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Tuesday, June 25, 2013

आपदा, राहत और सच – मौके से इन्द्रेश मैखुरी की रिपोर्ट


झकझोर देने वाली इन्द्रेश मैखुरी की यह रपट पढ़कर आपको उत्तराखंड की आपदा के सच के कई अलग और अदेखे पर ज़रूरी आयाम नज़र आएँगे

पहाड़ में चालीस किलोमीटर का फासला कितना होता है? इतना कि आदमी अधिकतम दो घंटे में पहुँच जाए. लेकिन 23 जून को यही चालीस किलोमीटर का फासला हमारे लिए इतना हो गया कि सुबह साढ़े सात बजे से रात आठ बजे तक लगातार चलते रहने के बावजूद हम, यह दूरी तय नहीं कर सके. अंततः लगभग बारह घंटे चलने के बाद हम केवल अठाईस किलोमीटर ही पहुँच पाए, जिसमें दस किलोमीटर से अधिक हमने वाहन से तय किया. आपदा के बाद पहाड़ कितना दुर्गम हो गया है,यह उसकी बानगी भर है.

आठ-नौ दिन पहले हुई भारी बरसात के बाद बदरीनाथ का सड़क संपर्क पूरी तरह ध्वस्त हो गया है. बद्रीनाथ और रास्ते में पड़ने वाले अन्य गावों और कस्बों में भारी बरसात के बाद के हालात का जायजा लेने भाकपा (माले) की गढ़वाल कमेटी के सदस्य कामरेड अतुल सती, मैं और देहरादून से आये दो पत्रकार मित्र-अमर उजाला के सुधाकर भट्ट और अभ्युदय कोटनाला निकले. इन पत्रकार मित्रों का जज्बा काबिले तारीफ है क्यूंकि जहां बाकी सारे मीडिया वाले सरकारी हेलिकॉप्टर में उड़ कर, नदियों में आये पानी से ज्यादा एक्सक्लूसिव की बाढ़ लाने पर उतारू हैं, वहीँ इन दो पत्रकार साथियों ने दुर्गम पहाड़ी रास्ते को पैदल तय कर असली तस्वीर को जानने-समझने की कोशिश की.

जोशीमठ से लगभग पच्चीस किलोमीटर पर गोविन्दघाट है, जहां से अलकनंदा नदी पार कर सिखों के प्रसिद्द तीर्थ हेमकुंड को रास्ता जाता है. भारी बरसात के बाद गोविन्दघाट में अधिकाँश दुकाने-होटल तबाह हो चुके हैं. चूँकि गोविन्दघाट से पहले सड़क दो जगह टूटी हुई है, इसलिए दो सौ से अधिक छोटे-बड़े वाहन यहाँ फंसे हुए हैं. वाहनों की सुरक्षा को लेकर चिंतित इन वाहनों के ड्राईवर भी यहीं जमे हुए हैं. हर आने वाले से सड़क कितने दिन में बनेगी, यह वे जरूर पूछते हैं. वे कहते हैं कि यदि पुलिस उनके वाहनों की सुरक्षा की गारंटी ले तो वे वाहनों को छोड़ कर पंजाब लौटने को तैयार हैं. पर पुलिस का तो यहाँ नामो-निशान ही नहीं है. पुलिस चौकी में रेत भरी है और पुलिस नदारद है. उनमें से कुछ यह चिंता भी जाहिर करते हैं कि ये वाहन ही उनकी आजीविका का साधन हैं, तो इन्हें यहाँ छोड़ कर,पंजाब जाकर भी वो क्या करेंगे? 

गोविन्दघाट से आगे का नजारा तो और भी भयावह है. जगह-जगह नदी में समा चुकी सड़क एक ऐसे आम दृश्य है जो बदरीनाथ यात्रा के शुरू होने के चंद रोज बाद ही, प्रकृति द्वारा यात्रा सीजन के समापन के घोषणा प्रतीत होती हैं. जोशीमठ से लामबगड तक जहां भी सड़क टूटी है, वहाँ एक खड़ी चढाई,चनौती दे रही है कि मंजिल तक पहुंचना हो तो मुझे पार करके दिखाओ. गोविन्दघाट से थोड़ा ही आगे एक भयानक भूस्खलन हुआ है. नदी में पानी बढ़ा और लगभग आधा पहाड़ सड़क अपने साथ लेकर नदी में समा गया. फिर एक ऊंची और खड़ी चढाई पार करके और बची हुई सुनसान सड़क पर पैदल चल कर हम पान्डुकेश्वर पहुंचे. यात्रा सीजन में यात्रियों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाले पान्डुकेश्वर बाज़ार में सन्नाटा पसरा हुआ है.लगभग सौ से अधिक दुकानों में से केवल दो ही दुकाने ही खुली नजर आती हैं. इन्ही में से एक दुकान पर बैठा युवाओं का एक ग्रुप 16 जून और उसके बाद के तमाम वाकयात तफसील से बताता है. वे बताते हैं कि 16 जून की रात को जब नदी में तेज गडगडाहट के साथ पानी बढ़ा तो लोग अपने घरों से भाग कर सुरक्षित स्थानों को चले गए.न दी से सड़क लगभग पांच सौ मीटर की दूरी पर होगी. ये युवा बताते हैं कि उस रात पानी में इतना वेग था कि सड़क भी इस तरह हिल रही थी मानों भूकंप आ रहा हो. पांडुकेश्वर में बीस मकान, होटल, स्कूल, सरकारी अस्पताल, आदि ध्वस्त हो गए. जगदीश लाल का मकान हवा में झूल रहा है तो संदीप मेहता का तीन मंजिला होटल बह गया. अरविन्द शर्मा बताते हैं कि उनका बारह कमरे का होटल, उसी में 6 आवासीय कमरे, पार्किंग, बीस नाली भूमि सब बह गया.वे रुआँसे स्वर में कहते थे कि उन्होंने बेहद मेहनत करके इतना सब बनाया था,अब उनके पास एक सुई भी नहीं बची है.
 
