Friday, December 10, 2010

दुख की घड़ी में हम सब आपके साथ है अशोक भाई…

अभी अजय जी का हिमाचल से फोन आया…कबाड़खाना के माडरेटर भाई अशोक पांडे के पिता जी नहीं रहे…    

इधर कई बार बातचीत में अशोक पिताजी के स्वास्थ्य के बारे में बताते रहते थे।
वह पिछले कुछ समय से काफ़ी बीमार चल रहे थे।


दुख की इस घड़ी में कबाड़खाने का यह पूरा वर्चुअल परिवार आपके साथ है भाई…

एक और नए कबाड़ी का स्वागत

गद्य के इस टुकड़े पर निगाह डालिए


ये बस दो रेगिस्तानी जिला मुख्यालयों को जोडती है जो दिन में शहर और रात में गाँव हो जाते है.सुबह ये शहर का सपना लिए जगते हैं और रात को सन्नाटा लिए सो जातें हैं.इनके बीच सदियों का मौन हैं, सिर्फ कहीं कहीं जीवन तो कहीं इतिहास मुखर हैं.

बस की खिड़की से शहर छूटता दिखाई पड़ता है और इमारतें विदा करतीं हैं अपने शिल्प की ख़ास भंगिमाओं को थोड़ा छोड़ते हुए.

डेढ़ सौ किलोमीटर का फासला और बीच में तीन स्टॉप हैं जिनमें एक पर सवारियां उतर कर चाय भी पीतीं हैं,जैसा की अक्सर लम्बी लगने वाली यात्राओं में होता है.

इसके अलावा बहुत कुछ जनशून्य है.कुछ पेड़ जो अपनी सारी ऊर्जा झोंक कर भी हरे होने के अहसास को ही जिंदा रख पाए हैं.

ऊंटों के बरग अनंत यात्रा और मरीचिकाओं के मिथ्याभास में सत और असत के बीच झूलते हैं.बस के भीतर देखने पर ही जीवन कुछ नज़दीक लगता है,यहाँ पीछे की सीटों पर लोगों से स्थान साझा करते हैं बकरी के शावक.

पहले स्टॉप पर बस रूकती है.कुछ सवारियां उतरती हैं ,एक दो चढ़ती है.

इस जगह में शहर के नज़दीक होने का दर्प है.ये दीगर बात है कि जिसके नज़दीक होने पर वो इतराती है उसे भी कायदे का शहर होने का गुमान नहीं.

बस फिर लय पकडती है. आगे एक मोड़ पर ड्राईवर होर्न बजाता है.सामने से कोई नहीं आ रहा,एक हाजरी-सी दी गयी है लोकदेवता के थान को. किसी अनिष्ट से मुलाक़ात न हो.

बारात वाली बसें तो बसें तो बाकायदा थान पर रुक कर अफीम,सिगरेट या खोपरा अर्पित करतीं हैं।

अगला स्टॉप आ गया है.बाहर एक पुराने किले के खंडहर हैं,उपेक्षित.पास ही गाँव वाले चाय की दूकान पर बातों में मशगूल हैं.उनकी बातचीत का विषय किला न होकर काळ है,जो लगातार तीसरे साल भी छाती पर बैठा है.किले के इतिहास के विषय में कोई नहीं जानता.यहाँ टूरिस्ट नहीं आते इसलिए इतिहास का गाईडी-गड्ड मड्ड संस्करण भी बन नहीं पाया है.लोक स्मृति में कूटल-सकीना की प्रेम कथा का राग ज़रूर बजता है.गडरिये को गाँव के मुखिया की लड़की से प्रेम हो गया था.ये प्रेम गडरिये की मरदाना सुन्दरता से नहीं था,उसके नड बजाने के हुनर से था जो चांदनी रात में रेत के असीम विस्तार को हूरों की दुनिया में तब्दील कर देता था.

बस फिर दौडती है.पूरे रास्ते में किसी गाँव या आदमी का दिखना एक सुखद क्रम-भंग की तरह होता है.स्टॉप से बस का प्रस्थान पीछे छूटते अनजान लोगों के प्रति भारी बिछोह को जन्म देता है.

ये वाला स्टॉप कुछ देर का है. यहाँ चाय पी जायेगी.

चाय के साथ प्याज के पकौड़ियाँ आँख मूँद कर अनुभव करने के चीज़ हैं.गाँव से बड़ी और क़स्बे से छोटी ये जगह जो भी हो प्याज की पकौड़ियों के लिए याद रखी जाने लायक है.सभी घरों में लोग नहीं रहते. कुछ खाली हैं,पुराने. उनमें भूत रहते हैं. इसी गाँव के बाशिंदे जो समय की रेखीय अवधारणा में भूत हैं और चक्रीय अवधारणा में अभी भी प्याज के पकौड़े खाने का इंतज़ार कर रहें हैं.ये ब्राह्मण तेल में खौलते इस हैरत अंगेज़ स्वाद से जबरन वंचित थे.उनके लिए खाद्य-अखाद्य सुनिश्चित था.एक स्व-निर्मित मर्यादा रेखा,अलंघ्य लक्ष्मण रेखा. फांदी न जा सकने वाली कारा-भित्ति. यजमान वृत्ति के लिए इसे तोडना या लांघना फलदायी नहीं था.पर इसके लिए अपना मोक्ष भी स्थगित रखे हुए.

बस रवाना होती है, रफ़्तार पकडती है.

विश्व-ग्राम की चौंध मारती रौशनी से दूर ये बस लगभग रात पड़ते,अँधेरे के स्थाई भाव में जीते अपने गंतव्य में दाखिल होती है.


यह संजय व्यास नाम के एक अति विनम्र व्यक्ति का लेखन है. संजय जोधपुर में रहते हैं. आकाशवाणी में काम करते हैं. अभी कुछ माह पहले उनसे एकाध मुलाकातें भी हुई. उनके घर जाकर उनके परिवार के साथ मिलना हुआ. शानदार राजस्थानी भोजन भी किया गया. उनकी दो प्यारी सी शर्मीली बच्चियां हैं. उन दिनों उनके माता-पिता भी जोधपुर आये हुए थे. हमने दुनिया-जहान की बातें कीं. और मैं उनसे ख़ासा प्रभावित हुआ.

संजय से परिचय ब्लॉग जगत के माध्यम से ही हुआ था. मुझे उनका लेखन भाता है. इधर कबाड़ख़ाने में नयी टीम जोड़ने की कोशिश में लगा हुआ हूँ.

संजय हमारे सबसे नए जोड़ीदार हैं. उनकी आमद यहाँ एक नया जायका पेश करेगी, मैं उम्मीद करता हूँ.

उनके स्वागत में उन्ही के ब्लॉग से उनकी नवीनतम पोस्ट लगा रहा हूँ. कविता ज़बरदस्त है और दिल को छू लेने वाली.


जागने का गीत

इससे पहले कि कल सुबह फिर शुरू हो
कानाफूसियों और दुरभिसंधियों से भरा एक और दिन
और शुरू हो कल ही सुबह
एक बेहतर जीवन की आस में
फिर से थका देने वाली दैनिक यात्रा
मैं जागना चाहता हूँ जी भर इस रात में
देख सकूँ जिससे
अपने बच्चों को सपनों की दुनियां में
डूबते उतराते,लोटते
सिहरते किसी काल्पनिक भय में
या खुश होते, खुश होने जैसी ही किसी बात से.

पढ़ सकूँ शायद जिससे
बरसों से बंद पड़ी किताब
या देख सकूँ कायदे से
माँ पिताजी का
युवावस्था का
पीला पड़ता साझा फोटो
जिसे अब पचास बरस होने को है
हालांकि इसे एकाधिक बार फ्रेम किया जा चुका है.

फ्रेम के कांच को माँ अब भी कई बार साफ़ करती है
और पिताजी डालते हैं इस पर अब भी कई बार
उड़ती सी नज़र
पर कायदे से इसे
कई सालों से देखा नहीं गया है
क्योंकि कुछ सवाल अभी भी अनुत्तरित है
मसलन इसमें पिताजी कि टाई उनकी खुद की थी या
इसे फराहम करवाया गया था
फाइन स्टूडियो के मालिक और फोटो ग्राफर खत्री जी ने
बिलुकल सही सही मौका कौनसा था जब ये
एकमात्र साझा फोटो खिंचवाया गया था
इसमें माँ के गले का हार अब कहाँ है
क्या इसे बेचना पड़ा या
घर में रखा है ये कहीं वगैरा वगैरा.
ऐसे मौलिक सवाल जब अभी भी सवाल है
तो संभावना इस बात की भी है कि सच में इसे
बहुत गौर से और गहन उत्सुकता से
कभी देखा ही नहीं गया है
कम से कम हम लोगों ने
माँ पिताजी ने अलग से
इस पर कभी बात की हो तो
अलग बात है.

