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Thursday, September 1, 2011

उन्हीं को इब्तेदा कहिये, उन्हीं को इन्तेहा कहिये


बाबा नुसरत से सुनिये यह कम सुनी गई क़व्वाली - अर्श-ए-आज़म का दूल्हा बड़ी चीज़ है.



नुसरत फ़तेह अली ख़ान

Monday, July 11, 2011

आज का दिन शिव बटालवी के नाम - 4


माए नी माए मेरे गीतां दे नैणा विच बिरहा दी रड़क पवे...

गीत शिव बटालवी का, आवाज़ बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब की -

Wednesday, April 20, 2011

आज एक और रीपोस्ट


बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ान की ये बन्दिश एक बार पोस्ट भी कर चुका हूं.

तकरीबन आधे घन्टे लम्बी इस रचना को पूरा सुनिये फ़ुरसत में. मौज आएगी.



डाउनलोड यहां से कीजिये:

http://www.divshare.com/download/12217845-a3d

Saturday, October 16, 2010

नदियों पार रांझण दा ठाणा, कीत्ते कौल ज़रूरी जाणा



बाबा नुसरत से सुनिये पंजाबी लोक साहित्य से एक रचना - मन अटकेया बेपरवा दे नाल, उस दीन दुणी दे शाह दे नाल

Friday, October 15, 2010

किसे पड़ी है जो जा सुनाएं प्यारे पी को हमारी बतियां



अमीर ख़ुसरो की यह रचना मैंने अर्सा पहले छाया गांगुली की मख़मल आवाज़ में कभी कबाड़ख़ाना के सुनने-पढ़ने वालों के लिए प्रस्तुत की थी. आज उसी रचना को सुनिए उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान से. रचना के मूल पाठ के कई संस्करण उपलब्ध हैं. नीचे लिखे संस्करण को सबसे ज़्यादा प्रामाणिक माना जाता है. भावानुवाद ख़ाकसार ने किया है सो उसमें आई किसी भी तरह की त्रुटि के लिए मैं ज़िम्मेदार. नुसरत बाबा ने अपनी अद्वितीय शैली में रचना के बीच बीच में यहां-वहां से सूफ़ी साहित्य के जवाहरात जोड़े हैं:



ज़ेहाल-ए-मिस्किन मकुन तग़ाफ़ुल, दुराये नैना बनाए बतियां
कि ताब-ए-हिज्रां नदारम अय जां, न लेहो काहे लगाए छतियां

शबान-ए-हिज्रां दराज़ चो ज़ुल्फ़ वा रोज़-ए-वस्लस चो उम्र कोताह
सखी़ पिया को जो मैं ना देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां

चो शाम-ए-सोज़ां चो ज़र्रा हैरां हमेशा गिरियां ब इश्क़ आं माह
ना नींद नैनां ना अंग चैना ना आप ही आवें ना भेजें पतियां

यकायक अज़ दिल बज़िद परेबम बबुर्द-ए-चश्मश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाएं प्यारे पी को हमारी बतियां

बहक़-ए-रोज़-ए-विसाल-ए-दिलबर कि दाद मारा फ़रेब खुसरो
सपेत मन के वराए राखो जो जाए पाऊं पिया की छतियां


(आंखें फ़ेरकर और कहानियां बना कर यूं मेरे दर्द की अनदेखी न कर
अब बरदाश्त की ताब नहीं रही मेरी जान! क्यों मुझे सीने से नहीं लगा लेता

विरह की रात ज़ुल्फ़ की तरह लम्बी, और मिलन का दिन जीवन की तरह छोटा
मैं अपने प्यारे को न देख पाऊं तो कैसे कटे यह रात

मोमबत्ती की फड़फड़ाती लौ की तरह मैं इश्क़ की आग में हैरान-परेशान फ़िरता हूं
न मेरी आंखों में नींद है, न देह को आराम, न तू आता है न कोई तेरा पैगाम

अचानक हज़ारों तरकीबें सूझ गईं मेरी आंखों को और मेरे दिल का क़रार जाता रहा
किसे पड़ी है जो जा कर मेरे पिया को मेरी बातें सुना आये

अपने प्रिय से मिलन के दिन के सम्मान में, जिसने मुझे इतने दिनों तक बांधे रखा है ए ख़ुसरो
जब भी मुझे उसके करीब आने का फिर मौक़ा मिलेगा मैं अपने दिल को नियन्त्रण में रखे रहूंगा)

Tuesday, October 12, 2010

तुम एक गोरखधन्धा हो


नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहेब की एक अजबग़ज़ब रचना

Sunday, August 8, 2010

सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम


बाबा नुसरत फ़तेह अली ख़ान की ये बन्दिश पुरानी है. मैं एक बार पोस्ट भी कर चुका हूं मगर दोबारा लगाने में क्या हरज़ है!

तकरीबन आधे घन्टे लम्बी इस रचना को पूरा सुनिये फ़ुरसत में. मौज आएगी.



डाउनलोड यहां से कीजिये:

http://www.divshare.com/download/12217845-a3d

Thursday, May 20, 2010

तुरिया तुरिया जा फ़रीदा



उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब की आवाज़ में बाबा फ़रीद का एक सबद सुनिये