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Tuesday, January 16, 2018

माधुरी दीक्षित, नानाजी और पानी की बोतल का किस्सा


माधुरी दीक्षित, नानाजी और पानी की बोतल का किस्सा


नानाजी किसी बीमा कम्पनी में लम्बी नौकरी कर बड़ी पोस्ट से रिटायर हुए थे. सगे नाना नहीं थे. किसी रिश्ते से माँ के चचा लगते थे. हमारे बचपन में जाड़ों के दिनों वे हमारे घर आते तो दो-दो, तीन-तीन महीनों तक मेहमानों वाले कमरे में उनका ठिकाना रहता. इस दौरान वह कमरा बीड़ी-सिगरेट के बेहिसाब धुएं से अटा रहता. वे दिन में अस्सी-नब्बे पनामा की सिगरेटें और पांचेक बण्डल इकतालीस नंबर बीड़ी के फूंक लेते थे. उनका यह हिसाब देखकर हमारे असंख्य परिचित-संबंधी तकरीबन पचास साल से उनके जल्दी मर जाने की भविष्यवाणियाँ करते रहे थे. यह और बात थी कि उनमें से ज़्यादातर खुद समय-समय पर अपने अपने बखत पर एक के बाद अल्लाह मियाँ की ठौर निकल चुके थे. ऐसी किसी मृत्यु के घटने पर किसी सिद्धहस्त कलाकार की साधना से पाई अद्वितीय अदा के साथ बीड़ी का आखिरी कश चूसते हुए नानाजी कहते - "शाहजहाँपुर में भी हमारा एक एजेन्ट ठीक ऐसे ही सांस की नाली बंद होने से चल दिया था."

किसी सफ़र में निकलना होता तो पनामा सिगरेट के डिब्बों की एक बड़ी पेटी जिसे टुकड़ा कहा जाता था, उनके बैग में सबसे पहले सैट होती थी और ऐसा ही एक टुकड़ा इकतालीस नंबर बीड़ी का भी. कपड़े-मंजन-साबुन का नंबर उसके बाद आता. बीड़ी और सिगरेट पीने को लेकर उनके जैसा उत्साह मैंने आज तक किसी नश्वर मानव में नहीं देखा. दिसंबर की एक सर्द दोपहर अपनी मौत से पहले तक उन्होंने उस दिन भी एक दर्ज़न पनामा के अलावा इकतालीस नंबर बीड़ी का एक पूरा पैकेट निबटाया था. उसी साल अगस्त में उन्होंने अपना तिरानावेवां जन्मदिन मनाया था. मुझ समेत मेरे अपने खानदान के तकरीबन दस चचेरे-ममेरे भाइयों ने सिगरेट की लत उन्हीं के धूम्र-भण्डार में डाका डाल कर हासिल की थी.

नानाजी शानदार थे - लंबा कद, सीधी रीढ़ और दया से भरपूर मुलायम, उष्माभरी हथेलियाँ. उनके पास गिने-चुने किस्से थे और वे उन्हीं को घुमा-फिरा कर हमें दस-दस हज़ार बार हमें सुना चुके थे - पीलीभीत में उनकी ब्रांच में 31 मार्च की एनुअल क्लोजिंग की रात को पड़ी डकैती, आगरा में पुलिस कप्तान के साथ ताजमहल की पैमाइश, 1930 के नैनीताल में रात-रात चलने वाले फिल्म शोज़, बड़ौदा में मुसलमान हलवाई के गोदाम में बिताई एक सर्द रात, बरेली में दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ फोटो खिंचाना, और उनका इकलौता अँगरेज़ दोस्त एरिक विल्सन लम्बू. वे इन किस्सों को बार-बार सुनाते और हम उन्हें सुना करते क्योंकि वे शानदार थे - उनके पास लेमनचूस और विलायती मिठाई का अजस्र भण्डार रहा करता और एक-एक दो-दो रुपये की अनगिनत गड्डियां भी जिनमें से निकाल-निकाल कर वे हमें हमारे माँ-बाप की निगाह चुरा कर एक्स्ट्रा पॉकेट मनी दिया करते थे. उनके बेपरवाह व्यवहार में कुछ ऐसा अपनापन और अनौपचारिकता हुआ करती कि हम आठ-नौ बरस के बच्चों को भी वे अपनी उम्र के लगा करते थे और हम पच्चीस-तीस के हुए तो भी वैसे ही. संक्षेप में वे एक लौंडे टाइप के दुर्लभ बुड्ढे थे.

उनकी एक ख़ूबी और थी. अखबार या मैगजीन में किसी भी फ़िल्मी हीरोइन का फोटो छपा दीखता या टीवी पर आ रही फिल्म में कोई भी हीरोइन डांस कर रही होती तो वे झट से कहते - "ये मधुबाला है ना!" और बरेली में दिलीप कुमार और मधुबाला के आने का किस्सा सुनाते.

मैं तीस-बत्तीस का रहा होऊँगा जब मैंने पहली बार उनके साथ शराब पी. बावजूद इस के कि दस-बारह बरस पहले वे खुद हमारे पड़ोस में स्थाई रूप से शिफ्ट हो गए थे, उन्हें हमारे घर रहना अच्छा लगता था. माँ-पिताजी से उनका विशेष स्नेह था. तब वे अस्सी के रहे होंगे. कुछ ऐसा संयोग बना कि घर पर बस हम दोनों ही थे. उन्होंने शाम को मुझसे उसी अनौपचारिकता से पूछकर तस्दीक भर की कि मैं पीता हूँ या नहीं. बस. और कोई अभिभावकनुमा ड्रामा नहीं किया. उनकी कैपेसिटी अच्छी खासी थी. रात का खाना उन्होंने बरसों पहले छोड़ दिया था. धुंआं ही उनकी खुराक था. धुंआं ही उनकी जीवनदायिनी ऑक्सीजन थी. हमने पूरी बोतल निबटाई और उत्साहपूर्वक दुनिया भर की गप्पें मारते रहे. उनका एनर्जी लेवल देखने लायक था जबकि मैं अद्धे के बराबर रम ठूंस चुके होने के कारण भुसकैट हो चुका था.

