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Tuesday, February 8, 2011

चित्रों में झांकता जैसलमेर

"घोड़ा कीजे काठ का, पिंड कीजे पाषाण
बख्तर कीजे लोह का, तब देखो जैसाण."
जो जैसलमेर आना चाहे उसके पास ऐसा घोड़ा हो जो थके नहीं (सिर्फ काठ का निर्जीव ही ऐसा हो सकता है), उसका शरीर पत्थर का हो,उस पर उसने लोहे का बख्तर पहन रखा हो तभी वो जैसलमेर पहुँच सकता है.
जैसलमेर के दुर्गम्य होने की बातें हमेशा कही जाती रही है.कुछ साल पहले तक सरकारी महकमे में जैसलमेर- बाड़मेर ट्रान्सफर का मतलब काले पानी जाना होता था. सरकारी तबादले में जैसलमेर जाने के लिए 'जा-साले-मर !' कहना चलन में रहा है.पर सारी बातें अब पुरानी और बासी हो चुकी है.लोग आज भी चाहे वहां ट्रान्सफर लेना पसंद न करते हों,घूमने के लिहाज से एक कम्प्लीट पैकेज है जैसलमेर.
तो लीजिये साहेबान,पेश है जैसलमेर की कुछ छंटेल फोटुएं.