Friday, August 3, 2018

दिल जलता है तो जलने दे

फ़िल्मी गानों की समीक्षा –  2
दिल जलता है तो जलने दे

प्रस्तावना: दिल अर्थात हृदय के अस्तित्व को लेकर विशेषज्ञ अभी एकमत नहीं हो सके हैं. कोई कहता है कि यह मनुष्य की आत्मा का दूसरा नाम है तो कोई इसे मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा वहम बतलाता है. एक अपेक्षाकृत नवीन चलचित्र का नायक इसे कैमिकल लोचे के स्रोत का नाम देता है. इसके बावजूद सर्वमान्य सर्वज्ञात तथ्य है कि इसके बगैर हमारी फ़िल्में लूली हो जातीं. फिल्मों ने लम्बे समय से सामाजिक जागरण तथा मानवता का सन्देश देने का ठेका उठा रखा है. तो ऐसा माध्यम विकलांग कैसे हो सकता है? इसका एक आर्थिक पहलू यह भी है कि फ़िल्में लूली नहीं हो सकतीं क्योंकि उनके निर्माण में बड़ा रुपया लगता है.
काव्य समीक्षा: राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत यह कविता देश के नागरिकों से अपील करती है कि उसे अपने कैमिकल लोचे से तनिक भी न घबराते हुए, बिना शिकायत किये सभी परेशानियों को झेलते चले जाना चाहिए. शास्त्रों में जीवन को दुखों का सागर बताया गया है. यहाँ पर्दानशीं अर्थात घूंघट के पीछे बैठी प्रेमिका से कवि का आशय उस आर्थिक सामाजिक उन्नति से है जिसकी प्रत्याशा में इस गीत को विभिन्न संस्करणों-रूपों में चालीस के दशक से गाया जा रहा है. मनुष्य को अपनी ग़ुरबत का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वह विकास रूपी ऐसी नायिका का प्रेमी है जो अपना मुँह इस जन्म में तो दिखाने से रही.
"दिल जलता है तो जलने दे
आँसू ना बहा फ़रियाद ना कर
तू परदानशीं का आशिक़ है
यूँ नाम-ए-वफ़ा बरबाद ना कर"
कविता का दूसरा पैरा अत्यधिक प्रेरक है जिसमें अपने आप को पहले से और अधिक घायल बनाने की ललकार है – “मासूम नजर के तीर चला, बिस्मिल को बिस्मिल और बना.” देशभक्त को कोई लाज शर्म नहीं होनी चाहिए, ऐसा कवि का मंतव्य है.
कवि कहता है कि हे पाठको! मैं खुद जीवन भर अपने विकास की उम्मीद लगाए रहा लेकिन तमाम वायदों के बावजूद वह नहीं हो सका. अंतिम कराह के रूप में वह विकास से मुखातिब होता है – “या सूरत आ के दिखा जाओ!” लेकिन अपनी वास्तविकता और राष्ट्रीय कर्तव्य का भान होते ही वह स्वयं को चेतावनी देता है – “या कह दो हमको याद ना कर”
पचास के दशक के आलोचकों के हिसाब से कवि ने मूल कविता का शीर्षक यूं रखा था – “आंसू ही बहा फ़रियाद ही कर.” इस बाबत कोई आधिकारिक मतैक्य न होने के कारण इस विषय को छोड़ दिया जाना ही श्रेयस्कर है. इक्कीसवीं शताब्दी के परिप्रेक्ष्य में यह कविता इतनी कालजयी साबित हुई है कि हैरानी होती है इसे अब तक राष्ट्रीय गीत या धरोहर घोषित क्यों नहीं किया गया. इसके बड़े उद्देश्य की प्राप्ति लिए एक बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है. कविता के अंत में नायक बारम्बार चीखता हुआ अपने कैमिकल लोचे की घोषणा करता है और गर्व से कहता है कि वह राष्ट्रभक्त है. कि उसकी गरीबी ही उसका धर्म है. कि उसका विकास से वंचित रह जाना ही उसकी जीस्त का मानी है. उसकी घोषणा में जनता के लिए एक आवश्यक आह्वान है.
वीडियो रिव्यू: इस कविता के फिल्मांकन हेतु काले और सलेटी रंगों वाले सैट का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. बेहतर है इसे ब्लैक एंड व्हाईट में शूट किया जाए. ऐसा ही किया भी गया है. नायक का मनहूस और उदास होना अनिवार्य है. नायिका विकास के स्वप्न सरीखी सुन्दर लेकिन मनहूस दिखनी चाहिए. यह निर्देशक की प्रतिभा और कला की समझ पर निर्भर करता है कि वह ऐसी खूबसूरत हीरोइन को भी मनहूस कैसे दिखा सकेगा. कविता की अंतिम पंक्तियों के फिल्मांकन के लिए नायक के सामने एक छोटा और पिद्दी काष्ठस्तम्भ होना चाहिए जिसे उखाड़ने का प्रयास करते हुए वह अंतिम चीत्कार कर सके. इससे दर्शकों में कविता के समाप्त हो जाने के उपरान्त भी जिज्ञासा बनी रहती है कि नायक कुछ उखाड़ पाया कि नहीं.

