Friday, November 30, 2007

तनाव दूर करने के एक सौ एक उपाय



तनाव दूर करने के एक सौ एक उपाय

1. 15 मिनट पहले उठने की आदत डालें.
2. अगली सुबह की तैयारी रात को ही कर लें
3. तंग कपड़े पहनने से बचें
4. रासायनिक तत्‍वों से जितना हो सके, बचें
5. अपने अपाइंटमेंट समय रहते बना लें
6. अपनी याददाश्‍त पर बिना वजह ज़ोर न डालें, लिख लें.
7. प्रतिरक्षात्‍मक उपाय अपनायें, चाहे मरम्‍मत हो या कुछ और.
8. डुप्‍लीकेट चाबियां रखें
9. ना कहने की आदत डालें और अक्‍सर ना कहें.
10. अपनी जिंदगी की प्राथमिकताएं तय करें.
11. नकारात्‍मक सोच के लोगों से बचें.
12. अपने समय का बेहतर इस्‍तेमाल करें.
13. अपने खाने की आदतों को आसान बनायें.
14. ज़रूरी कागज़ों की प्रतिलिपियां ज़रूर रखें.
15. अपनी ज़रूरतों का अंदाजा लगाना सीखें.
16. जो चीज़ ठीक से काम न कर रही हो, उसकी मरम्‍मत समय रहते कराने की आदत डालें.
17. जो काम आपको पसंद नहीं हैं, उन्‍हें करने के लिए किसी की मदद लें.
18. बड़े बड़े कामों को छोटे छोटे कामों में बांट लें.
19. समस्‍याओं को चुनौती मानें.
20. चुनौतियों को अलग तरह से देखना सीखें.
21. अपनी जिंदगी को तरतीब दें.
22. मुस्‍कुरायें.
23. बुरे दिनों के लिए तैयार रहें.
24. किसी बच्‍चे को गुदगुदायें.
25. किसी कुत्‍ते/बिल्‍ली को सहलायें.
26. ज़रूरी नहीं कि आपको सब जवाब आते ही हों.
27. अनुभव लेना सीखें.
28. किसी से कोई भली बात कहें.
29. किसी बच्‍चे को पतंग उड़ाना सिखायें.
30. बरसात में चलने का मज़ा लें.
31. हर दिन खेल के लिए कुछ समय रखें.
32. बुलबुला स्‍नान करें.
33. जो फैसले आप करते हैं, उनके नतीजों के लिए तैयार रहें.
34. अपने आप पर भरोसा करें.
35. अपने आपसे नेगेटिव बातें कहना बंद करें.
36. अपनी जीत की कल्‍पना करें.
37. हास्‍य बोध विकसित करें.
38. ये सोचना बंद कर दें कि आने वाला कल बेहतर दिन होगा.
39. अपने लिए लक्ष्‍य तय करें.
40. मौका निकाल कर नाचें.
41. किसी अजनबी से हैलो कहें.
42. किसी दोस्‍त से कहें कि वह आपको गले लगाये.
43. तारों को निहारें.
44. धीमे धीमे सांस लेने का अभ्‍यास करें.
45. किसी धुन पर सीटी बजाना सीखें.
46. कोई कविता पढ़ें.
47. कोई रागिनी सुनें.
48. नृत्‍य नाटिका देखें.
49. बिस्‍तर में बेतरतीबी से लेटे हुए कोई कहानी पढ़ें
50. कोई एकदम नया काम करें.
51. कोई बुरी आदत छोड़ें.
52. अपने लिए फूल खरीदें.
53. फूलों की खुशबू लेने के लिए थोड़ा सा वक्‍त निकालें.
54. दूसरों की मदद लेना सीखें.
55. किसी से कहें कि वह आपके दुखड़े सुने और आप उसके.
56. आज का काम आज ही करें.
57. खुश रहने और आशावादी बनने की कोशिश करें.
58. सुरक्षा को अहमियत दें.
59. किसी भी काम की अति न करें.
60. आप कैसे दिखते हैं, इस पर भी ध्‍यान दें.
61. उत्‍कृष्‍टता को लक्ष्‍य बनायें, सम्‍पूर्णता को नहीं.
62. हर दिन अपनी सीमाएं बढ़ायें.
63. जिंगल गुनगुनायें.
64. अपने वज़न पर ध्‍यान दें.
65. एक पेड़ उगायें.
66. पक्षियों को चुग्‍गा डालें.
67. दबाव में भी विनम्र बने रहना सीखें.
68. खड़े हो कर बाहें फैलायें.
69. हमेशा आपके पास वैकल्पिक योजना तैयार रहनी चाहिये.
70. कोई नयी पहेली सीखें.
71. कोई लतीफा याद करें.
72. अपनी भावनाओं की जिम्‍मेवारी लें.
73. अपनी ज़रूरतें खुद पूरी करना सीखें.
74. अच्‍छे श्रोता बनें.
75. अपनी सीमाओं को जानें और उनके बारे में दूसरों को भी जानने दें.
76. किसी से कहें कि उसका दिन बहुत अच्‍छा गुज़रे.
77. कागज़ के जहाज बना कर उड़ायें.
78. रोज़ाना एक्‍सरसाइज़ करें.
79. काम पर वक्‍त से पहले पहुंचें.
80. अपनी एक अल्‍मारी साफ करें.
81. घुटने चलने वाले किसी बच्‍चे के लिए घोड़ा बनें.
82. पिकनिक पर जायें
83. अपने काम पर जाने के लिए कोई और रास्‍ता लें.
84. दफ्तर से जल्‍दी निकलें (अनुमति ले कर)
85. अपनी कार में एयर फ्रेशनर रखें.
86. पाप कार्न खाते हुए पिक्‍चर देखें.
87. अपने दूर दराज के किसी दोस्‍त को खत लिखें.
88. किसी कार्यक्रम में जायें और जोर से चिल्‍लायें.
89. खाना बनायें और अकेले मोमबत्‍ती की रौशनी में खायें.
90. बिना शर्त प्‍यार की महत्‍ता को पहचानें.
91. इस बात को स्‍वीकार करें कि तनाव और कुछ नहीं. जिंदगी का नजरिया है.
92. डायरी लिखें.
93. जबरदस्‍ती हंसने की प्रैक्टिस करें.
94. इस बात को याद रखें कि आपके पास हमेशा विकल्‍प होते हैं.
95. आपके पास हमेशा काम में आने वाले लोगों, स्‍थानों और चीजों की सूची होनी चाहिये.
96. दूसरों का मज़ाक उड़ाने की आदत छोड़ें.
97. भरपूर नींद लें.
98. कम बोलें और ज्‍यादा सुनें.
99. दूसरी की खुले दिल से तारीफ करें.
100. किसी नये गाने के बोल याद करें.
101. किसी कलाकृति को देखें

Wednesday, November 28, 2007

ददरी मेला व्याख्यान : भारतवर्ष की उन्नति `ऐसे´ हो सकती है !




`इस साल बलिया में ददरी मेला बड़ी धूम-धाम से हुआ।श्री मुंशी बिहारीलाल,मुंशी गणपति राय,मुंशी चतुरभुज सहाय सरीखे उद्योगी और उत्साही अफसरों के प्रबंध से इस वर्ष मेले में कई नई बातें ऐसी हुईं, जिनसे मेले की शोभा हो गई। एक तो पहलवानों का दंगल हुआ ,जिसमें देश-देश के पहलवान आए थे और कुश्ती का करतब दिखलाकर पारितोषिक पाया।दूसरेके थोड़े ही दिन पूर्व ही से एक नाट्य समाज नियत हुआ था ,जिसने मेले में कई उत्तम नाटकों का अभिनय किया।´
- `हरिश्चंद्र चंद्रिका´ 3 दिसम्बर 1884

ददरी एक मामूली-सा गांव है ,भारत के अन्य गांवों की तरह।अगर आप नक्शा उठाकर जगहों को खोजने के आदी हों तो यह शायद ही मिले।चलिए बताते हैं आपको-बलिया का नाम सुना है?अरे वही बलिया ,भारत के उत्तर प्रदेश प्रांत के धुर पूरबी छोर पर बसा एक जिला जो समाचारों में कभी-कभार ही प्रकट होता है। हां, अगर इतिहास में उतरें तो देखेंगे कि यह पहली जंगे आजादी के महानायक मंगल पाण्डे की जमीन है।और भी कई ऐतिहासिक-पौराणिक आख्यान जुड़े हैं यहां से ,लेकिन बात तो ददरी की हो रही है।
ददरी बलिया से तीन -चार कोस की दूरी पर है।गंगा और घाघरा की इस मिलन-स्थली में प्रदेश का सबसे बड़ा पशु मेला कार्तिक पूणिमा को लगता है। कार्तिक पूणिमा यानी साल की सबसे उजली रात,गोल पूरा-पूरा चांद।जगह-जगह लगने वाले मेले-ठेले और नहान।ददरी का मेला भी इन्हीं में से एक है।पशुओं के इस मेले में आदमियों की भीड़ सबसे ज्यादा होती है।तरह-तरह के आदमी ,तरह-तरह के विचार, और उनसे दृश्य-अदृश्य रूप में बनती एक विचार सरणि।हैबरमास इसी को तो `पब्लिक स्फीयर´ का नाम देता है!
हिन्दी साहित्य में रूचि रखने वालों के लिए ददरी मेले का एक खास ऐतिहासिक महत्व है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885)ने नवम्बर 1884 में यहां एक व्याख्यान दिया था जिसे `बलिया व्याख्यान´ या `बलिया वाला भाषण´ के नाम से जाना जाता है।यही व्याख्यान ` भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है´ शीषक से `हरिश्चंद्र चंद्रिका´ में दिसम्बर 1884 में प्रकाशत हुआ।इससे पूर्व भारतेन्दु के दो नाटको-`सत्य हरिश्चंद्र´ और `नीलदेवी´ का मंचन होने के साथ ही उनका नागरिक अभिनंदन `बलिया इस्टट्यूट´ में किया गया था जिसकी सदारत `कलेक्टर मि0 डी0 टी0 राबट्स साहेब बहादुर´ ने की थी । इसी संस्था की एक सहयोगी `आर्यदेशोपकारिणी सभा´ के निमंत्रण पर `बाबू हरिश्चंद्र जी ने एक बड़ा ललित ,गंभीर और समयोपयोगी व्याख्यान इस विषय पर दिया कि `भारतवषोन्नति कैसे हो सकती है ?´ सभासद बाबू साहेब का लेकचर सुनकर गद्गद् हो गये।´
` भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?´ शीषक निबंध जहां एक ओर भारतेन्दु के साहित्य का एक अप्रतिम उदाहरण है। `देशोपकार´ की मुख्य धारा के साथ केवल भारतेन्दु ही नहीं जुड़े थे बल्कि उस समय के तमाम साहित्यकारों के लिए साहित्य मात्र `विनोद´ नहीं था, अपने समय और समाज की संवेदना व्यक्त करने, बनाने और बदलने का एक औजार था।भारतेन्दु निश्चत रूप से इनमें आगे और संभवत: सबसे अधिक सक्रिय थे। इस बाबत एकेडेमिक दुनिया में रामविलास शर्मा ,वसुधा डालमिया,क्रिस्टोफर किंग, सुधीर चंद्र, फ्रेंसेस्का आरसीनी आदि ने बहुत कुछ लिखा है।
यह निबंध भारतेन्दु के और गद्य की संवेदना और समझ की एक स्पष्ट विभाजक रेखा हैं , नाटकों में यह विभाजन और स्पष्ट है। इसे उनका अंतर्विरोध या `एम्बीवलेंस´ कहा गया हैं वैसे यह उस युग के लगभग सभी साहित्यकारों में विद्यमान था। जो लेखक -कवि पद्य में `विनोद´ रचते हुए प्राय: स्थान-स्थान पर `ब्रिटिश सिंह´ के प्रति अपनी `लायल्टी´ की मुनादी करता दिखाई देता है,वही अपने गद्य में विमशZ पर उतर आता है। यह उस काल की राजनीतिक -सामाजिक विवशता थी, साहित्यकारों का दुचित्तापन था ?क्या था? खैर,यह निबंध हिन्दी साहित्य में खूब पढ़ा गया है ,पाठ्यक्रम के भीतर और बाहर भी। इसमें सब अपना-अपना तत्व खोज लेते हैं।एक बड़ी रचना बार-बार अपने पाठ की चुनौतियां और संभावनायें लेकर मौजूद रहती है ´। और हां, 19वीं शताब्दी के ढ़लान पर बोलचाल तथा लिखत पढ़त की हिन्दी के विकास और विस्तार के `शेप´ का उम्दा नमूना तो यह है ही।
` भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?´ व्याख्यान के कुछ चुनिंदा अंश प्रस्तुत हैं-
हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं।यद्यपि फस्ट क्लास,सेकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी -अच्छी और बड़े बड़े महसूल की इस ट्रन में लगी हैं पर बिना इंजिन ये सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही हिन्दुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते।इनसे इतना कह दीजिए `का चुप साधि रहा बलवाना´,फिर देखिए हनुमानजी को अपना बल कैसा याद आ जाता है।सो बल कौन याद दिलावै।या हिन्दुस्तानी राजे महाराजे नवाब रईस या हाकिम। राजे -महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, गप से छुट्टी नहीं।हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है,कुछ बाल,धुड़दौड़,थिएटर,अखबार में समय गया।कुछ बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गंदे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवैं।
बहुत लोग यह कहैंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती बाबा,हम क्या उन्नति करैं?तुम्हरा पेट भरा है तुमको दून की सूझती है। यह कहना उनकी बहुत भूल है।इंगलैंड का पेट भी कभी यों ही खाली था।उसने एक हाथ से पेट भरा ,दूसरे हाथ से उन्नति की राह के कांटों को साफ किया।
अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो।कोई धर्म की आड़ में,कोई देश की चाल की आड़ में,कोई सुख की आड़ में छिपे हैं।उन चारों को वहां वहां से पकड़कर लाओ।उनको बांध बांध कर कैद करो। इस समय जो बातैं तुम्हारे उन्नति के पथ में कांटा हों उनकी जड खोद कर फेंक दो।कुछ मत डरो। जब तक सौ दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे,जात से बाहर न निकाले जायंगे,दरिद्र न हो जायंग,कैद न होंगे वरंच जान से मारे न जायंगे तब तक कोई देश भी न सुधरैगा।
देखो , जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली हैं ,वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंगलैंड,फरांसीस,जर्मनी,अमेरिका को जाती है।दीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है।जरा अपने ही को देखो।तुम जिस मारकीन की धोती पहने वह अमेरिका की बनी है।जिस लांकिलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंगलैड का है। फरांसीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हौ और वह जर्मनी की बनी बत्ती तुम्हारे सामने बल रही है।यह तो वही मसल हुई कि एक बेफिकरे मंगनी का कपड़ा पहिनकर किसी महफिल में गए।कपड़े की पहिचान कर एक ने कहा,` `अजी यह अंगा फलाने का है´।दूसरा बोला, `अजी टोपी भी फलाने की है´।तो उन्होंने हंसकर जवाब दिया कि,`घर की तो मूंछैं ही मूंछैं हैं´।हाय अफसोस,तुम ऐसे हो गए कि अपने निज के काम की वस्तु भी नहीं बना सकते।भाइयो,अब तो नींद से चौंको,अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो।जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताबें पढ़ो,वैसे ही खेल खेलो,वैसी ही बातचीत करो।परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का का भरोसा मत रखो।अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।

