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Friday, October 12, 2007

उमेश डोभाल की एक कविता

सरपट भागते घोड़े की तरह नहीं
अलकनंदा के बहाव की तरह
धीरे धीरे आयेगा बसंत
बसंत की पूर्व सूचना दे रहे हैं

मिट्टी पानी और हवा से ताकत लेकर
तने से होता हुआ
शाखाओं में पहुंचेगा बसंत

अंधेरे में जहां आंख नहीं पहुंचती
लड़ी जा रही है एक लड़ाई
खामोश हलचलें
अंदर ही अंदर जमीन तैयार कर रही हैं
जागो! बसंत दस्तक दे रहा है