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Sunday, March 12, 2017
Tuesday, October 7, 2014
तो ‘फ़ैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रूबरू ही सही
आबिदा परवीन गा रही हैं फ़ैज़ साहब की एक ग़ज़ल –
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही
न तन में खून फ़राहम है न अश्क आंखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही
किसी तरह तो जमे बज़्म मैक़दे वालो
नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हा-ओ-हू ही सही
गर इंतज़ार कठिन है तो जब तक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ्तगू ही सही
दयार-ए-गै़र में मरहम अगर नहीं कोई
तो ‘फ़ैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रूबरू ही सहीFriday, June 14, 2013
नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही
फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की ग़ज़ल, आबिदा
परवीन की आवाज़ में –
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही
न तन मे खून फ़राहम न अश्क आंखों में
नमाज़े-शौक़ तो वाज़िब है, बे-वज़ू ही सही
नमाज़े-शौक़ तो वाज़िब है, बे-वज़ू ही सही
किसी तरह तो जमे बज़्म, मैकदेवालों
नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही
नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही
गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वाद-ए-फर्दा से गुफ्तगू ही सही
किसी के वाद-ए-फर्दा से गुफ्तगू ही सही
दयारे-गैर में महरम अगर नहीं कोई
तो ‘फ़ैज़’ ज़िक्रे-वतन अपने रू-ब-रू ही सहीWednesday, September 26, 2012
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
आबिदा परवीन की आवाज़ में मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल –
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़हद
पर तबीयत इधर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती
क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती
दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता
बू-ए-चारागर नहीं आती
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती
Saturday, July 9, 2011
घड़ियाली देओ निकाल नी
आबिदा परवीन और बाबा बुल्ले शाह की एक और जुगलबन्दी. जगजाहिर है कि इस रचना को भारत में सबसे पहले बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने शोहरत दिलाई थी, अलबत्ता आबिदा का अन्दाज़ बिल्कुल अलहदा और खास तरह से निराला है -
Friday, July 8, 2011
Monday, June 20, 2011
ऐ इश्क हम तो अब तेरे क़ाबिल नहीं रहे
आज फिर आबिदा :
कुछ इस अदा से आज वो पहलूनशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे
या-रब किसी की राज़-ए-मुहब्बत की ख़ैर हो
दस्त ए जुनूँ रहे न रहे आस्तीं रहे
दर्द-ए-ग़म-ए-फ़िराक के ये सख्त मरहले
हैराँ हूँ मैं के फिर भी तुम इतने हसीं रहे
जा और कोई ज़ब्त की दुनिया तलाश कर
ऐ इश्क हम तो अब तेरे क़ाबिल नहीं रहे
अल्लाह रे चश्म-ए-यार की मौजिज़ बयानियाँ
हर इक को है गुमाँ के मुख़ातिब हमी रहे
इस इश्क की तलाफ़ी ए माफ़ात देखना
रोने की हसरतें हैं जब आंसू नहीं रहे
Saturday, June 11, 2011
Wednesday, February 23, 2011
युवा आबिदा परवीन को देखिए-सुनिए
सूफ़ी संगीत के क्षेत्र में आबिदा परवीन एक जाना पहचाना नाम हैं. पाकिस्तान के ख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद ग़ुलाम हैदर की पुत्री आबिदा इस मायने में भाग्यशाली रहीं कि उन्हें उनके पिता ने तमाम रिवायतों को दरकिनार कर बाक़ायदा संगीत शिक्षा दी और वे उन्हें तमाम महफ़िलों में भी ले जाया करते थे. बाद में उस्ताद सलामत अली ख़ान साहेब ने उनके टेलेन्ट को निखारा.
आज देखिये बेहद युवा आबिदा परवीन और वहीद अली ख़ान का एक दुर्लभ वीडियो -
Thursday, August 19, 2010
लग्गी वालेया नूँ नींद नईं औंदी
* सचमुच , जिसके जी को 'लग' जाए उसे नींद कहाँ आती है और ऐसी बेखबरी में अगर आँख लग जाए तो...
* आइए आज सुनते हैं बेगम आबिदा परवीन के स्वर में यह लोकगीत...
........तेरी किवें नी अँक्ख लग गई
* आइए आज सुनते हैं बेगम आबिदा परवीन के स्वर में यह लोकगीत...
........तेरी किवें नी अँक्ख लग गई
Friday, January 1, 2010
नए साल की पहली पोस्ट : किरपा करो महाराज !