Tuesday, November 27, 2007

वाम वाम वाम दिशा



वाम वाम वाम दिशा

शमशेर बहादुर सिंह


वाम वाम वाम दिशा,
समय साम्यवादी।
पृष्ठभूमि का विरोध अन्धकार-लीन। व्यक्ति ...
कुहास्पष्ट ह्रदय - भार, आज हीन।
हीनभाव, हीनभाव
मध्यवर्ग का समाज, दीन।


किन्तु उधर
पथ-प्रदर्शिका मशाल
कमकर की मुट्ठी में - किन्तु उधर:
आगे आगे जलती चलती है
लाल-लाल
वज्र- कठिन कमकर की मुट्ठी में
पथ-प्रदर्शिका मशाल।

भारत का
भूत-वर्तमान औ भविष्य का वितान लिए
काल- मान- विज्ञ मार्क्स-मान में तुला हुआ
वाम वाम वाम दिशा,
समय : साम्यवादी।

अंग - अंग एकनिष्ठ
ध्येय - धीर
सेनानी

वीर युवक
अति बलिष्ठ
वामपन्थगामी वह ...
समय: साम्यवादी।

लोकतंत्र-पूत वह
दूत, मौन, कर्मनिष्ठ
जनता का:
एकता-समन्वय वह ...
मुक्ति का धनंजय वह
चिरविजयी वय में वह
ध्येय-धीर
सेनानी

अविराम
वाम-पक्षवादी है ...
समय : साम्यवादी।

विएना में बीथोवेन के बहाने के. एल. सहगल से मुलाकात




(विएना डायरी से एक और अंश ...)
कई मायनों में लुडविग फान बीथोवन (1770-1827) एक अद्भुत रोमांटिक जीनियस थे जिन्होंने बाहरी तथ्यों और तर्कों से जरा भी प्रभावित हुए बिना अपनी रचनात्मक ऊर्जा और अन्दरूनी ताकत पर निर्भर रहना बेहतर समझा। `पवित्र´ समझी जानी वाली अपनी नौ सिम्फनियों के बूते पर वे अपने जीवनकाल में ही बहुत लोकप्रिय हो चुके थे - सही मायनों में वे पश्चिमी संगीत के पहले महानायक थे। अपने संगीत को तराशने का उद्यम उनके जीवन का प्रथम उद्देश्य था-पर वे बहुत बेचैन व्यक्ति थे। इसका प्रमाण है कि वे करीब तीस (या ज्यादा) घरों/मकानों में रहे।

इन्हीं में से एक है पास्कालाटी हाउस। इस घर में उन्होंने अपनी तमाम महान सिम्फनियों पर काम किया- अपनी चौथी, पांचवीं और छठी सिम्फ़नी उन्होंने यहीं पर पूरी कीं। वे सन् 1806 से 1808 तक इस घर में रहे। अपने इकलौते ऑपेरा `लियोनोरे´ (जिसे बाद में `फिडेलियो´ के नाम से ख्याति मिली) का सृजन भी उन्होंने यहीं किया।इस घर में रहते हुए ही वे धीरे-धीरे अपने स्वास्थ्य, साफ-सफाई और कपड़ों को लेकर बहुत लापरवाह हो चले थे और सनकी और चिड़चिड़े।
मोइलेकरबास्तेई-8 पर पांचवीं मंजिल पर तीन छोटे-छोटे कमरों वाला यह घर पाश्चात्य संगीत के मील के पत्थरों में गिना जा सकता है। बिल्कुल वीरान सी एक गली में घुसकर आप तीनेक सौ साल पुराना ज़ीना चढ़कर यहाँ पहुँचते हैं। यह एक राजकीय संग्रहालय बना दिया गया है अब। टिकट लेकर हम पहले कमरे में घुसते हैं - लकड़ी के फर्श वाले इस छोटे से कमरे के बीचोंबीच बीथोवन का पियानो रखा हुआ है। जुबैर उस पियानो को हौले से छूता है और साथ चल रही संग्रहालय की एक रिसेप्शनिस्ट से बार-बार पूछता है - क्या यही वो पियानो है जिस पर बैठकर बीथोवन ने अपने संगीत की रचना की थी? वह बार - बार सकारात्मक उत्तर देती है-उसकी आवाज में विचित्र सी ऊब भी है। मुझे अच्छा नहीं लगता-मैं बाकी कमरों में चला जाता हूँ - ये रही बीथोवन के हाथ की लिखावट, ये उसकी छठी सिम्फनी का छठा ड्राफ्ट, ये कुर्सी, ये मेज; दीवारों पर तस्वीरें हैं। एक तस्वीर बीथोवन की शवयात्रा की है। शवयात्रा के समय जैसे समूचा संगीतप्रेमी वियेना उमड़ आया था। भीड़ को नियंत्रित करने के लिये पुलिस और सेना की मदद लेनी पड़ी थी। लकड़ी के पुराने फर्श पर चलने से जूतों की चरमर होती है। दूसरे वाले कमरे की खिड़की से बाहर वियेना विश्वविद्यालय की पुरानी भव्य इमारत दिखाई देती है और दूर एक बड़े गिरजाघर का शिखर।

पांच मंजिल उतरकर हम वापस सड़क पर आते हैं और एक संकरी गली का रूख करते हैं जहाँ से तीखी ढाल वाली कोई चालीस सीढियां उतरकर बीथोवन शाम को टहलने जाया करते थे। तेज ठण्डी हवा चल रही है और पेड़ों से गिरे हुए पत्ते इधर-उधर उड़ रहे हैं। जुबैर कहता है उसे थर्राहट हो रही है इतने बड़े संगीतकार के इतने पास जाकर। मुझे इन सीढ़ियों पर उतरते हुए बार-बार मीर तकी मीर का शेर याद आ रहा है -


इस दश्त में अय सैल, सम्हल ही के कदम रख,
यां दफ़्न हर कदम पे मेरी तिश्नालबी है

बीथोवन अगर उर्दू शायरी करते होते तो शायद जुबैर से यही शेर कहते।
***

डोएबलिन्गर हॉप्टश्ट्रासे 92, पर एक छोटा सा मकान है जिसे अब एरोइका हाउस के नाम से जाना जाता है। सन् 1803 में बीथोवन ने ई-फ्लैट मेजर में यहाँ अपनी तीसरी सिम्फनी रची थी जिसे `एरोइका´ के नाम से ख्याति मिली। इस सिम्फनी ने बीथोवन को पश्चिमी संगीत में एक क्रान्तिकारी के रूप में स्थापित किया। शुरू में बीथोवन ने इसे नेपोलियन बोनापार्ट को समर्पित किया था पर 1804 में यह जानने के बाद कि नेपोलियन को फ्रांस का सम्राट घोषित किया गया है, बीथोवन ने यह समर्पण वापस ले लिया। इस बार हम वीडियो कैमरा लेकर आये हैं। संग्रहालय के रिसेप्शन पर बैठे सज्जन दबी जबान में हमें उसके इस्तेमाल की इजाजत दे देते हैं। दो कमरों के इस छोटे से अपार्टमेन्ट के बाहर एक छोटा सा बगीचा है। बगीचे में लगे एक पेड़ की तरफ इशारा करके संग्रहालय वाले सज्जन बताते हैं कि चार सौ साल पुराने इस पेड़ की छांह में बीथोवन ने गर्मियों की कई दोपहरें गुजारी थीं। अपार्टमेन्ट के भीतर कुछ फर्नीचर, कुछ तस्वीरें और बीथोवन की हस्तलिपि के चन्द नमूने हैं - बहुत ज्यादा कुछ नहीं। बाहर एक बेहद बूढ़ा आदमी लाल टोपी और सुर्ख लाल जैकेट पहले पत्तों को बुहार कर इकट्ठा कर रहा है। ठीक बगल के अपार्ट मेन्ट से एक महिला अपने कुत्ते के साथ बाहर निकलती है और हम पर एक उचटती हुई निगाह डालकर चल देती है।

जो भी हो वह बीथोवन के एरोइका हाउस की पड़ोसन तो है ही।

एरोइका हाउस में जी भर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के बाद हम रूख करते हैं प्रोबूसगासे 7 की तरफ जहाँ एक और घर है : बीथोवन ने अपने जीवन का एक अपेक्षाकृत निराशापूर्ण समय वहाँ बिताया था। उन्होंने अपने भाइयों को वहाँ से एक पत्र लिखा था जिसे हेलीगेनस्टेटर टेस्टामेन्ट के नाम से जाना जाता है। यह बात अलहदा है कि यह पत्र कभी भेजा नहीं गया। हेलीगेनश्टाट एक छोटा गाँव हुआ करता था जहाँ के पानी के स्रोतों में कई औषधीय गुण थे। अपने सार्वजनिक स्नानागारों के लिये विख्यात इस गाँव में 1750 के आसपास वियेना के धनाढ्य वर्ग ने छुट्टियाँ मनाने का प्रचलन चलाया। अपने बहरेपन का इलाज कर पाने की उम्मीद में बीथोवन यहाँ रहे थे। जब यहाँ आकर उन्हें निराशा ही मिली तो अपने घनघोर विषाद में उन्होंने अपने भाइयों को एक भावनात्मक पत्र लिखा। आज यह गाँव वियेना के उन्नीसवें डिस्ट्रिक्ट का हिस्सा है।

प्रोबूसगासे का यह छोटा सा दुमंजिला मकान बीथोवन की निराशा और अंधेरे भरे समय का गवाह है। बीथोवन अपने बहरेपन से जूझ रहे थे और संगीत रचना करने वाले का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि वह खुद अपने बनाये संगीत को न सुन सके।

यहाँ बीथोवन के व्यक्तिगत इस्तेमाल की कुछ चीज़ें, मृत्यु के बाद बनाया गया उनका मुखौटा और उनके बालों की एक लट सुरक्षित हैं- संगीत से सम्बन्धित कुछ तस्वीरें, कागजात और उपकरण भी प्रदर्शित किये गये हैं।

यहाँ एक बहुत जबरदस्त आदमी से मुलाकात हुई- जमील साहब करीब सत्तर साल के हैं और बीथोवन के इस घर के केयरटेकर हैं-यानी संग्रहालय के कर्मचारी। हमें देखकर वे पहले पूछते हैं- 'इण्डियन?'- हम लोग हाँ कहते हैं हालांकि जुबैर और बाबूभाई भारतीय नहीं हैं। फिर अपनी जर्मन में ही वे कहते हैं-'इण्डियन म्यूजिक?'- हम हामी भरते हैं। अपनी करीब-करीब शरारती आंखों से वे हमें देखते हुए कहते हैं- 'मुकेश ... रफी ...?'

बीथोवन के घर में रफ़ी और मुकेश का नाम!

फिर वे कहते हैं कि एक और गायक था पुराना-साइगेल। 'सहगल!' मैं पूछता हूँ. 'हाँ , हाँ, सहगल!' फिर अचानक वे कहते हैं- 'अच्छा, चलो बाई- अन्दर चलो'।

मैं उनको लेकर अब भी असमंजस में हूँ। भीतर एक जापानी लड़की हैडफोन लगाकर संगीत सुन रही है। हमारे पीछे-पीछे वे भी आ जाते हैं और खिड़की से बाहर नीचे एक छोटे से बगीचे की तरफ इशारा करके वह कुवाँ दिखाते हैं जिसमें औषधीय गुणों से परिपूर्ण पानी सामने के पहाड़ों से आया करता था। कैमरा चलाना है तो कोई दिक्कत नहीं- जमील साहब को कोई आपत्ति नहीं।बदकिस्मती से कैमरे की बैटरी खत्म हो गई है- हम उसे चार्ज करने की जुगत के बारे में सोचते हैं और बाबूभाई कहते हैं कि शायद जमील साहब इजाजत दे दें- उन्हें कोई आपत्ति नहीं। हमें उनसे थोड़ी देर बात करने का समय और मिल जाता है।

जमील साहब अफगानिस्तान से चालीस साल पहले यहाँ आकर बस गये थे। अब वे चौहत्तर साल के हैं और अकेले रहते हैं। जीवन-यापन के लिये यह नौकरी करना उनकी मजबूरी है। रोज सुबह नौ बजे यहाँ पहुचने के लिये वे छ: बजे तड़के अपना घर छोड़ देते हैं- फिर बस, ट्राम और अंडरग्राउण्ड बदलते-बदलते यहाँ आकर ताला खोलना, साफ-सफाई वगैरह। शाम छ: बजे छुट्टी होती है-फिर वही ढाई-तीन घंटे का वापस घर का सफर। हर रोज। यह सब बताते हुए उनकी आंखों में जरा भी आत्मदया नहीं है- वे अपने प्रकट खिलंदड़ेपन का आनन्द लेते हैं। मैं उनके परिवार के बारे में जानना चाहता हूँ पर वे उसका जवाब देने के बजाय संगीत को लेकर एक लतीफा छोड़ते हैं।

लतीफा इस तथ्य को जानने के बाद छेड़ा जाता है कि मेरे साथी बांग्लादेशी हैं। जमील साहब का लतीफा क्या है एक मजाकिया वक्तव्य भर है। वे कहते हैं- 'संगीत बंगाल में पैदा हुआ, हिन्दुस्तान में बड़ा हुआ, पाकिस्तान में बूढ़ा हुआ और अफगानिस्तान में जाकर उसकी मौत हो गई!'

