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Wednesday, June 27, 2012

चलती का नाम गाली उर्फ़ झोल ही महान है

फ़िल्म का ख़ासा इंतज़ार करवाया था मीडिया ने. और जाहिर है शुरुआती रिव्यूज में इसे अतिमानवीय कारनामा बतलाते हुए निर्देशक महोदय को भूत-वर्तमान-भविष्य में देख लेने वाला बताया जा रहा था. कुछेक अभिनेताओं के काम को कालातीत बताया गया. मैंने इस फ़िल्म का ट्रेलर कुछ दिन पहले देखा था. उसमें इस कदर बेशुमार गालियाँ थीं कि इंतज़ार करने की कोई ज़रूरत ही नहीं बची थी. पिछले कुछ सालों में हिन्दी पट्टीवासियों को अपनी फ़िल्मों में माँ-बहन की गालियाँ सुनने की उत्तेजना झेलने की आदत पड़ चुकी है. बैंडिट क्वीन के समय तक यह ख़ासा एडवेंचरस लगता था कि कोई निर्देशक अपने देश की किसी अभिनेत्री को नंगा दिखा दे या उसके मुंह से पुरुषों वाली एक गाली निकलवा ले. पर इधर ऐसी अति हुई है कि गालियों पर आधारित गाने ही किसी फ़िल्म को हिट करवा दे रहे हैं. सैक्स के नाम पर ऐसी जुगुप्सा फैलाई गयी है कि हम छोटे शहरों के बाशिंदों के मुंह से न आह निकल सके न वाह न कराह. और हिंसा के ऐसे हैबतनाक चेहरे ... उफ़! क्या हिटलर का दमन-राज वर्तमान से बेहतर था जिसे कैसे-कैसे बड़े निर्देशकों ने अपनी कालजयी फिल्मों में दिखाया है?

इस तरह की फ़िल्मों का इंतज़ार आदतन नहीं रहता पर जब-तब रात-बेरात अपनी पसंद की किसी फ़िल्म को एक दफा और देखने के उपरान्त मुझे चोर दरवाजों से झाँकने की आदत से निजात अब तक नहीं मिली है. एक मित्र अंगम शाएजा ने अपनी फेसबुक दीवार पर लिखा - sad, waylaid, populist, hijacked, stretched, mixed up, confused ... poor director. जवाब में मुम्बई से एक और दोस्त जीवन गर्ब्याल ने लिखा - Overrated Director, ... makes khichdi of Quentin/Martin and tries to serve in Indian thali.... totally depends on marketing hype...( Typical Hansraj College guy and he is...) ... gets his way thru Censor board in the name of Cinematic freedom...

इसके बाद जब कल अनिल यादव ने इस फ़िल्म का रिव्यू जैसा अपनी फेसबुक दीवार पर किया तो “गैंग्स ऑफ वासेपुर" पर लिखी उनकी टिप्पणी को यहाँ लगाने का लालच हुआ. 


बड़ी मुश्किल से खुद को “गैंग्स आफ वासेपुर” का रिव्यू लिखने से रोक पा रहा हूं. अब औचित्य नहीं है. अनुराग कश्यप चलती का नाम गाड़ी हो चुके हैं. सितारेदार प्री-पेड रिव्यूज का पहाड़ लग चुका है. वे अब आराम से किसी भी दिशा में हाथ उठाकर कह सकते हैं- इतने सारे लोग बेवकूफ हैं क्या? फिर भी इतना कहूंगा कि दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कहानी का तियापांचा हो गया है. कहानी की खामोश ताकत से अनजान निर्देशक गालियों और गोलियों पर ही गदगद है.