पांडुकेश्वर में आपदा का खौफ लोगों पर इस कदर है कि वे रात में घरों में नहीं सो रहे हैं. वे कहते हैं कि कुछ तिरपालों का इंतजाम हो जाए तो उनके लिए रात बिताना थोड़ा आसान हो जाएगा. जहां सब जगह से यात्रियों को लूटे जाने की ख़बरें आ रही हैं वहाँ पांडुकेश्वर के लोग इसका अपवाद हैं. हालांकि इस लूट में कुछ भी नया नहीं है, हमारे सभी धार्मिक पर्यटन के स्थानों पर सामान्य समयों में भी पंडों से लेकर व्यवसायियों तक एक लुटेरा गैंग सक्रिय रहता ही है, जो लोगों को मूंडने में कोई कसर नहीं छोडता. आज यह इसलिए अखर रहा है क्यूंकि आपदा के समय भी वे ऐसे कर रहे हैं. लेकिन आपदा के समय जब सरकार-सत्ता के चरित्र में कोई अंतर नहीं है तो इन्ही के चरित्र में चमत्कारिक परिवर्तन की अपेक्षा क्यूँ? बहरहाल पांडुकेश्वर में संकट के समय में भी लोगों ने यात्रियों की मदद की और अपने बचे-खुचे राशन में भी यहाँ पहुंचे यात्रियों को भूखा नहीं रहने दिया. लेकिन अब इनका खाने-पीने का सामान भी खत्म हो रहा है. यहाँ न बिजली है और न ही मोमबत्ती. बेहद आक्रोशित स्वर में युवाओं ने बताया कि प्रशासन अब तक उदासीन बना हुआ है. इनका आरोप है कि भारी बरसात के अगले दिन तहसीलदार आये जरूर, लेकिन खा-पीकर डाक बंगले में सो गए. आपदा के लगभग हफ्ते भर बाद बाद कानूनगो आया और प्रभावित परिवारों को 2700 रूपया देकर चला गया. युवाओं का ग्रुप बताता है कि हेलिकॉप्टर से स्थानीय विधायक राजेंद्र भंडारी भी यहाँ पहुंचे थे और सब हो जाएगा का जुमला थमा कर उड़ चले. कैसे होगा पता नहीं,कब होगा,कौन जाने !

फिर पैदल और खड़ी चढाई का रास्ता तय करके हम जिस ऊँचाई पर पहुँचते हैं, वहाँ खेत हैं. फिर एक बार विनाश का एक नया नजारा हमारे सामने है. जहां पर हम खड़े हैं,उससे कुछ कदम आगे से ही जमीन नीचे की ओर लुढ़क कर नदी में चली गयी है और यह भूस्खलन सड़क के बड़े हिस्से को भी अपने साथ नदी में ले गया है. ऊँचाई से देखने पर दो भूस्खलन और नजर आते हैं. सीमा सड़क संगठन (बी.आर.ओ) के काम करने की जो गति है,उससे तो अगले एक वर्ष से पहले इस सड़क का बनाना मुमकिन नजर नहीं आता.

बड़गासी गांव तो अभी सुरक्षित है, लेकिन उसके नीचे दरार है, जो आने वाले खतरे का संकेत है. लामबगड गांव है और बद्रीनाथ यात्रा मार्ग में पड़ने वाला छोटा सा बाजार भी. सड़क किनारे बाजार था और पहाड़ी पर थोड़ा ऊपर चढ कर गांव. आज के हालात यह हैं कि बाजार पूरी तरह से गायब हो चुका है. गांव में दस मकान बह गए हैं जिसमें से 6 अनुसूचित जाति के लोगों के थे और 4 सवर्णों के. आपदा में अपना घर गवां चुके विक्रम लाल बताते हैं कि भारी बारिश के चलते बेघर हुए लोग सरकारी प्राइमरी स्कूल में शरण लिए हुए हैं. अभी स्कूल की छुट्टियाँ हैं,लेकिन जब छुट्टियाँ खत्म हो जायेगी तो ये लोग कहाँ जायेंगे, ये चिंता उन्हें साल रही है. जिस समय हम इस गांव में पहुंचे लगभग उसी समय हेलिकॉप्टर तिरपाल और कुछ खाद्य सामग्री यहाँ गिरा रहा था. लेकिन जहां यह सामान हेलिकॉप्टर से गिरा वह इतनी दूर था कि बेघर लोगों के लिए इसे असहाय नजरों से देखने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. पूरा गांव ही खतरे की जद में है. इसलिए लोग चाहते हैं कि सब को कम से कम एक तिरपाल तो मिल जाए. लेकिन गांव में परिवार हैं 80 और तिरपाल आये 20.

