Tuesday, February 8, 2011

चित्रों में झांकता जैसलमेर

"घोड़ा कीजे काठ का, पिंड कीजे पाषाण
बख्तर कीजे लोह का, तब देखो जैसाण."
जो जैसलमेर आना चाहे उसके पास ऐसा घोड़ा हो जो थके नहीं (सिर्फ काठ का निर्जीव ही ऐसा हो सकता है), उसका शरीर पत्थर का हो,उस पर उसने लोहे का बख्तर पहन रखा हो तभी वो जैसलमेर पहुँच सकता है.
जैसलमेर के दुर्गम्य होने की बातें हमेशा कही जाती रही है.कुछ साल पहले तक सरकारी महकमे में जैसलमेर- बाड़मेर ट्रान्सफर का मतलब काले पानी जाना होता था. सरकारी तबादले में जैसलमेर जाने के लिए 'जा-साले-मर !' कहना चलन में रहा है.पर सारी बातें अब पुरानी और बासी हो चुकी है.लोग आज भी चाहे वहां ट्रान्सफर लेना पसंद न करते हों,घूमने के लिहाज से एक कम्प्लीट पैकेज है जैसलमेर.
तो लीजिये साहेबान,पेश है जैसलमेर की कुछ छंटेल फोटुएं.



Sunday, February 6, 2011

कविता समय





आगामी 25-26 फरवरी को ग्वालियर में  दख़ल विचार मंच तथा प्रतिलिपि पत्रिका के सहयोग से समकालीन कविता पर केन्द्रित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘कविता समय’ का आयोजन  पड़ाव स्थित कला वीथिका में  किया जा रहा है। ‘कविता का यूटोपिया और संकट’ विषय पर केन्द्रित इस आयोजन में देश भर के कवि तथा आलोचक हिस्सा लेंगे। देश भर में अपनी तरह के इस अनूठे दो दिवसीय आयोजन में नामवर सिंह, अशोक बाजपेयी, ज्ञानेन्द्रपति, आलोक धन्वा, वीरेन डंगवाल, अरुण कमल, नरेश अग्रवाल, राजेश जोशी, असद जैदी, कुमार अंबुज, लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप, बोधिसत्व, जितेन्द्र श्रीवास्तव,  गिरिराज किराडू, पंकज राग, गीत चतुर्वेदी सहित चालीस से अधिक कवि तथा आलोचक हिस्सेदारी करेंगे। इस दौरान न केवल समकालीन कविता की चुनौतियों तथा संकटों पर गहन विचार विमर्श होगा अपितु 25 से अधिक कवियों का विभिन्न सत्रों के काव्यपाठ भी होगा। ज्ञातव्य है कि ग्वालियर से शुरु हो रही यह शृंखला प्रतिवर्ष अलग-अलग शहरों में आयोजित होगी।

इस आयोजन के दौरान शहर के युवा कलाकारों के लिये कविता पोस्टर की एक कार्यशाला जाने-माने कलाकार विनय अम्बर (जबलपुर) तथा पंकज दीक्षित (अशोकनगर) के निर्देशन में संपन्न होगी तथा इन कलाकारों की कविता पोस्टर प्रदर्शनियाँ भी लगाई जायेंगी। इसके अलावा शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली तथा प्रतिलिपि प्रकाशन, जयपुर अपनी पुस्तकों की प्रदर्शनियाँ भी लगायेंगे और जयपुर के जाने-माने युवा पेंटर तथा कवि अमित कल्ला कविता आधारित पेंटिग्स का प्रदर्शन भी करेंगे। 

दो जिप्सी गीत


'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सौलिट्यूड' में बुएंदिया खानदान के प्रथमपुरुष होसे अर्कादियो बुएंदिया की एक जिप्सी 'मेल्कियादस' से दोस्ती का ख़ूब ज़िक्र हुआ है. इस महा आख्यान में इस चमत्कारी जिप्सी की मातृभाषा संस्कृत बताई गयी है, जो उसके या उसके पूर्वजों के मूल देश की तरफ एक संकेत है.
दुनिया के कोने कोने में बसे जिप्सी भले ही संस्कृत न बोलते हो पर शारीरिक बाह्याकृति के साथ साथ भाषाई आधार पर भी इन संगीतप्रेमी घुमक्कड़ों को भारतीय मूल का ही माना गया है. इनके बारे में एक अन्य पर बेहद महत्त्वपूर्ण पहलु ये है कि ये इतिहास के सर्वाधिक उत्पीड़ित समूहों में से एक हैं.
इन्हीं जिप्सियों बारे में भिक्षु चमनलाल की पुस्तक 'जिप्सी- भारत की विस्मृत संतति' (अनुवाद-डॉ.सत्यपाल रूहेला) में कुछ जिप्सी गीतों को भी संकलित किया गया है.इन्हीं कुछ में से दो गीत आपके लिए. इसी पुस्तक से साभार.