मैं यह फिल्म देखने लखनऊ की एक दीवार पर लाल-काले फ्रेम की एक ‘वाल राइटिंग’ से प्रेरित होकर गया था जिसमें कहा गया था सीक्वेल का ट्रेलर देखना न भूलें, सो फिल्म खत्म होने के बाद भी बैठा रहा. लेकिन हाल तेजी से खाली होता जा रहा था, बिल्कुल खाली हो गया, जो अपने आप में एक प्रामाणिक प्रतिक्रिया थी. मल्टीप्लेक्स से बाहर निकलते हुए मैने पाया, सिर में कई ओर तेज ‘सेन्सेशन’ हो रहे हैं जो कुछ देर बाद दर्द के रूप में संगठित हो जाने वाले थे.

घर लौटकर मैं ध्यान में चला गया. जानना जरूरी था कि फिल्म की जैविक प्रतिक्रिया ऐसी नकारात्मक और तकलीफदेह क्यों है. फिल्म देखते हुए सांस कई बार उखड़ी थी, भीतर नए रसायन लीक हुए थे और दिमाग के कई हिस्से अनियंत्रित ढंग से उछल रहे थे. ऐसा उन आवाजों और कई दृश्यों के कारण था जो सीधे निर्मम जिन्दगी से अचानक आए थे. मसलन उस दाई की दयनीय आवाज जो नवजात सरदार खान को उसके बाप को सौंपते हुए एक सांस में कहती है- ...(मां का नाम भूल गया)...तो मू गई लेकिन बड़ा सुंदर लइका भयल है....कसाई टोले में लटकी भैंसों की ठठरियों के बीच एक आदमी का बोटियाया जाना जिसकी रान अधखुले दरवाजे से दिखाई दे रही है...रामाधीर सिंह का एक बच्चे को, उसी के बाप (जिसे अभी उसने कटवा दिया है) के खून का तिलक लगाते हुए कहना, तुम्हारे पिताजी बहुत बड़े आदमी थे. बमों के धमाके बीच एक बूढ़े का ढोलक बजाकर कराहना- ए मोमिनों दीन पर ईमान लाओ...कुएं पर बंगालिन का एक एंद्रिक एंठन में अपना मुंह बालों में छिपा लेना...अपनी मां को एक गैरमर्द के साथ अधनंगे देख लेने के बाद बच्चे फजल का गुमसुम हो जाना...सरदार खान का एक आदमी को अनौपचारिक निस्संगता से गोद कर मारना जैसे कोई गेहूं के बोरे में परखी चलाता हो... ‘बिना परमिशन’ हाथ छू लेने पर प्रेमिका द्वारा स्नब किए जाने पर फजल खान जैसे चंट गंजेड़ी का रो पड़ना आदि.

यह सब स्मृति के स्पेस में छितरा हुआ अलग-अलग दिशाओं में उड़ रहा था लेकिन उन्हें आपस में पिरोने वाला धागा गायब था. धांय धांय, गालियों, छिनारा, विहैवरियल डिटेल्स, लाइटिंग, एडिटिंग के उस पार देखने वालों को यह जरूर खटकेगा कि सरदार खान (लीड कैरेक्टर: मनोज बाजपेयी) की फिल्म में औकात क्या है. उसका दुश्मन रामाधीर सिंह कई कोयला खदानों का लीजहोल्डर है, बेटा विधायक है, खुद मंत्री है. सरदार खान का कुल तीन लोगों का गिरोह है. हत्या और संभोग उसके दो ही जुनून हैं. उसकी राजनीति, प्रशासन, जुडिशियरी, जेल में न कोई पैठ है न दिलचस्पी है. वह सभासद भी नहीं होना चाहता न अपने गैंग में से ही किसी को बनाना चाहता है. उसका कैरेक्टर बैलठ (मतिमंद) टाइप गुंडे से आगे नहीं विकसित हो पाया है जो यूपी बिहार में साल-सवा साल जिला हिलाते हैं फिर टपका दिए जाते हैं. होना तो यह चाहिए था कि रामाधीर सिंह उसे एक पुड़िया हिरोईन में गिरफ्तार कराता, फिर जिन्दगी भर जेल में सड़ाता. लेकिन यहां सरदार के बम, तमंचे और शिश्न के आगे सारा सिस्टम ही पनाह मांग गया है. यह बहुत बड़ा झोल है.