फिर वे एक भरपूर ठहाका लगाते हैं और कहते हैं- 'अच्चा, चलो बाई! कैमरा!'

फुरसत के क्षणों में `मुगल-ए-आजम´ देखने और कुन्दन लाल सहगल सुनने वाले जमील साहब को हिन्दी के कुछेक जुमले याद आते हैं और आज उन्हें हमारे रूप में बढ़िया श्रोता मिले हैं। वे हमसे पोस्टरों के पैसे नहीं लेते और कहते हैं- 'हम सब भाई हैं ... ओ के, खुदाहाफिज़!'
... खुदा हाफिज़ जमील साब! ...

Sunday, November 25, 2007

किस्सा-ए-इंतखाब भाग दो



अक्सर ऐसा होता था कि आप इंतखाब में तीन की चार या आठ की दस के बंटवारे वाली चाय पी रहे होते हैं कि गली के कोने से किसी की केवल गर्दन नुमाया हो कर पूछती है, जहूरदा रिहर्सल सीआरएसटी में है या नगरपालिका हाल में? जवाब मिलता है नहीं आज तल्लीताल स्कूल में होगी।
जी हां, ये नाटक के रिहर्सल की ही बात हो रही है। दरअसल इंतखाब एक कपङे की दुकान और बैठकी का एक अड्डा होने के अलावा नैनीताल के सबसे पुराने और सबसे सक्रिय थियेटर ग्रुप युगमंच का कार्यालय भी है। रिहर्सल के लिए जगह की मुश्किल या फंड के लिए किसी निश्चित स्रोत के अभाव और ऐसी ही तमाम दिक्कतों के बावजूद युगमंच में कुछ न कुछ होता रहता है और पूरे उत्साह के साथ होता है।

युगमंच का खासा वैभवपूर्ण इतिहास रहा है। यहां के कई सारे कलाकार नेशनल स्कूल आफ ड्रामा (एनएसडी) और इंडियन इंस्टिट्यूट आफ फिल्म टेक्नोलाजी (आईआईएफटी) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रशिक्षित हो कर अपने पंसदीदा कला क्षेत्रों फिल्म या थियेटर में काम कर रहे हैं। दिल्ली के थियेटर जगत के कई सारे बङे नाम जहूरदा और युगमंच से अच्छी तरह से परिचित हैं। गाहे-बगाहे कला, संस्कृति या साहित्य क्षेत्र की कोई हस्ती चाय सुङकते हुए इंतखाब में बैठी मिल जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनके लिए भी इंतखाब उतना ही खास है जितना इंतखाब में उनका होना।

युगमंच की सांस्कृतिक गतिविधियों में केवल नाटक ही शामिल नहीं हैं। छोटी-मोटी काव्य गोष्ठियां तो आए दिन होती रहती हैं और उनमें हिस्सा लेने के लिए आपका बाकायदा कवि होना जरूरी भी नहीं। बस लगना चाहिए कि आप कवि बन चुके हैं और कविता सुनाना आपका मौलिक अधिकार है तो स्वागत है आपका मंच पर। बिल्कुल नौसिखिए भी वीरेन दा जैसे दिग्गज कवि के सामने बेझिझक कविता सुनाने के लिए स्वतंत्र हैं और कविता में थोङा सा भी सार है तो वीरेनदा की तारीफ भी सुनने को मिल सकती है। अवस्थी मास्साब कोई प्यारी सी टिप्पणी कर देंगे जिसे आप हमेशा याद रखेंगे। इससे ज्यादा और चाहिए भी क्या कच्ची रचनाओं वाले कच्ची उम्र के कवियों के आत्मविश्वास के लिए? कविता, कहानी, नाटक पढने-पढाने के इसी दौर में मिले उत्साहवर्धन से ही मेरे सहित हमारे कई साथियों को यह तय करने में मदद मिली कि हमें क्या करना अच्छा लगता और हमें आगे चल कर का करना चाहिए।

कुमाऊं की होली का अपना एक अलग रंग है। यहां होली एक-दो दिन का नहीं बल्कि महीने भर का गायकी का त्यौहार होता है। महिलाओं व पुरूषों की अलग-अलग होने वाली होलियों की गायन शैली में भी अलग होती हैं। पक्के रागों पर आधारित श्रृगांरिक गीतों वाली होली बैठकें रात-रात भर चलती हैं। होली के दिनों में युगमंच भी होलीमय होता है। होली की एक बैठक का आयोजन युगमंच के द्वारा किया जाता है जिसमें शहर के गणमान्य बुजुर्ग होल्यारों के साथ-साथ होली गाने वालों की नई पौध भी पूरे रंग में शामिल होती है। अबीर-गुलाल का टीका लगाने के बाद शुरू होता है आरोह-अवरोह के पेंचो-खम से भरा होली गायकी का दौर। उन होलियों की यादें अब तक कई बार ठंडी आहें भरने को मजबूर कर देती हैं।

हर साल होने वाला शरदोत्सव एक और मौका होता है युगमंच की हलचलें तेज होने का। मल्लीताल फ्लैट्स में हफ्ता दस दिन चलने वाले शरदोत्सव के रंगारंग कार्यक्रम में युगमंच की भी एक प्रविष्टि होती ही थी। कार्यक्रम शुरू होने से पहले तक की हङबङाहट, घबराहट और शो के बाद कई दिनों तक चलने वाला समीक्षाओं का दौर भी खासा दिलचस्प होता था।

केवल सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक गतिविधियां भी पूरे जोर-शोर से चलती रहती थी युगमंच में। उत्तराखंड राज्य की मांग का आंदोलन हो, विधानसभा चुनाव हों या कालेज में छात्र संघ के चुनाव का दौर हो, युगमंच की सक्रिय भागीदारी उसमें किसी न किसी रूप में होती ही थी। रात-रात भर बैठ कर पोस्टर बनाने और रात में ही उन्हें शहर की दीवारों पर चिपकाने का भी अपना सुरूर होता था। लगता था इंकलाब (वो जो भी होता हो) बस होने वाला है और उसे लाएंगे भी बस हमीं। उस समय लिखी अपनी कुछ कविताएं अब पढती हूं तो बहुत हंसी आती है।

अब सोचो तो अजीब सा लगता है कि कितना कुछ बदल गया हमारे आसपास। न वो पहले वाले बेफ्रिक दिन रहे, न ही बार-बार कुछ करने को उकसाने वाले लोग आसपास बचे हैं। कालेज के बाद कई साल तथाकथित कैरियर बनाने की दौङ में नैनीताल की गलियां तो छूटी ही, कितने आत्मीय दोस्तों के पते-ठिकाने भूले गए। बहरहाल इस ब्लागबाजी के बहाने उन भूले-बिसरे दिनों को याद करना भी एक तसस्लीजनक अहसास है।

Friday, November 23, 2007

एक नई पोस्ट जो लपूझन्ना पर लिखी जानी है, के लिये फ़ोटो



अशोक कबाड़ीदादू ने वादा किया है कि वो लपूझन्ना पर क्रिकेट की यादें वाया रामनगर लिखेंगे.
उस पोस्ट के लिये फ़ोटो हाज़िर है.

Thursday, November 22, 2007

हमारे तन के स्टेशन से ग़म की रेल जाती है





राधाचरण गोस्वामी का `रेलवे स्तोत्र´
19 वीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य आधुनिक साहित्य के निर्माण का युग है साथ ही नये पाठक समुदाय को ध्यान में रखकर नवीन विचारधाराओं ,नये जीवन दर्शन ,नये निर्माण, नई सोच और नये कथ्य को नयी भाषा मे नये ढ़ंग से कहने का युग भी है । हिन्दी की इस `नई चाल´ को पकड़ने और प्रस्तुत करने का काम भारतेन्दु मण्डल से जुड़े जिन साहित्यकारों ने किया उनमें राधाचरण गोस्वामी(1859 - 1925) का नाम सबसे प्रमुख है। अपनी सोच,साहस और सामाजिक सक्रियता के कारण वे सबसे अलग ,अद्वितीय और अपने समय से आगे चलने वाले साहित्यक व्यक्तित्व के रूप में दिखाई देते हैं।

राधाचरण वृंदावन के गोस्वामी वैष्णव संप्रदाय के आचार्य और बड़े महात्मा गोस्वामी गल्लू जी महाराज के बेटे थे। अग्रवाल वैश्यों की पुरोहिताई करने वाले इस परिवार का वातावरण बहुत ही रूढ़िवादी था।इसके बारे में `मेरा संक्षिप्त जीवन-चरित्र´ में उन्होंने स्वयं लिखा है-`पाठकों स्मरण रखना चाहिए कि मैं जिस कुल में उत्तपन्न हुआ उसमें अंग्रेजी पढ़ना तो दूर है,यदि कोई फारसी ,अंग्रेजी का शब्द भूल से भी मुख से निकल जाय तो पश्चाताप करना पड़े। अस्तु मैंने गुप्त रीति से अंग्रेजी आरंभ की´।

संस्कृत और धार्मिक शिक्षा के साथ उन्होंने स्वाध्याय से अंग्रेजी , उर्दू, बंगला, मराठी, उड़िया और गुजराती का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। गोस्वामी जी उस समय के अन्य साहित्यकारों की तरह `प्राइवेट´ और `पब्लिक´ की द्वन्द्वात्मकता से उबर कर सामाजिक जीवन या `देशोपकार´ से जुड़े। वे आजीविका के लिए गोसाइयों काम करते थे किन्तु अपने ही गोस्वामी समाज में सुधार की वकालत करते थे।वे `वैष्णव धर्म प्रचारिणी सभा´ और `कवि कुल कौमुदी´ जैसी संस्थाओं से ही संबद्ध नहीं रहे बल्कि 1885 और 1894 में वृंदावन के म्युनिसिपल कमिश्नर बने तथा कांग्रेस के लाहौर और कलकत्ता अधिवेशनों में डेलिगेट होकर गए। 1888 से 1893 तक मथुरा की डिवीजनल कांग्रेस कमेटी के सेके्रटरी रहे।श्री षड्भुज महाप्रभु मंदिर के अपने निवास में उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, बंगला, मराठी, उड़िया, पंजाबी और गुजराती की लगभग 5000 पांडुलिपियों और किताबों का संग्रह किया जिसे वह पब्लिक लाइब्रेरी का रूप देना चाहते थे।

दरअसल , गोस्वामी जी की सामाजिक सक्रियता के लिए साहित्य एक अस्त्र या औजार था। उन्होने `मंजु´ उपनाम से कविताओं की रचना की है। अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं - `दिन-रात श्रंगार रस की चर्चा करने से मेरा चरित्र कुछ-कुछ बिगड़ने लगा,इससे मैने कवित्तों का अभ्यास छोड़ दिया।मैंने स्वयं भी कवित्त बनाये हैं उनमें `मंजु´ नाम धरा है´। भारतेन्दु हरिश्चंद्र से वे बहुत प्रभावित थे शायद इसीलिए उन्होंने 1883 से प्रारंभ अपनी मासिक पत्रिका, जो साढ़े तीन साल तक निकली, का नाम भी `भारतेन्दु´ रखा था। उनकी रचनाओं में `बूढ़े मुह मुंहांसे, लोग देखें तमासे´ तथा `तन मन धन श्रीगुसाईं जी के अर्पण´ (प्रहसन) ´सौदामिनी´( उपन्यास) के अतिरिक्त बड़ी संख्या में निबंध ,टिप्पणी और कवितायें हैं लेकिन `यमलोक की यात्रा´ , विदेश यात्रा विचार` और `विधवा विवाह वर्णन´ये तीन ऐसी रचनायें है जो उन्हें अपने समकालीनों में सबसे ज्यादा तार्किक और `रेशनल´ साबित करती हैं। धार्मिक कर्मकांड-आडम्बर, विदेशगमन निषेध और विधवा विवाह विरोध जैसे मुद्दों को उन्होंने शास्त्रीय शब्दावली में शास्त्रीय तर्कों के सहारे पटखनी दी।

राधाचरण गोस्वामी के साहित्य का मूल स्वर व्यंग्य है। आज के साहित्य में व्यंग्य तेजी से गायब होता जा रहा है और उसकी जगह चलताऊ चुटकुलेबाजी ने ले ली है। खैर, गोस्वामी जी की एक रचना `रेलवे स्तोत्र´ के चुनिंदा हिस्से प्रस्तुत हैं-

अग्नि जल नभ पृथ्वी इन तत्वों का ही मेला है।
इच्छा कर्म संयोगी इनजिन गारड आप अकेला है।
जीव लादि सब खींचत डोलत तन स्टेशन झेला है।
जयति अपूरब कारीगर जिन जगत् रेल की रेला है।

लगा है तार हिचकी का खबर जाना की आती है।
हमारे तन के स्टेशन से ग़म की रेल जाती है।

हे सर्व मंगल मांगल्ये !स्टेशनों पर यात्री लोग तुम्हारी इस प्रकार बाट देखते हैं जैसे चातक स्वाति की,चकोर चंद्र की, किसान मेघ की, विरहणी पति की और बार बनिता जार लोगों की। पर तुम भी खूब झकाय-झकाय कंठगत प्राण करके ही आती हो।

हे दुर्गे! दुर्गति हारिणी ! तुम्हें बहुत से देहाती भक्त दुर्गा का अवतार मानकर प्रणाम करते। अतएव `या देवी सर्वदेशेषु रेल रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमोनम:´।

हे सुरासुर पूजिते ! तुम असुर वंश की स्वामिनी हो,तुम्हरा सिर हबड़े में है।तुम्हारे दोनों चरण दिल्ली और करांची में हैं। तुम्हारे दोनों हाथ रूहेलखंड रेलवे और राजपूताना रेलवे हैं। तुम्हारी पुच्छ ग्रेट इंडिया-पेनेंसुला रेलवे है और बाकी देलावली सब तुम्हारी रोमावली है। तुम समग्र भारत को दाबकर पड़ी हो। जिस दिन तुम्हें रूपये का पिण्ड न मिला कि तुमने गयासुर की तरह उठाकर हिन्दुस्तान का भक्षण किया।

हे टाइमटिबल संस्तुते ! हमें ठीक टाइम पर मिलो! हे बिकट टिकटे ! हमें टिकट बाबू न लूटैं! हे भीड़ भार भरिते ! हम भीड़ में दबकर न मरैं! हे नीलबंदर बल्लभे !हमें तुम्हारा काई नीलबंदर न छेड़े! हे पुलिस प्रिये! हम तुम्हारे पार्षदों द्वारा पुलिस में न दिये जावें! हे निद्रा तंद्रा में मातृक्रोड़ सदृशे! हम तुम्हारे भीतर सो न जायें और दो चार स्टेशन आगे न बढ़ जायें! हे बृखभानु बृखभानुजे! ब्रीकवान में हमारा असबाब खराब न हो! हे अंजन निरंजने !हे छप्पन व्यंजने !हे सर्वजन मनोरंजने ! अंजन से हमारा अंगभंजन न हो! हे सर्वशक्तिमान जगदीश्वर की बिकट खेल! रेल! हमसे तुम्हारा सदैव मेल हो और तुम्हारी कक्षा में सदैव हमारी रक्षा हो! और वाहन में सदैव हमें उत्साह न हो ! बोल रेलगाड़ी की जय ! बोल मेलगाड़ी की जय ! बोल इंद्रविमान की जय! जय !! जय !!!

