Friday, November 23, 2012
बच जायेगी बस हमारी पूरब दिशा
कविता फिर असद जैदी की. आवाज़ हम सब की
पूरब दिशा
एक दिन दुनिया से उर्दू बोलने वालों का
सफाया हो जाएगा
रह जायेगी बस हमारी प्यारी हिंदी भाषा
दफना देंगे फिर हम अपनी यह कुल्हाड़ी
एक दिन ख़त्म हो जायेंगी
पश्चिम की तरफ मुँह करने वाली कौमें
हर तरफ होगा पूरब की रीत का बोलबाला
एक दिन पश्चिम दिशा ही ख़त्म हो जायेगी
अकेली बच जायेगी बस हमारी पूरब दिशा
एक दिन दुनिया से उर्दू बोलने वालों का
सफाया हो जाएगा
रह जायेगी बस हमारी प्यारी हिंदी भाषा
दफना देंगे फिर हम अपनी यह कुल्हाड़ी
एक दिन ख़त्म हो जायेंगी
पश्चिम की तरफ मुँह करने वाली कौमें
हर तरफ होगा पूरब की रीत का बोलबाला
एक दिन पश्चिम दिशा ही ख़त्म हो जायेगी
अकेली बच जायेगी बस हमारी पूरब दिशा
Thursday, November 22, 2012
ध्रुपद- दो..... पंडित उदय भवालकर
किसी राग में वादी, संवादी या और ऐसे ही मुख्य
हिस्सों पर जोर देते हुए उन्हें धीरे-धीरे विकसित करना आलाप है. इसे विस्तार भी
कहते हैं. आलाप में बोल नहीं होते. बंदिश नहीं होती. राग और गायन के बीच यह एक
बतकही है. ध्रुपद में इसकी अहमियत बहुत ज्यादा है.
कालिदास के महाकाल के इलाके (उज्जैन) के पंडित
उदय भवालकर ध्रुपद परम्परा के एक मजबूत स्तम्भ हैं. वे डागर घराने के शिष्य हैं. उनके
स्वर हमारी चेतना को एक सम शान्ति से भर देते हैं. जब तक उनके जैसे प्रतिबद्ध ध्रुपदिये
हमारे बीच हैं, ध्रुपद बढ़ता और फलता-फूलता रहेगा. ध्रुपद संगीत के विस्तार में लगे
पंडित उदय भवालकर संगीत के बेहतरीन शिक्षक भी हैं.
ध्रुपद की पिछली कड़ी को आगे बढाते हुए
आइये सुनते हैं पंडित उदय भवालकर का राग बागेश्री के साथ आलाप-
मेरा वोट लिए बग़ैर भी आप मेरे सांसद हैं
असद जैदी की एक
और प्रासंगिक कविता –
हिंदू सांसद
आपका पानी बेस्वाद
आपका खाना खराब
आपकी ज़बान गलीज़
आपकी बोली अजीब
आपकी पोशाक नकली
आपका घर बेहूदा
आपका बाहर बेकार
आपकी रूह लापता
आपका दिल मुर्दार
आपका जिस्म आपसे बेजार
आपका नौकर भी है आपसे नाराज़
मेरा वोट लिए बग़ैर भी आप
मेरे सांसद हैं
आपको वोट दिए बग़ैर भी
मैं आपकी रियाया हूँ
आपका पानी बेस्वाद
आपका खाना खराब
आपकी ज़बान गलीज़
आपकी बोली अजीब
आपकी पोशाक नकली
आपका घर बेहूदा
आपका बाहर बेकार
आपकी रूह लापता
आपका दिल मुर्दार
आपका जिस्म आपसे बेजार
आपका नौकर भी है आपसे नाराज़
मेरा वोट लिए बग़ैर भी आप
मेरे सांसद हैं
आपको वोट दिए बग़ैर भी
मैं आपकी रियाया हूँ
अचानक आमने
सामने हो जाने पर
हम करते हैं एक दूसरे को
विनय पूर्वक नमस्कार
हम करते हैं एक दूसरे को
विनय पूर्वक नमस्कार
Wednesday, November 21, 2012
ध्रुपद- एक - पंडित उदय भवालकर
ध्रुव-पद या ध्रुपद हिन्दुस्तानी
संगीत की बेहद पुरानी शैली रही आयी है. यह धीमे-धीमे विकसित होने वाली गायकी है,
लगभग एक फूल की तरह खिलती हुई. आप झटके से देखेंगें, तो आप फूल को विकसता हुआ नहीं
देख पायेंगें. धीरे-धीरे ध्रुपद बढ़ता है, जैसे पुरानी किसी शानदार शराब का नशा
चढ़ता है. आज के वक्त में ध्रुपद सुनना उस दुनिया को याद करना भी है, जब जिन्दगी
में इतनी आपा-धापी न थी. वही जिसके बिना आज आपको-हमें खाली सा लगा करे.