इसी दौरान टीवी पर 'तेज़ाब' आना शुरू हुई. माधुरी दीक्षित को देखते ही वे बोले - "ये मधुबाला है ना!" मैं कुछ कहता उसके पहले ही वे बोल पड़े - "एक बार बरेली आई थी ये दिलीप कुमार के साथ!" फिर दस हज़ार एकवीं दफा बरेली का किस्सा जिसमें उनके असिस्टेंट ब्रांच मैनेजर ने उस होटल के मैनेजर को फ्री का बीमा कराने का लालच देकर पटा लिया था जहाँ दिलीप कुमार और मधुबाला ठहरे हुए थे.

ग्यारह बजे के आसपास मैं सोने को जाने लगा तो वे बोले - "नाती, हमारे ज़माने में अंग्रेज़ी पिक्चरों की एक हीरोइन हुआ करती थी ... अहा ... क्या गज़ब की हीरोइन थी ... बस उसी की पिक्चरें देखते थे हम ... क्या गज़ब की एक्टिंग करती थी और वैसा ही डांस भी. और अंग्रेज़ी पिक्चर की आदत जो है वो हमको डलवाई उसी एरिक विल्सन लम्बू ने."

मधुबाला के बाद मुझे यह दिलचस्प विषयांतर लगा. नींद आ रही थी लेकिन मैं कुछ देर उन्हीं के पास ठहरा रहा. नानाजी ने एरिक विल्सन लम्बू के हवाले से आधे-पौन घंटे तक उस हीरोइन की खूबसूरती और लोकप्रियता के किस्से बताना शुरू किया. मैंने उनसे हीरोइन का नाम पूछा तो वे कुछ देर सोचने के बाद बोले - "याद नहीं आ रहा है नाती! कल बताऊंगा."

अगली सुबह मैंने उन्हें कम्प्यूटर पर जोन फॉन्टेन से लेकर रीटा हेवर्थ और लाना टर्नर से लेकर एवा गार्डनर तक के तमाम फ़ोटोग्राफ़ दिखाए लेकिन उन्हें उस अँगरेज़ हीरोइन का नाम याद नहीं आया.

इत्तफाक से टीवी पर उसी दिन डस्टिन हॉफमैन और मैरिल स्ट्रीप की 'क्रैमर वर्सेज़ क्रैमर' आ रही थी. मैरिल स्ट्रीप को देखते ही वे बोले - "ये वही हीरोइन है!"

"नानाजी मैरिल स्ट्रीप है ये!"

"अरे नहीं नाती, उसका नाम ये नहीं था! ये वो नहीं है." नानाजी फिर से हीरोइन का नाम याद करने लगे.

अगले दस सालों में नानाजी के साथ करीब सौ बार ऐसा घटा कि टीवी पर हिन्दी फिल्म चल रही होती थी और हीरोइन के आते ही वे कह पड़ते - "ये मधुबाला है ना नाती!" जूही चावला से लेकर शबाना आजमी और करिश्मा कपूर से लेकर जयाप्रदा को उन्होंने मधुबाला ही बताया. ऐसे मौकों पर हम ने प्रतिवाद करना बंद कर दिया था. अलबत्ता इसी तरह अंग्रेज़ी फिल्म देखते हुए जब उन्होंने एंजेलिना जोली को अपनी वही वाली प्रिय हीरोइन बताया और सांड्रा बुलक को भी तो मैं उनके नाम उन्हें बता दिया करता. वे जैसे अपने आप से कहते - "उसका नाम कुछ और था नाती!" इसके बाद उन्हें अपनी प्रिय अँगरेज़ हीरोइन की याद आती और वे असहाय होकर मुझसे कहते - "नाम याद नहीं आ रहा यार नाती! ... क्या हीरोइन थी ... क्या डांस करती थी ... क्या एक्टिंग करती थी ..." और नाम याद करने की कोशिशों में जुट जाते.

मेरे लिए दस सालों से यह नाम एक गुत्थी बन चुका था और मुझे यह यकीन करने का मन होता था कि नानाजी की याददाश्त काफी बिगड़ चुकी है और यह भी कि अपने जीवनकाल में वे अपनी प्रिय अँगरेज़ हीरोइन का नाम शायद न बता सकें.

वे नब्बे के आसपास के हो रहे थे. हमारे पड़ोस में एक ग़मी हो गई थी. तेरहवीं के दिन मैं उन्हें अपने साथ उस घर में ले गया. संपन्न घर था. नए ज़माने के ठाठ के हिसाब से तेरहवीं के दिन भी लंच का माहौल बनाया गया था - पंडाल, हलवाई वगैरह और पीने को मिनरल वाटर की छोटी-छोटी बोतलें. नानाजी को एक कुर्सी पर स्थापित कर मैं उनके लिए थाली लगाने चला गया. मैं दूर से देख रहा था. कोई उन्हें पानी की बोतल थमा चुका था. वे आदतन अपने मोटे चश्मे से बोतल को गौर से देख रहे थे. फिर मैं कुछ देर एक परिचित से दुआ-सलाम में लग गया. थाली लगा ही रहा था कि पीछे से एक हाथ कंधे पर महसूस हुआ. पलट कर देखा. नानाजी थे.

