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Thursday, January 31, 2013

पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - अंतिम



पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - अंतिम

-अनुवाद  : मंगलेश डबराल

(पिछली कड़ी से आगे)


प्रकृति से आपको गहरा लगाव है। इस पर कुछ बतलायेंगे?

नेरुदा: अपने बचपन से ही मुझे चिडि़यों, सीपियों, जंगलों और पेड़-पौधों से प्रेम रहा है। समुद्री सीपियों की खोज में मैं कई जगह गया और उनका एक बड़ा संग्रह मेरे पास हैमैंने पक्षियों की कलानाम से एक पुस्तक लिखी हैमैंने बेस्तिअरी’, ‘सी-क्वेकऔर रोज ऑफ़फ एवालरियोभी लिखी हैं जो कि फूलों, शाखाओं और वानस्पतिक विकास के संबंध में हैमैं प्रकृति से अलग होकर रह नहीं सकताहोटलों में कुछ दिन गुजार सकता हूं और एकाध घंटे के लिए हवाई जहाज में रहना भी अच्छा लगता है, लेकिन प्रसन्नता मुझे जंगलों में, रेत पर या नाव खेते हुए ही मिलती है, जहां कहीं आग, धरती, पानी ओर हवा से सीधा संपर्क हो सके

आपकी कविता में बार-बार बहुत-से प्रतीक आते हैं, और हमेशा समुद्र, मछली, चिडि़यों का रूप लेते हुए....

नेरुदा: मैं प्रतीकों को नहीं मानतावे महज़ भौतिक वस्तुएं हैंमेरे लिए समुद्र, मछली और चिडि़यों का एक भौतिक अस्तित्व हैमैं उनका उल्लेख उसी तरह करता हूं जैसे धूप का करता हूंमेरा कविता में कुछ विषय अगर अलग से दिखते हैं-और बार-बार आते हैं-तो इसका संबंध सिर्फ उनकी भौतिक उपस्थिति से है

कबूतर और गिटार का क्या अभिप्राय है?

नेरुदा: कबूतर का अर्थ कबूतर है और गिटार का अर्थ है एक वाद्ययंत्र जिसे गिटार कहते हैं

आपका मतलब यह है कि जिन्होंने इन चीजों के विश्लेषण का प्रयत्न किया है वे...

नेरुदा: जब मैं कोई कबूतर देखता हूं तो उसे कबूतर कहता हूँकबूतर का, चाहे वह मौजूद हो या न हो, मेरे लिए वस्तुगत या व्यक्तिगत रूप से एक निश्चित रूपाकार हैपर वह कबूतर होने से परे कुछ नहीं है

धरती पर घरकी कविताओं के संबंध में आपने कहा था कि वे किसी को जीने में मदद देती हैं, किसी को मरने में मदद देती हैं‐’

नेरुदा: मेरा संग्रह धरती पर घरमेरे जीवन के अँधेरे और खतरनाक समय का प्रतिनिधित्व करता हैवह ऐसी कविता है जिसमें कोई दरवाजा नहीउससे बाहर आना मेरे लिए नया जन्म लेने जैसा थास्पेन के युद्ध और दूसरी संजीदा घटनाओं से पैदा हुई उस घोर निराशा से, जिसकी थाह मैं अभी तक नहीं माप पाया हूं, मैं बच गयाएक बार मैंने यह भी कहा था कि अगर मेरे वश में हुआ तो मैं इस संग्रह को पढ़ने की मनाही करूंगा और उसका कोई नया संस्करण नहीं छपवाउंगाउसमें जीवन के अहसास को एक दुखद भार के रूप में, एक नश्वर उत्पीड़न के रूप में देखा गया हैलेकिन मुझे यह भी लगता है कि यह मेरी बेहतरीन पुस्तकों में से है: इस अर्थ में कि यह मेरी एक मनःस्थिति को उजागर करती हैपता नहीं दूसरे भी ऐसा सोचते हैं या नहीं, लेकिन जब कोई कुछ लिखता है तो उसे यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि मेरी कविताएं कहां पहुंच रही हैंराॅबर्ट फ्रास्ट ने अपने एक निबंध में कहा है कि कविता का एकमात्र आधार दुख होना चाहिए: कविता में सिर्फ दुख रहने दोलेकिन मुझे नहीं मालूम रॉबर्ट फ्रॉस्ट तब क्या सोचते अगर कोई नवयुवक आत्महत्या करता और अपने खून के निशान फ्रास्ट की किसी किताब पर छोड़ जातामेरे साथ ऐसा हुआ है - यहां, इसी मुल्क मेजिन्दगी से भरपूर एक नौजवान ने मेरी पुस्तक की बगल में अपने को मार डालाउसकी मृत्यु में मेरा सचमुच कोई दोष नहीं था, लेकिन खून के धब्बों से भरा वह कविता-पृष्ठ तमाम कवियों को चिंतित कर देने के लिए  काफी हैमैंने अपनी पुस्तक के खिलाफ़ जो कुछ कहा उसका मेरे विरोधियों ने राजनीतिक इस्तेमाल किया, जैसा कि वे मेरे हर कथन का करते आये हैयह उन्हीं की देन है कि मेरे भीतर सिर्फ आस्थावान कविताएं लिखने की इच्छा जगीउन्हें इस प्रसंग की जानकारी नहीं थीऐसा नहीं है कि मैंने अकेलेपन, व्यथा या विषाद की अभिव्यक्ति बिल्कुल वर्जित कर दी होलेकिन मैं चाहता हूं कि अपने लहजों को बदलता रहूं, तमाम आवाजें पाउं, तमाम रंगों की तलाश करूं, और जहां कहीं भी जीवन शक्तियां रचना और विनाश में लगी हों, उन्हें देखूं
जो दौर मेरी ज़िन्दगी में आये हैं वे मेरी कविता में ही आये हैं: एकाकी बचपन और दूरदराज सबसे कटे हुए देशों में बीती किशोरावस्था से मैंने एक विराट मानव समूह में शरीक होने तक की यात्रा हैइससे मुझे पूर्णता हासिल हुई, बसकवियों का पीडि़तात्मा होना पिछली सदी की चीज थीऐसे भी कवि हो सकते हैं जो जीवन को जानते हों, उसकी समस्याओं को जानते हों और जो विभिन्न धराओं को पार करते हुए जीवित रहते होंऔर जो उदासी से गुजरकर एक परिपूर्णता तक पहुंचते हों