चिडियाँ और तारे

"मुझे बताओ, बूढ़े मित्र, यदि तुम बता सको
स्वर्ग में सितारों के लिए रोमानी क्या है?"
"हाँ, मेरे स्वामी, हम सितारों को शिरकी कहते हैं
और यह शब्द 'चिरीकल्स' या चिड़ियों से बना है
क्योंकि चिडियाँ और सितारे प्रकृति में समान है
सितारे स्वर्ग में प्रकाशपक्षी ही हैं
जो सदैव हमारे सिरों से ऊपर उड़ते रहते हैं
आर्डन पक्षी जो केवल अँधेरे में ही उड़ते हैं
और- चाँद स्वर्ग का स्वामी है
जो हर रात को अवश्य आता है
चारागाहों पर अपने मुर्गी के बच्चों को दाना खिलाने के लिए".

सर्वाधिक सुंदरी

"ओह, तुम यह कैसे जानती हो, मेरी पुत्री, कि तुम्हारा चेहरा सुन्दर है?"
"अवश्य, अवश्य, ऐसा ही है, मेरी माँ."
"लेकिन देखो, यहाँ घर में तो एक भी आइना नहीं है,
तुम यह कैसे जानती हो, मेरी पुत्री?"
"ओह,सड़क के ऊपर और नीचे, गोरे और भूरे लोग
कहते हैं कि कस्बे भर में मेरे जैसी सुंदरी दूसरी नहीं है."
"वे कैसे तुमसे बात करते हैं? जल्दी उत्तर दो,
और कोई झूठ न बोलना, मेरी पुत्री,
क्या वे गोर्सियो हैं या पुरानी रोमानी बोलते हैं?"
"ओह, उन्हें एक भी शब्द बोलने की ज़रूरत नहीं हैं, मेरी माँ,
उन्हें तो बस एक मृदु मुस्कान चाहिए
और मुझे यह समझते देर नहीं लगती,
कि मेरी जैसी सुंदरी देश भर में नहीं है."

(Image courtesy-Wikimedia)

Saturday, February 5, 2011

चाइल्डलाइक इनोसेंस

छटी क्लास में नये दोस्त बने थे कुछ , तो उनमें से एक था सुनील | सुनील अव्वल दर्जे का चोर था | वो घर से पैसे चुराकर लाता था, और हमें कुछ कुछ खिलाकर स्टाइल मारता था | मुझे भी उसकी संगति में मजा आने लगा था | हालांकि वो मुझे ज्यादा भाव नहीं देता था, लेकिन फिर भी अहसान सा करके मुझे भी अपने गिरोह में रहने की इजाजत दे देता था | घर में पैसों की बचत पर बहुत ध्यान दिया जाता था, इसलिए सुनील के साथ चोकोबार आइसक्रीम पहली बार खाई , वीडिओगेम पार्लर में खेला, और विद्या मन्दिर जैसे स्कूल से बंक मारा | एक दिन घर लाने वाली गाड़ी छूट गयी, पैदल घर पहुँचा तो बहुत देर हो गयी थी | माँ ने खाना खिलाया, और सिर्फ इतना पूछा कि इतनी देर क्यूँ हो गयी | मैं रो पड़ा, रोते रोते मैंने सब बताया कि सुनील घर से पैसे चुराकर लाता है, सबको खिलाता है और मैं भी उसके साथ खाता हूँ | माँ ने कुछ नहीं कहा, मैं रोता रहा और गुस्सा होता रहा | उसके बाद मैं कभी सुनील के साथ नहीं गया, जिसको लेकर अगले तीन सालों तक शाम को घर आते समय वे लोग हमेशा मुझसे लड़ते थे | मैं जितना लड़ सकता था, लड़ता रहा | सच की लड़ाई लड़ने की ऐसी कोई महान प्रेरणा मेरे अन्दर नहीं जागी थी, या थोपी नहीं गयी थी | न माँ ने मुझे मारा था, न सजा दी थी | न ही माँ ने फिर कभी मुझसे पूछा कि तू अब भी सुनील के साथ जाता है क्या? ये मेरे अन्दर ही कोई चीज़ थी , जिसने मुझे ये अहसास करा दिया था कि ये गलत है | इसी को मैं चाइल्डलाइक इनोसेंस कहता हूँ | सजा कभी कोई भी चीज़ सही नहीं कर सकती , सजा सिर्फ तुम्हारे मन में उस चीज को लेकर डर पैदा कर सकती है, लेकिन सही गलत का फर्क नहीं समझा सकती | चाइल्डलाइक इनोसेंस हम सबके अन्दर होती है , कहीं न कहीं हमारे अन्दर दस्तक देती भी होगी | अरबों खरबों को बेहद छोटी संख्या बना देने वाले नेताओं को भी रात को अचानक उठकर गला सूखता सा महसूस होता होगा | इटालियन मार्बल के फर्श पर चलते हुए शायद उनके अवचेतन मस्तिष्क में कहीं न कहीं ये बात आती होगी कि खैरु या मंगरू या उनका कोई बच्चा या कोई भी बच गया होता अगर ... | या कि बिहार का पूरा का पूरा गाँव शिक्षित होता अगर ये करोड़ों की कारें हमने अपनी मेहनत से कमाई होती | या कि भूस्खलन और दैवीय आपदाएं शायद उतनी विनाशक नहीं होती, जितनी हमने बना दीं हैं | जिस विश्वास और भरोसे के साथ हमने देश को चलाने के लिए एक किताब छापी थी , जिसका एक एक पन्ना हमसे गीता-कुरआन की तरह पवित्र मानने की उम्मीद की गयी थी, काश हमने माना होता | गढ़वाल में राजा को बोलंदा बदरी (बोलने वाले बद्रीविशाल, भगवान) कहा जाता था | वैसा ही कुछ विश्वास हमें मिलोर्ड पर भी होता है , आज भी है, न्याय की गद्दी पर बैठने वाला कभी गलत नहीं कर सकता | ये चाइल्डलाइक इनोसेंस हर एक को उनकी नींद से जगाये, उनका गला सुखाये , उन्हें शर्म आये, यही उम्मीद है ... 



