Thursday, March 16, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - चौदह



परमौत की प्रेम कथा - भाग चौदह

रोडवेज़ में पान-सिगरेट कार्यक्रम निबटाने और गिरधारी को सुबह तीन बजे गुडनाईट कहने के बाद परमौत ने आधे रास्ते से घर जाने के बजाय दुबारा से रोडवेज़ का रुख किया. चौबीसों घंटे आबाद रहने वाला हल्द्वानी का एक वही ठीहा था जहाँ उस समय जीवन के लक्षण देखे जा सकते थे. दोस्त के वायदे ने परमौत के वीरान पड़ते जा रहे मोहब्बत के आशियाने में नई पुताई कर दी थी और वह उस पल का पूरा लुत्फ़ लेने के उद्देश्य से जितनी देर हो सके जीवन के और नज़दीक जाना जाना चाहता था. 

रोडवेज़ का उत्सवपूर्ण माहौल उसकी आशा के अनुरूप हैरान कर देने वाली चहल-पहल से भरपूर था. कोई दर्ज़न भर दुकानों पर बिकने के वास्ते नेपाल के रास्ते लाये गए बड़े बड़े चाइनीज़ टेपरिकार्डर-टूइनवन-कैसेट्स और ऐसे ही इलैक्ट्रोनिक सामान सजे हुए थे और उनका प्रचार करने के वास्ते हर दुकान से ऊंची आवाज़ में पहाड़ी गाने बज रहे थे और संगीत की मारकाट मची हुई थी जिसका पूरा साथ देने के उद्देश्य से अगणित ठेलों-खोमचों पर फल, सब्जी, पान-सिगरेट, चाय, बन-आमलेट, पकौड़ी, समोसा, चाट, टिक्की वगैरह का महाव्यापार चल रहा था. 

पहाड़ से दिल्ली और दिल्ली से पहाड़ आने-जाने वाली दर्ज़नों नाइट बसों की आवाजाही के कारण उनके बड़े-बड़े टायरों ने कीचड़ और मुसमुसी मिट्टी से अटी सड़क और उसके गड्ढों पर एक से बढ़कर एक त्रिआयामी आकृतियाँ सर्जित कर दी थीं. अनेकानेक ढब-आकृति और मुखों वाले और अनेक मुद्राओं में चलते-बैठते-ऊंघते-खरीदारी करते-चाय सुड़कते-बोलते-टोहते-चीखते-सोते पैसेंजरगण इस समूचे माहौल को सम्पूर्णता प्रदान कर रहे थे. परमौत को अपना कलेजा अब भी मुंह में आया जैसा महसूस हो रहा था और उसका मुंह कसैला हो रहा था जिसे दूसरा स्वाद देने की नीयत से उसने पहले एक चाय समझी और फिर एक-के-बाद-एक दो सिगरेट. वह सिगरेट के पैसे चुका रहा था जब उसकी निगाह सामने पोस्टऑफिस की बिल्डिंग के पसमंजर में खड़े एक पुरातन नीम के पेड़ के पीछे छिपने जा रहे चन्द्रमा पर पड़ी.

इस दृश्य का दिखना था और पास की एक दुकान से 'चाँद सी मैबूबा' बजना शुरू हो गया. इस संयोग के कारण परमौत के चेहरे पर एक विडम्बनापूरित मुस्कान आयी और उसने इस मेले सरीखे माहौल में अपनी बगल में पिरिया की उपस्थिति होने की कल्पना करना शुरू कर दिया. वे दोनों ऐसे ही कभी-कभार रात के तीन बजे रोडवेज़ पर चाय और बन-मक्खन खाने आ जाया करेंगे जैसे एक ठेले पर एक फ़ौजी लग रहा आदमी और उसकी नवेली बीवी लग रही औरत खा रहे थे. गाने में प्रेमिका से कहा जा रहा था कि उसकी सूरत भोली भाली है और उसके नैना सीधे सादे हैं. गायक यह भी बता रहा था कि उसके ख़यालों में प्रेमिका का ठीक ऐसा ही रूप था. परमौत चंद्रमा को देखता था, गाना सुनता था और पिरिया की सूरत को याद करने की कोशिश करता था और हैरत करता जाता था कि मुकेश ने बिना देखे हू-ब-हू उसकी पिरिया का ऐसा सटीक वर्णन कैसे जो कर दिया होगा.

वह मटर गली वाले शॉर्टकट से रामलीला ग्राउंड होता हुआ अपने घर की राह लगने के बारे में सोच रहा था कि रास्ते को बाधित करती दिल्ली से आई एक और बस अचानक रुकी. 