Wednesday, January 30, 2013

पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ६



पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ६

-अनुवाद  : मंगलेश डबराल

(पिछली कड़ी से आगे)


युवा कवियों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

नेरुदा: अरे नहींयुवा कवियों को क्या सलाह दें! इन्हें अपना रास्ता खुद बनाना हैः उन्हें अपनी अभिव्यक्ति की राह में बाधाओं का सामना करना होगा और उन पर विजय पानी होगीहां राजनीतिक कविता से अपनी अन्य-यात्रा शुरू करने की सलाह मैं उन्हें कभी नहीं दूंगाराजनीतिक कविता में दूसरे किसी भी कविता से ज्यादा गहरा भावावेग होता है - कम से कम प्रेम-कविता जितना भी होता ही और उसे जबरन नहीं लिखा जा सकता, क्योंकि तब वह फूहड़ और अग्राह्य हो जाती हैएक राजनीतिक कवि होने के लिए पहले दूसरी तमाम तरह की कविताओं से गुजरना आवश्यक हैराजनीतिक कवि पर कविता से या साहित्य से विश्वासघात करने के जो आक्षेप लगते हैं, उसे उन्हें भी स्वीकार करने के लिए तैयार रहना होगाफिर, राजनीतिक कविता ऐसे कथ्य और वास्तविकता से लैस होनी चाहिए और उसमें इतनी बौद्धिक और भावनात्मक सम्पन्नता होनी चाहिए कि वह दूसरी का तिरस्कार करने में सक्षम हो सकेऐसा कभी-कभी ही हो पाता है

आपने अक्सर कहा है कि मैं मौलिकता में विश्वास नहीं रखता।

नेरुदा: हर क़ीमत पर मौलिक होने की कोशिश करना एक आधुनिक शर्त हैइस युग में लेखक आपका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना चाहता है, और फिर यह वही चिंता एक अंधश्रद्धा का रूप धारण कर लेती है। हर कोई इस फिराक में रहता है कि वह ऐसा कोई रास्ता हो जहां वह अद्वितीय हो: किसी गहराई में जाने या कुछ करने के लिए नहीं, बल्कि एक विशिष्ट प्रकार की क्षमता ओढ़ने के लिए सबसे मौलिक कलाकार में आपको समय और युग के अनुसार विभिन्न बदलाव दिखायी देंगेइस संदर्भ में पिकासो एक अद्भुत उदाहरण हैं, जिनके यहां शुरूआत में अफ्रीकी कलाकृतियों और मूर्तियों या आदिम कलाओं की प्रेरणा मिलती है और फिर वह रूपांतरण की ऐसी शक्ति के आगे बढ़ते हैं कि अद्भुत मौलिकता से सम्पन्न उनका कृतित्व विश्व के सांस्कृतिक भूगर्भ में अनेक अवस्थाओं में दिखलायी पड़ता है

आप पर कौन-से साहित्यिक प्रभाव रहे?

नेरुदा: एक तरह से लेखकों में अदला-बदली हमेशा चलती है: उसी तरह जैसे हम जिस हवा में सांस लेते हैं वह किसी एक जगह की नहीं होतीलेखक हमेशा घर-घर घूमता हुआ प्राणी होता है: उसे अपना साज-सामान बदलना ही होता हैकुछ लेखकों को यह अटपटा भी लगता हैमुझे याद है, लोर्का मुझे अक्सर अपनी कविताएं सुनाने को कहते थे और फिर सुनते-सुनते अचानक बीच में बोल उठते थे: रूको, रूको! आगे मत पढ़ो, कहीं मैं तुमसे प्रभावित न हो जाऊं

