Friday, September 11, 2009

जोगिया मेरे घर आए


उस्ताद अमीर ख़ान साहब की गायकी को लेकर इधर कबाड़ख़ाने में भाई सुशोभित सक्तावत ने एक बेहतरीन पोस्ट लगाई थी. तभी से इच्छा थी कि मंगलेश डबराल जी की उस्ताद पर लिखी कविता यहां लगाता.

पढ़िये यह कविता और करीब दो मिनट की उस्ताद की बन्दिश - 'जोगिया मेरे घर आए'

अमीर खां

मंगलेश डबराल

तुम खोजते रहे रहने के लिए एक घर
गाने के लिए एक घराना
तुम खोजते रहे दोस्तों की बैठकों में
किसी स्त्री के चेहरे पर
अपने ही जैसे लापरवाह शिष्यों की आवाज में
विकल करती हुई उन बंदिशों में
जिन्हें तुम एक निराकार शांति के साथ प्रस्तुत करते थे
आरोह-अवरोह के आकाश –पाताल के बीच
संगीत के मेरूखंड में तुम कहीं एक कोना ढूंढ़ते रहे
तुम बनाते रहे एक असंभव घर
सरगमों और छूट की तानों में
खिड़कियों दरवाजों के लिए खाली जगहें छोड़ते हुए
इतनी दूर से तुम सहज ही सम पर लौट आते थे
जैसे कोई लौटता है अपने घर
जहां बहुत दूर की चीजें भी बहुत पास रखी हुई होती हैं।

तुम गाते थे एक चट्टान की सिहरन
पेड़ों का रूदन, बादलों की हंसी
वियोग की तरह फैली हुई रात में उड़ता अकेलापन
तुम बार-बार मनाते रहे किसी रूठे हुए प्रेम को
देह को आत्मा और आत्मा को
देह की पुकार से भरते हुए
लेकिन कला में हम जितना बनाते-बनाते जाते हैं
उतना वह ढहता-ढहता जाता है
ऊपर उठते हुए ऊंचाइयां और ऊंची हो उठती हैं
नीचे उतरते हुए गहराइयां और गहरी

संगीत तुम्हारा एकमात्र काम था
हालांकि तुम्हें दे दिए गए थे दूसरे कई काम
जो संगीत के साथ थे बेसुर-बेताल
तुम्हें हिसाब रखना नहीं आया पैसे पता नहीं कहां खोते रहे
महान अमूर्तनों का समय खत्म हुआ आया व्यापार का युग
पाश् र्व में सुनाई देते रहे विवादी स्वर
समझ में न आने वाला गायन आवाज की सीमाएं
हिंदू संगीत मुस्लिम संगीत
घर घराना परंपरा कहीं की ईंट कहीं रोड़ा
लेकिन तुम गाते रहे बागेश्री पूरिया चंद्रकौंस
जगसम्मोहिनी अहीर भैरव कोमल ऋषभ आसावरी
और उत्तर दक्षिण हिंदी फारसी ईश्वर अल्लाह सबको एक करती
ज्ञान और गुण मांगती हंसध्वनि
इत्तिहादे मियाने मनो तो नेस्त मियाने मनो तो ...

कठिन था घर और घराने का बनना
कठिन था संगीत का गुरुत्व थामे रहना
अंत में तुम जीवित रहे अपनी उदारता औऱ विनम्रता के किस्सों में
घरेलू महफिलों और रेडियो स्टेशनों में दर्ज धुंधली पड़ती आवाज में
तुम जीवित रहे उन संस्मरणों में
कि किसने तुम्हें आखिरी बार कहां कब क्या गाते सुना था
और हर बार तुम्हें एक परीक्षा से गुजरना पड़ा
तुम्हारा जीवन संघर्ष अपने ही संगीत से था
अपनी ही आवाज से
और १९७४ में जब कलकत्ते के पास
एक कार दुर्घटना में तुम्हारी आकस्मिक मृत्यु हुई
तुम एक दोस्त के विवाह में अपना आखिरी राग सुनाकर
लौट रहे थे अपने असंभव घर और घराने की ओर।

(इत्तिहादे मियाने मनो तो नेस्त मियाने मनो तो... - अमीर खुसरो की फ़ारसी रचना जिसका अर्थ है –तुम और मैं इस तरह एक हैं कि तुम्हारे और मेरे बीच कोई बीच नहीं है। )

Amir Khan - Jogiya Mere Ghar Aaye
Found at bee mp3 search engine

4 comments:

शायदा said...

kamal hi kiya na aakhir.
ye असंभव घर और घराने ka masla aisa hi kyon hota hai?

संजय तिवारी said...

लेखनी प्रभावित करती है.

पारुल "पुखराज" said...

"संगीत तुम्हारा एकमात्र काम था
हालांकि तुम्हें दे दिए गए थे दूसरे कई काम
जो संगीत के साथ थे बेसुर-बेताल
तुम्हें हिसाब रखना नहीं आया पैसे पता नहीं कहां खोते रहे"

.............
कैसी कैसी मजबूरी
लोग निभाते हैं फिर भी गाते हैं
उनका धर्म होता है संगीत
वे रोते हुए भी गाते हैं
ना चाहते हुए भी गुनगुनाते हैं
सोते हुए , ताल चलती है उनके पोरों पर ...
रगों में समाई धुनें कभी ठहरती नहीं
बहती रहती हैं .....

मंगलेश जी की कविता पूरी जीवनी है ...टिप्पणी लम्बी हो गयी शायद ..धुन में कुछ कुछ लिख गयी हूँ

दीपा पाठक said...

बहुत सुंदर कविता और कमाल की बंदिश। बढ़िया पोस्ट।