परमौत जेब में हाथ डाले इस दृश्य को भी आलस भरी दार्शनिकता के साथ देखना शुरू कर ही रहा था कि अचानक उसने बस से पिरिया को उतरता देखा. पिरिया का चेहरा थकान और नींद से म्लान हो रहा था और सीढ़ियों से उतारते हुए उसने अपने शॉल को कन्धों के गिर्द लपेटते हुए एक जम्हाई ली. एक सेकेण्ड से कम समय में हुए इस दृश्य परिवर्तन ने परमौत को अचानक विस्मय अनजान भय से भर दिया और वह एक खोखे की आड़ में हो गया. आड़ में आते ही उसका आत्मसंतुलन वापस लौटा और उसके अवचेतन ने दीदार के इन दुर्लभ लम्हों को डीटेल में कैप्चर करना शुरू कर दिया. पिरिया ने फीरोज़ी रंग का वही सलवार सूट पहना हुआ था जो परमौत की निगाहों में उस पर सबसे ज्यादा फबता था. बस में बैठे रहे से उसका शॉल गुज्जीमुज्जी हो चुका था. नींद की तात्कालिक ज़रुरत उसकी बड़ी-बड़ी और फिलहाल उदास दिख रही आँखों में साफ़ पढ़ी जा सकती थी. फिल्मों में देखी गयी किसी भी हीरोइन से अधिक सुन्दर दिख रही उसकी पिरिया बस की सीढ़ियाँ उतर रही थी. बस के बाहर रिक्शेवालों का झुण्ड टूट चुका था जिनके कारण आख़िरी सीढ़ी से उतर पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था. तनिक झल्लाई सी पिरिया ने एक क्षण के एक लाखवें हिस्से के लिए अपनी निगाहें आसमान के उसी हिस्से की तरफ कीं जहाँ  पोस्टऑफिस की बिल्डिंग पीछे नीम के पेड़ पर चन्द्रमा छिप रहा था. उसी एक लाखवें हिस्से में उसके चेहरे पर आ गयी खीझ के बावजूद मुस्कराहट की एक सूदूरतम झलक आई जिसे परमौत ने अपनी आत्मा के कैमरे से कैद कर लिया. 

परमौत को अहसास भी नहीं हुआ कि वह मुस्करा रहा था और आड़ से बाहर आ गया था. पिरिया उतर चुकी थी और रिक्शेवालों और यात्रियों के हुजूम में अचानक अदृश्य हो गयी थी. परमौत उसकी टोह लेने की कोशिश कर रहा था कि अचानक उसकी निगाह लम्बू अमिताब पर पड़ी. लम्बू के बाल बिखरे हुए थे और वह रामलीला के किसी राक्षस जैसा दिख रहा था. उसके कंधे पर दो बैग लटके हुए थे और वह रिक्शेवालों के खदेड़ता हुआ सा अपने लिए बाहर निकलने का रास्ता बना रहा था.

अमिताब को देखते ही परमौत स्वप्नलोक से बाहर निकला और सतर्क होकर एफ़बीआई का एजेंट बन गया. पूरे होशोहवास में आकर अब वह फिर से खोखे की आड़ में हुआ और उसने अपनी निगाहें लम्बू पर लगा दीं. अचानक पिरिया नज़र आई. उसने रिक्शा कर लिया था और वह निढाल होकर उस पर बैठी हुई पलट कर लम्बू के आने का इंतज़ार कर रही थी. परमौत को अपना गला सूखता सा महसूस हुआ. लम्बू रिक्शे के करियर पर बैग लाद रहा था. लम्बू पिरिया की बगल में बैठ गया था. लम्बू हैडल थाम कर खड़े रिक्शेवाले से जोर-जोर से कुछ कह रहा था. रिक्शेवाला भी कुछ कह रहा था. फिर दोनों कुछ नहीं कह रहे थे. फिर रिक्शेवाला गद्दी पर बैठ रहा था. परमौत की चाँद सी मैबूबा और अमिताब राक्षस को लेकर रिक्शा रेलवे बाज़ार की दिशा में बढ़ चला. परमौत के पैर जैसे काठ के हो गए थे. उसका दिमाग कुंद हो रहा था. उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. सारा घटनाक्रम भयंकर तेज़ी से हुआ था. वास्तविकता धीरे-धीरे उसकी समझ में आना शुरू हुई. कमीना लम्बू उसकी माशूका के साथ दिल्ली से आ रहा था और सुबह के तीन बजे उसे रिक्शे में बिठाकर कहीं ले जा रहा था. हो सकता है दोनों ने भागकर शादी कर ली हो. हो यह भी सकता है वे बस में अचानक ऐसे ही संयोगवश मिल गए हों. इस दूसरी सम्भावना ने परमौत को थोड़ा सा दिलासा दिया लेकिन तथ्य यह था कि वे दोनों एक ही रिक्शे में बैठकर जा रहे थे.

परमौत ने अपनी बगल में खड़े एक खाली रिक्शा पर बैठते हुए कहा - "रेलवे बजार की तरफ चल. दस रुपे दूंगा और गाड़ी तेत्तेज चलइयो." परमौत ने हाथ में दस का नोट निकालकर रिक्शेवाले को दिखाया. केमू अड्डे से दाईं तरफ मुड़ते ही करीब पचासेक मीटर दूर पिरिया और लम्बू का रिक्शा दिखाई दे गया. मोड़ पर परमौत का रिक्शा तेज़ी से कटा और पलटता-पलटता बचा

"हौली कर बे जरा" - परमौत ने रिक्शे वाले को झिड़का.

