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Wednesday, February 10, 2016

ये चकड़ैतों की जमात है दिदा - राज्यगीत के बहाने कुछ बातें


बीते लम्बे समय से उत्तराखंड का राज्य गीत तैयार किये जाने के लिए तमाम लोग अथक प्रयास कर रहे थे. संयोगवश मैं गीत निर्माण कमेटी के सदस्यों को भी जानता हूँ और शानदार कुमाऊनी कवि हेमंत बिष्ट को भी जिनका लिखा गीत अंततः हमारे राज्य का राज्यगीत  चुना गया. हेमंत दा को इस उपलब्धि के लिए बधाई. अलबत्ता उत्तराखण्ड डॉट कॉम से लिया गया मनु पंवार का यह आलेख इस गीत के बहाने कई अति महत्वपूर्ण सवालों को छूता है और एक बार सलीके से पढ़े जाने की दरकार रखता है.  
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दिदासुना है बल कि तुम्हारे मुलुक की सरकार ने राज्य गीत तैयार कर लिया है ! भै, हमारी समझ में लेकिन ये बात नहीं आई कि आखिर वे कौन लोग हैं जिन्हें उत्तराखण्ड के राज्य गीत की जरूरत है? वे कौन हैं जो राज्य गीत के लिए मरे जा रहे थे? जरा हमको भी तो बिंगाओ कि ये राज्य गीत होता क्या है? जिस मुलुक में राजनीति, नौकरीशाही से लेकर मीडिया तक सब प्रशस्ति गान में जुटे हों, वहां प्रशस्ति के लिए अलग से राज्य गीत की ज़रूरत भला क्यों आन पड़ी?

आखिर वे कौन लोग हैं जिसे राज्य गीत की सबसे ज्यादा जरूरत है? वे कौन हैं जिनका निवाला राज्य गीत के बगैर हलक से नीचे नहीं उतर पा रहा था या जो सुबह-सुबह नित्यकर्म से निवृत्त नहीं हो पा रहे थे? ज़रा हमें भी तो बताओ कि क्या बगैर राज्य गीत के उन्हें उत्तराखंड से नीचे नहीं उतर पाने में दिक्कत महसूस हो रही थी? क्या उन्हें नजीबाबाद, मुजफ्फरनगर या मुरादाबाद में यूपी की पुलिस नाका लगाकर रोक दे रही थी? क्या राज्य गीत न होने के चलते देहरादून, हरिद्वार या हल्द्वानी में किसी को ट्रेन से टीटी ने धक्के मारकर बाहर फेंकवा दिया था या जॉलीग्राउंट हवाई अड्डे पर एयरपोर्ट अथॉरिटी वालों ने किसी को विमान पर चढ़ने नहीं दिया? क्या अल्मोड़ा के नैनसार में जिंदल के बाउंसरों ने स्थानीय लोगों को इसलिए पीटा कि हमारे लोगों के पास अपना राज्य गीत नहीं था? क्या पिछले पंद्रह बरस से उत्तराखंड की दुर्गति की वजह इसका राज्य गीत न होना था? क्या अब राज्य गीत तैयार हो जाने के बाद से उत्तराखंड का भाग्य बदल जाएगा?
दिदा, जरा ढंग से बिंगाओ भै. हमारी बुद्धि में कुछ घुस नहीं पा रहा है. वे कौन हैं जिन्हें अपना राज्य गीत न होने का कॉम्पलेक्स था? पड़ोस का हिमाचल तो पिछले छह दशक से बिना राज्य गीत के है. आखिर हम अपना कामधाम छोड़कर राज्य गीत के लिए इतने आतुर क्यों थे? ये चकड़ैतों की जमात है दिदा. राज्य गीत के लिए जैसी उत्तराखंड की अपनी बोलियां गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी ख़ारिज कर दी गईं, कल तो सियासतदां इसी तरह की दलील देकर गैरसैंण को भी ख़ारिज कर देंगे.
भै दिदा, तुम्हारे हरदा की प्राथमिकतायें क्या हैं, ये समझ में नहीं आ रहा है. एक राज्य जहां सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार और ज़मीन को बचाने की फिक्र मुंह बाए खड़ी है, वहां की सरकार के लिए राज्य गीत इतना बड़ा मसला कैसे हो गया? आखिर राज्य गीत के आकांक्षी कौन हैं? पहाड़, नदियां, हिमालय, हवा, पानी, जीवन, ज़मीन इस उत्तराखंड की खास पहचान हैं. इन पहचानों को धनकुबेरों के पास गिरवी रखकर आखिर हमारे मुखिया राज्य गीत किसे सुनाना चाहते हैं? ख़बरदार, कहीं यह राज्यगीत हमारे कौथिगेर मुख्यमंत्री का गुप्त हथियार तो नहीं? हमें राज्य गीत की धुन में मगन करके कहीं वो हमें हमारी ज़मीन से बेदखल करने की साज़िश तो नहीं रच रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि चाय बागानों को रौंदकर स्मार्ट सिटी बनाने के लिए राज्य गीत ज़रूरी हो? भै दिदा, ये चंट लोग हैं. इनकी नीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है. तुम होशियार रहना रे!

Wednesday, July 17, 2013

उत्तराखंड में आए हुए सैलानियो, बस यूं समझ लो कि ये हमारा घर है


उत्तराखंड में आए हुए सैलानियो, आपका शुक्रिया.

देवभूमि की तीर्थयात्रा पर आए श्रद्धालुओ, आपका भी शुक्रिया. आप सभी का शुक्रिया कि, आपकी मौजूदगी से ही सही, हमारा दर्द दुनिया को दिखने तो लगा है.

कुछ महीनों के बाद यात्रा सीजन खत्म हो जाएगा. उसके बाद, हम भी इन तबाह खेतों के बीच फिर से अपने सपनों की फसलें रोपेंगें, बर्बाद हो चुके अस्पतालों में जिंदगी की उम्मीद खोजेंगे और खंडहरनुमा स्कूलों में बच्चों के मासूम सवालों के जवाब सोचेंगे. क्योंकि, आप सभी के लौटने के साथ ही ये तमाम तामझाम और चमकते कैमरे भी यहां से विदा ले लेंगे, हमेशा की तरह.

यहां उपजे इस अंधेरे को दूर करना कुछ मुश्किल जरूर होगा, क्योंकि रोशनी के लिए पहाड़ों की देह को छलनी कर सुरंगों का जाल बनाने की औकात हमारी नहीं है. हमारे पास दैत्याकार मशीनें नहीं, बल्कि मामूली सी कुदालें ही हैं.