मोतीलाल और मुनव्वर सुल्ताना बड़े कलाकार थे. बिचारे निभा ले गए. भारत कुमार के नाम से जाने वाले मनोज कुमार और सुरती से काले पड़े दांतों वाले आज के एक देशप्रेमी नायक इस कविता के नवीन फ़िल्मी संस्करण में कैसे और कैसी जान फूंकते यह अटकलों का विषय है.

पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले

फ़िल्मी गानों की समीक्षा – 1
पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले

काव्य समीक्षा: कविता की पहली पंक्ति में नायक जीवन की क्षणभंगुरता की तरफ इशारा करते हुए नायिका द्वारा फकत एक पल के लिए झूठा प्यार कर लिए जाने की अभिलाषा व्यक्त करता है कि “पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले!” सामान्य दृष्टि से देखा जाय तो प्रेम को यहीं से कविता की मूल आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित करने का उद्यम प्रारम्भ किया जाता प्रतीत होता है. 
लेकिन नायक के झूठ और उसकी बदनीयत का पर्दाफ़ाश अगली ही पंक्ति में हो जाता है – “दो दिन के लिए कोई इकरार कर ले.” 
मल्लब एक पल से सीधा दो दिन. अगर एक पल को एक बार के लिए एक सेकेण्ड के बराबर मान लिया जाय तो वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध किया जा सकता है कि नायक जिस चीज के लिए बेकरार है उसके लिए उसकी उत्कंठा उसे शब्दों में अभिव्यक्त कर देने के अगले ही क्षण 86400x2 गुना बढ़ जाती है (ज्ञात हो कि एक दिन में 86400 सेकेण्ड होते हैं). इतनी तेज़ी से बढ़ने वाली कोई भी चीज़ केवल ईश्वर ही हो सकती है. इसकी तार्किक परिणति के रूप में नायक बहुत जल्दी ही वहां तक पहुँच भी जाता है और नायिका से शिकायत करता है कि उसके सभी उदात्त प्रयत्नों के बावजूद “राम में क्यों तूने रावण को देखा.” 
कविता के अगले छंद में नायक साम-दाम-दंड-भेद टाइप की सभी तिकड़में भिड़ाकर नायिका का करीब-करीब इमोशनल ब्लैकमेल करता हुआ पहले कहता है - “सुन सुन कर तेरी नहीं नहीं जाँ अपनी निकल जाए न कहीं” और बाद में अपने आत्मसम्मान के रक्षार्थ उसे उलाहना देता हुआ सूचित करता है कि “माना तू सारे हसीनों से हसीं है, अपनी भी सूरत बुरी तो नहीं है” 
इसके तुरंत बाद नायक को अचानक अपनी औकात का भान होता है और वह घिघियाता हुआ याचक बन जाता है “कभी तू भी हमारा दीदार कर ले झूठा ही सही” (*काफ़्का की एक कहानी में भी नायक का ऐसा ही कायांतरण होता है. नायक ग्रेगोर साम्सा एक अच्छे भले इन्सान से गुबरैले में तब्दील हो जाता है.) 
दीदार झूठा कैसे हो सकता है यह बहस का मुद्दा हो सकता है. हाँ भगवान का दीदार झूठा हो सकता है हालांकि उसमें भी शक है क्योंकि तुलसीदास जी हर सुबह भगवानजी का दीदार करने के बाद ही अगली चौपाई लिखना शुरू करते थे. 
फिल्मकाव्य के मनीषी जानते हैं कि एक पल से प्रारम्भ होने वाले प्रत्येक प्रकरण को जीवन की शाश्वतता तक पहुंचना अनिवार्य माना गया है. यही शास्त्रोक्त है. यह कविता भी इस पैमाने पर खरी उतरती है क्योंकि अंतिम अनुच्छेद के प्रारम्भ में ही नायक नायिका से कह चुकता है – “पल भर के प्यार पे निसार सारा जीवन.” 
रेखांकित किया जाना चाहिए कि इस पंक्ति में नायक की उत्कंठा 86400x2 गुना से सीधे 86400x365xA गुना बढ़ जाती है (फार्मूले में A=नायक का शेष बचा जीवन वर्षों में.) 
पैनी दृष्टि वाले पाठक/दर्शक समझ जाएंगे कि नायक का रूप धारे कवि मूलतः गणितज्ञ है तथा नायिका के गणित ज्ञान की परीक्षा लेने के बहाने उससे ठिठोली कर रहा है. कविता को अपने गणित के सिलेबस में लगाकर कोई भी शैक्षिक बोर्ड धन्य हो रहेगा. 
वीडियो रिव्यू: ऐसी कविता के फिल्मांकन के लिए ऐसे कक्ष का होना अनिवार्य है जिसमें दो दर्ज़न दरवाजे, तीन दर्ज़न खिड़कियाँ और एक सौ गवाक्ष हों. इन सब पर परदे लगें हों ऐसा ही प्रावधान है. परदे न हों तो वेनेशियन ब्लाइंड्स से काम चलाया जा सकता है. 