जी भर जागना चाहता हूँ इस रात
ताकि थोडा वक्त चुपके से रसोई में जाकर
देख सकूँ कि
असल में क्या है वहाँ जमा किये हुए
डिब्बे डिब्बियों में
और घर के खाने में कौनसे मसाले
अमूमन इस्तेमाल हो रहें है.
या यही देख लूं जिससे कि
पत्नी दिन के आखिर में
तमाम दुश्चिंताओं को
पल्लू से झटक कर या बाँध कर
निर्भार
या कि बोझिल
किस तरह की नींद में
सो रही है आज.

Thursday, December 9, 2010

सितारों से आगे जहां और भी हैं

कुछ दिन पहले हमने उन्मुक्त चन्द ठाकुर के दिल्ली की रंजी ट्रॉफ़ी टीम में बतौर ओपनर चुने जाने और उसकी विकास यात्रा को लेकर एक ख़ासी इमोशनल क़िस्म की पोस्ट लगाई थी.

दिन भर मैं और सुन्दर बीसीसीआई की ऑफ़ीशियल वैबसाइट पर उसके प्रदर्शन पर निगाह लगाए ज़रूरत से ज़्यादा व्यग्र रहे.

आज उन्मुक्त ने हमें मौक़ा दिया है कि एक बार फिर उस के कारनामों को आपके सामने पेश करें.

लवी यानी उन्मुक्त ने आज अपना चौथा प्रथम श्रेणी मैच खेलते हुए दिल्ली के कुल स्कोर २९० के आधे से ज़्यादा यानी १५१ रन ठोके. मैच भूतपूर्व चैम्पियन टीम रेलवेज़ से था. लवी की पारी की बदौलत दिल्ली को ३१ रन की बढ़त मिल गई.

शिखर धवन के साथ ओपनिंग करने निकले उन्मुक्त ने १९ चौके और दो छक्के लगाए. इसके अलावा पिछले तीन मैचों में उसने दो हाफ़ सेन्चुरियां मार कर अपने कैरियर एवरेज को ६३.०० पहुंचा दिया था अब उसका औसत ८५.०० है. इस आक्रामक बल्लेबाज़ को छक्के मारने में महारत है और वह अब तक छह छक्के मार चुका है प्रथम श्रेणी क्रिकेट में.

उसने मार्च में १२वीं का बोर्ड इम्तेहान देना बाक़ी है.

टाइम्स ऑफ़ इन्डिया ऑनलाइन ने अभी अभी उसकी तारीफ़ में एक क़सीदा छापा है. पेश है जस का तस.

Young Unmukt provides slender lead with a splendid ton

NEW DELHI: 17-year old opener Unmukt Chand hit his maiden first-class century as Delhi got a slender lead of 31 runs against city rivals Railways at stumps on the second day of the sixth round Ranji Trophy encounter being played at the Roshanara ground.

In reply to Railways' modest first innings score of 259, Delhi fared marginally better courtesy Unmukt who scored 151 with the help of 19 boundaries and two sixes. The youngster who batted close to seven hours (418 minutes) facing 291 deliveries in the process was the only batsman who was hardly troubled by veterans Jai Prakash Yadav (5/88) and Sanjay Bangar (4/57).

In fact the duo bowled to disciplined line as none of the other Delhi batsmen were even able to cross 40-run mark. Both skipper Shikhar Dhawan and Gaurav Chhabra scored 39 each.

It was young Unmukt, who showed lot of maturity as he notched up his first three-figure mark after having scored half centuries against Saurashtra and Assam in the earlier matches.

He didn't even let the seasoned pros like JP and Bangar dominate him as he hit both for a six each. The first over long-on and the next was over deep mid-wicket.

He was finally out in the last over of the day being the ninth batsman of his team to be dismissed.

"The match is still open. I would term this pitch as a sporting one where both batsmen and bowlers are getting a lot of help. I am happy that we have got the lead and I have been able to contribute for my team," said Unmukt, who is supposed to appear for his XIIth standard board exams next year.

शाबास उन्मुक्त! शाबास सुन्दर!

Wednesday, December 8, 2010

आधी रात को फरिश्ते आकर कविताएं सुना जाते हैं



कल आधी रात को एक फरिश्ता आया. मुझे ढेर सारी कविताएं सुना गया. अभी इस वक़्त बहुत कुछ तो भूल भाल चुका हूँ, ... जो मुझे याद रह गईं हैं, बल्कि परेशान भी कर रही है उन में से एक है महमूद दरवेश की “इतिहास को कविता तरह की मत लिखो”. उस के बाद उस ने आलोक धन्वा की “सफेद रात “ , “गोली दागो पोस्टर”, और “भागी हुई लड़कियाँ” सुनाई. उस ने कहा ‘अजेय भाई मैं शर्मिन्दा हूँ कि आप ने अभी तक आलोक धन्वा को नहीं पढ़ा’ फिर उसने वीरेन डंगवाल की कविताएं सुनाई. शीर्षक याद नहीं रख सका लेकिन वह नदी किनारे का रेतीला लोकेल याद रह गया जहाँ खीरे, लौकियाँ, तरबूज उगाए जाते हैं ... कटरी शायद. हाँ ऐसा ही कुछ था ... जहाँ कच्ची हरियाली के बीच एक लड़्की भी उग रही थी. फिर उस ने अपनी अद्भुत प्रेम कविताएं सुनाई. प्रेम तो आदमी का भी नायाब होता है; फिर एक फरिश्ते का प्रेम कैसा हो सकता है, आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं. उस ने कहा था कि “ मैं इस ऊबड़ खाबड जगह पर तुम्हारे लिए अपनी बाहों का तम्बू तानना चाहता हूँ.”

... मैं जो अभी तक खुद की एक भी प्रेम कविता नहीं लिख सका हूँ, स्तब्ध हो कर उस की कविताएं सुनता रहा. साथ में हम दारू खींच रहे थे.... उस के पास अपनी जॉनी वाकर या सिगल माल्ट जैसी कोई नफीस चीज़ थी. मैं अपनी दारचा वाली दोस्त की भेजी हुई जौ की देसी से काम चला रहा था. हल्के खुमार में हम ने बहुत सी बातें कीं. घर परिवार और तमाम चीज़ें. उस की तेरह वर्षीय बेटी है. पियानो बजाती है. परसों रोम में उस का कंसर्ट है ... वह उमर में मुझ से छोटा निकला. कहने लगा अरे यार तुम तो मेरे दद्दा हो ! मैं सच मुच खुद को अभागा समझ रहा था कि खुद को हिन्दी कवि समझता हूँ और अभी तक आलोक धन्वा और वीरेन डंगवाल को ठीक से नहीं पढ़ा है. खैर , अभी सुबह सुबह अपनी खुशक़िसमती पर इतरा रहा हूँ कि आलोक धन्वा और वीरेन डंगवाल को मैं ने एक फरिश्ते के मुँह से सुना ... लव यू दोस्त!

तुम इसी तरह आते रहना , बे खटके, किसी भी वक़्त. मुझे बड़ी कविताएं सुनाते रहना ... बल्कि बहुत सम्भव है कि तुम्हारे पाठ ने ही उन कविताओं को एक अलग उड़ान दी हो ... बस इसी मनःस्थिति में अपनी तीन दिन पहले लिखी अप्रकाशित कविता कबाड़ खाने पर अपनी पहली पोस्ट के रूप मे सादर लगा रहा हूँ.

ट्रंक मे स्वर्ग वासी माँ की चोलू –बास्कट देख कर

तुम्हारी जेबों मे टटोलने हैं मुझे
दुनिया के तमाम खज़ाने
सूखी हुई खुबानियां
भुने हुए जौ के दाने
काठ की एक चपटी कंघी और सीप की फुलियां
सूँघ सकता हूँ गन्ध एक सस्ते साबुन की
आज भी
मैं तुम्हारी छाती से चिपका
तुम्हारी देह को तापता एक छोटा बच्चा हूँ माँ
मुझे जल्दी से बड़ा हो जाने दे

मुझे कहना है धन्यवाद
एक दुबली लड़की की कातर आँखों को
मूँगफलियां छीलती गिलहरी की नन्ही पिलपिली उंगलियों को चूमना है

दो दो हाथ करने हैं मुझे नदी की एक वनैली लहर से
आँख से आँख मिलानी है हवा के एक शैतान झौंके से

मुझे तुम्हारी सब से भीतर वाली जेब से चुराना है
एक दहकता सूरज
और भाग कर गुम हो जाना है
तुम्हारी अँधेरी दुनिया में एक फरिश्ते की तरह
जहाँ औँधे मुँह बेसुध पड़ीं हैं
तुम्हारी अनगिनत सखियाँ
मेरे बेशुमार दोस्त खड़े हैं हाथ फैलाए

कोई खबर नहीं जिनको
कि कौन सा पहर अभी चल रहा है
और कौन गुज़र गया है अभी अभी
कि कैसी घड़ी आगे खड़ी है मुँह बाएँ ...