Thursday, February 3, 2011

गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण

अभी अभी मेल पर मुझे यह प्राप्त हुआ है , तो आप लोग भी आनन्द लें




1. सादा जीवन, उच्च विचार: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था. पुराने और मैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ों पर खानाबदोश जीवन. जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो. जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतना समर्पित कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल की भी फुर्सत नहीं. और विचारों में उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया, सो मर गया' जैसे संवादों से उसने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.

२. दयालु प्रवृत्ति: ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था. इसलिए उसने ठाकुर के सिर्फ हाथों को सज़ा दी. अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था. पर उसके ममतापूर्ण और करुणामय ह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.


3. नृत्य-संगीत का शौकीन: 'महबूबा ओये महबूबा' गीत के समय उसके कलाकार ह्रदय का परिचय मिलता है. अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदय शुष्क नहीं था. वह जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझता था. बसन्ती को पकड़ने के बाद उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जाग उठा था. उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को एक पल में पहचान लिया था. गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.


4. अनुशासनप्रिय नायक: जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्ट से नाकाम होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती. अनुशासन के प्रति अपने अगाध समर्पण को दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.

5. हास्य-रस का प्रेमी: उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था. कालिया और उसके दो दोस्तों को मारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था. ताकि वो हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें. वह आधुनिक युग का 'लाफिंग बुद्धा' था.


6. नारी के प्रति सम्मान: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरण करने के बाद उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया. आज-कल का खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.


7. भिक्षुक जीवन: उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुद्ध द्वारा दिखाए गए भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था. रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जो भी सूखा-कच्चा अनाज मिलता था, वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था. सोना, चांदी, बिरयानी या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहीं की.


8. सामाजिक कार्य: डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों को सुलाने का भी काम करता था. सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सो जाएं. सरकार ने उसपर 50,000 रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था. उस युग में 'कौन बनेगा करोड़पति' ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रात अमीर बनाने का गब्बर का यह सच्चा प्रयास था.


9. महानायकों का निर्माता: अगर गब्बर नहीं होता तो जय और वीरू जैसे लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते. पर यह गब्बर के व्यक्तित्व का प्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.

Wednesday, February 2, 2011

ओ रे नील दोरिया.....

कुछ दिन पहले एक दोस्त ने इस गाने का लिंक भेजा. बांग्ला समझ पाने की डींग हांकने के बावजूद पूर्वी बंगाल की बांग्ला पूरी तरह समझ तो नहीं पाया, लेकिन स्वर और संगीत ने मानों कलेजा बींध दिया..विशेषकर शुरुआत में गायिका की धीमी पुकार ने सरोबार कर दिया. आप सब को सुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया. 'अर्नब एंड फ्रेंड्स' के बारे में कुछ नहीं जानता सिवाय इसके कि एक बांग्लादेशी बैंड है.. इनके कुछ और गाने यहाँ सुन सकते हैं.
(विडियो यूट्यूब से लिया गया है)


