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Friday, March 18, 2016

हम अपने अब्बा को भुनाना नहीं चाहते


बाएँ से दाएं - मंटो की बेटियाँ नुसरत, नुज़हत और निगहत 

सआदत हसन मंटो की बेटी निगहत का एक छोटा सा इंटरव्यू आपने हाल ही में पढ़ा होगा. पाकिस्तान की पत्रकार नायला इनायत ने 13 जनवरी 2012 को निगहत का एक और इंटरव्यू लिया था. नायला के ब्लॉग से साभार इसे मैं यहाँ अनुवाद करके पेश कर रहा हूँ

1946 में बंबई में जन्मीं मंटो की सबसे बड़ी बेटी निगहत मंटो अब लाहौर के मशहूर ‘द मॉल’ के पास लक्ष्मी मेंशंस के मंटो हाउस में रहती हैं. मंटो अपने जीवन के आख़िरी सालों में इसी फ़्लैट में रहे थे. एक जमाने में यह मोहल्ला नामी-गिरामी विद्वानों और लेखकों-कवियों से अटा रहता था.

निगहत यहाँ पिछले 11 सालों से रह रही हैं. उनका कहना है कि वे इस फ़्लैट की रिपेयर कराने के बाद अपने पीटीआई के साथ इसमें रहने लगीं. बातचीत को थोड़ा हल्का-फुल्का बनाने की नीयत से मैं निकहत से पूछती हूँ – “मंटो साहब की सबसे प्यारी बेटी कौन सी थी?”

“मुझे ठीकठीक याद नहीं पड़ता अगर उन्हें किसी एक से सबसे ज़्यादा प्यार थे. बल्कि यूं कह सकते हैं कि ज़िंदगी ने  अपनी फेवरेट बेटी बना सकने का मौका उन्हें दिया ही नहीं.” वे सपाट चेहरे के साथ उत्तर देती हैं.

जब मैं उनसे पूछती हूँ कि उन्हें अपने वालिद की कितनी याद है, वे कहती हैं, “हमने कभी भी उनके साथ समय नहीं गुज़ारा. हम उन्हें दूसरों से और उनकी किताबों से उन्हें जानते हैं. हम ये नहीं कह सकते कि हम उनके नज़दीक थे. आप नौ साल की बच्ची से इन सब छोटी बातों को याद रखने की उम्मीद नहें कर सकते!”

मंटो की अल्पायु में हो गयी मृत्यु को लेकर वे बोलीं, “अगर वो जिंदा होते तो बाकी पिताओं की तरह उनके पास भी हमारे लिए योजनाएं होतीं. हमारी बदकिस्मती है कि वे जल्दी चले गए.”

निगहत मंटो के साथ हुए उस साक्षात्कार का आगे का हिस्सा इस तरह है –

हमें अपने और अपनी बहनों के बारे में बताइये. मंटो के चाहनेवालों को इस बारे में बहुत कम मालूम है.

निकहत मंटो: ऐसा कैसे? (आश्चर्य के साथ) नौजवान प्रशंसकों को शायद न पता हो लेकिन उनके लेखन की वजह से पुरानी पीढी मंटो के परिवार के बारे में एक-एक चीज़ जानती है. सच तो यह है कि मंटो के जो हार्डकोर फैन्स हैं, उन्हें उनके बारे में वे सारी बातें पता हैं जो हम तक नहीं जानतीं.

हम तीन बेटियाँ हैं – नुसरत, नुज़हत और मैं. मैं सबसे बड़ी हूँ. हमारी माँ एक साधारण गृहिणी थीं. जब उनका इंतकाल हुआ, हम बहुत छोटी थीं – मैं नौ की थी, नुज़हत सात की और नुसरत पांच की.

मंटो बहुत कम उम्र में चल बसे थे. आपके परिवार ने अपना गुज़ारा कैसे किया?

सच कहूं तो मुझे उस सब के बारे में कुछ भी याद नहीं. मैं कहना चाहूंगी कि हमें हमारे परिवार ने बचाया. हमारी दादी हमारी माँ के लिए एक सपोर्ट सिस्टम बन गई थीं. उन्होंने हर दुःख-तकलीफ में हमारा साथ दिया. बाद में हामिद जाला (मंटो के भतीजे) और ऊपर के फ्लैट्स में रहने वाली हमारी मौसियों और चाचियों ने ऐसा किया.