कहानी के साथ संगति न बैठने के कारण लगभग सारे गाने बेकार चले गए हैं. ‘बिहार के लाला’ सरदार खान के मरते वक्त बजता है. गोलियों से छलनी सरदार भ्रम, सदमे, प्रतिशोध और किसी तरह बच जाने की इच्छा के बीच मर रहा है. उस वक्त का जो म्यूजिक है वह बालगीतों सा मजाकिया है और गाने का भाव है कि बिहार के लाला नाच-गा कर लोगों का जी बहलाने के बाद अब विदा ले रहे हैं. इतने दार्शनिक भाव से एक अपराधी की मौत को देखने का जिगरा किसका है, अगर किसी का है तो वह पूरी फिल्म में कहीं दिखाई क्यों नहीं देता. ‘कह के लूंगा’ जैसे द्विअर्थी गाने की उपस्थिति इस बात का पुख्ता सबूत है कि अनुराग को माफिया जैसे पापुलर सब्जेक्ट के गुरुत्व और असर का अंदाजा कतई नहीं था. फ्लाप होने की असुरक्षा और एक दुर्निवार विकृत लालच के मारे निर्देशक फूहड़ गानों और संवादों से अच्छे सब्जेक्ट की संभावनाओं की हमेशा हत्या करते आए हैं. रचना के पब्लिक डोमेन में आने के बाद स्वतंत्र शक्ति बन जाने के नजरिए देखें तो शुरूआती गुबार थमने के बाद यह फिल्म अपने निर्देशक की कह के नहीं ‘कस के लेगी’ इसमें कोई दो राय नहीं है.

ध्यान में जरा और गहरे धंसने पर जब प्रतिक्रिया पैदा करने वाले सारे टुकड़े विलीन हो गए तो सांसें और उन्हें महसूस करती चेतना बचे रह गए. फिर भी खाली जगह में एक बड़ा सा क्यों कुलबुला रहा था. ऐसा निर्देशक जो कई बार कान्स हो आया है, देसी है, दर्शकों से जिसका सीधा संवाद है, जिसकी रचनात्मकता का डंका बजाया जा रहा है- वह ऐसी फिल्म क्यों बनाता है जो कोल माफिया पर है लेकिन उसमें खदान की जिन्दगी नहीं है. कोलियरी मजदूरों की बस्तियां भी नहीं है जिसका जिक्र पूरबिए अपने लोकगीतों में करते आए हैं. सीपिया टोन के दो फ्रेम और अखबारी कतरनों में उसे निपटा दिया गया जिसे समीक्षक गहन रिसर्च बता रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं है कि कई देशों के सिनेतीर्थों की मिट्टी लेकर भव्य मूरत तो गढ़ ली गई लेकिन भारतीय माफिया की आत्मा ने उसमें प्रवेश करने से इनकार कर दिया.

इस ‘क्यों’ पर ज्यादा दबाव के कारण स्मृति ने कहीं देखा हुआ एक कार्टून दिखाया जिसमें एक जड़ीला संपादक एक लेखिका से कह रहा है-“We loved all the words in your manuscript but we were wondering if you could maybe put them in a completely different order.”

कैसा संयोग... किसी और शहर में ठीक वही शो कथाकार और फिल्म समीक्षक दिनेश श्रीनेत भी देख रहे थे. थोड़ी देर बाद उनका एसएमएस आया- “ हर बेहतर फिल्म निजी जिंदगियों की कहानी कहती है और इस तरह से विस्तार लेती है कि वह कहानी निजी न होकर सार्वभौमिक हो जाती है- कोई बड़ा सत्य उद्घाटित करती है (उदाहरण- रोमान पोलांस्की की पियानिस्ट, स्पाइडरमैन, बैटमैन सिरीज़ या फिर सलीम-जावेद की लिखी अमिताभ की फिल्में) यहां उल्टा है, इतिहास से चलती हुई कहानी अंत तक पहुंचते-पहुंचते एक व्यक्ति की निजी जिंदगी के फंदे में झूल जाती है.”