नायक-नायिका जितने हॉकलेट हों उतना बेहतर. 

पर ढंग के तीन मृत्युलेख भी न छपे अख़बारों में


हमारे समय के बड़े कवि की ताज़ा कविताओं की सीरीज़ – 3 

नया रिपोर्टर
-असद ज़ैदी  

एक दिन में दो हास्य कवियों का निधन!
अब इस पर रोना भी हँसने जैसा ही होगा.
रोज़ी रोटी तो उनकी खूब चली कविता से
पर ढंग के तीन मृत्युलेख भी न छपे अबारों में.

संस्कृति सम्पादक कुछ संवेदनशील टाइप के थे
इंदिरा गाँधी का ज़माना था
कहा दोनों के घर जाकर कुछ रिपोर्ट बना लाओ.

पहले हास्य कवि की विधवा से मैंने पूछा—
कैसे बने मुकुट जी हास्यकविबोलीहम बहुत निर्धन थे
धर्मयुग के पारिश्रमिक से महीने में तीन दिन का आटा
न आता था. हम रेडियो पर हास्य कवियों को
सुना करते थे. एक दिन हमनें इनसे कहा—
आप भी यह रास्ता पकड़ लो 
आमदनी का कुछ ज़रिया निकल आएगा,
रेडियो-टी वी पे आओगे तो कवि-सम्मेलनों में भी
बुलावे आने लगेंगे. इन्हें कुछ सद्-बुद्धि आई
भगवान ने हमारी सुन ली.
भगवान ने सुनी कि मुकुट जी ने आपकी सुन ली?
मैंने पूछा तो उसने ज़रा सर हिलाया और चुपचाप मुस्कुराई.
अच्छा ये बताइयेमैंने पूछाआपके पति के जीवन का
सबसे अच्छा क्षण कौन सा था?
उसने कहा—रघुवीर सहाय को इनकी भाषा पसन्द थी
एक बार फोन करके कहा—मुकुट बिहारी तुम्हारी
तहरीर इतनी अच्छी हैबोल इतने सुघड़पर विषय बड़े लचर...
ये बोले—रघुवीर जी आपको मैं क्या बताऊँ...
रघुवीर जी ने कहा—कुछ मत कहो,
हाँ यह बताओ शांति कैसी हैं?
बस भैयाऐसी ही मामूली सी बातें हैं
जिन्हें ये मूल्यवान समझते थे.