सौंपना है माँ
उन्हें उनका अपना सपना
लौटाना है उन्हें उनकी गुलाबी अमानत
सहेज कर रखा हुआ है
जो तुम ने बड़ी हिफाज़त से
अपनी सब से भीतर वाली जेब में !

(सुमनम 05.12.2010)

Tuesday, December 7, 2010

एन ला दीस्तान्सीया तू रेकुएर्दो ... नए कबाड़ी का स्वागत

अभी कुछ दिन पहले मैंने यहाँ नीरज बसलियाल को सबसे युवा कबाड़ी के तौर पर परिचित करवाया था.

आज बीस साल के इक़बाल अभिमन्यु कबाड़खाने से जुड़ रहे हैं. इक़बाल दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्पानी भाषा के स्नातकोत्तर की पढाई में लगे हुए हैं. कुछ समय पूर्व गार्सिया लोर्का पर उन्होंने एक मुश्किल सवाल पूछ कर मुझे हैरत में डाल दिया था. मुझे उम्मीद है उनकी आमद से कबाड़खाने के कंटेंट में गुणोत्तर सुधार होगा और वे हमें स्पानी भाषा के कुछ नगीनों से परिचित करायेंगे.

स्वागत भाई इक़बाल!

इक़बाल के ब्लॉग से उनके गद्य की एक बानगी पेश है:

ऐसे समय में जब गूढ़ को सुन्दर और सरल को गया बीता मानने की परम्परा चल निकली है, मै पिछले एक महीने से क्या लिखूं इस जगह पर यही सोच रहा था। लेकिन अब मैंने तय कर लिया है कि ऐसा लिखूंगा जो कम से कम मुझे तो समझ में आ जाये। हाँ यह बात जरूर है कि जो लिखूंगा वह ज़रूरी नहीं कि एक ही विषय से जुड़ा हो, मेरी आदत है कि मैं लिखते लिखते भटककर कहीं का कहीं पहुँच जाता हूँ।
मेरी ज्यादातर कहानियाँ-आपबीतियाँ बचपन से शुरू होती हैं, वह भी ऐसा बचपन जो सुदूर अतीत में कहीं स्थित है। यह मानते हुए कि अब बचपन नहीं है, और उसे गए हुए काफी अरसा बीत चुका है। ऐसा मानने के पीछे शायद बचपन का एक चाशनी चढ़ा हुआ चित्र और साथ ही वर्तमान की परेशानियों- दुविधाओं के चलते उसे अपने सुन्दर-सहज 'बचपन' से बहुत दूर और अलग मानने की चाह निहित है। लेकिन यहाँ मैं कुछ लिखूंगा जो मेरे बचपन से लेकर आज तक के जीवन में एक हिस्सा रहा है।

यह है अधर में लटकने का एहसास। मैं कहीं भी रहा, गाँव में, कस्बे में, या महानगरीय टापू 'विश्वविद्यालय' में हमेशा से अधर में ही रहा हूँ। मेरा गाँव भुमकापुरा, जहां ज्यादातर बच्चों के माँ बाप मजदूरी-किसानी करते... मेरे माँ बाप राजनैतिक कार्यकर्ता थे। बहुत कम उम्र से ही अपने यार-दोस्तों के साथ कंचे खेलते, कबड्डी खेलते या धूल में लोट-पोट होते हुए कभी भी अजनबीपन का एहसास नहीं हुआ लेकिन यह मालूम था कि मेरे जीवन के कुछ हिस्से उनसे बिलकुल अलग हैं, जैसे छुट्टियों में बाहर रिश्तेदारों के घर जाना, या अपने माँ-बाप से खड़ी बोली में बात करना। कुछ बड़े होने पर जहां वे शिकार खेलने या जंगल घूमने जाते, या खेती के काम में हाथ बंटाते वहीं मैं बस मोहल्लों में घूमता या कभी उनके साथ जाता भी तो उतना कुशल नहीं होता जितना वे... पेड़ पर चढने या शहद का छत्ता तोड़ने में। स्कूल जितना महत्व मेरे जीवन में रखता उतना उनके में नहीं। वहीं दूसरी और स्कूल में कुछ गैर-आदिवासी बच्चे मिलते जिनके भी जीवन मुझसे बिलकुल अलग होती... टीवी और क्रिकेट काफी महत्व रखता था॥ और टीवी के कीड़े ने मुझे काटा भी लेकिन घर पर टीवी नहीं होने से उसका असर कम रहा। मैं खेलों में हमेशा फिसड्डी रहा और कम उम्र में चश्मा लग जाने से कई खेलों से वंचित हो गया। किताबों की लत लग जाने पर एक बड़ा हिस्सा समय के पढने में जाने लगा, मैं अखबार का कोना-कोना चाट जाया करता था...

जब नौवी कक्षा में पढने अपने दादाजी के घर रामपुरा आया तो यहाँ और भी अलग हो गया... दोस्तियाँ स्कूल तक सीमित थीं, क्योंकि घर के आसपास कोई हमउम्र हमखयाल रहता नहीं था। जीवन लगभग टीवी को समर्पित हो गयी या 'न पढने' और अपने दादा-दादी के खिलाफ बेमतलब का विद्रोह करने में। जो दोस्त स्कूल में थे वे भी कई तरह के थे ज्यादातर गरीब - दलित परिवारों से जो छुट्टियों में काम करते, क्रिकेट खेलते, मोहल्लाई दुश्मनियों में हिस्सेदारी करते और 'तेरे नाम' को अपने जीवन का आदर्श मानते। चर्चाएं लड़कियों से शुरू होती, सिनेमा, क्रिकेट, समाज और दुनिया पर से होती हुई फिर लड़कियों पर ही ख़त्म होती, जिनमे मैं अपने आप को बाहरी महसूस करता क्योंकि, मैं शुरू से ही डरपोक किस्म का लड़का था, जो इस तरह की बातों का रस लेते हुए भी अपनी कोई काल्पनिक कथा सुनाने से गुरेज करता था। शाम को रिंगवाल पर घूमते हुए हम कई हवाई किले बनाते और तोड़ते... लेकिन उन सभी को यह एहसास था कि जल्द ही उन्हें रोजी-रोटी की चिंता में जुट जाना है, और एक मैं जिसे कभी यह पता नहीं चल पाया कि उसे क्या करना है। यह कुछ साल बहुत कठिन थे॥ क्योंकि मैं न तो स्कूल में अपेक्षानुरूप नंबर ला रहा था, घर में नालायकी और आलस के नए रिकार्ड कायम कर रहा था, और अन्दर ही अन्दर बहुत परेशान और खालीपन महसूस कर रहा था।

यहाँ विश्वविद्यालय में मामला अलग है, एक ओर वे क्रांतिकारी उच्चवर्गीय छात्र हैं, जिन्हें 'बुद्धिजीविता' घुट्टी में पिलाई गयी है, या वे शहरी बांके छैला जो अपनी ही चकाचौंध, महंगे कपड़ों,पार्टियों और आधुनिकता में डूबती उतराती आरामतलब जिंदगियों के सपने में मस्त हैं। या मेरे अजीज दोस्त हैं, जो अपनी कस्बाई विरासत से निकलकर यहाँ तक पहुंचे हैं और अब किसी भी तरह उससे बाहर निकल एक अदद नौकरी और स्थायित्व से ज्यादा कुछ नहीं चाहते।
और मैं... शायद पलायनवादी हूँ, या आत्ममुग्ध छद्म -क्रांतिकारी, या शायद एक निठल्ला जो कुछ न कर सका....
लेकिन मैं अधर में हूँ...


और इक़बाल की शान में एक स्पानी गीत मेरे प्रिय गायकों में एक हूलियो इग्लेसियास के स्वर में:



(साभार : यूट्यूब)

Monday, December 6, 2010

अब का कहैं , कहो नहीं जात है..