अब नॉर्मन मेलरआप उनके बारे में सबसे पहले लिखने वालों में से है

नेरुदा: मेलर का दि नेकेड एण्ड दि डेडछपने के कुछ ही दिनों बाद माक्सिको में किताबों की एक दूकान में इस पर मेरी निगाह पड़ीइस पुस्तक के बारे में किसी को कुछ मालूम नहीं था: पुस्तक-विक्रेता भी नहीं जानता था कि इसमें है क्यामैंने उसे इसलिए खरीदा कि मैं सफर कर रहा था और कोई नया अमरीकी उपन्यास पढ़ना चाहता थामैं सोचता था कि अमरीकी उपन्यास ट्रीजर से लेकर हेमिंग्वे, स्टीनबेक और फाॅकनर जैसी हस्तियों तक आने के बाद खत्म हो चुका हैलेकिन अब मैंने एक ऐसे लेखक को खोज लिया था जिसकी भाषा असाधारण रूप से आक्रामक थी और साथ ही, बड़ी बारीक और अद्भुत वर्णन-शक्ति थीमैं पास्तरनाक की कविता का बहुत प्रशंसक हूं लेकिन दि नैकेड एंड दि डेडसे तुलना करने पर पास्तरनाक का ‘डॉक्टर ज़िवागोएक उबाऊ रचना लगती है: सिर्फ प्रकृति-वर्णन के कुछ अंश ही उसे बचा ले जाते हंैयानी कि वे अंश, जो कविता हैंमुझे याद है कि आराकशों को जगने दोशीर्षक कविता मैंने उन्हीं दिनों लिखीलिंकन के व्यक्तित्व का आह्नान करने वाली यह कविता विश्वशांति को समर्पित थीइसमें मैंने ओकिनावा के और जापान के युद्ध के बारे में लिखा था और नॉर्मन  मेलर का उल्लेख भी किया थायह कविता यूरोप पहुंची और अनूदित हुईमुझे याद है, लुई अरागां ने मुझे बतलाया था कि यह पता लगाने में बहुत ज्यादा दिक्कत हुई कि नॉर्मन  मेलर कौन है?’ वास्तव में उन्हें कोई नहीं जानता था और मुझे एक खास तरह का गौरव हुआ कि मैं उन्हें ढूंढ़ने वाले पहले लेखकों में से हूं

(जारी)

Tuesday, January 29, 2013

पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ५



पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ५

-अनुवाद  : मंगलेश डबराल

(पिछली कड़ी से आगे)


लातिन अमरीका में साहित्यिक गतिविधियों पर मैं आपके विचार जानना चाहूंगी।

नेरुदा: कोई भी पत्रिका उठाइए-चाहे वह ओंदुरास से छपती हो या न्यूयॉर्क से; स्पानी में या मोंतेविदेओ से या ग्वागाकिल से-उसमें एलियट और काफ़्का के प्रभाव में लिखे गये फैशनी साहित्य की भरमार मिलेगी।यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का एक नमूना हैहम अभी तक यूरोपीय तहज़ीब में बेतरह फंसे हुए हैंउदाहरण के तौर पर चीले में गृहणियां आपको कोई भी चीज-जैसे चीनी तश्तरियां-दिखलाते हुए एक तृप्त मुस्कान के साथ बतलायेंगी कि यह विदेशी है!चीले के लाखों घरों में सजे हुए चीनी मिट्टी के बर्तन प्रायः आयातित होते हैं अैर वह भी निहायत घटिया कि़स्म के, जर्मनी और फ्रांस के कारखानों में बनेमूर्खता का यह माल उच्च कोटि का माना जाता है: इसलिए कि वह विदेश से मंगाया जाता है

क्या अलग पड़ जाने की आशंका इसके लिए जिम्मेदार है?

नेरुदा: बिल्कुल पुराने जमाने में लोग और खासकर लेखक लोग क्रांतिकारी विचारों से बहुत घबराते थेइस देश में और कूबाई क्रांति के बाद विशेष रूप से, जो चलन शुरू हुआ है, वह इसके बिल्कुल उलट हैलेखकों को यह डर है कि कहीं ऐसा न हो कि उन्हें अति वामपंथी नहीं मान लिया जायेऐसे अनेक लेखक हैं जिनकी हर रचना यह जाहिर करती है कि वे साम्राज्यवाद-विरोधी लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर हैंहममें से उन लोगों को जिन्होंने लगातार वह लड़ाई लड़ी थी, यह देखकर बहुत खुशी होती है कि साहित्य जनता की तरफ आ रहा है, लेकिन हमारा यह भी मानना है कि अगर महज फैशन के चलते है और इसमें लेखकों की यह आशंका भी शरीक है कि कहीं उन्हें सक्रिय वामपंथी मानने से इंकार न कर दिया जाये, तो फिर इस तरह की क्रांतिकारिता दूर तक साथ नहीं देगीऔर अंततः साहित्यिक जंगल में तो हर प्रकार के पशु समा ही जाते हैं एक बार जब कुछ हठी किस्म के उपद्रवियों की ओर से कई साल तक मुझ पर प्रहार होते रहे - लगता था कि वे मेरी कविता और मेरे जीवन पर आक्रमण करने के लिए ही जिंदा हैं - तो मैंने कहा: उन्हें अपने हाल पर छोड़ दोइस जंगल में सबके लिए जगह हैअगर यहां हाथियों के लिए जगह है जो कि अफ्रीका और श्रीलंका के जंगलों में इस बड़े पैमाने पर छाये हुए है, तो बेशक सारे कवियों के लिए भी है

क्या आपने चीले के लोकसंगीत में भी रचनाएं की हैं?