माना जाता
है कि ध्रुपद लोक संगीत से विकसित हुआ गायन है. रूद्रवीणा और पखावज/मृदंग ही इस
गायकी के वाद्य हैं. मुग़ल राजाओं के वक्त में विकसित ख़याल गायकी से ध्रुपद मुख्यधारा
में उस तरह नहीं रह गया. माना जाता है कि संगीत सम्राट तानसेन निष्णात ध्रुपदिये
थे. उनके संगीत की गमक आपको इस दोहे में मिल जायेगी- भलो भयो विधि ना दियो शेषनाग
को कान/ धरा मेरु सब गूंजते तानसेन की तान. हमारे समय में इस शैली के गायन के कुछेक घराने/उस्ताद
हमारी इस विरासत को बखूबी सम्भाले हुए हैं, जिनमें डागर परिवार प्रमुख है. उनके
अलावा पंडित उदय भवालकर, पंडित ऋत्विक सान्याल, गुंदेचा बंधु आदि गायकों ने भी इस
परम्परा में बेहतरीन नगीने जोड़े हैं.
इस ध्रुपद परम्परा के अद्भुत वारिस पंडित उदय
भवालकर के स्वर में ये बंदिशें-
झुकत-झूमत अलबेली नार चलि आवत
दोनों करतार तुम राज साज के
जगत जननी ज्वालामुखी
समाज से खिसक कर परिवार मे छुप जाऊं, कहला दूं घर पर नहीं हूँ
असद जैदी की यह कविता अचानक मुझे अपने बड़े काम की लगने लगी है. क्या मालूम
आपको भी लगे. अनिल यादव के लफ़्ज़ों में कहूं – “चचा सलाम!”
व्याख्या का काम
क्या करूं व्याख्या का काम इतना आन पड़ा है
हकलाने के अलावा मैं और कर भी क्या सकता हूँ
इतनी ही मेरी मनुष्यता है बस कि
एकाध और मनुष्य के बैठने की जगह साफ कर दूं
मरखनी गाय के पास मंडराते शैतान
बच्चे का कान खींच दूं
कहूं : अबे मुर्गी के, क्या घर से फालतू है ?
भतीजे से कहूं बंबई न जाए -- वोह बड़ी
भयानक जगह है
समाज से खिसक कर परिवार मे छुप जाऊं
कहला दूं घर पर नहीं हूँ
कब आएंगे पता नहीं
बतला कर नहीं गए
क्या करूं व्याख्या का काम इतना आन पड़ा है
हकलाने के अलावा मैं और कर भी क्या सकता हूँ
इतनी ही मेरी मनुष्यता है बस कि
एकाध और मनुष्य के बैठने की जगह साफ कर दूं
मरखनी गाय के पास मंडराते शैतान
बच्चे का कान खींच दूं
कहूं : अबे मुर्गी के, क्या घर से फालतू है ?