मुझसे कहा गया है अपना मर्सिया खुद पढने के लिए, इसलिए सबसे पहले तो मैं 'मर्सिये' का मतलब विकिपीडिया पर तलाश आया...(हालाँकि कुछ अंदाज़ा था, लेकिन अब और बेहतर अंदाज़ा हो गया है)
मैं हूँ सबसे नया कबाड़ी, और अब जब कि मैं उज्जैन के एक साइबर कैफे में भिनभिनाते मच्छरों, आते जाते ट्रैफिक की आवाज़ों और हलकी हलकी ठण्ड के बीच कबाड़खाने के लिए अपनी पहली पोस्ट लिख रहा हूँ, तो मुझे कई तरह के ख्याल आ रहे हैं, पहला तो यही कि शायद मेरी उम्र ही मेरा सबसे बड़ी काबिलियत है और सबसे बड़ा अधूरापन भी। बचपन से 'बड़े' होने की जबरदस्त चाह ने हमेशा ही उकसाया, लेकिन जब थोडा भी बड़ा हुआ तो अचानक लगने लगा कि पालना ही सबसे जोरदार वैंतेज पॉइंट होता है, जहाँ से आप अंगूठा चूसते हुए दुनिया को लानत भेज सकते हैं।
जब गाँव में था तो "अहा ग्राम्य जीवन" में भी हमेशा किताबों में घुसा रहा या फिर पड़ोसी के घर टीवी पर शक्तिमान और मेजर साब देखता रहा, कुछ और बड़ा हुआ तो स्कूल और घर से तंग आकर भी कोई यादगार विद्रोह न कर सका... आखिरकार जब उनिवर्सिटी पहुंचा तो देखता क्या हूँ कि यहाँ भी सब पीट सीगर वाले बक्सों में ही घुसे हुए हैं... तो अपन का भी वही रूटीन बन गया, जम कर खाना, जम कर सोना और बीच बीच में "बुर्जुआ" "सर्वहारा", "प्रतिक्रांतिकारी" आदि आदि डकारें लेते रहना।
साहित्य में अपन ने जो भी पढ़ा, उसका कुल जमा असर ये पड़ा कि दोस्तों की गालियाँ खाते खाते भी खड़ी बोली में दो-चार उदगार बीच बीच में बगरा देते हैं और मन में संतोष कर लेते हैं। वैसे परसाई, भवानी दद्दा, और दुष्यंत तीनों को पढ़कर ऐसा लगता है मानों दिल से लाउडस्पीकर जोड़कर सीधे प्रसारण हो, याने अपने से ही लगते हैं ये सब। और कहानियों का बड़ा चस्का है... मुझे कोई संकोच नहीं कहने में कि हैरी पोटर काफी समय तक मेरी सबसे पसंदीदा किताबों में रही। ( अब भूत थोडा उतर रहा है)
खैर मुद्दे की बात यह है कि मैं स्पैनिश साहित्य का विद्यार्थी हूँ, इसलिए कोशिश रहेगी कि आप लोगों के बहाने मेरी पढाई कुछ आगे बढ़ती रहे, साथ ही जो भी मेरे मन में चलता रहता है उसमे से कुछ चुनिन्दा यहाँ पेश कर दिया करूंगा। मेरी काबिलियत पर मुझे भरोसा नहीं है, लेकिन शायद इस जिम्मेदारी से कुछ सुधर जाऊं... (आखिर सुधारने के लिए शादी तक कर देते हैं लोग.)
पिछले कुछ दिनों से खुद को यही समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि सिनिकल होना बहुत आसान है और आशावान होना बहुत कठिन...
वीरेन डंगवाल जी को मैंने, या उन्होंने मुझे कबाडखाना के माध्यम से ही खोज निकाला था..उन्हीं की दो पंक्तियाँ....
तू यही सोचना शुरू करे तो बात बने
पीडा की कठिन अर्गला को तोडें कैसे!

आपका
इकबाल अभिमन्यु

अपराजेय अजेय का कबाड़ख़ाने में स्वागत

बहुत दिनों से मैं चाहता था कि लाहौल के केलोंग में रहनेवाले भाई अजेय कबाड़खाने से जुड़ें. मैं प्रसन्न हूँ कि उन्होंने मेरी विनती सुनी और हमारे कबाड़-मंडल का हिस्सा बनने को अपनी सहमति दे दी. इस आदमी के भीतर पहाड़ की ठोस आत्मा बसती है. एक मीठी लेकिन पौरुष से भरपूर जिद और हिमालय जैसा ऊंचा हौसला. व्यक्तिगत पहचान यह है कि हमारे बीच चार-पांच दफा टेलीफोन पर बातचीत हुई है और कभी यह अहसास नहीं हुआ कि वे मुझसे या हमारे साझा कबाड़ीपन से ज़रा भी जुदा हैं.

हमारे बहुसंख्य कबाड़ी आजकल हाईबर्नेशन में गए दीखते हैं. होंगी उनकी भी मजबूरियां, जो होती ही हैं. मेरी भी हैं लेकिन मैं चाहता हूँ यह सिलसिला जारी रह सके.

अजेय भाई, आप का स्वागत है.

उनकी कविता यह तक कह सकने का माद्दा रखती है कि -

सुनो,
आज ईश्वर काम पर है
तुम भी लग जाओ
आज प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी।


उनके ब्लॉग से एक कविता प्रस्तुत है:

पैरों तक उतर आता है आकाश
यहां इस ऊँचाई पर
लहराने लगते हैं चारों ओर
मौसम के धुंधराले मिजाज़
उदासीन
अनाविष्ट
कड़कते हैं न बरसते
पी जाते हैं हवा की नमी
सोख लेते हैं बिजली की आग।

कलकल शब्द झरते हैं केवल
बर्फीली तहों के नीचे ठंडी खोहों में
यदा-कदा
अपने ही लय में टपकता रहता है राग।

परत-दर-परत खुलते हैं
अनगिनत अनछुए बिम्बों के रहस्य
जिनमें सोई रहती है ज़िद
छोटी सी
कविता लिख डालने की।

ऐसे कितने ही
धुर वीरान प्रदेशों में
निरंतर लिखी जा रही होगी
कविता खत्म नही होती,
दोस्त ...
संचित होती रहती है वह तो
जैसे बरफ
विशाल हिमनदों में
शिखरों की ओट में
जहाँ कोई नही पहुँच पाता
सिवा कुछ दुस्साहसी कवियों के
सूरज भी नहीं।

सुविधाएं फुसला नही सकती
इन कवियों को
जो बहुत गहरे में नरम और खरे
लेकिन हैं अड़े
संवेदना के पक्ष में
गलत मौसम के बावजूद
छोटे-छोटे अर्द्धसुरक्षित तम्बुओं में
करते प्रेमिका का स्मरण
नाचते-गाते
घुटन और विद्रूप से दूर

दुरूस्त करते तमाम उपकरण
लेटे रहते हैं अगली सुबह तक स्लीपिंग बैग में
ताज़ी कविताओं के ख्वाब संजोए
जो अभी रची जानी हैं।


(एक और नया कबाड़ी बस आया ही चाहता है कल. इंतज़ार कीजिये.)

Sunday, December 5, 2010

लैंपपोस्ट के नीचे दीनबंधु निराला !

मैं आज तक किसी महापुरुष से नहीं मिला हूँ लेकिन कई महापुरुषों की कहानियाँ पढ़ी हैं कि कैसे अभावों में उनका जीवन बीता और कैसे लैंपपोस्ट के नीचे बैठकर रात रात को उन्होंने पढ़ाई पूरी की.

दीनबंधु निराला कोई महापुरुष नहीं है. अलबत्ता उसका नाम दो महापुरुषों के नाम से बना है - महात्मा गाँधी के सहयोगी दीनबंधु एण्ड्रूज़ और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला. वो एक 18 वर्ष का किशोर है जिसे आप किसी शाम पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान के बीचोंबीच लगे ऊँचे लैपपोस्ट के नीचे गणित के सवालों से जूझते देख सकते हैं.

वहाँ सेना या सुरक्षा बलों में भर्ती होने की तैयारी कर रहे कुछ नौजवान कसरत करने आते हैं.

चने मुरमुरे बेचने वाला एक कमज़ोर वृद्ध ग्राहकों का इंतज़ार करते करते थक कर वहीं धरती पर बैठ गया था. कुछ बेरोज़गार नौजवान निरुद्देश्य टहल रहे थे. मैदान के चारों ओर सड़कों से मोटर, कार, ट्रक और टैम्पो के हॉर्न की आवाज़ें आ रही थीं. रह रह कर एक बारात में छोड़े गए पटाख़ों की आवाज़ें भी आसमान में गूँज जाती थीं.