"नाती वो जो अँगरेज़ हीरोइन थी ना ..." मुझे तुरंत शर्मभरी झेंप महसूस हुई कि एक तरफ तो पूड़ियाँ और पनीर भकोसते लोगों से अटा तेरहवीं की ग़मी का भीड़भरा पंडाल और दूसरी तरफ अपने पोते से अँगरेज़ हीरोइन की बात कर रहा नब्बे बरस का बूढ़ा. आसपास खड़ी दर्ज़न भर निगाहों ने हमें हल्की मुस्कान के साथ देखना शुरू कर दिया था.

मैं थाली लगाना छोड़ उनकी बात काटता हुआ बोला - "आप वहीं बैठो न नानाजी! मैं ला रहा हूँ आपका खाना ..."

"अरे नाती उसका नाम मिल गया. उस अँगरेज़ हीरोइन का ..."

मैं हैरत और झेंप में खड़ा समझने की कोशिश कर रहा था कि नब्बे साल का यह खब्ती गपोड़ बूढ़ा तेरहवीं के समय किये जाने वाले औपचारिक व्यवहार से इस कदर बेपरवाह कैसे हो सकता है.


मेरी मनःस्थिति से बिलकुल बेज़ार अचानक मुदित हो आये नानाजी ने बोतल पर लिखे लेबल पर उंगली धरते हुए कहा - "हद हो गयी यार ... मैं उसका नाम भूल कैसे गया होऊँगा. नाती, उस हीरोइन का जो है नाम था ... मिनरल मारले ..."

Wednesday, January 10, 2018

विस्की समजता टुम मिस्टर नरेन?


नारायणराम मास्साब की फसक

नारायणराम मास्साब के बारे में समूचे रानीखेत और आसपास के इलाकों में विख्यात था कि वे नब्बे की उमर में भी दिन भर में एक थ्री-पीस काट और सिल लेते थे. वे अंग्रेजों के ज़माने के टेलर थे और १९४७ से पहले रानीखेत छावनी के बड़े और गोरे अफसरों की वर्दियां और सूट सिया करते थे. ज़ाहिर है उनका बड़ा नक्शा था और वे वैसी ही सिलाई वसूला करते थे. मरने के दिन तक बेहद नफीस और एलीटिस्ट लेकिन जनप्रिय बने रहे इस उस्ताद को लेकर एक फसक अर्थात गप्प बहुत चलती है.

नारायणराम जब बारह-तेरह साल के हुए तो रोटी-पानी की तलाश में अपने गाँव से निकट की सबसे बड़ी बसासत अर्थात गरमपानी नामक एक छोटी सी जगह जाकर वहां के इकलौते बूढ़े दर्जी दीवानीराम के यहाँ बतौर अप्रेन्टिस भर्ती हो गए. सहस्त्राब्दियों से मानवजाति को झौयेन-झुलसैण रायता और जम्बू के छौंक वाले चटपटे आलू के गुटके परोसने वाली धुंआई गुमटियों के तीर्थसदृश महात्म्य के लिए द्वापर-त्रेता युग के समय से ही विख्यात रहा गरमपानी रानीखेत से कोई तीसेक किलोमीटर दूर है.

जन्मजात प्रतिभा के धनी बालक नारायण ने तीनेक महीने के भीतर अपने उस्ताद को पीछे छोड़ दिया जिसके फलस्वरूप उसकी ख्याति तमाम गाँवों में फैल गयी. इससे दीवानीराम की दुकान की आमदनी बहुत कम समय में कई गुना बढ़ गयी.

वह उदारता का ज़माना था. श्रेष्ठता और प्रतिभा को पहचाने जाने और उसे समुचित सम्मान दिए जाने का रिवाज़ था. ज्यादा समय नहीं बीता जब निस्संतान और विधुर दीवानीराम मास्साब ने अपनी दुकान नारायण के नाम कर उसे अपने घर में दत्तक पुत्र की हैसियत से रहने की जगह भी दे दी और खुद को स्वैच्छिक सेवानिवृत्त कर लिया. साल भर बाद दीवानीराम ने जीवन से संतुष्ट होकर संसार का त्याग किया और बालक नारायण को चौदह साल की आयु में मास्साब का खिताब अता हुआ. यह किसी प्रतिभावान शास्त्रीय गायक द्वारा छोटी सी आयु में उस्ताद फलां अली खान साहब जैसी पदवी पा लिए जाने जैसा कारनामा था.

नारायणराम पाजामों और पेटीकोटों पर ऐसी महीन तुरपाई करता कि मैग्नीफ़ाइंग ग्लास लेकर भी उसे देखा नहीं जा सकता था. कैंची उसके हाथ में आते ही कपड़े पर ऐसे चलना शुरू कर देती जैसे रामलीला के समय हारमोनियम पर तारादत पन्त उर्फ़ तारी मास्साब की उँगलियाँ. नारायणराम के हाथ के कटे कपड़ों की धज ऐसी होती कि पहनने वाले को लगता जैसे समूचे ब्रह्माण्ड में वह वस्त्र उसी के वास्ते सृजित किया गया हो. कालान्तर में पाजामे, फतुही और वास्कट की तमाम नई-नई डिजाइनें उनके रचनाशील मस्तिष्क ने ईजाद कीं. कहने का अभिप्राय यह है कि बहुत कम समय में नारायणराम इलाके के गुचियो गुच्ची और जॉर्जीयो अरमानी बन गए. भुजान-उपराड़ी से लेकर मजखाली- डीकोटी तक के लोग भी उनके पास आने लगे और लोधिया-क्वारब से लेकर मौना-ल्वेशाल तक के भी. नारायण हाथ में लिए गए काम को इतनी तेज़ी से अंजाम देता था कि रानीखेत तक में यह मशहूर हो गया कि गरमपानी का एक लौंडा टेलर दिन भर में सौ पाजामे तक सिल लेता है.

