंढते.

इस तरह दो भाई, एक बहन और मां-बाप, एक छोटा सा सामान्‍य किसान परिवार. जिसके पास न कोई जमा-पूंजी थी और न (बहन की शादी से पहले) किसी का कर्ज. पहनने को कभी एक जोड़ी से ज्‍यादा कपड़े नहीं रहे. वो भी केवल स्‍कूल वाले. सफेद सर्ट और खाकी निक्‍कर. निक्‍कर में सामान्‍यतः पाती लगी होती. चड्डी-बनियान भी एक ही जोड़ी थे. एक दिन धोता, दूसरे दिन पहनता. 10वीं क्‍लास में पहला पैंट सिलाया गया, वो स्‍कूल के लिए खाकी वाला क्‍योंकि 10वीं के बच्‍चों के लिए पैंट जरूरी था. 10वीं या 11वीं में पहली टीशर्ट पहनी. बी.ए. फर्स्‍ट या सैकंड ईयर में पहला स्‍वेटर पहना. भैया की नौकरी लगने पर वह लाए थे. 10वीं से बी.ए. तक उतरन के कपड़े ही पहनने को मिले.

बी.ए. के तीनों साल परीक्षा देने के अलावा कोई पढ़ाई नहीं की. बहन शादी होकर ससुराल चली गई थी और भैया पढ़ाई के लिए बाहर चले गए तो घर में मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई थी. पता नहीं कॉलेज में क्‍लास होती भी थी या नहीं! जुलाई से अक्टूबर तक गांव में दिनभर गाय-भैंस चराता और शाम को चरी की कुट्टी करता. सामान्‍यतः हम भैंस तालाब की पाड़्य पर चराया करते. वहीं बैठकर दिन में ताश भी खेलते. यही दिनचर्या थी. 

यह बाबा आदम के जमाने की कहानी नहीं, 2001 ईस्वी तक के जीवन की एक छोटी सी झलक है. जानता हूँ कि आपमें से बहुत से साथियों का जीवन इससे काफी मिलता-जुलता रहा होगा. हमसे बाद वाली पीढ़ी का बचपन इससे भिन्न रहा है. पिछले दशक में दुनिया काफी तेजी से बदली है. 2001 के बाद मेरी जिंदगी भी पूरी तरह बदल गई. 

मेरी जिंदगी बदलने वाली दो घटनाएं उस वर्ष (2001 में) घटी. मई-जून के महीने में जब जेएनयू की प्रवेश परीक्षा देने पहली बार दिल्‍ली आया था तो पिताजी दुनिया छोड़कर चले गए. इससे जीवन में ऐसी रिक्‍तता आई जो कभी नहीं भर पाएगी. 16 साल होने को हैं लेकिन दिल ये मानने को तैयार नहीं है कि पिताजी छोड़कर चले गए! सच्‍चाई यह है कि पिताजी के होने पर एक जीवन था, पिताजी के बाद दूसरा जीवन है. 

2001 के ही जुलाई में मेरा जेएनयू में पढ़ने के लिए चयन हो गया. मैं 10 जुलाई 2001 के आसपास पहली बार जेएनयू आया. ऐसे ही चलता-फिरता. डीयू गया था एम.ए. हिन्‍दी का फॉर्म भरने, लेकिन देर से पहुंचा इसलिए भर नहीं पाया. सोचा क्‍यों न इस जेएनयू नाम के 'कॉलेज' को देख लिया जाए. भैया के कहने पर जेएनयू की प्रवेश परीक्षा तो दे दी थी लेकिन अभी तक मेरा खयाल था कि ये कोई प्राइवेट 'कॉलेज' है क्‍योंकि राजस्‍थान में सरकारी कॉलेजों के नाम के आगे 'राजकीय' लिखा होता है. पूछताछ कर जेएनयू आने के लिए मोरी गेट से 621 नंबर की बस (उन दिनों 615 के अलावा 621 भी पूर्वांचल तक आती थी) में बैठा. कडक्‍टर ने पूछा, 'कहां जाना है', तो मेरा जवाब था, 'जेएनयू' जाना है'. कंडक्‍टर ने फिर पूछा, 'जेएनयू में कहां उतरना है', मैंने कहा, 'जेएनयू उतरना है'. तब तक मैंने सोचा भी नहीं था कि एक यूनिवर्सिटी में भी कई (सात) बस स्‍टॉप हो सकते हैं. अंततः मैंने कह दिया कि वहां उतार दीजिएगा जहां रिजल्‍ट आता है. कंडक्‍टर ने मुझे एड-ब्‍लॉक वाले बस स्‍टैंण्‍ड पर उतार दिया. प्रशासनिक भवन में घुसते ही देखा कि प्रवेश परीक्षा के परिणामों की सूचियां लगी हुई थीं. एम.ए. हिन्‍दी की सूची में सबसे ऊपर मेरा नाम लिखा हुआ था. मुझे अच्‍छा लगा लेकिन कुछ खास या ऐतिहासिक नहीं. मुझे नहीं पता था कि वो पल मेरी जिंदगी बदलने वाला पल साबित होगा.
      