Friday, December 30, 2011

एक कहानी जो मैं कहना नहीं चाहता

जापान में जन्मे अकिरा कुरोसावा (१९१०-१९९८  दुनिया के  बेहतरीन फिल्मकारों में से एक हैं | सेवेन समुराई, योजिम्बो, कगेमुषा, ड्रीम्स, राशोमोन, रैन उनकी कुछ ऐसी फिल्मों में से हैं जो आज भी देखने वालों पर न खत्म होने वाला प्रभाव छोड़ जाते हैं | हेइगो उनके बड़े भाई और मार्गदर्शक थे | १९३३ में हेइगो ने ख़ुदकुशी कर ली | पचास साल बाद अपनी आत्मकथा 'समथिंग लाइक एन आटोबायोग्राफी' में अकिरा ने इस घटना का जिक्र किया है |


Photo: Akira's persona and Van Gogh in Akira Kurosawa's Dreams

ऐसी कहानी सुनाने के बाद जो मुझे बुरा महसूस कराती हो, मुझे जारी रहना चाहिए और उस बारे में लिखना चाहिए जो मैं दुबारा नहीं देखना चाहूँगा | यह मेरे भाई की मृत्यु से सम्बंधित है | इसके बारे में लिखना मेरे लिए बेहद पीड़ादायी है , लेकिन अगर मैं इस बारे में चर्चा नहीं करूँगा, तो मैं आगे जारी नहीं  रख पाऊंगा | जिंदगी के स्याह पहलुओं की एक झलक देखने के बाद, मुझे अचानक अपने माता-पिता के घर जाने की जरूरत महसूस होने लगी | अब यह साफ़ हो गया था कि आगे से अब सारी विदेशी फ़िल्में बोलने वाली फिल्में होंगी , और उन्हें दिखाने वाले सिनेमाघरों ने एक सार्वभौमिक सा नियम बनाया कि उन्हें अब दृश्य का वर्णन करने वालों की कोई जरुरत नहीं रही | बड़ी संख्या में वर्णनकर्ता निकाले जाने लगे, और, इसे सुनकर, वे लोग हड़ताल पर चले गए | मेरा भाई, जो हड़तालियों का अगुआ बना था, काफी बुरे दौर से गुजर रहा था | मेरे लिए यह सही नहीं था कि लगातार अपने आप को उस पर थोपता रहूँ | मैं घर चला गया | मेरे माता-पिता , जो मेरी पिछली कुछ सालों की मेरी जिंदगी के बारे में कुछ नहीं जानते थे , उन्होंने मेरा स्वागत किया ऐसा जैसे मैं रेखाचित्रों के अध्ययन के लिए दूर गया था | मेरे पिता जैसे सब कुछ जानना चाहते थे कि मैं किस तरह की चित्रकला का अध्ययन कर रहा था , तो मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था इसके अलावा कि मैं सच के बारे में चुप ही रहूँ और जहाँ तक हो सके झूठ बोलूं | मेरे पिता की उम्मीदें मुझे एक कलाकार के रूप में देखना, यह देखकर मैंने दुबारा चित्रकार बनने की सोची | मैं दुबारा से रेखाचित्र बनाने लगा, मैं तैलचित्र बनाना चाहता था | लेकिन घर का खर्चा मेरी बड़ी बहन उठा रही थी, जिसने मोरिमुरा गकुएँ के एक अध्यापक से विवाह किया था | मैं उनसे रंग और कैनवस नहीं मांग सकता था | इसलिए मैंने रेखाचित्र बनाये |