हमारा परिवार  बहुत मजबूत था. अब्बा के मर जाने के बाद हमारी सारी दिक्कतों को हमारे बड़ों ने बहुत सलीके से सुलझाया. परिवार के मामलों ने हमें हमारे बचपन में कभी परेशान नहीं किया. हमें तो बाद में पता चला कि उनकी मौत के क्या मानी थे.

अपनी माँ के बारे में बताइये.मंटो के लेखन से पता चलता है कि वे उन्हें बहुत प्यारा करते थे. जब मंटो परिवार पाकिस्तान चला आया था, उस समय परिवार पर क्या-कैसी विपत्तियाँ पड़ीं?

हां, वो उन्हें बहुत प्यार करते थे. आप ये फोटो देख रहे हैं (वे सफ़िया के फ़्रेम किये हुए फोटो की तरफ इशारा करती हैं). अब्बा उन्हें फोटो के लिए पोज़ देने को तैयार करते थे. वे उनकी साड़ियों पर प्रेस करते थे और उनकी बड़ी स्टाइलिश तस्वीरें खींचते थे.

हमारे वालिद हर तरीके से बहुत मजबूत आदमी थे लेकिन माँ बहुत भोली थीं. वे इतनी भोली थीं कि कई बार उन्हें मंटो का लिखा समझ में नहीं आता था. अब्बा अलग से छोटी कहानियां लिखते थे और उन्हें समझाया करते थे. यह सब हमें हमारी माँ ने बताया था क्योंकि मैंने आपसे कहा था कि हमें उनकी बस धुंधली सी याद है. हमारी माँ ने जैसे हमें बताया था कि उन्हें गाजर का हलवा बहुत पसंद था. और ऐसी ही कई बातें.

पति की मृत्यु के बाद उनका जीवन किसी भी अन्य स्त्री की तरह मुश्किल रहा होगा. लेकिन उन्होंने उस समय को किसी के साथ साझा नहीं किया.

उनकी मौत के बाद पाकिस्तान की सरकार ने सफ़िया के साथ जो किया वह अधिक दर्दनाक था. उनकी किसी भी प्रकाशित रचना को कोई इनाम नहीं दिया गया. जब मेरी माँ उन्हें पीने से रोकती थीं तो अबा कहा करते थे, “सफू, तुम्हें पैसे की कोई चिंता नहीं करनी होगी.” उन्हें लगता था कि वे इतना सारा छोड़ कर जा रहे हैं कि उनके परिव्रा को कभी किसी तंगी का सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन उन्हें हर बार बैन कर दिया गया. और मज़े की बात है कि वे अब भी बैन हैं.

क्या आप आधुनिक टीवी ड्रामों की तरफ इशारा कर रही हैं? 

हां, आज के टीवी ड्रामों में शारीरिक निकटता और बोल्ड कहानियाँ – सब कुछ दिखाया जा रहा है. लेकिन उनके किसी भी नाटक को टीवी के लिए अडॉप्ट नहीं किया गया. पीटीवी ने कुछ किये हैं मगर उनमें कोई क्वालिटी नहीं है. मुझे समझ में नहीं आता कि मंटो के नाटक कोई क्यों नहीं करना चाहता. क्या बैन के कारण लोग उन पर काम करने से खौफ़ खाते हैं? उनकी कहानी ‘बू’ इतनी ताकतवर है. आप उसकी स्क्रिप्ट में खो जाते हैं. और मुझे उसमें कोई अश्लीलता नज़र नहीं आती.

मंटो की कब्र पर वह इबारत नहीं लिखी दिखती है जिसके बारे में हम पढ़ा करते हैं. उस इबारत को कब किसने और क्यों बदल दिया?

उनकी कब्र पर लिखे शब्द उन्हीं के हैं: “यहाँ सआदत हसन मंटो दफन है जिसके सीने में किस्सागोई की सारी कला और रहस्य छुपे हुए हैं. मिट्टी के इस ढेर के नीचे दफ़न किया हुआ भी वह सोच रहा है वह बड़ा किस्सागो है या ख़ुदा.”

लेकिन वह इबारत अब नज़र नहीं आती. मेरी फुफ्फू जो मेरे अब्बा के बिलकुल उलट थीं, ने उसे बदल दिया था क्योंकि उनका मानना था कि उसे वैसे ही रहने देने के गंभीर परिणाम होंगे.

सो अब वह इबारत कहती है: “यहाँ मंटो दफ़न है जो अब भी मानता हैं कि इस धरती पर आख़िरी शब्द उसी के नहीं थे.”