अब क्या करेंगी मैंने पूछा.
बोली—कुछ नहीं. बच्चों के बच्चे हैंउन्हीं से दिल लगाउँगी.

दूसरे कवि—अनोखेलाल 'ख़फ़ा’—की विधवा
स्वर्णलता से मैंने पूछा आपके अपने पति के बारे में
वास्तविक विचार क्या हैंउसने मुझे घूरकर देखा
पूछा—किस अबार से आये हो किस स्कूल के पढ़े हो?
तुम्हारी उम्र कितनी हैअपना नाम बताओ—पूरा!
मैंने कहा—सॉरी मैम! मैं नया हूँ अभी सीख रहा हूँ...
मैम फिर से रि-स्टार्ट करते हैं...
बोली—तुम्हें कैसे पता मैं टीचर हूँ मैंने कहा—मैम मुझे बिल्कुल नहीं पता!
तब उसने कहा चलो तुम्हें कुछ बताती हूँ.

इनका नाम अनोखेलाल 'ख़फ़ा’ नहीं सोहनलाल काबरा था
शादी के दो साल के भीतर ही दफ्तर में झगड़ा किया और नौकरी छोड़ दी
आवारागर्दी करने लगे और हास्य कविता का चस्का लगा लिया
तंग आकर मैं स्कूल की नौकरी करने लगी ये घर छोड़के जाने लगे
मैंने कहा जाते क्यों हो क्या मैं तुम्हें काटने दौड़ती हूँ?
तुम करो हास्य कवितामैं रोक रही हूँ क्यापर यह 
सोहनलाल काबरा नाम इस लाइन में चलने वाला नहीं.

अपनी बात के असर का पता मुझे यूँ चला कि एक साल के बाद
मेरे स्कूल ने मशहूर हास्यकवि अनोखेलाल 'ख़फ़ा’ को 
मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया और मैंने देखा ये तो अपने श्रीमान हैं
मुझे हैरान देखकर घबराएबोले—मुझे क्या पता था तुम यहाँ पर हो!
अब क्या बताऊँ पीठ पीछे सब स्कूल में मुझे मिसेज़ काबरा नहीं
मिसेज़ ख़फ़ा कहने लगे!

मैंने कहा—मैम यह क़िस्सा तो आपके शादीशुदा जीवन का रूपक हुआ!
रूपक?” अरे वाहशाबास!—वह बोली—कहाँ से सीख आए तुम यह सब!
खैर, ‘ख़फ़ा’ साहब की एक राबी बताती हूँ.
यूँ तो सफल थेपैसा भी बहुत बटोर लाते पर ये जो चाहते थे
होते होते रह जाता था मैंने एक बार कह दिया तो दुखी हुए
पद्मश्री मिलते मिलते रह गया
राज्यसभा में पहुँचते पहुँचते रह गए 
पिता भी बनते बनते रह गए
हमारी बेटी भी गोद ली हुई है बेटा भी 
अब तो हमारी एक नवासी है एक नवासा एक पोता भी
घर अपना है मेरी पेंशन भी होगी पर हाँ ख़फ़ा चले गए
और मुझे लगा मैम की आँखों में आँसू आया चाहते हैं.