पहाड़ों को सीढ़ीनुमा खेतों में बदलने में ही हमारी कई पीढ़ियां गुजर जाती हैं. इससे पहले कि वहां से दो मुट्ठी अनाज हमारे घरों तक पहुंचे, सब कुछ मलबे के ढेर में बदल जाता है. ... और ऐसा यहां कभी-कभी नहीं बल्कि अक्सर होता है.

अब आप ये ना कहना कि, फिर भी यहीं रहना क्यों जरूरी है. बस यूं समझ लो कि ये हमारा घर है, ठीक वैसा ही घर जहां पहुंचने का आप सभी को बेसब्री से इंतजार है. ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ आपका एक बार फिर से शुक्रिया.

(- हिलवाणी के पास ये मार्मिक भावनाएं संदेश के रूप में भेजी हैं युवा लेखक पत्रकार और अब शिक्षक श्रीनिवास ओली ने जो दिल्ली नोएडा छोड़कर अब उत्तराखंड के लोहाघाट में रहते हैं, उनका और हिलवाणी के शिवप्रसाद जोशी का आभार.)


Friday, July 5, 2013

उत्तराखंड - मुख्यमंत्री, मौसम और मीडिया का मुरब्बा

जल, जंगल, जमीन को बचाने के जितने भी वैज्ञानिक सुझाव आते हैं, सरकार हमेशा उनको दबा देती है -


(श्री शमशेर सिंह बिष्ट की फेसबुक वॉल से साभार) 

मौसम विभाग के पूर्वानुमान पर सवाल उठाते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा की आज तो मौसम विभाग ने पिछले 48 घंटे के लिए उत्तराखंड में भारी वर्षा होने की सम्भावना के साथ उन जनपदों के नाम तथा गढ़वाल की अपेक्षा कुमाऊँ में भारी वर्षा हाने की सम्भावना व्यक्त कर दी है. लकिन मौसम विभाग ने 16,17 जून को क्यों नहीं चिन्हित कर के भारी वर्षा होने की सम्भावना व्यक्त की. इस पर बहुगुणा ने मौसम विभाग के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की. मुख्यमंत्री के इस कथन पर मौसम विभाग के निर्देशक ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा की 14 जून को मौसम विभाग ने भारी वर्षा की ही जानकारी नहीं दी थी, वरन पूरी जानकारी दी थी जिसमें यह भी कहा था, चमोली जनपद में भारी भूस्खलन भी होगा, इस लिए 16,17 व 18 जून के लिए यात्रा में भी रोक लगा दी जाय, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने इस चेतावनी को गम्भीरता से नहीं लिया. यह मौसम विभाग का कहना है. मुख्यमंत्री बहुगुणा को यह अच्छा नहीं लगा की मौसम विभाग सरकारी लापरवाही को सार्वजनिक करें. इस लिए मुख्यमंत्री ने मौसम विभाग की इस पारदर्शिता की शिकायत केन्द्र सरकार से की है, कि भविष्य में सरकार की लापरवाही को मौसम विभाग उजागर न करें. अब मौसम विभाग पत्रकारों को स्पष्ट जानकारी देने से बच रहा है. लगता है केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने, उत्तराखंड की कांग्रेसी सरकार के पक्ष में खड़ी होकर, मौसम विभाग को अधिक ईमानदार न बनने की चेतावनी दी हो. इस लिए मौसम विभाग पत्रकारों से बात करने से बच रहा हो.


सरकारों की हमेशा यह मंशा रही है, उनकी लापरवाही व बेमानी पर कोई सवाल नहीं उठाये जाएं. जल, जंगल, जमीन को बचाने के जितने भी वैज्ञानिक सुझाव आते हैं, सरकार हमेशा उनको दबा देती है क्योंकि ये सुझाव उनके निकट के जल, जंगल, जमीन लूटने वालों के विरुद्ध होते हैं. अब मौसम विभाग पर बहुगुणा इसलिए  बरसे हैं, कि उनकी कमजोरियां उजागर न हों.


Sunday, June 30, 2013

आइये इस ज़रूरी प्रपत्र पर हस्ताक्षर करें

यह वक्तव्य मुझ तक नैनीताल समाचार की तरफ़ से भेजी गयी एक मेल की मार्फ़त मिला है.

जस का तस

...

देहरादून में वैज्ञानिक डा. रवि चोपड़ा, वयोवृद्ध पर्यावरणविद और टिहरी बाँध आन्दोलन के योद्धा रहे एन.डी. जयाल, उत्तराखंड आर.टी. आई. क्लब के अध्यक्ष बी.पी.मैठाणी आदि अनेक मित्रों के साथ मिलकर हमने यह वक्तव्य इस तरह बनाया कि इसमें उत्तराखंड के हर हितैषी की सहमति मिल जाये. मुद्दे बुनियादी हैं और भाषा एकदम शिष्ट. हम चाहते हैं कि उत्तराखंड के हर आम और ख़ास व्यक्ति की ही नहीं, उत्तराखंड के बाहर के हमारे शुभचिंतकों की भी इसमें सहमति मिल जाये. हज़ारों लोग जब इस वक्तव्य को लेकर अपनी एकजुटता दिखायेंगे तो शायद उत्तराखंड की सरकार हमारी आवाज़ दबाने में कामयाब नहीं होगी, विकास का यह विनाशकारी मॉडल टूटेगा और इस त्रासदी की पुनरावृत्ति नहीं होगी. हम चाहते हैं कि आप अकेले नहीं, बल्कि सभी मित्र-परिचितों के साथ इस पर सहमति व्यक्त करें, अपने हस्ताक्षर करें...

‘‘पिछले दिनों की अतिवृष्टि के बारे में मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी से गर्म हवा पश्चिम की ओर तथा कश्मीर से ठंडी हवा पूर्व की ओर आने और उनका टकराव उत्तराखंड के निकट होने से उत्तराखंड में कम दबाव का क्षेत्र बना और अरब सागर से नम हवाओं का खिंचाव इस दिशा में हुआ. इन नम हवाओं के हिमालयी श्रृंखलाओं से टकराने से सम्पूर्ण उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में अतिवृष्टि हुई. अकेले नैनीताल में तीन दिनों में 1116 मिमी. वर्षा हुई जो नैनीताल की वार्षिक औसत वर्षा के 40 प्रतिशत से अधिक है. देहरादून में वर्षा का 88 साल का रिकार्ड टूट गया.