मंटो ताजिन्दगी लालची प्रकाशकों के बारे में शिकायत करते रहे. उनकी मौत के बाद क्या हुआ? क्या किसी ने आपके परिवार को कोई रॉयल्टी दी?

प्रकाशकों की कौम अब भी बची हुई है. है ना? हमें किसी ने कोई रॉयल्टी नहीं दी. बाद में जब संग-ए-मील ने उनके काम को छापा, तब जाकर हमें रॉयल्टी मिली. मेरी माँ ने तमाम साहित्यिक हस्तियों जैसे अशफाक अहमद आदि से मदद माँगी पर किसी ने कुछ नहीं किया. हमारे चचा, चाची और दादी ने हमारी आर्थिक सहायता की. यहाँ एक बात याद राखी जानी चाहिए. मंटो दूसरों की तरह उस लोटे की तरह नहीं थे जो सरकार बदल जाने पर पाला बदल लिया करते थे.

साहित्यिक हलकों, मीडिया और सरकारी संस्थानों ने मंटो की जन्मशताब्दी को अधिकतर अनदेखा ही किया. ऐसा क्यों? क्या आपका परिवार इस बाबत कुछ करने वाला है?

हां उनकी जन्मशताब्दी है और इस मौके पर कई इवेंट्स होंगी. और मैं उनकी अनदेखी करने के लिए मीडिया को दोष नहीं देती. हम बेटियाँ अपने अब्बा को भुनाना नहें चाहतीं. यह एक बात है कि वे हमारे साथ हैं. हम उनकी उपलब्धियों को भुनाना नहीं चाहते. ऐसा नहीं कि हम ऐसा कर नहीं सकते. हम ऐसा करना नहीं चाहते.

उनकी जन्मशताब्दी पर आयशा जलाल उनकी जीवनी लिख रही हैं और मेरे छोटी बहन नुसरत आयशा जलाल के साथ काम कर रही हैं.

Thursday, March 17, 2016

काश आपने शराबनोशी न की होती - मंटो की बेटी का इंटरव्यू

बेटियों के साथ सआदत हसन मंटो 

मंटो की तीन बेटियाँ थीं - नुज़हत, नुसरत और निगहत. जब उनका देहांत हुआ ये बच्चियां क्रमशः 7, 5 और 9 साल की थीं. इन्हीं में से एक निगहत के साथ लिए गए एक इंटरव्यू के कुछ अंश -


किस तरह की यादें जुड़ी हैं अब्बा जान मंटो की आपके साथ?

बेहद अच्छी यादें हैं उनकी, हालांकि उनके साथ हमारा बहुत कम वक़्त गुज़रा. लेकिन मुझे याद है, वो बहुत प्यार करने वाले खुशमिजा़ज इंसान थे. वो हमें ही नहीं हमारे रिश्तेदारों के बच्चों को भी लाड़-दुलार किया करते थे. धुंधली सी याद है मुझे, बावर्चीखाने में खड़े हुए अपनी पसंद की डिश या पकोड़े अक्सर बनाया करते थे. तो इस तरह उनके साथ जो भी वक्त गुजरा ज़हन में आज भी है. 

उनकी ऐसी कोई बात जो आपको दिलचस्प लगती हो, जिसे आप भूल नही़ पाती हों?

मैंने उन्हें कभी नमाज़ पढते नहीं देखा था. क्योंकि वह उस मायने में मज़हबी बिल्कुल नहीं थे. लेकिन उनका हर कहानी या मज़मून शुरू करने से पहले सफेह पर 786 लिखना दिलचस्प लगता था.

मंटो साहब की कौन सी कहानियां आपको ज़्यादा अच्छी लगती हैं?

यूँ तो उनकी सभी कहानियां अच्छी हैं लेकिन खासतौर से 'काली शलवार', 'हादसे का खात्मा' और 'बू' कहानियां अच्छी लगती हैं. 'बू' मेरी पसंदीदा कहानी है.

मंटो का व्यक्तित्व और कहानियाँ दोनों ही विवादों में रहे हैं, लोगों की प्रतिक्रियाओं का आप पर कितना असर हुआ?

देखिए जिस वक़्त कहानी 'बू' पर मुकदमा चल रहा था उस वक्त मैं बहुत छोटी थी. रही बात लोगों की प्रतिक्रियाओं का हम पर असर होने की तो मैंने देखा कि उनके विरोधी कम और चाहने वाले ज़्यादा थे. इसलिए विरोधियों की बातों पर कभी गौ़र ही नहीं किया.

विवादों को आपकी अम्मी जान ने किस तरह लिया?