"ठीक है बाबू जी" रिक्शेवाले ने क्षमायाचना के लहजे में कहा.

भोर के झोंके परमौत के चेहरे पर पड़ रहे थे और उनकी ताजगी ने उसे आगामी रूपरेखा बनाने में सहायता की.

"वो वाले रिक्शे के पीछे लगाए रखियो गाड़ी ... और सुन ... " गला खंखारते हुए परमौत ने रिक्शेवाले को हिदायत दी - "इत्ती दूरी बनाए रखियो कि वो हमको ना देख पावें." रिक्शेवालों से बात करते समय वह शाहजहाँपुर-बरेली का लहज़ा अपना लेता था क्योंकि एक तो उसे ऐसा करना अच्छा लगता था दूसरे हल्द्वानी के ज़्यादातर रिक्शेवाले इन्हीं दो शहरों से आते थे.

इस दूसरी हिदायत के बाद रिक्शेवाले ने पैडल ऐसे मारने शुरू किये जैसे वह किसी गुप्त मिशन पर निकले जेम्स बांड का सहायक हो.

"जी बाबूजी ..." कहकर रिक्शेवाले ने सीटी बजाते हुए उस पर 'कभी आर कभी पार' बजाना शुरू कर दिया. परमौत की निगाहें पिरिया के रिक्शे पर लगी हुई थीं. उनके बीच अब करीब बीस मीटर का सुविधाजनक फासला था.

"बस ऐसेई रखियो ... और ये सीटी बजाना बंद कर ... पूजापाठ के टैम पर सीटी बजागा तो ज़िन्दगी भर रिक्शा खेंचता रै जागा भैए ..."

पिरिया का रिक्शा बाज़ार से होता हुआ में चौराहे से रामपुर रोड की तरफ मुड़ा थोड़ा आगे जाने के बाद एक गली में प्रविष्ट हो गया. परमौत ने रिक्शेवाले को रोका, पैसे दिए और उतर गया.

"भीतर ठीक से जइयो बाबूजी ... पूजापाठ का टैम हैगा ... " तेज़ी से वापस लौट रहे रिक्शेवाले ने काइयां हंसी हँसते हुए परमौत को ताना मारा और लक्ष्मी वाले मोड़ पर मुड़ता हुआ ओझल हो गया.

परमौत तय नहीं कर पा रहा था कि गली के भीतर जाए या नहीं. कहीं पिरिया ने उसे देख लिया तो. "देख लिया तो देख लिया साला" - उसके अन्दर से आवाज़ आई और वह अन्दर चला गया. वह दबे पाँव अंधेरी गली में घुसा तो उसने पाया आठवें-दसवें मकान के बाहर रिक्शा खड़ा था. वह एक मकान के बाहर खड़ा किये गए चाट के ठेले की ओट में हो गया. पिरिया और लम्बू कुछ बातें कर रहे थे और पिरिया अपने बटुए से पैसे निकालकर रिक्शेवाले को दे रही थी. मकान के भीतर लाईट जल चुकी थी और खड़खड़ करता लोहे का शटर खोला जा रहा था. शटर खोला गया. पिरिया और अमिताब मय बैगों के भीतर घुसे. कोई हंगामा नहीं हुआ. कुछ भी ऐसा अप्रत्याशित नहीं हुआ जो चीज़ों की असामान्य स्थिति की तरफ इशारा करता.

परमौत पशोपेश में था कि पिरिया का रिक्शेवाला उसकी बगल में आकर ठिठका और उसे गौर से देखकर इत्मीनान जैसा करने की कोशिश करने लगा कि वह कोई चोर तो नहीं.

"रोडवेज चल्लिया?" परमौत ने अचानक पूछ कर रिक्शेवाले को हकबका दिया.

मुख्य चौराहे पर पहुंचकर परमौत ने रिक्शेवाले को बजाय रोडवेज जाने के अपने घर की तरफ मुड़ने को कहा. उसके भीतर अमिताब लम्बू और पिरिया को लेकर भयानक उथलपुथल चल रही थी और वह अचानक बहुत ज्यादा थक गया. उसे नींद आ रही थी. पिछले दरवाज़े से बिना आवाज़ किये वह अपने कमरे में घुसा और किसी कटे पेड़ जैसा बिस्तर पर गिरा और दोपहर तक सोता रहा.

दो बजे भाभी ने दरवाज़ा खटखटाकर उसे जगाया और बताया कि कोई बिष्ट नाम का आदमी उससे मिलने आया है. आँखें मलते हुए परमौत को पिछली रात का समूचा घटनाक्रम याद आने लगा और वह झटके में उठ कर बीच के बरामदे की तरफ चल दिया जहाँ कोई उसका इंतज़ार कर रहा था. बिष्ट गिरधारी लम्बू निकला जो उसे देखते ही मुदित होकर पहले तो उसके गले से लगा लेकिन उसके मुंह से आ रही शराब की बचीखुची बास के कारण तुरंत अलग हो गया.

"परमौद्दा ... काम हो गया यार ददा! ..." गिरधारी ने चोरों की तरह इधर उधर देखते हुए फुसफुसाकर कहा.   

