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Monday, February 13, 2012

कैसे उनको पाऊँ आलि


संगीतकार जयदेव के संगीतबद्ध किए गए आशा भोसले की गाई जयशंकर प्रसाद रचित "तुमुल कोलाहल" कुछ दिन पहले आप ने सुना था.आज इसी अल्बम से एक और रचना. कविता महादेवी वर्मा जी की है -


कैसे उनको पाऊँ आलि
कैसे उनको पाऊँ

वे आँसू बनकर मेरे
इस कारण ढुल-ढुल जाते
इन पलकों के बन्धन में मैं
बाँध-बाँध पछताऊँ

वे तारक बालाओं की
अपलक चितवन बन जाते
जिस में उनकी छाया भी मैं
छू न सकूँ, अकुलाऊँ

Sunday, October 23, 2011

जलना ही रहस्य है

महादेवी वर्मा की कविता

जीवन दीप

किन उपकरणों का दीपक,
किसका जलता है तेल?
किसकि वर्त्ति, कौन करता
इसका ज्वाला से मेल?

शून्य काल के पुलिनों पर-
जाकर चुपके से मौन,
इसे बहा जाता लहरों में
वह रहस्यमय कौन?

कुहरे सा धुँधला भविष्य है,
है अतीत तम घोर ;
कौन बता देगा जाता यह
किस असीम की ओर?

पावस की निशि में जुगनू का-
ज्यों आलोक-प्रसार।
इस आभा में लगता तम का
और गहन विस्तार।

इन उत्ताल तरंगों पर सह-
झंझा के आघात,
जलना ही रहस्य है बुझना -
है नैसर्गिक बात !

Thursday, November 4, 2010

दीप रे तू जल अकम्पित











दीप रे तू जल अकम्पित
                  ( महादेवी वर्मा की कविता )
दीप मेरे जल अकम्पित,
घुल अचंचल !

सिन्धु का उच्छ्वास घन है,
तड़ित् तम का विकल मन है,
भीति क्या नभ है व्यथा का
आँसुओं से सिक्त अंचल !
स्वर-प्रकम्पित कर दिशाएँ,
मीड़ सब भू की शिराएँ,
गा रहे आँधी-प्रलय
तेरे लिए ही आज मंगल।
मोह क्या निशि के वरों का,
शलभ के झुलसे परों का,
साथ अक्षय ज्वाल का
तू ले चला अनमोल सम्बल !
पथ न भूले, एक पग भी,
घर न खोये, लघु विहग भी,
स्निग्ध लौ की तूलिका से
आँक सब की छाँह उज्ज्वल !
हो लिये सब साथ अपने,
मृदुल आहटहीन सपने,
तू इन्हें पाथेय बिन, चिर
प्यास के मरु में न खो, चल !

धूम में अब बोलना क्या,
क्षार में अब तोलना क्या !
प्रात हँस-रोकर गिनेगा,
स्वर्ण कितने हो चुके पल !

दीप रे तू गल अकम्पित,
चल अचंचल !
* 'कबाड़ख़ाना' के सभी हमराहियों को दीपावली की मुबारकबाद !

Tuesday, November 3, 2009

रामगढ़ के 'टैगोर टाप' पर क्षण भर....

रामगढ़ ( जिला : नैनीताल ) उत्तराखंड महादेवी वर्मा सृजन पीठ में आयोजित 'हिन्दी कहानी और कविता पर अंतरंग बातचीत' के दो दिवसीय आयोजन ( ३० एवं ३१ अक्टूबर २००९ ) से लौटा हूँ जिसकी रपट भी लिखनी है लेकिन इससे पहले महादेवी वर्मा और निर्मल वर्मा के दो निबन्धों के एकाध हिस्सों को प्रस्तुत करने का मन बन गया है. मल्ला रामगढ़ की देवीधार पहाड़ी पर महादेवी वर्मा ने अपना घर बनाया और गर्मियों में वह यहाँ आया करती थीं किन्तु यहीं रामगढ़ में ही रवीन्द्रनाथ टैगोर भी रहे. महादेवी जी का घर तो अब कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अधीन सृजन पीठ बन गया है किन्तु कवीन्द्र रवीन्द्र की स्मृति से जुड़े स्थान को ( जो अब खंडहर है ) को कोई शक्ल नहीं दी जा सकी है. इस जगह पर कई बार गया हूँ. यहाँ जंगल है, हवा है , शान्ति है ,दूर चॊटियों पर दिखता हिम है और चहुँओर अपनी विशालता से असीसता हिमालय है.