4.4.2018

Thursday, August 2, 2018

यूजीन दे ब्लास की कुछ पेंटिंग्स - 2






यूजीन दे ब्लास की कुछ पेंटिंग्स - 1

यूजीन दे ब्लास 
उन्नीसवीं सदी के इतालवी चित्रकार यूजीन दे ब्लास (1843-1932) की कुछ पेंटिंग्स देखिये -







लब्ब यू


लब्ब यू
-विवेक सौनकिया
  
शुकुल बाबू ने दिमाग का दही कैसे बनायें विषय पर शोध कार्य हाल ही में संपन्न किया था और पापी पेट के सवाल पर नारद मुनि के पेशे में अल्मोड़ा आन टपके थे ठीक हमारी तरह. व्हाट्सऐप पर प्राप्त डिग्री के सहारे प्राप्त ज्ञान का आउटलेट खोलने के लिये अल्मोड़े में इधर से उधर डोलते शुकुल बाबू से एक तुलसी डबल जीरो के पान और चाय के साथ शुरू हुयी दोस्ती बिना किसी लिक्विडटी और लिक्विड के आज तक क़ायम है.

दिन प्रतिदिन प्रगाढ़ होने वाली दोस्ती से नारदमुनि के अन्य वंशज खासे चिढ़ते थे और अप्रत्यक्ष रूप से मौके बे मौके ताना मारने से न चूकने वाले हुये आपकी नज़र में खबर तो केवल शुकुल जी बनाते हैं बाकी सब तो चिंदी चोर ठैरे. कहीं यह आपका क्षेत्रवाद तो नहीं है.”

असल में पौने छै फुटिया, खिचड़ी बालों पर खिजाब न करने वाले, काले फ्रेम चश्मे वाले शुकुल कानपुर देहात के किसी गांव के रहने वाले हुये जो कानपुर में अपने कम माता पिता के सपने ज्यादा पूरे करने के लिये पढ़ने वाले और किराये के कमरे में रहने वाले हुये. पनकी में उनका कमरा हमारे गांव से मात्र एक सौ बीस किलोमीटर हुआ सो अल्मोडे़ के पत्रकार क्षेत्रवाद की गंध सूंघने में अपने आपको क़ामयाब मानते थे.

शुकुल जी अपनी कथित जवानी के दिनों से ही कथित तौर पर प्रेमी थे सो ऑफ द रेकॉर्ड उनकी कथित प्रेमिकाओं के किस्से गाहे बगाहे हमारे कानों में पड़ जाते थे.एक प्रेमिका का किस्सा बकौल शुकुल जी -

भैया कानयपुर की बात है. हम इंटर विंटर के लउडें रहे होंगे. घरई के पास एक ठो जादव रहा दूधिया”

फिर”

फिर का हम रोज सबेरे अपना बल्टा लइके जाते थे दूध लेने के ऐक दिन”

एक दिन”

ऐक दिन हमें महसूस भवा के कौनऊ पाछे से पीठ पर कंकरी धर दिहिस है.”

पलट के देखा तो जादो की लौंडिया हंसत हंसत भाग गई दुमंजिले पे”

फिर गुरू” कल्पनालोक में बन रहे बिंब अपने झोलझाल में फंसा रहे थे.

गुरू एक ठो चूरन की पुरिया पड़ी रही. हम ओका उठाये त कुछ लिखा पावा तभ्भये जादो भी बल्टा लेके आ गया सो पुड़िया जेबा मां खोंस के हम दूध लइके लइयां पइयां हो गये”

शुकुल सातवें आसमान पर बने कल्पनालोक से मात्र कुछ मीटर ही शेष थे. पर वो रूके नहीं.

घर पर कुंडी मार के कमरे में पुड़िया खोली त ई सुसरा जादो की लउंडिया का लब लइटर भवा”

अमां का कह रहे हो गुरू” उत्सुकता कुछ फाड़ के बाहर निकलने को फड़फड़ा रही थी.

हां भई लब लैटर ... साच्छात लब लैटर रहा” शुकुल के काले चश्मे के पीछे झांकती आखें किसी अनजान नशे की गिरफ्त में आ रही थीं.

क्या लिखा था”

शुकुल लव लैटर उवाच रहे थे. एकदम ईकोफ्रेंडली मोड में.

माई डियर जी ...आई लब्ब यू
तुमें देखती हूं तो ऐसे
के जइसे जुगों से तुमें जानती हूं
अगर तुम हो सागर तो मैं पियासी नदी हूं
अगर तुम हो सावन तो मै जलती कली हूं”

लड़की शानदार भूमिका के बाद मेन मुद्दे पर आ रही थी.

