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Tuesday, August 14, 2018

पानी का धोका है और सोन मछरिया है


अजन्ता देव के पांच माहिये

 

1.

खुलने से खुले बस्ता

तू कितनी महँगी है

मै भी तो नहीं सस्ता.

 

2.

ये जोग बिजोग के दिन

काटेगा भला कैसे

कमबख्त बड़ा कमसिन. 

 

3.

ये रेत का दरिया है

पानी का धोका है

और सोन मछरिया है.

 

4.

हाँ मैंने दिया है दिल

पर सारे क़िस्से में

ये चाँद भी है शामिल.

 

5.

आंधी के पत्ते हैं

उड़ते फिरते रहते

दिल्ली कलकत्ते हैं. 


अजन्ता देव 



Tuesday, December 23, 2014

सिर्फ घोड़ों की आँखों में आंसू आ जाते हैं हर बार


युद्धबन्दी

-अजन्ता देव 

हताशा से मेरा गला सूख गया 
फिर से मेरा ही नाम दर्ज हुआ

दुनिया की किसी भी भाषा में
नफ़रत से बोला गया नाम
मेरे नाम में बदल जाता है

हर युद्ध की मै क़ैदी हूँ 
हर युद्ध मुझसे छीनता  रहता है 
आसमान पेड़ गीत और मोटा अनाज 

कुछ दूर तक का वक्फा भी नहीं मिलता रिहाई का 
कि फिर पकड़ लिया जाता है 

कितने सत्तावन सैतालीस पैंतालीस चार पांच तेरह सौ अट्ठारह सौ उन्नीस सौ दो हज़ार ग्यारह बारह तेरह और आगे भी जाने कितने 

मुझ पर पूरी दुनिया का दावा है 
इसलिए मुझे कोई नहीं जानता 
कोई देश नहीं कहता आगे आकर 
यह युद्धबन्दी मेरा है 

सिर्फ घोड़ों की आँखों में आंसू आ जाते हैं हर बार 
पेड़ों से टपकता है खारा  पानी
मछलियाँ उलट जाती हैं समंदर में

ज़मीन फट कर खाई बन जाती है
जिसमे दुबके बच्चे फैली आँखों से इन्तेज़ार करते हैं
सुर्ख धमाकों का

आसमान पर मंडराने लगता है भूतिया जहाज़  ...

Friday, October 31, 2014

स्त्रियां नहीं बन सकतीं शराबी, यह कहा होगा कवि ने मेरे हाथ से पीकर



आज अजन्ता देव का जन्मदिन है. आज से कोई छः सात पहले उनकी कविताओं की एक पतली सी किताब मुझे हासिल हुई थी - 'एक नगरवधू की आत्मकथा'. उस कविता संग्रह ने मुझे झकझोर कर रख दिया था. आज भी उस पाए की कविताएँ किसी भी हिन्दी कवयित्री की मेरी निगाह से गुज़री हों मुझे याद नहीं पड़ता. अजन्ता जी को उनके जन्मदिन की बधाईयाँ प्रेषित करता हुआ मैं उनकी कविताओं पर लिखा अपना एक पुराना लेख आपसे साझा करना चाहता हूँ -

इतना झीना जितना नशा, इतना गठित जितना षडयंत्र

-----------------------------------------------------------

 

ये अब्र पुराने हैं
बरसेंगे यहीं आकर
मेरा घर जाने हैं.

'माहिया' शीर्षक यह नन्हीं सी कविता अजन्ता देव की छोटी सी कविता-पुस्तिका 'एक नगरवधू की आत्मकथाका हिस्सा है. जब से यह पुस्तिका मेरे पास पहुंची है, इसे दसियों बार पढ़ चुका हूं और हर बार इसमें नये अर्थ मिले हैं.

यूरोप से उधार लिये गये नारीवाद और उत्तर नारीवाद जैसे किताबी सिद्धान्तों की आड़ में युवतर कवयित्रियों की लगतार बढ़ती जाती जमात की एकांगी और रसहीन कविताओं की भीड़ में अलग से छिटक सामने आती है यह ज़बरदस्त पुस्तिका. पहली ही कविता है 'मेरा मिथ्यालय':

आमन्त्रण निमन्त्रण नहीं
अनायास खींच लेता है अपनी ओर
मेरा मिथ्यालय

श्रेष्ठ जनों के बीच
यहीं रचा जाता है
कलाओं का महारास

मेरे द्वार कभी बन्द नहीं होते
ये खुले रहेंगे
तुम्हारे जाने के बाद भी.