हमने कोशिश की कि यहाँ से बदरीनाथ के लिए बढ़ लिया जाए. सो ऊपर गांव से हम नीचे सड़क पर उतरे.सड़क का अधिकाँश हिस्सा गायब हो चुका है. नदी पार करके बदरीनाथ तेरह-चौदह किलोमीटर पैदल टूटे-फूटे रास्तों से जाना ही एकमात्र विकल्प है. बदरीनाथ से सैकड़ों यात्री पैदल चल कर नदी के दूसरे निर्जन छोर पर खड़े हैं. यहाँ से सेना और आई.टी.बी.पी. रस्सों के सहारे लोगों को नदी के इस पार उतार रही है. सेना के लोगों से हमने कहा कि वे हमें दूसरी तरफ यानि उस छोर पर जहां लोग बदरीनाथ से आकर खड़े हैं, उस तरफ उतार दें. थोड़ी ना-नुकुर के बाद वे तैयार तो हुए लेकिन फिर वे दो पेड़ों को जोड़ कर एक बनाये गए लंबे से डंडे से पुल बनाने का पुराना तरीका अजमा रहे हैं. अलकनंदा की तेज धार के आगे फौजी जोर नहीं चला. सब जगह सिर्फ जोर ही जोर से तो काम नहीं बनता.

जो लोग पार हुए उन्हें तो फौजी जे.पी.कंपनी के कैम्प में ले गए, लेकिन नदी के दूसरी तरफ जहां सिर्फ नदी है, पत्थर हैं और जंगल है, वहाँ सैकड़ों लोग इस इन्तजार में खड़े हैं कि रस्सी लगे और वे पार हों. अन्धेरा गहराने से पहले हेलिकॉप्टर इन लोगों के लिए खाने के पैकेट फेंक कर चला जाता है. आपदा के मारे सैकड़ों लोग नदी किनारे और जंगल में रात बिता रहे हैं, सिर्फ इस आस में कि सुबह फिर रस्सी लगे तो वे पार हों. यह उस आपदा प्रबंधन और रेस्क्यू आपरेशन का असली चेहरा है जिसके कसीदे टी.वी.स्टूडियो में बैठे एंकर चीख-चीख कर पढ़ रहे हैं. बद्रीनाथ से लेकर पिनौला (जोशीमठ से दस किलोमीटर पहले जहां से जोशीमठ पहुँचने को वाहन मिल रहे हैं) तक सैकड़ों यात्री हैं, जो जंगलों, दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर लगातार दिन-रात, भूख-प्यास की परवाह किये लगातार चल रहे हैं कि आपदा की त्रासदी से वे मुक्ति पा सकें. हर व्यक्ति का अपना दर्द है, हर मिलने वाले की अपनी व्यथा है. इस सब के बीच जो नहीं है तो वो है सरकार और प्रशासन नाम की चीज. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सामन्य दिनों की ही तरह दिल्ली में नजर आ रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आपदा के दौर में वे केंद्रीय मंत्रियों को गुलदस्ते भेंट करते नहीं बल्कि टी.वी.स्टूडियो और अखबारों में साक्षात्कारों में ऐसे दावे करते देखे जा रहे हैं, जिनकी सच्चाई के सबूत कम से कम उत्तराखंड में तो ढूँढना मुश्किल है. स्थानीय प्रशासनिक है तो वह सुबह से शाम तक हैलीपैड पर खड़े हैं. सेना और अर्द्ध सैनिक बल जिनपर तारीफों की जमकर पुष्पवर्षा हो रही है, दरअसल आपदा के अनुपात में उनकी रफ़्तार को देखें तो वह नाकाफी है. लेकिन चूँकि बाकी पुलिस-प्रशासन के दर्शन भी आपदाग्रस्त क्षेत्रों में दुर्लभ हैं, इसलिए लगता है कि चलो कम से कम सेना वाले दिख तो रहे हैं, पहाड़ चढ़ने-उतरने में लोगों की मदद तो कर रहे हैं. इतना ही क्या कम है? अन्यथा की स्थिति में देखें तो ना तो कहीं कोई पुल सैन्य बलों ने लगाया है, ना ही कोई रास्ता खोला है. 