निकानोर पार्रा की एक महत्वपूर्ण कविता






पाब्लो नेरुदा के बाद चिले के सबसे प्रभावशाली कवि निकानोर पार्रा अपनी प्रयोगधर्मिता और कट्टर राजनैतिक प्रतिबद्धता के चलते, दुनिया भर में सम्मानित हैं। यह रहा आधुनिक राजनीति, दकियानूस बौद्धिकता और थोथी बयानबाजी को ठेंगा दिखाती उनकी एक महत्वपूर्ण कविता का अनुवाद:


कुछ इस तरह

पार्रा ठहाका मारता है मानो उसे नरक भेजा जा रहा हो
लेकिन आप बताएं कवियों ने कब नहीं लगाया ठहाका
कम से कम वह दम ठोक कर कह तो रहा है कि वह ठहाका मार रहा है

बीतते जाते हैं साल
बीतते ही जाते हैं
कम से कम वे इस बात का आभास तो देते ही हैं
चलिए मान लेते हैं
हर चीज़ यूं चलती है मानो वह बीत रही हो

अब पार्रा रोना शुरू करता है
वह भूल जाता है कि वह एक अकवि है

बन्द करो दिमाग खपाना
आजकल कोई नहीं पढ़ता कविता
कोई फर्क नहीं पड़ता कविता अच्छी है या खराब

मेरी प्रेमिका मेरे चार अवगुणों के कारण मुझे कभी माफ नहीं करेगी :
मैं बूढ़ा हूं
मैं गरीब हूं
कम्यूनिस्ट हूं
और साहित्य का राष्ट्रीय पुरूस्कार जीत चुका हूं

शुरू के तीन अवगुणों की वजह से
मेरा परिवार मुझे कभी माफ नहीं कर सकेगा
चौथे की वजह से तो हर्गिज़ नहीं

मैं और मेरा शव
एक दूसरे को बहुत शानदार तरीके से समझते हैं
मेरा शव मुझसे पूछता है : क्या तुम भगवान पर भरोसा करते हो
और मैं दिल की गहराई से कहता हूं : नहीं
मेरा शव मुझसे पूछता है : क्या तुम सरकार पर भरोसा करते हो
और मैं जवाब देता हूं हंसिए हथौड़े के साथ
मेरा शव मुझसे पूछता है : क्या तुम पुलिस पर भरोसा करते हो
और मैं उसके चेहरे पर घूंसा मार कर जवाब देता हूं
फिर वह अपने कफन से बाहर आता है
और एक दूसरे की बांह थामे
हम चल देते हैं वेदी की तरफ

दर्शनशास्त्र की सबसे बड़ी समस्या यह है कि
जूठे बरतन कौन साफ करेगा

यह इसी संसार की बात है

भगवान
सत्य
समय का बीतना
बिल्कुल सही बात
लेकिन पहले बताइए जूठे बरतन कौन साफ करेगा

जो करना चाहे करे
ठीक है फूटते हैं अपन
और लीजिए अब हम दोबारा वही बन चुके : एक दूसरे के दुश्मन।

जिम कॉर्बेट की ' माई इंडिया ' का पहला पन्ना



जिम कॉर्बेट (१८७५-१९५५) को दुनिया भर में वन्यजीवन और पर्यावरण की परवाह करने वाले बहुत इज्ज़त के साथ देखते हैं। नैनीताल और कालाढूंगी में अपने जीवन का लंबा हिस्सा बिता चुके कॉर्बेट इन इलाकों में रहने वाले लोगों से बहुत अपनापन रखते थे और उनके लिए लगातार काफी कुछ किया करते थे। १९४७ में उन्हें बेमन से भारत छोड़ना पड़ा और अपने जीवन के अन्तिम साल उन्होने केन्या में गुजारे। इन साधारण ग्रामीण लोगों को वे भारत से जाने के बाद भी नहीं भूले। भारत के संस्मरणों को लेकर १९५२ में उनकी किताब 'माई इंडिया' प्रकाशित हुई। इस पुस्तक का पहला पन्ना, जिसमें उन्होने भारत को लेकर बहुत अंतरंग बातें लिखते हुए इस किताब को भारत के गरीबों को समर्पित किया है, आदमखोर बाघों का खात्मा करने वाले इस वीर के व्यक्तित्व का एक दूसरा ही आयाम हमारे सामने लाता है। प्रस्तुत है:

If you are looking for a history of India, or for an account of the rise and fall of the British raj, or for the reasons for the cleaving of the subcontinent into two mutually antagonistic parts and the effect this mutilation will have on the respective sections, and ultimately on Asia, you will not find it in these pages; for though I have spent a lifetime in the country, I lived too near the seat of events, and was too intimately associated with the actors, to get the perspective needed for the impartial recording of these matters.

In my India, the India I know, there are four hundred million people, ninety percent of whom are simple, honest, brave, loyal, hard-working souls whose daily prayer to God, and to whatever Government is in power, to give them security of life and of property to enable them to enjoy the fruits of their labours. It is of these people, who are admittedly poor, and who are often described as ‘India’s starving millions’ among whom I have lived and whom I love, that I shall endeavour to tell in the pages of this book, which I humbly dedicate to my friends, the poor of India.

Wednesday, November 21, 2007

भारत की पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा का एक गीत ?




आलमआरा(१९३१)भारत की पहली बोलती फ़िल्म है. कहा जाता है कि इस फ़िल्म के कोई सुबूत अब हमारे यहां बचे नहीं हैं. डब्ल्यू.एम.खान यानी वज़ीर मोहम्मद खां और ज़ुबेदा इसके प्रमुख सितारे थे, जिन्हें आप यहां फोटो में देख सकते हैं. ज़ाहिर है कि इस फिल्म के गाने भी इन्हीं लोगों ने गाये थे. इत्तेफ़ाक से थोड़ा अर्सा पहले तक ज़ुबेदा ज़िंदा थीं और एक फ़ंक्शन में लोगों के बहुत इसरार पर आलमआरा के एक गाने की शुरुआती लाइन उन्होंने खुद गाकर सुनाई.
आप भी सुनिये...और कहिये कि कबाड़ियों का काम ही है कबाड़ जुटाना.

सर जेफ्री बायकाट का एक संस्मरण




चौंकिएगा मत। इस तस्वीर में इयान बौथम के साथ सर जेफ्री बायकाट खड़े हैं। इस बड़बोले क्रिकेटर और कमेंटेटर को पसन्द करने वालों की संख्या इन से नफरत करने वालों के बराबर ही पाई जायेगी। अपने पूरे कैरियर के दौरान सर जेफ्री बायकाट ने स्वार्थपूर्ण बल्लेबाजी के एक से बढ़कर एक मुकाम हासिल किये। उनके स्वार्थ का चरमोत्कर्ष १९६७ में आया जब दोहरा शतक लगाने के बावजूद उन्हें बेहद धीमा खेलने की वजह से टीम से बाहर कर दिया गया था। बेहतरीन बैकफुट कवर ड्राइव और ऑन ड्राइव मारने वाले सर जेफ्री के नाम टेस्ट में अधिकतम रन (१०८ मैच में ८११४ रन) बनाने का कीर्तिमान लंबे समय तक रहा।

योर्कशायर के मूल निवासी इस खिलाडी को कमेंटेटर बनने के बाद भारतीय क्रिकेट प्रेमी, खराब खेल को 'रूबिश' कहकर गरियाने की उनकी अदा के बाद से ज्यादा बेहतर जानने लगे हैं। लगातार विवादों में घिरे रहने वाले सर जेफ्री बायकाट ने अपने कैरियर के सर्वश्रेष्ठ काल में तीस टेस्ट फकत इस जिद पर नहीं खेले कि रे इलिंग्वर्थ के बाद इंग्लैंड की कप्तानी उनके बजाय माइक डेनेस को सौंप दी गयी। अगर वे इन तीस मैचों को खेले होते तो निस्संदेह टेस्टों में दस हजार रन बनाने वाले पहले खिलाडी बनते।

सर जेफ्री बायकाट का 'ब्लैक ह्यूमर' सारे क्रिकेट जगत में वि/कु ख्यात है।

बात १९७२ की है। मिडिल्स्बरो में योर्कशायर का काउंटी मैच ग्लोस्टर्शायर से चल रह था। सर जेफ्री बायकाट योर्कशायर के कप्तान थे। उनकी टीम के माइकेल बोर अक्सर सर जेफ्री के मजाक और गुस्से का शिकार बनते थे। कुछ ऐसी स्थिति बनी कि योर्कशायर ने अपना एक खिलाडी ग्लोस्टर्शायर को फील्डिंग के वास्ते उधार देना था। माइकेल बोर जब फील्डिंग करने पहुंचे तो सर जेफ्री ६८ पर खेल रहे थे। बोर के आते ही प्रोक्टर की गेंद को सर जेफ्री ने हुक किया और बोर साहब ने लॉन्ग लेग पर ज़बरदस्त कैच ले कर खुद अपने कप्तान को आउट कर दिया।

बोर को चाहिए था कि निखिद्द कुत्ते की तरह बाउन्ड्री पर खडे रहते लेकिन वे चेहरे पर बढ़िया मुस्कान सजाये ग्लोस्टर्शायर के खिलाडियों के साथ जश्न में शामिल हो गए। जब माइकेल बोर ड्रेसिंग रूम में पहुंचे तो उन्होने देखा कि गुस्साए कप्तान ने उनकी पूरी किट ग्लोस्टर्शायर के ड्रेसिंग रूम में ले जा कर फेंक दी थी।


( तस्वीर के बारे में: यह तस्वीर १९८१ - ८२ सत्र में दिल्ली टेस्ट के दौरान पड़े क्रिसमस की फैंसी ड्रेस पार्टी की है। बौथम के सीने पर लिखा हुआ 8032 बताता है कि पिछले ही दिन सर जेफ्री ने लंबे समय से कायम सर गैरी सोबर्स के ८०३२ टेस्ट रन बनाने के कीर्तिमान को धूल चटाई थी। इस ड्रा मैच में सर जेफ्री ने शतक बनाया था। सर जेफ्री के बारे में एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि पहले अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच की पहली गेंद का सामना उन्होने ही किया था और इस तरह की क्रिकेट में गिरने वाला पहला विकेट भी उन्ही का था।)

Monday, November 19, 2007

मेहनाज़ अनवर से इरफ़ान की बातचीत: उर्फ रेडियो के रंग्



ऑल इंडिया रेडियो: कुछ भूले बिसरे चित्र



मुजीब सिद्दीक़ी (बीच में), स्टूडियो से बाहर आते हुए



प्रसारण के क्षण


पुरानी मशीनों पर रिकॉर्डिंग


उर्दू के प्रख्यात व्यंग्यकार मुज्तबा हुसैन


मुजीब सिद्दीक़ी (बाएं) प्रसारण के बीच


मरियम क़ाज़मी (बाएं)



जावेद अख़्तर



बाएं से, मुजीब सिद्दीक़ी, आई.के.गुजराल, रेवती सरन शर्मा और अन्य


बशीर बद्र


अमृता प्रीतम के साथ ऑल इंडिया रेडियो का स्टाफ़
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मेहनाज़ अनवर का नाम न सिर्फ़ पुरानी स्टाइल के रेडियो से जुड़ा हुआ है बल्कि वो FM सुननेवालों के लिये भी बेहद जाना-पहचाना नाम हैं. एफ़एम ब्रॊडकास्टिंग की जब शुरुआत हुई तो ग़ज़लों के प्रोग्राम आदाब और आदाब अर्ज़ है से उन्होंने नये सुनने वालों से एक बेहद अपनापे का रिश्ता बनाया, लोगों में ज़बान का शऊर पैदा किया और एक नये अन्दाज़-ए-बयां को मक़बूल बनाया. सुननेवालों से जज़्बाती रिश्ता बनाना कोई उनसे सीखे.वो जितनी दिलकश आवाज़ की धनी हैं उतनी ही खूबसूरत शख्सियत भी हैं.
आइये सुनतें हैं उन्ही की आवाज़ मे कुछ गुज़री बातें.पहला हिस्सा.
यह कहते हुए मैंने रेडियोनामा पर 28सितंबर 2007 को मेहनाज़ आपा के इंटरव्यू का एक शुरुआती हिस्सा जारी किया था. आज, जब कि रेडियो की वापसी की बातें बडे ज़ोर-ओ-शोर की जा रही हैं ; ये लाज़िमी हो जाता है कि रेडियो प्रोफ़ेशन पर एक मुकम्मल नज़र डाली जाए. बग़ैर इसके यह वापसी एक बेसिर पैर की क़वायद ही साबित होगी. कोई तीस बरस से रेडियो बिज़नेस में रही आई मेहनाज़ ने बहुत कुछ पुराने ब्रॉडकास्टर्स से सीखा और इस बीच रेडियो ब्रॉडकास्टिंग को मुतास्सिर किया है. लखनऊ की रहने वाली मेहनाज़ ने जेएनयू से बाद की पढाई की. उनकी दो बेटियां आज ख़ुद देश और विदेश के एफ़एम रेडियो पर लोकप्रिय प्रोग्राम पेश करती हैं.
तो पेश है वह पूरा और अनएडिटेड इंटरव्यू. सुनिये कि मेहनाज़ साहेबा के रेडियाई सफर में क्या-क्या मरहले आये और क्या उनके observations हैं.