एक जड़ समाज की नब्ज़ पर उंगली रख कर हतप्रभ कर देने का यह क्रम अगली कविता 'विपरीत रसायन' में जारी रहता है:

स्त्रियां नहीं बन सकतीं शराबी
यह कहा होगा कवि ने
मेरे हाथ से पीकर
अगर बन जातीं स्त्रियां शराबी
तो पिलाता कौन

मेरे प्याले भरे हैं मद से
केसर कस्तूरी झलझला रही है
वैदूर्यमणि सी
कीमियागर की तरह
मैं मिला रही हूं
दो विपरीत रसायन
विस्फोट होने को है
मैं प्रतीक्षा करूंगी तुम्हारे डगमगाने की.

और आगे देखिये 'रामरसोई' शीर्षक कविता क्या कहती है:

तुम्हारी जिह्वा
ठांव-कुठांव टपकाती है लार
इसे काबू करना तुम्हारे वश में कहां
तुमने चख लिया है हर रंग का लहू

परन्तु एक बार आओ
मेरी रामरसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में नहीं 
मेरे चूल्हे में भी है
यह पृथ्वी स्वयं हांडी बन कर 
खदबदा रही है
केवल द्रौपदियों को ही मिलती है
यह हांडी
पांच पतियों के परमसखा से.

यह एक बेबाक, ईमानदार कथन कहने की हिम्मत है जिसमें अजन्ता देव सारे समाज के सामने एक आईना रखती हुईं 'अन्य जीवन से' में कहती हैं:

किस लोक के कारीगर हो
कि रेशे उधेड़ कर अंतरिक्ष के 
बुना है पटवस्त्र
और कहते हो नदी सा लहराता दुकूल

होगा नदी सा
पर मैं नहीं पृथ्वी सी
कि धारण करूं यह विराट
अनसिला चादर कर्मफल की तरह
मुझे तो चाहिये एक पोशाक
जिसे काटा गया हो मेरी रेखाओं से 
इतना सुचिक्‍कन कि मेरी त्‍वचा
इतने बेलबूटे कि याद न आये
हतभाग्‍य पतझर
सारे रंग जो छीने गये हों
अन्‍य जीवन से

इतना झीना जितना नशा
इतना गठित जितना षडयंत्र


मैं हर दिन बदलती हूं चोला
श्रेष्ठ्जनों की सभा में
आत्मा नहीं हूं मैं
कि पहने रहूं एक ही देह
मृत्यु की प्रतीक्षा में.

"आत्मा नहीं हूं मैं" कह चुकने के साथ ही बहुत सारी जंज़ीरें यक-ब-यक खुलती चली जाती हैं. ज़रा 'कामकेलि' शीर्षक कविता को देखें:

क्या किया मैंने
शैशव से यौवन तक
किया जो भी
वह उपस्थित था धरती पर पहले से

चपल मुद्रा
चतुर स्वभाव
झीना छल
मिला सदैव अपने आसपास
वह जो साधा गया सायास
क्या नहीं था प्रकृति में अनायास

रंगों की इतनी छायाएं
ये प्राणवन्त प्रतिमाएं
फिर भी मेरी यह 
दुर्दान्त धृष्टता

सृष्टि की आदिकला को
मैंने संवारा
कितने श्रृंगार
कितने कपट से
फिर भी अन्त में बच गई 
केवल कामकेलि
मूक पशुओं से सीखी एक कला.

अजन्ता देव की कविताएं इधर लिखी जा रही सपाटबयानी के बीच किसी ख़ुशबूदार झोंके की मानिन्द आपको अपने लपेटे में ले लेती हैं. बहुत दिनों बाद मैंने भाषा में एक नया मुहाविरा, एक नया नैसर्गिक शिल्प और कहीं सूफ़ियाना तो कहीं मन्द्र मेघ जैसा स्वर देखा. यह एक बेहद संवेदनशील और बेहद चौकस रचनाकार है जो अपने समाज और परिवेश के दोमुंहेपन को एक पारदर्शी कौशल के साथ उघाड़ देने की हिम्मत रखता है. और भाषा के साथ वे अनन्त प्रयोग करती चलती हैं. अजन्ता देव की कविताओं का अन्डरस्टेटमेन्ट युवा कवियों के लिये मिसाल है. पुस्तिका से एक और कविता 'रंग है री':

कैसी आंधी चली होगी रात भर
कि उड़ रही है रेत ही रेत अब तक

असंख्य पदचिह्नों की अल्पना आंगन में
धूम्रवर्णी व्यंजन सजे हैं चौकियों पर
पूरा उपवन श्वेत हो गया है
निस्तेज सूरज के सामने उड़ रहे हैं कपोत

युवतियां घूम रही हैं
खोले हुए धवल केश
वातावरण में फैली है
वैधय की पवित्रता
कोलाहल केवल बाहर है

आज रंग है री मां! रंग है री! 