भतीजे से कहूं बंबई न जाए -- वोह बड़ी
भयानक जगह है
समाज से खिसक कर परिवार मे छुप जाऊं
कहला दूं घर पर नहीं हूँ
कब आएंगे पता नहीं
बतला कर नहीं गए
Tuesday, November 20, 2012
पृथ्वीराज चौहान की सरकार का दंडवत समर्पण न केवल शर्मनाक , बल्कि खतरनाक भी
20 नवम्बर. शाहीन और रेनू , मुंबई की इन दो छात्राओं को मुंबई पुलिस ने कल इसलिए
गिरफ्तार किया कि फेसबुक पर शाहीन ने यह सवाल उठाया कि बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद और अंतिम
संस्कार के दिन मुंबई क्यों बंद रही. फेसबुक पर
इस पोस्ट को रेनू ने 'लाइक' किया था. इसके
बाद शिव-सैनिकों ने शाहीन के चाचा की क्लीनिक को ध्वस्त किया. बाल ठाकरे की मृत्यु
के बाद राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार से लेकर फेसबुक पर एक बिलकुल ही
सामान्य टिप्पणी पर की गई गिरफ्तारी तक,
ऐसा लग रहा है मानो सरकार खुद शिवसेना ही चला रही है. पुलिस बल के
भीतर शिवसेना की घुसपैठ पहले से ही एक जाना माना तथ्य है. लेकिन पृथ्वीराज चौहान की सरकार ने इस प्रकरण में अब तक जो कुछ भी किया है, वह भी एक जाना-माना तथ्य है. यह तथ्य और कुछ नहीं, बल्कि
1970 के दशक में वामपंथी ट्रेड यूनियनों को ख़त्म करने के लिए शिवसेना को खड़ा करने में कांग्रेस की ऐतिहासिक
भूमिका से लेकर , लगातार उसकी कारगुजारियों को बर्दाश्त करने,
अल्पसंख्यकों पर लगातार पुलिस दमन के सिलसिले को जारी रखने और कुल मिलाकर देश भर में तमाम नाज़ुक
मौकों पर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ सांठ- गाँठ है जो कि कांगेसी सरकारों के चरित्र का हिस्सा है. इस मौके पर
शिव-सेना के सामने पृथ्वीराज चौहान की सरकार का
दंडवत समर्पण न केवल शर्मनाक , बल्कि खतरनाक भी है. इसकी
जितनी निंदा की जाए कम है.
जन संस्कृति मंच शाहीन और रेनू की
असंवैधानिक गिरफ्तारी के लिए ज़िम्मेदार पुलिस-कर्मियों को दण्डित किए जाने की मांग
करता है. शाहीन के चाचा अब्दुल धाढा के क्लीनिक को ध्वस्त किये जाने की घटना के
लिए ज़िम्मेदार न केवल उपद्रवी शिवसैनिकों पर कठोर कार्रवाई
की जानी चाहिए, बल्कि इन दोनों छात्राओं के परिवारों को
पुलिसिया कार्रवाई करके सरकार ने जिस तरह असुरक्षित बनाया है, उसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए सरकार को अब्दुल धाढा के क्लीनिक को हुए नुक्सान की भरपाई करनी चाहिए. नागरिक समाज से हम
अपील करेंगे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस तरह के
सरकार समर्थित हमलों के खिलाफ पुरजोर आवाज़ बुलंद करे.
प्रणय कृष्ण,
महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी
कोई प्रेम के पेंगे झुला दे
शास्त्रीय गायिका और लेखिका विद्या
राव ठुमरी और दादरा के लिए जानी जाती हैं. उन्होंने स्वर्वीय नैना देवी पर एक
पुस्तक भी लिखी है.
उनका पालन पोषण हैदराबाद में हुआ.
स्नातक की डिग्री मद्रास से लेने के बाद उन्होंने दिल्ली के देहली स्कूल ऑफ़
इक्नोमिक्स में दाखिला लिया और समाजशास्त्र में परास्नातक की डिग्री हासिल की.
१९८६ से १९९३ तक उन्होंने नैना देवी से प्रशिक्षण लिया. १९९३ में नैना जी की मृत्यु
के बाद उन्होंने सेंटर फॉर वीमेंस डेवलपमेंट स्टडीज़ में शोधकार्य किया और उसके बाद
संगीत पर ध्यान लगाने का फैसला किया. कबीरदास जी के अलावा उन्होंने अमीर खुसरो को
भी गाया है.