मेहनाज़ अनवर के घर पर 26 फ़रवरी 2005 को रिकॉर्ड किया गया.
Dur. 50Min 54Sec

Sunday, November 18, 2007

क़िस्सा- ए - इंतखाब : भाग एक



मल्लीताल बङा बाजार से अशोक सिनेमा हाल की ओर नीचे उतरती ढलवां सङक के दांई ओर मुङती संकरी गली के नुक्कङ पर है मामाजी की चाय के दुकान। इसी के बाद वाली दुकान ही है जहूर दा की दुकान इंतखाब। कौन जहूर दा ? इंतखाब ? अगर आप नैनीताल में रहते हैं या कभी रह चुके हैं और साहित्य, कला, लिखने- पढने से आपका दूर-दूर से भी संबंध रहा है तो यह मानना थोङा मुश्किल लगता है कि आप उनसे परिचित न हों। अगर आप कभी भी नैनीताल और उसकी सांस्कृतिक हलचलों से वाकिफ नहीं रहे तो माफ कीजिएगा आप इंतखाब नाम की दुकान और जहूर आलम नाम के इसके दुकानदार को नहीं जानते होंगे।

वैसे इंतखाब कपङे की दुकान है लेकिन हमेशा भरी रहने वाली उस दुकान में ग्राहकों के दर्शन मुश्किल से ही होते हैं। ग्राहक बेचारा करे भी तो क्या, एक तो दुकान इतनी छोटी सी, उस पर ना जाने कौन-कौन से लोग हमेशा वहां आ कर अड्डा जमाए रहते हैं। हमेशा ही बहस- बतकहियों की महफिल सी जमी रहती है, हिम्मत करके कोई दुकान में आ भी जाता है तो दुकान में बैठे और लोगों से ज्यादा खुद दुकानदार के चेहरे पर हल्की सी खीझ के भाव आ जाते है कि अरे यार ये क्यों आ गया अभी।

जहूर आलम को बहुत कम लोग ही उनके पूरे नाम से बुलाते होंगे, वो जहूरदा के नाम से ही जाने जाते हैं। पिछले १५ साल से, जब से मैं उन्हें जानती हूं हिना से रंगे लाल बालों और छोटी कद-काठी वाले जहूर दा के चेहरे पर समय के ब्रश का एक हल्का सा स्ट्रोक भी नहीं पङा है। उम्र जैसे साल दर साल बिना छुए आगे बढ जा रही है। हर बार उनसे मिलने पर उसी गर्माहट वाली कुछ-कुछ शर्मीली सी लगने वाली मुस्कराहट के साथ आपका स्वागत होता है। हर बीतते साल के बाद अजनबी से लगने वाले नैनीताल में यह स्वागत भरी मुस्कान तसल्ली देती है आपको घर वापसी का अहसास दिलाती है।
नैनीताल में रहने वाले या पढाई-नौकरी के दौरान कुछ अरसा बिता चुके लोग या कहूं कि थोङा संवेदनशील किस्म के लोग जानते हैं कि यह पहाङी शहर कुछ खास है। इसका अपना एक अलग सा मिज़ाज है जो मौसमों के साथ बदलने के बावजूद एक शाश्वत भाव के साथ आपकी आत्मा से चिपका रहता है। नैनीताल की हवाओं में एक उर्जा हमेशा चलायमान रहती है। एक छोटे शहर के शांत ठहराव के बावजूद नैनीताल में हमेशा कुछ न कुछ बजबजाता रहता है। इंतखाब यानी जहूर दा की दुकान भी नैनीताल के इस मूलभूत विशेषता को अपने में समाए हुए है।

दुकान बहुत छोटी सी है, मुख्य काउंटर के पीछे जहूर दा या असल में इंतखाब के कारोबार की जिम्मेदारी निभाने वाले देवेंद्र पांडे खङे रहते हैं या अपने पीछे वाली रैक की निचली संकरी पट्टी पर तशरीफ टिकाए बैठे होते हैं। जो लोग जहूर दा से परिचित है वह पांडे जी को भी जानते है। दुकान में होने वाली बौद्धिक व अबौद्धिक हर तरह की चर्चाओं के दौरान वह केवल मूकदर्शक बन कर नहीं बल्कि एक सक्रिय वक्ता की तरह हिस्सेदारी करते हैं।

इन दोनों के अलावा दुकान में चार लोग और बैठ सकते हैं, कपङों के डिब्बे इधर-उधर खिसका कर, लेकिन अक्सर सात-आठ लोग जैसे-तैसे अटक कर बैठे मिल ही जाते हैं वहां। दो-चार लोग तो दुकान की दो सीढियों में ही लटक कर काम चला लेते हैं। बीच-बीच में दुकान के सामने से गुजरते लोगों से ओहो पांडे जी, अहा गिरदा, अरे प्रमोद दा की पुकार के साथ कुशल-क्षेम का आदान-प्रदान जारी रहता है। दुकान के बाहर की संकरी सी गली जैसे एक फिल्मी परदे का काम करती है, जिसमें निर्मल वर्मा की कहानियों जैसे पात्र एक कोने से निकल कर दूसरे कोने में छिपते चले जाते हैं। दुकान के ठीक सामने यानी गिन कर तीन कदम की दूरी पर दिवाल से लगभग चिपकी हुई चूढी की दुकान हैं। इंतखाब में बैठ कर केवल इस दुकान में होने वाली हलचल पर नजर टिकाए भी घंटों बिताए जा सकते हैं।

बहरहाल यह तो था दुकान का भौतिक स्वरूप, खास बात है इसकी आत्मा। मेरे जैसे छोटे गांव-कस्बों से नैनीताल पढने आए कई सारे लोगों के लिए यह दुकान जैसे एक दूसरा विश्वविद्यालय थी। मैंने यहीं आ कर जाना कि थियेटर जैसी भी कोई चीज होती है, एक एनएसडी भी है कहीं, कोई कवि हैं वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, नाज़िम हिकमत, कोई ग्यानरंजन हैं उनकी एक पत्रिका है पहल। यहीं जाना कि एक चीज़ होती है राजनीति और एक राजनीतिक विचारधारा। एक दक्षिण पंथ होता है और एक वामपंथ। एक जनमत भी है। यहीं आ कर पता चला कि फिल्म संगीत से इतर भी संगीत होता है। जैसे बंद कमरे में अनगिनत दरवाजे अचानक खुल गए हों।

ऐसा नहीं था कि सब बातें समझ में आ ही जाती थीं लेकिन जितना भी समझा उसने ही आगे के जीवन की दिशा तय करने में मदद करी ये क्या कम योगदान है एक दुकान का? मैं ही नहीं कुछ और लोग भी हैं जिनकी जिंदगी के रास्ते इंतखाब की रोशनी में तय हुए। जब मैं यह बात कर रही हूं तो इसमें अतिशयोक्ति कतई नहीं हैं। दरअसल इंतखाब बहुत ही सादामिज़ाज सी दुकान है कि वास्तव में इसे खुद भी यह अहसास नहीं होता कि अनजाने में ही यह कितने लोगों को कितनी बातें सिखा देती है। हिंदुस्तान की सांझा संस्कृति देखनी हो तो यहां आइए। जहूरदा की अगुआई में कुमाउंनी होली की रंगत देखनी हो या रामलीला में श्रवण कुमार नाटक का मंचन आप जान जाएंगे कि सांम्प्रदायिक सदभावना कहने-सुनने की नहीं गुनने की चीज़ है।

इंतखाब में आप बातें ही नहीं जानते बल्कि इतने सारे लोगों से, इतनी विधाओं के जानकार लोगों से मिलते हैं कि आप कितने ही आत्मकेंद्रित किस्म के हों आपके दोस्तों का दायरा बढना निश्चित है। कबाङखाने के ज्यादातर साथियों को मैं जहूर दा, युगमंच और इंतखाब के जरिए ही जानती हूं। कुछ साल पहले अवस्थी मास्साब से आप यहीं मिल सकते थे, हमेशा मुस्कराते लगते चेहरे पर मुंदी हुई आंखों के साथ शेक्सपियर के किसी नाटक के किसी हिस्से की दिलचस्प व्याख्या करते हुए। कंधे पर झोला टांगे गिर्दा भी यही मिल जाते हैं कभी-कभार। इंतखाब ही वह जगह हो सकती है जहां आपको असलम के लिखे नोहे का मतला ठीक करते जगमोहन जोशी यानी मंटूदा मिल सकते हैं, या जाङों में अंडे का ठेला लगाने के कारण अनिल अंडा के नाम से मशहूर अनिल, जहूर दा से बहस करता दिख सकता है कि नाटक के काम में राजनीतिक विचारधारा का दखल नहीं होना चाहिए। प्रदीप पांडे किसी नए नाटक के संवादों से माथापच्ची करते यहीं मिल जाएंगे। संजीदा चेहरे के साथ अपनी हंसोङ टिप्पणियों से हंसा-हंसा कर लोट-पोट कर देने वाले हेंमत बिष्ट से या बच्चों वाली सरस मुस्कान वाले मामा जी यानी जितेंद्र् बिष्ट से भी यहीं मुलाकात हो सकती है। किस-किस का नाम लूं, इतने सारे आत्मीय और दिलचस्प लोगों से गुलजार रहती है इंतखाब की महफिल कि यहां से गए लोग सालों-साल यहां की यादों को सहेजे रखते हैं।

बीते सालों में इंतखाब भी काफी उथल-पुथल से हो कर गुज़रा है। कई सारे पुराने साथियों ने यह अड्डा छोङ कर नए मुकाम तलाश लिए। सालों से जुङे दिलों में जब दरारें आईं तो जाहिरी तौर पर तल्खियां भी सामने आईं। कई तरह के गिले-शिकवे हैं दिलों में, रिश्ते जितने गहरे होते हैं चोट भी उतनी ही गहरी होती है इसलिए आपसी कङवाहटें भी स्वाभाविक हैं। लेकिन समय की स्लेट पर सब कुछ अच्छा ही लिखा जाए यह संभव भी तो नहीं इसलिए कुछ अलगाव, कुछ दूरियां, कुछ कङवाहटों के लिए भी अपनी यादों में ही जगह बनानी होगी।

नमस्ते जी :नए कबाड़ी अरूण रौतेला का स्वागत !



कबाड़खाने में आपका स्वागत है भाई ।
न हमारे पास धन-दौलत न फूल-माला-मिठाई।
आओ मिलजुल के कुछ कपास कातें
बाकी तो चलती रहेंगी दुनिया जहान की बातें।
कुछ गप्प ,कुछ शप्प ,कुछ धप्प
कबाड़खाना में सब कुछ गड़प्प।


भाई अरूण रौतेला जी आपका इस ठिए पर कबाड़ी समुदाय की ओर से स्वागत है। आपके आने से यहां कुछ नया-नया होगा। स्वागत !

Friday, November 16, 2007

`राग दरबारी´ : यह संगीत हमारे भीतर भी बज रहा है क्या ?




1970 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास `राग दरबारी´ आजादी के बाद के भारतीय जनमानस के सामाजिक जीवन की बहुरंगी छवियों , परिवर्तित - परावर्तित जनाकांक्षाओं , राजनीतिक सदाचार - कदाचार के सार्वजनिक स्वीकार - अस्वीकार , सरकारी - गैर सरकारी योजनाओं - परियोजनाओ -कार्यक्रमों की नीति-अनीति-परिणति , शैक्षिक संस्थानो में फल-फूल रही दार्शनिक दरिद्रता - दकियानूसी और दुकानदारी , बुद्धजीवी तबके की निस्पृह-निस्सार निस्संगता आदि-आदि का जीवंत दस्तावेज तो है ही साथ ही यह आम जनता की उस दुर्दम्य जिजीविषा का प्रमाण भी है जिसके लिए प्रतिकूलताओं का मतलब दैनंदिन चुनौती और दैनिक जीवन -व्यापार का एक पड़ाव भर है । शायद यही वजह है कि यह उपन्यास समाज के हर तबके द्वारा सराहा गया ।

`राग दरबारी´ की कथाभूमि शिवपालगंज हैं , एक छोटा-सा कस्बा या एक बड़ा-सा गांव ।यहां की पंचायत, कोआपरेटिव सोसाइटी , कालेज की प्रबंध समिति ,सबके सब आजादी के बाद के भारतीय सामाजिक तानबाने के प्रतिनिधि हैं । इनके बीच स्वार्थ, लोभ ,लिप्सा का खेल तो है ही , इन्ही के बीच जगह-जगह मानवीय करूणा, अपननत्व,, प्रेम,पीड़ा आदर्श की वे सरितायें भी हैं जिन्हें सदानीरा बनाये रखने की जद्दोजहद को हम लोग साहित्य , संस्कृति, कला , आस्था आदि-आदि का उद्देश्य या प्रयोजन के नाम से जानते समझते -समझाते हैं । यह उपन्यास हिन्दी कथा साहित्य में तेजी से तिरोहित होते हुए उस `स्पेस´ की उपस्थिति भी है जिसे गांव या कस्बा कहते हैं । साथ इस `स्पेस´ को लेकर बनी -बनाई उस रोमानी छवि के ध्वस्तीकरण की ईमानदार कोशिश भी जो ` अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है ´ और मादल -मृदंग के `डिमिक - डिमिक ´ से आस्वाद ग्रहण कर उसी में आंख मूंदकर मुदित रहने की अभ्यस्त है ।
`राग दरबारी´ की भाषा-शैली का अपना एक अलग रंग है । लेखक के सामने इस बात की पूरी गुंजाइश थी कि वह बड़ी सरलता से इसकी भाषा को लोकल कलर या आंचलिक पुट दे सकता था लेकिन संभवत: ऐसा करने पर उसके कथानक की व्यापकता सीमाबद्ध हो जाती , वह अपनी लघुता में विराटता का रूपक प्रस्तुत करने में पिछड़ जाता , वह उतना बेधक और विध्वंसक नहीं रह पाता । कथ्य भाषा को किस तरह साधता है और भाषा कथ्य को कैसे कसती है ,यह इस उपन्यास के माध्यम से सीखा जा सकता है ।
`राग दरबारी´ निरन्तर वर्णनात्मकता में चलने वाला एक असमाप्त गद्य है । इसके पात्रों का एक अपना संसार है , वे शिवपालगंज के `गंजहे´ हैं । वैद्य जी, रूप्पन बाबू , रंगनाथ , सनीचर ,बद्री पहलवान , छोटे पहलवान, बाबू रामाधीन भीमखेड़वी, लंगड़ ,प्रिन्सिपल साहब, पं0 राधेलाल , खन्ना मास्टर ,मास्टर मोतीराम , कुसहर प्रसाद ,जोगनाथ इत्यादि पात्र अपनी दुनिया के भीतर ही एक सार्वजनिक दुनिया ( पब्लिक स्फीयर ) का खाका खीते चलते हैं । पाठक के लिए यह दुनिया नई भी है और अपनी भी । आजादी के बाद के हिन्दी उपन्यास साहित्य में `मैला आंचल´( फणीश्वर नाथ रेणु) के बाद `आधा गांव´( राही मासूम रज़ा) ,`तमस´( भीष्म साहनी) और `राग दरबारी´ की त्रयी ने काफी हलचल पैदा की थी । तीनों की कथाभूमि और कहने का अंदाज जुदा-जुदा था फिर भी तीनों ही एक साथ मिलकर भरतीय जनमानस के वृत्त को पूरा करते हैं ।

`राग दरबारी´ का आखरी हिस्से को श्रीलाल शुक्ल जी ने पलायन संगीत का नाम दिया है । तो आइए ! सुनते हैं वही संगीत । पर ध्यान रहे यह सुनना भी निहायत जरूरी है कि कहीं किसी कोने -कांतर में यह संगीत हमारे भीतर भी बज रहा है क्या ?