‘‘पिछले दो दशकों से वैश्विक स्तर पर किये गये अध्ययनों का निष्कर्ष है कि ग्लोबल वार्मिंगके कारण इस तरह की मौसम सम्बंधी चरम घटनाओं की आकस्मिता तथा आवृत्ति निरन्तर बढ़ रही है. उदाहरण के लिये उत्तराखंड में ही वर्ष 2012 में उत्तरकाशी तथा उखीमठ तथा वर्ष 2010 में अल्मोड़ा जिले की बादल फटने की घटनाओं का जिक्र किया जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में मोटरवाहन जनित प्रदूषण तथा सड़कों व बाँधों के निर्माण से उत्पन्न धूल के कणों से ऐसी अतिवृष्टि की संभावना बढ़ती है.

‘‘16-17 जून की अतिवृष्टि के कारण उत्तराखंड की छोटी-बड़ी नदियों में कई जगहों पर बाढ़ आई. चार धाम क्षेत्र में हुई भयंकर तबाही की खबरें लगभग पूरी तरह जगजाहिर हो गई हैं. किन्तु शेष प्रदेश, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, में हुई तबाही के समाचार बहुत धीरे-धीरे आ रहे हैं और पूरी तस्वीर साफ होने में अभी काफी समय लगेगा. इस आपदा में जहाँ चार धाम में आये देश भर के हजारों श्रद्धालुओं ने अपने प्राण गँवाये, वहीं तीर्थ यात्रा के व्यवसाय से जुड़े हजारों परिवारों के कमाने वाले पुरुषों के मारे जाने की भी आशंका है. मंदाकिनी घाटी के 46 गाँवों के डेढ़ हजार से अधिक पुरुष अभी तक अपने घरों को नहीं लौटे हैं. प्रदेश भर में उफनाई हुई नदियों ने अपने रास्ते में अवरोध बनने वाले पहाड़ी गाँवों, कस्बों, मवेशियों, खेतों, गूलों, पेयजल योजनाओं, पुलों, निर्माणाधीन बाँधों, मोटर वाहनों, होटल-रिजॉर्टों को नष्ट कर दिया. नदियों पर हुआ हर तरह का अतिक्रमण नदियों की चपेट में आया.

‘‘इस आपदा ने उत्तराखंड में आपदा प्रबन्धन तंत्र की पूर्व तैयारियों तथा प्रबन्धन की पोल खोल कर रख दी. दो दिन तक सदमे में पड़ी सरकार जब हरकत में आयी भी तो उसका ध्यान केवल चार धाम यात्रियों पर केन्द्रित रहा. यहाँ भी जो जानें बचाई जा सकीं, वह सेना तथा अर्द्धसैनिक बलों के कारण. अन्य क्षेत्रों में राहत की बात तो दूर रही, क्षति का आँकलन भी अभी तक नहीं हो सका है. देश भर से राहत के लिये आये स्वयंसेवी संगठनों को दिशा निर्देश देने वाला भी अभी कोई नहीं है. बेहिसाब राहत सामग्री यहाँ-वहाँ बेकार पड़ी बर्बाद हो रही है.

‘‘एक अतिवृष्टि किस तरह इतनी बड़ी मानवीय आपदा बन गई, इसके लिये हमें विकास के मौजूदा सोच का समझना पड़ेगा. उपभोक्तावादी मानसिकता और बाजारवाद प्रकृति के साथ लगातार छेड़खानी कर ऐसी घटनाओं को जन्म देते हैं. इसलिये उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौर में ही यहाँ की जनता ने इस तरह के विकास को खारिज कर जल, जंगल और जमीन पर अपना अधिकार माँगा था. तब यह आशा की गई थी कि नंगी पहाड़ी ढलानों पर हरियाली होगी. इन्ही जंगलों से यहां के निवासियों की ईंधन, चारा और पानी की जरूरतें पूरी होंगी, पुरुषों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने से पलायन रुकेगा और खुशहाली बढ़ेगी. जलागम प्रबन्धन से सूखी नदियों में पानी आयेगा. शराब के आतंक से मुक्ति मिलेगी.

‘‘मगर उत्तराखंड के 13 वर्षों के जीवन में यहाँ के पहाड़ों के चरित्र और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की अवहेलना करते हुए यहाँ की सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों से पैसा कमाने को ही विकास का एकमात्र लक्ष्य बनाया. इसके लिये कमजोर पहाडि़यों पर भी बिना सोचे समझे सड़को, बाँधों, सुरंगों, पुलों एवं होटल- रिजॉर्टों का निर्माण किया गया. इससे जो पैसा उत्पन्न हुआ वह तो कुछ ही हाथों तक पहुँचा, लेकिन प्रकृति से छेड़छाड़ से हुई आपदाओं की मार व्यापक पर्वतीय समाज को झेलनी पड़ी.

‘‘इस वक्त जबकि सारा देश उत्तराखंड के कष्टों को महसूस कर रहा है, हमें विकास का यह रास्ता छोड़ना पड़ेगा. इससे पहले कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सिलसिला फिर से शुरू हो, हमें कुछ जरूरी निर्णय कर लेने चाहिये. सबसे पहले हमें यह मानना होगा कि उत्तराखंड का विकास मानव, सामाजिक एवं प्राकृतिक संपदा के विकास में ही निहित है. इसी से रोजगार एवं स्वावलंबी व टिकाऊ आर्थिक विकास के अवसर पैदा होंगे. यह तभी संभव है जब संविधान द्वारा 73वें-74वें संशोधन में निर्देशित विकेन्द्रित शासन व्यवस्था लागू हो और संविधान के अनुच्छेद ‘39 बीके अनुसार प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का स्वामित्व स्थापित हो. इस कदम से मौजूदा विकास की नीतियों से उत्पन्न हुआ पूँजी का केन्द्रीकरण रुकेगा और आर्थिक समानता का रास्ता खुलेगा.


‘‘फिलहाल प्रदेश भर में इस आपदा में हुई क्षति का जन सहभागिता से पूरी पारदर्शिता के साथ आँकलन कर त्वरित राहत पहुँचाना पहली प्राथमिकता है. जनजीवन के लिय आवश्यक सम्पर्क मार्ग, पेयजल लाइनें, नहरें, स्कूल, स्वास्थ्य सेवायें, विद्युतापूर्ति आदि पुनर्स्थापित की जायें. प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित आजीविका के स्रोतों के सष्जन हेतु ठोस कार्य योजना बनाई जाये.’’