"कौन सा काम यार गिरधारी बाबू?"

"अरे भूल गया परमौद्दा! फोटुक नईं चइये थी तुज्को! ..." उसने फिर से चारों तरफ निगाह डाली और परमौत के कान में कहा - "भाबी की फोटुक कै रा हूँ यार. ले आया साले को बड़ी मुश्किल से यार ..."

"हैं ..." परमौत की आँखें अचम्भे में खुली रह गईं जब गिरधारी लम्बू ने उसके हाथ में बाकायदा एक छोटा सा लिफाफा थमाया.

"एडमीसन फॉरम में दो लगी थीं. भाबी की दोनों फोटुक उचेड़ लाया यार परमौद्दा ... अब तैयार होकर जल्दी बाहर चल तो ... तुज्को कुछ बताना है ..."     


(जारी)

Wednesday, March 15, 2017

हिज़ नेम इज़ एन्थनी गोंसाल्वेस

7 अगस्त 2014 को यह पोस्ट इरफ़ान ने अपने ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई पर लगाई थी. आज एक चैनल पर 'अमर अकबर एन्थनी' का वह गाना चल रहा था जिसने मुझे इस पोस्ट की याद दिलाई. इरफ़ान से पूछे बिना इसे यहाँ जस का तस लगाए दे रहा हूँ ताकि आप भी खुद से कम से एक बार तो अवश्य पूछें कि आखिर कौन था ये शख्स जिसका नाम एन्थनी गोंसाल्वेस था.

एन्थनी गोंसाल्वेस पर उपलब्ध कुछ लेख-साक्षात्कार वगैरह पढ़ रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ जल्द ही उन पर एक पोस्ट लिख सकूंगा.

युवा एन्थनी गोंसाल्वेस (1927-18 जनवरी 2012)

मत हंसो... कि तुम्हारी हंसी से कोई हारता है

- सैयद मोहम्मद इरफ़ान

प्यारे लाल शर्मा (लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल) भले ही यह कहें कि उन्होंने अपने गुरु एंथनी गोंसाल्वेस के प्रति कृतज्ञता स्वरूप एक सस्ते से गाने में अपने गुरू का नाम डलवाया लेकिन बात कुछ जंचती नहीं है.

दिल पर हाथ रखकर कहिये कि तुलसीदास के शिष्य ने ऐसी कोई श्रंद्धांजलि उन्हें दी होती तो क्या आपको मंज़ूर होता? रवींद्रनाथ टैगोर को 'माय नेम इस रवींद्रनाथ टैगोर' कहकर एक बड़े से दुर्गापूजा पंडाल से बाहर आता देखना कैसा लगता? अज्ञेय के लिये ये बात शायद माक़ूल होती लेकिन तब वात्स्यायन की चटपटी पहचान में भी वह खटकती.

जो लोग भी अमर अकबर एंथनी की कहानी और उसमें आए इस गाने से परिचित हैं जिसमें एंथनी गोंसाल्वेस का नाम लिया गया, क्या वो कह सकते हैं कि उन्हें इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के 37 साल बाद भी एक स्वप्नदर्शी कम्पोज़र-अरेंजर एंथनी गोंसाल्वेस के बारे वैसा कुछ मालूम हो सका जिसके वो हक़दार हैं?

वैसे तो एंथनी गोंसाल्वेस के शिष्य आर डी बर्मन भी थे लेकिन प्यारेलाल जैसा ओछा फ़ैसला उन्होंने नहीं लिया. पिछ्ले 9 वर्षों में मैं अपने मन को आश्वस्त नहीं कर सका हूं कि माय नेम इज़ एंथनी गोंसाल्वेज़ ... गाने ने मशहूर गोवानी म्यूज़ीशियन, विलक्षण अरेंजर एंथनी गोंसाल्वेस को इस पॉपुलर प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिये संगीत प्रेमियों से परिचित कराया.

इसके उलट मेरा मानना है कि इस गाने को सुनते हुए ख़ुद एंथनी गोंसाल्वेस उस फ़िल्म म्यूज़िक की तरफ़ पीठ ही फेरते गये (इस गाने को उन्होंने 35 साल तक झेला होगा) जिससे उन्होंने अपना न सिर्फ़ करियर शुरू किया था बल्कि जिस अद्भुत संगीत संसार में उन्होंने मुंबई में भारतीय और पश्चिमी संगीत के अंतर्घुलन की भव्य प्रस्तुतियां कर दिखाई थीं.

मैं यह भी मानता हूं कि बजाय कोई जिज्ञासा जगाने के, यह गीत एक 'वास्तविक' आदमी को 'फ़िक्शनल' ही सिद्ध करता गया. कोई अगर एंथनी गोंसाल्वेस के ब्रेनचाइल्ड सिम्फ़नी ऑर्केस्ट्रा ऑफ़ इंडिया के उन ब्रोशर्स को देखे जिनमें उन्होंने क़रीब डेढ सौ भारतीय और विदेशी वाद्यों के साथ अपनी प्रस्तुतियां की थीं तो दांतों तले उंगलियां दबाएगा.