नेरुदा: कुछ गीतों की रचना की है जो इस देश में लोकप्रिय है

रूसी कवियों में आपको कौन अच्छे लगते हैं?

नेरुदा: रूसी कविता में अभी तक सबसे प्रमुख व्यक्तित्व मायकोवस्की का ही हैरूसी क्रांति में उनकी वही हैसियत है जो उत्तर अमरीका की औद्योगिक क्रांति के संदर्भ में वाल्ट व्हिटमैन की हैमायकोवस्की ने कविता को इस ढंग से अनुप्राणित किया कि लगभग समूची कविता मायकोवस्कीयहोने लग गयी

अपना देश छोड़ने वाले रूसी लेखकों के बारे में आप क्या सोचते हैं?

नेरुदा: जो लोग किसी जगह को छोड़ना चाहते हैं, उन्हें छोड़ना चाहिए दरअसल यह एक व्यक्त्गित मसला हैकुछ सोवियत लेखक साहित्यिक संगठनों से या अपने राज्य से ही अपने संबंधों को लेकर असंतुष्ट महसूस करते होंगे, लेकिन राजसत्ता और लेखकों के बीच जितनी कम असहमति मैंने समाजवादी देशों में देखी है, उतनी कहीं नहीं हैअधिसंख्य सोवियत लेखकों को समाजवादी ढांचे पर, नाजियों के खिलाफ मुक्ति की उस महान लड़ाई पर, क्रांति और महायुद्ध में जनता की भूमिका पर गर्व है और समाजवाद ने जिन ढांचों की रचना की है, उन पर भीपर इसके कुछ अपवाद हैं, तो यह एक निजी मामला है और साथ ही ऐसे हर मामले की अलग-अलग पड़ताल की जानी चाहिए

(जारी)

Monday, January 28, 2013

पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ४



पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ४

-अनुवाद  : मंगलेश डबराल

(पिछली कड़ी से आगे)


आपके पहले संग्रहों में से एक बीस प्रेम कविताएं और निराशा का एक गीतहजारों पाठकों द्वारा पढ़ा गया है और पढ़ा जा रहा है

नेरुदा: जिस संस्करण के साथ उस पुस्तक की दस लाख प्रतियों का प्रकाशन पूरा हुआ, उसकी भूमिका में मैंने कहा है कि मुझे सचमुच नहीं मालूम कि यह सब किस बारे में है - क्यों प्रेम की उदासी, प्रेम की पीड़ा की यह किताब इतने सारे लोगों, इतने युवकों द्वारा पढ़ी जाती हैसच, मुझे समझ में नहीं आताशायद यह कई सारे रहस्यों का एक युवा अंदाज पेश करती है: शायद यह उन पहेलियों का समाधान पेश करती होयह एक शोकाकुल संग्रह है, लेकिन इसका आकर्षण पुराना नहीं पड़ा

आप उन कवियों में हैं जिनकी रचनाओं के सबसे अधिक अनुवाद हुए हैं - कोई तीस भाषाओं मेसबसे अच्छा अनुवाद किन भाषाओं में हुआ है?

नेरुदा: मेरे विचार से इतालवी में शायद इसलिए कि दोनों भाषाओं में बहुत समानता हैइतालवी के अलावा मैं अंग्रेजी और फ्रांसीसी जानता हूं, लेकिन इन भाषाओं का स्पेनी से कोई तालमेल नहीं है: न उच्चारण में, न संयोजन में, न रंगत और शब्दों के वज़न मे

आप अपने को आसपास की चीजों से काट लेते हैं?

नेरुदा: काट लेता हूँ और फिर अगर अचानक शांति छा जाये तो मुझे बाधा-सी महसूस होती है

गद्य को आपने कभी ज्यादा महत्त्व नहीं दिया

नेरुदा: गद्य...मुझे अपनी जि़्ान्दगी में हमेशा पद्य ही लिखने की आवश्यकता महसूस होती रही हैगद्यात्मक अभिव्यक्ति में मन नहीं लगतागद्य का सहारा मैं किसी खास तरह की उड़ती हुई भावना या घटना को अभिव्यक्त करने के लिए लेता हूं, जिसमें किसी वर्णनात्मकता की गुंजायश होसच तो यह है कि मैं गद्य लिखना एकदम छोड़ सकता हूंबस, कभी-कभार ही लिखता हूं

अगर कभी आपकी रचनाएं आग में पड़ जायें और उन्हें बचाना हो तो कौन-सी रचना बचायेंगे?

नेरुदा: शायद उनमें से कोई भी नहीवे मेरे किस काम आयेंगी? उनकी जगह मैं एक लड़की को बचाना चाहूंगा...या जासूसी कहानियों की किसी बढि़या किताब कोउनसे मेरा अपनी रचनाओं की अपेक्षा कहीं अधिक दिल बहलाव होगा

आपकी कृतियों को किस आलोचक ने सबसे अच्छी तरह समझा है?