पलायन संगीत

तुम मंझोली हैसियत के मनुष्य हो और मनुष्यता के कीचड़ में फंस गए हो । तुम्हारे चारों ओर कीचड़ ही कीचड़ है। कीचड़ की चापलूसी मत करो । इस मुगालते में न रहो कि कीचड़ से कमल पैदा होता है । कीचड़ में कीचड़ ही पनपता है । वही फैलता है वही उछलता है ।
कीचड़ से बचो । यह जगह छोड़ो ।यहां से पलायन करो।

वहां ,जहां की रंगीन तस्वीरें तुमने `लुक´ और `लाइफ´ में खोजकर देखी हैं ( जहां के फूलों के मुकुट, गिटार और लड़कियां तुम्हारी आत्मा को हमेशा नए अन्वेषणों के लिए ललकारती हैं (जहां की हवा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, जहां रविशंकर - छाप संगीत और महर्षि-योगी छाप अध्यात्म की चिरंतन स्विप्नलता है । जाकर कहीं छिप जाओ। यहां से पलायन करो । यह जगह छोड़ो.

नौजवान डाक्टरों की तरह ,इंजीनियरों ,वैज्ञानिकों , अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लिए हुड़कने वाले मनीषियों की तरह ,जिनका चौबीस घंटे यही रोना है कि सबने यहां मिलकर उन्हे सुखी नहीं बनाया , पलायन करो, यहां के झंझटों में मत पड़ो।

अगर तुम्हारी किस्मत ही फूटी हो ,और तुम्हें यहीं रहना पड़े तो अलग से अपनी एक हवाई दुनिया बना लो । उस दुनिया में रहो जिसमें बहुत -से बुद्धिजीवी आंख मूंदकर पड़े हैं होटलों और क्लबों में ।शराबखानों और कहवाघरों में, चण्डीगढ़ - भोपाल - बंगलौर के नवनिर्मित भवनों में ,पहाड़ी आरामगाहों में ,जहां कभी न खत्म होने वाले सेमिनार चल रहे हैं। विदेशी मदद से बने हुए नए-नए शोध - संस्थानों में , जिनमें भारतीय प्रतिभा का निर्माण हो रहा है। चुरूट के धुयें ,चमकीली जैकेट वाली किताब और गलत , किन्तु अनिवार्य अंग्रेजी की धुन्ध वाले विश्वविद्यालयों में । वहीं जाकर जम जाओ ,फिर वहीं जमे रहो।

यह न कर सको तो तो अतीत में जाकर छिप जाओ । कणाद, पतंजलि, गौतम में , अजन्ता, ऐलोरा ,एलिफेंटा में , कोणार्क और खजुराहो में ,शाल -भंजिका -सुर -सुंदरी-अलसकन्या के स्तनों में, जप-तप-मंत्र में ,सन्त -समागम -ज्योतिष -सामुद्रिक में- जहां भी जगह मिले , जाकर छिप रहो।

भागो, भागो, भागो । यथार्थ तुम्हरा पीछा कर रहा है ।

बखत बखत की बात है





मुर्गा मारे लात है

... लगी?

Wednesday, November 14, 2007

जब चार्ली पहली बार मंच पर उतरे





मेरे प्रिय कबाड़ी मित्रो
अच्‍छा लग रहा है एक और ब्‍लाग बिरादरी में आ कर. मेरे कुछ माल का परिचय अशोक जी ने दे दिया है और बाकी का मैं खुद देता रहूंगा ताकि कबाड़ी बाज़ार में मेरी साख बनी रही. आपसे एक बात और भी शेयर करनी है कि मेरा बचपन और लड़कपन और यौवन सचमुच देहरादून के कबाड़ी बाजार में बीता है सो वहां के तौर तरीके मैं खूब जानता हूं. आपसे शेयर करता रहूंगा. मैंने कुछ विश्‍व‍ प्रसिद्ध आत्‍म कथाओं के अनुवाद किये हैं. इनमें चार्ली चैप्लिन की आत्‍म कथा और चार्ल्‍स डार्विन की आत्‍म कथा खास हैं.
आज आपसे पहली बार रू ब रू होते हुए मैं चार्ली चैप्लिन की आत्‍म कथा के एक महत्‍वपूर्ण अंश को यहां दे रहा हूं.
आपको अच्‍छा लगेगा.
सूरज कबाड़ी

मां को उसकी आवाज़ बहुत तकलीफ दे रही थी। वैसे भी उसकी आवाज़ कभी भी इतनी बुलंद नहीं थी लेकिन ज़रा-सा भी सर्दी-जुकाम होते ही उसकी स्वर तंत्री में सूजन आ जाती थी जो फिर हफ्तों चलती रहती थी; लेकिन उसे मज़बूरी में काम करते रहना पड़ता था। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी आवाज़ बद से बदतर होती चली गयी। वह अब अपनी आवाज़ पर भरोसा नहीं कर सकती थी। गाना गाते-गाते बीच में ही उसकी आवाज़ भर्रा जाती या अचानक गायब ही हो जाती और फुसफुसाहट में बदल जाती। तब श्रोता बीच में ठहाके लगने लगते। वे गला फाड़ कर चिल्लाना शुरू कर देते। आवाज़ की चिंता ने मां की सेहत को और भी डांवाडोल कर दिया था और उसकी हालत मानसिक रोगी जैसी हो गयी। नतीजा यह हुआ कि उसे थियेटर से बुलावे आने कम होते चले गये और एक दिन ऐसा भी आया कि बिल्कुल बंद ही हो गये।
ये उसकी आवाज़ के खराब होते चले जाने के कारण ही था कि मुझे पांच बरस की उम्र में पहली बार स्टेज पर उतरना पड़ा। मां आम तौर पर मुझे किराये के कमरे में अकेला छोड़ कर जाने के बजाये रात को अपने साथ थियेटर ले जाना पसंद करती थी। वह उस वक्त कैंटीन एट द' एल्डरशाट में काम कर रही थी। ये एक गंदा, चलताऊ-सा थियेटर था जो ज्यादातर फौजियों के लिए खेल दिखाता था। वे लोग उजड्ड किस्म के लोग होते थे और उन्हें भड़काने या ओछी हरकतों पर उतर आने के लिए मामूली-सा कारण ही काफी होता था। एल्डरशॉट में नाटकों में काम करने वालों के लिए वहां एक हफ्ता भी गुज़ारना भयंकर तनाव से गुज़रना होता था।
मुझे याद है, मैं उस वक्त विंग्स में खड़ा हुआ था जब पहले तो मां की आवाज़ फटी और फिर फुसफुसाहट में बदल गयी। श्रोताओं ने ठहाके लगाने शुरू कर दिये और अनाप-शनाप गाने लगे। उन्‍होंने कुत्ते बिल्लियों की आवाज़ें निकालना शुरू कर दिया। सब कुछ अस्पष्ट-सा था और मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या चल रहा है। लेकिन शोर-शराबा बढ़ता ही चला गया और मज़बूरन मां को स्टेज छोड़ कर आना पड़ा। जब वह विंग्स में आयी तो बुरी तरह से व्यथित थी और स्टेज मैनेजर से बहस कर रही थी। स्टेज मैनेजर ने मुझे मां की सखियों के आगे अभिनय करते देखा था। वह मां से शायद यह कह रहा था कि उसके स्थान पर मुझे स्टेज पर भेज दे।
और इसी हड़बड़ाहट में मुझे याद है कि उसने मुझे एक हाथ से थामा था और स्टेज पर ले गया था। उसने मेरे परिचय में दो चार शब्द बोले और मुझे स्टेज पर अकेला छोड़ कर चला गया। और वहां फुट लाइटों की चकाचौंध और धुंए के पीछे झांकते चेहरों के सामने मैंने गाना शुरू कर दिया। ऑरक्रेस्टा मेरा साथ दे रहा था। थोड़ी देर तक तो वे भी गड़बड़ बजाते रहे और आखिर उन्होंने मेरी धुन पकड़ ही ली। ये उन दिनों का एक मशहूर गाना जैक जोन्स था।


जैक जोंस सबका परिचित और देखा भाला
घूमता रहता बाज़ार में गड़बड़झाला
नहीं नज़र आती कोई कमी जैक में हमें
तब भी नहीं जब वो जैसा था तब कैसा था
हो गयी गड़बड़ जब से छोड़ा उसे बुलियन गाड़ी ने
हो गया बेड़ा गर्क, जैक गया झाड़ी में
नहीं मिलता वह दोस्तों से पहले की तरह
भर देता है मुझे वह हिकारत से
पढ़ता है हर रविवार वह अखबार टेलिग्राफ
कभी वह बन कर खुश था स्टार
जब से जैक के हाथ में आयी है माया
क्या बतायें, हमने उसे पहले जैसा नहीं पाया।



अभी मैंने आधा ही गीत गाया था कि स्टेज पर सिक्कों की बरसात होने लगी। मैंने तत्काल घोषणा कर दी कि मैं पहले पैसे बटोरूंगा और उसके बाद ही गाना गाऊंगा। इस बात पर और अधिक ठहाके लगे। स्टेज मैनेजर एक रुमाल ले कर स्टेज पर आया और सिक्के बटोरने में मेरी मदद करने लगा। मुझे लगा कि वो सिक्के अपने पास रखना चाहता है। मैंने ये बात दर्शकों तक पहुंचा दी तो ठहाकों का जो दौरा पड़ा वो थमने का नाम ही न ले। खास तौर पर तब जब वह रुमाल लिये-लिये विंग्स में जाने लगा और मैं चिंतातुर उसके पीछे-पीछे लपका। जब तक उसने सिक्कों की वो पोटली मेरी मां को नहीं थमा दी, मैं स्टेज पर वापिस गाने के लिए नहीं आया। अब मैं बिल्कुल सहज था। मैं दर्शकों से बातें करता रहा, मैं नाचा और मैंने तरह-तरह की नकल करके दिखायी। मैंने मां के आयरिश मार्च थीम की भी नकल करके बतायी।

और कोरस को दोहराते हुए मैं अपने भोलेपन में मां की आवाज़ के फटने की भी नकल कर बैठा। मैं ये देख कर हैरान था कि दर्शकों पर इसका जबरदस्त असर पड़ा है। खूब हंसी के पटाखे छूट रहे थे। लोग खूब खुश थे और इसके बाद फिर सिक्कों की बौछार। और जब मां मुझे स्टेज से लिवाने के लिए आयी तो उसकी मौज़ूदगी पर लोगों ने जम के तालियां बजायीं। उस रात मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार स्टेज पर उतरा था और मां आखिरी बार।

(चार्ली चैप्लिन की आत्‍म कथा में से एक अंश)

Tuesday, November 13, 2007

पारसी क्रिकेट और हारे हुए अंग्रेज़ खिलाड़ियों की कविता






करीब करीब तीन सौ साल पहले (१७२१ में) भारत में पहला क्रिकेट मैच खेले जाने के प्रमाण उपलब्ध हैं, पहला टेस्ट मैच अलबत्ता भारत ने १९३२ में खेला था। १७२१ से १९३२ के बीच के दौर में भारत में क्रिकेट को लेकर बहुत ज्यादा दस्तावेज़ नहीं मिलते। क्रिकेट के लिए इस देश की दीवानगी के बावजूद यह बहुत दुखी करने वाला तथ्य है कि आम भारतीय क्रिकेटप्रेमी को इस खेल के इतिहास में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। फिलहाल कबाड़ी आप के लिए एक दिलचस्प मसाला लाया है।

१९३२ से ४६ साल पहले यानी १८८६ में बंबई से पारसी खिलाड़ियों की एक टीम ने इंग्लैंड का दौरा किया था। भारत में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने का काम पारसियों ने ही किया था। पारसी स्कूलों में बच्चों को १८३९ से ही क्रिकेट प्रशिक्षण दिया जाता था। १८४८ में बंबई में 'ओरिएंटल क्रिकेट क्लब' की स्थापना की गई थी। १८७६ में ए बी पटेल ने पारसी क्रिकेट क्लब शुरू किया और 'बौम्बे जिमखाना' (जिसके सदस्य केवल अंग्रेज़ हुआ करते थे) के साथ एक मैच खेल पाने में कामयाबी हासिल की। पारसी टीम ६३ रन से हार गई लेकिन ए बी पटेल को इस मैच के बाद एक विचार सूझा। वे चाहते थे कि भारत से एक टीम इंग्लैंड का दौरा करे।

यह स्वप्न १८८६ में पूरा हुआ और डाक्टर डी एच पटेल की कप्तानी में १५ खिलाड़ियों का दल इंग्लैंड के लिए रवाना हुआ. २४ मई १८८६ को लौर्ड शेफील्ड की टीम से पहला मैच था। पूरे दौरे में पारसी टीम का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। कुल २८ मैच हुए। पारसी टीम सिर्फ एक मैच जीत पाई। ८ मैच ड्रा हुए और १९ में उन्हें शिकस्त मिली। लेकिन १८८८ में पी डी कांगा की कप्तानी में इंग्लैंड का दौरा करने वाली पारसी टीम ने ३१ मैच खेले: आठ जीते और बारह हारे। यह पिछले दौरे से कहीं बेहतर प्रदर्शन था।

३ और ४ अगस्त १८८८ को बौर्नमाउथ में जेंटलमैन ऑफ़ बौर्नमाउथ के साथ मैच खेला गया। जेंटलमैन ऑफ़ बौर्नमाउथ सकी टीम पहली पारी में ५६ पर आउट हो गई। जवाब में पारसियों ने ६१ रन बनाए। जेंटलमैन ऑफ़ बौर्नमाउथ की टीम दूसरी पारी में फकत ४१ रन बना सकी। पिच बहुत घातक थी लेकिन पारसियों ने ज़बरदस्त खेल दिखाया और चौथी पारी में जीत के लिए ज़रूरी ३७ रन चार विकेट खो कर बना लिए। इस हार से बुरी तरह खिन्न एक अंग्रेज़ फैन ने निम्नलिखित कविता रची:

The Heathen Parsees

Now I wish to remark, and my language is plain,
That for ways that are dark, and for tricks that are vain,
The Heathen Parsee is peculiar, and the same
I would like to explain.