यहां एक और बात मेरे ज़ेहन में आती है, जितना मैं अमिताभ बच्चन को जानता हूं, कि अगर उन्हें यह मालूम होता कि जिस आदमी को उस गीत का खिलंदड़ हिस्सा बनाया जा रहा है, वो कितने सम्मान का हक़दार है, तो शायद वो प्यारेलाल की इस सायास और आनंद बख़्शी की इस लापरवाह स्कीम का हिस्सा न बनते.


तो सवाल ये है कि 2 साल पहले तक जीवित रहे इस भारतीय नागरिक और संगीत के चितेरे के साथ हम सब ने मिलकर यह मज़ाक़ क्यों किया?

Tuesday, March 14, 2017

इरोम की हार और लोकतंत्र का शोकगीत


मणिपुर का मालोम बस स्टैंड. तारीख़ 2 नवंबर, 2000. एक महिला कवि बस स्टैंड पर खड़ी थी. सुरक्षाबलों का एक दस्ता पहुंचता है और दस युवाओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसा कर उन्हें भून देता है. कवि हृदय रो पड़ता है. भारतीय संविधान में तो अपराधी या आतंकी को भी ऐसी सज़ा देने का प्रावधान नहीं है!
उस महिला कवि ने फ़ैसला किया कि वह इस काले क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ेगी. इस तरह किसी को कैसे मारा जा सकता है? यह कौन सा क़ानून है? यह क़ानून है सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम यानी आफ्सपा, जो पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में लागू है. यह क़ानून सुरक्षा बलों को यह अधिकार देता है कि वह किसी को शक के आधार पर गोली मार सकते हैं.
उस युवा महिला कवि का नाम है इरोम शर्मिला चानू. इरोम ने अगले दिन से इस क़ानून के ख़िलाफ़ अनशन शुरू कर दिया. यह अनशन अन्ना हज़ारे का अनशन नहीं था. उन्होंने 16 साल तक एक अनसुना अनशन किया. कोर्ट के आदेश पर उन्हें आत्महत्या की कोशिश के आरोप में पुलिस हिरासत में रखकर नाक में नली डालकर तरल भोजन दिया जाता रहा. वे अनशन करती रहीं और हारती रहीं.
दिल्ली की एक अदालत में इरोम ने पिछले साल आंख में आंसू भरकर कहा था, ‘मैं ज़िंदा रहना चाहती हूं. मैं जीना चाहती हूं. शादी करना चाहती हूं, प्रेम करना चाहती हूं, लेकिन उससे पहले यह चाहती हूं कि हमारे प्रदेश से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हटा लिया जाए.’ वे 16 साल तक इस एक इच्छा के लिए लड़ती और हारती रहीं.
अंतत: इरोम ने तय किया कि वे चुनावी रास्ते से विधायिका में जाएंगी और इस क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ेंगी. वे इस बार मणिपुर के मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ीं और 90 वोट पाकर हार गईं. जिस प्रदेश की जनता के जीने के अधिकार के लिए वे 16 वर्षों तक लड़ती रहीं, उस जनता ने उनके सियासी सपने को बेरहमी से मार दिया. इरोम ने आंखों में एक सपना लेकर चुनावी अखाड़े में प्रवेश किया था और आंखों में आंसुओं का सैलाब लेकर उस अखाड़े से बाहर निकल गईं, साथ में यह कहती गईं, ‘अब इधर कभी नहीं आना है.’ उन्होंने सियासी जीवन जिए बिना उससे संन्यास की घोषणा कर दी.
अफ्स्पा को लेकर 16 वर्षों तक अनशन करने वाली इरोम शर्मिला वैसे ही हार गई हैं, जैसे मणिपुर में मनोरमा हार गई थी, जैसे मनोरमा कांड में न्याय पाने के लिए नग्न होकर प्रदर्शन करने वाली महिलाएं हार गई थीं, जैसे बस्तर में मड़कम हिड़मे और सुखमती हार गई. इस हार के बदले आज इरोम शर्मिला को समर्थन देने वाले एक फेसबुक पेज पर लिखा गया - थैंक्स फॉर 90 वोट्स. इस पेज पर इरोम के पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने की सूचनाओं के साथ अपीलें भी की गई थीं कि उन्हें वोट कीजिए. इरोम के 90 वोट पाने के बाद 90 को मतदाताओं को धन्यवाद दिया गया.
इरोम 16 साल से लड़ रही हैं और बार-बार हार रही हैं. वे कह रही थीं कि सेना को वह अधिकार न दिया जाए, जिसके तहत वह किसी को शक के आधार पर गोली मार देने का अधिकार रखती है.
वे चाहती हैं कि सेना को इतना अधिकार न हो कि वह किसी मनोरमा का बलात्कार कर दे या चौराहे पर खड़े किन्हीं युवाओं को बिना कारण गोलियां बरसा कर भून दे, या किसी 12 साल के बच्चे को पेशेवर आतंकी घोषित करके उसकी मां के सामने उसका ‘एनकाउंटर’ कर दे.
जिस तरह चुनाव में नोटबंदी में मरे क़रीब 150 लोग कोई मुद्दा नहीं थे, जिस तरह उत्तर प्रदेश में कुपोषित आधी महिलाएं कोई मुद्दा नहीं थीं, जिस तरह डायरिया या इनसेफलाइटिस से मरने वाले लाखों बच्चे कोई मुद्दा नहीं होते, उसी तरह इरोम का 16 साल तक संघर्ष करके अपना जीवन दे देना कोई मुद्दा नहीं रहा.
जिस लोकतंत्र में अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी पत्नी की हत्या के केस में जेल में बंद रहकर चुनाव जीत जाते हों, माफ़िया मुख़्तार अंसारी जेल में रहकर चुनाव जीत जाते हों, बाहुबली सुशील कुमार, रघुराज प्रताप सिंह और विजय मिश्र आदि चुनाव जीत जाते हों, वहां पर हत्याओं के विरोध में ज़िंदगी खपा देने वाली इरोम की हार तो जैसे पहले से ही तय थी. तमाम बाहुबलियों को भारी बहुमत से जिता देने वाली जनता ने आंसुओं से गीली आंखों वाला, नाक में नली डाले एक कवयित्री का चेहरा पसंद नहीं किया.