इन सबके बीच, एक दिन हमने मेरे भाई के आत्महत्या की कोशिश के बारे में सुना | मुझे यकीन था कि इसकी वजह उसकी हडताली वर्णनकर्ताओं के मुखिया बनने की दर्दनाक स्थिति थी, जो असफल रही थी | मेरे भाई ने यह सोचकर इस्तीफा दे दिया था कि जब फिल्म तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि अब फिल्मों में आवाज भी शामिल की जाने लगी है, तो वर्णनकर्ताओं की जरूरत नहीं रह जायेगी | जबकि वह जानता था कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है, उसके लिए उनका अगुआ बनना बयान करने की हद से भी तकलीफदेह रहा होगा | मेरे भाई की अपनी जिंदगी की पीड़ा को एक बार में खत्म कर देने की कोशिश ने पूरे घर पर फिर से दुःख का ग्रहण ला दिया | मैं किसी भी तरह से कोई खुशी का बहाना ढूँढना चाहता था जिससे एकबारगी सबका ध्यान कहीं और जाए | तो मुझे एक विचार आया कि अपने भाई की शादी उस औरत से करवा दूँ जिसके साथ वह रह रहा था | मैं लगभग एक साल तक उसके जासूसी सा करता रहा, और उसके चरित्र में कुछ संदेहास्पद मुझे नहीं मिला , बल्कि मैं उससे ऐसे व्यवहार करने लगा जैसे वह वास्तव में मेरी भाभी ही हो | मुझे लगने लगा जैसे उनके रिश्ते को एक औपचारिक जामा पहनाने का काम मेरा नैसर्गिक भूमिका हो जो मुझे अदा करनी ही है | माँ, पिता तथा बड़ी बहन को इसमें कोई ऐतराज नहीं था | लेकिन अजीब बात यह थी कि मुझे अपने भाई से कोई सीधा सीधा जवाब नहीं मिला | मैंने उसके मौन को यह सोचकर स्वीकार कर लिया कि वह आजकल बेरोजगार है | तब एक दिन माँ ने मुझसे पूछा, "क्या हेइगो पूरी तरह से ठीक है |" "आपका क्या मतलब है ?" मैंने पूछा | तब उन्होंने अपना डर  बताया "क्या हेइगो हमेशा नहीं कहता था कि वह तीस साल पूरे करने से पहले ही मर जाएगा ?" जो भी उन्होंने कहा वह सच था | भाई हमेशा कहता था | वह दृढतापूर्वक कहता था कि जब लोग तीस साल पार कर लेते हैं , वे जो भी करते है वह बदसूरत और मतलबी होता है, इसलिए उसका वो सब करने का कोई इरादा नहीं है | वह रशियन साहित्य का बड़ा उपासक था, और मिखाइल आर्त्सीबशेव के दी लास्ट लाइन को दुनिया की सबसे बेहतरीन किताब का दर्जा देता था , और उसकी एक प्रति हमेशा अपने हाथो में रखता था | लेकिन नायक नौमोव के अजीब मृत्यु के धर्म के प्रति मेरे भाई का लगाव  मुझे हमेशा भावनाओं के अतिरेकता से ज्यादा कुछ नहीं लगता था | और यह बेशक उसकी अपनी मौत की इच्छा नहीं है | इसलिए जब मेरी माँ ने अपनी चिंता व्यक्त की तो मैंने इसे हंसकर उड़ा दिया, यह कहकर, "जो लोग मरने के बारे में बात करते है , नहीं मरते |" मैंने अपने भाई के शब्दों को हल्का कर दिया , लेकिन कुछ ही महीने बाद , मैंने माँ की आशंका को अपनी आखों के सामने घटते हुए देखा, मेरा भाई मर चुका था | और जैसा उसने वादा किया था , वह तीस साल पूरे होने से पहले ही मर गया था | सताईस साल की उम्र में उसने ख़ुदकुशी कर ली | ख़ुदकुशी से तीन दिन पहले उसने मुझे अपने साथ रात्रिभोज करने के लिए बुलाया था | लेकिन, काफी अजीब, मैं कितनी भी कोशिश करूँ, मुझे याद नहीं कहाँ | शायद उसकी मौत ने मुझपर गहरा सदमा छोड़ा था , हालाँकि मैं हमारे आखिरी बातचीत के एक एक वाक्य