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Wednesday, November 15, 2017

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है - साहिर के किस्से


जब पाकिस्तान गए साहिर वापस लौट आए
- रेहान फ़ज़ल

(बीबीसी हिन्दी से साभार)

"साढ़े पाँच फ़ुट का क़द, जो किसी तरह सीधा किया जा सके तो छह फ़ुट का हो जाए, लंबी-लंबी लचकीली टाँगें, पतली सी कमर, चौड़ा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग़, सरकश नाक, ख़ूबसूरत आँखें, आंखों से झींपा -झींपा सा तफ़क्कुर, बड़े-बड़े बाल, जिस्म पर क़मीज़, मुड़ी हुई पतलून और हाथ में सिगरेट का टिन."

ये थे साहिर लुधियानवी, उनके दोस्त और शायर कैफ़ी आज़मी की नज़र में.

साहिर को क़रीब से जानने वाले उनके एक और दोस्त प्रकाश पंडित उनकी झलक कुछ इस तरीक़े से देते हैं, "साहिर अभी-अभी सो कर उठा है (प्राय: 10-11 बजे से पहले वो कभी सो कर नहीं उठता) और नियमानुसार अपने लंबे क़द की जलेबी बनाए, लंबे-लंबे पीछे को पलटने वाले बाल बिखराए, बड़ी-बड़ी आँखों से किसी बिंदु पर टिकटिकी बाँधे बैठा है (इस समय अपनी इस समाधि में वो किसी तरह का विघ्न सहन नहीं कर सकता ... यहाँ तक कि अपनी प्यारी माँजी का भी नहीं, जिनका वो बहुत आदर करता है) कि यकायक साहिर पर एक दौरा-सा पड़ता है और वो चिल्लाता है- चाय!"

"और सुबह की इस आवाज़ के बाद दिन भर, और मौक़ा मिले तो रात भर, वो निरंतर बोले चला जाता है. मित्रों- परिचितों का जमघटा उस के लिए दैवी वरदान से कम नहीं. उन्हें वो सिगरेट पर सिगरेट पेश करता है (गला अधिक ख़राब न हो इसलिए ख़ुद सिगरेट के दो टुकड़े करके पीता है, लेकिन अक्सर दोनों टुकड़े एक साथ पी जाता है.) चाय के प्याले के प्याले उनके कंठ में उंडेलता है और इस बीच अपनी नज़्मों-ग़ज़लों के अलावा दर्जनों दूसरे शायरों के सैकड़ों शेर, दिलचस्प भूमिका के साथ सुनाता चला जाता है."

एक बार पंजाब के एक शायर नरेश कुमार शाद को साहिर लुधियानवी का इंटरव्यू लेने का मौक़ा मिला. जैसा कि रिवाज होता है उन्होंने पहला सवाल दाग़ा, "आपकी पैदाइश कहाँ और कब हुई?"

साहिर ने जवाब दिया, "ऐ जिद्दत पसंद नौजवान, ये तो बड़ा रवायती सवाल है. इस रवायत को आगे बढ़ाते हुए इसमें इतना इज़ाफ़ा और कर लो- क्यों पैदा हुए?"

विभाजन के बाद साहिर पाकिस्तान चले गए. नामी फ़िल्म निर्देशक और उपन्यासकार ख़्वाजा अहमद अब्बास ने उनके नाम 'इंडिया वीकली' पत्रिका में एक खुला पत्र लिखा.

अब्बास अपनी आत्मकथा 'आई एम नॉट एन आइलैंड' में लिखते हैं, "मैंने साहिर से अपील की कि तुम वापस भारत लौट आओ. मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब तक तुम अपना नाम नहीं बदलते, तुम भारतीय शायर ही कहलाओगे. हाँ, ये बात अलग है कि पाकिस्तान भारत पर हमला कर लुधियाना पर क़ब्ज़ा कर ले."

"मुझे ख़ासा आश्चर्य हुआ जब इस पत्रिका की कुछ प्रतियाँ लाहौर पहुंच गईं और साहिर ने मेरा पत्र पढ़ा. मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब साहिर ने मेरी बात मानी और अपनी बूढ़ी माँ के साथ भारत वापस आ गए और न सिर्फ़ उर्दू अदब बल्कि फ़िल्मी दुनिया में काफ़ी नाम कमाया."

जब साहिर की ग़ज़ल 'ताजमहल' प्रकाशित हुई तो हर ख़ास-ओ-आम की ज़बाँ पर चढ़ गई. तारीफ़ के साथ-साथ कुछ दक्षिणपंथी उर्दू अख़बारों ने साहिर की ये कह कर आलोचना की कि उन जैसे एक नास्तिक शख़्स ने बिना वजह महान सम्राट शाहजहाँ की बेइज़्जती की है. ग़ज़ल का एक शेर था-

ये चमनज़ार, ये जमुना का किनारा, ये महलये मुनक्कश दरो-दीवार, ये मेहराब, ये ताक़
एक शहनशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़

दिलचस्प बात ये है कि इसे लिखने से पहले साहिर न तो कभी आगरा गए थे और न ही उन्होंने ताजमहल देखा था.

अपने एक दोस्त साबिर दत्त को इसकी सफ़ाई देते हुए साहिर ने कहा था, "इसके लिए मुझे आगरा जाने की क्या ज़रूरत थी? मैंने मार्क्स का फ़लसफ़ा पढ़ा हुआ था. मुझे मेरा भूगोल भी याद था. ये भी पता था कि ताजमहल जमुना के किनारे शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज़ महल के लिए बनवाया था."

साहिर से जुड़ा एक दिलचस्प क़िस्सा स्टार पब्लिकेशंस के प्रमुख अमर वर्मा सुनाते हैं जो उनके दोस्त भी थे और प्रकाशक भी.

वो बताते हैं, "मेरी उनसे पहली मुलाक़ात 1957 में दिल्ली में हुई थी. मैंने स्टार पॉकेट बुक्स में एक रुपये क़ीमत में एक सिरीज़ शुरू की थी. मैं चाहता था कि उसकी पहली किताब साहिर साहब की हो. मैंने कहा कि मैं आपकी किताब छापने की इजाज़त चाहता हूँ. वो बोले मेरी तल्ख़ियाँ क़रीब-क़रीब दिल्ली के हर प्रकाशक ने छाप दी है बिना मेरी इजाज़त लिए हुए. आप भी छाप दीजिए. जब मैंने ज़ोर दिया तो उन्होंने कहा कि आप मेरे फ़िल्मी गीतों का मजमुआ छाप दीजिए, गाता जाए बनजारा के नाम से."

"न भूलने वाली बात ये है कि कुछ वक़्त बाद मैंने उन्हें बहुत झिझकते हुए रॉयल्टी का बासठ रुपए पचास पैसे का चेक भेजा. तय हुआ था कि मैं उनकी किताब की हज़ार प्रतियाँ छापूँगा और सवा छह फ़ीसदी की रॉयल्टी दूँगा. साहिर को इतनी छोटी रक़म भेजते हुए मैं डर रहा था कि वो पता नहीं क्या सोचेंगे. साहिर का मेरे पास जवाब आया... आप इसे मामूली रक़म मानते हैं. ज़िंदगी में पहली बार किसी ने मुझे रॉयल्टी दी है. इस चेक को तो मैं ज़िंदगी भर भूल नहीं पाऊंगा."