इतने शोर शराबे के बीच लैंपपोस्ट के नीचे बने चबूतरे पर दीनबंधु निराला अपनी किताबों पर झुका हुआ गणित के मुश्किल सवाल सुलझाने में लगा था.

मैं उसके बिलकुल पास जाकर बैठ गया और इंतज़ार करता रहा कि किसी तरह बात शुरू हो. लेकिन उसने नज़र उठाकर मेरी ओर नहीं देखा.

शोर के बीच भी वो एक स्वनिर्मित सन्नाटे में समाधिस्थ था !

मैंने देखा गणित के समीकरण उसकी कलम से निकल निकल कर कॉपी पर बिछते जा रहे थे, जिन्हें मैं नहीं समझ पाया. समीकरण सिद्ध होने के बाद लिखा गया अँग्रेज़ी का सिर्फ़ एक शब्द - प्रूव्ड यानी सिद्ध हुआ - मुझे समझ में आया.

आख़िर मैंने ही बातचीत की शुरुआत की.

"क्या बनना चाहते हो?"

"मैं मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहता हूँ और अगर ख़ुदा भी आ जाए तो मुझे वो रोक नहीं सकता".

"कहाँ रहते हो?

"यहाँ से तीन सौ किलोमीटर दूर सुपोल ज़िले के एक गाँव में."

"पिछले साल कितने नंबर आए थे?"

"पिछले साल पाँच सौ में से 385 नंबर आए थे. आइएससी (यानी बारहवीं) का इम्तिहान इस साल देने की तैयारी कर रहा हूँ."

उसक आवाज़ में न तो ग़ुरूर का पुट था और न ही किशोर सुलभ कच्चा हौसला. उसके बयान में आश्वस्ति का भाव था और ठोस आत्मविश्वास था.

वो सिर्फ़ परीक्षा की तैयारी के लिए पटना आया है और अपने कुछ दोस्तों के साथ रहता है. बदले में वो उनके लिए खाना बना देता है और इस बात के लिए वो अपने दोस्तों का बार बार शुक्र अदा करता है.

बातचीत में काफ़ी वक़्त गुज़र गया था. अँधेरा कुछ और गहरा हो गया था. निराला ने अपने बस्ते में किताबें समेटीं और लैंपपोस्ट से दूर अँधेरे में आगे बढ़ गया. उसे अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना था.

मैं चाहता हूँ कि दीनबंधु निराला मैकेनिकल इंजीनियर न बने.

मैं जानता हूँ कि वो कोई और बड़ा सपना देखने और उसे हासिल करने की कुव्वत रखता है.

(ये ब्लॉग www.bbchindi.com पर प्रकाशित हो चुका है.)

Saturday, December 4, 2010

तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया

कुछ समय से यह प्यारा छत्तीसगढ़िया गीत इस कबाड़ी के गरीबखाने में खूब पसंद किया जा रहा है औरखूब बज रहा है। भला ऐसा क्यों न हो !  छतीसगढ़ से अपना गहरा नाता है और एक ठो 'बिलासपुरहिन' के साथ  ही  अपनी जोड़ी बनी है व दोनो बालगोपाल भी वहीं जनम लिए हैं। यह तो हुई कुछ घरू किसम की बात लेकिन यह तो जगजाहिर है कि लोकसंगीत ,चाहे वह कहीं का भी हो; उसका कोई सानी नहीं। तो आइए मिलकर  कहते हैं 'छतीसगढ़िया सबले बढ़िया' और  सुनते हैं  नायक - नायिका की चुहल  से भरपूर  यह  गीत ...यह ददरिया...
.


गायन शैली : ददरिया
स्वर  :केदार यादव एवं साधना यादव





तै बिलासपुरहिन अस अउ मैं रायगढ़िया
तै बिलासपुरहिन अस अउ मैं रायगढ़िया
तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया
अजी तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया

मैं बिलासपुरहिन हौंव अउ तै रायगढ़िया
मैं बिलासपुरहीन हौंव अउ तै रायगढ़िया
तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया
अजी तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया

राजनांदगाँव रिथे मोर ममा मामी
राजनांदगाँव रिथे मोर ममा मामी
मोर ममा दुरूग के आए उकील नामी
मोर ममा दुरूग के आए उकील नामी
तोर ममा गवईहा
तोर ममा गवईहा अउ मोर ममा सहरिया
तोर ममा गवईहा अउ मोर ममा सहरिया
तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया
अजी तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया

बस्तर मा मोर बड़े बाप के किसानी
बस्तर मा मोर बड़े बाप के किसानी
सरगुजा मा मोरो तो हाबय लागमानी
सरगुजा मा मोरो तो हाबय लागमानी

आज दुनों बम्बई मा गवातथन ददरिया
आज दुनों बम्बई मा गवातथन ददरिया
तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया
अजी तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया
तै बिलासपुरहिन अस अउ तै रायगढ़िया
तै बिलासपुरहिन अस अजी अउ तै रायगढ़िया

तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया
तोर मोर जोड़ी फबे हे सबले बढ़िया
............

( गीत /संगीत : साभार : http://cgsongs.wordpress.com )

Friday, December 3, 2010

पंकज बसलियाल खुश हैं

पंकज बसलियाल मेरे बड़े भाई हैं| आज मेरा जन्मदिन है, तो उनकी लिखी हुई एक कविता, दिसंबर २००७ में हिन्दयुग्म में प्रकाशित, कबाड़खाने में मय समीक्षा डालने का मन हुआ| ये मेरी तरफ से उन सब बातों के लिए छोटा धन्यवाद जो उन्होंने बड़े भाई के फ़र्ज़ के तौर पर निभाई, और भी जो बिना फ़र्ज़ के निभायी| 


पंकज बसलियाल खुश हैं
यूनिकवि प्रतियोगिता के दिसम्बर अंक के ८वीं पायदान पर कविता है पंकज बसलियाल की 'मैं खुश हूँ'। इन्होंने पहली बार प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और खुद को टॉप १० में रखने में सफल रहे। यह हिन्द-युग्म के लिए बहुत खुशी की बात है कि हर माह नए-नए नगीनों तक पहुँच रहा है और उन्हें प्रोत्साहित कर उनको और बेहतर साहित्य रचने के लिए प्रेरित कर पा रहा है।

इनका जन्म उत्तरांचल के सीमावर्ती क्षेत्र में सन् १९८३ में हुआ। स्कूल से घर ४-५ किलोमीटर था और ये अकेले जाया करते थे, रास्ते भर कुछ न कुछ गुनगुनाने की कोशिश में तुकबंदी प्रारंभ की, ८वीं कक्षा में पहली कविता प्रकाशित हुई। उसी वर्ष "गुनाहों का देवता" पढ़ा तो विधिवत साहित्य से परिचय हो गया। कालांतर में कंप्यूटर इंजीनियरिंग करने के उपरांत TCS में काम करते हुए देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे रहे हैं... पिछले कुछ समय से अमेरिका में हैं।

संपर्क-पंकज बसलियाल
१२५ , शांतिनगर , ढालवाला,
पो.ओ. - मुनी की रेती ,
ऋषिकेश , उत्तरांचल , २४९२०१.

पुरस्कृत कविता- मैं खुश हूँ

जी , मैं खुश हूँ .
आपने सही सुना , कि मैं खुश हूँ .

शायद आज किसी को रोते नहीं देखा ,
नंगे बदन फ़ुटपॉथ पर सोते नहीं देखा ,
शायद रिश्तों की कालिख छुपी रही आज,
तो किसी को टूटी माला पिरोते नहीं देखा.

आज भी भगवान को किसी की सुनते नहीं देखा,
पर हाँ, आज किसी के सपनों को लुटते नहीं देखा,
तन्हा नहीं देखा , किसी को परेशान नहीं देखा,
पाई-पाई को मोहताज, सपनों को घुटते नहीं देखा.

बेचैनी नहीं दिखी, कहीं मायूसी नज़र न आयी ,
कहीं कुछ गलत होने की भी कोई खबर न आयी,
सब कुछ आज वाकई इतना सही क्यों था आखिर,
कि दर्द ढूंढती मेरी निगाहें कहीं पे ठहर न पायी .

मैं खुश हूं वाकई, पर कुछ हो जाने से नहीं
कुछ ना हो पाने से खुश हूँ कुछ पाने से नहीं
किसी के जाने से खुश हूँ, किसी के आने से नहीं
किसी के रूठ जाने से, किसी के मनाने से नहीं

पर ये खुशी की खनक मेरे आस पास ही थी,
कई अनदेखी आँखें आज भी उदास ही थी,
मैनें कुछ नहीं देखा, का मतलब खुशहाली तो नहीं
मेरे अकेले की खुशी, एक अधूरा अहसास ही थी..