नए साल का पहला दिन।
सभी कबाड़ियों को और 'कबाड़ख़ाना' के सभी पाठकों और प्रेमियों को नया साल मुबारक होवे !
आइए सुनते हैं आबिदा परवीन के स्वर में 'किरपा करो महाराज' ! और कोशिश करें कि हमारे बाहर - भीतर का संसार कबाड़ होने से बचा रहे !
बस्स , यही शुभकामना !
Sunday, October 11, 2009
भला हुआ मेरी मटकी फूटी

कितने - कितने बरस बीत गए
सब धरती को कागज
सात समुद्रों को स्याही
और समूची वनराजियों को
कलम बना लेने का मंत्र देने वाला जुलाहा
अब भी बुने जा रहा है लगातार-
रेशा रेशा !
बहुत दिन हुए 'कबाड़ख़ाना' पर कुछ गीत - संगीत नहीं प्रस्तुत किया. सो आज यह गीत और इस बहाने कबीर की कुछ साखियाँ. जब भी कबीर की बात आती है अधिकांश लोग कबीर के 'दोहे' सुनाने लगते हैं लेकिन यह सच है कि उन्होंने दोहे ( लिखने की बात नही है - 'मसि कागद छूयो नहीं !) नहीं , साखियाँ कही है.याद करे 'बीजक' के तीन खंडों को - साखी , सबद और रमैनी.साखी अर्थात साक्षी. इसमें कोई दो राय नहीं कि कबीर की वाणी अपने समय में अपने समय साक्ष्य थी और और आज भी अपने समय का साक्ष्य है !
कितनी - कितनी किताबों में कबीर पर कितना - कितना कहा गया है , उस इंसान के बारे में इतनी किताबें जिसने कभी 'मसि कागद' छुआ तक नहीं और 'कलम गही नहिं हाथ' और हम सब हैं कि पोथी पढ़ - पढ़कर मुए जा रहे हैं तथा 'अरे दोउन राह न पाई' की मार तमाम चेतावनी बाद भी अंधकार में मौज काटने में लगे हैं !
बहुत कुछ कहने मन कर रहा है लेकिन थोड़ा कहना और यह समझने की कोशिश करना कि 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो...'
सो , आज सुनते है कबीर की कुछ साखियाँ , स्वर है आबिदा परवीन का...
Wednesday, May 6, 2009
जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा
जिन चीजों ने 'बरबाद' करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है उनमें से एक इब्ने इंशा (१९२७-१९७८) की शायरी भी है. इंशा खुद कहते हैं - 'एक जरा से किस्से को अब देते क्या हो तूल मियाँ ' इसलिए लिखत - पढ़त ज्यादा नहीं !

जब शायरी के पक्षी को संगीत के पंख मिल जायें तो क्या कहने ! आइए सुनते हैं इंशा साहब की एक कालजयी रचना - स्वर है आबिदा परवीन का -

जब शायरी के पक्षी को संगीत के पंख मिल जायें तो क्या कहने ! आइए सुनते हैं इंशा साहब की एक कालजयी रचना - स्वर है आबिदा परवीन का -
कल चौदहवीं की रात थी, शब-भर रहा चर्चा तेरा.
कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा।
कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा।
हम भी वहीं मौजूद थे, हमसे भी सब पूछा किये,
हम हँस दिये, हम चुप रहे, मंज़ूर था पर्दा तेरा।
इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटीं महफ़िलें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।
कूचे को तेरे छोड कर जोगी ही बन जायें मगर,
जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा।
बेदर्द सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा , रुस्वा तेरा, शाइर तेरा 'इंशा' तेरा।
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