Monday, January 31, 2011

गट्टू भाई की नजर

गट्टू भाई अभी काहिरा हवाई अड्डे के बाहर मिल गए बैठने के लिए इतने बवाल के बीच पिरामिड बुक कराने आए थे।

न जाने कहां से आ या जा रहे थे वही जाने। वे जो कहते हैं मान लेता हूं क्योंकि वे समान्तर दुनिया के बाशिन्दे हैं जो इस दुनिया से कम असली नहीं है।

मैं उनसे कभी मिला नहीं लेकिन देखते आंखों से पहचान गया। पता ही होगा कि किसी की बात बहुत अचरज भरे ध्यान से सुनी जाती है तो उसकी आंखों में खिंचाव आ जाता है और वे बाहर की तरफ लटक आती हैं। अच्छा! ..हां!!! अब समझे तो हां आंखों से गट्टू भाई को पहचान गया। हमारे पुराणों में आंखे तो सुंदरी को देख के खिंचती हुई घुटनों तक आती पाई गई हैं। बाद में वही सुंदरी विरह में सांस के धक्कों से कई योजन फारवर्ड-बैकवर्ड मूवमेन्ट में दोलायमान पाई जाती है।

दुआ सलाम के बाद गट्टू भाई ने बताया कि उन्हें भारत सरकार सबसे अधिक उपभोक्ताओं को जागरूक करने के वास्ते भारत रत्न देने वाली है। किस खुशी में, तो बोले कि दारू की बोतल को कई साल देखके हैरान होने के वास्ते। आपकी हैरानी से भारत रत्न का क्या लेना देना होगा भाई साब तो बोले, जे ल्लो इस दुनिया में कुछ भी हैरानी से ही पैदा होता है। जे भारत रतन भला किस खेत की मूली हुआ।

अभी हाल के हाल फ्लाइट में पोन्टी चड्ढा और विजय माल्या मिल गे। पोन्टी तो अपने ह्यां का ठैरा। उसे तो मैं पैचान गया क्योंकि वो कमाए चाहे जितना लेकिन गिन नहीं सकता। और मालिया से उनने मिलवा दिया के जे अपने उत्तराखंड के ठाकुर साब हुए, बगैर इनके सपोट के तेरी ब्रेवरी चल नी सकती।

मैंने कई कि दोनों पढ़े लिखे लगते हो सबसे पैले जे बताओ कि एक लीटर में कितनी बूंदे अटा करे हैं। माल्या ने दाढ़ी पे हाथ फेर के कई कि ठाकुर साब, इतना महीन पीसना तो कभी हुआ नीं लेकिन समझ लो कि आजकल एक लीटर में हजार मिलीलीटर का आंकड़ा पूरे बल्ड में चल रहा हैगा। मैने पूछी के आधा लीटर में उनने कई के पान सौ मिलीलीटर। क्वाटर में उनने कई के यही कोई दो सौ पचास मिलीलीटर।

मेरा पारा थरमामीटर ऊपर। तब मैने कई के बौब्लेन्डर के दुस्मनों जे बताओ के फुल में सातसोपचास, अद्धी में तीनसोसाठ और पौव्वे में सिरफ एकसोअस्सी देके किसे चूतिया बना रै तुम एक जमाने से।

व्हईं बैठा एक उब्भोक्ता मामले सुलटाने वाला एक कानदार मंत्री हमारी बात सुन रिया था, उनने मेरा नाम पूछा तो हमने कहा पोन्टी बता देगा और उनने मोबाइल मिला के राष्टरपति के ह्वां सिपारिश कर दी।
मंत्री ने अपना कार्ड भी दिया था लेकिन उसके आगे ही खिड़की के बाहर हवा में पारसल कर दिया। जो सरकार खुद ही इतने दिनों से घटतोली करा रई हो उसके हाथ से रतन-वतन क्या लेना।

फारम हाउस पर अईयो पाल्टी करेंगे। उन्होंने चलते-चलते कहा, असोक भाई के दोस्त हो आना लगे हाथ बाघ की खाल भी दिखा देंगे जो लोटे का पानी छलक जाने से जरा और घैरी कलर की हो गई है।

गट्टू भाई का सांप


गट्टू भाई का सांप

कल एक दोस्त की दुकान के उद्घाटन में बहुत दिनों बाद गट्टू भाई से मुलाकात हुई.