बहुत सहजता से. क्योंकि घर में मामू और फूफियों के अलावा पूरी साहित्यिक बिरादरी उनके साथ थी. इसलिए विरोध से वह कभी परेशान नहीं हुईं.

मंटो साहब के लेखन के बारे में वह क्या सोचती थीं?

अम्मी बताती थीं कि अब्बाजान अपनी हर कहानी और मजमून सबसे पहले उन्हें ही सुनाया करते थे. और बताते थे कि इस कहानी या मजमून का मक़सद क्या है.

अम्मी से किस तरह का रिश्ता था मंटो साहब का?

होश आने पर जो घर के लोगों से जाना, वह यह कि रिश्तेदारों से उनका रिश्ता मोहब्बत और दोस्ती का था. बस अम्मी से उनकी झड़प शराबनोशी को लेकर हुआ करती थी. और उस वक्त भी वह अपनी कमज़ोरी और गलतियों को मान लेते थे.

'मनो मिट्टी के नीचे दफन सआदत हसन मंटो आज भी यह सोचता है कि सबसे बड़ा अफसाना निगार वह है या ख़ुदा.' मंटो की इस इबारत में आपको आत्मविश्वास और चुनौती नज़र आती है या ग़ुरूर?

मुझे तो सौ फीसदी आत्मविश्वास और साथ में चुनौती भी नज़र आती है. गुरूर तो उनमें था ही नहीं.

अगर अब्बा जान मंटो से कोई एक बात कहनी हो, तो वो क्या होगी?

यही कि.. 'काश आपने शराबनोशी न की होती तो ... हमें आपके साथ ज़्यादा रहने का मौका मिला होता..." बस इतना ही.

[बड़ी बेटी निकहत पटेल से 2009 में हुई बातचीत के ये टुकड़े http://www.sahityashilpi.com/ से साभार लिए गए हैं.]

Wednesday, March 16, 2016

कश्मीरी मजदूर की कहानी - मंटो


मज़दूरी
– सआदत हसन मंटो

लूटखसोट का बाज़ार गर्म था. इस गर्मी में इज़ाफ़ा हो गया जब चारों तरफ़ आग भड़कने लगी. एक आदमी हारमोनियम की पेटी उठाए ख़ुश ख़ुश गाता जा रहा था. “जब तुम ही गए परदेस लगा के ठेस, ओ पीतम प्यारा, दुनिया में कौन हमारा.” एक छोटी उम्र का लड़का झोली में पापड़ों का अंबार डाले भागा जा रहा था, ठोकर लगी तो पापड़ों की एक गड्डी उस की झोली में से गिर पड़ी, लड़का उसे उठाने के लिए झुका तो एक आदमी ने जिसने सर पर सिलाई मशीन उठाई हुई थी, उस से कहा. रहने दिए बेटा! रहने दे. अपने आप ही भुन जाऐंगे.

बाज़ार में धब से एक भरी हुई बोरी गिरी. एक शख़्स ने जल्दी से बढ़कर अपने छुरे से उस का पेट चाक किया. आंतों के बजाय शकर, सफ़ैद दानों वाली शकर उबल कर बाहर निकल आई. लोग जमा हो गए और अपनी झोलियाँ भरने लगे. एक आदमी कुरते के बग़ैर था, उस ने जल्दी से अपना तहबंद खोला वार मुठ्ठियाँ भर भर कर उस में डालने लगा. “हट जाओ, हट जाओ” एक ताँगा ताज़ा-ताज़ा रोग़न शूदा अलमारियों से लदा हुआ गुज़र गया.

ऊंचे मकान की खिड़की में से मलमल का थान फ़ड़फ़ड़ाता हुआ बाहर निकला, शोले की ज़बान ने हौले हौले उसे चाटा. सड़क तक पहुंचा तो राख का ढेर था. “पों पों, पों पों” मोटर के हॉर्न की आवाज़ के साथ दो औरतों की चीख़ें भी थीं.

लोहे का एक सेफ दस पंद्रह आदमीयों ने खींच कर बाहर निकाला और लाठियों की मुदी से उस को खोलना शुरू किया.

दूध के कई टिन दोनों हाथों पर उठाए अपनी थोड़ी से उनको सहारा दिए एक आदमी दूकान से बाहर निकला और आहिस्ता-आहिस्ता बाज़ार में चलने लगा.