इतने बड़े शायर होने के बावजूद ज़रा-सी बात पर उकता जाना, घबरा जाना या शरमा जाना साहिर का स्वभाव था.
उन पर किताब लिखने वाले अक्षय मनवानी बताते हैं कि एक ज़माने में छात्र नेता रहे साहिर लुधियानवी बड़े जमघट को देखकर कभी उत्साहित नहीं होते थे.

"माइक्रोफ़ोन के नज़दीक जाते ही उनकी ज़ुबान जैसे सिल जाती थी. सुनने वालों का एक वर्ग फ़रमाइश करता था कि वो ताजमहल सुनाएं, तो दूसरी तरफ़ से फ़नकार सुनाने की आवाज़ आती थी. दोनों फ़रमाइशों के बीच वो अक्सर भूल जाते थे कि उन्होंने वहाँ सुनाने के लिए कौन सी नज़्म चुनी है."

ये अनिर्णय की स्थिति इस हद तक पहुंचती थी कि साहिर की समझ में नहीं आता था कि मुशायरे के वक़्त वो कौन-से कपड़े पहनें. यहाँ तक कि किस क़मीज़ पर वो कौन-सी पतलून पहनें, इसके लिए उन्हें अपने दोस्तों की मदद लेनी पड़ती थी.

उनके दोस्त प्रकाश पंडित लिखते हैं, "उनके दोस्त तय करते थे कि वो नाश्ते में पराठे आमलेट खाएं या टोस्ट मक्खन. साहिर की इन्हीं आदतों के कारण कभी-कभी हम दोनों में ठन भी जाती थी. जब वो लिबास के बारे में मेरी राय लेता तो मैं बड़ी गंभीरता से कपड़े छाँटकर उसे अच्छा ख़ासा कार्टून बना देता और नाश्ता तो मैंने उसे कई बार आइसक्रीम तक का करवाया. लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि वो मज़ाक़ नहीं दया का पात्र है. ये आदतें उसने ख़ुद नहीं पालीं. इसकी तह में काम करती थीं वो परिस्थितियाँ, जिनमें उसने आँखें खोलीं, परवान चढ़ा और जो अपने समस्त गुणों-अवगुणों के साथ उसके व्यक्तित्व का अंग बन गईं."

बंबई के उनके शुरू के दिनों में जब उन्हें कोई काम नहीं मिला तो उनके दोस्त मोहन सहगल ने उन्हें बताया कि मशहूर संगीतकार एसडी बर्मन एक गीतकार की तलाश में हैं. उस समय बर्मन ने खार में ग्रीन होटल में एक कमरा ले रखा था. उसके बाहर 'प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब' का साइन लगा हुआ था.

इसके बावजूद साहिर सीधे बर्मन के कमरे में घुस गए और अपना परिचय कराया. एसडी बर्मन चूँकि बंगाली थे, इसलिए उर्दू साहित्य में साहिर के क़द के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इसके बावजूद उन्होंने साहिर को एक धुन दी.

फ़िल्म की सिचुएशन समझाई और एक गीत लिखने के लिए दिया. साहिर ने बर्मन से वो धुन एक बार फिर से सुनाने के लिए कहा. जैसे ही बर्मन ने उसे हारमोनियम पर बजाना शुरू किया साहिर ने लिखा, "ठंडी हवाएं, लहरा के आंए, रुत है जवाँ, तुम हो यहाँ, कैसे भुलाएं."

लता मंगेशकर के गाए इस गीत ने बर्मन-साहिर जोड़ी की नींव रखी जो कई सालों तक चली.

गुरुदत्त की फ़िल्म 'प्यासा' के गीत और संगीत दोनों ने उस समय पूरे भारत में खलबली मचा दी. भारतीय फ़िल्म इतिहास का सबसे काव्यात्मक क्षण तब आया जब गुरुदत्त ने साहिर की नज़्म गुनगुनाई, 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.'

फ़िल्म इंडस्ट्री में हमेशा से ही संगीतकारों को गीतकारों की तुलना में ज़्यादा अहमियत मिलती आई है. बर्मन और साहिर दोनों का मानना था कि 'प्यासा' की सफलता के वो हक़दार हैं.

साहिर का ज़ोर-शोर से ये कहना एसडी बर्मन को पसंद नहीं आया और उन्होंने साहिर के साथ दोबारा काम करने से इंकार कर दिया.

साहिर का नाम कई महिलाओं के साथ जुड़ा लेकिन उन्होंने ताउम्र शादी नहीं की. उनकी सबसे नज़दीकी दोस्त थीं अमृता प्रीतम.

वो अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में लिखती हैं, "वो चुपचाप मेरे कमरे में सिगरेट पिया करता. आधी पीने के बाद सिगरेट बुझा देता और नई सिगरेट सुलगा लेता. जब वो जाता तो कमरे में उसकी पी हुई सिगरेटों की महक बची रहती. मैं उन सिगरेट के बटों को संभाल कर रखतीं और अकेले में उन बटों को दोबारा सुलगाती. जब मैं उन्हें अपनी उंगलियों में पकड़ती तो मुझे लगता कि मैं साहिर के हाथों को छू रही हूँ. इस तरह मुझे सिगरेट पीने की लत लगी."

पार्श्व गायिका सुधा मल्होत्रा का नाम भी साहिर के साथ जोड़ा गया. लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि ये साहिर का एकतरफ़ा प्यार था.

अक्षय मनवानी कहते हैं, "सुधा ने मुझे बताया... शायद साहिर को मेरी आवाज़ अच्छी लगती थी. वो मुझसे मोहित ज़रूर थे. उन्होंने मुझे गाने के लिए लगातार अच्छे गाने दिए. रोज़ सुबह मेरे पास उनका फ़ोन आता था. मेरे चाचा मुझे चिढ़ाया करते थे... तेरे मॉर्निंग अलार्म का फ़ोन आ गया. लेकिन ये ग़लत है कि मेरा उनसे कोई रोमांस चल रहा था. वो मुझसे उम्र में कहीं बड़े थे."

लेकिन कहा ये जाता था कि फ़िल्म गुमराह में साहिर का लिखा महेंद्र कपूर का गाया गाना 'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं' वास्तव में सुधा मल्होत्रा के लिए लिखा गया था.

लेकिन सच बात ये थी कि ये नज़्म साहिर की सुधा से मुलाक़ात से कहीं पहले उनके काव्य संग्रह तल्ख़ियाँ में ख़ूबसूरत मोड़ के नाम से प्रकाशित हो चुकी थीं.

1960 में अपनी शादी के बाद सुधा ने हिंदी फ़िल्मों के लिए कोई गाना नहीं गाया. उनकी साहिर से फिर कभी मुलाक़ात भी नहीं हुई. साहिर का लिखा एक गीत जिसे सुधा मल्होत्रा ने गाया, उन दोनों के संबंधों को शायद सही ढंग से रेखांकित करता है-

तुम मुझे भूल भी जाओ, तो ये हक़ है तुम को मेरी बात और है, मैंने तो मोहब्बत की है.