लामबगड में हमारे पत्रकार मित्रों से जे.पी. कंपनी के लोग कहते हैं कि उनका बहुत नुक्सान हो गया है, इसकी भी खबर वे छापें. पिनौला में एन.टी.पी.सी वाले कह रहे हैं कि वे आपदा पीड़ितों को निशुल्क खाना खिला रहे हैं,पानी पिला रहे हैं, यह भी अखबारों में आये. सच है कि जे.पी .कंपनी का नुक्सान हुआ है और सही है कि एन.टी.पी.सी वालों ने लंगर लगाया है. ये आपदा के बाद उनकी भूमिका है, लेकिन आपदा के पहले उनकी भूमिका पर चर्चा क्यूँ ना हो? पांडुकेश्वर में लोग आरोप लगा रहे हैं कि जे.पी.कंपनी के बैराज से आये पानी से ही उनका नुक्सान हुआ है और जे.पी.कंपनी को इस नुक्सान की जिम्मेदारी लेकर भरपाई करनी चाहिए. जे.पी. कम्पनी के इंजीनियर पंकज रावत इस बात से सहमत नहीं होते कि कम्पनी के कारण आपदा की तीव्रता बढ़ गयी. लेकिन पांडुकेश्वर के लोगों का आरोप है कि जे.पी.कम्पनी के बैराज में पहले क्षमता से अधिक जमा हुआ और फिर जब अत्याधिक पानी के दबाव को बैराज सह न सका तो वह टूट गया और यह बैराज का पानी, लामबगड के आगे सारे इलाके को तहस-नहस करता चला गया. यह कोई पहली बार नहीं है कि जे.पी कंपनी पर इस क्षेत्र में तबाही लाने का आरोप लगा है. इससे पहले भी 2004 में भी लामबगड क्षेत्र में बाढ़ जैसे हालात पैदा करने और इस गांव को नुक्सान पहुँचाने के लिए जे.पी.कम्पनी को उत्तरदाई ठहराया गया था. 2007 में जे.पी.कम्पनी की कारस्तानी से जोशीमठ की ठीक सामने की पहाड़ी पर स्थित चांई गांव में जमीन धंसने लगी. लोगों के घर-खेत सब जगह बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गयी और बिना किसी आपदा के ही यह गांव आपदा ग्रस्त हो गया. चांई गांव की ही तलहटी में ही जे.पी.कम्पनी की विष्णुप्रयाग परियोजना का पावर हॉउस है और लामबगड से बारह किलोमीटर लंबी सुरंग से नदी का पानी यहाँ लाकर विद्युत उत्पादन होता है. आधिकारिक तौर पर 400 मेगावाट की बताये जाने वाली इस परियोजना में नान-मानसून सीजन में मात्र 100-150 मेगावाट ही विद्युत उत्पादन होता है. मानसून सीजन में यह अपने घोषित उत्पादन लक्ष्य के करीब तब पहुँचती है जबकि नदी में सिल्ट ना हो और बरसात में नदी में सिल्ट ना हो यह कैसे संभव है,भला! इसी तरह इस बरसात में एन.टी.पी.सी द्वारा बनायी जा रही तपोवन-विष्णुगाड परियोजना का बैराज भी बह गया. जम कर खनन भी जे.पी कंपनी ने किया और नदी के एक हिस्से पर अतिक्रमण कर मंदिर भी बनाया जो अब तहस-नहस हो चुका है. बैराज बहने के बाद इस परियोजना में विद्युत उत्पादन ठप्प हो गया है . 530 मेगवाट की एन.टी.पी.सी.द्वारा बनायीं जा रही तपोवन-विष्णुगाड परियोजना का काफर डैम पिछली बरसात में भी बहा. सुरंग खोदने के दौरान इस परियोजना की सुरंग में दिसंबर 2009 में अचानक पानी निकालना शुरू हुआ और बीते चार सालों से यह पानी निकल ही रहा है. जोशीमठ क्षेत्र में बनने वाली इन दो परियोजनाओं का क्षेत्र को नुक्सान पहुंचाने का पुराना इतिहास और हाल की बरसात में इनके बैराजों का बहना साफ़ दिखाता है कि आपदा की तीव्रता को बढाने में इन्होने भरपूर योगदान दिया. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और परियोजनाओं के अंध समर्थकों को यह ना दिखाई दे तो कोई क्या कर सकता है?

इस विभीषिका की मार को बढाने वाले महकमों ने इससे कोई सबक सीखा हो, ऐसा कतई दिखाई नहीं देता.उदाहरण के लिए सीमा सड़क संगठन(बी.आर.ओ) की कार्यप्रणाली को ही देख लीजिए. बी.आर.ओ.की जिम्मेदारी उत्तराखंड में सीमाओं तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण,रखरखाव और उन्हें चौड़ा करने की है. राष्ट्रीय राजमार्गों को चौड़ा करने का यह काम केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान शुरू हुआ था. तत्कालीन केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री भुवन चंद्र खंडूडी ने सड़कों के चौड़े करवाने का श्रेय लेते हुए वाहवाही और वोट, दोनों ही खूब बटोरे. केंद्र के सत्ता से भारतीय जनता पार्टी और खंडूडी साहब को रुखसत हुए दस साल होने को हैं.लेकिन जिन सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर वोट पाये गए, अव्वल तो वे अभी तक भी पूरी तरह चौड़ी नहीं हो पायी और दूसरा अंधाधुन्द डाइनामाइट के विस्फोटों ने इन सड़कों को स्थायी भूस्खलन स्थलों में तब्दील कर दिया है. बी.आर.ओ.  सड़क निर्माण और उसे चौड़ा करने में न केवल बेहिसाब विस्फोटकों का प्रयोग करता है बल्कि मलबा भी नदी में ही डालता है. यह दोनों ही काम आपदा की विभीषिका को बढाने वाले ही सिद्ध होते हैं.

लेकिन भारी आपदा के बाद जगह-जगह सड़कों के नदी में समाने के बाद भी बी.आर.ओ.की कार्यप्रणाली जस की तस है. बदरीनाथ राजमार्ग पर, गोविन्दघाट से कुछ ही आगे भयानक भूस्खलन हुआ है. सड़क का काफी हिस्सा नदी में चला गया है और बाकी अंश पर मौजूद दरारें संकेत हैं कि यह हिस्सा भी जल्द ही टूटने वाला है. भूस्खलन की चपेट में आये हिस्से से बड़े-बड़े बोल्डरों को हटाने के लिए बी.आर.ओ. वालों ने हमारे वहाँ पर से गुजरने के दौरान ही तीन बड़े विस्फोट किये और हर विस्फोट से पूरा पहाड़ और आसपास का इलाका थर्राता हुआ महसूस हो रहा था. इन विस्फोटों के बाद भूस्खलन के ही ढाल पर एक पतला सा रास्ता तो बी.आर.ओ. ने बना दिया. लेकिन यहीं पर और बड़े भूस्खलन की पटकथा भी साथ ही लिख दी गयी है.