Friday, September 27, 2013

एक शब्दकोष के पीले-विदीर्ण-जीर्ण पन्नों पर मत जाओ

इसे थोड़ा सा ठहर कर पढ़े जाने की दरकार है. बस इतनी सी गुज़ारिश.


रेख़ते के बीज

(उर्दू-हिन्दी शब्दकोष पर एक लंबा पर अधूरा वाक्य)

-कृष्ण कल्पित

एक दिन मैं दुनिया जहान की तमाम महान बातों महान साहित्य महान कलाओं से ऊब-उकताकर उर्दू-हिन्दी शब्दकोष उठाकर पढ़ने लगा जिसे उर्दू में लुग़त कहा जाता है यह तो पता था लेकिन दुर्भाग्यवश यह पता नहीं था कि यह एक ऐसा आनंद-सागर है जिसके सिर्फ़ तटों को छूकर मैं लौटता रहा तमाम उम्र अपनी नासमझी में कभी किसी नुक़्ते-उच्चारण-अर्थात के बहाने मैं सिर्फ जलाशयों में नहाता रहा इस महासमुद्र को भूलकर और यह भूलकर कि यह लुग़त दुनिया के तमाम क्लासिकों का जन्मदाता है और एक बार तो न जाने किस अतीन्द्रिय-दिव्य प्रेरणा से इसे मैंने कबाड़ी के तराज़ू पर रखकर वापस उठा लिया था इसकी काली खुरदरी जिल्द का स्पर्श किसी आबनूस के ठंडे काष्ठ-खण्ड को छूने जैसा था जिससे बहुत दिनों तक मैं अख़बारों के ढेर को दबाने का काम लेता रहा जिससे वे उड़ नहीं जाएँ अख़बारी हवाओं में इसे यूं समझिए कि मेरे पास एक अनमोल ख़ज़ाना था जिसे मैं अपनी बेख़बरी में सरे-आम रखे हुए था यह वाक्य तो मैंने बहुत बाद में लिखा कि एक शब्दकोष के पीले-विदीर्ण-जीर्ण पन्नों पर मत जाओ कि दुनिया के तमाम आबशार यहीं से निकलते हैं कि इसकी थरथराती आत्मा में अब तक की मनुष्यता की पूरी कहानी लिखी हुई है कि इसकी पुरानी जर्जर काया में घुसना बरसों बाद अपने गाँव की सरहदों में घुसना है कि मैंने इसके भीतर जाकर जाना कि कितनी तरह की नफ़रतें होती हैं कितनी तरह की मुहब्बतें कैसे कैसे जीने के औज़ार कैसी कैसी मरने की तरकीबें कि इसकी गलियों से गुज़रना एक ऐसी धूल-धूसरित सभ्यता से गुज़रना था जहाँ इतिहास धूल-कणों की तरह हमारे कंधों पर जमता जाता है और महाभारत की तरह जो कुछ भी है इसके भीतर है इसके बाहर कुछ नहीं है एक प्राचीन पक्षी के पंखों की फड़फड़ाहट है एक गोल गुम्बद से हम पर रौशनी गिरती रहती है जितने भी अब तक उत्थान-पतन हैं सब इसके भीतर हैं इतिहास की सारी लड़ाइयां इसके भीतर लड़ी गईं शान्ति के कपोत भी इसके भीतर से उड़ाए गए लेकिन वे इसकी काली-गठीली जिल्द से टकराकर लहूलुहान होते रहे और यह जो रक्त की ताज़ा बूँदें टपक रही हैं यह इसकी धमनियों का गाढ़ा काला लहू है जो हमारे वक़्त पर बदस्तूर टपकता रहता है जो निश्चय ही मनुष्यता की एक निशानी है और हमारे ज़िंदा रहने का सबूत गुम्बदों पर जब धूप चमक रही हो तब यह एक पूरी दुनिया से सामना है यह एक चलती हुई मशीन है वृक्षों के गठीले बदन को चीरती हुई एक आरा मशीन जिसका चमकता हुआ फाल एक निरंतर धधकती अग्नि से तप्त-तिप्त जहाँ काठ के रेशे हम पर रहम की तरह बरसते हैं पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह अपने रंग-रेशों-धागों को अपनी आत्मा से सटाए हुए हम हमारे इस समय में गुज़रते रहते हैं यह जानते हुए कि जिन जिन ने भी इन शब्दों को बरता है वे हमारे ही भाई-बंद हैं एक बहुत बड़ा संयुक्त परिवार जिसके सदस्य रोज़ी-रोटी की तलाश में उत्तर से पच्छिम व पूरब से दक्खिन यानी सभी संभव दिशाओं में गए और वह बूढ़ा फ़क़ीर जो रेख़ते के बीज धरती पर बिखेरता हुआ दक्खिन से पूरब की तरफ आ रहा था जिसे देखकर धातु-विज्ञानियों ने लौह-काष्ठ और चूने के मिश्रण से जिस धातु का निर्माण किया उससे मनुष्य ने नदियों पर पुल बनाए लोहे और काष्ठ के बज्जर पुल जिन पर से पिछली कई शताब्दियों से नदियों के नग्न शरीर पर कलकल गिर रही है चूना झर रहा हैं अंगार बरस रहा है और जिसके कूल-किनारों