साहिर को लिफ़्ट इस्तेमाल करने से डर लगता था. जब भी यश चोपड़ा उन्हें किसी संगीतकार के साथ काम करने की सलाह देते तो वो उस संगीतकार की योग्यता उसके घर के पते से मापते थे..."अरे नहीं नहीं, वो ग्यारहवीं मंज़िल पर रहता है... जाने दीजिए छोड़िए. इसको लीजिए... ये ग्राउंड फ़्लोर पर रहता है."

मज़े की बात है कि यश चोपड़ा साहिर की बात सुना करते थे. लिफ़्ट की तरह साहिर को जहाज़ पर उड़ने से भी डर लगता था. वो हर जगह कार से जाते थे. उनके पीछे एक और कार चला करती थी कि कहीं जिस कार में वो सफ़र कर रहे हैं वो ख़राब न हो जाए.

एक बार वो कार से लुधियाना जा रहे थे. मशहूर उपन्यासकार कृश्न चंदर भी उनके साथ थे. शिवपुरी के पास डाकू मान सिंह ने उनकी कार रोक कर उसमें सवार सभी लोगों को बंधक बना लिया.

जब साहिर ने उन्हें बताया कि उन्होंने ही डाकुओं के जीवन पर बनी फ़िल्म 'मुझे जीने दो' के गाने लिखे थे तो उन्होंने उन्हें इज़्ज़त से जाने दिया था.


Saturday, March 12, 2016

साहिर की मोहब्बतें


एक सरकश से मुहब्बत की तमन्ना
राशिद अशरफ़

साहिर लुधियानवी मुहब्बत के आदमी थे. सरहद के इधर भी और सरहद के उधरभी जो देखता था, साहिर के सह्र में मुबतला हो जाता था .शख़्सियत का सह्र था, सरकशी का या शायरी का,  ख़ुदा जाने लेकिन था जान-लेवा  लेकिन साहिर के लिए नहीं, बल्कि उनके जादू से घायल होजाने वालों के लिए . ज़रा नाम भी तो देखिए कि कैसे कैसे क़द्दावर लोगों के आते हैं. हाजिरा मसरूर भी ख़ुद को न रोक पाई थीं. १९४६ के आख़िर में बंबई के अख़बारात में उनकी हाजिरा मसरूर से मंगनी की ख़बर की इशाअत का तज़किरा हमीद अख़तर  ने अपने ख़ाके में किया है. लेकिन साहिर ही थे जो भाग निकले थे.

सरापा जमाल ही जमाल, इन्किसार ही इन्किसार, लखनऊ की तहज़ीब का नमूना, साहिर को हाजिरा मसरूर से शादी पर आमादा करने में ऐसे उलझे कि ख़ुद को उलझा बैठे और उनकी परेशानी उस वक़्त दो-चंद हुई जब हाजिरा मसरूर की बहनें आईशा जमाल और ख़दीजा मस्तूर उनसे साहिर की शिकायत करने आ धमकें.

साहिर के इस रवैय्ये की वजह से बने भाई को तरक़्क़ी-पसंद तहरीक को नुक़्सान पहुंचने का ख़दशा खाए जाता था. मगर ये कोई पहला मौक़ा तो था नहीं. हमीद अख़तर के मुताबिक़ इस से क़ब्ल अमृता प्रीतम, लता मंगेशकर और सुधा मल्होत्रा सब साहिर की साहिरी के असीर रह चुके थे.

ख़ालसा स्कूल लुधियाना की अशर कौर तो माज़ी का क़िस्सा बन चुकी थी. साहिर की पहली मुहब्बत

सुधा मल्होत्रा से मुआमला ख़त्म हुआ तो एक फ़िल्मी अख़बार ने तबसरा किया था कि साहिर को अपने नाम के साथ स्कैंडल बनाने का शौक़ है. वो मुहब्बत का खेल खेलते हैं और जब ताल्लुक़ात कामियाबी की मंज़िल तक पहुंच जाते हैं तो ख़ुद ही पीछे हट जाते हैं.

एक बरस हुआ जब लाहौर के माहनामा अलहमरा में कराची से ताल्लुक़ रखने वाले अदीब--मुतर्जिम क़ाज़ी अख़तर जूना गढ़ी का एक मज़मून शाय हुआ. क़ाज़ी साहिब लाहौर गए थे और हमीद अख़तर से साहिर लुधियानवी और हाजिरा मसरूर की मंगनी ख़त्म होने का सबब खोज लाए थे. लिखते हैं:

“उर्दू ज़बान की एक मारूफ़ अफ़्साना निगार की जो इन दिनों मुंबई ही में मुक़ीम थीं, मंगनी साहिर लुधियानवी के साथ हो चुकी थी. साहिर को एक ऐसे मुशायरे में शरीक हो कर अपनी शहरा आफ़ाक़ नज़म ताज-महल सुनाना थी जिसमें जोश मलीहाबादी भी शिरकत करने वाले थे जो अलफ़ाज़ के ग़लत तलफ़्फ़ुज़ को कभी बर्दाश्त नहीं करते थे. चूँकि साहिर लुधियानवी अहल--ज़बान नहीं थे लिहाज़ा उन्होंने अपनी नज़म ताज-महल में इस्तिमाल किए गए लफ़्ज़ मक़ाबिर के सही और दरुस्त तलफ़्फ़ुज़ के बारे में इन ख़ातून से राय तलब की. उन्होंने बताया कि सही तलफ़्फ़ुज़ मक़ाबिर यानी ब के नीचे ज़ेर आएगा. गोया ये मिसरा यूं हो जाएगा: मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली. जोश साहिब ने साहिर को जो मलाहयां सुनाई होंगी, उनका अंदाज़ा आप इस वाक़े से लगा सकते हैं कि साहिर ने फ़ील-फ़ौर इन ख़ातून से अपनी मंगनी के ख़ातमे का ऐलान कर दिया.”

ख़ैर हाजिरा मसरूर का ये मुआमला तो साहिर लुधियानवी की उफ़्ताद तबा के बाइस ख़त्म हुआ लेकिन फिर अमृता प्रीतम को क्या कहिये कि शादी तो इमरोज़ से की और वही इमरोज़, सलीम पाशा को एक मुलाक़ात में बताते हैं कि ये जानते हुए भी कि अमृता साहिर से प्यार करती है, मैं अमृता से प्यार करता हूँ. मैं उसे स्कूटर पर बिठा कर स्टूडियो ले जाता तो वो मेरे पीछे बैठी मेरी कमर पर साहिर साहिर लिखती रहती. अमृता ने यादों के लम्स में अपने महबूब को कुछ इन अलफ़ाज़ में याद किया था:

यही वो चेहरा था जिसने मेरे अंदर इन्सानियत की वो जोत जगाई कि मुल्क की तक़सीम के वक़्त,
तक़सीम के हाथों तबाही से दो-चार हो कर भी
जब मैं ने इस हादिसे के बारे में क़लम उठाया
तो दोनों गिरोहों की ज़्यादतियां बग़ैर किसी रियाइत या रेज़र वीशीन के कलमबंद कर सकी.

इसी अमृता प्रीतम ने साहिर की मौत की ख़बर सुनकर क़लम उठाया और उसे यूं ख़िराज--तहिसीन पेश किया था:

यार बदनीयत या
तुमने तो यार हमारे साथ बदनीयती कर दी
हमने तो तेरे नाम पर दुनिया के लाखों इल्ज़ाम लिए
और आज तुम ही दग़ा कर रहे हो
यार बदनीयत या
चलो जहां चलोगे हम साथ चलेंगे
अगर मौत के रेगिस्तान से भी गुज़रना होगा तो गुज़़रेंगे
*

नरेश कुमार शाद को दिए एक इंटरव्यू में साहिर ने एक क़हक़हे के साथ शादी ना करने के सवाल के जवाब में कहा था – “कुछ लड़कियां मुझ तक देर में पहुंचीं और कुछ लड़कियों तक मैं देर में पहुंचा.”