इस वक्तव्य पर देश और प्रदेश के अधिकाधिक विशिष्ट व्यक्तियों तथा विशेषज्ञों की सहमति लेकर जन-जागरण किया जायेगा, ताकि उत्तराखंड ऐसी आपदाओं के दुष्चक्र से मुक्त होकर वास्तविक विकास के मार्ग पर आगे बढ़े.

Tuesday, June 25, 2013

गिद्ध के बहाने एक सवाल का उत्तर दीजिये


भारतीय गिद्ध के बारे में विकीपीडिया यह कहता है –

गिद्ध शिकारी पक्षियों के अंतर्गत आनेवाले मुर्दाखोर पक्षी हैं ... ये कत्थई और काले रंग के भारी कद के पक्षी हैं, जिनकी दृष्टि बहुत तेज होती है. शिकारी पक्षियों की तरह इनकी चोंच भी टेढ़ी और मजबूत होती है, लेकिन इनके पंजे और नाखून उनके जैसे तेज और मजबूत नहीं होते. ये झुंडों में रहने वाले मुर्दाखेर पक्षी हैं जिनसे कोई भी गंदी और घिनौनी चीज खाने से नहीं बचती ... ये किसी ऊँचे पेड़ पर अपना भद्दा सा घोंसला बनाते हैं ... भारत में गिद्ध की चार प्रजातियाँ पायी जाती हैं ...


-      उक्त विवरण की मदद से उत्तराखंड त्रासदी के परिप्रेक्ष्य में भारतीय गिद्धों की प्रजातियों के नाम बताइये.

Monday, June 24, 2013

बिल्डर लेकर आयेगा, अबके नई मशीन


दोहा विधा में सिद्धहस्त कवि नरेंद्र मौर्य की ताज़ा रचना (श्री असद ज़ैदी की फेसबुक वॉल से साभार) :

दुख में दोहे


-नरेंद्र मौर्य 

खेल ये कुदरत का नहीं, इंसानी करतूत
मोहना तेरे विकास का ये है असली रूप

पीटे ढोल विकास का, खोदे रोज़ पहाड़
क़ुदरत भी कितना सहे, तेरा ये खिलवाड़़

बड़ी मशीनें देखकर, रोये ख़ूब पहाड़
कैसे झेलेगा भला जब आयेगी बाढ़

खनन माफ़िया से हुआ सत्ता का गठजोड़
पैसा ख़ूब कमायेंगे, धरती का दिल तोड़

खण्ड-खण्ड बहता रहा हाय उत्तराखण्ड
मलबा बन गई ज़िन्दगी, रुका नहीं पाखण्ड

आपदा राहत कोष से, होंगे कई अमीर
जनता बिन राहत मरे, वे खायेंगे खीर

धरम करम के चोचले, दान पुण्य भी ख़ूब
भक्त बचे कैसे भला, ख़ूद भगवन गये डूब

गाँव बहे और हो गयी, ख़ाली यहाँ ज़मीन
बिल्डर लेकर आयेगा, अबके नई मशीन

Sunday, June 23, 2013

उत्तराखंड - आपदा या अपराध?


उत्तराखंड और हिमाचल की विध्वंसक बाढ़ और भू-स्खलन को प्राकृतिक आपदा ठहराना एक आपराधिक कर्म है. इसे राज्य-समर्थित नरसंहार की श्रेणी में उसी तरह गिना जाना चाहिए जिस तरह एकमत से आज अर्थशास्त्री और इतिहासकार बंगाल के अकाल और उन्नीसवीं सदी के दुर्भिक्षों को गिनते हैं, क्योंकि ये उस समय की औपनिवेशिक नीति, वितरण प्रणाली और खेती के विनाश का परिणाम थे. पहाड़ की ताज़ा विभीषिका भी इसी तरह नव-उदारवादी शासक वर्ग की 'विकास-नीति' की देन है -- पहाड़वासियों को और आकस्मिक रूप से वहाँ फँस गए बाक़ी भारतवासियों को.

ऐतिहासिक रूप से पहाड़ों के धार्मिक अर्थतंत्र और तीर्थाटन-व्यवस्था की परिकल्पना और स्थापना पहाड़ के लोगों ने नहीं, बल्कि दक्षिण भारत और उत्तर भारत के मैदानी इलाक़ों से आये पुरोहित वर्ग ने की थी. तमाम पीठ और स्थान उन्हीं के बनाए और बताए गए हैं. आज भी इस तंत्र और इससे जुड़े व्यवसायों पर पहाड़वासियों का कोई नियंत्रण नहीं है. वहाँ की जनता का छोटा सा हिस्सा ज़रूर इसमें अधीनस्थ भूमिका निभाता है और निचले चरण पर ही खड़ा पाया जाता है. इस सब से पहाड़ी अवाम के लौकिक और सेकुलर जीवन और आकांक्षाओं पर परदा पड़ जाता है, और उन्हें यह कहकर भरमाया जाता है कि वे 'देव-भूमि' के सौभाग्यशाली नागरिक हैं.


(असद ज़ैदी की फेसबुक वॉल से साभार)

Thursday, June 20, 2013

उत्तराखंड आपदा – कुमाऊँ की कोई रपट क्यों नहीं आ रही?



मेरे एक मित्र कुमाऊँ के सीमान्त पिथौरागढ़ के धारचूला शहर के नज़दीक बन रही एन एच पी सी की विराट जलविद्युत परियोजना में काम करते हैं. आजकल उनका परिवार गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने वहीं गया हुआ है.

धारचूला के आसपास के इलाके से मेरा बेहद पुराना और रागात्मक सम्बन्ध रहा है, सो जब वहां से बादल फटने वगैरह की छिटपुट ख़बरें आना शुरू हुईं तो मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था. परसों रात से लगातार अपने मित्र को फ़ोन लगाने की असफल कोशिशों के बाद अंततः आज उनसे बात हो सकी. धारचूला के इलाके में ऐसा अकल्पनीय विध्वंस हुआ है जिसकी सही सही खबर आने में अभी संभवतः वक्त लगेगा.  

फिलहाल मेरे मित्र ने जो बताया उसका सार इस तरह से है –

२०० मेगावाट से ज़्यादा क्षमता वाला एन एच पी सी की विराट जलविद्युत परियोजना का मुख्य प्लांट बुरी तरह ध्वस्त हो गया है और उसे कामचलाऊ स्थिति तक में लाने के लिए कम से कम छः माह लगेंगे.

सोबला समेत कुछेक गाँवों का कोई नाम-ओ-निशान नहीं बचा है.