It was August the third, and soft were the skies,
Which it might be inferred, the Parsees were likewise,
But they playedit that day upon Bournemouth,
in a way for to open our eyes.

When we had a small game with the artful Hindoo
It was cricket the same, to Parsees something new,
For they had come all the way from Calcutta
to pick up a wrinkle or two.

And the balls that they bowled, with ineffable glee
And the yorkers that told, were quite frightful to see,
Till we Bournmouths looked at each other, and said
"How on earth can this be."

Then the Parsees went in and we gave them a shout,
And pulled up our slacks, for to bundle them out,
But the foreigner were not to be beaten, and that Cooper*
He knocked us all out.

Then we rose in our places, and said all disgusted
These Indian races are not to be trusted,
For we thought we had got a soft thing on,
and so! We were utterly butted.


*आर डी कूपर: पारसी टीम के मध्यक्रम के बल्लेबाज़। १८८८ के दौरे में कूपर का बैटिंग औसत दोनों टीमों में सर्वश्रेष्ठ था। उन्होने ५२ पारियों में १८.३० की औसत से ९५२ रन बनाए।

Monday, November 12, 2007

ई देखो बिग्यापोन




( कबाड़खाने का पहला आधिकारिक विज्ञापन )

हम खून-ए-ज़िगर लेकर बाज़ार में आए हैं
क्या दाम लगाएंगे लफ़्ज़ों की दुकां वाले ।
-राही मासूम रज़ा

Saturday, November 10, 2007

खुशआमदीद : नए ‘कबाड़ी ’ कथाकार सूरज प्रकाश का स्वागत !



आज दाखिल हुआ है एक और नया कबाड़ी ,
सब भइयन मिल के चलाएंगे कबाड़खाने की गाड़ी ।

लेखक , अनुवादक और पाठक है अपना यह भाई ,
`अधूरी तस्वीर´ ,`हादसों के बीच´ ,`जरा संभल के चलो`
ऐसी कई किताबें इन्नें लिक्खीं और बनाईं ।


`एनिमल फार्म ´(जार्ज आरवेल ),`
`कानिकल आफ ए डेथ फोरटोल्ड´( मारखेज) आदि -आदि
विश्व प्रसिद्ध कथाकारों का अनुवाद करा है ,
और अभी इनके पास करने को कित्ता सारा काम धरा है ।

`कथाकार ´ अपना मुंबई में रैता है
और अपने प्रोफाइल में खुद के बारे में जे कैता है -


` बंदा लेखक है , अनुवादक है और पाठक है ।
कुछ अरसे से लिखना छूटा हुआ है । शायद
ब्लागिस्तान में आने से शुरू हो जाए ।´

कथाकार सूरज प्रकाश आपके आने - लिखने - लिखाने से `कबाड़खाना ´की दौलत में इजाफा होगा । आपका स्वागत है!





Friday, November 9, 2007

पानी, बालू और बारिश



तारीख़: १५ अगस्त, साल: १९९१






बारिश के अपने नियम हैं
अपने कायदे,
जब दिन होता है खाली - उचाट
तब पहाड़ की भृकुटि पर उदित होता है
स्मृति का अंधड़,
हरे पेड़ होने लगते हैं और हरे -और ऊंचे '


जहां जाना था उसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई थी । भूगोल विभाग के प्रोफेसर रघुवीर चन्द जी ने एक बड़े से नक्शे में एक छोटे से बिन्दु की ओर संकेत कर बताया था कि वहां पहुंचने के लिए सबसे पहले एक बड़ी नदी पार करनी होगी और उसके बाद एक छोटी नदी, फिर उससे छोटी एक नदी और। फिर?`फिर तो तुम्हें जाकर ही पता चल पाएगा ।´ और मैं चल पड़ा था।


रात तिनसुकिया रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में काटी थी, मच्छरों की कवितायें सुनते हुए। सुबह सूरज जल्दी निकल आया था - शायद राह दिखाने के लिए। आओ सूरज दद्दा! आओ मेरे गाइड! तुम यहां भी वैसे ही हो। वैसा ही है तुम्हारा ताप। लेकिन इतनी जल्दी? रात को ठीक से सोए नहीं क्या ?


बस के कंडक्टर से जब तेजू का टिकट मांगा तो वह ऐसे देखने लगा मानो मैं किसी अन्य ग्रह-उपग्रह से आया हूं - एलियन।` तेजू का टिकट तु फिफ्तीन अक्तूबर के बाद मिलेगा।´ तब तक मैं? कहां? छोटी - छोटी मिचमिची आंखों वाले कंडक्टर को मेरी `मूर्खता´ शायद पसंद आई। वह गंभीर हो गया । बोला - अभी नामसाई का तिकत लो उसके बाद का रस्ता हाम बता देगा। बाद का रस्ता? यह कैसा रहस्यमय रास्ता है भाई!


नामसाई यानी पानी , बालू और बारिश। नामसाई में प्रवेश से पहले नोवादिहिंग या दिबांग को पार करना पड़ता है। मानो स्वर्ग में प्रवेश से पहले वैतरणी। यह वही बड़ी नदी है ! नोवादिहिंग बारिश के मौसम में मजे की खुराक ले कर मस्ता गई है। उसका हहराता बहाव डराता कम है , बांधता ज्यादा है। क्या ऐसे ही दृश्यों के लिए बांग्ला में ` भीषण शुन्दर ´ उपमान गढ़ा गया है ? वह अपने प्रवाह में सब कुछ बहाये चली जा रही है- मिट्टी , वनस्पतियां , जीव- जंतु। बस उसकी धार को संभल- संभल कर चीरते हुए चल रही है हमारी फेरी। मानव की बनाई एक नौका मशीन की ताकत के सहारे प्रचंड प्रकृति की प्रवाहमान पटिट्का पर अपने हस्ताक्षर कर रही है।

नामसाई के आगे दूसरी बस से जाना है चौखाम तक। बारिश हो रही धीरे-धीरे ।यहां आप बारिश को सुन सकते हैं। उसके बरसने की लय के साथ बदलती जाती हैं आवाजें। सत्यजित दा की `पथेर पंचाली´ का बारिश वाला दृश्य ! उससे भी थोड़ा और आगे , थोड़ा और सूक्ष्म । `वृष्टि पड़े टापुर- टुपुर ´ । बारिश बाधा नहीं है यहां । जीवन चलता रहता है अविराम । यह एक नया संसार है , छोटी -सी जगह । मैं भी तो ऐसी ही छोटी जगह से आया हूं , पर जाना कहां है?


`लाइफ मैटर्स लाइक दिस
इन स्माल टाउन्स बाइ द रिवर
वी आल वान्ट टु वाक विद द गाड्स।´

चौखाम से दिगारू तक छोटी नाव में जाना है । यात्री कुल पांच हैं और नाविक सात । बड़े- बडे रस्सों और लग्गी के सहारे हमारी नाव आगे बढ़ रही है मानव की ताकत और तरकीब के बूते । हर तरफ पानी , पानी और पानी । जहां पानी नहीं वहां बालू है और जहां न पानी न बालू वहां पेड़ - हरे और ऊंचे । मल्लाह सचेत करते हैं यह दिगारू बाबा का `मेन करेन्ट´ है - सावधान !


`बोल दिगारू बबा की जय ´ और मेन करेन्ट पार । अगर पार न हो पाते तो ? सुना है लगभग हर साल बह जाती हैं कुछ नावें , हर साल `उस पार ´ की अनंत यात्रा पर चले जाते हैं कुछ यात्री कुछ मल्लाह । नदी नहीं नद है दिगारू , ब्रह्मपुत्र की तरह । तभी तो मल्लाह दिगारू बाबा की जय बोलते हैं दिगारू माता की नहीं । दिगारू `नदी´ का भी नाम है और जगह का भी । दिगारू को तीन तरफ से काट रहा है दिगारू का प्रवाह । यहां एक छोटी -सी बस्ती है और छोटा -सा प्राइमरी स्कूल । अपना प्यारा तिरंगा लहरा है वहां । आज पन्द्रह अगस्त है -आजादी का दिन , आजादी की सालगिरह।


यहां से अब कहां ? यह खड़खड़िया बस तेजू तक ले जाएगी । बात बस इतनी है कि पगली नदी में ज्यादा पानी न हो नही तो हाथी पर सवार होकर नदी पार करनी पड़ेगी । `सुबे तु जब हाम आया था तब थोरा पानी था।´ बस चालक अपनी वीरता का बखान कर रहा है कि कैसे उसने सुबे थोरे पानी में `बरी´ बस को निकाल लिया था , बिना किसी नुकसान के।


पगली नदी तेरा नाम क्या है? सहयात्रियों से पूछने पर सब हंसते हैं।कहते हैं पगली नदी है यह। ऊपर पहाड़ों पर जब बारिश होती है तो इसमें उफान आ जाता है अचानक। कभी इस पर पुल भी बना था जिसे यह एक दिन अपने पागलपन में बहा ले गई। वह देखो पुल का टूटा हिस्सा- पागलपन के इतिहास का प्रमाण , बंधन से मुक्ति का स्मारक। पहाड़ अब करीब आ रहे हैं। जंगल का घनापन घट रहा है। दिखने लगी हैं छोटी - छोटी बसासतें। शायद करीब आ रहा है तेजू- धुर पूरबी अरूणाचल प्रदेश के लोहित जिले का मुख्यालय , मेरा नया निवास स्थल। सड़क अब सड़क जैसी लग रही है। नहीं तो इससे पहले जगह-जगह पानी और बालू मे खड़े-गड़े सीमा सड़क संगठन के बोर्ड ही बताते थे कि यहां एक सड़क है ( या सड़क थी ) - नेशनल हाई वे।


`सड़क के हर कदम पर अंकित हैं
कई- कई तरह के निशान
मैं फिर देखती हूं नदी को ।
पेड़ की टहनियों को मरोड़ती हुई हवा

धंसा देती है मुझे स्मृतियों के जंगल में।´


अपनी बस अब तेजू में दाखिल हो रही है। सबसे पहले सेना का ब्रिगेड मुख्यालय ,फिर कालेज, केन्द्रीय विद्यालय, इण्डेन गैस गोदाम ,जिला अस्पताल और यह बाजार। बस रूक गई है, सवारियां उतर रही हैं । सबसे आखीर मैं उतरता हूं ,अपनी अटैची और बैग के साथ । सामने चौराहा है - चार रास्ते । बाद में पता चला कि चौराहे को यहां `चाराली´ कहते हैं- चार रास्ते । मैं अपने आप से प्रश्न करता हूं- ` तुम्हें किस रास्ते पर जाना है डाक्साब?´ इससे पहले कि जवाब आए अरे वह देखो आ गई बारिश । और मैं भीग रहा हूं नए जगह की नई बारिश में नए रास्ते को खोजता हुआ।


( इस सफरनामे में शामिल किए गए कवितांश/ कविता ममांग दाई के संग्रह `रिवर पोएम्स´ से साभार ली गई हैं । वह पत्रकारिता ,आकाशवाणी और दूरदर्शन ईटानगर से जुड़ी रही हैं । उन्होंने कुछ समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी भी की , बाद में छोड़ दी । अब स्वतंत्र लेखन । उन्हें `अरूणाचल प्रदेश : द हिडेन लैण्ड´ पुस्तक पर पहला `वेरियर एलविन अवार्ड ` मिल चुका है। ममांग दाई की कविताओं के और अनुवाद जल्द ही `कबाड़खाना´ में आप देखेंगे )

Thursday, November 8, 2007

कहाँ हो राजेश जो






कलकत्ता: ३०० साल

शहर बसाते वक़्त
यह नहीं सोचा गया
कि बेचैन पीढियां
जन्म लेंगी यहाँ

शर बसते वक़्त
यह भी नहीं सोचा गया
कि बच्चे हो जायेंगे
बुतशिकन ...