बाक़ौल कैफ़ी आज़मी, शादियां उन पर मंडलाईं, मंडलाती रहीं और मंडला के रह गईं  मगर साहिर हर मर्तबा बच निकले.

लुधियाना के एक ज़मींदार घराने में अबदुलहई के नाम से पैदा होने वाला साहिर लुधियानवी , निजी ज़िंदगी में निहायत शर्मीला और बुज़दिल इन्सान था, इतना कम हिम्मत कि उस में लाहौर के नाशिर चौधरी नज़ीर से अपनी किताब तल्ख़ीयां की बक़ाया रक़म मांगने का हौसला भी ना था. ये काम भी उसके अज़ीज़ दोस्त ए हमीद  ही को करना पड़ा था. ग़रज़ पूरी हुई तो दोस्तों का ये टोला अनार कली में वाक़्य मुमताज़ होटल में चाय और पेस्ट्री खाने जा पहुंचा जो इन दिनों एक अय्याशी तसव्वुर की जाती थी. वो ज़माना भी ख़ूब था, मुंबई की ज़बान में कहिए तो सब दोस्त कड़के होते थे. इन सभों की एक रात ऐसे ही कटी थी, मांगे के सिगरटों पर गुज़रा करते.

मुफ़लिसी ने सभों को दबोचा हुआ था लेकिन हौसले जवान थे. रात के आख़िर होते होते सब ख़ाब--ख़रगोश के मज़े ले रहे थे. पौ फटी, साहिर ने हमीद के सामने ये हसीन राज़ अयाँ किया कि उस के पास दो रुपये हैं. सालिम दो रुपये. दोनों दोस्तों ने रेलवे स्टेशन का रुख किया जहां चाय और सिगरट, दोनों ही का बंदोबस्त था.

Monday, February 2, 2015

इन्सान की इस जिल्लत से परे शैतान की जिल्लत क्या होगी


सका लहू है कौन मरा

– साहिर लुधियानवी

धरती की सुलगती छाती के बैचेन शरारे पूछते हैं
तुम लोग जिन्हे अपना न सके, वो खून के धारे पूछते हैं

ये किसका लहू है कौन मरा
ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

ये जलते हुए घर किसके हैं
ये कटते हुए तन किसके है,
तकसीम के अंधे तूफ़ान में
लुटते हुए गुलशन किसके हैं,
बदबख्त फिजायें किसकी हैं
बरबाद नशेमन किसके हैं,

कुछ हम भी सुने, हमको भी सुना.
ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

किस काम के हैं ये दीन धरम
जो शर्म के दामन चाक करें,
किस तरह के हैं ये देश भगत
जो बसते घरों को खाक करें,
ये रूहें कैसी रूहें हैं
जो धरती को नापाक करें,

आँखे तो उठा, नज़रें तो मिला.
ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

जिस राम के नाम पे खून बहे
उस राम की इज्जत क्या होगी,
जिस दीन के हाथों लाज लूटे
उस दीन की कीमत क्या होगी,
इन्सान की इस जिल्लत से परे
शैतान की जिल्लत क्या होगी,

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा



Saturday, October 19, 2013

चलो दिलदार चलो - ग़ुलाम मोहम्मद की याद


“ये बस्ती है मुर्दापरस्तों की बस्ती” – साहिर लुधियानवी.
ता ज़िन्दगी आदमी इस मुगालते में जीता है कि उसकी इच्छें पूरी होंगी, लेकिन आखिरकार वह खाली हाथ यहाँ से चला जाता है. उसके मर चुकने के बाद लोगों को उसकी कीमत समझ में आ पाती है, अगर वह तकदीर वाला हुआ तो. महान संगीत निर्देशक गुलाम मोहम्मद की भी यही नियति रही. समूची ज़िन्दगी संगीत पर वार देने के बावजूद उन्हें कुछ मिला नहीं. भारतीय सिनेमा की भ्रष्ट और कीच्भारी राजनीति के एक बड़े शिकार ग़ुलाम मोहम्मद भी थे.
संगीत प्रेमियों के कानों में ‘पाकीज़ा’ के गीत आज भी किसी ताज़ा हवा की मानिंद तेरा करते हैं. “चलो दिलदार चलो”, “इन्हीं लोगों ने ले लीना” और “चलते चलते मुझे कोई मिल गया था” भारतीय सिनेमा संगीत के मील के पत्थरों में शुमार होते हैं. ‘पाकीज़ा’ में दिया गया ग़ुलाम मोहम्मद का संगीत अब अमर हो चुका है.
ग़ुलाम मोहम्मद को संगीत विरासत में मिला था उनके वालिद नबी बख्श एक मशहूर तबलानवाज़ थे. पिता-पुत्र की जोड़ी ने अलबर्ट थियेटर में असंख्य बार परफ़ॉर्मेंस दी थीं. ग़ुलाम मोहम्मद को इस थियेटर में पक्की नौकरी मिलते ही अलबर्ट थियेटर की माली हालत डगमगा गयी और उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. अब उन्होंने एक कम्पनी के ऑर्केस्ट्रा में काम हासिल किया. आखिरकार १९२४ में ग़ुलाम मोहम्मद बंबई चले आए. आठ साल के संघर्ष के बाद उन्हें सरोज मूवीटोन्स प्रोडक्शन की ‘राजा भर्तृहरि’ में काम करने का अवसर मिला. उनके काम को पहचाना गया और वे लोकप्रिय हुए. उन्होंने अनिल बिस्वास और नौशाद सरीखे संगीत निर्देशकों के साथ काम किया. ‘संजोग’ से लेकर ‘आन’ तक वे नौशाद के असिस्टेंट रहे. नौशाद के संगीत में उनके बजाए तबले और ढोलक के पीसेज़ एक तरह से मोटिफ़ का काम करते थे.

‘आन’ के बाद ग़ुलाम मोहम्मद ने स्वतंत्र काम करना शुरू कर दिया. ‘पारस’, ‘मेरा ख्वाब’. ‘टाइगर क्वीन’ और ‘डोली’ जैसी फिल्मों से ग़ुलाम मोहम्मद ने अपनी जगह बनाना शुरू किया. उन्होंने ‘पगड़ी’, ‘परदेस’, ‘नाजनीन’, ‘रेल का डिब्बा’, ‘हूर-र-अरब’, ‘सितारा’ और ‘दिल-ए-नादान’ में भी संगीत दिया. अगर उनकी धुनों को सरसरी सुना जाए तो उनमें एक तरह का दोहराव नज़र आता है पर संजीदगी से सुनने पर उनके गीतों की खुसूसियत ज़ाहिर होना शुरू करती है. उनकी उत्कृष्टता के नमूनों के तौर पर ‘कुंदन’ का गाना “जहां वाले हमें दुनिया में क्यों पैदा किया ...” और ‘शमा’ का “दिल गम से जल रहा है पर धुआँ न हो ...” के ज़िक्र अक्सर किया जाता है.
फ़िल्मी गीतों में मटके को बाकायदा एक वाद्य की तरह प्रयोग करने वाले ग़ुलाम मोहम्मद पहले संगीतकार थे. ‘पारस’ और ‘शायर’ फिल्मों के गीतों में इनका स्पष्ट प्रयोग देखा जाता है.
फ़िल्म ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ के लिए उन्हें राष्ट्रपति सम्मान दिया गया. सिचुएशन-फ्रेंडली धुनें बनाना ग़ुलाम मोहम्मद की विशेषता थी.
लेकिन उनका सबसे बड़ा शाहकार थी ‘पाकीज़ा’. बदकिस्मती से यह फ़िल्म उनकी मौत के बाद जाकर रिलीज़ हो सकी.