को पूरी स्पष्टता से याद करता हूँ , मुझे बिलकुल याद नहीं आता कि उसके पहले और उसके बाद क्या हुआ | हमने शिन ओकुबो स्टेशन पर एक दुसरे से विदा ली | हम एक टेक्सी में थे | जैसे मेरा भाई उतरा और ट्रेन स्टेशन की सीढियां चढ़ने लगा , उसने मुझसे कहा कि मैं घर तक के लिए गाडी ले लूँ | लेकिन जैसे ही गाडी दुबारा शुरू हुई, वह सीढ़ियों से वापस आया और उसने ड्राईवर को रुकने का इशारा किया | मैं गाडी से उतरा , उसकी तरफ बढ़ा  और , कहा , "क्या बात है ?" उसने  एक पल के लिए बहुत मुश्किल से मुझे देखा और तब कहा , "कुछ नहीं, तुम अब जाओ |" वह मुड़ा और सीढ़ियों से फिर ऊपर चढ़ने लगा | अगली बार जब मैंने उसे देखा तो वह खून सनी चादर से ढका हुआ था | इजू प्रायद्वीप के एक गर्म पानी के झरने के पास एक सराय के तनहा कमरे में उसने अपनी जान ले ली | कमरे के दरवाजे पर खड़ा मैंने अपने आप को हिलने में असमर्थ पाया | एक रिश्तेदार, जो शव की सुपुर्दगी के लिए मेरे और पिता के साथ आया था , ने मुझे गुस्से से घूरा और पूछा , "अकिरा, तुम  वहाँ  क्या कर रहे हो ?" मैं क्या कर रहा था ? मैं अपने मृत भाई को देख रहा था | मैं अपने मृत भाई के शव को देख रहा था , जिसके रगों में भी वही खून था जो मेरी रगों में है , और जिसने उसे अपने शरीर से बाहर बह जाने दिया था , और जिसे मैं सबसे ज्यादा मान देता था , और जिसकी जगह मेरी दुनिया में कोई नहीं ले सकता था | वह मर चुका था | मैं क्या कर रहा था ? लानत है मेरे ऊपर !
"अकिरा, जरा मेरी मदद करो ," मेरे पिता ने बहुत कोमलता से कहा | और तब, काफी मशक्कत के साथ, वह मेरे भाई के शव को एक चादर में लपेटने लगे | मेरे पिता के सांस फूलने और तनाव के दृश्य ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया , और किसी तरह से मैं कमरे में प्रवेश करने का हौसला जुटा सका | जब हमने मेरे भाई के शव को कार में रखा जिसे हम टोक्यो से हमारे साथ लाये थे , शव ने एक गहरी कराह ली | उसके पैर जो उसकी छाती से सट गए थे , जिसकी वजह से हवा उसके मुंह के रास्ते बाहर निकल आई थी | कार के ड्राईवर की कंपकंपी छूट गयी थी, लेकिन किसी तरह से वह शव को शमशान ले जा सका और उसे राख में बदल सका | वह पागलों की तरह वापस टोक्यो के लिए गाडी चलाता रहा , और बहुत सारे अजीब रास्तों से ले गया | मेरी बहादुर माँ ने मेरे भाई की ख़ुदकुशी के पूरे घटना को पूरे मौन के साथ, बिना एक आंसू बहाए सहन किया | जबकि मैं जानता था कि उसके दिल में मेरे लिए बिलकुल भी द्वेष नहीं है , मैं अपने आप को उसकी मौन यातना का जिम्मेदार मानने लगा | जब वह मेरे पास आई तो मैंने उससे अपने भाई के शब्दों को काफी हलके में लेने के लिए माफ़ी मांगनी चाही | लेकिन उसने इतना ही कहा , "अकिरा, तुम क्या कहना चाहते हो ?"  वह रिश्तेदार जिसने मुझसे पूछा था , "अकिरा, तुम वहाँ क्या कर रहे हो?" जब मैं अपने भाई के शव को देखकर स्तब्ध हो गया था, भी मुझे उतना नहीं डरा सका था, लेकिन मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाया जो कुछ भी मैंने अपनी माँ से कहा था | और इसका अंजाम मेरे भाई के लिए कितना खतरनाक हुआ था | मैं कितना बेवकूफ हूँ !


