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Thursday, June 15, 2017

इसीलिये मैं पक्षधर हूँ जीवन की - स्वाति मेलकानी की कविताएं - 7


तुम और मैं

तुम
एक विशाल आकाश हो
बड़े से बड़े
ग्रह और नक्षत्र भी
तुम में समाकर
ओझल हो जाते हैं
इसीलिए शायद
तुम रह पाते हो
तटस्थ
निष्पक्ष
और अक्षुण्ण

पर मैं,
निरंतर
अपने ही पैरों तले
पाताल की विभीषिका को
उद्घाटित करती
वह गतिशील धरती हूँ
जिसमें समाकर
सूक्ष्मतम् बीज भी
अपनी जड़ें जमा लेता है.

मुझमें कुछ नहीं खोता
मैं एकत्र करती हूँ
स्वयं के भीतर
उन सुप्त खदानों
और मूक झरनों को
जो समय-असमय
तुम्हारे द्वारा
खोज लिये जाने को
प्रस्तुत रहते हैं.

इसीलिये
मैं पक्षधर हूँ
जीवन की
सुख और दुःख की
हर्ष और विषाद की

मैं
तुम्हारी तरह
निर्लिप्त रहकर
विजयी मुस्कान धारण नहीं कर सकती.

मुझे
प्रेम और विरह
दोनों पर मान है
मैं भी जीवित हूँ वर्तमान में
किन्तु मुझमें

भूत अब तक प्राणवान है.

Wednesday, June 14, 2017

तुम्हारा होना मेरे होने का प्रमाण है - स्वाति मेलकानी की कविताएं - 6


अनंत की कड़ियां
-स्वाति मेलकानी 

अब पड़ने लगी हैं
मेरे चेहरे पर सिलवटें
और तुम्हारा चेहरा
कली सा खिलता है.

मेरे घुटनों में थकान के कंपन हैं
और तुम्हारे पैर
दौड़ने की तैयारी कर चुके हैं
भोर के शुभचिन्हों से
भरे हैं तुम्हारे हाथ
और मैं
सूर्यास्त की सुन्दरता को
समेटना चाहती हूँ.


मेरी बेटी
तुम एक
अद्भुत जीवन को
अनावृत करने वाली हो
और मैं
एक भरपूर जिंदगी के
अहसास से भरी हूँ

तुम्हें पाना है बहुत
और मैं गिन रही हूँ
वह सब
जो रह गया शेष


तुम्हारी आंखों से
मेरी आंखें
आने वाले कल में उतरती हैं.

तुम्हारा होना
मेरे होने का प्रमाण है
तुम हो
क्योंकि मैं थी.

तुम रहोगी
क्योंकि मैं हूँ
मैं और तुम

अनंत की कड़ियां हैं.

Tuesday, June 13, 2017

मुक्त करती हूँ - स्वाति मेलकानी की कवितायेँ - 6


मुक्ति
- स्वाति मेलकानी

जानती हूँ
यह नहीं है प्रेम की परख
कि तुम प्रस्तुत रहो सदा
जब भी मुझे
तुम्हारी आस हो.
या कि मैं बिछ जाऊँ
आँख मूँदकर चलते
तुम्हारे कदमों तले.
इसीलिए आज
मैं मुक्त करती हूँ
तुम्हें और स्वयं को
अपेक्षा और उपेक्षा के
सभी दुर्निवार अवसरों से. 

Monday, June 12, 2017

जंगल में एक और ट्रेन आकर रूकी है - स्वाति मेलकानी की कविताएं - 5


जंगल
- स्वाति मेलकानी

पहाड़ से जंगल कटे
और शहर में उगने लगे.
जंगल
सिर्फ पेड़ों के नहीं होते
ठीक उसी तरह 
जैसे
जंगली नहीं होते
सिर्फ जानवर.

शहर ढकने लगा है
फैलते जंगल से.
सूरज की
आधी अधूरी रोशनी को
झपटने के लिए
हजारों बेलें
पेड़ों को कसती हुई
बेतरतीब बढ़ती जाती हैं.

जंगल फैल रहा है
एक मजबूत जाल की तरह
जिसमें फँसी हुई मछलियाँ
सांस भर हवा के लिए
एक दूसरे के ऊपर
चढ़ती उतरती
लड़ती
या मरती हैं.

ऊँघते शहर में
धुंध से बैचेन
करोड़ों तारों की
चीखें सुनाई पड़ती हैं
और
एक बेजान खामोशी से
भरी हुई रात
घिसटती रेंगती
खत्म हो जाती है
फैक्ट्रियों के सायरन के साथ.

अलस्सुबह
जंगल में
एक और ट्रेन आकर रूकी है.
अनगिनत मुसाफिर
धरती सी गठरियाँ लादे
अपने पहुंचने लायक
जगहों को तलाशते हैं.

जंगल कहीं नहीं ठहरता
कई-कई सड़कों पर
बे-रोक टोक
दौड़ता रहता है ...
और इस जंगल में
रास्ता भटक जाना
एक बेहद मामूली बात है
जिसका जिक्र करना
महज
वक्त की बर्बादी है.
वही वक्त
जो हमेशा
जरूरत से कम पड़ जाता है
शहर के जंगल में.