Sunday, September 1, 2013

विभाजन और मंटो और साहिर और ... महिंद्रा की विलिस



... पिछले कुछ सालों में मंटो ने वह इज़्ज़त प्राप्त कर ली है जिस से उन्हें जान बूझ कर तब महरूम रखा गया था जब वे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से लाहौर में बिखर रहे थे – उस मृतलोक में जो बम्बई की उस अनैतिक और जघन्य दुनिया से इतना मिलता-जुलता था जिसके बारे में उन्होंने बहुत लिखा था.

तिरालीसवीं सालगिरह से पहले ही मंटो की मौत हो गयी थी. अल्कोहोलिज्म ने उन्हें उतना ही तबाह इंसान बना दिया था जितना ग़रीबी ने और अश्लीलता के उन मुकद्दमों ने जो पाकिस्तान की नई सरकार के दकियानूसी और प्रतिहिंसक एस्टैब्लिश्मेंट ने उन पर थोप रखे थे. सच तो यह है कि ब्रिटिश भारत में भी उन पर ऐसे ही मुकद्दमे चले थे हालांकि हरेक बार उनकी रिहाई बड़ी कीमतों पर हुई थी ख़ास कर आख़िरी मुकद्दमों में.  

पाकिस्तान जाने से पहले और बाद के मंटो के काम की पिकासो के पिंक और ब्लू पीरियड्स से समानता नज़र आती है. मंटो का पिंक पीरियड १९४० के दशक के बंबई में था जबकि ब्लू पीरियड पाकिस्तान में जब उन्होंने “तीखे ब्लेड जैसे चुभने वाले कंटीले” विभाजन की पाशविक छवियों को काग़ज़ पर उतारा था.

जहां अब तक यह माना जाता रहा था कि मंटो अपनी महबूब नगरी बम्बई को आसन्न साम्प्रदायिक दंगों की संभावना के कारण छोड़ने पर मजबूर हुए थे, उनकी पोती मशहूर इतिहासकार आयशा जलाल ने उनकी नवीनतम जीवनकथा में स्पष्ट किया है कि ऐसा नहीं था. युवावस्था के अविवेक और मुश्किल सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण मंटो ने सदा के लिए लाहौर में बसने का मन बना लिया था. जलाल का मानना है कि अपने प्रोजेक्ट्स के मुकाबले कमाल अमरोही और शाहिद लतीफ़ की फिल्मों को हिमांशु रॉय के पौराणिक बन चुके बॉम्बे टॉकीज़ में वरीयता दिया जाना उन्हें कतई पसंद नहीं आया था.

जैसा कि आयशा पुष्टि करती हैं ऐसा असामान्य नहीं था. उपेन्द्रनाथ अश्क से हुए एक विवाद के कारण मंटो ने ऑल इण्डिया रेडियो की अपनी नौकरी छोड़ दी थी और “अपना टाइपराइटर लेकर वहां से निकल गए थे.” बम्बई में स्क्रीन-राइटर का उभरता हुआ करियर त्याग कर मंटो १९४८ में पाकिस्तान चले गए थे.

जिस लाहौर में मंटो पहुंचे वहां पहले से ही लुधियाने की एक प्रतिभा का जलवा चल रहा था – वामपंथी शायर साहिर लुधियानवी, जिन्हें कॉलेज से इस अपराध पर निकाल दिया गया था कि वे प्रिंसीपल के बगीचे में एक सहपाठिनी के साथ बैठे थे, और जिन्हें इस बात ने खासी प्रसिद्धि दिला दी थी. साहिर १९४३ में लाहौर गए थे जहाँ वे उर्दू शायरी की एक असाधारण पहचान बनते जा रहे थे. १९४९ में जब ‘सवेरा’ में “भड़काऊ कम्यूनिस्ट लेखन” के कारण उन के नाम वारंट निकला वे भाग कर नई सरहद पार दिल्ली आ पहुंचे. एक बार बंबई आ चुकने के बाद उन्होंने हिन्दी फिल्मों के गीतकार के बतौर बाकायदा राज किया.

जो बम्बई मंटो छोड़ गए थे, वह साहिर को कामयाब बनाने को तैयार बैठी थी. बम्बई में अपनी एंट्री के पहली ही साल वे फ़िल्मी परदे पर गानों के क्रेडिट में अपना नाम डलवा सकने में कामयाब हुए, अलबत्ता उनका जुनून बंगाली जीनियस संगीतकार एस. डी. बर्मन के साथ महेश कॉल की ‘नौजवान’ और गुरुदत्त की ‘बाज़ी’ के बाद चढ़ना शुरू हुआ. कालिख़ भरे संसार में वंचितों के दृष्टिकोण से सहानुभूति रखने वाले गुरुदत्त के विचारों और उन्हें बेहद ख़ूबसूरती के साथ उतारने वाले दत्त के प्रिय सिनेमेटोग्राफ़र वी. के. मूर्ति को साहिर के रूप में एक उपयुक्त गीतकार मिला.

इन्होने मिलकर हिन्दी सिनेमा के मास्टरपीसेज़ बनाए और समाजवादी भारत की अस्तित्ववादी धारणा की सबसे यादगार छवियाँ भी. मंटो और साहिर द्वारा की गयी इन दो सरहदी यात्राओं का दिलचस्प पहलू उन रास्तों में दिखता है जहाँ इनके रचनात्मक करियर्स इन्हें लेकर गए. मंटो का करियर डगमगा गया था – उन्हें शराब की ज़रुरत पूरी करने के लिए संपादकों के केबिनों में जाकर ऑन-द-स्पॉट कहानियां लिखते देखा जाने लगा था.

साहिर की प्रसिद्धि लगातार बढ़ती गयी. १९५० के दशक में वे इतने शक्तिशाली बन गए थे कि संगीत-निर्देशकों की नियति तक तय कर सकते थे. जब उन्होंने जोर देकर कहा कि राज कपूर स्टारर रमेश सहगल की ‘फिर सुबह होगी’ के लिए लिखे उनके गानों को संगीत वही आदमी देगा जिसने दोस्तोवस्की का ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पढ़ रखा हो (फ़िल्म उसी पर आधारित थी), तो निर्माताओं ने शंकर-जयकिशन को हटा कर खैय्याम को लिया. इस तरह ‘फिर सुबह होगी’ ने हिन्दी फ़िल्म संगीत को खैय्याम के रूप में एक असाधारण जीनियस अता फ़रमाया.  