गट्टू भाई हद दर्जे के गपोड़ी हैं. और मुझे उनका साथ अच्छा लगता है. दारू पीते हैं तो उनका तकिया कलाम "ज़रा बनइयो एक बौव्लेंडर बेटे" होता है. बताता चलूँ की जनाब बौव्लेंडर का पूरा नाम फ्लोरिस फौन बौव्लेंडर था. ये साहब हौलैंड के नामी हॉकी खिलाडी थे और उनके पेनाल्टी कॉर्नर पर गोल ठोकने की उनकी विशेषज्ञता के कारण समूचा हॉकी जगत कोई डेढ़ दशक तक खौफ़ में रहा था. भारत के खिलाफ एक ओलिम्पिक मैच में उन्होंने हमारी खाल में खासा भुस भरा था. गट्टू भाई एक ज़माने में हॉकी खेलते थे ऐसा मैंने सुना है. बौव्लेंडर द्वारा भारत को ध्वस्त किये जाने के बाद से ही गट्टू भाई इस खिलाड़ी के ऐसे फैन बने कि पीते ही टल्ली बना देने वाले अचूक पैग का नामकरण उसके नाम पर कर दिया. अर्थात यानी जिस तरह पेनाल्टी कॉर्नर मिलते ही बौव्लेंडर सीधे गोल ठोक दिया करता था उसी भांति पहला पैग पीते ही आदमी को टुन्नावस्था तक पहुँच जाने का सद्प्रयास करना चाहिए.

खैर. गट्टू भाई बढ़िया टैट थे. और गप्प मरने के मूड में भी.

गट्टू भाई द्वारा उनके फार्म हाउस में पानी से भरे लोटे से बाघ को मार देने का किस्सा हल्द्वानी शहर के अधिकाँश लोगों को मालूम है. बातों का सिलसिला कब उनके फार्म हाउस पर पहुंच गया मुझे याद नहीं पर उस के बाद उन्होंने जो गप्प मारी वो उन्ही की ज़बानी पेश करता हूँ -

"अशोक भाई, परसों फारम पे गया था. दिन में एक संपेरा घर के भार आ के तमाशा दिखने लगा. संपेरा बीन बजा रिया  और सांप नाचा कर रये. आठ-दस डलिया में से उन्ने सांप भार लिकाल्लिये और सब के फन हिलवा-हिलवा के डांस करवाने लगा. एक सांप तो मिथुन चक्कर्बरती से भी बढ़िया डिस्को कर रया था. बड़ी मौज का समां बन्निया था जब एक नौकर ने पीछे से आके मेरे कान में कुछ कया.

संपेरा बोरी में एक डलिया छुपा के बैठा हुआ था. मैंने उस से कई की बेटे जे डलिया का सांप भी भार लिकाल तो बो बोला कि ठाकुर साब जे सांप बीमार चल्लिया आज कल. मैंने कई कि ढक्कन तो खोल ले. बिचारे को भी हवा पानी खान दे. तो साब उन्ने बड़ी मान-मनव्वल के बाद जो डलिया का ढक्कन खोला तो एक धाँसू टैप का सांप अपनी मुंडी भार कर के मुझे देखने लगा. मैंने दिमाग पे जोर डाला तो याद आया की जे सांप तो जाना-पैचाना दिक्खे. मैंने नौकर से पूछी कि बेटे जरा देख के बतइयो तो. नौकर तुरंत पैचान गया. बोला कि मालिक जे तो अपना नीम के पेड़ के नीचे रैने वाला सांप हैगा.

मैंने फिर जरा धियान से देखा तो बो सांप अशोक भाई बो ई था. मैंने थामी ससुरे संपेरे कि गर्दन और पिछाड़ी पे दी दो लात कि साले हमारे फारम का सांप हमें ई दिखा रिया. अपने फारम के एक-एक सांप को जाना करूं मैं. कितना दुबला बना दिया तैने इसे साले. जा दूकान से दूध की थैली ले के आ एक. और खबरदार जो हमारे फारम के एक भी सांप पे आगे से निगाह डाली तो ... और हाँ दूध पिला के इस बच्चे को व्हंई छोड़ के आईयो फ़ौरन से जल्दी ..."

... इस के आगे का किस्सा आप अपने आप गढ़ सकते हैं क्यूंकि इस के बाद कि डिटेल्स मुझे याद नहीं रही. ऐसी बौव्लेंडर गप्प सुन चुकने के बाद होश में रह पाना नामुमकिन होता है.

पुनश्च: गट्टू भाई चरस के नियमित सेवन पर बहुत जोर देते हैं. अगर कभी कोई बढ़िया क्वालिटी का माल उन तक पहुँचता है तो मुझे फ़ोन कर के न्यौतना नहीं भूलते कि "अशोक भाई सांप के बांये कान के नीचे का बौफ्फाइन माल आया है. स्याम को आ जाओ अड्डे पे."


Friday, January 28, 2011

पूछो सूरज से क्या वह आएगा

श्श्श्श्श्श्श्श्श्श................. यह चन्द्र भागा नदी है। कभी इस के किनारे किन्नर रहते थे...........आज कल इस नदी मे शीत सो रहा है. .............