मैंने अंदर जाकर (जहां प्रवेश शाखा लिखा था) एक सक्रिय दिख रहे व्‍यक्ति (श्री टेकचंदानी, उनका नाम काफी बाद में पता चला) से कहा, 'सर, बाहर लिस्‍ट में मेरा नाम है'. उन्‍होंने खुशी और स्‍वागत के अंदाज में कहा, 'बहुत बधाई हो, 15 से 22 तारीख के बीच 12 फोटो और अपने दस्‍तावेज लेकर प्रवेश के लिए आ जाना'. 'ठीक है' कहकर मैं सहज भाव से वापस अपने भैया के कमरे पर (बदरपुर बॉर्डर) चला गया. जेएनयू की प्रवेश सूची में अपना नाम देखना उस वक्‍त मेरे दिमाग में कोई उत्‍तेजना पैदा नहीं कर सका, इसकी दो वजहें थीं- पहला, जेएनयू की प्रवेश परीक्षा देने और परिणाम आने के बीच (7 जून, 2001 को) मेरे पिताजी का निधन हो गया था. उन दिनों मैं जेएनयू (एम.ए.), दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय (बी.एड.) आदि की प्रवेश परीक्षाएं देने पहली बार दिल्‍ली आया था, इस वजह से आखिरी समय में पिताजी के पास नहीं था. दूसरी वजह यह थी कि मैं तब तक जेएनयू के बारे में कुछ जानता नहीं था. उस वक्‍त मेरे लिए जेएनयू किसी भी सामान्‍य कॉलेज या यूनिवर्सिटी से कुछ ज्‍यादा नहीं था. लिस्‍ट में नाम देखने के बाद मैं गांव गया. जहां मुझे मेरे गांव के एक व्‍यक्ति (जो जेएनयू में पढ चुके थे) और उनके भाई (जो राजस्‍थान प्रशासनिक सेवा में हैं) ने कहा कि 'जेएनयू अच्‍छी यूनिवर्सिटी नहीं है. अगर नौकरी लगना है तो जेएनयू मत जाओ. वहां तुम्‍हें कभी 'ए' ग्रेड नहीं मिलेगा'. 
      
इस तरह मेरा जेएनयू आना किसी जुनून या लंबी तैयारी का नतीजा नहीं था. बल्कि सारी परिस्थितियां प्रतिकूल थी. मेरे चयन का पत्र भी आज तक मेरे घर तक नहीं पहुंचा. उस दिन अनायास ही जेएनयू नहीं आया होता और लिस्‍ट में अपना नाम नहीं देखा होता तो शायद मुझे पता भी नहीं चल पाता कि मेरा यहां चयन भी हुआ है. जेएनयू में मेरा कोई जानकार भी नहीं पढता था जो मुझे बताता कि मेरा चयन हुआ है. ऐसी स्थितियों में भी पता नहीं क्‍या सोचकर मैं जेएनयू आ गया. शायद मेरे फूफाजी की प्रेरणा से. एक मेरे फूफाजी ही थे (उन दिनों वे कैंसर से पीडित थे और कुछ समय बाद गुजर गए) जिन्‍होंने मुझे जेएनयू प्रवेश परीक्षा में पास होने पर बधाई दी. शायद तब मेरे परिवार और समस्‍त रिश्‍तेदारों में केवल उन्‍हीं ने जेएनयू का नाम सुना था. मुझे मेरे अनपढ किसान मां-बाप ने खेती और मजूरी करके पढाया. वे आगे की पढाई और जेएनयू के बारे में तो नहीं जानते थे लेकिन मेरे पिताजी की मुझे लेक्‍चरर बनाने की हार्दिक इच्‍छा थी. काश, उनको दो महीने की जिंदगी और मिली होती तो मैं उन्‍हें जेएनयू लाता. अपना सपना पूरा होने की शुरूआत वे अपनी आंखों से देख पाते. आज मैंने इस भारत के सर्वश्रेष्‍ठ विश्‍वविद्यालय में अध्‍यापन का एक दशक पूरा कर लिया, जहां इसकी अपार खुशी है वहीं मेरे मां-पिता यह दिन देखने के लिए इस दुनिया में नहीं है, यही सबसे बड़ा गम है.