स्थानीय लोगों के रिश्तेदार गरमपानी आते तो मेजबानों के इसरार पर नारायणराम से एक न एक कपड़ा ज़रूर सिलवा कर ले जाते और वर्षों बाद कहते पाए जाते – “गरमपानी के नारायण मास्साब का सिला हुआ ठैरा. इस जिन्दगी में तो फटने से रहा!

फिलहाल रानीखेत में अंग्रेजों की फ़ौज की रेजीमेंट हुआ करती थी. एक रात अँगरेज़ अफसरों से भरा एक ट्रक गरमपानी के पास खराब हो गया. उन्होंने वहीं टेंट लगाकर रात बिताई और सुबह नाश्ते के बाद रानीखेत को रवाना हुए. खैरना का पुल पार करते ही उनका ट्रक गहरी खाई में गिरा और सारे अफसरों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई. सिर्फ एक युवा अफसर किसी तरह बच सका. स्थानीय लोगों के सहयोग से जैसे-तैसे इस इकलौते अफसर ने रानीखेत पहुंचकर अपने सीनियर अफसरों को पूरे वाकये से अवगत कराया.

उसी शाम को रेजीमेंट के सबसे बड़े अफसर यानी ब्रिगेडियर हैनरी, जिसका नाम स्थानीय किस्सों में अब भी लाड़ से हैनरू लाटा के रूप में आता है, को अपने दो हिन्दुस्तानी अर्दलियों के साथ गरमपानी में नारायणराम को खोजते देखा गया. जब वे नारायणराम के पास पहुंचे तो कुल सत्तरह साल के इस खलीफा टेलर मास्टर को देखकर एकबारगी तो हैनरू लाटे को यकीन नहीं हुआ कि वही नारायणराम है. लेकिन स्थानीय प्रधान और असंख्य प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा तस्दीक किये जाने के बाद उसने सबसे पहले तो नारायणराम को एक अपॉइंटमेंट लेटर थमाया जिसका आशय यह था की नारायणराम को सीधे सूबेदार की ऑनरेरी पोस्ट देकर रेजीमेंट का टेलर-इन-चीफ बना दिया गया है - चार सौ रुपये की पगार पर. उन दिनों नारायणराम की महीने भर की कमाई बारह से पंद्रह रूपये की होती थी. हैनरू ने दूसरा काम यह किया कि नारायणराम से अपना सामान बाँध कर एक घंटे के भीतर अपनी जीप में आने को कहा.

नारायणराम ने हाथ जोड़कर अंग्रेज़ साहब विनती करते हुए कहा कि उसे डेढ़ घंटे का समय दिया जाए क्योंकि वह अपने सारे पेंडिंग टेलरिंग प्रोजेक्ट्स को निबटाना चाहेगा. साहब को कोई ऐतराज़ न हुआ. बोले – “टुमको दो गन्टा डीया जाओ नरेन बट अबी का अबी अमको टुमको लेके साबबाडुर के पास अल्मोरा ले के जाने का ऐ.

नारायणराम ने हैनरू लाटे के सामने ही पौन घंटे में बिलकुल शुरू से शुरू कर दो वास्कटें तैयार कीं और सवा घंटे के भीतर वह अपने सामान समेत हैनरू पधान की जीप के सामने खड़ा हो गया. ऐसी उस्तादी देख ब्रिगेडियर हैनरी सत्रह साल के इस लौंडे का कायल हो गया था और उसी शाम से भुच्च गंवार पहाड़ियों के प्रति उसका रवैया सदा के लिए बदल गया. अर्दली नारायण के सामान को जीप के पीछे लगी ट्राली में डाल चुकने के बाद उससे ट्राली में ही बैठने को कह रहे थे जब हैनरू पधान ने उन्हें लताड़ते हुए कहा – “टुम डोनो रास्कल साला बेटो उदर ट्राली मे. और नरेन टुम इडर बेटो अमारा संग में पीचू का सीट पे.

तो साहब पांच सौ दर्शक मुंह खोले खड़े थे और गरमपानी-गौरव को एक खुर्राट अँगरेज़ साहब की बगल में बैठता देख रहे थे. यह अकल्पनीय था. वे कुछ भी रिएक्ट कर पाते उसके पहले ही धूल उड़ाती जीप चल दी.

खैरना पुल के पास पहुँचते ही हैनरू पधान ने नारायण से पूछा – “अबी बताओ नरेन. टुम क्या किया अमारे ऑफीसर के साथ ... ओ केटा ऐ के इडर गरमपानी में टुमने उसका जान बचाया ...

नारायण को याद आया. उस सुबह लौंडा जैसा दिखने वाला एक अँगरेज़ सिपाही उसकी दुकान में आया था जिसकी कमीज़ का एक काज बिगड़ गया था. उसने बिना पैसे लिए उसके काज को पांच मिनट में दुरुस्त कर दिया था.

उसने अँगरेज़ बहादुर को किस्सा बयान कर दिया.


टबी तो ... " हैनरू लाटे ने नारायण का हाथ थामते हुए भावुक स्वर में कहना शुरू किया - "तुमने उसका बटन का ऐसा काज लगाया नरेन की जबी अमारा औफीसर्स का गाड़ी पलटा और सब खाई में गिर रा था टो जो विलियम ठा अमारा औफीसर. टो उसका बटन खुल गया और उसका काज एक पेड़ का फंगी से मटलब टहनी में जा करके उडर में फंस गया. बाकी सारा औफीसर लोग तो उपर चला गया ऑलमाईटी का पास में और ओ जो विलियम जो ऐ ना ओ अबी मेस में मटन का बोटी खाता और विस्की पीटा ... विस्की समजता टुम मिस्टर नरेन? ...”

