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Thursday, September 25, 2014

कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक, रहस्य साक्षात्


मुक्तिबोध की पचासवीं पुण्यतिथि पर बीबीसी के लिए यह शानदार प्रस्तुति हमारे कबाड़ी पत्रकार राजेश जोशी ने तैयार की थी. आज एक एक्सक्लूसिव कबाड़ -

Thursday, December 8, 2011

दिल में तड़पता है अँधेरे का अन्दाज़

मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में '  में ने  कितने - कितने समय से कितना - कितना कोलाहल मचा रक्खा है।  हिन्दी कविइता पढ़ने - लिखने वालों की जमात में  यह  अपनी उपस्थिति निरन्तर बनाए हुए है। उप्फ ..अंधेरा है कि  कम नहीं होता है। वह बार - बार  आता है नए - नए रूप धरकर ।

(गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में ' का एक अंश)

सूनी है राह, अजीब है फैलाव

कमज़ोर घुटनों को बार-बार मसल,

लड़खड़ाता हुआ मैं
उठता हूँ दरवाज़ा खोलने,
चेहरे के रक्त-हीन विचित्र शून्य को गहरे
पोंछता हूँ हाथ से,
अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर
बढ़ता हूँ आगे,
पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,
हाथों से महसूस करता हूँ दुनिया,
मस्तक अनुभव करता है, आकाश
दिल में तड़पता है अँधेरे का अन्दाज़,
आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगतीं,
केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी।
आत्मा में, भीषण
सत्-चित्-वेदना जल उठी, दहकी।
विचार हो गए विचरण-सहचर।
बढ़ता हूँ आगे,
चलता हूँ सँभल-सँभलकर,
द्वार टटोलता,
ज़ंग खायी, जमी हुई जबरन
सिटकनी हिलाकर
ज़ोर लगा, दरवाज़ा खोलता
झाँकता हूँ बाहर....
सूनी है राह, अजीब है फैलाव,
सर्द अँधेरा।
ढीली आँखों से देखते हैं विश्व
उदास तारे।
हर बार सोच और हर बार अफ़सोस
हर बार फ़िक्र
के कारण बढे हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ
अँधियारा पीपल देता है पहरा।
हवाओं की निःसंग लहरों में काँपती
कुत्तों की दूर-दूर अलग-अलग आवाज़,
टकराती रहती सियारों की ध्वनियों से।
काँपती हैं दूरियाँ, गूँजते हैं फ़ासले
(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर)

Sunday, January 9, 2011

मैं तुम लोगों से दूर हूँ

मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ
तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है
कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है |

मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है,
अकेले में साहचर्य का हाथ है,
उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं
किन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिम्बित हैं, पुरस्कृत हैं
इसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है!!
सबके सामने और अकेले में |
(मेरे रक्त-भरे महाकाव्यों के पन्ने उड़ते हैं
तुम्हारे-हमारे इस सारे झमेले में)

असफलता का धूल-कचरा ओढ़े हूँ
इसलिए कि वह चक्करदार ज़ीनों पर मिलती है
छल-छद्म धन की
किन्तु मैं सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँ
जीवन की |
फिर भी, मैं अपनी सार्थकता में खिन्न हूँ
विष से अप्रसन्न हूँ
इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए
वह मेहतर मैं हो नहीं पाता
पर, रोज़ कोई भीतर चिल्लाता है
कि कोई काम बुरा नहीं
बशर्ते कि आदमी खरा हो
फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता |

रिफ्रिज़रेटरों, विटैमिनों, रेडियोग्रैमों के बाहर की
गतियों की दुनिया में
मेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों में
पेटों की आँतों में न्यूनों की पीड़ा है
छाती के कोषों में रहितों की ब्रीड़ा है

शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है
शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है
सत्य केवल एक है जो कि
दु:खों का क्रम है |

मैं कनफटा हूँ हेठा हूँ
शेव्रलेट- डॉज़ के नीचे मैं लेटा हूँ
तेलिया-लिबास में, पुरज़े सुधारता हूँ
तुम्हारी आज्ञाएँ ढोता हूँ |

गजानन माधव मुक्तिबोध

Sunday, December 19, 2010

शून्य

यह जरूर है, कभी कभी ऐसा महसूस होता है कि पेड़ों के जंगल में अकेले पेड़ का अस्तित्व खो जाता है; लेकिन तब उस जंगल का व्यक्तित्व इतना सजीव चित्रित होता है कि व्यक्ति की सजीवता उसपर ईर्ष्या करे | मुक्तिबोध की शक्तिशाली मानवतावादी रोमानियत में अमूर्त का सविस्तार मूर्तीकरण, समाजवाद के धरातल पर प्रतिष्ठित किये जाने के कारण एक ऐसी प्रखर स्पष्टता धारण कर लेता है जिसमें भयानक से भयानक, विद्रूप से विद्रूप (और कोमल से कोमल भी), फैण्टेसी को हम मानो अपनी सांस में महसूस कर सकते हैं | 
- शमशेरबहादुर सिंह 