मेरे पियारे ‘जी’ तुम्हरी आंख में एक ठो नसा है.हम तुमारी आंख में डूब के कहीं मर मरा गये तो.बाल बहुत अच्छा है तुमारा एक दम घना काला. कउन से साबुन से नहाते हो जी”

अरी सुसरी नहाने पे आ गई सीधे .हम तो समझ रहे थे कि कुछ अउर लिखेगी” शुकुल की हाई स्पीड मैमोरी कार अचानक किसी ब्रेकर के ऊपर छलांग मारकर निकली.

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़के के के के
तुम नाराज मत होना के के के
तुम्मेरी जिंदगी हो के के के
तुम्मेरी बंदगी हो के के के”

विविध भारती के गानों का कनपुरिया वर्जन सुनकर चक्कर आने वाला ही था कि शुकुल महराज फिर बोले - अखीर में भइया बड़ा सा दिल बना कर उसमें बांण घुसेड़ा गया था अउर खून की चार बूंदे चुचुवा रही थी. हिन्दी की मां बहिन एक करने के डर से ज्यादा हमें जादौ के डण्डे अउर बडे़ शुकुल की भरूवा सुमेरपुरी की मट्ठे में भीगी पनही (जूती) की आवाज कानों में सुनाई दे रही थी सो बाबू हम ऊ लब लइटर का फाड़ने के बजाये चबा गये अउर ऊपर से दो गिलास दूध पी गये. फिर हम उस घर में दूध लेने कभी नहीं गये.”

शुकुल की लव स्टोरी वन साइडेड ट्रैजिक अंत की सद्गति प्राप्त करने को अग्रसर थी.

शुकुल की एकपक्षीय स्वनामधन्य प्रेमिका उत्तरप्रदेश के जौनपुर जनपद के किसी सुदूरवर्ती देहात की रहने वाली थी जो कि अपनी उच्च शिक्षा को उच्च भाषायी दक्षता के साथ उच्चता प्राप्त करने के लिये कानपुर जैसे महानगर में स्थित मौसा के तबेले में बने घर में रह रही थी. भाषायी अपमिश्रण के पीछे का प्रामाणिक पुरातात्विक साक्ष्य यही था और कुछ नहीं. प्रेम पत्र पूर्ण रूप से भावना प्रधान था और दिल की गहराइयों से उठती आवाजों को सुनकर लिखा गया था जिसमें भाषा के अवरोध को किसी प्रकार की तवज्जो देना सर्वथा वर्जित होता है. भावों को पुष्ट करने के लिये विनाका गीतमाला के अंशों को कापीराइट एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुये संकलित सम्मिलित किया गया था.

शुकुल के सामने उत्तर लिखने की दुविधा बरसात की गंगा मैया की तरह उफना रही थी, जिसके एक पार प्रेमिका और दूसरी पार पिताजी अपनी भरूवा सुमेरपुरी पनही को हाथ में लिये “हिंया आवा तुमका बतावैं”  का उवाच करते हुये शुकुल के नदी पार उतरने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

बेचारे शुकुल ने वक्त की नज़ाकत भांपते हुये उफनती नदी में ही कुछ देर बहते हुये दोनों से आगे निकलने का फैसला कर लिया था.

शुकुल लंबे समय तक अपनी उस प्रेमिका से बचते रहे और उससे भी लंबे समय तक क़ामयाब भी रहे फिर दिल पर पत्थर रखते हुये एक दिन उन्होंने सामाजिक वास्तविकता, जातीय संरचना, सामाजिक विभेद, अपनी बेरोजगारी आदि जैसे भारी भरकम मुद्दों को सामासिक शैली में अपनी उस कथित नायिका के सामने प्रस्तुत करने का फैसला बीयर के सुरूर में कर डाला
एक दिन हिम्मत बांध कर गये शुकुल ने मौका ताड़ कर एक सांस में सब कुछ कहने के बाद जो उत्तर सुना वह सचमुच हिला देने वाला था या कहें कि जड़ से उखाड़ देने वाला था.