Monday, July 24, 2017

कुकाट पाण्डे जी और अ थिंग ऑफ़ ब्यूटी


वे बूढ़े, खब्ती और चाटू थे और  हमारे मोहल्ले में स्थाई रूप से बसने की मंशा रखते थे. इस प्रयोजन से उन्होंने हमारी गली के एक खाली मकान को किराए पर ले रखा था. दो गली छोड़कर उनका एक प्लाट था जिस पर उन्होंने मकान बनाना था. मेरे मोहल्ले में बसने की आवश्यक अर्हता भी उनके पास थी यानी वे एक अवकाशप्राप्त अफसर भी थे. बीस साल की क्लर्की और बीस ही साल की छोटी-मोटी अफसरी करने के बाद जब वे बकौल उनके "हुड्ड प्लेन्स वालों के नगर" रायबरेली से रिटायर हुए तो मध्यवर्गीय पहाड़ी समुदाय द्वारा स्थापित की गयी नई परंपरा के प्रति सम्मान और अपनी संतति के प्रति कर्तव्यनिष्ठता दिखाते हुए उन्होंने हल्द्वानी का रुख किया था. "दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ" वाली मिर्ज़ा ग़ालिब की हिदायत को गाँठ बांधकर उन्होंने बेहद ईमानदारी से नौकरी की थी अर्थात रिश्वत का एक भी पैसा नहीं कमाया था. अपने इस गुण के चलते उन्हें अक्सर अपने दोनों बेरोज़गार बेटों के कोप का भाजन बनना पड़ता था कि पापा ने कुछ नहीं किया. बेटों के अनुराग के इस अतिरेक के चलते उनके बीच में स्थाई अबोला था. 

अंग्रेजों के ज़माने में उन्होंने बीए कर रखा था. अंग्रेज़ी में एमए सेकेण्ड ईयर कर रहे थे कि उनकी नौकरी लग गयी. किराए के घर में प्रवेश करते ही रसोई तक जमाये जाने से पहले उनके नाम की तख्ती घर के बाहर ठोकी गयी - "पं. धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस." इस तख्ती का ऐसा प्रताप रहा कि मोहल्ले में पहले से बसे दो-एक दर्ज़न उन्हीं जैसे अवकाशप्राप्त अफसरों  ने उन्हें तुरंत स्वीकार कर लिए जाने लायक मान लिया. घर आये मेहमानों को वे अक्सर आगरा, बिजनौर, नागथाट, बलिया, कानपुर और प्रतापगढ़ के अपने दफ्तरों के देसी सहकर्मियों के किस्से सुनाया करते थे. किस्से खासे दिलचस्प होते थे लेकिन उनकी बारम्बारता और उबाऊ विवरणों ने उन्हें मोहल्ले में ऐसी कीर्ति प्रदान की की महीने भर के बाद लोगों ने उनके घर की तरफ निकलना बंद कर दिया. इसी दरम्यान उन्हें कुकाट पाण्डे की उपाधि से भी सुशोभित किया जा चुका था.

उनका छोटा बेटा मनोज मेरा हमउम्र था और उससे नज़दीकी बनने में ज़्यादा देर नहीं लगी. नतीजतन मेरा उसके घर में आना-जाना शुरू हो गया. मनोज बीटेक की पढ़ाई बीच में छोड़ आया था और फिलहाल कुछ नहीं करता था. खूब लम्बी, घनी और अस्तव्यस्त रहने वाली दाढ़ी का स्वामी उनका बड़ा बेटा नीरज खैनी और हस्तमैथुन की मदद से सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा था. उसके गद्दे के नीचे खैनी की बेशुमार खाई-अधखाई पुड़ियों और 'डेबोनेयर' सरीखी मैग्जीनों लाजवाब संग्रह रहता था. मैंने खुद एमए अंग्रेज़ी में दाखिला ले रखा था और यही तथ्य इन लड़कों के पिता अर्थात बाप से मेरे पहले संवाद का सबब बना. 

मनोज के पिता अर्थात पंडित धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस उर्फ़ कुकाट पाण्डे से मेरा पहला सामना उन्हीं के घर में हुआ जब मैं नीरज के गद्दे के नीचे से चोरी की गयी डेबोनेयर की एक प्रति को कमीज़ के नीचे पेट में अड़ा कर बरामदे से बाहर निकल रहा था. 

"संजुवा अपनी माँ को बता रहा था कि एमए इंग्लिश करते हो तुम सुना ..." उनके सवालिया स्वर में थोड़ी सी हिकारत भी सुनाई पड़ी कि बेटा तुम क्या खा के करोगे अंग्रेज़ी में एमए.

"जी अंकल" मुझे घबराहट हुई कि कहीं पेट में अड़ाई गयी मैगजीन खेल खराब न कर दे. मैंने सांस खींच कर पेट भीतर किया और बाहर निकलने को हुआ.

"बैठो दो मिनट ... जल्दी काहे की है! फ़र्स्ट ईयर तो मैंने भी किया था सन पैंतालीस में फिर जो है नौकरी लग गयी ..." उन्होंने सामने धरी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

मुझे बैठना पड़ा.

"कीट्स पढ़ लिया?"

"जी"

"बायरन?"

"जी वो कोर्स में नहीं है."

"कोर्स में नहीं है तो क्या ... बायरन के बिना कैसे एमए कर लोगे यार ... हैं? ... शैली पढ़ लिया?"

"जी अभी शुरू नहीं किया ..."