वो दिन आयेगा शायद, जब हर कोई खुशी देख सकेगा,
बिन आँसू और गमो के जब हर कोई रह सकेगा.
खुशी सही मायनों में वो होगी तब,
"मैं खुश हूँ" ... जिस दिन हर इन्सान ये कह सकेगा..

Thursday, December 2, 2010

एक टुकड़ा सुखांत

"शादी कब कर रहे हो ?"
"अभी फिलहाल दो-तीन साल तक तो नहीं |"
"तुम्हारा ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है |"
मेरे ब्लड प्रेशर का मेरे विवाह करने से मुझे कोई सीधा संबंध नजर नहीं आता | डॉक्टर से ज्यादा जानते हो क्या तुम ? मैंने मन ही मन पापा को साक्षात दंडवत किया |
"बेटा वो जो पेपर हैं, वो मैंने मुनिरका में उस मोहना को दिए हैं | तू उससे पेपर लेके उसपे डॉक्टर अंकुर के साइन करा लेना, डॉक्टर अंकुर के केवल | हैं ? ठीक है ? वो मोहना गया था उस दिन, पर वो अंकुर नहीं था वहाँ | फिर उसने, वो नी है वहाँ, वो, क्या नाम उसका...हाँ... कांशी, उसको दिए थे पेपर, पर वो भी नहीं करा सका |"
"हेलो! हाँ पापा! हाँ, अब बोलो क्या करना है ?"
"कागजों पे दस्तखत करवाने हैं |"
"ठीक है |" मैंने फ़ोन रख दिया | डॉक्टर से साइन करवाने में कोई ख़ास दिक्कत नहीं आई | बस मुझे रात को नॉएडा रूककर, सुबह भागकर एम्स जाना था | एम्स में ब्लड सैम्पल देकर वापस नॉएडा आकर पिछले दिन कराये पेनग्राफ लेवल की रिपोर्ट लेनी थी | उसके बाद नाश्ता करके मुनिरका जाना, वहाँ से कागजात लेकर एम्स जाकर, डॉक्टर से साइन करना था | सामयीन गौर फरमायें कि मैंने लंच नहीं किया है और सुबह से डी टी सी बसों में सफ़र कर रहा हूँ | एम्स कोई बुरी जगह नहीं है, पर अगर तुम जल्दी जल्दी वहाँ काम ख़तम कर लो | अगर वहाँ किसी डॉक्टर को ढूंढ रहे हो तो भुतहा मूवी का सा सीन हो जाता है | फर्श पर एक आदमी लेता हुआ है, सोया है या मर गया है, मैं नहीं जानता | जल्दी से उसे नज़रअंदाज करके मेरी आँखें उस सफ़ेद कोट पर लगी हैं, वो जरूर डॉक्टर अंकुर होगा | अपने आगे खड़े आदमी को कंधे से पकड़कर लगभग एक तरफ धक्का देते हुए मैं आगे आगे भागा | एक झलक पीछे मुड़कर देखा तो आदमी का बांया कन्धा था ही नहीं | एक औरत बार बार पानी के कटोरे में कपडा डुबोकर अपनी गोद में कुछ साफ़ कर रही थी | गौर से देखा, एक मरगिल्ला सा बच्चा गोद में पड़ा था, जिसके माथे पर वो पानी की पट्टी रख रही थी | उसका सिर्फ सर दिख रहा था, हाथ-पैर जैसे थे ही नहीं |

"अरे! वो पार्वती का हसबैंड मर गया |" एक सभ्रांत सी दिखने वाली महिला ने जरा नज़ाकत से मुस्कुरा के कहा |
"ओहो ! बेचारी की जिंदगी में कभी सुख ही नहीं रहा | पिछले एपिसोड में बेटी के साथ 'गलत' हो गया, अब उसका पति मर गया |" सभ्रांत महिला 2 ने अफ़सोस जाहिर किया |
"चार नंबर बेड के पेशेंट के साथ कौन है ?" वार्ड-बॉय ने पूछा |
"जी, मेरे पति हैं |" सभ्रांत महिला 2 ने कहा |
"उनका ब्लड प्रेशर लो हो गया है | उनके लिए कुछ नमकीन, चिप्स ले आइये |"
"जी अच्छा |" सभ्रांत महिला 2  ने पर्स से मोबाइल निकालकर किसी सुनीता को फोन करके आदेश जारी कर दिया |
"और पेशेंट नौ नंबर बेड के साथ ?"
"जी! माय मदर-इन-ला |" सभ्रांत महिला 1  ने कहा |
"उनका डायलिसिस हो गया है |" वार्ड-बॉय ने मेरी ओर देखा | "चलो, आपका नंबर आ गया | वेट कर लो अपना |"
मैं वेट मशीन पर जाता हूँ | 52  केजी, 4 . 5  केजी बढ़ गया है |
"कितना पानी निकलना है ?" मेरे गले पर लगे केथेटर को डायलिसिस मशीन से जोड़कर वार्ड-बॉय पूछता है | मुझे लेटकर रहना है अब, चार घंटे | हफ्ते में दो दिन, दिन में चार घंटे | चार पॉइंट पांच केजी पानी के लिए | 

पार्क में लोगों ने अपना घर ही बना लिया था, कपडे तारों पर सूखने के लिए डाले हुए थे | दिन का खाना बन रहा था | कुछ लोग लेटे हुए थे | खड़े रहने की कूव्वत उनमें भी नहीं थी, जो बचे हुए थे | इस बीच एक परिवार ने रोटी का टुकड़ा उछल दिया किसी कुत्ते की तरफ | दूर से एक कव्वे ने तेजी से नीची उड़ान भरी , झपट्टा मारके टुकड़ा छीन लिया | इस ख़ुशी से ज्यादा देर तक खुश नहीं रह सका वो | चारों तरफ से साथी कव्वों ने उस पर हमला कर दिया | 
"भाईजान, डॉक्टर साहब ने तो बोल दिया है |"
"चलो कोई बात नहीं, उपरवाला ही अब सबकुछ है |" अली भाई कुछ संजीदा हो गए |
बुर्के से एक निस्तेज बूढ़े चेहरे ने बाहर झाँका | आँखें छलछलाने को हुई जाती थी | घर कौन संभालेगा ? आदिल ने अली भाई की ओर देखा | घर संभालने जैसा इसमें क्या था ? चार साल से बाप की दवा में ही तो घर बर्बाद हो चला था | पार्क के इस घर में खाना नहीं बना था, अब शायद आज बने भी नहीं | राजू की माँ ने आदिल को बुलाया, आजा लल्ला खा ले कुछ | आदिल ने अली भाई की ओर, अली ने माँ की तरफ देखा, जा बेटा अंटी बुला रही है | 
"लंच टाइम है, डॉक्टर अंकुर नहीं मिलेंगे |" कांशी ने मुस्कुराते हुए कहा |
(जी, मुझे पता है | लेकिन एक गुजारिश थी भाईजी आपसे |) पापा इसी तरह बात शुरू करते, मुस्कुराकर | "जी, एक्चुली मुझे 1288 / 07  की फ़ाइल चाहिए थी | मुझे डॉक्टर अंकुर से पेपर ... "
"आज सुबह ब्लड सैम्पल दिया था ?" कांशी ने मेरी बात काट दी |
"जी !"
"तो चिंता मत करो, फ़ाइल को जहाँ पहुँचना होगा, पहुँच जायेगी |"
मैंने एक बार फिर पापा की सहनशीलता को नमन किया | 

"जी, वो कह रहे हैं कि रिपोर्ट वहाँ नहीं आई, और रिपोर्ट गयी तो यहीं से थी | कृपया कर के बता दीजिये साहब, बड़ी मेहरबानी होगी |" पापा ने छोटी सी खिड़की में आँख घुसाते हुए पूछा |
"देख, मैं बोला न तुझको कि रिपोर्ट हम लोग यहाँ से भेज दिए | अब तू मेरे सर पे क्यों बैठ रहा है ?"
"साहब, अब हम क्या करें अगर रिपोर्ट नहीं मिली तो ?"
"डॉक्टर से बात कर, दूसरा फॉर्म लेके फिर से ब्लड सैम्पल दे |"
पापा कुछ रुआंसे हो गए | तेजी से आगे आगे चलने लगे |
"बड़ी मुसकल करके तो खून बनता है और ये अपड़ी माँ के खसम, साले उसको भी चूस लेते हैं | साले हरामजादे, किसी को किसी से कोई हमदर्दी नहीं है |"
मैं इतना तेज नहीं चल सकता था | 