Sunday, June 11, 2017

हम थक गये हैं और सोना चाहते हैं - स्वाति मेलकानी की कविताएं - 4


यूरोप में शरणार्थी
- स्वाति मेलकानी

जब समुद्र के किनारे
एक बच्चा मरा हुआ मिलता है
तब समुद्र शान्त रहता है
और कोई सुनामी नहीं आता.

जब ट्रेन से धकेलकर
लोग फेंके जाते हैं
तब दुनिया की
तमाम रेलगाड़ियां
बिना रूके चलती रहती हैं.

जब मनुष्यों के
भीतर घुस आने के डर से
कंटीले तारों की बाड़ें लगाई जाती हैं
तब जमीन पर उगा
हर बबूलनागफनी और गुलाब
अपने बदन के काँटों पर
शर्मिंदा नहीं हो उठता.

जब पटरियों पर
बच्चे लेट जाते हैं
और उनकी मांएँ
भूख से बेहोश होकर
गिर पड़ती हैं
तब
कहीं एक शराबी
नशे में धुत होकर
निर्वस्त्र औरतों पर नोट फेंकता है.

जब
मृत शरीरों को नोचने के लिये
गिद्ध न मिलते हों
और लकड़ी कम पड़ने पर
प्लास्टिक के ताबूत बनाने पड़ें
ठीक उसी वक्त
हम आसमान देखकर
एक ठन्डी आह भरते हैं
और
दोपहर से
रात के बीच का फासला
हमें लम्बा महसूस होता है.

लौटती लहरों के साथ
वह आये
ऑक्टोपसों के बीच से
पैर बचाते हुए
हम एक और दिन
रात होने से पहले
घर लौट आते हैं ...

कि हम थक गये हैं
और सोना चाहते हैं
कयामत आने में
अब भी वक्त है. 

Saturday, June 10, 2017

यह समय गूंगों के आगे अकड़ता है - स्वाति मेलकानी की कविताएं - 3

मार्ड इस्सा की पेन्टिंग 'द वेस्टलैंड ऑफ़ होप'

यह समय

यह समय
जो चल रहा है
धमनियों में रक्त
अब बहता नहीं है एक गति से
अनियंत्रित होकर
टकराता है दीवारों से ...
फटने को तैयार
फूली हुई शिराएँ
झांकती हैं
चमड़ी से बाहर.

धूप तेज है
निकलने से पहले ही
सूख जाता है पसीना.
बचे खुचे पेड़
अब छाया नहीं देते
वे तो बस
एक मजबूती खूँटी हैं
कर्ज में डूबे
किसानों के
गले की फाँस बनने को.

इस समय में
भूख है, प्यास है, सूखा है ...

इस समय में
बाढ़ है, भीड़ है, बातें हैं ...
अल्जाइमर और अवसाद से घिरा
यह समय
ओबेसिटी और कुपोषण
साथ-साथ झेलता है.
कैलोरी बर्नकरने को
ट्रैडमिलमें चलता है.
अंत्योदय कार्ड लिये
धूप में पिघलता है ...

यह समय
गूंगों के आगे अकड़ता है.
बदन को मिट्टी छुए
तो झगड़ता है.
चांद के सपनों पे जाकर
अटकता है.
टपकते नल के ऊपर
झपटता है.

यह समय
अपनी ही जमीन पर
झूलता हिलता मटकता
लटकता है.
यह समय
अपने ही घर में भटकता है.
अब गिरा
वो तब गिरा
ठोकर लगी
फिर बच गया
डग-मग,
डग-मग
गड-मड
गड-मड.

Friday, June 9, 2017

हवा में तुम्हारा भी हिस्सा है - स्वाति मेलकानी की कविताएं - 2

एक खिड़की
- स्वाति मेलकानी 

एक ऐसी खिड़की
जरूर बनाना घर में
जो
तुम्हारी पहुँच में हो
और
जिसे तुम
अपनी मर्जी से खोल सको.

जब
तुम्हारी सांसें
फूलने लगती हैं
तो उस खिड़की से होकर
ताजी हवा
आ सके तुम तक
और तुम
महसूस कर सको
कि हवा में
तुम्हारा भी हिस्सा है.

एक ऐसी खिड़की
जरूर बनाना घर में
जहाँ से झाँककर
धूप तुम्हें देख सके
और
तुम जान सको
कि सूरज तुम्हारा भी है.
जहाँ से चहककर
पक्षी
तुम्हें गीत सुना सकें
और
तुम देख सको
फूलों से खेलती तितलियों को.

यह भी हो सकता है
कि बगीचे में दौड़ती
गिलहरी को देखकर
तुम्हे
थोड़ी हँसी भी आ जाए
और तुम मान सको
कि
हँसी बची है
तुम्हारे भीतर

शायद किसी रात को
खिड़की के बाहर
चमकते तारों के बीच
भरे अंधेरों को
निहारते हुए
तुम्हें
उस बची हुई हँसी के
घर का
रास्ता मिल जाए
और
अंधकार में मुस्काती
तुम्हारी आंखें
दहलीज पर रूठी
सुबह को मनाकर

भीतर ले आएँ.