Sunday, January 29, 2012
नए तिब्बत की कविता - ८
दगा
तेनजिन त्सुंदे
हमारे घर,
हमारे गाँव, हमारे देश को बचाने की कोशिश में
मेरे पिता ने अपनी जान गंवाई.
मैं भी लड़ना चाहता था.
लेकिन हम लोग बौद्ध हैं.
शांतिप्रिय और अहिंसक.
सो मैं क्षमा करता हूँ अपने शत्रु को.
लेकिन कभी कभी मुझे लगता है
मैंने दगा दिया अपने पिता को.
Saturday, January 28, 2012
नए तिब्बत की कविता - ७
तेनजिन त्सुंदे की कविताओं की सीरीज जारी है
मैं थक गया हूँ
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ दस मार्च के उस अनुष्ठान से
धर्मशाला की पहाड़ियों से चीखता हुआ.
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ सड़क किनारे स्वेटरें बेचता हुआ
चालीस सालों से बैठे-बैठे, धूल और थूक के बीच इंतज़ार करता
मैं थक गया हूँ
दाल-भात खाने से
और कर्नाटक के जंगलों में गाएं चराने से.
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ मजनू टीले की धूल में
घसीटता हुआ अपनी धोती.
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ लड़ता हुआ उस देश के लिए
जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं.
मैं थक गया हूँ
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ दस मार्च के उस अनुष्ठान से
धर्मशाला की पहाड़ियों से चीखता हुआ.
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ सड़क किनारे स्वेटरें बेचता हुआ
चालीस सालों से बैठे-बैठे, धूल और थूक के बीच इंतज़ार करता
मैं थक गया हूँ
दाल-भात खाने से
और कर्नाटक के जंगलों में गाएं चराने से.
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ मजनू टीले की धूल में
घसीटता हुआ अपनी धोती.
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ लड़ता हुआ उस देश के लिए
जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं.
नए तिब्बत की कविता - ६
तिब्बतपन
तेनजिन त्सुंदे
निर्वासन के उन्तालीस साल.
तो भी कोई देश हमारा समर्थन नहीं करता.
एक भी देश तक नहीं!
हम यहाँ शरणार्थी हैं.
खो चुके एक देश के लोग.
किसी भी देश के नागरिक नहीं.
तिब्बती - दुनिया की सहानुभूति के पात्र;
शांत मठवासी और जिंदादिल परम्परावादी;
एक लाख और कुछ हज़ार
अच्छे से घुले-मिले हुए
आत्मसात कर लेने वाले तमाम सांस्कृतिक आधिपत्यों में.
हरेक चेक-पोस्ट और दफ्तर में
मैं एक "भारतीय - तिब्बती" हूँ.
मुझे हर साल अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट
रिन्यू करना होता है एक सलाम के साथ -
भारत में जन्मा एक शरणार्थी.
मैं भारतीय अधिक हूँ.
सिवा अपने चपटे तिब्बती चेहरे के.
"नेपाली?" "थाई?" "जापानी?"
"चीनी?" "नागा?" "मणिपुरी?"
कोई नहीं पूछता - "तिब्बती?"
मैं तिब्बती हूँ.
अलबत्ता मैं तिब्बत से नहीं आया.
कभी गया भी नहीं वहां.
तो भी सपना देखता हूँ
वहां मरने का.
Friday, January 27, 2012
मारियो मिरान्डा की यादें
गोवा की शिथिल, समुद्री छवियों को संसार के सामने पेश करने वाले मारियो मिरान्डा पहले कलाकार थे - गोवा के लोग, उनके विचित्र बाज़ार, ढलवां छतों वाले मकान और भीड़ भरे शराबखाने-कहवाघर.