आपदा के बचाव और राहत कार्यों की जानकारी देने में केंद्र से लेकर राज्य सरकार जितनी तत्परता दिखा रही है, उतनी सतह पर भी दिखाई देती तो शायद अभी भी हज़ारों लोग बद्रीनाथ में नहीं फंसे होते और ना ही भूखे-प्यासे जंगलों, नदी, पहाड़ों में भटक रहे होते. स्लो-मोशन में चल रहे बचाव एवं राहत अभियान में भी शासन-प्रशासन का जोर इस बात पर ही है किसी तरह यात्रियों को यहाँ से रवाना किया जा सके. जो होटल बह गए, उन में काम करने वाले नौकरों का क्या हुआ, वे ज़िंदा हैं या कि होटलों के साथ ही नदी में समा गए, इसकी ना कोई चर्चा है, ना किसी को फ़िक्र. इसी तरह जिन लोगों की आजीविका का साधन घोड़े-खच्चर हैं, उनका क्या होगा है, यह प्रश्न भी अनुत्तरित है. गोविन्दघाट से हेमकुंड को जाने वाला अलकनंदा नदी पर लगा पुल बह गया है. वहाँ फंसे लगभग सभी लोगों को निकाला जा चुका है.घोड़े-खच्चर चलाने वाले भी इस पार आ गये हैं और सामने पहाड़ी ढाल पर खच्चरों के झुण्ड के झुण्ड चरते हुए देखे जा सकते हैं. खच्चरों का पेट तो घास से भर जाएगा पर इनपर अपनी आजीविका के लिए निर्भर लोगों का पेट कैसे भरेगा, यह दीगर सवाल है. 


इस पूरे क्षेत्र को देखने पर समझ आता है कि चाहे किसी का आपदा में नुक्सान हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन आपदा की यंत्रणा से पूरा पहाड़ गुजर रहा है. मकान, दूकान, खेती सब आपदा में गंवा चुके लोगों का जीवन फिर पटरी पर कैसे आएगा, यह भी पहाड़ जैसा ही विकट सवाल है. पर हवाई जहाजों और राहत के हवाई दावों पर सवार सत्ताधीशों से इन सवालों पर संवेदनशील चिंतन की अपेक्षा करना क्या कुछ ज्यादा नहीं हो जाएगा ?

Monday, June 24, 2013

बिल्डर लेकर आयेगा, अबके नई मशीन


दोहा विधा में सिद्धहस्त कवि नरेंद्र मौर्य की ताज़ा रचना (श्री असद ज़ैदी की फेसबुक वॉल से साभार) :

दुख में दोहे


-नरेंद्र मौर्य 

खेल ये कुदरत का नहीं, इंसानी करतूत
मोहना तेरे विकास का ये है असली रूप

पीटे ढोल विकास का, खोदे रोज़ पहाड़
क़ुदरत भी कितना सहे, तेरा ये खिलवाड़़

बड़ी मशीनें देखकर, रोये ख़ूब पहाड़
कैसे झेलेगा भला जब आयेगी बाढ़

खनन माफ़िया से हुआ सत्ता का गठजोड़
पैसा ख़ूब कमायेंगे, धरती का दिल तोड़

खण्ड-खण्ड बहता रहा हाय उत्तराखण्ड
मलबा बन गई ज़िन्दगी, रुका नहीं पाखण्ड

आपदा राहत कोष से, होंगे कई अमीर
जनता बिन राहत मरे, वे खायेंगे खीर

धरम करम के चोचले, दान पुण्य भी ख़ूब
भक्त बचे कैसे भला, ख़ूद भगवन गये डूब

गाँव बहे और हो गयी, ख़ाली यहाँ ज़मीन
बिल्डर लेकर आयेगा, अबके नई मशीन

Thursday, June 20, 2013

गोविन्दघाट - मौके से रपट



कल आपने गोविन्दघाट की कुछ ताज़ा तस्वीरें भाई इन्द्रेश मैखुरी की सौजन्य से देखी थीं. अभी अभी उन्होंने एक रपट अपने फेसबुक स्टेटस पर लगाई है. पहली बार इस इलाके की आँखों देखी बताने के लिए उनका आभार -

उत्तराखंड इस समय भीषण विभीषिका की चपेट में है. विगत तीन दिनों से,जब से भारी बारिश शुरू हुई हम लगातार जोशीमठ में आपदा की जानकारी लेने,सुझाव देने और नागरिकों की ओर से मदद करने तक,स्थानीय प्रशासन से निरन्तर संपर्क बनाए हुए थे.लेकिन प्रशासन की तरफ से आपदा के संदर्भ में जितनी आधी-अधूरी,कच्ची-पक्की जानकारी मिल रही थी,उससे हम संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे.

इसलिए कल 19जून 2013 को भाकपा (माले) के गढ़वाल कमेटी के सदस्य कामरेड अतुल सती,मैं और आइसा के साथी महादीप पंवार नजदीक से हालात का जायजा लेने के निकल पड़े. जोशीमठ से गोविन्दघाट बमुश्किल बीस-पचीस किलोमीटर है. लेकिन दस-पन्द्रह किलोमीटर मोटर साईकिल से तय करने के बावजूद हमें गोविन्दघाट पहुँचने में हमें तकरीबन दो घंटे लग गए.दो जगहों पर सड़क का बड़ा हिस्सा बह चुका है और तीखी ढाल पर ऊपर चढ कर ही दूसरी तरफ पहुंचा जा सकता है.पहाड़ के निवासी होने के चलते हमारे लिए तो यह अपेक्षाकृत कम मुश्किल थालेकिन सेना और आई.टी.बी.पी. के जवानों द्वारा लोगों को चढ़ने-उतरने में मदद किये जाने के बावजूद, बाहरी यात्रियों के लिएतीखी पहाड़ी ढाल की ऊपर तक चढ कर नीचे उतरना बेहद कष्टकारी और डरावना अनुभव है. 