(गंगा सहाय मीणा जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. यह नोट उन्होंने यहां अध्यापन के 10 साल होने पर लिखा है.)


Tuesday, April 4, 2017

किशोरी अमोनकर के नाम में ही एक मंथरगति की नदी थी

किशोरी अमोनकर (11 अप्रैल 1931-3 अप्रैल 2017)
फ़ोटो: प्रसाद पवार 

किशोरी अमोनकर नहीं रहीं. वो उस्ताद अलादिया खां की शिष्या कुशल गायिका मोगूबाई कुर्डीकर की बेटी थीं. पिछले कई साल से उनको देख सुन ना पाने की वजह से मन इस बात के लिए तैयार था कि एक दिन उनके मरने की खबर से एक बार फिर उनकी याद ताज़ा हो जाएगी.

मैंने अपने बचपन में जब उन्हें पहली बार दूरदर्शन पर गाते हुए देखा तब शास्त्रीय संगीत में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. वैसे भी दूसरे शास्त्रीय गायक जिस तरह मुंह टेढ़ा-मेढ़ा बनाया करते थे और अजीब-अजीब आवाजें निकालते थे, तब वो सब बहुत बेकार लगता था. जबकि किशोरी अमोनकर के नाम में ही एक मंथरगति की नदी थी.

लम्बोतरे चेहरे की लय नुकीली ठुड्डी पर आकर इस तरह का अवरोह लेती कि 'सहेला रे आ मिल गाएं' का हल्का सा आमंत्रण सैकड़ों मील दूर से झट बुला लाता. 'एक ही संग हुते जो तुम तो ... कहते हुए मुलायम जुल्फों के एक घने परदे से वो मुझे देखतीं और झट आसपास जुट रहे सुरों में उसे तलाशने लग जातीं .

ऐसा बहुत बरसों तक होता रहा और मैं मल्लिकार्जुन मंसूर, पंडित कुमार गन्धर्व, फैयाज़ खान साहब और भीमसेन जोशी की सीटों से गुज़रता हुआ उनकी बगल में बैठ गया. सफ़र लंबा चला और वो कहती रहीं घट घट में पंछी बोलता ... दुहराती रहीं बोलता. मैं हठ करता रहा कि कभी इस पर लम्बी बात करें और वो झिड़कती रहीं. यही मुझे उम्मीद थी और इसमें कोई शिकायत क्यों होती. मुझे उनके वो घाव मालूम थे जो उन्होंने फिल्मो के लिए गाकर कमाए थे; तो क्या, वो घाव तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के भी कभी नहीं भरे.

भरेंगे तो वो घाव भी नहीं जो आज रचनाविरोधी समय रच रहा है.

जाओ किशोरी जहां रहो शान्ति और सुख से रहो . हाँ हम कितने दिन तुम्हारा रचा मंथर जिद्दी और कलकल बहता संगीत बचा पाएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं लेते.

-सैयद मोहम्मद इरफ़ान

Saturday, April 1, 2017

पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा

केदारनाथ अग्रवाल (1 अप्रैल 1911 - 22 जून 2000)

आज केदार जी जन्मदिन है. अगस्त 2013 में छपी कबाड़खाने की तीन हजारवीं पोस्ट उन्हीं को समर्पित थी. उन्हें याद करते हुए उनकी यह आशाभरी कविता लगाने की हिम्मत हो रही है -  


पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा
 - केदारनाथ अग्रवाल

इसी जन्म में,
इस जीवन में,
हमको तुमको मान मिलेगा.
गीतों की खेती करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा.

क्लेश जहाँ है,
फूल खिलेगा,
हमको तुमको ज्ञान मिलेगा.
फूलों की खेती करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा.

दीप बुझे हैं
जिन आँखों के,
उन आँखों को ज्ञान मिलेगा.
विद्या की खेती करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा.

मैं कहता हूँ,
फिर कहता हूँ,
हमको तुमको प्राण मिलेगा.
मोरों-सा नर्तन करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा.

रमज़ी तस्किरान के चित्र - 5









रमज़ी तस्किरान के चित्र - 4










रमज़ी तस्किरान के चित्र - 3










रमज़ी तस्किरान के चित्र - 2










रमज़ी तस्किरान के चित्र - 1

तुर्की के समकालीन चित्रकार रमज़ी तस्किरान (जन्म 1961)  के चित्र देखिये -