बुलंद आवाज़ आई, “आओ लेमोनीड की बोतलें पियो, गर्मी का मौसम है ” गले में मोटर का टावर डाले हुए आदमी ने दो बोतलें लें और शुक्रिया अदा किए बग़ैर चल दिया.

एक आवाज़ आई “कोई आग बुझाने वालों को तो इत्तिला कर दे , सारा माल जल जाएगा.” किसी ने इस मश्वरे की तरफ़ तवज्जा ना दी, लूट खसूट का बाज़ार इसी तरह गर्म रहा और इस गर्मी में चारों तरफ़ भड़कने वाली आग बदस्तूर इज़ाफ़ा करती रही. बहुत देर के बाद तड़-तड़ की आवाज़ आई. गोलियां चलने लगीं. पुलिस को बाज़ार ख़ाली नज़र आया, लेकिन दूर धोईं में मलफ़ूफ़ मोड़ के पास एक आदमी का साया दिखाई दिया. पुलिस के सिपाही सीटियाँ बजाते उस की तरफ़ लपके. साया तेज़ी से धोईं  के अंदर घुस गया तो पुलिस के सिपाही भी उस के तआक़ुब में गए. धोईं  का इलाक़ा ख़त्म हुआ तो पुलिस के सिपाहियों ने देखा कि एक कश्मीरी मज़दूर पीठ पर वज़नी बोरी उठाए भागा चला जा रहा है. 

सीटियों के गले ख़ुशक हो गए मगर वो मज़दूर ना रुका. उस की पीठ पर वज़न था. वज़न मामूली नहीं , एक भरी हुई बोरी थी मगर वो यूं दौड़ रहा था जैसे पीठ पर कुछ है ही नहीं.

सिपाही हांपने लगे. एक ने तंग आकर पिस्तौल निकाला और दाग़ दिया. गोली कश्मीरी मज़दूर की पिंडली में लगी. बोरी उस की पीठ से गिर पड़ी, घबरा की उसने अपने पीछे सिपाहियों को देखा. पिंडली से बहते हुए ख़ून की तरफ़ भी उसने ग़ौर किया लेकिन एक ही जेबर से बोरी उठाई और पीठ पर डाल कर फिर भागने लगा. सिपाहियों ने सोचा, “जाने दो, जहन्नुम में जाये ” मगर फिर उन्हों ने उसे पकड़ लिया.

रास्ते में कश्मीरी मज़दूर ने बारहा कहा “हज़रत ! आप मुझे क्यों पकड़ती है , में तो ग़रीब आदमी होती, चावल की एक बोरी लेती, घर में खाती. आप नाहक़ मुझे गोली मारती.” लेकिन उस की एक न सुनी गई.

थाने में कश्मीरी मज़दूर ने अपनी सफ़ाई में बहुत कुछ कहा. “हज़रत! दूसरा लोग बड़ा बड़ा माल उठाती, में तो एक चावल की बोरी लेती. हज़रत! में बहुत ग़रीब होती. हर-रोज़ भात खाती.”

जब वो थक गया तो उस ने अपनी मैली टोपी से माथे का पसीना पोंछा और चावलों की बोरी की तरफ़ हसरत भरी निगाहों से देखकर थानेदार के आगे हाथ फैला कर कहा. “अच्छा हज़रत! तुम बोरी अपने पास रख. मैं अपनी मज़दूरी माँगती, चार आने…”

Tuesday, March 15, 2016

मंटो क्यों लिखता था


मैं क्यों लिखता हूँ

-सआदत हसन मंटो

मैं क्यों लिखता हूँ? यह एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूँ... मैं क्यों पीता हूँ... लेकिन इस दृष्टि से मुख़तलिफ है कि खाने और पीने पर मुझे रुपए खर्च करने पड़ते हैं और जब लिखता हूँ तो मुझे नकदी की सूरत में कुछ खर्च करना नहीं पड़ता.

पर जब गहराई में जाता हूँ तो पता चलता है कि यह बात ग़लत है इसलिए कि मैं रुपए के बलबूते पर ही लिखता हूँ.
अगर मुझे खाना-पीना न मिले तो ज़ाहिर है कि मेरे अंग इस हालत में नहीं होंगे कि मैं कलम हाथ में पकड़ सकूँ. हो सकता है, फ़ाकाकशी की हालत में दिमाग चलता रहे, मगर हाथ का चलना तो ज़रूरी है. हाथ न चले तो ज़बान ही चलनी चाहिए. यह कितनी बड़ी ट्रेजडी है कि इंसान खाए-पिए बग़ैर कुछ भी नहीं कर सकता.