नेरुदा: अरे, मेरे आलोचक! मेरे आलोचकों ने तो दुनिया-भर की नफरत या प्रेम लेकर मेरी धज्जियां उड़ा के रख दी हैकला की तरह ज़िन्दगी में भी आप हरेक को खुश नहीं रख सकते, और यह एक ऐसी स्थिति है जो हमेशा बनी रहती है आपको हमेशा चुंबन और चांटे मिल रहे हैं, दुलार और दुलत्तियां मिल रही हैं, और यही एक कवि की जिन्दगी हैजिस बात से मुझे परेशानी होती है, वह है: आपकी कविता या जि़्ान्दगी की घटनाओं की तोड़-मरोड़कर की गयी व्याख्याउदाहरण के लिए न्यूयार्क में पी.ई.एन. क्लब के सम्मेलन में जहां कि अनेक जगहों के अनेक लोगों को इकट्ठा होने का अवसर मिला था, मैंने अपनी सामाजिक कविताएं पढ़ीं, वे कविताएं  कूबा को समर्पित थीं, उसकी क्रांति के समर्थन में थीलेकिन कूबा के लेखकों ने लाखों की तादाद में एक पर्चा छपवाकर बंटवाया जिसमें मेरे विचारों को संदिग्ध माना गया और मुझे उत्तरी अमरीकियों की छत्रछाया में रहने वाला जीव करार दिया गयाउसमें यहां तक कहा गया कि मुझे अमरीका बुलाया जाना भी एक तरह का इनाम हैयह झूठा लांछन नहीं तो सरासर मूर्खतापूर्ण बात है, क्योंकि समाजवादी देशों के भी अनेक लेखक वहां उपस्थित थे और कूबा के लेखकों तक के आने की सम्भावना थी‐ न्यूयॉर्क जाने में हमारे साम्राज्यवाद-विरोधी चरित्र में कोई बदलाव भी आ गयाफिर भी या तो हड़बड़ी में या किसी बदनीयती के चलते कूबाई लेखकों की ओर से ऐसा कहा गयाइस समय मैं अपने दल की तरफ से गणराज्य के राष्ट्रपति पद के चुनाव में खड़ा हुआ हूं और इससे भी जाहिर है कि मेरा वस्तुतः एक क्रांतिकारी इतिहास रहा हैउस पत्र पर जिन लेखकों के हस्ताक्षर थे, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो क्रांतिकारी कामों के प्रति इतना निष्ठावान रहा हो या जितना काम और संघर्ष मैंने किया उसके सौवें हिस्से के बराबर भी कर सका हो

आपके रहन-सहन और आर्थिक स्थिति को लेकर आपकी आलोचना होती रही है

नेरुदा: सामान्य रूप से, यह मनगढ़ंत हैएक अर्थ में स्पेन से हमें एक खासी बुरी विरासत मिली है, वह कभी यह सहन नहीं कर सकती कि हमारे लोग साधारण से अधिक हों या किसी बात में विशिष्टता प्राप्त करेक्रिस्टोफर कोलंबस जब लौटकर स्पेन आया तो जंजीरों से जकड़ दिया गयायह ईर्ष्यालु पेटी-बूर्जुआजी की देन है, जिसके भीतर बस यही ख्याल घुमड़ते रहते हैं कि दूसरों के पास क्या है और यह कि हमारे पास अब नहीं हैजहां तक मेरा संबंध है, मैंने अपनी जिंदगी जनता के कल्याण के लिए समर्पित की है और मेरे घर में जो कुछ है - यानी किताबें - वह मेरे अपने अस्तित्व का नतीजा हैजिस तरह के उलाहने मुझे मिलते हैं वैसे उन लेखकों को नहीं मिलते, अमीरी जिनका जन्मसिद्ध अधिकार हैउनकी बजाय सारी निंदा मेरे हिस्से में आ सकती है‐ 

(जारी)

Sunday, January 27, 2013

पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ३



पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - ३

-अनुवाद  : मंगलेश डबराल

(पिछली कड़ी से आगे)


आपके कृतित्व को विभिन्न चरणों में बांटा जा सकता है, या नहीं?

नेरुदा: इस बारे में मुझे खासी उलझन हैमुझे भिन्न चरणों का कोई अहसास नहीं है उन्हें आलोचक सोचते हैअगर मैं कुछ कह सकता हूं तो यह कि मेरी सार्थकता में एक अवयवी गुण रहा है - जब मैं बच्चा था तो बाल-सुलभ थी, जवान था तो कैशोर्य से भरी थी, जब दुख में रहा तो उदास थी, सामाजिक संघर्ष में शरीक होना पड़ा तो युयुत्सु हुईमेरी मौजूदा कविता में इन प्रवृतियों की मिली-जुली छाया हैमैंने हमेशा अपनी आंतरिक ज़्ारूरत से लिया है और मेरा ख्याल है कि हर लेखक के साथ ऐसा होता हैकवियों के साथ खास तौर पर

मैंने आपको कार में भी लिखते देखा है

नेरुदा: मैं जहां और जब भी लिख सकूं लिख देता हूंपर लिखता हूँ

क्या आप हर चीज हाथ से लिखते हैं?