संयोगवश, खैय्याम ने, जो ख़ुद एक पंजाबी थे, जब संगीत निर्देशक के रूप में अपना करियर प्रारम्भ किया था तो वे शर्माजी-वर्माजी नामक एक जोड़ी के हिस्सेदार थे. इस जोड़ी के दूसरे पार्टनर रहमान वर्मा के विभाजन के बाद पाकिस्तान चले जाने के बाद खैय्याम सोलो संगीत निर्देशक बन गए.

ठीक ऐसा ही काम विभाजन पूर्व की महिंद्रा-मोहम्मद जोड़ी ‘महिंद्रा एंड मोहम्मद’ के साथ हुआ था जब महिंद्रा भाइयों को छोड़ गुलाम मोहम्मद पकिस्तान चले गए थे. अकेले छूट गए महिंद्रा बंधुओं ने तब अपनी ऑटो कम्पनी पर ज़्यादा ध्यान दिया जिसके परिणामस्वरूप भारतीय लाइसेंस लेकर विलिस जीप बनाने वाली महिंद्रा एंड महिंद्रा कम्पनी अस्तित्व में आई. गुलाम मोहम्मद पाकिस्तान के पहले वित्तमंत्री बने.


( हरीश नाम्बियार का एक आलेख पिछले महीने की १८ तारीख़ को ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ में छपा था. उस के चुने हुए हिस्सों का हिन्दी अनुवाद  है यह पोस्ट.) 

Thursday, January 24, 2013

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी



१९६० की फिल्म “बरसात की रात”
मूल गीत गाया था मोहम्मद रफ़ी ने.
भारत भूषण, मधुबाला अभिनीत फिल्म के निर्देशक थे पी. एल. संतोषी.
गीत लिखा था साहिर लुधियानवी ने. संगीत रोशन का.

Friday, September 14, 2012

साहिर लुधियानवी का एक इंटरव्यू - २





 (पिछली किस्त से आगे)

"शुरू-२ में आप किन-२ शायरों से मुतास्सिर रहे ?"

"इक़बाल और जोश मलीहाबादी से ."

"अब अगर में ये पूछूं के आप शेर क्यों कहते हो ?"

साहिर ने बड़ी हैरानी से मेरी तरफ देखा (लेकिन न जाने क्यों मुझे लगा के वो मेरी तरफ नहीं देख रहे हैं बल्कि अपबी लम्बी नोकीली नाक से मुझे सूंघ रहे हैं ) . एक बार फिर कुर्सी पर बैठते हुए बोले, "मेरी राय में हर शख्स का जो पेशा होता है उस में उसके शौक़ और ज़रुरत शामिल होते हैं, कभी शौक़ पहले तो कभी ज़रुरत . सियासी और मजाजी मसलों से तआल्लुक का सवाल बाद में पैदा होता है . वतनपरस्ती और फ़र्ज़ के बाद मुझे अपनी ज़िन्दगी का एक हिस्सा ज़िन्दगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए फ़िल्मी शायरी की नज़र करना पड़ा . इसके साथ-२ ज़िन्दगी के कई अच्छे-बुरे हादसों की याद को महफूज़ रखने के लिए भी मेरा दिमाग़ शायरी करने को मजबूर हो जाता है . "

ये सुन कर मुझे उनका एक और शेर याद आ गया -

दुनिया ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है, वो लौटा रहा हूँ मैं


"आप शेर कहते किस तरह हैं ?'

इस के जवाब में साहिर अपने चेचक भरे चेहरे को सहलाते हुए बोले, "कई बार, कोई ज़ाती हादसा या अवामी मामला दिमाग़ पर इस तरह हावी हो जाता है की शेर के बगैर उसकी एनालिसिस मुमकिन नहीं होती . उस वक़्त किसी ख़ास माहौल की भी ज़रुरत नहीं होती .

ऐसी हालत में कोई चीज़ रुकावट नहीं डालती, अलबत्ता फ़िल्मी गाना लिखने के लिए दरवाज़ा बंद करके, कमरे में टहल-२ कर और शऊरी तौर पर अपने आप को गीत के अहसास के दरमयान रख कर, माहौल और किरदार की नफ्सियाती कैफ़ियत को सांचे में ढाल कर शेर कहता हूँ, गीत लिखता हूँ ."

"अच्छे शेर की आपके मुताबिक क्या तारीफ़ है?"

"ख़ूबसूरत, सच्चा और फायदेमंद होना चाहिए ."

"क्या आप इल्म-ऐ-अरूज़ (तुक यानी बहर का ज्ञान) से वाकिफ हैं और क्या इस की सूझ-बूझ शायरी के लिए ज़रूरी है ?"

"मैं खुद इल्म-ऐ-अरूज़ से नावाक़िफ हूँ, ऐसी हालत में, मैं अरूज़ का जानना ज़रूरी कैसे समझ सकता हूँ . लेकिन ये ज़रूर कहूँगा के अगर एक अच्छा शायर अरूज़ से वाक़िफ हो तो ये उसकी शायरी के लिए ज्यादा अच्छा है ."

"आपकी ज़िन्दगी का कोई ऐसा वाकया, जिसने आप की शायरी पर गैर-मामूली असर डाला हो "

"बहुत से छोटे-बड़े वाकिये हैं, किसी खास वाकिये का इंतेख़ाब नामुमकिन है "

"आप इस सदी का सबसे बड़ा शायर किसे मानते हैं ?"

"नज़रयाती इख्तेलाफ़ (मतभेद) के बावजूद 'इक़बाल' को "

"उर्दू के मौजूदा शायरों में से आप को ख़ास तौर पर कौन सा शायर पसंद है ?"

"मुश्किल ये है, के हमारे ज़माने के शायरों में से ज़ाती पसंद को अलेहदा करने की बुनियाद क्या हो ? मेरे ख्याल से फ़नकार की शायरी के इलावा उसकी शख्सियत उसे दूसरों से अलग करती है . फिर भी मुझे फैज़ अहमद ‘फैज़' सब से ज़्यादा पसंद हैं .

"उर्दू के जदीद शायरों में से क्या कोई शायर ज़िक्र करने लायक है ?"

"नरेश कुमार ‘शाद’ ."

साहिर ने संजीदगी के साथ जवाब दिया, मैंने हँसते हुए कहा:-

"हौसला-अफज़ाई के लिए शुक्रिया, पर ज़रा और संजीदगी के साथ बताईये . मेरा मतलब है के थोडा साफ़गोई से काम लीजिये और किसी की हक़-तलफ़ी नहीं होनी चाहिए ."

साहिर ने अपनी लम्बी-२ अँगुलियों को लहराते हुए कहा :

 "मैं अपनी राय पहले भी ज़ाहिर कर चूका हूँ, सबूत की ज़रुरत हो तो कुंवर महिंदर सिंह बेदी से पूछ लो ."

अपने ज़िक्र को जान बूझ के बीच में ही छोड़ते हुए मैंने दूसरा सवाल पुछा:-

"अभी तक, आपकी अपनी नज़्मों में से, सबसे पसंदीदा नज़्म कौन सी है ?"

साहिर ने सिगरेट का एक लम्बा कश लेते हुए कहा, "अलग-२ वक़्त पर, अलग-२ नज़्में पसंद रही हैं"

"मिसाल के तौर पर इस वक़्त कौन सी नज़्म?"

"परछाइयाँ ", साहिर ने कुछ सोचते हुए जवाब दिया.