आज पेश है कबीरदास जी का भजन विद्या
राव की आवाज़ में –
Monday, November 19, 2012
यहाँ खाना पहले बना लिया जाता है, असली शोकगीत पहले लिख लिए जाते हैं
आज पढ़िए असद ज़ैदी की एक कम पढी गयी रचना -
पहाड़ी गाँव, पर्यटक, कवि
-असद ज़ैदी
ऐसे लोग जिनके पास तकलीफ़ उठाने की क्षमता भी हो
और कामना भी
जिनकी आदत में शुमार हो उमड़ पड़ना और सोख लेना
उन्हें ही तैनात किया जाए इस समाज का पहरेदार
कह देते हैं हम यह पर उस जगह
लगा है जहाँ शराब का पहरा
शाम होते ही ऐसी एकाग्रता से जुटते हैं पाँच छः
आठ दस लोग अहिंसक और शांत
जैसे धर्म और दाम्पत्य का विकल्प यहीं मौजूद हो
जैसे उनका पीते जाना और हँसते जाना रोते रहने का बदल हो
जो आवाज़ दें तो उनकी पुकार में
भरी हो एक सीली हुई ख़ामोशी और आश्वस्ति कि
खलनायकी भले ही अट्टहास करती रहे
मासूमियत गूँजती रहेगी अपने नशे में सदा स्वायत्त
वह खुशमिज़ाज आदमी थोड़ी सी पिए हुए था
2010 से फिसलकर 1962 तक गया
और बड़ी लड़ाई तक जा पहुँचा जिसमें
उसका पूर्वज लड़ा था मेसोपोटेमिया जाकर
और फिर गिनाने लगा
गोरखा राज के नुक़सान और अंग्रेज़ी राज के नफ़े
जाते जाते बोला डोंट माइंड सर गुड नाइट सर
वहीं वार्तालाप का एक टुकड़ा सुनाई देता है -
दीदी अभी शाम को ही बत्ती जलाने की क्या ज़रूरत है
मुझे तो घनी शाम तक रसोई के बर्तन
अपनी चमक के उजाले में दिखते रहते हैं
इस किफ़ायतशुआरी में -- कि चीज़ों की
अपनी रोशनी ही काफ़ी है -- भरी थी कैसी ख़ुशी
कैसा इत्मीनान
बस की सीट के ऊपर लिखा था केबल हिलाएँ
पहाड़ी रास्ते पर जगह जगह तख़्तियाँ लगी थीं
ध्वनि करें ध्वनि करें
स्कूली बच्चों से भरी उस छोटी बस में
तीस या पैंतीस बच्चे थे पर ध्वनियाँ साठ-पैंसठ होंगी
बस लहराती चली जाती थी
पीछे पीछे जाती थी पुरानी हवा
एक और बस
मील के पत्थर -- मंसूरी 13 मिलीमीटर... नैनबाग़ 26 लीटर...
चकराता 65 किलोग्राम... तीव्र मोड़...
आगे तीव्र गाड़ है
सावघान अत्यंत तीव्र गाड़ ...
गाड़ क्या होता है पूछता है कोई उत्सुक मैदानी भाई
दो अधेड़ पहाड़ी यात्री हँसते हैं
उनमें एक अध्यापक है कहता है जी ऊधमी लड़कों की शरारत है
नालायक़ चंद्रबिन्दु लगाना भूल गए
यह मार्मिकता भी क्या इसलिए अनदेखी रह जाएगी
कि कैमरे की बैटरी हो गयी है ख़त्म
बूढ़े लोग बच्चों को हमेशा जेब से
खाने की चीज़ निकालकर देते हैं
और बुदबुदाते हुए आगे बढ़ जाते हैं
स्कूल से लौटते छोटे छोटे लड़के और लड़कियाँ
अलग अलग चलते हैं अपनी धुन में मग्न
एक दूसरे से वाजिब और लगभग जैविक दूरी बनाते हुए
ऊपर से देखने पर वे दिखाई देते हैं छोटे छोटे कीड़ों से
उनके ऊपर मंडरा रहा है काला बादल
जो जल्द ही उन्हें तरबतर कर देगा
यह दुनिया ग़लतफ़हमियों का रंगमंच है लिपियाँ
बदल जाती हैं संकेत भी बदलते हैं
पर एक भाषा बची रहती है
जगमगाते बाज़ार के बग़ल ही तो बहता है
मृत्यु का नाला
यहाँ खाना पहले बना लिया जाता है
असली शोकगीत पहले लिख लिए जाते हैं
बाद का लिखा या तो लेटलतीफ़ी है या
अगले दुःख की तैयारी.