"अच्छा ..." कहकर उन्होंने एक लम्बी डकार ली और मटमैली हो चुकी बंडी से बमुश्किल ढँक पा रहे अपने स्थूल उदर पर हाथ फेरा और एक कुटिल निगाह मुझ पर डाली. मैंने गौर किया उनकी नाक पर एक बड़ा सा फोड़ेनुमा मस्सा था जिसकी ऊर्ध्वाधर बैलेंसिंग करने के लिए वे दक्षिण भारतीय शैली का रोली-चन्दन वाला टीका लगाया करते थे. "कीट्स के बारे में क्या जानते हो? ... कोर्स में क्या-क्या है?"

मैंने एकाध कविताओं के टाइटल बता दिए.

"हूँ ..." कुछ देर चुप रहकर उन्होंने कहना शुरू किया "ये जो कीट्स था ना बिचारा गज़ब जीनियस था. वैसे ही जीनियस हुए ठहरे बायरन और शैली भी. तो ... जीनियसों को जो है भगवान जल्दी अपने पास बुला लेता है. तीनों बिचारों को भी बुला लिया. बीस-बीस-पच्चीस-पच्चीस साल में मर गए हुए तीनों ..." उन्होंने लम्बी सांस भर कर छत की तरफ निगाह डाली और बोले "ज़रा सोचो कीट्स, बायरन और शैली सत्तर-अस्सी साल तक जिन्दे रहते तो कितनी किताबें लिख गए होते ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! ..." वे अपने आप में खो गए लगते थे "... क्या बात है साली ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! ... आहा! ..." उनका एकालाप अंततः उनके सन पैंतालीस में अंग्रेज़ी में फ़र्स्ट ईयर कर चुके होने पर निबटा.

मैं उनके अंग्रेज़ी ज्ञान से प्रभावित और आतंकित होकर बाहर निकला. मुझे लगा मनोज और नीरज बेवजह अपने पिताजी से इतना चिढ़े रहते हैं. उनसे दूसरी मुलाक़ात अगले ही दिन हुई. मनोज के मामा भी रिटायर होकर पिछले साल हल्द्वानी आकर बस गए थे और उनके घर आए हुए थे. जब मैं मनोज के साथ उसके कमरे की तरफ बढ़ रहा था तो अंकल ने मुझे रोक लिया और वहीं बिठाकर मेरा परिचय कराने लगे "आगे वो पंडिज्जी नहीं रहते? उन्हीं का लड़का है ये ... नैनीताल से एमए कर रहा है अंग्रेजी में ..."

उनकी बातों का बाधित सिलसिला शुरू हुआ तो पता चला कि हल्द्वानी के कूड़ा-प्रबंधन पर बहस चल रही थी. पंद्रह मिनट तक मामाजी ने अपने मोहल्ले की बेकाबू बढ़ती आबादी, उसके कूड़ा-निस्तारण की समस्या और नगरपालिका की अकर्मण्यता पर विचार व्यक्त किये. मैंने भी एकाध दफ़ा हाँ-हूँ की.

"हूँ ... क्या होता है कूड़ा? हैं? ... क्या होता है कूड़ा? बताओ!" कुकाट अंकल ने वार्तालाप में निर्णायक तरीके से कूदते हुए कहना शुरू किया - "साला सब कुछ कूड़ा कर दिया है इस गवर्मेंट ने ... अरे एजूकेशन को ले लो ... वहां नहीं है कूड़ा ... बिचारे कीट्स, शैली, बायरन मर गए बीस-बीस-पच्चीस-पच्चीस साल की उमर में तब तो इंग्लैण्ड जैसे देश तक में इतना कूड़ा लिख गए लोग ... सोचो अगर सत्तर-अस्सी साल तक जिन्दे रहते बिचारे तो ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! "

इस निपट बेसिरपैर के तर्क और रिपीट कीट्स, शैली, बायरन ने मुझे सन पैंतालीस में एम ए फ़र्स्ट ईयर इंग्लिश कर चुके मनोज के बाप को लेकर अपने विचार बदलने को विवश किया. जैसे-तैसे बचकर भागा.

उसके बाद वे जहां भी मुझे देख लेते अपने पास बुला लेते. इंदिरा गांधी के मर्डर से हल्द्वानी में बरसातों में फैलने वाली पेचिश और कहाँ की जलेबी बेहतर होती है से विव रिचर्ड्स के कवर ड्राइव तक किसी भी विषय से तक पहुंचता हुआ आवारा वार्तालाप अंततः कीट्स, शैली और बायरन की अकाल मौतों के ज़िक्र से होता हुआ उनकी उसी कल्पना पर ठहरता कि इन जीनियस कवियों के सत्तर-अस्सी साल जी चुकने की स्थिति में दुनिया कैसी होती.

महीने-डेढ़ महीने के बाद इस चाट-कार्यक्रम से बचने का इकलौता उपाय मेरे पास यह बचा था कि या तो मैं उनके सामने पडूं ही नहीं और बदकिस्मती से ऐसा हो जाय तो उनके आगे हां-हूँ से आगे न बढूँ. लेकिन वे चाट के महासागर थे और किसी न किसी विषय के बहाने से कीट्स, शैली, बायरन और एम ए फ़र्स्ट ईयर इंग्लिश पर आकर थमते.

उनके अंग्रेज़ी ज्ञान से प्रभावित होकर एक दिन पड़ोस के एक सज्जन अपनी हाईस्कूल में पढ़ने वाली बेटी को लेकर उनके पास पहुंचे कि पाण्डे जी बच्ची इंग्लिश में कमज़ोर है, कभी पढ़ा दीजिएगा बिचारी को. उन्होंने ट्यूशन से होने वाली हानियों को लेकर इस पड़ोसी को लंबा लेक्चर दिया और बताया कि कीट्स, शैली, बायरन ने कभी ट्यूशन नहीं पढ़ा और अमर हो गए. पड़ोसी के जाते ही वे अपनी पत्नी से मुखातिब होकर बोले - "देख रही हो साले ठाकुरों के बच्चे भी कीट्स, शैली, बायरन पढ़ने के सपने देखने लग गए अब! ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा!"