धारचूला से जौलजीबी जाने वाली सड़क कुछ जगतों पर तीन सौ से चार सौ मीटर तक पूरी बह गयी है. काली नदी के इस तरफ भारतीय सीमा में धारचूला है तो दूसरी तरफ़ नेपाल का दार्चुला. नेपाल के इलाके में हुई हानि भयानक नज़र आ रही है.

एन एच पी सी की विराट जलविद्युत परियोजना में काम करने वाले इंजीनियरों वगैरह की कॉलोनी के चार ब्लॉक पूरी तरह बह गए. करोड़ों के जान माल का नुकसान हुआ है.

सबसे हैबतनाक हादसा छिपलाकेदार नामक स्थान के नज़दीक हुआ है जिसमें अचानक बादल फटने की कुछेक घटनाओं के कारण दो से तीन दर्जन लोगों की मौत की पुष्टि प्रत्यक्षदर्शी लगातार कर रहे हैं. ध्यान रहे, ऐतिहासिक त्रासदी के गवाह रही मालपा नामक जगह इसी इलाके के निचले हिस्सों में अवस्थित है और ऊंचाई पर के गाँवों की रिपोर्ट्स अभी आना बाकी हैं.

स्थानीय अखबारों तक में ढंग की रिपोर्टिंग नहीं हुई है, टीवी चैनलों की क्या बात की जाए. तमाम सड़कें टूटी हुई हैं, संचार की व्यवस्था ठप्प है  ... 

Wednesday, June 19, 2013

उत्तराखंड में आई आपदा - तय होनी चाहिए जवाबदेही भी


उत्तराखंड में आई आपदा के बहाने कुछ खरी-खरी

-पुरुषोत्तम शर्मा

उत्तराखंड में आई भयानक आपदा की पूरी तस्वीर अभी आनी बाकी है . अब तक जो भी तस्वीरें और रिपोर्ट सामने आ रही हैं वह चारधाम यात्रा स्थलों और मार्गों से जुड़ी हैं . जिन 75 हजार लोगों के फंसे होने और कुछ सौ के मरने या लापता होने की खबरें हैं वह भी तीर्थ यात्रियों से सम्बंधित एक अनुमान मात्र ही है . इस तबाही में स्थानीय लोगों व स्थानीय गाँवों का जो नुकसान हुआ है अब तक न तो उसकी सुध लेने का किसी को समय है और न ही राज्य सरकार के आपदा प्रबंध की योजना में ही ऐसा दिख रहा है . तबाही का मंजर बता रहा है कि मौतों का आंकड़ा हजारों में है. मगर हमारा कानून तो बरामद लाश को ही मृत मानता है . अब उस अलकनंदा , भागीरथी और गौरी के रौद्र रूप से कौन उन हजारों लाशों को खोज ला पाएगा ताकि हमारा कानून उन्हें मृत बता सके.
 
जरूर हमारी सेना और आई टी बी पी के जवान इस रेस्क्यू आपरेशन को जी जान से चला रहे हैं और उनकी प्राथमिकता रास्तों में फंसे यात्रियों का जीवन बचाना और रास्तों को खोलना है ताकि राहत दल और राहत सामग्री प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँच सके. मगर जितने बड़े पैमाने पर तबाही हुई है उसमें इस तरह से कई जगहों तक पहुँचने में महीनों लग सकते हैं, ऐसे में यात्रा मार्गों के साथ ही तबाह हुए दूरस्थ गावों तक तत्काल राशन, दवाएं, कपड़े और तिरपाल समय पर पहुचाने के लिए राहत में लगे हेलीकॉप्टरों की संख्या दो गुना से ज्यादा करनी चाहिए ताकि सेना जल्द से जल्द सभी पीड़ितों तक राहत व बचाव अभियान चला सके. यह जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि ज्यादातर जगहों पर लोग राशन व दवा के बिना जिन्दगी बचाने के लिए असहाय पड़े हैं.

इस आपदा को प्रकृति की मार कह कर हम अपनी राज्य सरकार की अपराधिक गैर जिम्मेदारियों पर पर्दा नहीं डाल सकते. मौसम विज्ञान की आधुनिक तकनीक के इस युग में हम पूर्वानुमान के आधार पर जानमाल के इतने बड़े नुकसानों को कम कर सकते हैं. इस बार तबाही से पूर्व ही मौसम विभाग ने पर्वतीय क्षेत्र में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने और मानसून के एक सप्ताह पूर्व ही पहुँचने की भविष्यवाणी कर दी थी. जाहिर है जब एक तरफ पश्चिमी विक्षोभ और दूसरी तरफ मानसून एक साथ सक्रिय है तो भारी बारिश या बादल फटने जैसी स्थिति का पैदा होना सामान्य बात है. ऐसे में एक दिन पूर्व ही चारधाम यात्रा को रोक देना और संवेदनशील स्थानों से लोगों को सुरक्षित जगहों तक लौट आने का अलर्ट जारी हो जाना चाहिए था. मगर ऐसा नहीं हुआ और हमेशा की तरह यह निर्लज्ज व जन हत्यारी सरकार और उसकी नौकरशाही आपदा की फसल काटने के लिए अब तत्पर दिख रहे हैं.
 
प्राकृतिक आपदा के प्रति उत्तराखंड राज्य सरकार कितनी संवेदनशील है इसके दो उदाहरण आपको बता दूँ. केन्द्र सरकार के मौसम विज्ञान विभाग ने मौसम की पूर्व जानकारियाँ एकत्र करने के लिए राज्य में दो रडार स्थापित करने के लिये मसूरी और नैनीताल में जमीन की मांग की थी मगर तीन साल से यह जमीन मौसम विज्ञान विभाग को नहीं मिली है. दूसरा उदाहरण सन् 2010 तक राज्य में आपदा से प्रभावित 243 गावों को विस्थापित कर पुनर्वास के लिए चुना गया था जिनकी संख्या सन् 2013 मार्च तक बढ़ कर 550 हो गई. मगर अब तक मात्र एक गाँव छातीखाल (रुद्रप्रयाग) का ही अधूरा पुनर्वास हुआ है. राज्य बनने के बाद सिर्फ जमीनों को ही खुर्दबुर्द कर रही उत्तराखंड की सरकारें विस्थापितों के पुनर्वास के लिए जमीन न मिलने का रोना रो रही हैं . जबकि इसी बीच यह सरकारें पूंजीपतियों , बिल्डरों , धार्मिक व सामाजिक संस्थाओंनौकरशाहों और नेताओं को राज्य की लगभग एक लाख हेक्टेयर बेशकीमती जमीन लुटा चुकी है.