लोग कला को इतना ऊँचा रूतबा देते हैं कि इसके झंडे सातवें असमान से मिला देते हैं. मगर क्या यह हक़ीक़त नहीं कि हर श्रेष्ठ और महान चीज़ एक सूखी रोटी की मोहताज है?

मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है. मैं लिखता हूँ इसलिए कि मैं कुछ कमा सकूँ ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूँ.

रोटी और कला का संबंध प्रगट रूप से अजीब-सा मालूम होता है, लेकिन क्या किया जाए कि ख़ुदाबंद ताला को यही मंज़ूर है. वह ख़ुद को हर चीज़ से निरपेक्ष कहता है-यह गलत है. वह निरपेक्ष हरगिज नहीं है. इसको इबादत चाहिए. और इबादत बड़ी ही नर्म और नाज़ुक रोटी है बल्कि यूँ कहिए, चुपड़ी हुई रोटी है जिससे वह अपना पेट भरता है.

मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़र्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती. लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने खाविंद से लड़कर और खुदकशी की धमकी देकर सिनेमा देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख़्त परेशानी की हालत में देखता हूँ तो मुझे दोनों से एक अजीब व ग़रीब क़िस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है.

किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ ज़रूर खींचेगा जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ो लड़कियाँ जान देती हैं लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित वाशिंदा. इस बज़ाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियाँ भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा.

चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मिनान से सो जाती है, मेरे अफ़सानों की हीरोइन नहीं हो सकती. मेरी हीरोइन चकले की एक टखयाई रंडी हो सकती है. जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आ रहा है. उसके भारी-भारी पपोटे, जिनमें वर्षों की उचटी हुई नींद जम गई है, मेरे अफ़सानों का मौजूँ (विषय) बन सकते हैं. उसकी गलाजत, उसकी बीमारियाँ, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियाँ-ये सब मुझे भाती हैं-मैं उसके मुताल्लिक लिखता हूँ और घरेलू औरतों की शस्ताकलामियों, उनकी सेहत और उनकी नफ़ासत पसंदी को नज़रअंदाज कर जाता हूँ.

सआदत हसन मंटो लिखता है इसलिए कि यह खुदा जितना बड़ा अफसाना साज और शायर नहीं, यह उसकी आजिजी है जो उससे लिखवाती है.

मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बड़ा नाम है. अगर यह ख़ुशफ़हमी न हो तो ज़िदगी और भी मुश्किल बन जाए. पर मेरे लिए यह एक तल्ख़ हक़ीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूंढ नहीं पाया हूँ. यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है. मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ.

मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेट चढ़ा चुका हूँ. अब तो यह हालत है- मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ.

मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज़ से गुजारी जाए तो एक क़ैद है. अगर वह बदपरहेजियों से गुज़ारी जाए तो भी एक क़ैद है. किसी न किसी तरह हमें इस जुराब के धागे का एक सिरा पकड़कर उधेड़ते जाना है और बस.


Monday, March 14, 2016

मंटो की एक कहानी


करामात
- सआदत हसन मंटो 

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए.

लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अँधेरे में बाहर फेंकने लगे; कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, कानूनी गिरफ्त से बचे रहें.

एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई. उनके पास शक्कर की दो बोरियाँ थीं जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थीं. एक तो वह जूँ-तूँ रात के अँधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा तो खुद भी साथ चला गया.

शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गए. कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं. जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया; लेकिन वह चंद घंटों के बाद मर गया.

दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था.


उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे.

Friday, January 9, 2015

खोल दो


खोल दो
-सआदत हसन मंटो 
अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची. रास्ते में कई आदमी मारे गए. अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए.

सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं. वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा. यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे. उसे कुछ सुनाई नहीं देता था. कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था. उसके होशो-हवास गायब थे. उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था.

गंदले आसमान की तरफ बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं. तेज रोशनी उसके अस्तित्व की रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा. ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं-लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना...सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इनसानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया.

पूरे तीन घंटे बाद वह सकीना-सकीना पुकारता कैंप की खाक छानता रहा, मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न मिला. चारों तरफ एक धांधली-सी मची थी. कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई मां, कोई बीबी और कोई बेटी. सिराजुद्दीन थक-हारकर एक तरफ बैठ गया और मस्तिष्क पर जोर देकर सोचने लगा कि सकीना उससे कब और कहां अलग हुई, लेकिन सोचते-सोचते उसका दिमाग सकीना की मां की लाश पर जम जाता, जिसकी सारी अंतड़ियां बाहर निकली हुईं थीं. उससे आगे वह और कुछ न सोच सका.

