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Monday, December 15, 2014

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपदा जी से जोड़ सुनाई हो

इब्ने इंशा का कलाम. छाया गांगुली की आवाज़ –





फ़र्ज़ करो हम अह्ले वफ़ा होफ़र्ज़ करो दीवाने हों 
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हो अफ़साने हों 
फ़र्ज़ करो ये जी की विपताजी से जोड़ सुनाई हों 
फर्ज़ करो अभी और हो इतनीआधी हमने छुपाई हों 
फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूँढे हमने बहाने हों 
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों 
फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठाझूठी पीत हमारी हों 
फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में साँस भी हम पर भारी हों 
फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हों 
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हों

Friday, September 28, 2012

फ़ैज़ साहब


जिया मोहिउद्दीन सुना रहे हैं इब्ने इंशा जी की एक बेहद मज़ेदार रचना -

Friday, September 21, 2012

मसला बच्चों के नामों का


ज़िया मोहिउद्दीन सुना रहे हैं इब्ने इंशा की यह शानदार रचना - 

Tuesday, September 18, 2012

इक बार कहो तुम मेरी हो


इब्ने इंशा जी की एक और नज़्म पेश है. गायक हैं अहमद जहांज़ेब -



इक बार कहो तुम मेरी हो

हम घूम चुके बस्ती-बन में
इक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

Monday, September 17, 2012

जो तुमने कहा और फैज़ ने जो फरमाया है ... सब माया है


इब्ने इंशा जी की मशहूर रचना सलमान अल्वी की आवाज़ में. अल्वी साहब ने पूरी नज़्म नहीं गाई. मैं आपके वास्ते पूरी रचना यहाँ लगाए दे रहा हूँ -



सब माया है
सब माया है
सब ढलती फिरती छाया है

इस इश्क़ में हमने जो खोया जो पाया है
जो तुमने कहा और फैज़ ने जो फ़रमाया है

सब माया है

हाँ गाहे गाहे दीद के दौलत हाथ आए
या एक वो लज्जत नाम है जिस का रुसवाई

बस उसके सिवा तू जो भी सवाब कमाया है
सब माया है

इक नाम तू बाक़ी रहता है, गर जान नहीं
जब देख लिया इस सौदे में नुकसान नहीं

तब शमा पे देने जान पतंगा आया है
सब माया है

क्यूँ दर्द के नामे लिखते लिखते रात करूँ
जिस सात समंदर पार के नार की बात करूँ

उस नार से कोई एक ने धोका खाया है
सब माया है

मालूम हमें, कैस मियाँ का क़िस्सा भी
सब एक ही हैं, ये रांझा भी, ये इंशा भी

फरहाद भी, जो एक नहर सी खोद के लाया है
सब माया है

जिस गोरी पे हम एक ग़ज़ल हर शाम लिखें
तुम जानते हो - हम क्यूंकर उस का नाम लिखें


दिल उस की चौखट चूम के वापिस आया है
सब माया है

वो लड़की भी जो चाँद नगर की रानी थी
वो जिस के अल्हड़ आँखों में हैरानी थी

आ, उसने भी पैगाम यही भिजवाया है
सब माया है

जो लोग अभी तक नाम वफा का लेते हैं
वो जान के धोखे खातें , धोखे देतें है

हाँ , ठोक बजा के हमने हुकम लगाया है
सब माया है

जब देख लिया हर शख़्स यहाँ हरजाई है
इस शहर से दूर - एक कुटिया हम ने बनाई है

और उस कुटिया के माथे पर लिखवाया है
सब माया है

(चित्र- ख्यात चित्रकार रामकुमार की एक पेंटिंग)

Sunday, September 16, 2012

शे'र में 'नज़ीर' ठहरे, जोग में 'कबीर' ठहरे



इब्ने इंशा के दो कबित्त

(एक)

जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी
अभी न बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना.
पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है
पीत बुरा रोग भी है, लगे तो लगाओ ना.
गेसुओं की नागिनों से, बैरिनों अभागिनों से
जोगिनों बिरागिनों से, खेलती ही जाओ ना.
आशिकों का हाल पूछो, करो तो ख़याल- पूछो
एक-दो सवाल पूछो, बात जो बढ़ाओ ना.

(दो)

रात को उदास देखें, चांद को निरास देखें
तुम्हें न जो पास देखें, आओ पास आओ ना.
रूप-रंग मान दे दें, जी का ये मकान दे दें
कहो तुम्हें जान दे दें, मांग लो लजाओ ना.
और भी हज़ार होंगे, जो कि दावेदार होंगे
आप पे निसार होंगे, कभी आज़माओ ना.
शे'र में 'नज़ीर' ठहरे, जोग में 'कबीर' ठहरे
कोई ये फ़क़ीर ठहरे, और जी लगाओ ना.