आइए उम्मीद करें कि यह काम जल्द हो और वहाँ भी साहित्य प्रेमियों का आना जाना बढ़े ! अभी तो इस स्थान के बारे दो प्रमुख साहित्यकारों के लिखे दो अंश ही.... नीचे की तस्वीर उसी स्थान की है कभी जहाँ कभी 'गीतांजलि' के कुछ अंश रचे गए थे.......

* महादेवी वर्मा : 'पथ के साथी' से

हिमालय के प्रति मेरी आसक्ति जन्मजात है। उसके पर्वतीय अंचलों में भी हिमानी और मुखर निर्झरों, निर्जन वन और कलरव-भरे आकाश वाला रामगढ़ मुझे विशेष रूप से आकर्षित करता रहा है। वहीं नन्दा देवी, त्रिशूली आदि हिम-देवताओं के सामने निरन्तर प्रणाम में समाधिस्थ जैसे एक पर्वत-शिखर के ढाल पर कई एकड़ भूमि के साथ एक छोटा बँगला कवीन्द्र का था जो दूर से उस हरीतिमा में पीले केसर के फूल जैसा दिखाई पड़ता देता था। उसमें किसी समय वे अपनी रोगिणी पुत्री के साथ रह रहे थे और सम्भवतः वहाँ उन्होंने ‘शान्ति निकेतन’ जैसी संस्था की स्थापना का स्वप्न भी देखा था; पर रुग्ण पुत्री की चिरविदा के उपरान्त रामगढ़ भी उनकी व्यथा भरी स्मृतियों का ऐसा संगी बन गया जिसका सामीप्य व्यथा का सामीप्य बन जाता था। परिणामतः उनका बँगला किसी अंग्रेज अधिकारी का विश्राम हो गया।
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** निर्मल वर्मा : 'महादेवी पहाड़ों का बसंत मनाती थीं' से

यह भी विचत्र संयोग ही रहा होगा कि महादेवी ने अपने लिए जो निवास-स्थान चुना था, उससे लगभग तीन किलोमीटर दूर सबसे ऊंची पहाड़ी पर, कभी कवींद्र रवींद्र रहा करते थे वे सन् 1903 में अपनी बीमार बेटी के स्वास्थ्य लाभ के लिए यहां आये थे उन्होंने अपनी कुटी का नाम 'गीतांजली' रखा था, जिसकी कुछ कविताएं उन्होंने यहां रखी थी आज उनके घर के नाम पर सिर्फ पत्थरों के ढूह दिखायी देते हैं क़ितना अजीब है, जिस कृति के नाम पर रवींद्रनाथ को विश्वख्याति मिली, उसी के नाम का आवास- स्थल आज खंडहरों में दिखायी देता है।

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( रामगढ़ पर कुछ यहाँ भी है। मन करे तो देख लें )

Tuesday, October 27, 2009

ताना न मारो मोहे तीर लागे ....


आज और इस क्षण मन कर रहा है कि एक पसंदीदा गीत को साझा किया जाय। कुछ सुना जाय , कुछ बुना जाय !

अब कि ऐसे समय में जब चारो तरफ लगभग भुस - सा भरा हुआ है और जिसे देखिए वही अपने ही भीतर के हाहाकार से हलकान है और दोष बाहर के दबावों , प्रलोभनों , उठापटक को दिए जा रहा है तब अपने मन की कुछ कर लेना , अपने वास्ते एकांत के दो पल तलाश लेना कितना -कितना कठिन हो गया है ! औरों की बात क्या करूँ ? मैं किसी के मन के भीतर तो पैठा नहीं हूँ ! अपने तईं लगता है कि मन के भीतर पैठने के वास्ते संगीत और शायरी से बढ़िया चीज कोई और नहीं मिली.
कहना बहुत कुछ है लेकिन सुनना और भी जरूरी है सबसे जरूरी. तो आइए थोड़ी देर के लिए तमाम चीजों को एक तरफ कर बैठें , तसव्वुरे जानां करे और कुछ सुनें.. और मन करे , फुरसत हो तो कुछ बुनें

.. तो आइए , आज सुनते हैं ज़िला खान का गाया यह गीत - ताना न मारो .. उम्मीद है कि पसंद आएगा..






करुणामय को भाता है
तम के परदों में आना
हे नभ की दीपावलियों!
तुम पल भर को बुझ जाना!

( चित्र परिचय : महादेवी वर्मा की पेंटिंग )