इरोम ने 16 साल बाद अपना अनशन तोड़ा था और चुनावी राजनीति में उतरकर बदलाव लाने का फ़ैसला किया था. उन्होंने ‘पीपुल्स रिइंसर्जेंस एंड जस्टिस अलाएंस’ नाम की पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन मणिपुर के मतदाताओं ने इरोम को नोटा का विकल्प समझना भी मुनासिब नहीं समझा. उन्हें मात्र 90 वोट मिले. चुनाव परिणाम आने के बाद इरोम रोईं और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर डाली.
रविवार को इरोम को समर्थन देने वाले एक फेसबुक पेज पर चार शब्द का स्टेटस लिखा, ‘Thanks for 90 Votes.’
इस स्टेटस पर तमाम लोगों ने हमदर्दी भरे कमेंट किए हैं. शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फ़ेसबुक पेज पर यह स्टेटस शेयर करते हुए लिखा, ‘इरोम शर्मिला का ये स्टेटस पढ़ रहा हूं और रोयां-रोयां कांप रहा है. कितनी हिम्मत जुटाई होगी उन उंगलियों ने Thanks for 90 Votes टाइप करने के लिए! मणिपुर के लोगों के लिए 16 साल का अनशन और तोहफे में 90 वोट! वाह रे लोकतंत्र!’
अदिति ने अपनी वॉल पर लिखा, ‘इरोम ने जनता को धन्यवाद नहीं दिया है, चार शब्दों में लोकतंत्र का शोकगीत लिखा है.’
रवि जोशी ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला को सिर्फ़ 90 वोट मिलना ये दिखाता है कि भारत के लोगों को राजनीति में अच्छे लोगों की कोई ज़रूरत नहीं है, उसे गुंडे, बलात्कारी ही अच्छे लगते है या नोट और शराब बाटने वाले!’
अंशू राजपूत ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला की हार से काफी लोग सदमे में हैं. इरोम को शायद 90 वोट मिले हैं. दरअसल, चुनाव का अपना डायनामिक्स होता है. जनता अपने तरीके से सोचती है. इरोम शर्मिला को छोड़िए … जिस शख्स ने 1950 में देश को इतना शानदार संविधान दिया, उस आंबेडकर को 1951-52 के लोकसभा चुनाव में बॉम्बे की जनता ने हरा दिया. आंबेडकर चौथे नंबर पर आए. और तो और, 1954 में वो भंडारा का उपचुनाव भी नहीं जीत सके. जिस राम मनोहर लोहिया के राजनीतिक दर्शन पर यूपी और बिहार में सरकारें बनती हैं उन लोहिया जी को यूपी में चंदौली के लोगों ने हरा दिया. लोहिया नेहरू जी के खिलाफ भी चुनाव हारे. आचार्य नरेंद्र देव, मोरारजी देसाई, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी- ये सबके सब हार चुके हैं. अगर इरोम शर्मिला में राजनीतिक क्षमता और योग्यता होगी तो उन्हें सियासी ताकत बनने से कोई नहीं रोक सकता है.’
एके मिश्रा ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला का 90 वोट पाना और राजा भैया का 1,30,000 वोट पाना ही लोकतंत्र है. सलाम जनादेश!’ बाबूराम यादव का कहना था, ‘बेहद दुखद. इरोम शर्मिला के हिस्से 90 वोट, किस जनता के लिए आपने 16 साल अनशन किया?’
तरुण शेखर ने लिखा, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला को नोटा के 166 वोट से भी कम 90 वोट मिले. अच्छे काम की इससे बड़ी किरकिरी क्या होगी! मणिपुर में 16 साल से आंदोलन कर रही ईरोम ने 2016 में अनशन तोड़ा था. 16 साल तक अफ्स्पा हटाने के खिलाफ इरोम सत्याग्रह के रास्ते पर चली थीं, 44 साल की आयरन लेडी इरोम पिछले 16 साल से नेजल ट्यूब के साथ अनशन पर थीं. सत्याग्रह करने वाली शर्मिला के शरीर में अन्न जल पहुंचाने का यही अकेला तरीका था.’
गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला चुनाव हार गई, सोनी सोरी चुनाव हार गई, दयामनी बारला चुनाव हार गईं, मेधा पाटकर चुनाव हार गईं. खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते. तो उस फ़कीर ने कहा कि तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है, पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिए इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है. धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं. उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं.’
चुनाव हारने के बाद इरोम ने बयान दिया, ‘मैं इस राजनीतिक प्रणाली से आजिज आ चुकी हूं. मैंने सक्रिय राजनीति छोड़ने का फैसला लिया है. मैं दक्षिण भारत चली जाउंगी क्योंकि मुझे मानसिक शांति चाहिए. लेकिन मैं आफस्पा के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखूंगी, जबतक वह हटा ना लिया जाए, लेकिन मैं सामाजिक कार्यकर्ता की भांति लड़ती रहूंगी.’
यानी इरोम फिर उसी अनशन की अंधी गली में लौट जाएगी, जिसमें घुप्प अंधेरा है, डरावना सन्नाटा है और इरोम अकेली है.
(यह लेख http://thewirehindi.com से साभार लिया गया है.)