पर क़ातिल अपने रक्तारक्त हथियार धो रहे हैं वे बाहर ही करते हैं क़त्ले-आम तांडव बाहर ही मचाते हैं क़ातिल सिर्फ मुसीबत के दिनों में ही आते हैं किसी शब्दकोष की जीर्ण-शीर्ण काया में सर छिपाने वे ख़ामोश बैठे रहते हैं सर छिपाए क़ाज़ी क़ायदा क़ाबू क़ादिर और क़ाश के बग़ल में और क़ाबिले-ज़िक्र बात यह है कि क़ानून और क़ब्रिस्तान इसके आगे बैठे हुए हैं पिछली कई सदियों से और और इसके आगे बैठे क़ाबिलियत और क़ाबिले-रहम पर हम तरस खाते रहते हैं जैसे मर्ग के एक क़दम आगे ही मरकज़ है और यह कहने में क्या मुरव्वत करना कि मृत्यु के एकदम पास मरम्मत का काम चलता रहता है और बावजूद क़ातिलों को पनाह देने के यह दुनिया की सबसे पवित्र किताब है जबकि दुनिया के तमाम धर्मग्रंथों को हर साल निर्दोष लोगों के रक्त से नहलाने की प्राचीन प्रथा चलती आती है इस तरह पीले नीले गुलाबी हरे रेशम वस्त्रों में लिपटे हुए धर्मग्रंथ मनुष्य के ताज़ा खून की तरह प्रासंगिक बने रहते हैं जबकि यहाँ दरवाज़े से झाँकते ही हमें दरिन्दे और दरवेश एक से लबादे ओढ़े हुए एक साथ नज़र आते हैं लुग़त के एक ही पन्ने पर गुज़र-बसर करते और उस काल्पनिक और पौराणिक धार की याद दिलाते हुए जहाँ शेर और बकरी एक साथ पानी पीते थे और यह तो सर्वथा उचित ही है कि शराब शराबख़ाना शराबख़ोर और शराबी एक ही इलाक़े में शिद्दत से रहें लेकिन क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं कि शराफ़त जितनी शराबी के पास है उतने पास किसी के नहीं हालाँकि शर्मिन्दगी उससे दो-तीन क़दम दूर ही है यह कोई शिगूफ़ा नहीं मेरा शिकस्ता दिल ही है जो इतिहास की अब तक की कारगुज़ारियों पर शर्मसार है जिसका हिन्दी अर्थ लज्जित बताया गया है जिसके लिए मैं शर्मिन्दा हूँ और इसके लिए फिर लज्जित होता हूँ कि मुझे अब तक क्यों नहीं पता था कि मांस के शोरबे को संस्कृत में यूष कहा जाता है शोरिश विप्लव होता है १८५७ जैसा धूल उड़ाता हुआ एक कोलाहल और इस समय मैं जो उर्दू-हिन्दी शब्दकोष पढ़ रहा हूँ जिसके सारे शब्द कुचले और सताए हुए लोगों की तरह जीवित हैं इसके सारे शब्द १८५७ के स्वतंत्रता-सेनानी हैं ये सूखे हुए पत्ते हैं किसी महावृक्ष के जिससे अभी तक एक प्राचीन संगीत क्रंदन की तरह राहगीरों पर झरता रहता है यह एक ऐसी गोर है जिसके नीचे नमक की नदियाँ लहराती रहती हैं आँधियों में उड़ता हुआ एक तम्बू जो जैसा भी है हमारा आसरा है एक मुकम्मल भरोसा कि यह हमें आगामी आपदाओं से बचाएगा कहीं से भी खोलो इस कोहे-गिराँ को यह कहीं से भी समाप्त नहीं होता है न कहीं भी शुरू जैसे सुपुर्द का मानी हुआ हस्तांतरित तो क्या कि शराब का मटका और सुपुर्दगी होते ही हवालात में बदल जाता है गाने-बजाने का सामान होता है साज़ पर वह षड्यंत्र भी होता है मरते समय की तकलीफ़ को सकरात कहते हैं शब्द है तो मानना ही पड़ेगा कि वह चीज़ अभी अस्तित्व में है सकरात की तकलीफ़ में भी शब्द ही हमारे काम आएँगे यह भरोसा हमें एक शब्दकोष से मिलता है जिसे मैं क्लासिकों का क्लासिक कहता हूँ जिस उर्दू-हिन्दी शब्दकोष को मैं इस समय पढ़ रहा हूँ उसे ख़रीद लाया था सात बरस पहले एक रविवार दिल्ली के दरियागंज से एक किताबों के ढेर से फ़क़त बीस रुपयों में उस कुतुब फ़रोश को भला क्या पता कि गाँधी की तस्वीर वाले एक मैले-कुचैले कागज़ के बदले में आबे-हयात बेच रहा है वह एक समूची सभ्यता का सौदा कर रहा है सरे-राह जिसमें सकरात के फ़ौरन बाद सुकूत है और इसके बाद सुकून इसके बाद एक पुरानी रिहाइश है जहाँ हम सबको पहुँचना है काँटों से भरा एक रेशम-मार्ग सिल्क जिसे कभी कौशेय कभी पाट कभी डोरा कभी रेशम कहा गया यह एक सिलसिलाबंदी