ऐसे लोग जिनके पास तकलीफ़ उठाने की क्षमता भी हो
और कामना भी
जिनकी आदत में शुमार हो उमड़ पड़ना और सोख लेना
उन्हें ही तैनात किया जाए इस समाज का पहरेदार
कह देते हैं हम यह पर उस जगह
लगा है जहाँ शराब का पहरा
शाम होते ही ऐसी एकाग्रता से जुटते हैं पाँच छः
आठ दस लोग अहिंसक और शांत
जैसे धर्म और दाम्पत्य का विकल्प यहीं मौजूद हो
जैसे उनका पीते जाना और हँसते जाना रोते रहने का बदल हो
जो आवाज़ दें तो उनकी पुकार में
भरी हो एक सीली हुई ख़ामोशी और आश्वस्ति कि
खलनायकी भले ही अट्टहास करती रहे
मासूमियत गूँजती रहेगी अपने नशे में सदा स्वायत्त
वह खुशमिज़ाज आदमी थोड़ी सी पिए हुए था
2010 से फिसलकर 1962 तक गया
और बड़ी लड़ाई तक जा पहुँचा जिसमें
उसका पूर्वज लड़ा था मेसोपोटेमिया जाकर
और फिर गिनाने लगा
गोरखा राज के नुक़सान और अंग्रेज़ी राज के नफ़े
जाते जाते बोला डोंट माइंड सर गुड नाइट सर
वहीं वार्तालाप का एक टुकड़ा सुनाई देता है -
दीदी अभी शाम को ही बत्ती जलाने की क्या ज़रूरत है
मुझे तो घनी शाम तक रसोई के बर्तन
अपनी चमक के उजाले में दिखते रहते हैं
इस किफ़ायतशुआरी में -- कि चीज़ों की
अपनी रोशनी ही काफ़ी है -- भरी थी कैसी ख़ुशी
कैसा इत्मीनान
बस की सीट के ऊपर लिखा था केबल हिलाएँ
पहाड़ी रास्ते पर जगह जगह तख़्तियाँ लगी थीं
ध्वनि करें ध्वनि करें
स्कूली बच्चों से भरी उस छोटी बस में
तीस या पैंतीस बच्चे थे पर ध्वनियाँ साठ-पैंसठ होंगी
बस लहराती चली जाती थी
पीछे पीछे जाती थी पुरानी हवा
एक और बस
मील के पत्थर -- मंसूरी 13 मिलीमीटर... नैनबाग़ 26 लीटर...
चकराता 65 किलोग्राम... तीव्र मोड़...
आगे तीव्र गाड़ है
सावघान अत्यंत तीव्र गाड़ ...
गाड़ क्या होता है पूछता है कोई उत्सुक मैदानी भाई
दो अधेड़ पहाड़ी यात्री हँसते हैं
उनमें एक अध्यापक है कहता है जी ऊधमी लड़कों की शरारत है
नालायक़ चंद्रबिन्दु लगाना भूल गए
यह मार्मिकता भी क्या इसलिए अनदेखी रह जाएगी
कि कैमरे की बैटरी हो गयी है ख़त्म
बूढ़े लोग बच्चों को हमेशा जेब से
खाने की चीज़ निकालकर देते हैं
और बुदबुदाते हुए आगे बढ़ जाते हैं
स्कूल से लौटते छोटे छोटे लड़के और लड़कियाँ
अलग अलग चलते हैं अपनी धुन में मग्न
एक दूसरे से वाजिब और लगभग जैविक दूरी बनाते हुए
ऊपर से देखने पर वे दिखाई देते हैं छोटे छोटे कीड़ों से
उनके ऊपर मंडरा रहा है काला बादल
जो जल्द ही उन्हें तरबतर कर देगा
यह दुनिया ग़लतफ़हमियों का रंगमंच है लिपियाँ
बदल जाती हैं संकेत भी बदलते हैं
पर एक भाषा बची रहती है
जगमगाते बाज़ार के बग़ल ही तो बहता है
मृत्यु का नाला
यहाँ खाना पहले बना लिया जाता है
असली शोकगीत पहले लिख लिए जाते हैं
बाद का लिखा या तो लेटलतीफ़ी है या
अगले दुःख की तैयारी.
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