शून्य 

भीतर जो शून्य है 
उसका एक जबड़ा है,
जबड़े में मांस काट खाने के दांत हैं;
उनको खा जायेंगे,
तुमको खा जायेंगे |
भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह 
हमारा स्वभाव है,
जबड़े की भीतरी अँधेरी खाई में 
खून का तलाब है |
ऐसा वह शून्य है 
एकदम काला है, बर्बर है, नग्न है 
विहीन है, न्यून है,
अपने में मग्न है |
उसको मैं उत्तेजित 
शब्दों और कार्यों से 
बिखेरता रहता हूँ 
बाँटता फिरता हूँ |
मेरा जो रास्ता काटने आते हैं,
मुझसे मिले घावों में 
वही शून्य पाते हैं |
उसे बढाते हैं, फैलाते हैं,
और-और लोगों में बाँटते बिखेरते,
शून्यों की सन्तानें उभारते |
बहुत टिकाऊ है,
शून्य उपजाऊ है |
जगह-जगह करवत, कटार, और दर्रात,
उगाता बढाता है 
मांस काट खाने के दाँत |
इसीलिए जहाँ देखो वहाँ 
खूब मच रही है, खूब ठन रही है,
मौत अब नये नये बच्चे जन रही है |
जगह-जगह दाँतदार भूल,
हथियार-बन्द ग़लती है,
जिन्हें देख, दुनिया हाथ मलती हुई चलती है |

गजानन माधव मुक्तिबोध 

Wednesday, March 4, 2009

गेरुआ मौसम उड़ते हैं अंगार

कल सुबह से बहुत खिन्न रहा. अनिल यादव की पोस्ट से तबाह भी रहा. जिस काम को हाथ लगाया वह गटरुद्दीन अली का घूरा बन गया. आख़िरकार बहुत देर रात, तमाम ज़रूरी, ग़ैरज़रूरी करतूतों के बाद बाबा गजानन की किताब थामी. 'अंधेरे में' को एक बार और आद्योपान्त पढ़ा. अब सुबह उम्दा लग रही है, निगाह थोड़ा ज़्यादा साफ़ ...



'अंधेरे में' से एक अंश : गजानन माधव मुक्तिबोध

... सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं
उनके ख़याल से यह सब गप है
मात्र किंवदन्ती.
रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग
नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे.
प्रश्न की उथली-सी पहचान
राह से अनजान
वाक् रुदन्ती.
चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई.

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये
समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल.
गढ़े जाते संवाद,
गढ़ी जाती समीक्षा,
गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूर.
बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,
किराये के विचारों का उद्भास.
बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं.
नपुंसक श्रद्धा
सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी,
कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी.
धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार
द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,
एक स्पिलट सेकेण्ड में शत साक्षात्कार.
टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने.
रक्त में बहती हैं शान की किरनें
विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गयी,
कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी.

राह के पत्थर-ढोकों के अन्दर
पहाड़ों के झरने
तड़पने लग गये.
मिट्टी के लोंदे के भीतर
भक्ति की अग्नि का उद्रेक
भड़कने लग गया.
धूल के कण में
अनहद नाद का कम्पन
ख़तरनाक !!
मकानों के छत से
गाडर कूद पड़े धम से.
घूम उठे खम्भे
भयानक वेग से चल पड़े हवा में.
दादा का सोंटा भी करता दाँव-पेंच
नाचता है हवा में
गगन में नाच रही कक्का की लाठी.
यहाँ तक कि बच्चे की पेंपें भी उड़तीं,
तेज़ी से लहराती घूमती हैं हवा में
सलेट पट्टी.
एक-एक वस्तु या एक-एक प्राणाग्नि-बम है,
ये परमास्त्र हैं, प्रक्षेपास्त्र हैं, यम हैं.
शून्याकाश में से होते हुए वे
अरे, अरि पर ही टूट पड़े अनिवार.
यह कथा नहीं है, यह सब सच है, भई !!
कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी !!

किसी एक बलवान् तन-श्याम लुहार ने बनाया
कण्डों का वर्तुल ज्वलन्त मण्डल.
स्वर्णिम कमलों की पाँखुरी-जैसी ही
ज्वालाएँ उठती हैं उससे,
और उस गोल-गोल ज्वलन्त रेखा में रक्खा
लोहे का चक्का
चिनगियाँ स्वर्णिम नीली व लाल
फूलों-सी खिलतीं।कुछ बलवान् जन साँवले मुख के
चढ़ा रहे लकड़ी के चक्के पर जबरन
लाल-लाल लोहे की गोल-गोल पट्टी
घन मार घन मार,
उसी प्रकार अब
आत्मा के चक्के पर चढ़ाया जा रहा
संकल्प शक्ति के लोहे का मज़बूत
ज्वलन्त टायर !!
अब युग बदल गया है वाक़ई,
कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी.

गेरुआ मौसम उड़ते हैं अंगार,
जंगल जल रहे ज़िन्दगी के अब
जिनके कि ज्वलन्त-प्रकाशित भीषण
फूलों में बहतीं वेदना नदियाँ
जिनके कि जल में
सचेत होकर सैकड़ों सदियाँ, ज्वलन्त अपने
बिम्ब फेंकतीं‍‍ !!
वेदना नदियाँ
जिनमें कि डूबे हैं युगानुयुग से
मानो कि आँसू
पिताओं की चिन्ता का उद्विग्न रंग भी,
विवेक-पीड़ा की गहराई बेचैन,
डूबा है जिनमें श्रमिक का सन्ताप.
वह जल पीकर
मेरे युवकों में होता जाता व्यक्तित्वान्तर,
विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर,
मानो कि ज्वाला-पँखरियों से घिरे हुए वे सब
अग्नि के शत-दल-कोष में बैठे !!
द्रुत-वेग बहती हैं शक्तियाँ निश्चयी.
कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी.

...