भैया ऊ चिट्ठी त हम ऊ गुबरधन को फैंके रहे जो तुम्हरे बगल से बल्टा लइके बाहर जावा रहा!”

शुकुल लड़खड़ा चुके थे. संभावित लव स्टोरी की मात्र उन्नीस शब्दों में मासूमियत के साथ हत्या अपनी आंखों के सामने देखना अवर्णनीय झटके देने वाला था.

शुकुल अल्मोड़ा के नारदमुनि के वंशजों में शुमार होते हुये भी शुमार न थे. पत्रकारिता के उच्चतम मानदण्ड जो अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से स्थापित किये गये थे उसे जिंदा रखने का जिम्मा शुकुल बखूबी निभाते रहे. पत्रकारिता के इस दौर में जब पत्रकारिता सिस्टम के हत्यारों के साथ पूरी नंगई के साथ खड़ी हुई रंगदारी करती दिखायी देती है तब शुकुल जैसा पत्रकार अपनी शोधपरक दृष्टि से खबरों का सम्यक प्रोजेक्शन खांटी अल्मुड़िया अंदाज में करता हुआ अल्मोड़त्व में डूबता उतराता तैरता रहता है और हमेशा अल्मोड़े को अल्मोडे़ की नज़र से अल्मोड़े की स्टाइल में उघाड़ता हुआ आगे बढ़ता हुआ दोस्त बना रहता है.

मरणशीलों में सबसे मरणशील है यह बाइनरी कोड

हमारे समय के बड़े कवि की ताज़ा कविताओं की सीरीज़ – 2

कैरेन हेल की पेंटिंग 'वेल्ड मेमरी'
वही जीवन फिर से
असद ज़ैदी

कितने लोग हैं इस दुनिया में जिन्होंने गाहे बगाहे
रोककर कभी मुझसे कहा  भैया ...

किसी ने बस रास्ता पूछा एक औरत ने आधी रोटी माँगी
या कहा कि बीमार है छोरी, किसी डागदर से मिलवा दे
किसी ने इसलिए पुकारा कि मुड़के देखूँ तो मेरी शक्ल देख सके
आँखें मिचमिचाए और कहे भैया तू कहाँ कौ है
इनमें से कुछ तो कभी के गुज़र गए कुछ अभी हैं
कैसे जानूँ कौन भूत है कौन अभूत
दानिश को इससे क्या कि सब रस्ते में हैं

दो पीढ़ी बाद अक्सर कोई बता नहीं पाता मामला क्या था
जिस रजिस्टर में टूट फूट दर्ज हुई वह बोसीदा हो चला
काग़ज़ भी तो जैविक चीज़ है
स्याही-क़लम-दवात से बहुत कुछ लिखा गया
01010101 में तब्दील नहीं हुआ और जान लीजिए
काग़ज़ पत्तर भले कुछ बचे रहें 01010101 को छूमंतर होते
ज़रा देर नहीं लगेगी
मरणशीलों में सबसे मरणशील है यह बाइनरी कोड

दुनिया के अंत के बारे में कोई नहीं जानता
सब उसके आरंभ के पीछे पड़े रहते है धर्म हो चाहे वाणिज्य और विज्ञान
मिल-जुल के हम सब सब कुछ तबाह किये दे रहे हैं इस विनाश की सामाजिकता
इसका मर्म इसके भेद अभेद ज़रूर किसी दैवी मनोरंजन का मसाला हैं

तुम देख लो सभी तो यहाँ बैठे हैं सारे यज़ीद,
फ़िरऔन, क़ारून, इबलीस, दज्जालतुम पूछती थी या अल्लाह क्या अब
हमारा क़ब्रिस्तान भी हमसे छीन लिया जाएगा
वक़्त आने पर मैं कहाँ जाऊँगी

ऐसी ही मरी रहना अब, मेरी आपा
सुकून की नींद भी ऐसी ही होती है
बना रहेगा तुम्हारा कथानक वैसा जैसा कि तुम छोड़कर गयीं
और आना जीने के लिये वही जीवन फिर से

22.11.2017