Thursday, November 29, 2012
Wednesday, November 28, 2012
देखना एक दिन यह बातूनी चुड़ैल
असद ज़ैदी की कतई एक
अलहदा किस्म की कविता पेश है –
दूसरी तरफ
- असद ज़ैदी
- असद ज़ैदी
कहीं भी दाखिल होते ही
मैं बाहर जाने का रास्ता ढूँढ़ने लगता हूँ
मेरी यही उपलब्धि है कि
मुझे ऐसी बहुत जगहों से
बाहर निकलना आता है
जहाँ दाखिल होना मेरे लिए नहीं मुमकिन
कि मैं तेरह जबानों में नमस्ते
और तेईस में अलविदा कहना जानता हूँ
कोई बोलने से ज्यादा हकलाता हो
चलने से ज्यादा लंगड़ाता हो
देखने से ज्यादा निगाहें फेरता हो
जान लो मेरे कबीले से है
मेरी बीबी - जैसा कि अक्सर होता है
मुख्तलिफ कबीले की है
उससे मिलते ही आप उसके
मुरीद हो जाएँगे
देखना एक दिन यह बातूनी चुड़ैल
हँसते- हँसते मेरा खून पी जाएगी.
Tuesday, November 27, 2012
संवेदना को मार रही है अपनी भाषा में अत्याचार की आवाज़
अनुवाद की भाषा
- असद ज़ैदी
अनुवाद की भाषा से अच्छी क्या भाषा हो सकती है
वही है एक सफ़ेद परदा
जिस पर मैल की तरह दिखती है हम सबकी कारगुजारी
सारे अपराध मातृभाषाओं में किए जाते हैं
जिनमें हरदम होता रहता है मासूमियत का विमर्श
ऐसे दौर आते हैं जब अनुवाद में ही कुछ बचा रह जाता है
संवेदना को मार रही है
अपनी भाषा में अत्याचार की आवाज़!
Monday, November 26, 2012
आकाश एक तंग छतरी बनकर रह गया है
घंटी
- असद ज़ैदी
धरती पर कोई सौ मील दूर सुस्त कुत्ते की तरह पड़ा हमारा दर्द
अचानक आ घेरता है नए शहर में
तेज़-रफ़्तार वाहन पर बैठे-बैठे
आँखें मुंद जाती हैं मेज़बान अचंभे में पड़ जाते हैं :
तुम ये क्या कर रहे हो वह पूछते हैं
हम विदा हो रहे हैं
हम विदा हो रहे हैं पारे की बूँदों की तरह
हम विदा हो रहे हैं चमकते हुए
हम क्या कर रहे हैं दोस्तो ? हम विदा हो रहे हैं
आकाश एक तंग छतरी बनकर रह गया है इस जगह की
हर चीज़ मेरे गले तक आ गई है
दिन की यह निर्णायक घड़ी एक सतत घंटी बनकर
टनटना रही है सलाम !
मैं अब जाऊँगा
Sunday, November 25, 2012
जैसी पाँचवीं कक्षा में गणित मेरे लिए वैसी इस शहर में भीड़ थी
दिल्ली की
नगरिकता
- असद ज़ैदी
जैसी पाँचवीं कक्षा में गणित मेरे लिए वैसी इस शहर में भीड़ थी
फ़्लैशबैक ख़त्म हुआ. बारिश में भीगता एक रोज़ चला जाता था
कि एक भली औरत ने मुझे एक छाता दिया जो मैंने ले लिया
बिना कुछ बोले अंत में एक दिन एक मक़ाम पर हम विदा हुए
कि एक भली औरत ने मुझे एक छाता दिया जो मैंने ले लिया
बिना कुछ बोले अंत में एक दिन एक मक़ाम पर हम विदा हुए
कहिए श्रीमान कैसे हैं ? यह एक दोस्त का ख़त था शहर के
दूसरे कोने से
दूसरे कोने से
मैं वहाँ गया
गलियों में बदबू थी अँधेरा कुछ नहीं कहता था
उस दोस्त ने दाँत चमकाए
और मुझे प्यार से खाना खिलाया
वहाँ की हर चीज़ मेरा मुँह देखती थी
हमने थॊड़ी शराब पी ली रेडियो भर्रा रहा था
फटे गले से कोई गाता जाता था
अचानक एक विश्वास मुझमें आने लगा चाहे कुछ भी हो
मैं अनंतकाल तक ज़िन्दा रहूँगा
गलियों में बदबू थी अँधेरा कुछ नहीं कहता था
उस दोस्त ने दाँत चमकाए
और मुझे प्यार से खाना खिलाया
वहाँ की हर चीज़ मेरा मुँह देखती थी
हमने थॊड़ी शराब पी ली रेडियो भर्रा रहा था
फटे गले से कोई गाता जाता था
अचानक एक विश्वास मुझमें आने लगा चाहे कुछ भी हो
मैं अनंतकाल तक ज़िन्दा रहूँगा
Saturday, November 24, 2012
मोहन वीणा पर राग तिलक कामोद
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, ग्रेमी और पद्म श्री जैसे सम्मानों से अलंकृत पंडित विश्वमोहन भट्ट हिन्दुस्तानी
शास्त्रीय संगीत जान हैं। उन्होने वीणा और गिटार का संयोग करके मोहन वीणा आविष्कृत
की। पश्चिम और पूर्व का यह विस्मरणीय संयोजन
श्रोताओं को एक अलग दुनिया में ले जाता है। आइये सुनते हैं उनसे मोहन वीणा पर राग तिलक
कामोद। ख्याल गायकों का सर्वप्रिय यह रात के दूसरे पहर का राग है।
असद ज़ैदी का हलफ़नामा
हलफ़नामा
- असद ज़ैदी
नहीं ऐसा कभी नहीं हुआ
आदमी और कबूतर ने एक दूसरे को नहीं देखा
औरतों ने शून्य को नहीं देखा
कोई द्रव यहाँ बहा नहीं...
नहीं कोई बच्चा यहाँ
सरकंडे की तलवार लेकर
मुर्गी के पीछे नहीं भागा
बंदरों के काफिलों ने कमान मुख्यालय पर डेरा नहीं डाला
मैंने सारे लालच सारे शोर के बावजूद केबल कनेक्शन
नहीं लगवाया
चचा के मिसरों को दोहराना नहीं भूला
नहीं बहुत सी प्रजातियों को मैंने नहीं जाना जो सुनना न चाहा
सुना नहीं,
गोया बहुत कुछ मेरे लिए नापैद था
नहीं पहिया कभी टेढा नहीं हुआ
नहीं बराबरी की बात कभी हुयी ही नहीं
{हो सकती भी न थी }
उर्दू कोई ज़बान ही न थी
अमीर खानी कोई चाल ही न थी
मीर बाक़ी ने बनवाई जो
कोई वह मस्जिद ही न थी
नहीं तुम्हारी आंखों में
कभी कोई फरेब ही न था
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