मिस्त्रियों को


यह मालूम नहीं था
कि एक नस्ल का
पेट चीरा जाएगा

दो सौ अस्सी साल बाद

अब युवाओं से
किसी को ख़तरा नहीं है
किशोर कक्षाओं में जाते हैं
और शासक कहते हैं :
यह एक मरता हुआ शहर है।


(कविता के बाद दो वाक्य। यह कविता बी बी सी की हिन्दी सेवा में कार्यरत हमारे अंतर्राष्ट्रीय कबाड़ी पत्रकार मित्र राजेश जोशी की लिखी हुई है। कब या कहाँ मैं नहीं जानता। पर जल्दी जल्दी पीले पड़ते चार खस्ताहाल कागजों में मैनुअल टाइपराइटर से थेची हुई हुई राजेश जो की तीन कवितायें मेरे पास अब भी महफूज़ रखी हुई हैं। कहीं भेजने छपाने के इरादे से इन्हें मैं कई बरस पहले उसके ग्रीनपार्क वाले घर से माँग लाया था। अब जाके अपनी दुकान खोली तो उस इरादे को बाकायदे अमली जामा पहना रहा हूँ। लेकिन मेरी पुकार अब भी वही है जो कई बरस पहले थी : कहाँ हो राजेश जो? हो कहाँ?" राजेश जोशी से इस पर्सनल रिक्वेस्ट के साथ कि कम लिखे को जादै समझना।)

Wednesday, November 7, 2007

स्टारी नाईट




महान कलाकार विंसेंट वान गौग को प्यार करने वालों के लिए पेश है Don McLean का गाया गीत 'स्टारी नाईट'। जाहिर है यह गीत विंसेंट की मशहूर श्रृंखला 'स्टारी नाईट' से प्रेरित है। लेकिन इस के बोल महान विंसेंट के संघर्ष भरे जीवन को रेकोर्ड करते हुए आधुनिक कला-संसार को लेकर कुछ बुनियादी सवाल भी उठाते हैं।





गीत के बोल हैं:

Starry, starry night.
Paint your palette blue and grey,
Look out on a summer's day,
With eyes that know the darkness in my soul.

Shadows on the hills,
Sketch the trees and the daffodils,
Catch the breeze and the winter chills,
In colors on the snowy linen land.

Now I understand what you tried to say to me,
How you suffered for your sanity,
How you tried to set them free.
They would not listen, they did not know how.
Perhaps they'll listen now.

Starry, starry night।

Flaming flowers that brightly blaze,
Swirling clouds in violet haze,
Reflect in Vincent's eyes of china blue.
Colors changing hue, morning field of amber grain,
Weathered faces lined in pain,
Are soothed beneath the artist's loving hand.

Now I understand what you tried to say to me,
How you suffered for your sanity,
How you tried to set them free.
They would not listen, they did not know how.
Perhaps they'll listen now.
For they could not love you,
But still your love was true.
And when no hope was left in sight
On that starry, starry night,
You took your life, as lovers often do.
But I could have told you, Vincent,
This world was never meant for one
As beautiful as you.

Starry, starry night।

Portraits hung in empty halls,
Frameless head on nameless walls,
With eyes that watch the world and can't forget.
Like the strangers that you've met,
The ragged men in the ragged clothes,
The silver thorn of bloody rose,
Lie crushed and broken on the virgin snow.
Now I think I know what you tried to say to me,
How you suffered for your sanity,
How you tried to set them free.
They would not listen, they're not listening still.

Perhaps they never will...

(यह पोस्ट बिना इरफान के सहयोग से नहीं बन सकती थी।)

Tuesday, November 6, 2007

मट्टी : खाक मट्टी




क्या आप भइया जी को जानते हैं ? बब्बू भइया को ?

मैं जानता हूं। वैसे मुझसे ज्यादा मेरा बेटा उन्हें जानता है क्योंकि वह उसके भइया जी हुआ करते थे । भइया जी यानी रिक्शावाला ।

मेरे कस्बे में ज्यादातर बच्चे रिक्शे पर स्कूल जाते हैं। एक रिक्शे पर दस-बारह बच्चे । कुछ शान्त कुछ शरारत करते। रिक्शे की चौड़ाई से एक-डेढ़ फुट बाहर निकला पटरा , पटरे के किनारे पर लटके बस्ते , पानी की बोतलें और उचक -उचक कर पैडल मारता एक आदमी । यह एक आम दृश्य है ,कस्बे के भूगोल,इतिहास और नागरिक शास्त्र का एक जरूरी हिस्सा।

बच्चों की शब्दावली में रिक्शेवालों के लिए एक परम्परागत सम्बोधन है-भइया जी ।अगर ढ़ेर सारे भइया जी लोगों के बीच अपने वाले भइया जी को कोई नाम देना पड़े तो सूरज भइया जी,तसव्वर भइया जी, भूरे भइया जी जैसे नाम चलते हैं। इन्हीं में से एक हैं बब्बू भइया जी। उन्हें उचक -उचक कर पैडल मारते देखने के लिए उचकना नहीं पड़ेगा ।

बब्बू भइया जी कोई चालीस - पैंतालिस के लपेटे में हैं । कुरता- पाजामा पहनते हैं , कभी - कभी पैंट - कमीज भी । कद औसत से थोड़ा अधिक है। खिचड़ी बाल -खिचड़ी दाढ़ी । और कुछ ज्यादा तो नहीं है बब्बू भइया के बारे में बताने को।

मेरा बेटा कक्षा एक में पढ़ता है। उसके शब्दों में कहें तो क्लास फर्स्ट बी में । उसे नाइन तक का टेबल याद है। वह डिक्टेशन में स्पेलिंग की गलतियां बहुत कम करता है । उसे पनिशमेंट कभी कभार ही मिलती है । ही इज अ गुड बॉय।

आज से दो बरस पहले की बात है । बेटे की छुट्टी एक बजे होती थी और एक बीस - एक पच्चीस तक वह घर आ जाया करता था । एक दिन काफी देर हुई तो हमें चिन्ता हुई । कई तरह की आशंकायें । मैं अपना स्कूटर निकाल ही रहा था कि गली में रिक्शा धड़धड़ाते भइया जी प्रकट हुए । रिक्शे पर बैठे बेटे को सही- सलामत देखकर जान में जान आई । अंदर गुस्सा भी था । गुस्सा प्रकट हुआ -

मैं - इतनी देर कैसे हुई ?
वह -साब छुट्टी के टैम मैने अपने लड़के को भेजा तो स्कूल वालों ने उसके साथ तुम्हारे लड़के को ना भेजा । कैन लगे अनजान आदमी के संग ना भेजेंगे । बात भी ठीक है साब ! बखत भौत खराब है ।
मैं - फिर ?
वह- फिर क्या ! लड़के ने घर आन के जे बात बताई तो मैं भाज के गया ।
मै - बात क्या थी भइया जी ? तुम क्यों नहीं गए पहले ? इस तरह तो कभी नहीं किया तुमने।

वह - क्या बताएं । आज दुपैर में मेरी लड़की खतम हो गई। दस - ग्यारह साल की थी । मैं उसके कफन - दफन के इंतजाम में लगा था इस मारे लड़के को भेजा था । जब स्कूल वालों ने मना कर दिया तो मैं खुद भाज के गया । क्या है साब ! मेरी लड़की तो खतम हो गई मगर औरों के बच्चे तो टैम से घर आने चइएं । बच्चे हैं भूख लग जाती होगी । मट्टी तो मट्टी है साब ! उसके लिए क्या टैम - क्या देर । चलता हूं । मट्टी घर में पड़ी है ।

क्या आप भइया जी को जानते हैं ? बब्बू भइया को?

भारतेन्दु : उड़ा दूंगा `रसा´ मैं धज्जियां दामाने सहरा की




भारतेन्दु ने अपने छोटे से जीवन काल में गद्य और पद्य में इतना लिखा है कि आज के धांसू और धुरंधर लिक्खाड़ भी चीं बोल जाएं । उनके साहित्य की छवियां रंगबिरंगी हैं जो परम्परा का हिस्सा होते हुए भी परम्परा का अतिक्रमण करती दिखाई देती हैं । हिन्दी साहित्य को उनका योगदान तो जग जाहिर है । इस सिलसिले में बड़े-बड़े विद्वान बड़ी -बड़ी किताबें और लम्बे-लम्बे लेख लिख गये हैं । भारतेन्दु ने संस्कृत में भी काव्य रचना की है । उर्दू में तो वे `रसा´ थे ही ।उनके कुछ काव्य संग्रहों का मंगलाचरण संस्कृत में है । कुछ कवितायें/कविताओं के हिस्से संस्कृत में हैं। लीजिए भारतेन्दु रचित संस्कृत काव्य का नमूना पेश है -

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।

स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थी लभते गतिं ।।

एक कालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत।

भव पाश विनिर्मुक्त: अंग्रेज लोकं संगच्छति ।।


( `अंग्रेज स्तोत्र ´ से )

( अर्थात इससे विद्यार्थी को विद्या , धन चाहने वाले को धन , स्टार-खिताब-पदवी चाहने वाले को स्टार और मोक्ष की कामना करने वाले को परमगति की प्राप्ति होती है । जो प्राणी रोजाना ,नियम से , तीनो समय इसका- (अंग्रेज - स्तोत्र का) पाठ करता है वह अंग्रेज लोक को गमन करने का पुण्य लाभ अर्जित करने का अधिकारी होता है । )


निन्दतो बहुभिलोकैमुखस्वासपरागमुखै: ।

बल:हीना क्रियाहीनो मूत्रकृतलुण्ठतेक्षितौ ।।

पीत्वा पीत्वा पुन: पीत्वा यावल्लुंठतिभूतले ।

उत्थाय च पुन: पीत्वा नरोमुक्तिमवाप्नुयात् ।।

( `अथ मदिरास्तवराज ´ से )

( अर्थात भले ही कुछ लोग इसकी - मदिरा की - निन्दा करते हों किन्तु बहुतों के मुख से निकलने वाली सांस को यह सुवासित करने का कार्य करती है । यह अलग बात है कि यह बल और क्रिया से हीन कर मूत्र से सिंचित धरा पर क्यों न धराशायी कर दे फिर भी मदिरा का सेवनकर्ता पीता है , पीता है , बार -बार पीता है और तब तक पीता है ,जब तक कि धरती माता का चुम्बन न करने लगे । वह फिर उठता है ,फिर पीता है और तब तक पीता जाता है जब तक कि उसकी नर देह को मुक्ति नहीं मिल जाती ।)

( पोस्ट जारी)

Sunday, November 4, 2007

रू-ब-रू: मोमिन खां `मोमिन´ और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र `रसा´




मोमिन खां `मोमिन´(1801-1852) का नाम आते ही मिर्जा गालिब की याद आती है। साहित्य की दुनिया में यह किंवदंती मशहूर है कि गालिब ने मोमिन के केवल एक शेर के बदले अपना सारा दीवान देने की पेशकश की थी । `मोमिन´ का व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है । वे आला दरजे के हकीम थे साथ ही संगीत,ज्योतिष और शतरंज के महारथी भी । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885) के जमाने में हिन्दी `नई चाल में ढ़ली`। वे कवि,कथाकार , निबंधकार, नाटककार ,इतिहासकार, होने के साथ अपने समय के प्रसिद्ध पत्रकार और अभिनेता भी थे। उर्दू में उन्होने `रसा´ नाम से शायरी की है । मोमिन और भारतेन्दु उर्दू- हिन्दी के आरंभिक निर्माताओं में से हैं। यहां दोनो के साहित्य से एक-एक नमूना पेश है । गौर कीजिए खास क्या है !

वो जो हममें तुममें करार था तुम्हें याद हो कि न याद हो ।
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


वो नए गिले वो शिकायतें वो मजे मजे की हिकायतें
वो हरेक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो


कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयान से पहले ही रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


सुनो जिक्र है कई साल का कोई वादा मुझसे था आपका
वो निबाहने का जिक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


कभी हममें तुममें भी चाह थी कभी हमसे तुमसे भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफा
मैं वही हूं मोमिन-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


अब देखिए भारतेंदु जी कैसे इसी मीटर का प्रयोग करते हैं:

वह अपनी नाथ दयालुता तुम्हें याद हो कि न याद हो ।
वह जो कौल भक्तों से था किया तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


व जो गीध था गनिका व थी व जो व्याध था व मलाह था
इन्हें तुमने ऊंचों की गति दिया तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


जिन बानरों में न रूप था न तो गुन हि था न तो जात थी
उन्हें भाइयो का सा मानना तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


खाना भील के वे जूठे फल, कहीं साग दास के घर पै चल
यूँही लाख किस्से कहूं मैं क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


कहो गोपियों से कहा था क्या, करो याद गीता की भी जरा
वानी वादा भक्त - उधार का तुम्हें याद हो कि न याद हो ।


या तुम्हारा ही `हरिचंद´ है गो फसाद में जग के बंद है
है दास जन्मों का आपका तुम्हें याद हो कि न याद हो ।।



( पोस्ट जारी)

Saturday, November 3, 2007

आओ जी आओ । स्वागत है नए कबाड़ी शैलेन्द्र जोशी का



क्या ही `खुसी` की बात है कि आज कबाड़खाने में शैलेन्द्र जोशी दाखिल हुए हैं।शैलेन्द्र का स्वागत करते हुए यह पक्की उम्मीद है कि वे उम्दा कबाड़ से इसमें इजाफा करेंगे। प्रतिभाशाली कवि और अनुवादक शैलेन्द्र उत्तराखंड के सुदूर गाँव पतलोट के जीआईसी में अध्यापक हैं। ` पहल´ के 76 वें अंक में 'दागेस्तान का रसूल' शीर्षक उनकी रचना प्रकाशित हुई थी। रसूल हम्ज़ातोव की मृत्यु के बाद छापे इस लेख पर टिप्पणी छापते हुए संपादक ज्ञानरंजन यानि ज्ञान दादा ने लिखा था- "टिप्पणी और कवितायें शैलेन्द्र जोशी ने हल्द्वानी से भेजी हैं। वे अंग्रेजी में एम0ए0 करने के बाद आगे की पढ़ाई कर रहे हैं। 1980 में उनका जन्म हुआ यानी अभी वे 24 के भी पूरे नहीं हुए हैं।" नई जानकारी यह है कि शैलेन्द्र जोशी आजकल खूब लिख-पढ़ रहे हैं। `लोकमत´ के नये सालाना अंक में भारतीय युवा पर उनका एक महत्वपूर्ण लेख आ रहा है । शैलेन्द्र स्वागत हियां भी कुछ लिखो प्यारे कबाड़खाना इंतजार में है तुम्हारे।

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