"शेर और शराब का क्या रिश्ता है? क्या शराब शायर के लिए ज़रूरी है?"

"हरगिज़ नहीं, शेर कहने के लिए नशे की कोई ज़रुरत नहीं. नशे की हालत में आम तौर पर अच्छा शेर कहा ही नहीं जा सकता ."

"फिर आप शराब क्यों पीते हो?"

"मैं तो बूट-शर्ट भी पहनता हूँ, हालांकि बूट-शर्ट पहनना शायर के लिए ज़रूरी नहीं ."

"शायरी की बात छोडिये, आपके शराब पीने की वजह क्या है ?"

 "मैं शराब नहीं पीता था, जब शराब बंदी हुई थी तब भी नहीं . बाद में लो ब्लड-प्रेशर की वजह से मुझे तकरीबन ३-४ साल शराब पीनी पड़ी, जिस से मुझे बहुत फायदा भी हुआ . अब मैं इसका आदी हो गया हूँ और रात को शराब पिए बगैर अच्छी नींद भी नहीं आती . "

"शायरी के साथ-२ आप अदब के किस-२ रूप में दिलचस्पी रखते हैं ?"

"पढने की हद तक अदब के हर रंग को पसंद करता हूँ लेकिन, ..."

साहिर ने अपनी अंगुलियाँ बालों में फिराते हुए कहा:

".. मैंने शुरूआती दिनों में कुछ कहानियाँ भी लिखीं थीं और बाद में कुछ तन्कीदी मज़मून भी ."

"क्या हमारा मौजूद अदब वाकई जमूद (स्थिरता) का शिकार है ?"

"जमूद हरक़त की ज़िद है . अदब में हरक़त तो है, बहुत कुछ लिखा भी जा रहा है, ये बात अलेहदा है के वो उस कैफ़ीयत और सिफ़त का नहीं है ."

"आपका सियासी नज़रिया क्या है?"

"मैं कभी किसी सियासी पार्टी का मैम्बर नहीं रहा . गुलाम हिंदुस्तान में आज़ादी के अच्छे पहलू तलाश करना और उनको अवाम तक पहूंचना मेरा अहम काम ज़रूर रहा . अब दिमागी तौर पर इक्तेसादी (आर्थिक) आज़ादी का हामी बेशक हूँ, जिसका वाजेह (स्पष्ट) ढांचा मेरे सामने कम्यूनिज़्म है . "

"आपके ख्याल के मुताबिक, हिंदुस्तान में उर्दू का मुस्तकबिल क्या है?"

साहिर ने हिकमत भरा अंदाज़ इख्तेयार करते हुए कहा, "उर्दू ज़बान के मुस्तकबिल को हिंदुस्तान के मुस्तकबिल से अलग नहीं किया जा सकता . हिंदुस्तान एक तरक्की पसंद मुल्क है और उर्दू जुबां एक तरक्की-याफ्ता जुबां . इसलिए उर्दू का वही मुस्तकबिल है जो हिंदुस्तान का . जिस रफ़्तार से तअस्सुब और तंग-नज़री में कमी आएगी, उसी रफ़्तार से मुल्क और उर्दू आगे बढेंगे . "

"अब तरक्की-पसंद अदब की तहरीक के बारे में कुछ फरमाईये?"

"मैं समझता हूँ के तरक्की-पसंद तहरीक ने अदब और मुल्क की बहुत खिदमत की है, पर इस से इनकार नहीं किया जा सकता के इस से कुछ गलतियाँ भी हुई हैं, लेकिन जो लोग इस की सिर्फ ख़ामियां ही गिनाते हैं में उन से इतेफाक़ नहीं रखता . "

"लेकिन ये तो आप भी मानते हो के इस का शीराज़ बिखर चुका है?"

"जी हाँ, इस की मैनेजमेंट अब कायम नहीं ".

"कुछ लोग ये भी बातें करते हैं के ये तहरीक कुछ लोगों का शौहरत हासिल करने का और एक दूसरे की तारीफ करने का जरिया है, इस के ज़रिये सभी ने अपना उल्लू सीधा किया है " .

"लोग कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे"

मुझे उम्मीद थी के मेरी इस सवाल के जवाब में साहिर अपना एक मिसरा पढ़ के पीछा छुड़ाने की कोशिश करेंगे, लेकिन मेरी उम्मीद से उलट उन्होंने बर्दास्त करते हुए ये कहना शुरू किया:-

"ऐसी कोई बात नहीं है. इस तहरीक के कार-कूनों ने बहुत कुर्बानियां दी हैं, तकलीफें झेली हैं . ये बात बेशक सच है के ये लोग एक दूसरे की शौहरत में इज़ाफा करने से नहीं चुकते थे . इस की वजह मोआशरे (समाज) और अदब के गलत रुझान के खिलाफ उनका नज़रियाती इत्तेहाद (एकता) था . अब जो तहरीक में बोहरां (संकट) पैदा हुआ है और इस का सबब ये है के जिन वजहों से सरमायेदारी के खात्मे के लिए समाजवाद का तसव्वुर किया गया था, उस में भी शख्सी आज़ादी और कुछ दूसरे मुआमले में अमली कमियाँ महसूस की गयीं ."

मैंने गुफ्तगू का मौज़ू बदलते हुए कहा, "फ़िल्मी शायरी, ख़ास तौर पर आपकी अपनी फ़िल्मी-शायरी के बारे में क्या राय है?"

"अदबी शायरी के लिए भी शुरूआत में रवायती शायरी करनी पड़ती है . उस के बाद शायर अपने मन-पसंद तरीके से शायरी करता है. शायरी के उसूल शायर की पुख्ता शायरी से बनाये जाते हैं, रद्द-ओ-बदल का दायरा थोडा बड़ा करना पड़ता है . मैंने भी शुरुआत में फ़िल्मी दुनिया की रवायत से मेल खाती शायरी की, लेकिन जब मैंने अपने लिए इस दुनिया में जगह बना ली तो अपनी शर्तों पर ही काम किया और खुद इंतेखाब की फिल्मों के लिए ही लिखा . इस तरह में आसानी से अपनी शायरी के ज़रिये अपने ख्यालात और जज़्बात भी कह पाया . फिल्मों के इस पहलू को भी नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता के ये अपने ख्यालात और जज़्बात को ज़ाहिर करने का सबसे ताक़तवर तरीका है . "

"अब आप ये बताएं के पुराने फ़िल्मी शायरों में से कौन सा शायर आपको सब से ज्यादा पसंद है ?"

"आरज़ू लखनवी ."

"और आजकल के शायरों में से ?"

साहिर के भरे हुए चेहरे पर हलकी सी परेशानी दौड़ी लेकिन, जल्द ही उन्होंने संभल कल मुस्कुराते हुए कहा, "बात ये है कि मैं फिल्म रायटर एसोसियेशन का सदर हूँ, इस लिए इस सवाल का जवाब देना मेरे लिए मुनासिब नहीं है . क्योंकि सदर की हैसियत से, सब फ़िल्मी शायरों को एक ही नज़र से देखना मेरा फ़र्ज़ है ."

अचानक मुझे साहिर की पुरानी नज़्म का एक शेर याद आ गया .