उनकी रेखाएं अद्वितीय होती थीं. मारियो मिरान्डा को बतौर कार्टूनिस्ट सबसे ज़्यादा प्रसिद्धि उनके बनाए टिपिकल चरित्रों जैसे बण्डलदास और मिस नीम्बूपानी से मिली लेकिन वे एक साधारण कार्टूनिस्ट से कहीं बड़े जीनियस थे. अपनी दुनिया भर की यात्राओं को कार्टूनों और स्केचेज़ के जरिए उकेर कर उन्होंने यात्रावृत्तों के लिए एक नई फॉर्म ईजाद की थी.
पिछले महीने मारियो मिरान्डा ८५ वर्ष की आयु में दिवंगत हुए. उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके कुछ स्केचेज़ पेश हैं -
(ऊपर से नीचे - चोर बाज़ार, पुराना पेरिस, रेस्तरां क्रोकोडाइल, सेंट फ्रांसिस जेवियर, शिवाजी. कुछ स्केच कल भी देखें)
नए तिब्बत की कविता - ५
अड़तीस साल के तेनजिन त्सुंदे कहते हैं - "मानवीय कथाओं में हमेशा एक सार्वभौमिक अनुगूंज होती है. मैं मानता हूँ कि जहां मेरा दिल में अपने परिवार के साथ अपने घर में रह सकने के एक सपने की टीस होगी, यह नैसर्गिक होगा कि हर कोई उस दर्द को पहचान लेगा, चाहे मेरा पाठक एक चीनी ही क्यों न हो."
तेनजिन की एक और कविता -
हताश समय
मार डालो मेरे दलाई लामा को
ताकि मैं बंद कर दूं यकीन करना.
दफ़ना दो मेरा सिर
फोड़ दो उसे
मेरे कपड़े उतार दो
जंजीरों में बाँध दो.
बस मुझे आजाद न करना.
इस कैदखाने के भीतर
यह शरीर तुम्हारा है.
लेकिन इस शरीर के भीतर
मेरा यकीन बस मेरा है.
तुम चाहते हो न?
मुझे मार डालना यहीं - ख़ामोशी के साथ.
ध्यान रखना एक भी सांस न बचे.
बस मुझे आजाद न करना.
अगर तुम चाहो
तो ऐसा फिर से करना.
बिलकुल शुरू से -
मुझे अनुशासित करो
नए सिरे से शिक्षित करो
अपने सिद्धांत सिखलाओ
मुझे दिखलाओ अपनी कम्युनिस्ट तिकड़में
बस मुझे आजाद न करना.
मार डालो मेरे दलाई लामा को
और मैं
बंद कर दूंगा यकीन करना.
तेनजिन की एक और कविता -
हताश समय
मार डालो मेरे दलाई लामा को
ताकि मैं बंद कर दूं यकीन करना.
दफ़ना दो मेरा सिर
फोड़ दो उसे
मेरे कपड़े उतार दो
जंजीरों में बाँध दो.
बस मुझे आजाद न करना.
इस कैदखाने के भीतर
यह शरीर तुम्हारा है.
लेकिन इस शरीर के भीतर
मेरा यकीन बस मेरा है.
तुम चाहते हो न?
मुझे मार डालना यहीं - ख़ामोशी के साथ.
ध्यान रखना एक भी सांस न बचे.
बस मुझे आजाद न करना.
अगर तुम चाहो
तो ऐसा फिर से करना.
बिलकुल शुरू से -
मुझे अनुशासित करो
नए सिरे से शिक्षित करो
अपने सिद्धांत सिखलाओ
मुझे दिखलाओ अपनी कम्युनिस्ट तिकड़में
बस मुझे आजाद न करना.
मार डालो मेरे दलाई लामा को
और मैं
बंद कर दूंगा यकीन करना.
नए तिब्बत की कविता - ४
तेनजिन त्सुंदे की कविताओं की सीरीज जारी है -
क्षितिज
अपने घर से तुम पहुँच गए हो
यहाँ क्षितिज तलक.
यहाँ से अगले की तरफ
ये चले तुम.
वहां से अगले
अगले से अगले
क्षितिज से क्षितिज.