है एक पंक्तिबद्धता जो हमारे पैदा होने से बहुत पहले से चली आती है क्या आप जानते हैं कि समंदर एक कीड़े का नाम है जो आग में रहता है ऐसी ऐसी हैरत अंगेज़ आश्चर्यकारी बातें इन लफ़्ज़ों से बसंत के बाद की मलयानिल वायु में मंजरियों की तरह झरती रहती हैं ऐसे ऐसे रोज़गार आँखों के सामने से गुज़रते हैं मसलन संगसाज़ उस आदमी को कहते हैं जो छापेख़ाने में पत्थर को ठीक करता और उसकी ग़लतियाँ बनाता था और यह देखकर हम कितने सीना सिपर हो जाते थे कि हर आपत्ति-विपत्ति का सामना करने को तैयार रहने वालों के लिए भी एक लफ़्ज़ बना है तथा जिसे काया प्रवेश कहते हैं अर्थात अपनी रूह को किसी दूसरे के जिस्म में दाखिल करने के इल्म को सीमिया कहते हैं जो लोग यह सोच रहे हैं कि अश्लीलता और भौंडापन इधर हाल की इलालातें हैं उन्हें यह जानना चाहिए कि यह उरयानी बहुत पुरानी है पुरानी से भी पुरानी दो पुरानी से भी अधिक पुरानी काशी की तरह पुरानी लोलुपता जितनी पुरानी लालसा और कामशक्तिवर्द्धक तेल तमा जितनी पुरानी और जिसमें उग्रता, प्रचंडता और सख्त तेज़ी जैसी चीज़ें हों उसे तूफ़ान कहा जाता है और आदत अपने आप में एक इल्लत है जैसा कि पूर्वकथन है कि इसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है कहीं पर भी समाप्त किया जा सकता है फिर से शुरू करने के लिए एक शब्द के थोड़ी दूर पीछे चलकर देखो तुम्हें वहाँ कुछ जलने की गंध आएगी एक आर्त्तनाद सुनाई पड़ेगा कुछ शब्द तो लुटेरों के साथ बहुत दूर तक चले आए लगभग गिड़गिड़ाते रहम की भीख माँगते हुए शताब्दियों के इस सफ़र में शब्द थोड़े थक गए हैं फिर भी वे सिपाहियों की तरह सन्नद्ध हैं रेगिस्तान नदियों समन्दरों पहाड़ों के रास्ते वे आए हैं इतनी दूर से ये शब्द विजेताओं की रख हैं जो यहाँ से दूर फ़ारस की खाड़ी तक उड़ रही है इनका धूल धूसरित चेहरा ही इनकी पहचान है ये अपने बिछड़े हुओं के लिए बिलखते हैं और एक भविष्य में होने वाले हादसे का सोग मनाते हैं और इनके बच्चे काले तिल के कारण अलग से पहचाने जाते हैं यहाँ उक़ाब को गरुड़ कहते हैं जिसे किसने देखा है एक ग़रीबुल-वतन के लिए भी यहाँ एक घर है कहने के लिए कंगाल भी यहाँ सरमाएदार की तरह क़ाबिज़ है यह एक ऐसा भूला हुआ गणतंत्र है जहाँ करीम और करीह पड़ोसी की तरह रहते हैं यह अब तक की मनुष्यता की कुल्लियात है हर करवट बैठ चुके ऊँट का कोहान एक ऐसा गुज़रगाह जिसपर गुज़िश्ता समय की पदचाप गूँज रही है और इससे गुज़रते हुए ही हम यह समझ सकते हैं कि हमारा यह उत्तर-आधुनिक समय दर अस्ल देरीदा-हाल नहीं बल्कि दरीदा-हाल है किंवा यह फटा-पुराना समय पहनकर ही हम इस नए ज़माने में रह सकते हैं यह जानते हुए कि लिफ़ाफ़ा ख़त भेजने के ही काम नहीं आता हम चाहें तो इसे मृत शरीरों पर भी लपेट सकते हैं एक निरंतर संवाद एक मनुष्य का दूसरे से लगातार वाकोपवाक एक अंतहीन बातचीत कई बार तो यह शब्दकोष जले हुए घरों का कोई मिस्मार नगर लगता है जहाँ के बाशिंदे उस अज्ञात लड़ाई में मारे गए जो इतिहास में दर्ज नहीं है एक कोई डूबा हुआ जहाज़ एक ज़ंग खाई ज़ंजीर टूटा हुआ कोई लंगर एक सूखा हुआ समुद्र उजाड़ रेगिस्तान एक वीरान बंदरगाह एक उजड़ा हुआ भटियारख़ाना इसी तरह धीरे धीरे हमारी आँखें खुलती हैं और हवा के झोंकों से जब गुज़िश्ता गर्द हटती है तब हमारा एक नई दुनिया से सामना होता है जहाँ विपत्तियों-आपदाओं और बुरे वक़्त में इस शब्दकोष से हम उस प्राचीन बूढ़े नाविक की तरह एक प्रार्थना बना सकते हैं; एक जीर्णशीर्ण शब्दकोष इससे अधिक क्या कर सकता है कि वह मुसीबत के दिनों में मनुष्यता के लिए एक प्रार्थना बन जाए, भले ही वह अनसुनी रहती आई हो.