"तुम भविष्य हो न, इसलिए तुम्हारे डायलिसिस के टेम पे तुम्हारे मम्मी-पापा साथ आते हैं |" सभ्रांत महिला 2  के पति ने कहा | मैंने उनकी तरफ पलटकर देखा, कहा कुछ नहीं |
"मैं तो गुज़र गया हूँ न, मेरे साथ कोई नहीं आता | सिर्फ ये आती है, ये भी पता नहीं कब तक | बच्चे तो किसी के हुए ही नहीं | पाँच बेटों में से चार के साथ ब्लड ग्रुप मैच होता था, लेकिन किसी ने हाँ नहीं कहा किडनी देने के लिए |" उसकी आँखों से आंसू की धार बह निकली |
"बाबा, ज्यादा बोलो मत |" नर्स ने कहा और फिर से अखबार में आँखें घुसा ली | नर्स को लेकर मेरे दिलोदिमाग में जितने भी चित्र थे उन्हें मैंने खुद ही घोंट घोंट के मारना चाहा |
"उसने भी कहा | बहुत वास्ता दिया, कि कमीनों, बाप है वो तुम्हारा | एक किडनी नहीं दे सकते तुम लोग | तो हम लोगों से साफ़ कह दिया कि बाबा डायलिसिस के पैसे हम दे देंगे | हम दे देंगे ? पैसे ? मेरा बिजनेस, बंटवारे के टेम पे भाई ने रखा था | आज ये लोग उसे अपना बिजनेस बताते हैं | अपना पैसा ? अरे जिस पैसे को मैंने कभी अपना नहीं बोला, हमेशा भाई को नज़र करके बिजनेस किया ... उसे ये हरामी.. " उसका गला रुंध गया | 
"बाबा! आपका ब्लड प्रेशर फिर से लो हो जाएगा |" ये कहते हुए नर्स बाहर सभ्रांत महिला 2  को बुलाने के लिए चली गयी |

मैं लिफ्ट में घुसा | बस किसी तरह धंस गया | पीछे किसी ने मुझे बलात एक तरफ धकेला हुआ था, "दांयी तरफ रहो !!!" मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखा | स्ट्रेचर पे एक डेड बॉडी पड़ी हुई थी | तीन फीट की बॉडी, सफ़ेद कपड़ों में सही से बांधी हुई बॉडी | वो आदमी बिलकुल निश्चिन्त खड़ा था | शायद उस बॉडी का कुछ लगता था, पर जैसे जाहिर नहीं होने देना चाहता हो | मेरे अन्दर गुस्सा अभी भी भरा था, लेकिन किससे ? "क्या यार लाइफ में कोई नहीं मिली, लिफ्ट में भी मुर्दे ही मिलते हैं |" अपने क्रूर मजाक पर मेरा खुद अट्टहास करने का मन कर रहा था | दो साल पहले अगर पापा ने किडनी नहीं दी होती तो शायद मुझे भी ऐसे ही पैक किया हुआ होता | साढ़े पाँच फीट की बॉडी | किसी को क्या फर्क पड़ता ? पापा ऐसे ही खड़े होते | निर्विकार, निर्लिप्त, उपरवाला ही सबकुछ है | कुछ चारएक साल पहले मैंने पूजा करना छोड़ दिया था | मेरे मूक और निरीह क्रोध को स्वर मिला था, जब किसी मूवी में मैंने नायिका को कहते हुए सुना कि जन्नत में आपके खुदा का गिरेबान पकड़कर पूछूंगी कि जो कुछ मेरे साथ हुआ क्या वो उसका इन्साफ था | 

"न जाने कौन से जनम के पाप हैं मेरे ये !!!" माँ की आँखों में आँसू थे | जो यकीनन माँ के ही आँसू थे, लेकिन माँ के ये आँसू निकलने में बहुत ज्यादा वक़्त नहीं लेते थे | रात को अचानक मुझे हाँफता हुआ पाकर माँ, जो कि मेरे पैरों की तरफ लेती रहती थी, ने एकदम से डरकर सारे कुलदेवताओं  को श्राप दिया कि उनके ऊपर बिजली गिरेगी और वो सब राख के ढेर में बदल जायेंगे | उसके बाद माँ ने चौरंगी से विनम्र हाथ जोड़कर निवेदन किया कि उसके बच्चे को कम से कम सोने तो दें | श्राप का प्रभाव चौरंगी देवता से उठा लिया गया था, और बदले में उन्हें मुझे रात की नींद देनी पड़ी | मगर भैरों, महाकाली, हुण नाग श्राप से भयभीत कांप रहे थे | 'जातक की कुंडली में कारावास का योग है' दादा जी ने इतने शान से ये सब कुंडली में लिखा था जैसे आई ए एस का योग लिखा हो |
"माँ, मुझे डर लग रहा है |" मैंने बाईस साल का सच स्वीकार किया | कभी नहीं कहा किसी से कि मुझे डर लग रहा है | किस चीज़ से ? पता नहीं | माँ हैरान होकर मेरी तरफ देखती रही, मगर कहा कुछ नहीं, रोना भी रुक गया था | 
"ऐसा नहीं बोलते मेरे बच्चे !" माँ ने मुझे सीने में छुपा लिया | 

"विक्की पढ़ रहा था एक कॉपी ... अच्छा तो तुम्हारी थी वो | तुम लिखते हो ?" गौरव ने सिगरेट सुलगाई | दो-चार गालियाँ एक शादीशुदा को दी जिसके साथ उसके प्रेम-संबंध थे | फिर उसके अंगों का विश्लेषण परत दर परत हमारे सामने उघड़ने लगा | मैंने श्रद्धा को याद किया | खुश होगी वो अपने हसबैंड के साथ | लेकिन क्यों छोड़ा उसने मुझे ? बस, अब और सवाल नहीं, खासतौर पर ये सवाल जिसका जवाब मुझे पता है | एक लड़की मिली है आजकल, माइक्रोबायोलोजी टीचर, लगती भी ठीक ठाक है | बार बार कहती है, ओह आई लव यू जानू | मैं तुम्हारे साथ पूरी लाइफ बिताने को तैयार हूँ | देखो तुम्हारा फिजिकल प्रॉब्लम इज नथिंग टू मी | यीअह!!! मेरी फेमिली को थोड़ा प्रॉब्लम हो सकता है, बट डोंट वरी, मैं उन्हें मना लूंगी | जीत की ख़ुशी जैसे मोबाइल से छनछना उठी हो | पता नहीं ऐसे वक़्त पे मुझे श्रद्धा क्यों बहुत याद आती है, और उसका ये कहना कि अगर मेरे पापा हाँ कहेंगे तो ... | लड़की का चेहरा बुरी तरह से जल गया था | एक आँख की जगह बस कोलतार का गड्ढा रह गया था | स्किन स्ट्रेचर पर चिपक गयी थी | बॉयफ्रेंड, उसके दोस्तों ने रेप करने के बाद जला दिया था | आजतक ने ग्रेटर नॉएडा से खबर दी थी | सफदरजंग में भर्ती कर दी गयी है, शायद मरने वाली है | बच गयी तो घरवाले उसकी मौत मांगेंगे | लड़की का नाम आरती है, उसके सारे प्रेम संबंधों की जांच पड़ताल की गयी | लड़कों के साथ पिक्चर देखने जाती थी, छोटे कपडे पहनती थी, गाड़ी तेज़ चलाती थी,  जॉब करती थी | कुल मिलाकर, चैनल वाली लड़की के मुताबिक, लड़की का चरित्र ठीक नहीं था | इसके तुरंत बाद वो बिपाशा और करीना की एक सेट पे एक स्पेशल ड्रेस के लिए हुई तू तू मैं मैं की स्पेशल रिपोर्ट दिखाने वाले थे | मुझसे कहीं नहीं जाने की और उनके साथ बने रहने की अपील की गयी थी | 