हर कदम है एक क्षितिज.
कदमों की गिनती करो
और उनकी संख्या याद रखना.
सफ़ेद कंकडों को पहचान लो
और विचित्र अजनबी पत्तियों को.
घुमावों को चीन्ह लो
और चारों तरफ की पहाड़ियों को
क्योंकि तुम्हें
दोबारा घर आने की ज़रूरत पड़ सकती है.
क्षितिज
अपने घर से तुम पहुँच गए हो
यहाँ क्षितिज तलक.
यहाँ से अगले की तरफ
ये चले तुम.
वहां से अगले
अगले से अगले
क्षितिज से क्षितिज.
हर कदम है एक क्षितिज.
कदमों की गिनती करो
और उनकी संख्या याद रखना.
सफ़ेद कंकडों को पहचान लो
और विचित्र अजनबी पत्तियों को.
घुमावों को चीन्ह लो
और चारों तरफ की पहाड़ियों को
क्योंकि तुम्हें
दोबारा घर आने की ज़रूरत पड़ सकती है.
Thursday, January 26, 2012
साजन ये मत जानियो की तोरे बिछरत मोहे चैन
महान क़व्वाल मरहूम मुंशी रज़ीउद्दीन अहमद खान (१९१२-२००३) भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े क्लासिकल गवैयों में शुमार किए जाते थे. उनका ताल्लुक़ क़व्वाली के सबसे बड़े घराने यानी दिल्ली के क़व्वाल बच्चा घराने से रहा. उनके ख़ानदान को शाही संरक्षण हैदराबाद के निजाम के दरबार से मिलता आ रहा था. निजाम के पतन के बाद वे पाकिस्तान चले आये. यहाँ उन्होंने अपने भाई मंज़ूर नियाज़ी और अपने चचेरे भाई बहाउद्दीन क़व्वाल के साथ अपनी क़व्वाली पार्टी बनाई. यह टीम १९६६ तक ही चल सकी. इस के बाद उन्होंने अकेले ही इस क्षेत्र में काम किया और अपने बच्चों फरीद अयाज़ और अबू मोहम्मद को क़व्वाली के गुर सिखाए अपनी मौत तक वे भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियों का अध्ययन करते रहे.
दीगर है कि उस्ताद बहाउद्दीन क़व्वाल को आप एकाधिक बार कबाड़खाने पर सुन चुके हैं. और उनके लायक बेटों फरीद अयाज़ और अबू मोहम्मद को भी. बल्कि फरीद अयाज़ और अबू मोहम्मद को तो आपने कल ही सुना होगा. आज बड़े उस्ताद को सुनिए. उनके बेटे उनके साथ जुगलबंदी कर रहे हैं -
नए तिब्बत की कविता - 3
तेनजिन त्सुंदे की कविताओं की सीरीज जारी है -
मुंबई में एक तिब्बती
मुंबई में एक तिब्बती
को विदेशी नहीं समझा जाता.
वह एक चाइनीज़ ढाबे
में रसोइया होता है.
लोग समझते वह चीनी है
बीजिंग से आया कोई भगौड़ा
वह परेल ब्रिज की छाँह में
स्वेटरें बेचता है गर्मियों में.
लोग समझते हैं वह
कोई रिटायर हो चूका नेपाली बहादुर है.
मुंबई में एक तिब्बती
बम्बइया हिन्दी में गाली देता है
तनिक तिब्बती मिले लहज़े के साथ
और जब उसकी शब्द - क्षमता खतरे में पड़ती है
ज़ाहिर है वह तिब्बती बोलने लगता है.
ऐसे मौकों पर पारसी हंसने लगते हैं.
मुंबई में एक तिब्बती को
पसंद आता है मिड-डे उलटना
उसे पसंद है एफ़ एम. अलबत्ता वह नहीं करता
तिब्बती गाना सुन पाने की उम्मीद
वह एक लालबत्ती पर बस पकड़ता है
दौडती ट्रेन में घुसता है छलांग मारता
गुज़रता है एक लम्बी अंधेरी गली से
और जा लेटता है अपनी खोली में.