पंडित धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस का अपना अस्तित्व इन तीन युवा अँगरेज़ कवियों के जल्दी मर जाने से ऐसा ओतप्रोत था कि उनके घर में अक्सर घटने वाले के हर अनिष्ट के लिए इन्हीं को ज़िम्मेदार माना जा सकता था.

मोहल्ले में आये छः माह बीतने के बाद भी उनके घर का निर्माण शुरू ही नहीं हो पा रहा था क्योंकि जब-जब नक़्शे की बात चलती कुकाट अंकल कहते - "अरे इस साली सभ्यता ने दीवारें बहुत बना दी हैं. मेरा घर जो है ऐसा होगा कि उसमें बस एक बड़ा हॉल बनाया जाएगा और कुछ नहीं. सोने के लिए इसी हॉल में सबके अपने-अपने हिस्से होंगे, अपनी-अपनी खाट होगी और बाकी टाइम सब लोग खुशी-ग़मी एक साथ करेंगे. अरे बातचीत भी कोई चीज होती है ... है कि नहीं! ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! ..." इधर वे घर आये किसी अभागे मेहमान को अपना घर-दर्शन चटा रहे होते उधर इन बातों को हज़ारवीं  दफा सुन रही पत्नी रसोई में बर्तनों को और नीरज अपने कमरे की किताबों को फर्श पर पटकना शुरू कर देते. अंततः कीट्स, शैली, बायरन और एम ए फ़र्स्ट ईयर इंग्लिश जैसे विषयों पर पीएचडी कर चुकने के बाद ही दुबारा उस घर की तरफ फूटी आँख न करने का संकल्प लिए पड़ोसी अपने घर वापस लौट पाता था.

मनोज को बंगलौर में नौकरी मिल गयी तो वह चला गया. मैंने भी ज़्यादातर समय हल्द्वानी के बाहर बिताना शुरू कर दिया. स्मृति के कोनों में गहरे धंसे बैठे धरणीधर पाण्डे कुछ दिन भयाक्रांत करते रहे फिर अदृश्य हो गए. बाद में पता चला वे हमारी गली छोड़ कर अपने प्लाट वाली गली के किसी खाली मकान में चले गए थे. सुनकर जान बची सो लाखों पाए टाइप की फीलिंग आई.

बीस-पच्चीस साल तक उनकी कोई खबर नहीं थी. तीन साल पहले मनोज हल्द्वानी में टकरा गया. उसने बताया कुछ साल पहले उसके पिताजी गुज़र गए और माँ पिछली बरसातों में भगवान की प्यारी हुईं.  नीरज ने दिल्ली में एक एक्सपोर्ट हाउस में नौकरी कर ली थी और खुद मनोज अमेरिका सेटल हो गया था. पिताजी का ज़िक्र चलने पर वह थोड़ा सा उदास हुआ लेकिन उसकी उदासी में मौजूद गहरी खीझ की तलछट का अहसास हो जाता था. उसने आगे बताया कि वह पिताजी द्वारा बनाए गए मकान का सौदा तय करने की नीयत से हल्द्वानी आया है और हफ्ते भर में अमेरिका लौट जाएगा. मैंने घर की बाबत उन दिनों होने वाले वाद-विवादों को याद करते हुए उस से थोड़ी मसखरी करने की कोशिश की तो फटते हुए उसने कहा - "बाप थे तो हमारे बड़े खूसट यार ... चल तुझे दिखा के लाता हूँ उनका ताजमहल."

वर्षों से खाली पड़े दिख रहे घर के गेट के बाहर वही पुरानी तख्ती लगी थी. घर का प्रवेशद्वार किसी गैरेज के गेट जैसा चौड़ा और ऊंचा था. दरवाज़ा खोला गया तो पंडित धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस के सपनों का घर सामने था - बिल्कुल जैसा वे चाहते थे वैसा. एक विशाल हॉल था जिसकी दीवारों पर तमाम खूँटियाँ ठुकी हुई थीं. ताले लगे चार बड़े-बड़े संदूक थे जिनमें घर का सामान भरा हुआ था. दीवारों से लगाकर चार तखत खड़े  किये गए थे. एक कोना देख कर मुझे दिलचस्पी हुई. वह मंदिर था और उसे ज़रा भी डिस्टर्ब नहीं किया गया था.

मैं मंदिर के विवरणों को देखने झुका तो मनोज कह रहा था - "एक सरदार से बात फाइनल हो गयी है. अपना गोदाम बनाने वाला है वो यहाँ ... हत्या कटेगी साली!"

मंदिर में प्रतिष्ठित देवी-देवताओं के असंख्य कैलेंडरों, चित्रों, सस्ती मूर्तियों, पूजा-पाठ के सामान के बीच एक तरफ धूल से ढंके फ्रेम में अक्षत-पिठ्या लगे हुए कुकाट पाण्डे जी की फोटो लगी थी. दूसरी तरफ तीन ऐसे ही अक्षत-पिठ्या लगे हुए फ्रेम और थे जिनमें कीट्स, शैली और बायरन प्रतिष्ठित थे. 

Saturday, July 15, 2017

बिड़ला वाले बिष्टजी और गेठिया के भूत


बिड़ला वाले बिष्टजी और गेठिया के भूत

बिष्ट गुरु जी नैनीताल के मेरे मशहूर रेजीडेंशियल स्कूल में हॉबी के पीरियड्स के दौरान बच्चों को अपनी वर्कशॉप में मैटलवर्क सिखाया करते थे. क्लासरूम में प्रायः किसी अध्यापक के छुट्टी में गए होने पर उनकी अरेंजमेंट में ड्यूटी लगा करती. अरेंजमेंट की इन कक्षाओं में वे देश के विभिन्न हिस्से से आए विद्यार्थियों के साथ फसक अर्थात गप मारने की अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का रियाज़ किया करते थे.