गोविन्दघाट का मंजर बेहद भयानक था. जिस जगह कभी बाजार हुआ करता थावहाँ तक अलकनंदा नदी अपने तट का विस्तार कर चुकी है और गोविन्दघाट के मुख्य बाज़ार की यह जगह बड़े-छोटे बोल्डरों से अटी पडी थी. गुरूद्वारे के सभी कक्षों में लगभग चार-पांच फीट ऊँचे रेत की टीले बने हुए हैं. इसके पीछे की दुकाने और खोखे भी रेत से भरे हुए हैं.अब रेत में दबे हुए सामान को दुकानदार निकाल रहे हैं .गुरूद्वारे के परिसर में मौजूद पुलिस चौकी में भी रेत ही रेत है. गुरूद्वारे के कुछ कक्षों में पेड़ों के तने भी घुसे हुए हैं. गुरद्वारे और मुख्य बाजार से बद्रीनाथ मार्ग तक पहुँचने वाली सड़क आधी से ज्यादा गायब हो चुकी है. सपरिवार बद्रीनाथ यात्रा पर निकले और बीते तीन-चार दिनों से गोविन्दघाट में फंसे हुए डी.बी.एस.(पी.जी) कॉलेजदेहरादून में जिओलौजी के असिस्टंट प्रोफ़ेसर,डा.प्रदीप भट्ट तबाही की रात का सिहरा देने वाला वाकया सुनाते हैं. वे बताते हैं कि रात में दो-तीन बजे के आसपास नदी में तेज गड़गाहट सुन वे अपने होटल से पत्नीबुजुर्ग सास और दो बच्चों को गोद में लेकर ऊपर की तरफ भागे. ऊपर सड़क में पहुँचने के बाद उन्हें ख़याल आया कि उनकी कार तो नीचे पार्किंग में खड़ी है. वे बताते हैं कि जैसे ही वे कार लेकरऊपर सड़क में पहुंचे,उनके पीछे की सड़क बह गयी.यानी कुछ पलों की देर होती तो वे भी नदी में समा गए होते.

यहाँ पर होटलों और पार्किंग के साथ सैकड़ों मोटर साईकिल और कारें भी अलकनंदा नदी की प्रचंड लहरों में समा गयी. कारों के बहने के बेहद भयावह अनुभव यहाँ मौजूद लोग सुना रहे हैं. लोग बताते हैं कि जब एक कार बहने लगी तो उसका ड्राइवर (जो संभवत उसका मालिक भी रहा होगा) पीछे-पीछे नदी की उफनती लहरों मेंयह कहते हुए कूद गया कि जब दस लाख की गाडी नहीं रही तो मैं जीवित रह कर क्या करूँगा. दो बच्चेजिनके माँ-बाप हेमकुंड की यात्रा पर गए हैंउन्हें ड्राइवर ने कार में सुलाया हुआ थावे भी कार समेत नदी में समा गए. कतिपय कारों में सोये हुए ड्राईवरों के बह जाने की बात भी लोग कहते हैं.

राहत और बचाव कार्य जोर-शोर से चलाने के दावे समाचार माध्यमों से किये जा रहे हैं. जोशीमठ में बचाव कार्यों में लगे हैलीकाप्टरों की गडगडाहट सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक सुनाई दे रही है. दूरस्थ इलाकों में फंसे लोगों को जोशीमठ लाने का काम ये हैलीकाप्टर कर रहे हैं. लेकिन 6-6 सीट वाले दो हैलीकाप्टर दिन में कई चक्कर लगाने पर भी,चौदह हज़ार के करीब फंसे हुए लोगों में से कितने फंसे हुए लोगों को निकाल पायेंगे,यह समझा जा सकता है. इसलिए गोविन्दघाट में फंसे सिख तीर्थ यात्री बेहद आक्रोशित हैं कि न तो उन्हें निकालने का कोई बंदोबस्त हो रहा है और न ही उन तक किसी तरह की कोई राहत ही पहुँच रही है. 

गोविन्दघाट पहुँचने पर जब हमने इन सिख तीर्थ यात्रियों से बात करनी शुरू की तो हमें घेर कर ये कहने लगे कि आप पहले सरकारी लोग हैं, जो यहाँ पहुंचे हैं. हमने उन्हें बताया कि हम सरकारी लोग नहीं, आम जनता का हिस्सा हैं. इन सिख तीर्थ यात्रियों की मुसीबत यह है कि ये अपने वाहनों समेत गोविन्दघाट में फंसे हुए हैं. इनमें से बहुतों की आजीविका का आधार इनके वाहन ही हैं,इसलिए वाहनों को लावारिस छोड़ कर,अपने घरों को लौटने के लिए ये तैयार नहीं हैं. इन सिख तीर्थ यात्रियों ने बताया कि दो दिन से इन्हें कुछ खाने को नहीं मिला. दो दिन के बाद कल इन्होने खुद ही गुरुद्वारे के मलबे में दबे हुए अनाज और अन्य खाद्य सामग्री को निकाला, उसे धोया और फिर उसी को पका कर लंगर में सभी को खिला रहे हैं. कोई मदद ना मिल पाने के लिए ये सिख तीर्थ यात्री उत्तराखंड सरकार से तो खफा हैं ही, पंजाब सरकार और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा भी कोई सुध ना लिए जाने को लेकर भी ये बेहद क्षुब्ध हैं.