उसे गुस्सा आता है
जब लोग उस पर हँसते हैं
"चिंग-चौंग-पिंग-पौंग"
मुंबई में एक तिब्बती
अब थक चूका है
उसे थोड़ी नींद चाहिए और एक सपना.
११ बजे रात की विरार फास्ट में
वह चला जाता है हिमालय.
सुबह ८:०५ की फास्ट लोकल
उसे वापस ले आती है चर्चगेट
महानगर में - एक नए साम्राज्य में.
मुंबई में एक तिब्बती
मुंबई में एक तिब्बती
को विदेशी नहीं समझा जाता.
वह एक चाइनीज़ ढाबे
में रसोइया होता है.
लोग समझते वह चीनी है
बीजिंग से आया कोई भगौड़ा
वह परेल ब्रिज की छाँह में
स्वेटरें बेचता है गर्मियों में.
लोग समझते हैं वह
कोई रिटायर हो चूका नेपाली बहादुर है.
मुंबई में एक तिब्बती
बम्बइया हिन्दी में गाली देता है
तनिक तिब्बती मिले लहज़े के साथ
और जब उसकी शब्द - क्षमता खतरे में पड़ती है
ज़ाहिर है वह तिब्बती बोलने लगता है.
ऐसे मौकों पर पारसी हंसने लगते हैं.
मुंबई में एक तिब्बती को
पसंद आता है मिड-डे उलटना
उसे पसंद है एफ़ एम. अलबत्ता वह नहीं करता
तिब्बती गाना सुन पाने की उम्मीद
वह एक लालबत्ती पर बस पकड़ता है
दौडती ट्रेन में घुसता है छलांग मारता
गुज़रता है एक लम्बी अंधेरी गली से
और जा लेटता है अपनी खोली में.
उसे गुस्सा आता है
जब लोग उस पर हँसते हैं
"चिंग-चौंग-पिंग-पौंग"
मुंबई में एक तिब्बती
अब थक चूका है
उसे थोड़ी नींद चाहिए और एक सपना.
११ बजे रात की विरार फास्ट में
वह चला जाता है हिमालय.
सुबह ८:०५ की फास्ट लोकल
उसे वापस ले आती है चर्चगेट
महानगर में - एक नए साम्राज्य में.
नए तिब्बत की कविता - २
सत्तर की दहाई के शुरुआती सालों में मनाली के नज़दीक भारत की सरहदों पर बन रही सडकों पर मज़दूरी कर रहे एक गरीब तिब्बती शरणार्थी परिवार में जन्मे तेनजिन की तीन पुस्तकें छाप चुकी हैं. इनमें दो कविता-संग्रह हैं और एक उनके लेखों का संग्रह. अपना पहला कविता संग्रह छपने के लिए उन्होंने अपने सहपाठियों से पैसे उधार मांगे थे - तब वे बम्बई में अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. कर रहे थे.
१९९९ में तेनजिन ने फ्रेंड्स ऑफ तिब्बत (इण्डिया) की सदस्यता ग्रहण की. तब से अब तक वे इस संगठन से जुड़े हैं और वर्तमान में महासचिव हैं. २००२ में उन्होंने बम्बई के ओबेरॉय टावर्स में तिब्बती झंडा और एक बैनर फहराया था जिस पर लिखा था - "तिब्बत को आजाद करो". भारत का दौरा कर रहे चीनी राष्ट्रपति उसी इमारत में भारत के बड़े व्यापारियों की एक सभा को संबोधित कर रहे थे. इस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इस कारनामे की तरफ खींचा और भारतीय पुलिस अफसरान ने जेल में उन्हें अपने अधिकारों की पैरवी करने की हिम्मत रखने की दाद भी दी.