(अजन्ता देव की फेसबुक वॉल से साभार.)

Thursday, August 8, 2013

कोई देश नहीं कहता आगे आकर यह युद्धबन्दी मेरा है


युद्धबन्दी

-अजन्ता देव 

हताशा से मेरा गला सूख गया 
फिर से मेरा ही नाम दर्ज हुआ

दुनिया की किसी भी भाषा में
नफ़रत से बोला गया नाम
मेरे नाम में बदल जाता है

हर युद्ध की मै क़ैदी हूँ 
हर युद्ध मुझसे छीनता  रहता है 
आसमान पेड़ गीत और मोटा अनाज 

कुछ दूर तक का वक्फा भी नहीं मिलता रिहाई का 
कि फिर पकड़ लिया जाता है 

कितने सत्तावन सैतालीस पैंतालीस चार पांच तेरह सौ अट्ठारह सौ उन्नीस सौ दो हज़ार ग्यारह बारह तेरह और आगे भी जाने कितने 

मुझ पर पूरी दुनिया का दावा है 
इसलिए मुझे कोई नहीं जानता 
कोई देश नहीं कहता आगे आकर 
यह युद्धबन्दी मेरा है 

सिर्फ घोड़ों की आँखों में आंसू आ जाते हैं हर बार 
पेड़ों से टपकता है खारा  पानी
मछलियाँ उलट जाती हैं समंदर में

ज़मीन फट कर खाई बन जाती है
जिसमे दुबके बच्चे फैली आँखों से इन्तेज़ार करते हैं
सुर्ख धमाकों का

आसमान पर मंडराने लगता है भूतिया जहाज़  ...