तुम में हिम्मत हो तो दुनिया से बगावत कर दो
वरना माँ बाप, जहाँ कहते हैं शादी कर लो

"इस का जवाब देना तो आप न-मुनासिब ख्याल नहीं करोगे ?", मैंने कुछ झिझकते हुए पुछा, "आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की?"

उम्मीद से उलट इस सवाल को सुन कर साहिर कुछ चौंक से गए और फिर अपनी आदत के मुताबिक सवाल को हंसी में टालते हुए जवाब दिया, " क्योंकि कुछ लड़कियां मेरी तरफ देर से पहुंची और कुछ लड़कियों तक मैं देर से पहुंचा."

हम दोनों मुस्कुराने लगे और फिर मैंने कहा, "बहुत अच्छा साहिर साहब ! मुझे अब इजाज़त दीजिये, क्योंकि में बंबई में अपनी रिहाईश पर वक़्त से पहूंचना चाहता हूँ."

Thursday, September 13, 2012

साहिर लुधियानवी का एक इंटरव्यू - १


ज़माने भर के महबूब शायर साहिर लुधियानवी (१८ मार्च १९२१ - २५ अक्टूबर १९८०) का यह इंटरव्यू उनकी मौत के काफी अरसा पहले जनाब नरेश कुमार 'शाद' ने लिया था. एक बार फिर उसे यहाँ कबाड़खाने पर पेश किया जा रहा है.

इंटरव्यू की भूमिका बांधते हुए शाद लिखते हैं -

"नए ज़माने के शायरों में जनाब साहिर लुधियानवी साहब एक ऊंची हैसियत रखते हैं. अहसास, शिद्दत और जज़्बे की सच्चाई इन की शायरी के बुनियादी हिस्से हैं . इन के दो टूक और रोशन अंदाज़-ऐ-बयाँ ने इन की शायरी को एक नया रूप रंग और निखार बख्शा है . इन की पुर-ख़ुलूस शायरी आज के हिन्दुस्तानी नौजवान के ज़हनी उतार-चढ़ाव की कहानी है . अपने महबूब शायर फैज़ अहमद ‘फैज़' की तरह साहिर ज़हनी तौर पर एक इन्क़लाबी और रूमानी शायर हैं, इसीलिए इनके इश्क का जज़्बा एक इंकेलाबी जज़्बा है"


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शाद - आप की पैदाइश कब और कहाँ की है ?

"मैं कब और कहाँ पैदा हुआ ?" मेरे इस सवाल को दांतों और होठों के दरम्यान दोहराते हुए, साहिर हंस के कहने लगे, "मेरे प्यारे दोस्त, ये तो बड़ा ही रवायती सवाल है, इस सवाल को थोडा आगे बढ़ाते हुए इस में थोडा इज़ाफा और कर लो, के क्यों पैदा हुआ ?"

मैंने जान बूझ के अपने आपको शांत और उनके जवाब से बे-असर रखते हुए पुछा . "आपकी खुश-मिजाज़ी दुरुस्त है, लेकिन साहिर साहब, इस का सहारा लेते हए आप हम गरीब इंटरव्यू लेने वालों का मज़ाक कैसे उड़ा सकते हो ?"

साहिर मन-ही-मन में मुस्कुराते और सिगरेट का पैकेट मेरी तरफ करते हुए बोले, "सन १९२१ में लुधियाने में"

मुझे कुछ तसल्ली हुई और मैंने सिगरेट के पैकेट से एक सिगरेट निकालते हुए कहा, "आपकी तालीम कहाँ से और कहाँ तक हुई है?"

"बी. ए. नहीं कर पाया, गवर्नमेन्ट कॉलेज लुधियाना और दयाल सिंह कॉलेज दोनों से निकाला गया था ", ऐसा कहने से मानो साहिर के लहज़े में जैसे फ़ख्र और ख़ुद-यकीनी की लहर दौड़ गयी .

"..अब इन कॉलेजों को मुझ पर नाज़ है की मैं इन कॉलेजों का तालिब-ए-इल्म रहा, लेकिन मुझे वहां से निकाले जाने का अफ़सोस किसी को नहीं है ."

इस ज़िक्र पर मुझे साहिर साहब की वो 'नज़र ऐ-कॉलेज' याद आ गयी -

ऐ सरज़मीन-ए-पाक़ के यारां-ए-नेक नाम
बा-सद-ख़ुलूस शायर-ए-आवारा का सलाम
ऐ वादी-ए-जमील मेंरे दिल की धड़कनें
आदाब कह रही हैं तेरी बारगाह में
तू आज भी है मेरे लिए जन्नत-ए-ख़याल
हैं तुझ में दफन मेरी जवानी के चार साल
कुम्हलाये हैं यहाँ पे मेरी ज़िन्दगी के फूल
इन रास्तों में दफन हैं मेरी ख़ुशी के फूल
तेरी नवाज़िशों को भुलाया न जाएगा
माजी का नक्श दिल से मिटाया न जाएगा ...

"अच्छा, अब आप ये बताएं के आप अब्दुल हई से साहिर लुधियानवी कब बने?"

"१९३५ में दसवीं के इम्तेहान के बाद और नतीज़ा निकलने से पहले, जब में बिलकुल बेकार था ."

"आपका सबसे पहला शेर कौन सा था?”

"याद नहीं, शायद याद रखने जैसा भी नहीं है"

"आपने अपनी शायरी के शुरूआती दिनों में किस से इस्लाह ली?”

"किसी से नहीं?", फिर अचानक शायद साहिर साहब को कुछ याद आ गया, और कहने लगे, " हाँ, ऐसा ज़रूर हुआ है के मैं अपनी सब से पहले नज़्म इक दोस्त के ज़रिये अपने स्कूल के टीचर 'फैयाज़' हरियाणवी से उनकी राय जानने के लिए भेजी थी. "

"तो उन्होंने क्या राय दी?”

"यही के शेर अच्छे और वक़्त के मुत्तालिक हैं, पर पूरे तौर पर नज़्म मामूली है." इतना कहने पर साहिर ने अपने ख़ास और बड़े दिलकश अंदाज़ में कहा, "ज़ाहिर है के उस वक़्त मेरे लिए इतना ही काफी था के मेरे शेर उम्दा और समकालीन हैं."

"आपने अपना तख़ल्लुस 'साहिर' ही क्यों इंतेख़ाब किया ?"

कुर्सी से उठकर साहिर साहब कमरे में यहाँ वहां टहलने लगे और बोले, "क्योंकि कोई न कोई तख़ल्लुस रखने का रिवाज़ था, इसलिए मैं अपनी स्कूल की किताबों के वर्क उलट-पलट कर उस मौजूं लफ्ज़ की तलाश में था जिसे में अपना तख़ल्लुस मुक़र्रर कर सकूं . अचानक मेरी नज़र एक शे’र पर पड़ी जो इक मर्सिये का था जिसे 'इकबाल' ने 'दाग़' के लिए लिखा था -

इस चमन में होंगे पैदा, बुलबुल-ऐ-शीराज़ भी
सैंकड़ों साहिर भी होंगे, साहिब-ऐ-एजाज़ भी 

मुझे अपनी शायरी को लेकर कभी कोई गलत-फहमी नहीं रही और में भी अपने आप को सैंकड़ों शायरों में से एक शुमार करता हूँ . इसलिए अपने लिए मुझे 'साहिर' तखल्लुस मुनासिब लगा."

(जारी)