अक्सर पिछले इतवार को उनके शिकार पर जाने और दो या तीन शेरों को मारने के उनके किस्सों की ख़ूबी यह होती थी कि कथ्य में समान होने के बावजूद वे हर बार नए लगते थे. अमूमन नैनीताल के समीप स्थित किलबरी, आलूखेत, पंगूट, रातीघाट और भवाली के जंगलों में इन चमत्कारिक कारनामों को अंजाम दिया जाता था. कभी-कभार उनकी फसक का दायरा नागालैंड, मणिपुर और बंगलादेश-वियतनाम और मलेशिया तक पहुंचा करता. इन किस्सों की दूसरी ख़ूबी यह होती थी कि इन शिकार-यात्राओं में उनके साथ एक पार्टनर ज़रूर होता था. गुरुजी को दुनिया के पचड़ों से ज्यादा लेना-देना नहीं होता था सो यह पार्टनर शेरों का शिकार हो जाने के बाद खालें अपने साथ ले जाया करता था - हमेशा.

उस दिन उनकी एम.ओ.डी. अर्थात मास्टर ऑफ़ द डे वाली लम्बी ड्यूटी लग गयी थी. इसके लिए एम.ओ.डी. को सुबह के सात बजे से साढ़े दस बजे रात तक विशाल क्षेत्रफल में फैले स्कूल के चप्पे-चप्पे पर उपस्थित रहकर सुनिश्चित करना होता था कि जूनियर और सीनियर सेक्शनों के सभी लड़के नियत समय पर सभी कक्षाओं में, दिन में पांच दफ़ा डाइनिंग हॉल में, असेम्बली हॉल में, खेल के मैदान और हॉस्टलों में मौजूद हों और अच्छे बच्चों द्वारा किये जाने वाले सभी कार्य करते हुए स्कूल का डिसिप्लिन खराब न कर रहे हों. इस काम के लिए हर बच्चे की अटेंडेंस करीब ढाई हज़ार बार ली जानी होती थी.

तो उस दिन उनकी एम.ओ.डी. वाली ड्यूटी थी. गुरुजी का ससुराल नैनीताल-भवाली के नज़दीक गेठिया नामक स्थान पर था जहाँ उन दिनों उनका परिवार छुट्टी मनाने गया था. इन दिनों वे रोडवेज़ की बस पकड़ कर गेठिया आना-जाना कर रहे थे. उस रात जब साढ़े दस बजे वे ड्यूटी निबटा कर फारिग हुए तो उन्हें बहुत थकान का अनुभव हुआ. एम. ओ. डी. के रात के ठहरने की व्यवस्था स्कूल कैम्पस में ही होती थी ताकि अगले दिन की सामान्य ड्यूटी के लिए हाज़िर होने में उन्हें ज़्यादा दिक्कत न आए.

पर गुरुजी को तो हर हाल में गेठिया जाना था क्योंकि उन्हें बच्चों की याद आ रही थी. सो वो स्कूल के फील्ड नम्बर एक से गेठिया जाने वाले जंगली शॉर्टकट से ससुराल की राह लग लिए. घने वनप्रांतर से गुज़रने वाले इस रास्ते पर वह समय शेर, भालू जैसे जंगली जानवरों के भ्रमण का था लेकिन डर के मारे उनके सामने कोई भी नहीं आया. आता भी कैसे? जिम कॉर्बेट के पितामह जो जंगल से गुज़र रहे ठैरे! 

घन्टे-सवा घन्टे हाँफते-थकते फूं-फ्वां करते उन्हें अंततः गेठिया के पश्चिमी ढाल पर मौजूद अपने ससुराल की बत्तियां जली हुई नज़र आ गईं . "बस दो मोड़ और यार!" - उन्होंने अपने आप से कहा और कदमों में तेज़ी लाने का प्रयास किया. अचानक क्या देखते हैं कि दूर दिख रहे पहले मोड़ के कोने पर चार भूत खड़े थे. शेर-भालू का तो खाली हाथ भी शिकार किया जा सकता था लेकिन भूतों का क्या? डर के मारे गुरुजी की हवा संट हो गयी. एक तरफ थकान के मारे उनका बदन "बिस्तर-बिस्तर नींद-नींद" कर रहा था और उधर सामने ऐसी बला! क्या करते!

काफी दे असमंजस में खड़े रहे भयाक्रांत और थकान से चूर बिष्ट गुरुजी को जब अपने बच्चों की बेतरह याद आने लगी तो वे "देखी जाएगी साले को!" कह कर आगे बढ़ने लगे. मोड़ के आते-आते उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं कि अब जो करना है भूतों ने ही करना है. लेकिन पहाड़ी रास्ते पर बहुत देर तक आँख बंद नहीं की जा सकती सो जैसे ही उन्होंने मजबूरन आँखें खोलीं तो देखा चारों भूत ठीक सामने खड़े थे.


भूतों ने गुरुजी को देखा तो बोले - "अरे ये तो बिड़ला वाले बिष्ट जी हैं. इनको जाने दो!" 

Monday, February 23, 2015

यह कितना बड़ा रूपक लगता है आपको?


यह कितना बड़ा रूपक लगेगा आपको, कह नहीं सकता. 

बहरहाल कलकत्ते की यह फ़ोटो मुझे कभी यूं ही नैट पर मिल गयी थी. 

सहेज ले रहा हूँ.