आज सुबह - सुबह १५ अगस्त , स्वाधीनता के जश्न में शिरकत की और अपने बसेरे को लौटते हुए एक ही शब्द जेहन में गूँजता रहा - आजादी . कितना कुछ लिखा गया है , लिखा जाएगा इस अकेले शब्द के बारे में. आजादी बहुत बड़ी नेमत है . ख़लीक अंजुम और मुज़्तबा हुसैन द्वारा संपादित पुस्तक 'ज़ब्तशुदा नज़्में' से साभार प्रस्तुत है 'जोश' मलीहाबादी के चंद शब्द इस एक अकेले शब्द के बारे में जो सिर्फ शब्द भर नहीं है।सुनो ऐ बस्तगाने -जुल्फ़ें गेती -
निदा क्या आ रही है आसमां से
कि आजादी का इक लम्हा है बेहतर
गुलामी की हयाते जाविदां से
- 'जोश' मलीहाबादी
बस्तगाने -जुल्फ़ें गेती = पृथ्वी के बाल - जाल में फंसे हुए
निदा = आवाज़
लम्हा = क्षण
हयाते जाविदां = अमर जीवन