पहाड़ में जितनी बड़ी बाढ़ आती है नदियाँ उतनी ही गहरी होती जाती हैं. इस बात की पुष्टि उन नदियों से की जा सकती है जहाँ अभी विद्युत परियोजना नहीं बनी हैं. आज अगर इस आपदा के बाद नदी किनारे आठ से दस फुट गाद या मलवा पट गया है तो यह सुरंग आधरित विद्युत परियोजनाओं द्वारा नियम विरुद्ध नदी में गिराए गए मलवे के कारण है. अपने अति मुनाफे के लिए उनके द्वारा किये गए इस अपराध से नदी किनारे हुई इस तबाही की कीमत इन विद्युत कंपनियों से वसूली जानी चहिये. पर्यटकों को प्रकृति के और करीब ले जाकर धन कमाने और इसके लिए नदियों, पहाड़ों, जंगलों व सड़कों को सत्ता के संरक्षण में कब्जाने की जो होड़ उत्तराखंड में मची है उसके बाद इन भवनों को नदी में समाते देखना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. सत्ता के संरक्षण में चल रहे इस गोरखधंधे से हो रहे इस जानमाल के नुकसान को रोकने की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. 

( लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव हैं.)

गोविन्दघाट का ताज़ा हाल-चाल - तस्वीरों की जुबानी

भाई इन्द्रेश मैखुरी की फेसबुक वॉल से साभार - 


प्राकृतिक आपदा के बाद गोविन्दघाट में फंसे यात्रियों का हाल-चाल जानने कामरेड अतुल सती,मैं और आइसा के साथी महादीप पंवार गए,जोशीमठ से लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोविन्दघाट पहुँचने में ही हमें दो-ढाई घंटे से अधिक समय लग गया.फ़ौज हेलिकोप्टर से आपदा में फंसे लोगों को लाती-ले जाती तो दिखी पर गोविन्दघाट में यात्री बेहद आक्रोशित हैं.विस्तृत रिपोर्ट अगले पोस्ट में लिखता हूँ.फोटो खुद ही तबाही का मंजर बयान कर रहे हैं.

















इस बार हिमालय में सुनामी - काम करने और जुट जाने का समय आया



सरकारी आपदा राहत विभाग कह रहा है कि उत्तराखंड के वृष्टि-प्रभावित इलाकों में सुनामी की सी स्थिति बन गई है. केदारनाथ से घटनास्थल की जो भी तस्वीरें आई हैं वे हैलीकॉप्टर से खींची गई हैं और बाकी की तस्वीरें उन असल जगहों से खासी दूर की हैं जहां प्रकृति ने अपना रौद्रतम रूप दिखलाया है – सुदूर दुर्गम गाँवों और रास्तों पर क्या हुआ, अभी तक किसी को सही सही नहीं मालूम. बमुश्किल शुरू हुए राहत कार्य में तमाम अड़चनें आ रही हैं, और हालात इतने बुरे हैं कि राहत कार्य में लगे जवानों तक की जिंदगी सुरक्षित नहीं. एक आम नागरिक की तरह मुझे भी उतना ही पता है जितना आप को.

धीरज धरे रहने और अच्छी ख़बरों के आने की उम्मीद लगाए रखने के सिवा हम फिलहाल कुछ भी कर सकने से लाचार हैं. सब के काम करने और जुट जाने का समय आया ही चाहता है.

Monday, October 1, 2012

और अब फौजी भाइयों के लिए ...


जब छोटा था तो बड़े भैया (ताउजी के लड़के) को अलग अलग दौर से गुजरते देखा | जहाँ एक तरफ उन्हें सैनिक फिल्म के "कितनी हसरत है हमें, तुमसे दिल लगाने की " गाते हुए देखा , साल दो साल बीतते न बीतते उन्हें "धरती हमरा गढ़वाल की" पे आते हुए भी देखा | कमोबेश यही हालत मामाओं की भी थी | जिसे मैं बेवकूफी और निम्न-जीवों के कार्यक्रम समझता था | थोड़ा बड़ा हुआ तो यह समझने लगा कि प्रवासी पक्षियों को कुछ कुछ दिनों में खुद (नराई , याद) का दौरा चढ़ने लगता है, जिससे में अछूता हूँ और रहूँगा | अभी बढती उम्र में ही हूँ , इसलिए कई सारी गलतियाँ करूँगा ये भी मुझे पता ही है | कई ऐसे लोगों और लेखों से प्रभावित होऊंगा जिन्हें एक वक़्त बीत जाने के बाद मैं सिरे से नकार भी सकता हूँ , फिर से अपना भी सकता हूँ | उन्हीं में से एक पर्यावरण का भी है | मैं भी बहुत कहता हूँ , पेड़ बचाओ , पेड़ बचाओ | कई रोज़ पहले इसे ही बड़ा मुद्दा समझता था | 

तीन चार साल से अनजान परदेस में रह कर अब कुछ और महसूस करता हूँ | ऐसा नहीं कि पुणे में मुझे कुछ तकलीफ है , और आपका महान देश विविधताओं से भरा हुआ किंतु एकता के सूत्र में बंधा नहीं है | और ऐसा तो बिलकुल नहीं कि मुझे इस शहर ने कभी दुत्कारा या भगाया हो | लेकिन दिल के किसी कोने में अब ये चीज शिद्दत से महसूस होने लगी है कि काश ये सब मेरे घर के पास होता | ऋषिकेश से भी कोई दस घंटे की थकान भी पहाड़ी यात्रा करने के बाद मेरा गाँव आता है(नाम की जरुरत नहीं पड़ेगी), और उसमें आते हैं वो लोग , जिनके पास नौकरी के नाम पे या तो पंडिताई करके एम पी और पंजाब हरियाणा भागने का सुअवसर होता था, या फिर फौज में भर्ती होने का | नौकरी के इस अभाव को हम लोग पंडिताई के आडम्बर से , और देशसेवा के छद्म उपमानों से ढकने की बेहद सफल कोशिश करते हैं | एक जगह फ़ालतू का पैसा है, दूजी जगह दारु बहुत है | सूरज अस्त, पहाड़ी मस्त | हम ठग लोग भोले भाले दुनिया वालों को बेवकूफ बनाकर, बिना मेहनत किये पैसा कमाते है | 

