उदय जी ने अनिल यादव की पोस्ट के जवाब में अपने ब्लॉग पर लिखा. (ध्यान रहे उदय जी ने मेरे ही इसरार पर कबाड़खा़ना जॉइन किया था):
इस बीच कई फोन और एस.एम.एस. आये कि गोरखपुर में अपने भाई नरेंद्र (जिनकी पिछले वर्ष अचानक हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गयी थी, उनके नाम पर सम्मान लेने के एक बिल्कुल पारिवारिक और वैयक्तिक कार्यक्रम को भा.ज.पा. के आडवाणी और हमारे जे.एन.यू. के पुराने दोस्त चंदन मित्रा (जो लंबे अर्से से हिंदुत्ववादी राजनीति के प्रबल समर्थक हैं) के अंग्रेजी अखबार 'Pioneer' के किसी कर्मचारी की पोस्ट एक 'मशहूर' ब्लाग में साया की गयी है और नियोजित तरीके से, मुझ पर आक्रमण करके बदनाम करने की घृणित जातिवादी कोशिश की जा रही है। मैंने अभी २ मिनट पहले ही उस ब्लाग को देखा। वह मेरा पसंदीदा ब्लाग 'कबाडखाना' निकला। दुख और आश्चर्य है। लेकिन इस ब्लाग पर बात करने का समय शायद आ गया है।
दरअसल, इस हिंदू जातिवादी समाज में विचारधाराओं से लेकर राजनीति और साहित्य तक जैसा छ्द्म और चतुर खेल खेला गया है, उसके हम सब शिकार हैं। मेरे परिवार में यह सच है कि कोई भी एक सदस्य ऐसा नहीं है (इनमें मेरी पत्नी, बच्चे, बहू और पोता तक शामिल हैं...और मेरे मित्र तथा पाठक भी) जो किसी एक धर्म, जाति, क्षेत्र, नस्ल आदि से जुड़े़ हों। लेकिन हिंदी साहित्य, मीडिया और अब ब्लागिंग में सक्रिय सवर्ण हिंदू उसी कट्टर वर्णाश्रम-व्यवस्थावादी mindset से प्रभावित पूर्व-आधुनिक, सामंती, अनपढ़ और घटिया लोग हैं जिनके भीतर जैन, बौद्ध, नाथ, सिद्ध, सरहपा, ईसाइयत, दलित, इस्लाम आदि तमाम आस्थाओं और identities के प्रति गहरी घृणा और द्वेष है। इसे वे भरसक ऊपर-ऊपर छिपाए रखने की चतुराई करते रहते हैं। मैंने अपने जीवन भर इनका दंश और ज़हर झेला है और अभी भी झेल रहा हूं। लेकिन इस अपमान और साजिश का शिकार मैं अकेला नहीं, बहुतेरे हैं।
उपर्युक्त ब्लाग में समूची सोची-समझी नीयत के साथ जिस तरह से इस पोस्ट को प्रस्तुत किया गया है, (इसमें माडरेटर एक्टिवेटेड है) वह उनकी ही कलई ही उद्घाटित करता है। इसका सरगना इलाकाई-जातिवादी नेक्सस का वह कुत्सित नाम है, जिसने देश और समाज की सारी नैतिकताओं के धुर्रे बिखेरते हुए अपनी कई हवसों को पूरा किया है। ये एक नहीं, कई हैं। दक्षिण से 'वाम' तक इनकी धर्म-ध्वजा फ़हरा रही है।
गनीमत यही है कि आने वाली नयी पीढी़ और जातिवादी ज़हर से मुक्त नव-आधुनिक युवा इनके चेहरे पहचान रहे हैं।
मैं ज़ल्द ही इन सबके बारे में लिखूंगा। (हालांकि ये इतने ताकतवर हैं और इस व्यवस्था में इनकी पैठ इतनी गहरी है कि हमेशा की तरह जीवन मेरा ही बिगड़ेगा)...शमशेर की वही पंक्ति फिर पेश है, जिसे मैं अक्सर दुहराता हूं :
'ज़माने में तो अपना जब तलक ये जीना होना है,
तुम्हारी चोटें होनी हैं, हमारा सीना होना है !'