नेरुदा: एक दुर्घटना में जब मेरी एक अंगुली टूटी और कुछ महीने तक मैं टाइपराइटर पर नहीं लिख सका, तब से मैंने अपनी युवावस्था का तरीका अपनाया और हाथ से लिखना शुरू कियाअंगुली ठीक होने के बाद फिर से टाइप करने पर मुझे लगा कि जो कविताएं मैंने हाथ से लिखी थीं वे ज़्यादा संवेदनशील बन पड़ी थीउनके लचीले फॉर्म अधिक आसानी से बदले जा सकते थे‐ रॉबर्ट ग्रेव्स ने किसी इंटरव्यू में कहा है कि चिंतन करने के लिए आदमी को अपने इर्द-गिर्द ऐसी चीजें कम से कम रखनी चाहिए जो हाथ से बनी न होवह इतना और जोड़ देते कि कविता हाथ से ही लिखनी चाहिए टाइपराइटर ने मुझे कविता के साथ एक अधिक गहरी आत्मीयता से काट दियाहाथ से लिखने पर जैसे वह आत्मीयता लौट आयी

आपका लिखने का क्या समय है?

नेरुदा: कोई नियत समय नहीं है, लेकिन मैं सुबह लिखना ज़्यादा पसन्द करता हूँयानी कि आप अगर यहां मेरा समय और अपना भी ख़राब न कर रही होतीं तो मैं लिख रहा होतादिन में मैं ज़्यादा नहीं पढ़ताबल्कि मैं दिन-भर लिख सकता हूं, लेकिन अक्सर किसी विचार, किसी अभिव्यक्ति या भीतर से बहुत उत्तेजना के साथ आयी हुई किसी बात की पूर्णता - आप उसे प्रेरणाजैसी पुरानी संज्ञा दे सकते हैं - मुझे पूरी तरह संतुष्ट कर जाती है या निचोड़कर रख देती है या शांत या खाली कर जाती हैमतलब यह कि मैं ज़्यादा नहीं चला पाताइसके अलावा, दिन-भर लगातार मेज पर झुके रहना मुझे है-उस लेखक को, जिसके साथ पचास साल का सृजन हैवे कहते रहते हैं: देखो, वह कैसे रहता है! समुद्र की तरफ खुलता हुआ मकान है और पीने के लिए बढि़या शराब है‐’ अव्वल तो चीले में कोई घटिया शराब पी ही नहीं सकता, क्योंकि यहां की लगभग सारी शराबें अच्छी होती हैंयह एक ऐसा मसला है जो एक तरह से उजागर करता है कि हमारा देश अल्प विकसित है - कुल मिलाकर यह कि हमारे तरीके कितने सतही हैंआप ही ने मुझे बताया है कि संयुक्त राज्य अमरीका की एक पत्रिका नॉर्मन मेलर को तीन लेखों के साथ नब्बे हजार डॉलर दियेयहां किसी लातिन अमरीकी लेखक को अपनी रचना पर अगर इतना पारिश्रमिक मिल जाये तो इस पर प्रसन्न होने की बजाय कि किसी लेखक को इतना पैसा भी मिल सकता है, दूसरे लेखकों में विरोध की लहर फैल जायेगी: कितनी घृणित है! कितना भयंकर! यह कहां तो जायेगा?’ खैर, जैसा कि मैंने कहा, ये ऐसे दुर्भाग्य हैं जो सांस्कृतिक पिछड़ेपन के नाम पर चलते रहते हूँ

क्या यह आरोप इसलिए ज़्यादा वजनदार नहीं है कि आप कम्युनिस्ट पार्टी में हैं

नेरुदा: बिल्कुलअनेक बार कहा गया है कि जिसके पास कुछ नहीं है, उसके पास खोने को सिवाय जंजीरों के कुछ नहीं होतामेरा जीवन, मेरा व्यक्तित्व और मेरे पास जो कुछ है वह हर क्षण दांव पर लगा रहता है-मेरी किताबें, मेरा घरमेरा घर जलाया गया, मुझ पर अभियोग लगाये गये मुझे एक नहीं कई बार हिरासत में रखा गया हजारों पुलिस वालों को मेरी तलाश रहीठीक है फिरमेरे पास जो कुछ है उसमें मुझे कोई आराम नहीं हसो, जो कुछ मेरे पास है, उसे मैंने जनता को, उसके संघर्ष को सौंप दिया और यह मकान भी, जिसमें आप बैठी हुई हैं, मैंने बीस वर्ष पहले एक सार्वजनिक परवाने के ज़रिये पार्टी को दे दिया थाबीस साल तक वह पार्टी की सम्पत्ति रहामैं तो अपनी पार्टी की सदस्यता के चलते यहां रह रहा हूँठीक है, मेरी भत्र्सना करने वाले भी ऐसा कर दिखायें: और कुछ नहीं तो ज़रा अपने जूते ही कहीं छोड़ दें ताकि वे किसी दूसरे को दिये जा सकें

आपने अनेक पुस्तक-भंडार दान किये हैक्या यह सच है कि इन दिनो आप ईस्ला नेग्रा में एक लेखक-बस्ती बसाने की योजना में लगे हैं?