केबिन नंबर ग्यारह, डॉक्टर अंकुर |
"बारह अठासी !!!"
"जी डॉक्टर, मैं हूँ |"
"अरे तुम तो वही हो न जिसका चलते डायलिसिस में शंट निकल गया था ? डॉ विश्वास, इस लड़के का चलते डायलिसिस में शंट निकल गया था, सर गंगाराम में डायलिसिस कराता था ये | बहुत खून बह गया था |" 
मुझे याद था | कैसे भूल सकता था, माँ पागलों की तरह चिल्लाई थी | "डॉक्टर! ए भैया! अरे ए भैया!! देखो न, बहुत खून निकल रहा है | इसको रोको | ए भैया! ए सोहन..." वार्ड-बॉय भागते हुए आये थे, मुझे थोड़ा नशा सा होने लगा था | आउट ऑफ़ बॉडी एक्सपीरिएंस, भांग पीकर अजय बोला | कुछ कुछ वैसा ही क्या ? पता नहीं मैं नशा नहीं करता | तुम भविष्य हो ... सभ्रांत महिला 2  के पति के शब्द मेरे कानों में गूँज रहे थे | तुम्हारे साथ तुम्हारे मम्मी - पापा हैं, मेरे साथ कोई नहीं ... वो आदमी अभी हँसने लगा था | मेरे मम्मी पापा साथ रहकर भी क्या कर लेंगे ? दांयी तरफ रहो... लिफ्ट के अँधेरे कोने से आवाजें आ रही थी | अजय ने उलटी कर दी है, मैं उसे साफ़ कर रहा हूँ | कव्वे फिर से चीखने लगे हैं, किसी ने रोटी उछाल दी है | अगर मेरे पापा हाँ कहेंगे तो ... श्रद्धा ने नाखून से जमीन कुरेदते हुए कहा | श्रद्धा के घर से शादी का कार्ड आया है | शादी कब कर रहे हो ? अभी फिलहाल दो तीन सालों तक तो नहीं | तुम्हारा ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है | मैंने कुछ नहीं कहा | डॉक्टर ने कुछ दवाएं घटा दीं, कुछ बढ़ा दीं | ओह, डोंट वरी हनी, यू नो आई लव यू | आई विल आलवेज़ बी दियर फॉर यू | मोबाइल वाइब्रेट करने लगा था | "डॉक्टर! ये कुछ पेपर और बिल्स हैं | सर, प्लीज़ जरा साइन कर दीजिये |"

"हो गए आखिर डॉक्टर के साइन ? कितने के बिल हैं ये ?"  कांशी ने मुहर लगाते हुए पूछा |
"चालीस हज़ार"
कांशी ने नकली आश्चर्य दिखाया, "अभी तक तुम कम से कम दस बिल तो ऐसे ले जा चुके हो, और वो शुरू वाला दो लाख का अलग | काफी पैसे मिल गए होंगे तुम लोगों को तो गोरमेंट की तरफ से ?"
"हाँ" मैंने कांशी की ओर देखा, मुस्कुरा दिया |
"ये साले, हरामी, अपड़ी माँ के खसम !" मेरे सहनशील पिता ने उक्ति की |
"कौन पापा ?"
"अरे बेटा! एक से एक बढ़कर जोंक बैठे हुए हैं सरकारी कार्यालयों में | अपने ही ऑफिस में दो लाख के बिल पे चालीस हज़ार तो खिलाने पड़े | बाकी और बिल अभी प्रोसेस ही नहीं हो रहे | वो कह रहे हैं कि सी एम ओ के साइन नहीं हैं इसमें, वो भी चाहिए | पता नहीं मिलेगा भी पैसा कि नहीं |"
पिता के चेहरे की निराशा मुझे बहुत ज्यादा विचलित नहीं करती | मैंने तो बहुत कुछ झेला है न | हँसता हूँ...नहीं,,,रोता हूँ...नहीं ...नोकिया के सेल पे स्नेक खेलता हूँ |

"आज तेरे दादा के मौत हो गयी |" माँ ने शांत भाव से कहा, "चल अच्छा हुआ, बेचारे गुज़र गए | नहीं तो लोग बोलते कि बुड्ढा खुद तो मरा नहीं, पर काल उसके एवज में पोते को ले गया |" 
दादा का चेहरा मेरे आगे घूम गया | शांत, अविचलित जैसे व्यक्तिवाद का अस्तित्व कहीं खो गया हो | "तू अपने बाप के लिए आज इतनी परायी हो गयी ? मर गया क्या तेरे लिए तेरा बाप कि तू उसे देखने भी नहीं आई ?" कोई अन्य सभ्रांत मरीज़ बेड नंबर सात पर मोबाइल कान में रखकर रो रहा था | 
"हार्ट-अटैक आया था तेरे बाबूजी को | बस स्नेहा स्नेहा करते रहे |" सभ्रांत महिला 3 ने फोन ले लिया, "बोले बहुत बुरा किया उसे साथ | उसी की सजा मिल रही है | अरे अपनी ही बच्ची थी, क्या हुआ जो विजातीय से शादी की | एक बार हाल-चाल तो पूछती ... " सभ्रांत महिला 3 ने अचानक से फोन हाथ से गिर जाने दिया, "स्नेहा के पति की किडनी खराब हो गयी है | आलोक... आलोक ने किडनी दी, नौ साल के आलोक ने ..." सभ्रांत महिला 3 का पति फिर से हार्ट-अटैक खा गया शायद |

एम्स रेलवे रिज़र्वेशन काउंटर पर काफी भीड़ थी, खैर मुझे कोई रिजर्वेशन नहीं कराना था | लेकिन लाइन में सारे मायूस चेहरे, भीड़ में एक भी लड़की नहीं | इस बात पे भी गुस्सा आ जाता है, लेकिन क्या कर सकता हूँ | पता नहीं, अस्पताल में लडकियाँ क्यों नहीं आती किसी के साथ | आती हैं तो हमेशा जली हुई | मेरे अन्दर का इंसान रोज़ घुटता है, मरने की कोशिशें करता है | कभी देखता हूँ कि किसी आरती को मैंने जला दिया, सभ्रांत महिला 2  के पति का गला घोंट दिया | राजू, आदिल के खाने में जहर मिला दिया | आलोक, नौ साल की उम्र में मसीहा बनता है, मार डाला उसको भी | मेरे जिस्म पर खून के कई धब्बे हैं | खुद को छलनी छलनी किया है, लेकिन मौत नहीं | आँखों के कोने से आँसू की बूंदे छलक जाती है, बरबस मेरे हाथों में एक गिरेबान आ जाता है | दुनिया के दोमंजिले पर बैठने वाले का क्या यही इन्साफ है ? 
"तुम वादा कर सकती हो कि तुम मुझे छोड़ कर नहीं जाओगी ?" मैं बिनब्याही माँ की तरह पूछता हूँ, "क्यों एक अधूरे आदमी के साथ जिंदगी गुजारना चाहोगी तुम भी ?"
"डोंट से लाइक दैट | प्लीज़, इट हर्ट्स | ये सब बार बार मत सुनाया करो |" उसकी आवाज भर्रा आई है | मैं अपने आप से ही शर्मिंदा हूँ, इसलिए चुप रहता हूँ |
"...      ...      ...     विल यू मैरी मी ?" मोबाइल के दोनों तरफ सिर्फ ख़ामोशी धड़क रही है | 

Wednesday, December 1, 2010

ज़रूरत भी नहीं है

यह कविता आज नैट पर इत्तेफाकन कवि निरंजन श्रोत्रिय से हुई मुलाक़ात के बाढ़ यहाँ लग रही है. निरंजन श्रोत्रिय का पहला संग्रह २००२ में छाप कर आया था  जहाँ से जन्म लेते हैं पंख. उनका दूसरा संकलन जुगलबंदी २००८ में आया. उन की कविताओं के बारे में एक लम्बी पोस्ट जल्दी लगाऊंगा. फिलहाल उनकी यह ताज़ा कविता पढ़िए. 



ज़रूरत भी नहीं है 

भरोसा नहीं होता लेकिन यह सच है
वह कभी कह नहीं पाई अपनी माँ से
न जाने क्यों
अपनी सग़ी बहन से भी
लेकिन शादी के बाद उसने साझा किया
इसे अपनी ननद से
कोई गायनी प्राब्लम थी उसे!

देवर उसका नाम सुनील
अपनी भाभी के लिए दरअसल एजेंट सुनील
समस्या कोई भी सुलटा सकता पलक झपकते

एक दिन जब उसे अपने एकांत में फफक कर रोना था
वह रोई अपने ससुर के सीने में मुँह छुपाकर
अरे....जो निकले उसके पिता ही
रोई इतना कि भींग गया कुरता उनका

और अंत में जिसे भारतीय परंपरा में
'सास' कहते हैं
मुट्ठी में भींचते हुए एक पत्र समझाया उसे...
'बेटी...बचपन में हो जाती है ऐसी नादानी
पूरा जीवन पड़ा है सामने...!'

इस तरह एक औरत
इस इक्कीसवीं सदी में
आत्महत्या करने से बच गई

यह सब उसके पति तक को पता नहीं था
कथित ससुराल वालों का मानना था
--इसकी ज़रूरत भी नहीं है!

(चित्र: शबनम गिल की पेंटिंग -  दैट वूमैन