आज उनकी एक और कविता -
निर्वासन का घर
चू रही थी हमारी खपरैलों वाली छत
और चार दीवारें ढह जाने की धमकी दे रही थीं
लेकिन हमें बहुत जल्द लौट जाना था अपने घर.
हमने अपने घरों के बाहर
पपीते उगाये,
बगीचे में मिर्चें,
और बाड़ों के वास्ते चंगमा,
तब गौशालों की फूंस-ढंकी छत से लुढ़कते आए कद्दू
नांदों से लड़खड़ाते निकले बछड़े,
छत पर घास
फलियों में कल्ले फूटे
और बेलें दीवारों पर चढ़ने लगीं,
खिड़की से होकर रेंगते आने लगे मनीप्लांट,
ऐसा लगता है हमारे घरों की जड़ें उग आयी हों.
बाड़ें अब बदल चुकी हैं जंगल में.
अब मैं कैसे बताऊँ अपने बच्चों को
कि कहाँ से आये थे हम?
(चंगमा - बेंत जैसा लचीले तने वाला एक पेड़)
१९९९ में तेनजिन ने फ्रेंड्स ऑफ तिब्बत (इण्डिया) की सदस्यता ग्रहण की. तब से अब तक वे इस संगठन से जुड़े हैं और वर्तमान में महासचिव हैं. २००२ में उन्होंने बम्बई के ओबेरॉय टावर्स में तिब्बती झंडा और एक बैनर फहराया था जिस पर लिखा था - "तिब्बत को आजाद करो". भारत का दौरा कर रहे चीनी राष्ट्रपति उसी इमारत में भारत के बड़े व्यापारियों की एक सभा को संबोधित कर रहे थे. इस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इस कारनामे की तरफ खींचा और भारतीय पुलिस अफसरान ने जेल में उन्हें अपने अधिकारों की पैरवी करने की हिम्मत रखने की दाद भी दी.
आज उनकी एक और कविता -
निर्वासन का घर
चू रही थी हमारी खपरैलों वाली छत
और चार दीवारें ढह जाने की धमकी दे रही थीं
लेकिन हमें बहुत जल्द लौट जाना था अपने घर.
हमने अपने घरों के बाहर
पपीते उगाये,
बगीचे में मिर्चें,
और बाड़ों के वास्ते चंगमा,
तब गौशालों की फूंस-ढंकी छत से लुढ़कते आए कद्दू
नांदों से लड़खड़ाते निकले बछड़े,
छत पर घास
फलियों में कल्ले फूटे
और बेलें दीवारों पर चढ़ने लगीं,
खिड़की से होकर रेंगते आने लगे मनीप्लांट,
ऐसा लगता है हमारे घरों की जड़ें उग आयी हों.
बाड़ें अब बदल चुकी हैं जंगल में.
अब मैं कैसे बताऊँ अपने बच्चों को
कि कहाँ से आये थे हम?