Wednesday, September 26, 2012

पुकार रही हूँ तुम्हें चातक की तरह नहीं अपनी तरह


अजन्ता देव की एक कविता आप ने कल पढी थी. आज उसी क्रम में एक और कविता -

अर्द्धसमाप्त जीवन

क्या यही मृत्यु है
जबकि सब-कुछ रह गया पहले सा
मैं भी मेरा जीवन भी
रह गया लोकस्मृति में

आशा रह गई पुनर्जन्म की
खीज रह गई कुछ नहीं पाने की
शरीर गया पर रह गया अशरीर
पृथ्वी रह गई विहंगम कोण से दिखती हुई
रह गई पिपासा जो नहीं मिटेगी जल से

क्षुधा स्वयं को खा रही है
निद्रा घेर रही है चेतना को
महास्वप्न में दिख रहा है तुम्हारा चेहरा
मेघ में आकृति की तरह
अनहद के पार से
पुकार रही हूँ तुम्हें
चातक की तरह नहीं
अपनी तरह

मृत्यु भी पूर्ण नहीं कर सकी
एक अर्द्धसमाप्त जीवन 

Tuesday, September 25, 2012

अब मैं अनिकेत हूँ


अजन्ता देव के नाम से कबाड़खाने के पाठक अपरिचित नहीं हैं. उनकी एक छोटी सी किताब ‘एक नगरवधू की आत्मकथा’ को हाथोंहाथ लिया गया था और उस पर एक विस्तृत पोस्ट मैंने कभी यहाँ लगाई थी, जिसका लिंक यह रहा - इतना झीना जितना नशा, इतना गठित जितना षडयंत्र. आज प्रस्तुत है उनकी एक और कविता -

अनिकेत 

इसे कभी महल कभी प्रासाद कहा गया
छत को असंख्य हाथों ने सम्भाला
विशाल खम्भों की तरह
यह खड़ा था नींव के सहस्रपदों पर

शताब्दियों तक टपकने के बाद चूना
झंझाओं से टकराकर चूर-चूर चट्टान
मेरे महल की भित्तियों के लिए
कितनी कुल्हाड़ियाँ कितनी चोटें
लकड़ी के एक खंड पर
कितनी आरियों का दिन-रात आवागमन
तब कहीं कक्ष के दो जोड़े किवाड़

कितने अधिक श्रम पर
यह मेरा विश्राम था ।
पर यात्राएँ अभी और थीं
प्रस्थान का हो चुका है समय
सभी कक्ष बंद किए जा रहे हैं
खुला है केवल एक अकेला द्वार
बाहर नक्षत्रों की खचाखच है
पीछे बंद होती साँकल की
धातुई ध्वनि

अब मैं अनिकेत हूँ

Thursday, May 29, 2008

इतना झीना जितना नशा, इतना गठित जितना षडयंत्र


ये अब्र पुराने हैं
बरसेंगे यहीं आकर
मेरा घर जाने हैं.

'माहिया' शीर्षक यह नन्हीं सी कविता अजन्ता देव की छोटी सी कविता-पुस्तिका 'एक नगरवधू की आत्मकथा' का हिस्सा है. जब से यह पुस्तिका मेरे पास पहुंची है, इसे दसियों बार पढ़ चुका हूं और हर बार इसमें नये अर्थ मिले हैं.

यूरोप से उधार लिये गये नारीवाद और उत्तर नारीवाद जैसे किताबी सिद्धान्तों की आड़ में युवतर कवयित्रियों की लगतार बढ़ती जाती जमात की एकांगी और रसहीन कविताओं की भीड़ में अलग से छिटक सामने आती है यह ज़बरदस्त पुस्तिका. पहली ही कविता है 'मेरा मिथ्यालय':

आमन्त्रण निमन्त्रण नहीं
अनायास खींच लेता है अपनी ओर
मेरा मिथ्यालय

श्रेष्ठ जनों के बीच
यहीं रचा जाता है
कलाओं का महारास

मेरे द्वार कभी बन्द नहीं होते
ये खुले रहेंगे
तुम्हारे जाने के बाद भी.

एक जड़ समाज की नब्ज़ पर उंगली रख कर हतप्रभ कर देने का यह क्रम अगली कविता 'विपरीत रसायन' में जारी रहता है:

स्त्रियां नहीं बन सकतीं शराबी
यह कहा होगा कवि ने
मेरे हाथ से पीकर
अगर बन जातीं स्त्रियां शराबी
तो पिलाता कौन

मेरे प्याले भरे हैं मद से
केसर कस्तूरी झलझला रही है
वैदूर्यमणि सी
कीमियागर की तरह
मैं मिला रही हूं
दो विपरीत रसायन
विस्फोट होने को है
मैं प्रतीक्षा करूंगी तुम्हारे डगमगाने की.