नेरुदा: मैंने अपने देश के विश्वविद्यालय को एक से अधिक पुस्तक-भंडार भेंट किये हैमैं अपनी पुस्तकों से होने वाली आय पर गुजर करता हूं मेरे पास किसी किस्म की बचत नहीं हैहर महीने किताबों से मिलने वाले धन के अलावा और मेरे पास खर्चने के लिए भी कुछ नहीं होताबहुत बाद में उस आय से मैंने समुद्र तट पर जमीन का एक बड़ा-सा टुकड़ा हासिल किया, ताकि भविष्य में लेखक वहां गर्मियां बिता सकें और असाधारण सौंदर्य के उस वातावरण में अपना रचनात्मक कार्य कर सकें इसका नाम कांतालास फाउंडेशन होगा और उसके निदेशकों में कैथलिक विश्वविद्यालय, चीले विश्वविद्यालय और सोसायटी ऑफ़ रायटर्स के लोग होंगे‐ 


(जारी)

Saturday, January 26, 2013

पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - २



पाब्लो नेरुदा से एक बातचीत - २

-अनुवाद  : मंगलेश डबराल

(पिछली कड़ी से आगे)

नोबेल पुरस्कार, जिसके लिए आपका नाम अक्सर लिया गया है और चीले का राष्ट्रपति-पद-इन दो में से अगर किसी एक का चुनाव करना हो तो आप क्या चुनेंगे?

नेरुदा: इस तरह की अवास्तविक चीजों के चुनाव का प्रश्न ही नहीं उठता

लेकिन अगर राष्ट्रपति-पद और नोबेल पुरस्कार दोनों को ही मेज पर लाकर रख दिया जाये तो?

नेरुदा: तो मैं उठकर दूसरी मेज पर चला जाउंगा

आपके विचार से, सेमुअल बेकेट को नोबेल पुरस्कार दिया जाना ठीक था?

नेरुदा: मेरे ख्याल से ठीक थाबेकेट संक्षिप्त लेकिन गहरी चीजें लिखते हैंनोबेल पुरस्कार जिस किसी को भी मिले, वह हमेशा साहित्य का सम्मान हैपुरस्कार को लेकर जो लोग हमेशा इस पर बहस करते हैं कि पुरस्कार सही आदमी को मिला है कि नहीं, मैं उनमें से नहीं हूंइस पुरस्कार में महत्त्व है तो यह है कि वह लेखक नाम की संस्था को सम्मान की उपाधि से अलंकृत करता हैयही एक चीज है जो महत्त्वपूर्ण है

आपकी सबसे सशक्त स्मृतियां क्या हैं?

नेरुदा: पता नहीसबसे उत्कट स्मृतियां शायद स्पेन में बीती जिन्दगी की हैं - कवियों की उस महान बिरादरी कीहमारी इस अमरीकी दुनिया में मैंने कभी ऐसी बिरादराना टोली नहीं देखी जो, ब्वेनोस आयरेस के मुहावरे में कहूं तो, इस कदर गपोडि़यों से भरी हुई होफिर बाद में, यह देखना भयावह था कि मित्रों के उस गणराज्य को गृहयुद्ध ने ध्वस्त कर दिया, जिसमें फासिस्ट दमन की भीषण सच्चाई सामने आयीसारे दोस्त बिखर गयेः कुछ उसी जगह मार डाले गये - मसलन गार्सिया लोर्का और मीगेल एरनांदेसकुछ की मृत्यु निर्वासन में हुई, और कुछ और अब तक निर्वासित होकर जी रहे हैंमेरी जि़्न्दगी का वह समूचा दौर घटनाओं से, गहरे भावावेशों से भरपूर रहा और उसने मेरे जीवन की गति में निर्णायक परिवर्तन किया

क्या आपको अब स्पेन जाने की अनुमति मिल जायेगी?

नेरुदा: मेरा वहां प्रवेश सरकारी तौर पर निषिद्ध नहीं हैएक बार वहां चीले के दूतावास ने कविता-पाठ के लिए मुझे बुलाया भी थाबहुत संभव है कि वे मुझे जाने देंलेकिन मैं इसे कोई सैद्धांतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता: इसलिए कि स्पेन की सरकार बड़ी आसानी से ऐसे लोगों को, जो कि उसके खिलाफ ज़्ाबर्दस्त ढंग से लड़े थे, अपने यहां प्रवेश करने की अनुमति देकर कुछ लोकतंत्रीय भावनाओं का प्रदर्शन कर सकती थीकह नहीं सकतामुझे इतने देशों में जाने से रोका गया है और इतने देशों से निकाल बाहर किया गया है कि अब इससे मुझे कतई क्षोभ नहीं होता, जैसा कि पहले-पहले होता था

गार्सिया लोर्का के लिए लिखे गये आपके ओड में एक तरह से उनकी दुखद मृत्यु की भविष्यवाणी है

नेरुदा: हां, वह विचित्र कविता हैविचित्र इसलिए कि वह इतना सुखी व्यक्ति था, इतना प्रफुल्ल प्राणीमैंने उस जैसे लोग बहुत कम देखेवह सचमुच अवतार था....सफलता का न कहें, बल्कि जिन्दगी के प्यार का अवतारउसने अपने अस्तित्व के हरेक क्षण का उपभोग कियावह प्रसन्नता के भंडार को मुक्त हस्त लुटाने वाला आदमी थाइस वजह से भी उसकी हत्या का अपराध फासिज़्म के सबसे अक्षम्य अपराधों में से है