Saturday, April 11, 2009

...इस दुनिया को बस अब बदलना चाहिए

इतिहास और भूगोल कभी भी न तो मेरे पाठ्यक्रम में शामिल थे न मेरे पसंदीदा विषयों की सूची में, लेकिन अब मुझे लगता है कि ये दोनों महत्वपूर्ण विषय अगर मैंने पढे होते तो समाज के बारे में, दुनिया के बारे में मेरी समझ बहुत बेहतर होती। तब शायद अफगानिस्तान मेरे लिए पाकिस्तान की सीमा से लगा एक मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों वाला, अलकायदा को पनाह देने वाले एक मुसलिम देश के अलावा कुछ और भी होता। तब शायद मैं जान पाती कि वहां पारदर्शी पानी से भरी नदियां भी हैं और लहलहाते खेत भी थे। इतिहास मुझे बताता कि कैसे ताकतवर देश अपनी बादशाहत के लिए किसी दूसरे देश को बरबादी की किस हद तक ले जा सकते हैं। कट्ठरवादिता कैसे मासूम बच्चों को तालिबान बना देती है, मुजाहिदीन बना देती है, जिंदा बम बना देती है यह सब मुझे बेहतर तरह से मालूम हो पाता।


तब शायद मुझे यह बात समझनी ज़्यादा आसान लगती कि किसी भी देश में ज़्यादातर आम लोग होते हैं जो गिने-चुने लोगों की सियासतों के बीच जीते हैं। यह भी पता होता कि वहां कट्ठरपंथियों की दहशत तले भी लङकियां प्यार करती हैं, परिवार बनाती हैं। वहां भी लाल-लाल गालों वाले खूबसूरत बच्चे गलियों में वही खेल खेलते हैं जो सारी दुनिया के सारे बच्चे खेलना जानते हैं। शायद तब ये सोचना ज़्यादा स्वाभाविक लगता कि वहां भी बच्चे मां की आंख का तारा होते हैं और जब वो किसी और की लङाई कि ज़िहाद समझ कर लङते हुए जवान होने से पहले ही मर जाते हैं तो उस मां का दुख दुनियां में किसी भी मां के दुख जैसा होता है।


पिछले दिनों अफगानी लेखक खालिद हुसैनी की दूसरी किताब a Thousand splendid suns पढने के बाद मुझे शिद्धत से इस बात का अहसास हुआ कि अखबारी खबरों से किसी समाज को किसी खास छवि में बांध देना कितना गलत है। पेशे से डॉक्टर खालिद हुसैनी अफगानिस्तान में पैदा हुए और अस्सी के दशक में उनका परिवार शरणार्थी के रूप में अमेरिका जा बसा। दो-ढाई साल पहले उनकी पहली किताब the kite runner पढी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी। यह एक मर्मस्पर्शी कहानी है सत्तर के दशक में काबुल में रहने वाला १२ साल का बिन मां का आमिर अपने प्रभावशाली पिता की नजर में खुद को बहादुर साबित करना चाहता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर होने वाले पतंगबाजी मुकाबले को जीतना उसका लक्ष्य है। आमिर यह मुकाबला जीत जाता है लेकिन उसी दिन उसके खास दोस्त हसन के साथ हुआ हादसा उसे गहरी आत्मग्लानी से भर देता है। अपनी कमतरी को छिपाने के लिए वह हसन पर चोरी का आरोप लगा कर अपने अहाते में बने नौकरों वाले घर से निकलवा देता है। आगे चल कर दोनों की जिंदगियां क्या मोङ लेती हैं, वो है इस उपन्यास की कहानी। हालांकि आमिर और हसन दोनों में से कोई भी नायक नहीं है, इसका मुख्य पात्र है दिनों दिन बद से बदहाल होता अफगानिस्तान। बदलते राजनीतिक हालत किस तरह से आम आदमियों की जिंदगियों की दशा दिशा कैसे बदलते हैं, इसे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी के जरिए कहा गया है the kite runner में।