अभी सात दिन और सोया रहेगा ...... ५ फरवरी तक लाहुल में सब से ठन्डे दिन होते है ।यह फोटो मुझे छोटे भाई दिनेश से प्राप्त हुआ. कल वे लोग सामने दिख रहे पीर पंजाल की तलहटी में स्कींईग के लिए गए थे. इस ठण्ड मे अपनी एक पुरानी कविता याद आ रही है :




ठिठुरते मौसम की धार
छील छील ले जाती है त्वचाएं
बींधती हुई पेशियां
गड़ जाती हिड्डयों मे
छू लेती मज्जा को
स्नायुओं से गुज़रती हई
झनझना दे रही तुम्हें आत्मा तक...................

सूरज से पूछो, कहां छिपा बैठा है

बर्फ हो रही संवेदनाएं
अकड़ रहे शब्द
कंपकपाते भाव
नदियां चुप और पहाड़ हैं स्थिर!

कूदो
अंधेरे कुहासों में
खींच लाओ बाहर
गरमाहट का वह लाल-लाल गोला

पूछो उससे, क्यों छोड़ दिया चमकना

जम रही हैं सारी ऋचाएं
जो उसके सम्मान में रची गई
तुम्हारी छाती में
कि टपकेंगी आंखों से
जब पिघलेगी
जब हालात बनेंगे पिघलने के

कहो उससे, तेरी छाती में उतर आए!

छाती में उतर आए
कि लिख सको एक दहकती हुई चीख
कि चटकने लगे सन्नाटों के बर्फ
टूट जाए कड़ाके की नीन्द
जाग जाए लिहाफों में सिकुड़ते सपने
और मौसम ठिठुरना छोड़
तुम्हारे आस पास बहने लगे
कल-कल
गुनगुना पानी बनकर

पूछो उससे क्या वह आएगा ?

Thursday, January 27, 2011

ओसियां

जोधपुर से करीब साठ ही किलोमीटर का फासला है ओसियां कस्बे का, पर अभी कुछ दिनों पहले ही पहली बार वहाँ जाने का अवसर मिला. क़स्बा पुराना है ये पहले से ही जानता था और उसमें पहुँचने पर कोई भी, इन दिनों चल पड़े मुहावरे का सहारा लूँ तो, बिना रॉकेट साइंस पढ़े भी, कह सकता है कि जगह काफी क़दीम है. यहाँ जैन तीर्थ यात्री ख़ूब आते है. हिन्दुस्तान के कई हिस्सों में बरसों से अपना ठिकाना किये मारवाड़ी जैन भी. और इसका असर देखिये, जोधपुर से ओसियां के रास्ते पर बना एक मशहूर ढाबा ' शेरे पंजाब ' से 'शुद्ध वैष्णव' हो गया.

ओसियां कस्बे में ख़ास मारवाड़ी सूखे साग की हर चप्पे पर दुकानें है जो 'देस' से बाहर बसे मारवाड़ियों को तेज़ धूप में सुखाई गयी देसी सब्जियों का स्वाद बेचने के लिए खुली रहती है. सांगरी, कैर, कूमटा, काचरा जैसी सूखी सब्जियां कई महीनों तक खराब नहीं होती. ये अलग बात है कि आज मारवाड़ के शहरों में भी ये रोज़मर्रा की बात न होकर कौतुहल के बायस बरती जाने वाली वस्तुएँ हो गयी हैं. खैर.

कई पुराने मंदिरों की जर्जर देह धारे ये गाँव एक आम श्रद्धालु के लिए आज सच्चियाय माता मंदिर और जैन मंदिर के लिए ज़्यादा जाना जाता है. इन दिनों कुछ सैलानी यहाँ के रेतीले टीले और उस पर ऊँट सवारी के आनंद के लिए भी आते हैं.

तो देखें, ओसियां के चित्रों की एक झांकी. मेरी ख़ास कोशिश इनके ज़रिये आपको ये दिखाने की है कि किस तरह पुराने मंदिरों में, जीर्णोद्धार के बहाने,पुराने और नए वक्त के टुकड़ों को जोड़ने की बेढंगी कोशिश की जाती है.