अभी हमारे पास एक और पेशा बहुतायत में आया है , होटल में जॉब करने का | बहुत आसान पैसा है | कहीं से होटल मैनेजमेंट का कोर्स करो, किसी सिफारिश से किसी तीन -चार -पाँच स्टार वाले होटल में लग जाओ (यह पूरी तरह सुनिश्चित है कि आपका कोई चचा मामा वहाँ पहले से होगा |) और विदेश जाने का रास्ता ढूंढो | पहाड़ बेहद तरक्की पर हैं , कई लोग विदेश में हैं | आजकल बाबा रामदेव के सौजन्य से योगा(योग नहीं प्लीज़) करके विदेशियों को जाकर सिखाने का  धंधा भी खूब चल निकला है | पुणे में बैठकर कभी अचानक कोई समाचार उत्तराखंड का हाथ लग जाता है तो पता चलता है कि सरकार ने ये बना दिया वो बना दिया | प्रदेश ऐसा कुछ हो गया कि मेरे वापस जाने पर शायद मुझे पता भी न चले कि मैं पहुँचा हूँ , या अभी कुछ और दूर है | लेकिन हफ्ते हफ्ते वही फ़ोन आते हैं, राजू चाइना गया, चंदू जापान गया, सीश्पाल ले गया अपने होटल में | अर बेटा त्वे कति मिलदी | 
  
[खूबसूरती का ठेका अकेले मेरे देश ने नहीं उठा रखा,
 केप ऑफ गुड होप , साउथ अफ्रीका ]
आज यह सब इसलिए याद नहीं कर रहा हूँ कि मुझे खुद लग रही है | न ही मुझे उत्तराखंड नवनिर्माण सेना में कोई दिलचस्पी है | बस ऐसे ही दिमाग में आ गया | हर जगह की अपनी स्पेशलटी है , अगर उत्तराखंड में आई टी कंपनीस आएँगी तो क्या बेंगलोर को देवभूमि ? लोग पेड़ बचाओ करते हैं, कहते हैं कि सब अच्छा होना चाहिए | बाँध बनने से नुक्सान हैं, जंगल में आग बहुत लग रही, पहाड़ से पलायन रुके, पर्यावरण बचाओ, अबे साला पर्यावरण बचाने का हमने ठेका ले रखा है क्या ? हमारे पास क्या सिर्फ पर्यावरण ही है क्या ? हम क्या खाएं | घर पर कुछ खाने को हैं नहीं , बाहर कुछ खाने जाओ तो उन्हें जरूरत नहीं | टूरिस्म बढाओ , अपने घर की बारे में बात करता हूँ तो अपने आप आवाज कुछ सीखे सिखाये गाइड जैसी हो जाती है | जहाँ मेरा कॉलेज है न पौड़ी में, वहाँ दिसंबर में बर्फ गिरती थी , आह बादल नीचे की तरफ दिखते थे , सिरीनगर की तरफ | और पहाड़ के टॉप पे हम | जाना है यार किसी दिन तुम लोगों के यहाँ , अभी इस गर्मियों में मम्मी पापा के साथ एक टूर ऋषिकेश , हरिद्वार का लगाने वाला हूँ मैं | ऐसा ही है न वो ? हरिद्वार कहीं से उत्तराखंड नहीं है लेकिन हाँ में गर्दन हिला देता हूँ मैं | उन लोगों को हरिद्वार की कोई जरूरत नहीं, और बाकी पहाड़ की तो बिलकुल नहीं | "अभी तक मराठी तो आही गयी होगी तुम्हें , मेरे ख़याल से अगर तुम कहीं रह रहे हो पाँच साल से ऊपर तो तुम्हें वहाँ की लेंगुएज आनी चाहिए |" और मुझे याद आता है कि मोबाइल में "धरती हमरा गढ़वाल की" मैंने बहुत दिन से सुना नहीं है |

(बहुत सारी बातें छूट गयी हैं , बेहतर है उन्हें छूटा ही रहने दिया जाए | और आइये अब फौजी भाइयों के लिए हमारे कार्यक्रम के तहत यह गाना ... )


Thursday, December 1, 2011

अन्ना के खंडूरी



जब से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने राज्य में लोकपाल विधेयक पास किया है वे अऩ्ना हज़ारे और उनके समर्थकों के दुलारे बने हुए हैं. इससे राज्य में भ्रष्टाचार के आरोपों से गले-गले तक डूबी भारतीय जनता पार्टी अन्ना के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव में फिर से जीतने का सपना देखने लगी है. खंडूरी का कहना है कि वे जल्द ही राज्य में एक बड़ी रैली करने जा रहे हैं जिसमें अन्ना ने भी शिरकत करने की सहमति दी है. लेकिन जिस लोकपाल के लिए अन्ना के सिपहसालार फूले नहीं समा रहे हैं शायद उसकी स्थापनाओं को उन्होंने अभी अच्छी तरह पढ़ा नहीं है या वे जानबूझकर बीजेपी के पक्ष में माहौल बना रहे हैं.

अन्ना हज़ारे और इंडिया अगेंस्ट करप्शन को इस बात का श्रेय ज़रूर दिया जाना चाहिए कि उन्होंने पूरे देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक माहौल बनाया है लेकिन उनकी ज़िद और एकांगी सोच की वजह से वे इस मर्ज की असली वजह पर कुछ भी सोचने के लिए तैयार नहीं हैं. यही वजह है कि 1 नवम्बर को उत्तराखंड की खंडूरी सरकार ने जैसे ही विधानसभा में उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक-2011 पास किया तो अऩ्ना को बीजेपी शासित उत्तराखंड एक आदर्श राज्य नज़र आने लगा और उसके नेता आदर्श जनप्रतिनिधि. जनता की भ्रष्टाचार विरोधी अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए किसी भी पार्टी ने इस विधेयक का विरोध करने की हिम्मत नहीं की. लेकिन सवाल उठाया जाना चाहिए कि जो अन्ना समूह केंद्र की कांग्रेस सरकार से प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाने पर आसमान सर पर उठाए हुए है. उत्तराखंड वाले अधिनियम में उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार को जांच के दायरे में लाने के लिए ऐसे क्या प्रावधान हैं कि वे बिना किसी झिझक के उसका समर्थन कर रहे हैं.

