फ़र्ज़ करो हम अह्ले वफ़ा हो, फ़र्ज़ करो दीवाने हों फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हो अफ़साने हों फ़र्ज़ करो ये जी की विपता, जी से जोड़ सुनाई हों फर्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हों फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूँढे हमने बहाने हों फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हों फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में साँस भी हम पर भारी हों फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हों फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हों
इब्ने इंशा जी की एक और नज़्म पेश है. गायक हैं अहमद जहांज़ेब -
इक बार कहो तुम मेरी हो
हम घूम चुके बस्ती-बन में
इक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी
अभी न बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना.
पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है
पीत बुरा रोग भी है, लगे तो लगाओ ना.
गेसुओं की नागिनों से, बैरिनों अभागिनों से
जोगिनों बिरागिनों से, खेलती ही जाओ ना.
आशिकों का हाल पूछो, करो तो ख़याल- पूछो
एक-दो सवाल पूछो, बात जो बढ़ाओ ना.
(दो)
रात को उदास देखें, चांद को निरास देखें
तुम्हें न जो पास देखें, आओ पास आओ ना.
रूप-रंग मान दे दें, जी का ये मकान दे दें
कहो तुम्हें जान दे दें, मांग लो लजाओ ना.
और भी हज़ार होंगे, जो कि दावेदार होंगे
आप पे निसार होंगे, कभी आज़माओ ना.
शे'र में 'नज़ीर' ठहरे, जोग में 'कबीर' ठहरे
कोई ये फ़क़ीर ठहरे, और जी लगाओ ना.
इब्ने इंशा मेरे चुनिन्दा सर्वकालीन, सर्वप्रिय रचनाकारों में हैं. उनकी कई रचनाएं कबाड़खाने पर लगाई जाती रही हैं. आज इंशा जी के प्रशंसकों के वास्ते उनके एक दुर्लभ इंटरव्यू की रेकॉर्डिंग खोज कर लाया हूँ. आनंद लीजिए. बेहतरीन इंटरव्यू है. और क्या तो इंशा जी का अंदाज़-ए-बयाँ -
जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी, अभी न बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना . पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है, पीत बुरा रोग भी है, लगे तो लगाओ ना . गेसुओं की नागिनों से, बैरिनों अभागिनों से , जोगिनों बिरागिनों से, खेलती ही जाओ ना . आशिकों का हाल पूछो, करो तो ख़याल- पूछो , एक-दो सवाल पूछो, बात जो बढ़ाओ ना .
दूसरा ( कबित्त)
रात को उदास देखें, चांद को निरास देखें , तुम्हें न जो पास देखें, आओ पास आओ ना . रूप-रंग मान दे दें, जी का ये मकान दे दें , कहो तुम्हें जान दे दें, मांग लो लजाओ ना . और भी हज़ार होंगे, जो कि दावेदार होंगे , आप पे निसार होंगे, कभी आज़माओ ना . शे'र में 'नज़ीर' ठहरे, जोग में 'कबीर' ठहरे, कोई ये फ़क़ीर ठहरे, और जी लगाओ ना .
शब्द : इब्ने इंशा स्वर : नय्यरा नूर चित्र जामिनी राय
जिन चीजों ने 'बरबाद' करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है उनमें से एक इब्ने इंशा (१९२७-१९७८) की शायरी भी है. इंशा खुद कहते हैं - 'एक जरा से किस्से को अब देते क्या हो तूल मियाँ ' इसलिए लिखत - पढ़त ज्यादा नहीं ! जब शायरी के पक्षी को संगीत के पंख मिल जायें तो क्या कहने ! आइए सुनते हैं इंशा साहब की एक कालजयी रचना - स्वर है आबिदा परवीन का -
कल चौदहवीं की रात थी, शब-भर रहा चर्चा तेरा. कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा।
हम भी वहीं मौजूद थे, हमसे भी सब पूछा किये, हम हँस दिये, हम चुप रहे, मंज़ूर था पर्दा तेरा।
इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटीं महफ़िलें, हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।
कूचे को तेरे छोड कर जोगी ही बन जायें मगर, जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा।
बेदर्द सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल, आशिक़ तेरा , रुस्वा तेरा, शाइर तेरा 'इंशा' तेरा।
(मन करे तो इंशा और आबिदा को यहाँ भी सुन सकते हैं. चाँद की तस्वीर इंटरनेट से, गूगल बाबा की जय )