Wednesday, January 26, 2011

कबीर-गायन के शिखर टिपानियाजी को पद्मश्री




आज पूरा मालवा का मन-मयूर आनंद से थिरक रहा है ! हाँ हुज़ूर ये पल और समाचार ही कुछ ऐसा है जिस पर मन का तंबूरा ख़ुशी से झनझना गया है.हमारे अपने लोकगीत गायक प्रहलादसिंह टिपानिया का नाम नागरिक अलंकरणों की उस सूची में शुमार है जो आज गणतंत्र-दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भवन से जारी हुई है. उज्जैन ज़िले के ग्राम लूनियाखेड़ी का लाल प्रहलादसिंह टिपानिया जिसने पिछले पच्चीस बरस में कबीरी पदों का जादू पूरी दुनिया में जगाया है अब पद्मश्री प्रहलादसिंह टिपानिया कहलाएंगे.म.प्र.के शिखर सम्मान और संगीत नाटक अकादमी के सम्मान से नवाज़े जाने के बाद प्रहलादसिंहजी ज़िन्दगी का यह अनमोल अलंकरण है. यूँ वे जिस कबीरी तबियत और फ़क्कड़पन में जीते हैं;उन्हें इन सम्मानों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. जब उनसे मैंने बात की तो बोले दादा यो म्हारो नीं आखा माळवा को सम्मान हे. और साँची कूँ म्हारे कबीर नी मिलता तो म्हने कूँण पूछतो....तो यो कबीरदासजी को सम्मान पेलाँ हे,म्हारों बाद में. (ये मेरा नहीं पूरे मालवा का सम्मान है.और सच कहूँ ? मुझे कबीर नहीं मिलते तो मुझे कौन पूछता,ये सम्मान कबीर के नाम पहले है,मेरे नाम बाद में) मैंने जब पूछा कि आपने गाने की तरबियत किससे पाई तो पहलादसिंह जी ने विनम्रता से कहा कि “सब काहू से लीजिये;साँचा शब्द निहार” मैंने हर अच्छी शैली से कुछ न कुछ पाया है और उसमें सचाई के शब्दों की थाह पाने की कोशिश की है. पूरी दुनिया जानती है कि प्रहलादसिंह टिपानिया नाम के गुदड़ी के लाल और कबीर पर स्टेनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की शोधार्थी लिंडा हैस लगातार काम कर रही है और इस मालवी पूत को अमेरिका भी आमंत्रित कर चुकीं है. बैंगलोर की शबनम विरमणी का कबीर फ़ाउण्डेशन प्रहलादसिंह टिपानिया के काम का दस्तावेज़ीकरण कर उसे विस्तार देने में ख़ासी मशक़्कत कर रहा है. प्रहलादसिंहजी की इस क़ामयाबी में मालवा हाउस (आकाशवाणी इन्दौर ) का भी बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि ग्रामीण परिवेश के इस खाँटी गायक की रचनाओं को सबसे पहले पूरे मध्यप्रदेश की गाँव-गलियों में प्रचारित करने का काम उसी ने किया है. राग-रागिनियों की तालीम और शास्त्र से परे प्रहलाद दादा का काम ख़ालिस रूप से रूहानी है और उसमें मालवा के गाड़ी-गड़ारों से उड़ती धूल की आत्मीय ख़ुशबू आन समाई है. वे कहते हैं कबीर का राग तो बेराग है उसमें उन सारी कुरीतियों पर कुठाराघात है जो बुराई से अच्छाई की ओर ले जाती है. कबीरी गायन का मतलब ही है हद के बाहर जाकर गाना...हद में बंधा वह कबीरी छाप वाला नहीं.बनारस के कबीरचौरा से मालवा के ओटलों पर कबीरी जाजम बिछाने वाले प्रहलादसिंह टिपानिया ने मालवी लोक-संगीत की धजा को आज वाक़ई जगमग दे दी है.

हाँ ये भी बताना मुनासिब होगा कि इस आलेख के साथ जारी तस्वीर जानेमाने छायाकार तनवीर फ़ारूक़ी की खींची हुई है. कबाड़ख़ाना पर जारी करने की इजाज़त देने के लिये तनवीर भाई का शुक्रिया.

परम पद पा गया वह पहाड़ी स्वर !