पिछले दिनों जब मैंने खालिद हुसैनी की a thousand splendid suns पढी तो ज्यादातर हिस्सा डबडबाई आंखों से ही पढा गया। ये बहुत उदास लेकिन बहुत खूबसूरती से लिखी गई किताब है। यहां भी कहानी का मुख्य पात्र अफगानिस्तान ही है। लेकिन यहां औरतों की दुनिया में झांका गया है। इस कहानी में एक मरियम है और एक लैला है। एक अमीर बाप की अवैध संतान है और एक तरक्कीपसंद पिता की लाङली। एक अपने पिता को शर्मिंदगी को छिपाने की मजबूरी में और दूसरी बम विस्फोट में परिवार को खो देने के बाद बने हालातों में एक ही आदमी की बीबी बनती हैं। 15 साल की मरियम से जब राशिद ने शादी की तो उसकी उम्र थी लगभग 45 साल और 27 साल बाद जब उसने दूसरी शादी की तो लैला की उम्र भी 15 ही साल थी। ये अफगानिस्तान की औरतों की बेबसी और उससे मुक्त होने की उनकी कोशिशों की कहानी है।

ये बिल्कुल संयोग ही था कि इस किताब के बाद मैंने जो फिल्म देखने के लिए चुनी वो थी पाकिस्तान के फिल्मकार सोएब मंसूर की 'खुदा के लिए' । संयोग इसलिए कि खालिद हुसैनी की दोनों किताबें और यह फिल्म एक सी नहीं तो काफी मिलती जुलती सी परिस्थितियों की कहानी कहती हैं । फिल्म 'खुदा के लिए' बहुत तर्कसंगत रूप से पाकिस्तान के बारे में आम आदमी की गलतफहमियों को दूर करती है। यह 9/11 के बाद पाकिस्तान के आम तरक्की पसंद मुसलमान की कशमकश को बयान करती एक बढिया फिल्म है । इस फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वो है जहां ब्रिटेन में रह रहा एक पाकिस्तानी अपने दीन की हिफाज़त के लिए बेटी मरियम को धोखे से पाकिस्तान ले जा कर उसे बिना बताए उसकी शादी कर अफगानिस्तान के एक गांव में छोङ आता है। यह एक रोंगटे खङे कर देने वाला दृश्य है। यह फिल्म इस्लाम के नाम पर फैले बहुत से भ्रमों को बहुत खूबसूरती के साथ दूर करती है।

एक खालिद की मरियम है जो कुरान के कुछ अक्षर बांच पाती है और जो दुनिया के बारे में बस उतना ही जानती है जितना बचपन में उसके पिता ने और शादी के बाद उसके पति ने बताया। सोएब मंसूर की मरियम इंग्लैंड में पली बङी आज़ाद खयाल लङकी है। लेकिन विडंबना देखिए कि दोनों के बाप उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी जबरन उनकी शादियां करवाते हैं। आखिर क्यों होता है औरतों के साथ ‌ऐसा हर कहीं?

ये दोनों किताबें और यह फिल्म काफी पहले आ चुके हैं लेकिन चूंकि मैंने ये अब पढीं और देखी और मन किया कि लिखूं सो लिख डाला। सो गर बात पुरानी लगे तो माफी के सिवा क्या?