अधिनियम के अनुसार लोकपाल और उसके पांच सदस्यों की नियुक्ति सरकार की चयन समिति के सुझावों के बाद राज्यपाल करेगा. हमारे लोकतंत्र में कोई भी संस्था सत्ता के प्रभाव से कितनी अछूती रहती है यह बात जग ज़ाहिर है. इसलिए पूरा अधिनियम बहुत ही चालाकी से बनाया गया है. पहली नज़र में ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक भी इसके दायरे में है. लेकिन अधिनियम के अध्याय छह में साफ़ लिखा गया है कि लोकपाल के सभी सदस्यों और अध्यक्ष की आम सहमति के बिना इन उच्च पदस्थ लोगों पर कोई जांच और कार्रवाई नही की जा सकती. इसे आसानी से समझा जा सकता है कि लोकायुक्त और उसके सभी सहयोगियों का किसी मुद्दे पर एकमत होना कितना मुश्किल है, वो तब, जब सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ आरोप हों.

बीजेपी हमेशा भुवन चंद्र खंडूरी की छवि को ऐसे पेश करती है जैसे वे दूध के धुले हों. लेकिन उत्तराखंड की अधिकांश जनता उन्हें बीजेपी हाईकमान की तरफ़ से उन पर थोपा गया नेता मानती रही है. ज़िंदगी भर फ़ौज में अफ़सर रहे खंडूरी, दो हज़ार सात में बिना विधानसभा का चुनाव जीते ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनाए गए थे. तब बीजेपी हाई कमान ने पद के दूसरे महत्वपूर्ण दावेदार भगत सिंह कोश्यारी को किनारे लगा दिया था. राज्य की जनता और बीजेपी कार्यकर्ता इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पाए. मुख्यमंत्री बनने के बाद खंडूरी अपनी फ़ौजी अनुशासन की छवि को भुनाने में कामयाब रहे. कांग्रेस की नारायण दत्त तिवारी की अराजक सरकार के बाद खंडूरी राज्य के एक तबके में लोकप्रिय भी हुए लेकिन भीतरी और बाहरी असंषोष की वजह से दो हज़ार नौ में उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी. बहाना लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड से बीजेपी का सफ़ाया बना. खंडूरी काल में उनके चहेते आईएएस अफ़सर सारंगी पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आरोप लगे लेकिन खंडूरी लगातार उन्हें बचाते रहे. यहां तक की बाबा रामदेव ने भी खंडूरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस सब से तंग आकर बीजेपी हाई कमान ने रमेश पोखरियाल निशंक को उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री बना दिया. उनके शासन काल में उत्तराखंड भ्रष्टाचारियों का अड्डा बन गया. निशंक पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगे, जिस वजह से बीजेपी को भी लगा कि उनके नेतृत्व में अगला विधानसभा चुनाव लड़ा तो बीजेपी चंद सीटों में सिमट सकती है, इसीलिए चुनाव से ठीक पहले खंडूरी को मुख्यमंत्री बना दिया गया. इस सारी पृष्ठभूमि की अनदेखी करने वाले अन्नावादियों को लग रहा है कि खंड़ूरी उनकी मंशा का लोकपाल बनाने वाले पहले और स्वाभाविक नायक हैं.

गौरतलब है कि उत्तराखंड में भ्रष्टाचार का पर्याय माने जाने वाले निशंक भी अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थक रहे हैं. खंडूरी पर निशंक के ख़िलाफ़ कई घोटालों में सीबीआई जांच की सिफ़ारिश करने का दबाव है लेकिन वे लगातार इस बात को टालते जा रहे हैं. देश की जनता के लिए हैरान करने वाली बात यह है कि अऩ्ना के आदमी निशंक बचाने में लगातार जुटे रहे. उनके एक बेहद क़रीबी वकील शांतिभूषण, निशंक को बचाने एक विशेष विमान से नैनीताल हाईकोर्ट पहुंचे थे. निशंक स्टर्डिया भूमि घोटाले में बुरी तरफ फंसे हुए थे. तब शांति भूषण ने ही उन्हें मुसीबत से बचाया था. आख़िरकार कोर्ट ने निशंक को स्टर्डिया घोटाले में बरी कर दिया और सारा ठीकरा राज्य की नौकरशाही पर फोड़ दिया. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सख्त कानून की बात करने वाले अऩ्ना के सिपहसालार ही जब इस तरह भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एक मुख्यमंत्री को बचाने पहुंचते हैं तो इससे उनकी लड़ाई का खोखलापन भी ज़ाहिर होता है.

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को उम्मीद है कि अन्ना आंदोलन उसके लिए एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है. बीजेपी की राजनीति को समझने के बाद भी अन्ना समूह उसकी मंशा को पूरा करने में जुटा है. इसीलिए वो पांचों राज्यों में बीजेपी के समर्थन का माहौल बना रहा है. जन लोकपाल को भ्रष्टाचार मिटाने का जादुई हथियार मानने वाले ये लोग न सिर्फ़ भ्रष्टाचार की असली जड़ों की अनदेखी कर रहे हैं बल्कि वे इससे जुड़े नैतिक पहलुओं की भी अनदेखी कर रहे हैं. यही वजह है कि लोकलुभावन नारों के सहारे आंदोलन चला रहे इंडिया अंगेस्ट करप्शन के कर्ता-धर्ता सिर्फ़ कांग्रेस को ही भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. संस्थागत हो चुके भ्रष्टाचार की जड़ें उन्हें दिखाई नहीं देती हैं. फिलहाल भ्रष्टाचार के ख़िलाफ बोलना एक फ़ैशन बन गया है. अन्ना हज़ारे इस फ़ैशन के प्रतीक पुरुष हैं. इसे आगे बढ़ाने वाले भुवन चंद्र खंडूरी ख़ुद को मसीहा मान रहे हैं. कुल मिलाकर इस राजनीति में बीजेपी के हाथों में ही लड्डू दिखाई दे रहे हैं, जबकि वर्तमान हालात के लिए बीजेपी, कांग्रेस से किसी भी मामले में कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. अगर अऩ्नावादी बीजेपी को चुनाव जिताने में किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग करते हैं तो इससे कांग्रेस का यह आरोप भी सही साबित होगा कि वे बीजेपी के हाथ की कठपुतली मात्र हैं.

(कुछ अख़बारों के संपादकीय विभाग में काम करने वाले दोस्तों ने इसे न छाप पाने की मजबूरी दिखाई. उन्हें लगा कि नौकरी ख़तरे में पड़ जाएगी.)

(चित्र - विश्व के महानतम कार्टूनिस्ट माने जाने वाले गैरी लार्सन का कार्टून. लार्सन के कई कार्टून आप कबाड़खाने पर देख चुके हैं.)