Friday, September 14, 2012

गाफ़ गबरू है कि बाईस बहारों में पले – इब्ने इंशा का इंटरव्यू


इब्ने इंशा मेरे चुनिन्दा सर्वकालीन, सर्वप्रिय रचनाकारों में हैं. उनकी कई रचनाएं कबाड़खाने पर लगाई जाती रही हैं. आज इंशा जी के प्रशंसकों के वास्ते उनके एक दुर्लभ इंटरव्यू की रेकॉर्डिंग खोज कर लाया हूँ. आनंद लीजिए. बेहतरीन इंटरव्यू है. और क्या तो इंशा जी का अंदाज़-ए-बयाँ -

पहला हिस्सा - 



दूसरा हिस्सा -



Saturday, April 17, 2010

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता जी से जोड़ सुनाई हो

नज़्म इब्ने इंशा साहब की है, गा रही हैं छाया गांगुली




फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो

फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो

फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो

Thursday, May 14, 2009

इंशा जी के दो कबित (कबित्त)


पहला कबित्त

जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी,
अभी न बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना .
पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है,
पीत बुरा रोग भी है, लगे तो लगाओ ना .
गेसुओं की नागिनों से, बैरिनों अभागिनों से ,
जोगिनों बिरागिनों से, खेलती ही जाओ ना .
आशिकों का हाल पूछो, करो तो ख़याल- पूछो ,
एक-दो सवाल पूछो, बात जो बढ़ाओ ना .

दूसरा ( कबित्त)

रात को उदास देखें, चांद को निरास देखें ,
तुम्हें न जो पास देखें, आओ पास आओ ना .
रूप-रंग मान दे दें, जी का ये मकान दे दें ,
कहो तुम्हें जान दे दें, मांग लो लजाओ ना .
और भी हज़ार होंगे, जो कि दावेदार होंगे ,
आप पे निसार होंगे, कभी आज़माओ ना .
शे'र में 'नज़ीर' ठहरे, जोग में 'कबीर' ठहरे,
कोई ये फ़क़ीर ठहरे, और जी लगाओ ना .

शब्द : इब्ने इंशा
स्वर : नय्यरा नूर
चित्र जामिनी राय



Wednesday, May 6, 2009

जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा

जिन चीजों ने 'बरबाद' करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है उनमें से एक इब्ने इंशा (१९२७-१९७८) की शायरी भी है. इंशा खुद कहते हैं - 'एक जरा से किस्से को अब देते क्या हो तूल मियाँ ' इसलिए लिखत - पढ़त ज्यादा नहीं !

जब शायरी के पक्षी को संगीत के पंख मिल जायें तो क्या कहने ! आइए सुनते हैं इंशा साहब की एक कालजयी रचना - स्वर है आबिदा परवीन का -

कल चौदहवीं की रात थी, शब-भर रहा चर्चा तेरा.
कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

हम भी वहीं मौजूद थे, हमसे भी सब पूछा किये,
हम हँस दिये, हम चुप रहे, मंज़ूर था पर्दा तेरा।

इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटीं महफ़िलें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।

कूचे को तेरे छोड कर जोगी ही बन जायें मगर,
जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा।

बेदर्द सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा , रुस्वा तेरा, शाइर तेरा 'इंशा' तेरा।




(मन करे तो इंशा और आबिदा को यहाँ भी सुन सकते हैं. चाँद की तस्वीर इंटरनेट से, गूगल बाबा की जय )

Wednesday, December 3, 2008

जिस झोली में सौ छेद हुए

उस्ताद अमानत अली ख़ान सुना रहे हैं अपने अलग क़िस्म के अन्दाज़ में इब्न-ए-इंशा साहब की एक नज़्म.



इंशाजी उठो अब कूच करो,
इस शहर में जी का लगाना क्या
वहशी को सुकूं से क्या मतलब,
जोगी का नगर में ठिकाना क्या

इस दिल के दरीदा दामन में
देखो तो सही, सोचो तो सही
जिस झोली में सौ छेद हुए
उस झोली को फैलाना क्या

शब बीती चाँद भी डूब चला
ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े पे
क्यों देर गये घर आये हो
सजनी से करोगे बहाना क्या

जब शहर के लोग न रस्ता दें
क्यों बन में न जा बिसराम करें
दीवानों की सी न बात करे
तो और करे दीवाना क्या

इंशा साहब की एक और मशहूर नज़्म ग़ुलाम अली की आवाज़ में सुखनसाज़ पर :

ये बातें झूठी बातें हैं