सकीना की मां मर चुकी थी. उसने सिराजुद्दीन की आंखों के सामने दम तोड़ा था, लेकिन सकीना कहां थी , जिसके विषय में मां ने मरते हुए कहा था, "मुझे छोड़ दो और सकीना को लेकर जल्दी से यहां से भाग जाओ."

सकीना उसके साथ ही थी. दोनों नंगे पांव भाग रहे थे. सकीना का दुप्पटा गिर पड़ा था. उसे उठाने के लिए उसने रुकना चाहा था. सकीना ने चिल्लाकर कहा था "अब्बाजी छोड़िए!" लेकिन उसने दुप्पटा उठा लिया था.....यह सोचते-सोचते उसने अपने कोट की उभरी हुई जेब का तरफ देखा और उसमें हाथ डालकर एक कपड़ा निकाला, सकीना का वही दुप्पटा था, लेकिन सकीना कहां थी?

सिराजुद्दीन ने अपने थके हुए दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर वह किसी नतीजे पर न पहुंच सका. क्या वह सकीना को अपने साथ स्टेशन तक ले आया था?- क्या वह उसके साथ ही गाड़ी में सवार थी?- रास्ते में जब गाड़ी रोकी गई थी और बलवाई अंदर घुस आए थे तो क्या वह बेहोश हो गया था, जो वे सकीना को उठा कर ले गए?

सिराजुद्दीन के दिमाग में सवाल ही सवाल थे, जवाब कोई भी नहीं था. उसको हमदर्दी की जरूरत थी, लेकिन चारों तरफ जितने भी इनसान फंसे हुए थे, सबको हमदर्दी की जरूरत थी. सिराजुद्दीन ने रोना चाहा, मगर आंखों ने उसकी मदद न की. आंसू न जाने कहां गायब हो गए थे.

छह रोज बाद जब होश-व-हवास किसी कदर दुरुसत हुए तो सिराजुद्दीन उन लोगों से मिला जो उसकी मदद करने को तैयार थे. आठ नौजवान थे, जिनके पास लाठियां थीं, बंदूकें थीं. सिराजुद्दीन ने उनको लाख-लाख दुआऐं दीं और सकीना का हुलिया बताया, गोरा रंग है और बहुत खूबसूरत है... मुझ पर नहीं अपनी मां पर थी...उम्र सत्रह वर्ष के करीब है....आंखें बड़ी-बड़ी...बाल स्याह, दाहिने गाल पर मोटा सा तिल...मेरी इकलौती लड़की है. ढूंढ लाओ, खुदा तुम्हारा भला करेगा.

रजाकार नौजवानों ने बड़े जज्बे के साथ बूढे¸ सिराजुद्दीन को यकीन दिलाया कि अगर उसकी बेटी जिंदा हुई तो चंद ही दिनों में उसके पास होगी.

आठों नौजवानों ने कोशिश की. जान हथेली पर रखकर वे अमृतसर गए. कई मर्दों और कई बच्चों को निकाल-निकालकर उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया. दस रोज गुजर गए, मगर उन्हें सकीना न मिली.
एक रोज इसी सेवा के लिए लारी पर अमृतसर जा रहे थे कि छहररा के पास सड़क पर उन्हें एक लड़की दिखाई दी. लारी की आवाज सुनकर वह बिदकी और भागना शुरू कर दिया. रजाकारों ने मोटर रोकी और सबके-सब उसके पीछे भागे. एक खेत में उन्होंने लड़की को पकड़ लिया. देखा, तो बहुत खूबसूरत थी. दाहिने गाल पर मोटा तिल था. एक लड़के ने उससे कहा, घबराओ नहीं-क्या तुम्हारा नाम सकीना है?

लड़की का रंग और भी जर्द हो गया. उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जब तमाम लड़कों ने उसे दम-दिलासा दिया तो उसकी दहशत दूर हुई और उसने मान लिया कि वो सराजुद्दीन की बेटी सकीना है.
आठ रजाकार नौजवानों ने हर तरह से सकीना की दिलजोई की. उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया और लारी में बैठा दिया. एक ने अपना कोट उतारकर उसे दे दिया, क्योंकि दुपट्टा न होने के कारण वह बहुत उलझन महसूस कर रही थी और बार-बार बांहों से अपने सीने को ढकने की कोशिश में लगी हुई थी.
कई दिन गुजर गए- सिराजुद्दीन को सकीना की कोई खबर न मिली. वह दिन-भर विभिन्न कैंपों और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता, लेकिन कहीं भी उसकी बेटी का पता न चला. रात को वह बहुत देर तक उन रजाकार नौजवानों की कामयाबी के लिए दुआएं मांगता रहता, जिन्होंने उसे यकीन दिलाया था कि अगर सकीना जिंदा हुई तो चंद दिनों में ही उसे ढूंढ निकालेंगे.