आपकी कविताओं में अक्सर उनका उल्लेख हुआ है, और मीगेल एरनांदेस का भी

नेरुदा: एरनांदेस बेटे की तरह थाकवि के रूप में वह मेरे लिए शिष्यवत् था और वह प्रायः मेरे ही मकान में रहता थावह जेल गया और वहीं मरा, क्योंकि उसने गार्सिया लोर्का की मृत्यु के सरकारी कारण को नहीं मानाफासिस्ट सरकार के बयान में अगर सच्चाई थी तो उसने मीगेल एरनांदेस को मौत तक सींखचों में बन्द क्यों रखा? उसने चीले के दूतावास का यह सुझाव क्यों स्वीकार नहीं किया कि उसे अस्पताल में ले जाया जाये। मीगेल एरनांदेस की मृत्यु भी एक हत्या थी

भारत-प्रवास के समय की कौन-सी बातें आपको सबसे अधिक याद आती हैं?

नेरुदा: वहां अपने प्रवास के दिनों में मैंने जो कुछ देखा, उसके लिए मैं तैयार नहीं थाउस अपरिचित महाद्वीप की भावना ने हालांकि मुझे अभिभूत कर दिया लेकिन वहां मेरी जि़्न्दगी इतनी लम्बी और अकेली थी कि मैं भयंकर निराशा में रहाकभी ऐसा लगता जैसे मैं किसी अन्तहीन रंगबिरंगी तस्वीर मे फंस गया हूं: एक अद्भुत फिल्म में, जहां से बाहर नहीं आया जा सकताभारत में मुझे कभी उस रहस्यात्मकता का अनुभव नहीं हुआ, जिसने कितने ही दक्षिण अमरीकियों और दूसरे विदेशियों को राह दिखायी हैजो लोग अपनी चिंताओं के किसी धर्मिक समाधान की खोज में भारत जाते हैं वे चीजों को और ही तरह से देखते हैजहां तक मेरा संबंध है, मुझ पर समाजशास्त्रीय परिस्थितियों का गहरा असर हुआ - विशाल निःशस्त्र राष्ट्र, बेहद सुरक्षाहीन, अपने शाही जुए में जकड़ा हुआयहां तक कि अंग्रेजी संस्कृति भी, जिससे मुझे खासा अनुराग था, वहां घिनौनी लगी, क्योंकि उने उस समय के कितने ही हिंदुओं को बौद्धिक गुलामी के लिए विवश कर दिया थामैं महाद्वीप के विद्रोही युवकों के बीच रहा: अपने कौंसुल रूप के बावजूद उस बड़े संघर्ष के सारे क्रांतिकारियों से मेरी मुलाकात थी जिसने अन्ततः आज़ादी हासिल की

धरती पर घरकी कविताएं आपने भारत में लिखीं?

नेरुदा: हां, यद्यपि कविता पर भारत का बौद्धिक प्रभाव कम पड़ा

आर्खेतीना के एक्तोर एयांदी के नाम वे मार्मिक पत्र भी आपने भारत से लिखे थे?

नेरुदा: हां, वे मेरे जीवन के बड़े महत्त्वपूर्ण पत्र थेपर उनसे मेरा लेखक के रूप में व्यक्तिगत परिचय नहीं था, फिर भी एक अच्छे समैरिटन की तरह उन्होंने मुझे समाचार, पत्रिकाएं भेजने और मेरे विराट अकेलेपन को कम करने का जिम्मा लियामुझे अपनी ही भाषा से संपर्क टूट जाने की आशंका हो गयी थी: वर्षों तक मुझे एक भी ऐसा आदमी नहीं मिला जिससे स्पानी में बात कर सकूं राफायल आलबेर्ती को मैंने एक पत्र में स्पेनी का शब्दकोष भेजने के लिए लिखामैं वहां कौंसुल के पद पर नियुक्त हुआ था, लेकिन वह निम्न श्रेणी का पद था और कोई वजीफा नहीं मिलता थावहां मैं घोर ग़रीबी में रहा और उससे भी घोर अकेलेपन मेहफ्तों तक किसी दूसरे प्राणी के दर्शन नहीं होते थे

वहां आपको खोसिये ब्लिस के साथ बहुत तगड़ा प्रेम थाआपकी अनेक कविताओं में उसका जिक्र है।

नेरुदा: हां, खोसिये ब्लिस एक ऐसी स्त्री थी जिसका मेरी कविता पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा‐  मैं उसका वरण करता रहा हूं: अपनी सबसे ताजा पुस्तकों में भी

तब तो आपके कृतित्व का आपकी व्यक्तिगत का आपकी व्यक्तिगत जि़्ान्दगी से घनिष्ठ से घनिष्ठ संबंध है?

नेरुदा: बिल्कुलकविता में कवि के जीवन का प्रतिबिंब होगा हीयह कला का नियम है और कविता का भी

(जारी)