अब भी ज़िन्दा है इंसानियत. यकीन कीजिये!

डॉक्टर सुभाष को सलाम
- सैयद मोहम्मद इरफ़ान

किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ से 1969 में MBBS करने के बाद डॉक्टर नरेश त्रेहन अमरीका चले गए और उनके साथ पढ़े डॉक्टर सुभाष चन्द्र दुबे गुरुसहायगंज.


गुरसहायगंज कन्नौज जिले का एक छोटा सा क़स्बा है जो जीटी रोड पर दिल्ली से क़रीब 300 किमी और कानपुर से 100 किमी दूर है. क़रीब 25 साल तक जनरल फीजीशियन डॉक्टर सुभाष ने गुरुसहायगंज और आसपास के प्रायमरी हेल्थ सेंटर्स में सरकारी नौकरी की और आखिरकार 1994 में वीआरएस लेकर वे अब गुरसहायगंज में प्रायवेट प्रैक्टिस करते हुए स्थायी रूप से रहते हैं.

डॉक्टर सुभाष ने अपने लंबे क्लीनिकल अनुभव और लोगों के लिए सेवाभाव से इलाक़े में जो ख्याति अर्जित की है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है.

1950 से 1970 के दौरान पूरे फर्रुखाबाद जिले में चिकित्सा सुविधाएं न के बराबर थीं. यहां बमुश्किल 3 डॉक्टरों पर इलाक़े की जनता इलाज के लिए निर्भर थी. इनमें डॉक्टर पी एन टंडन और डॉक्टर मोहनलाल प्रमुख थे. इन डॉक्टरों की दो मान्यताएं प्रमुख थीं - एक तो यह कि आप पैसे के पीछे मत भागिए, आप सेवा कीजिये पैसा खुद ही आपके पीछे भागेगा. और दूसरी यह कि आप अधिक से अधिक सीरियस होकर काम कीजिये दूसरों की सेवा के लिए, क्योंकि आराम करके मरना है और काम करके भी मरना है. इन डॉक्टरों से मिली यह सीख डॉ सुभाष ने अपने जीवन में गांठ की तरह बांध ली और काम शुरू किया. डॉक्टर मोहनलाल उनके सगे ताऊ थे जिनके बारे में कहा जाता है की छिबरामऊ में वो अपनी मृत्यु के ठीक पहले तक मरीज़ देखकर ही उठे थे.

डॉक्टर सुभाष पिछले लगभग 50 बरसों से इलाक़े की जनता के बीच लगातार प्रैक्टिस करते हुए यहां के गरीब, मेहनतकश और मामूली लोगों के जीवन में एक अनिवार्य उपस्थिति हैं. लोगो का विश्वास है कि अगर कोई बीमारी जगह-जगह दौड़ने पर भी ठीक न हो तो डॉक्टर सुभाष ही आख़िरी सहारा हैं. उनके अपने घर और नर्सिंग होम पर सुबह से लेकर देर रात तक मरीजों की कतारें लगी रहती हैं और इनमें से वो लोग खुद को सौभाग्यशाली समझते हैं जिन्हें डॉक्टर देख लेते हैं. बेहद नाउम्मीद होकर आए मरीज भी डॉक्टर का स्पर्श पाकर नया जीवन पाते हैं और उनके रिश्तेदार यही मानते हैं कि मरने से पहले डॉक्टर सुभाष एक अंतिम पड़ाव हैं.

डॉक्टर सुभाष को बिना थके 12 से 14 घंटे रोज काम करते देखना किसी को भी हैरान कर देनेवाला है. यह काम वो अपने किसी निजी लाभ और व्यवसाय के लिए नहीं बल्कि पूरी तरह सेवा और समर्पण के भाव से करते हैं.