कुछ सुरों की ताब श्रोता के मानस में ऐसा घर कर लेती है कि वह सामने हो न हो कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता.किराना घराने के शीर्षस्थ स्वर साधक पं.भीमसेन जोशी ने पिछले पचास बरसों में कुछ ऐसी ही मुकम्मिल जगह बना ली थी. वे शरीरी लोक के बाहर के वासी हो गये थे और पुरी दुनिया में फ़ैले उनके मुरीदों की संख्या शायद उनके परिजनों से कहीं अधिक और लाखों में थी. पहाड़ी आवाज़ के धनी पं.भीमसेन जोशी की क़ामयाबी का सिलसिला कुछ देरी से शुरू हुआ क्योंकि जिस कालखण्ड में वे युवा थे उस समय कई दिग्गज स्वर परिदृश्य पर सक्रिय थे. ख़ुद उनके घराने की हीराबाई बड़ोदेकर और गंगूबाई हंगल महफ़िलों की शान बढ़ा रहीं थीं और पं.ओंकारनाथ ठाकुर,उस्ताद अमीर ख़ाँ,उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ,उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ,पं.विनायकराव पटवर्धन जैसी आवाज़ों का जलवा सर्वत्र मौजूद था. भीमसेनजी के करियर का फ़ैलाव भी कुछ वैसे विलम्बित गति में ही हुआ जैसी कि उनकी गायकी का होता रहा है. लेकिन जैसे ही वे उसकी गायकी लय पा लेती थी वैसे ही भीमसेनजी की शख़्सियत का पाया भी गढ़ता गया.ख़रामा-ख़रामा पं.भीमसेन जोशी पूरे देश में संगीत समारोहों की क़ामयाबी का अचूक फ़ार्मूला बन गये.
पं.भीमसेन जोशी की स्वर-यात्रा ख़ालिस तौर तपस्या का का जगमगाता दस्तावेज़ है.
पण्डितजी को जब जब भी सुना गया ; कभी ऐसा नहीं लगा कि आज कोई कोर-कसर बाक़ी रह गई. इसकी ख़ास वजह यह थी कि वे उस पीढ़ी के नुमाइंदे थे जो गायकी को एक इबादत की तरह लेती थी और मानती थी कि आयोजक से बड़ी ज़िम्मेदारी कलाकार की होती कि वह वह अपना १००% देकर अपना फ़र्ज़ ही पूरा कर रही है.

पण्डित भीमसेन जोशी के जाने के बाद एक सितारा चला गया, मैं तो उनसे बहुत प्रभावित थी और उन्होंने मुझे हमेशा आशीर्वाद दिया, वो तो मेरे लिये गुरू जैसे ही थे ऐसे कई वक्तव्य आपको अख़बारों और टीवी चैनल्स पर पढ़ने को और सुनने को मिलने वाले हैं लेकिन समझने की बात यह है कि यह समय पं.जोशी से रिश्तेदारी और अपनापा दिखाने का नहीं उनकी गायकी के उस स्वर-वैभव को अपने भीतर महसूस करने का है.नई पीढ़ी के कई कलाकार भीमसेन जोशी गायकी का अनुसरण करते हैं और नक़ल भी करना चाहते हैं लेकिन मुझे लगता है कि वे यहीं ग़लती करते हैं. स्वयं भीमसेनजी ने अपने गुरू सवाई गंधर्व की गायकी के अनूठेपन को आत्मसात किया,उनकी आवाज़ को नहीं.रचनाधर्मिता को लेकर आज संगीत जगत में हमेशा बड़-चढ़ कर बातें की जाती रहीं हैं.लेकिन भीमसेनजी को याद करें तो लगता है कि शास्त्र की मर्यादा में रहकर भी उन्होंने फ़िल्म संगीत,अभंग,नाट्य-संगीत और भक्ति पद गाने से गुरेज़ नहीं किया.और तो और उन्होंने दूरदर्शन के लिये बनाए गये वृत्तचित्र मिले सुर मेरा तुम्हारा और देसराग में भी अपना स्वर दिया. इन्दौर के पचकुईया शिव मंदिर में वे बरसों तक आते ही रहे और अपनी स्वरांजली पेश करते रहे. शास्त्र के लिहाज़ से देखें तो तीनों सप्तकों में सहजता से फ़िरता पण्डितजी का स्वर एक विशिष्ट टैक्चर का बना हुआ था और उसमें मौजूद ठोस खरज नाभि से उठकर ब्रह्मनाद बन जाया करता था. आकार की तानों के साथ खेलने का उनका एक बेजोड़ अंदाज़ था सुरों के साथ वे मनचाही लयकारी से समाँ बांध देते थे.संगीत की धजा को हमेशा ऊँचा रखने फ़हराने वाले महान साधक के रूप में भारतरत्न पण्डित भीमसेन जोशी का नाम उस फ़ेहरिस्त में शुमार हो गया है जिसका आग़ाज़ तानसेन,बैजूबावरा,भातखण्डे,पलुस्कर,सवाई गंधर्व,अलादिया ख़ाँ,रहमत अली ख़ाँ जैसे नामों का शुमार है.देह से ज़रूर पण्डित भीमसेन जोशी हमसे विलग हुए हैं लेकिन उनकी गायका का वितान मनुष्यता को एक सुरीली छाँह देता रहेगा जिससे हम मनुष्य बने रहें.

(इन्दौर के प्राचीन शनि मंदिर में अपनी सुर-सखी स्व.वत्सलाताई के साथ पण्डितजी..तस्वीर तक़रीबन सन चौरासी की है)