एक रोज सिराजुद्दीन ने कैंप में उन नौजवान रजाकारों को देखा. लारी में बैठे थे. सिराजुद्दीन भागा-भागा उनके पास गया. लारी चलने ही वाली थी कि उसने पूछा-बेटा, मेरी सकीना का पता चला?

सबने एक जवाब होकर कहा, चल जाएगा, चल जाएगा. और लारी चला दी. सिराजुद्दीन ने एक बार फिर उन नौजवानों की कामयाबी की दुआ मांगी और उसका जी किसी कदर हलका हो गया.

शाम को करीब कैंप में जहां सिराजुद्दीन बैठा था, उसके पास ही कुछ गड़बड़-सी हुई. चार आदमी कुछ उठाकर ला रहे थे. उसने मालूम किया तो पता चला कि एक लड़की रेलवे लाइन के पास बेहोश पड़ी थी. लोग उसे उठाकर लाए हैं. सिराजुद्दीन उनके पीछे हो लिया. लोगों ने लड़की को अस्पताल वालों के सुपुर्द किया और चले गए.

कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा. फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया. कमरे में कोई नहीं था. एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी. सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा. कमरे में अचानक रोशनी हुई. सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना

डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है?

सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं...जी मैं...इसका बाप हूं.

डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो.

सकीना के मुद्रा जिस्म में जुंबिश हुई. बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी.

बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है-. डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया.

Thursday, January 8, 2015

मंटो की पाँच कहानियाँ -


मंटो की पाँच कहानियाँ -

घाटे का सौदा
                                
दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक चुनी और बयालीस रुपये देकर उसे ख़रीद लिया.
रात गुज़ारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा : तुम्हारा नाम क्या है? ”
लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया: हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो..!
लड़की ने जवाब दिया : उसने झूठ बोला था!
यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा : उस हरामज़ादे ने हमारे साथ धोखा किया है ... हमारे ही मज़हब की लड़की थमा दी ... चलो, वापस कर आएँ ...!

करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए.
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे,
कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौक़ा पाकर अपने से अलहदा कर दियाताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें.
एक आदमी को बहुत दिक़्कत पेश आई. उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दूकान से लूटी थीं. एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आयालेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा ख़ुद भी साथ चला गया.
शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये. कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं.
जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया.
लेकिन वह चंद घंटो के बाद मर गया.
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था.
उसी रात उस आदमी की क़ब्र पर दीए जल रहे थे.

 बेख़बरी का फ़ायदा

लबलबी दबी पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली.
खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया.
लबलबी थोड़ी देर बाद फ़िर दबी दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली.
सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा.
लबलबी तीसरी बार दबी निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई.
चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख़ भी न सकी और वहीं ढेर हो गई.
पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, कोई हलाक हुआ और न ज़ख़्मी.
गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया.
दफ़्तन सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया.
गोलियाँ चलानेवाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ़ मोड़ा.
उसके साथी ने कहा : यह क्या करते हो?”
गोलियां चलानेवाले ने पूछा : क्यों?”
गोलियां तो ख़त्म हो चुकी हैं!
तुम ख़ामोश रहो ... इतने-से बच्चे को क्या मालूम?”



ख़बरदार

http://www.bbc.co.uk/staticarchive/5ea3e7590d674d9be4582cc6f6c8e86070157686.gif
बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीटकर बाहर लाए.कपड़े झाड़कर वह उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा :
तुम मुझे मार डालो, लेकिन ख़बरदार, जो मेरे रुपए-पैसे को हाथ लगाया ... !


हलाल और झटका

मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया.
यह तुमने क्या किया?”
क्यों?”
इसको हलाल क्यों किया?”
"मज़ा आता है इस तरह."
मज़ा आता है के बच्चे.....तुझे झटका करना चाहिए था ... इस तरह.
और हलाल करनेवाले की गर्दन का झटका हो गया.