हम अपनी रचनाओं, प्रतिभाओं, मेहनत और ईमानदारी से इन घृणित सवर्ण लुटेरों के साम्राज्य को ध्वस्त करेंगे।
अंत में एक शेर और जो किसी ज़माने में अपने युवा दिनों में हम गाते थे :
'हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक बाग नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे !!'
ज़ल्द ही मिलेंगे। (एक खयाल आता है ; 'Right to Information' सिर्फ़ सरकार और सरकारी संस्थाओं पर ही क्यों लागू हो? क्या हम इन गिरोहों से इनकी योग्यताओं के प्रमाणपत्र और इनकी उपलब्धियों के दस्तावेज मांग कर उन्हें सार्वजनिक नहीं कर सकते?
अनिल ने टिप्पणी की:
"आडवाणी और हमारे जे.एन.यू. के पुराने दोस्त चंदन मित्रा (जो लंबे अर्से से हिंदुत्ववादी राजनीति के प्रबल समर्थक हैं) के अंग्रेजी अखबार 'Pioneer' के किसी कर्मचारी" वाह दादा वाह। हमला करने से पहले दूरी बनाने की क्या अदा है आपकी। इस कर्मचारी का आपसे तबसे स्नेहिल परिचय था जब वह, इस अखबार से पहले फ्रीलांसर हुआ करता था।
बहरहाल ठाकुर साहब, दलित चिंतन की लफ्फाजी छोड़िए और कबाड़खाने पर आकर जवाब दीजिए कि क्या योगी को आप किसी भी लेखक को सम्मान देने लायक पाते हैं आप। आपके भाई वहां नौकरी करते थे तब तो और भी अच्छी तरह आप सांसद योगी को जानते रहे होंगे।
कृपया माडरेटर का दुरूपयोग न करें। अगर आपने मेरे बारे लिखा तो मेरा पक्ष भी प्रकाशित होना चाहिए।
और ये रहा उदय जी का जवाब:
अनिल जी, मैं सचमुच आपसे कभी नहीं मिला हूं। मैं आपको ठीक से जानता भी नहीं। कृपया गलत बयानी ना करें। 'कबाड़्खाना' या कट्टर जातिवादियों और धूर्तों का 'पाखाना' कोई ऐसी अनिवार्य जगह नहीं है, जिसमें जाना मेरी मज़बूरी हो। हां, आपने सम्मान की 'रकम' के बारे में अपना कयास लगाया है तो वह बता देता हूं। गोरखपुर से चलने के पहले मेरी भाभी ( स्व.कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह की पत्नी) ने एक सूती कुर्ता और एक सूती पाज़ामा अपने इस खानाबदोश बना डाले गये देवर को दिया था। क्या उसे भी लूटना चाहते हो?
पिछली पोस्ट में मेरी कविता 'उनका उनके पास' की अंतिम पंक्तियां हैं :
'जहां तक मेरा सवाल है तो धन्यवाद
बस मेरे कपडे़-लत्ते ही लौटा दें. तो गनीमत !'
(उम्मीद है यह कविता किसी बदले हुए समय में फिर पढी जाएगी, 'तिब्बत' की तरह। क्षोभ में और गुस्से में कुछ असंगत लिख गया होऊं तो आप सब माफ़ करेंगे। ढेरों शुभकामनाएं।
मैं तबाह हूं!
मेरी बहुत सारी और हवसें बची हुई हैं. टैम ना मिल्लिया सर जीज़. उन्नीस माह से अपनी इकलौती बच्ची को देखने नहीं जा पा रहा क्यूंकि अपने अधमरे बाप की मिजाज़पुर्सी के घृणित कर्म की हवस में लीन हूं. थैंक्यू उदय जी! ये नया विशेषण मुझे और इतनी आजिज़ी से बनाए गए 'जातिवादी और इलाक़ाई' ब्लॉग को बख़्शने के लिए. आपकी महानता का प्रताप इसे बचाए रखेगा उम्मीद है.
आपका अपना
Ashok Pande
(जातिवादी कबाड़ियों का सरग़ना. जो बकौल आपके,उदय जी, इलाकाई-जातिवादी नेक्सस का वह कुत्सित नाम है, जिसने देश और समाज की सारी नैतिकताओं के धुर्रे बिखेरते हुए अपनी कई हवसों को पूरा किया है।)
आन दो! आन दओ!
होर वेखी जा - छेड़ी ना!
आपकी महानता को नमन!