सिख तीर्थ यात्रियों में इस बात को लेकर भी बेहद आक्रोश था कि संकट की घडी में भी कुछ लोग लूट मचाने से बाज नहीं आ रहे हैं. मोहाली,चंडीगढ़ के मंजीत सिंह,चरणजीत सिंह और पटियाला के लखबीर सिंह बेहद गुस्साए स्वर में बताते हैं कि बीते दो दिनों में यहाँ एक साबुन की टिकिया चालीस रुपये में बिकी, सौ रुपये में चावल की प्लेट और सौ ही रुपये में दस रुपये में मिलने वाला मैगी का पैकेट बिका. वे तो यह भी आरोप लगाते हैं कि गुरूद्वारे का दान पात्र तोड़ कर रुपये चुराए गए और खडी गाड़ियों के शीशे तोड़ कर भी सामान चुरा लिया गया. एक तरफ खड़ी चढाई पार कर नीचे उतरने वालों को कुछ लोग शरबत पिलाने और खाना खिलाने के लिए खड़े हैं और दूसरी ओर इस संकट की घडी में लूट करने का अवसर भी कुछ लोग नहीं चूकना चाहते. आपदा को अवसर मानने और उस दौरान तिजोरियां भरने की यह दुष्प्रवृत्ति सत्ता के शीर्ष से नीचे तक पहुँच चुकी है. फर्क इतना है कि जब सत्ता ऐसी लूट को अंजाम देती है तो इसे भ्रष्टाचार कहा जाता है और आम आदमी करे तो यह अमानवीयता कहलाती है. 

गोविन्दघाट से नदी के पार घंघरिया,हेमकुंड साहिब जाने वाला पुल बह चुका है. अलकनंदा नदी के पार लगभग दो सौ तीर्थ यात्री फंसे हुए हैं,जिनके पास खाने को कुछ नहीं है. कल शाम तक उन्हें नहीं निकाला जा सका था.आई.टी.बी.पी. के जवान रस्सी डाल कर इन्हें निकालने की कोशिश कर रहे थे.लेकिन नदी की उफनती लहरों के बीच यह संभव प्रतीत नहीं हो रहा था. गोविन्दघाट में साफ़-सफाई के अभाव में जिस तरह गन्दगी के ढेर,दुर्गन्ध और मक्खियों का साम्राज्य नजर आ रहा है, अगर जल्द ही इन हालातों को ठीक ना किया गया तो वहाँ लोग बीमारियों की चपेट में आ जायेंगे. 

जोशीमठ में विभिन्न विद्यालयों और नगरपालिका के विश्राम गृह को अस्थायी राहत कैम्पों में तब्दील किया गया है, जहां आपदा प्रभावित तीर्थ यात्रियों और ग्रामीणों को ठहराया गया है. हेमकुंड साहिब जाने के रास्ते में पड़ने वाले भ्यूंडार गाँव के लोग नगरपालिका परिषद जोशीमठ के विश्रामगृह में हैं.इस गांव की बुजुर्ग महिलायें बताती हैं कि आपदा में उनका सब कुछ तबाह हो गया. उनके मकान, खेत, गौशालाएं सब टूट गयी हैं. किसी का दो मंजिला मकान टूटा, किसी का एक मंजिला. इन बुजुर्ग महिलाओं को इस बात का बेहद अफ़सोस है कि वे अपनी जान बचा कर तो जोशीमठ चले आये पर उनके पालतू पशु गांव में ही छूट गए. वे कहती हैं कि उन्होंने अपने पालतू पशुओं को खुला छोड़ दिया है ताकि वे घास चरने और संकट के समय प्राण बचाने के लिए कहीं भी जा सकें. कुछ लोग जिनके पशु हाल ही में गाभिन हुए हैं और दुधारू हैं,वे अभी भी गांव में ही रुके हुए हैं.

तीर्थ यात्रियों और स्थानीय ग्रामीणों के अलावा कुछ और लोग हैं, जो आपदा की चपेट में आने की आशंका हैं. ये स्थानीय लोग हैं,जो हर बार गर्मियों के मौसम में ऊंचे बुग्यालों में कीड़ा जड़ी की तलाश में जाते हैं.कीड़ा जड़ी(cordyceps sinesis)जिसे कुछ क्षेत्रों में यारसा गम्बू भी कहा जाता है,ऊँचे बुग्यालों(Alpine meadows) में बर्फ पिघलने पर मिलने वाला, कीड़े जैसा दिखने वाला फंगस है,जो औषधि निर्माण में काम आता है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी कीमत 5-6 लाख रूपया प्रति किलो है. सरकारी व्यवस्था यह है कि इसके दोहन की इजाजत वन पंचायतें देंगी तथा दोहन करने वाला व्यक्ति इसे वन पंचायत को देगा. वन पंचायती इसे बेचेंगी, पांच प्रतिशत रॉयल्टी स्वयं के लिए रख कर बाकी संग्रहकर्ताओं में संग्रहण के अनुपात में वितरित कर दिया जाएगा. उक्त बातों का अनुपालन सुनिश्चित करवाना जिलों के जिलाधिकारी और प्रभागी वनाधिकारियों (डी.एफ.ओ.) की जिम्मेदारी है. लेकिन यह व्यवस्था जमीन पर कहीं नजर नहीं आती. हर बार हज़ारों लोग बुग्यालों में कीड़ा जड़ी की तलाश में जाते हैं और फिर अवैध रूप से तस्करों को लाखों रुपये में बेच दिया जाता है, जबकि इसकी सरकारी दर पचास हज़ार रुपये प्रति किलो है. इस बार की भारी बारिश में कीड़ा जड़ी के दोहन के लिए ऊँचे बुग्यालों में गए लोगों की चिंता बचाव एवं राहत अभियान चलाने वालों के एजेंडे में नहीं है. जोशीमठ की उर्गम घाटी में कीड़ा जड़ी निकालने गए दस लोगों के भारी बारिश की चपेट में आकर जान से हाथ धो बैठने और कई लोगों के लापता होने की खबर है.