और आगे देखिये 'रामरसोई' शीर्षक कविता क्या कहती है:

तुम्हारी जिह्वा
ठांव-कुठांव टपकाती है लार
इसे काबू करना तुम्हारे वश में कहां
तुमने चख लिया है हर रंग का लहू

परन्तु एक बार आओ
मेरी रामरसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में नहीं
मेरे चूल्हे में भी है
यह पृथ्वी स्वयं हांडी बन कर
खदबदा रही है
केवल द्रौपदियों को ही मिलती है
यह हांडी
पांच पतियों के परमसखा से.

यह एक बेबाक, ईमानदार कथन कहने की हिम्मत है जिसमें अजन्ता देव सारे समाज के सामने एक आईना रखती हुईं 'अन्य जीवन से' में कहती हैं:

किस लोक के कारीगर हो
कि रेशे उधेड़ कर अंतरिक्ष के
बुना है पटवस्त्र
और कहते हो नदी सा लहराता दुकूल

होगा नदी सा
पर मैं नहीं पृथ्वी सी
कि धारण करूं यह विराट
अनसिला चादर कर्मफल की तरह
मुझे तो चाहिये एक पोशाक
जिसे काटा गया हो मेरी रेखाओं से
इतना सुचिक्‍कन कि मेरी त्‍वचा
इतने बेलबूटे कि याद न आये
हतभाग्‍य पतझर
सारे रंग जो छीने गये हों
अन्‍य जीवन से

इतना झीना जितना नशा
इतना गठित जितना षडयंत्र


मैं हर दिन बदलती हूं चोला
श्रेष्ठ्जनों की सभा में
आत्मा नहीं हूं मैं
कि पहने रहूं एक ही देह
मृत्यु की प्रतीक्षा में.

"आत्मा नहीं हूं मैं" कह चुकने के साथ ही बहुत सारी जंज़ीरें यक-ब-यक खुलती चली जाती हैं. ज़रा 'कामकेलि' शीर्षक कविता को देखें:

क्या किया मैंने
शैशव से यौवन तक
किया जो भी
वह उपस्थित था धरती पर पहले से

चपल मुद्रा
चतुर स्वभाव
झीना छल
मिला सदैव अपने आसपास
वह जो साधा गया सायास
क्या नहीं था प्रकृति में अनायास

रंगों की इतनी छायाएं
ये प्राणवन्त प्रतिमाएं
फिर भी मेरी यह
दुर्दान्त धृष्टता

सृष्टि की आदिकला को
मैंने संवारा
कितने श्रृंगार
कितने कपट से
फिर भी अन्त में बच गई
केवल कामकेलि
मूक पशुओं से सीखी एक कला.

अजन्ता देव की कविताएं इधर लिखी जा रही सपाटबयानी के बीच किसी ख़ुशबूदार झोंके की मानिन्द आपको अपने लपेटे में ले लेती हैं. बहुत दिनों बाद मैंने भाषा में एक नया मुहाविरा, एक नया नैसर्गिक शिल्प और कहीं सूफ़ियाना तो कहीं मन्द्र मेघ जैसा स्वर देखा. यह एक बेहद संवेदनशील और बेहद चौकस रचनाकार है जो अपने समाज और परिवेश के दोमुंहेपन को एक पारदर्शी कौशल के साथ उघाड़ देने की हिम्मत रखता है. और भाषा के साथ वे अनन्त प्रयोग करती चलती हैं. अजन्ता देव की कविताओं का अन्डरस्टेटमेन्ट युवा कवियों के लिये मिसाल है. पुस्तिका से एक और कविता 'रंग है री':

कैसी आंधी चली होगी रात भर
कि उड़ रही है रेत ही रेत अब तक

असंख्य पदचिह्नों की अल्पना आंगन में
धूम्रवर्णी व्यंजन सजे हैं चौकियों पर
पूरा उपवन श्वेत हो गया है
निस्तेज सूरज के सामने उड़ रहे हैं कपोत

युवतियां घूम रही हैं
खोले हुए धवल केश
वातावरण में फैली है
वैधय की पवित्रता
कोलाहल केवल बाहर है
आज रंग है री मां! रंग है री!

(इस पोस्ट के लिये पहला शुक्रिया अविनाश का जिनकी मार्फ़त अजन्ता जी की इस पुस्तिका से परिचय हुआ. दूसरा शुक्रिया अजन्ता जी का जिन्होंने मुझे यह पुस्तक भेजी. पुस्तिका प्राप्ति का पता: कलमकार प्रकाशन, ६८/१७९, प्रताप नगर, सांगानेर, जयपुर -३०२०३० टेलीफ़ोन: ०१४१ ५१२२००६)