(चंगमा - बेंत जैसा लचीले तने वाला एक पेड़)
Wednesday, January 25, 2012
ईश्वर और गीध
ईश्वर और गीध


बहुत पहले जब कायदा कानून नही था , गीध बहुत ताक़त वर पक्षी था, और इनसानी बच्चों को खा जाया करता था . वे हमेशा अकेले खेल रहे बच्चों की ताक मे रहता और मौका पाते ही उन्हे उठा ले जाता था . एक गाँव मे लोग गीध के इस कृत्य से परेशान हो गए थे. अतः उन्हो ने ईश्वर के पास शिकायत लगाई. प्रभु इस गीध का कुछ करो वर्ना यह तो हमारी संतति को आगे बढ़ने ही न देगा . ईश्वर ने उन्हे आश्वस्त किया और गीध के पास गया. गीध उस समय बच्चे का गोश्त चबा रहा था. ईश्वर ने गीध से पूछा , तुम इंसानी बच्चों को क्यों उठा ले जाते हो? गीध ने कहा क्यों कि मुझे उन का माँस बहुत पसन्द है. ईश्वर ने कहा , यदि युम इन्हे छोड़ कर कुछ और खाना शुरू कर दो तो तुम्हे अपना मंत्री बनाऊँगा. गीध ने उत्तर दिया, तुम मुझे इस से बेहतर माँस बताओ, तो आगे से इसे मुँह से नही लगाऊँगा. ईश्वर सोचने लगा, इंसानी माँस से बेह्तर और कौन सा माँस हो सकता है ? उसे कुछ नही सूझा. फिर उस ने धमकाया, देखो मै यहाँ का राजा होता हूँ तुम्हे मेरी बात माननी चाहिए. गीध ने कहा , राजा उसे मानता हूँ जिस के पास ताक़त होती है. ईश्वर का चेहरा उतर गया. उसे गीध की ताक़त का पता था . लेकिन प्रकट मे बोला, बहुत घमण्ड है अपनी ताक़त पर ? गीध ने कहा कि उसे कोई घमण्ड वमण्ड नहीं है, वह सिद्ध कर सकता है कि उस के पास ताक़त है. ईश्वर की आँखों मे कुटिल चमक आ गई. बोला अच्छा एक गेम खेलते हैं . यदि तुम जीत गए तो तुम्हे बच्चे खाने की अनुमति मिल जाएगी. हार गए तो इनसानी बच्चे तो क्या , किसी भी ज़िन्दा जानवर का शिकार नही कर पाओगे . ठीक है बताओ क्या गेम है ? ईश्वर ने शर्त रखी-- - मक्खन के ढेले को अपनी चोंच से टुकड़े टुकड़े करना होगा . गीध हँसा...... मंज़ूर है. रखो इस पत्थर पे मक्खन का ढेला. ईश्वर अपनी कुटिल बुद्धि पर प्रसन्न हो रहा था...... गीध शोर मचाते हुए गोल गोल ऊपर उड़ने लगा. उस का कंफिडेंस देख कर ईश्वर संशय मे पड़ गया. कहीं इस ने मक्खन के टुकड़े कर दिए तो ? उसे एक चाल सूझी. जब गीध ऊपर उड़ रहा था तो उस ने चुपके से मक्खन की जगह पर एक सफेद चकमक पत्थर रख दिया. उधर गीध तीर की तरह लक्ष्य पर झपटा. जब उस की वज्र जैसी चोंच चकमक पत्थर से टकराई तो पत्थर के सैकड़ों टुकड़े हो गये. लेकिन खुद गीध भी बेहोश हो गया.
अब क्या करें ईश्वर तो हार गया ! लेकिन ईश्वर को कैसे हरा दें ? तो बच्चो, ईश्वर ने यह किया कि चुपके से चकमक पत्थर समेट के एक तरफ कर दिए, और मक्खन के ढेले मे बेहोश गीध की चोंच घुसा कर चलता बना. होश मे आने पर गीध ने देखा कि मक्खन का ढेला टूटा न था फक़त एक छेद भर निकली थी उस में. गीध को अपनी घमण्ड का अहसास हुआ. तब से गीध अपना बचन निभा रहा है. केवल मरे हुए जानवरों को खा कर गुज़ारा कर रहा है.
अब क्या करें ईश्वर तो हार गया ! लेकिन ईश्वर को कैसे हरा दें ? तो बच्चो, ईश्वर ने यह किया कि चुपके से चकमक पत्थर समेट के एक तरफ कर दिए, और मक्खन के ढेले मे बेहोश गीध की चोंच घुसा कर चलता बना. होश मे आने पर गीध ने देखा कि मक्खन का ढेला टूटा न था फक़त एक छेद भर निकली थी उस में. गीध को अपनी घमण्ड का अहसास हुआ. तब से गीध अपना बचन निभा रहा है. केवल मरे हुए जानवरों को खा कर गुज़ारा कर रहा है.
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