इस भयावह विनाशलीला के बाद कई सवाल हैं,जिनका जवाब राहत की बंदरबांट के बीच से कैसे मिलेगा,समझ नहीं आता. गोविन्दघाट में सौ से अधिक वाहनों के साथ फंसे लोगों को कैसे निकाला जाएगा? पुलिस उद्घोषणा कर रही है कि सड़क बनने में कम से कम पन्द्रह दिन लग जायेंगे,इसलिए लोग अपनी कार इत्यादि को वहीँ छोड़ कर अपने घरों को लौट जाएँ. अपनी गाड़ियों की सुरक्षा को लेकर आशंकित सिख यात्री गाडियां छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हैं. सवाल यह भी है कि जो सैकड़ों छोटे बड़े वाहन बह गए हैं,उनका मुआवजा कौन देगा और कैसे देगा? भ्यूंडार गांव के ग्रामीणों का कहना है कि गांव में सब तबाह होने के बाद वे वहाँ कैसे रहेंगे,लेकिन साथ ही वे इस उहापोह में भी हैं कि जोशीमठ में वे कितने दिन तक रहेंगे. सब कुछ तबाह हो जाने के बाद उनके बच्चों की पढाई-लिखाई का क्या होगा ये सवाल भी उन्हें साल रहा है.

इस विभीषिका के बीच सेना, अर्द्धसैनिक बलों के प्रयास की तारीफ़ लोग करेंगे, वे प्रयास कर भी रहे हैं.लेकिन तीखे पहाड़ी ढाल पर,जहां अपने शरीर का भार संभालना भी मुश्किल है,वहाँ यात्रियों के भारी बैगों, सूटकेसों आदि को पीठ पर लादे हुए नेपाली मजदूर, इस राहत-बचाव अभियान के ऐसे खामोश सिपाही हैं, जिनके श्रम को न कहीं दर्ज किया जाएगा,न कोई प्रशंसा वे पायेंगे. लेकिन इनके द्वारा दुष्कर चढाई पर यदि यात्रियों का बोझा न ढोया जाए तो यात्रियों की बहुतायत के लिए आपदा प्रभावित क्षेत्रों से निकालना लगभग मुमकिन हो जाए.
 
यह प्राकृतिक आपदा थी, लेकिन इस आपदा की विभीषिका को बढाने में मनुष्य की प्रकृति से छेडछाड की बड़ी भूमिका थी. हमारी सरकारों द्वारा छल-कपट, प्रलोभन और दमन के दम पर लागू किया जा रहा विकास का आक्रमणकारी मॉडल, जो मुनाफे के अलावा सब कुछ ध्वस्त कर देना चाहता है, उसने प्रकृति के कहर की तीव्रता को कई गुणा बढ़ा दिया. जोशीमठ से ऊपर की ओर जलविद्युत परियोजना निर्माण के लिए किये गए विस्फोटों, सुरंग निर्माण, मलबा नदी में डालना और परियोजनाओं के बैराजों से छोड़े गए पानी और बैराजों के टूटने ने आपदा को और अधिक मारक बना दिया. प्रकृति के कहर का शिकार हुए भ्यूंडार गांव के ग्रामीण बताते हैं कि लगभग पन्द्रह दिन पहले ही वे लक्ष्मणगंगा पर बन रही जलविद्युत परियोजना की निर्माता- सुपर हाइड्रो कंपनी के पास यह शिकायत लेकर गए थे कि कंपनी द्वारा किये जा रहे विस्फोटों से उनके मकान हिल रहे हैं. सीमा तक सड़क पहुँचाने के लिए उत्तरदायी सीमा सड़क संगठन (बी.आर.ओ.) ने भी विभीषिका को बढाने का इंतजाम पहले ही किया हुआ था.सड़क चौड़ा करने के लिए डाइनामाइट से किये गए विस्फोटों और सडक की खुदाई में निकलने वाले मलबे को नदी में बहाने जैसे बी.आर.ओ. के कारनामों ने कभी तो कहर बरपाना ही था, इस बरसात में एक बार फिर वह कहर दिखा. इसके अलावा अनियंत्रित,अनियोजित तरीके से होता शहरीकरण भी प्रकृति की विनाशलीला को बढाने वाला सिद्ध होता है. गोविन्दघाट में जो मुख्य बाज़ार,होटल,पार्किंग आदि बहे,वे लगभग नदी में घुस कर बनाए गए .गोविन्दघाट का गुरुद्वारा जो आज रेत और पेड़ों के तनों से पटा हुआ है, वह भी एकदम अलकनंदा से सट कर बना हुआ है. नदी के किनारे इस पांच मंजिला इमारत को बनने की इजाजत देने वाले प्रशासन के सुधीजनों को नहीं समझ आया होगा कि नदी में पानी का स्तर बढते ही यह एक आसान शिकार होगा? नदी से एकदम लगी हुई वे पार्किंग, जिनमें कार पार्किंग का 600 रूपया तक लिया जाता था, आज बह गयी हैं. यह धनराशि वाहनों की सुरक्षा के लिए ही ली जाती होगी. असुरक्षित जगह पर वाहनों की सुरक्षा के नाम पर खूब चांदी काटने वाले पार्किंग स्वामी क्या गाड़ियों के बहने की जिम्मेदारी लेंगे, या फिर वे पुलिस या प्रशासन के लोग जिम्मेदारी लेंगे, जिनकी जेबें इन पर्किंगों की कमाई के हिस्से से भरती थी?