सुभाष नर्सिंग होम में कदम रखते ही आपको यह पता चल जाता है कि यह एक अस्पताल नहीं बल्कि भरोसे की जगह ज़्यादा है. जहां मरीज को इलाज करा सकने का बल मिलता है. पहली नजर में यह नर्सिंग होम आपके लिए एक शॉक की तरह लगेगा क्योंकि यहां ऐसा कुछ भी नही है जो आपके देखे किसी नर्सिंग होम से मेल खाता हो. लकड़ी की बेंचें और तखत यहां मरीजों के तीमारदारों और खुद मरीजों के लिए बिछे हैं. एक डिस्पेंसरी है, एक्स रे की मशीन और प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की अधखुली बोरियां वगैरह. दो तीन कम्पाउंडर दवा और दूसरी जरूरतों के लिए तीन शिफ्टों में काम करते हैं. बीच का अहाता जहां हाल ही में शेड पड़ गया है, पहले खुला हुआ ही था, यहां मरीज छाते लेकर बारिश या धूप में खड़े रहते थे. अस्पताल में बीड़ी-सिगरेट पीने या पान-गुटखा खाने और थूकने की आज़ादी भी एक ऐसा जनतांत्रिक स्पेस रचती है जिससे इस पूरी दुनिया के साथ आत्मीय रिश्ता बन जाता है. यह एक ऐसी जगह है जहां आना किसी भी तरह से डराने वाला अनुभव नहीं है. न डॉक्टर, न स्टाफ, न फीस और न ही माहौल ऐसा है कि डर लगे. अपने साथ अपना ओढ़ना-बिछौना और चना-चबेना लाकर इलाज कराना जैसे घर में ही इलाज कराने का दूसरा नाम है. ऊपर से डॉक्टर ऐसा जो सिर्फ इलाज ही नहीं करेगा बल्कि बेहद अपनापे से पेश भी आएगा.

डॉक्टर सुभाष आज दूर-पास के मरीजों के लिए ईश्वर जैसी आस्था का केन्द्र हैं और उनके बारे में यहां के लोगों के बीच कई तरह की किंवदंतियां मशहूर हैं. डॉक्टर सुभाष का सबसे छोटा पुत्र खुद एक कुशल दन्त चिकित्सक है और दिल्ली में कार्यरत है. पिता के समर्पण और सेवाभाव से प्रेरित वह खुद भी हफ्ते में दो दिन अपने पिता के नर्सिंग होम में अपनी सेवाएं देने के लिए हाजिर हो जाता है.

लोगों को विशवास है कि जब तक डॉक्टर सुभाष जीवित हैं तब तक उनके जीवन में स्वस्थ हो सकने की उम्मीद ज़िंदा है.
खुद डॉक्टर सुभाष दो बातों पर पक्का विशवास रखते हैं - एक तो यह कि अपने से ऊपर जाने का लक्ष्य रखो और अपने से ऊंचे जाने की हमेशा तमन्ना रखो. और दूसरी यह कि अपने से नीचे देख कर सैटिस्फाइड रहो. जन-जीवन में व्याप्त यह विशवास ही उन्हें जीवनी शक्ति देता है कि लोग तीन लोगों की दक्षिणा कभी नहीं रोकते - एक तो मल्लाह, दूसरा गुरु और तीसरा वैद्य.

डॉक्टर सुभाष इलाज के दौरान फीस और दवाइयों का फैसला अपने मरीजों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत से काटकर कभी नहीं करते और यही बात उन्हें विशाल जन समूह का पारिवारिक डॉक्टर बनाती है.

देश के अनेक ऐसे इलाक़े स्वास्थ्य की सुविधाओं से वंचित होकर भी संजीवनी पा रहे हैं तो इसमें डॉक्टर सुभाष जैसे समर्पित और कुशल डॉक्टरों का निस्वार्थ जीवन ही प्रमुख रोल निभाता है जिन्होंने लोभ और व्यक्तिगत लाभ के सामने अपने लोगों की भलाई को प्रमुखता दी है.


यही कारण है कि पिछले हफ्ते अपने ही सहपाठी के अस्पताल मेदांता से अपने पैर का सफल ऑपरेशन कराकर लौटे डॉक्टर सुभाष का स्थानीय जनता ने गर्म जोशी से स्वागत किया.


























Sunday, March 12, 2017

कौन तरह से तुम खेलत होली

होली महोत्सव - 10 

संध्या मुखर्जी



कैसी ये धूम मचाई

होली महोत्सव - 9 

बेग़म अख्तर



उड़त अबीर गुलाल लाली छाई है

होली महोत्सव - 8

गिरिजा देवी


पूजन दो गणगौर भंवर म्हाने

होली महोत्सव - 7 

उस्ताद सुल्तान ख़ान


रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे

होली महोत्सव - 6

शोभा गुर्टू


तब देख बहारें होली की

होली महोत्सव - 5

छाया गांगुली 

होली की मची है धूम

होली महोत्सव - 4

जूथिका रॉय 


आज पिया होली खेलन आया

होली महोत्सव - 3

आबिदा परवीन