इस बार छुट्टियों में घर पर हमेशा की तरह पुरानी अलमारियां टटोलते हुए एक किताब हाथ लगी.."आठवें दशक के सशक्त जनवादी कवि और प्रतिबद्ध कविताएँ' -सम्पादक स्वामी शरण स्वामी। (अगस्त 1982)अब चूंकि इधर कुछ दिनों से कबाड़खाना पर आकर कविताएँ पढ़ने लगा हूँ, इसलिए माँगकर किताब साथ दिल्ली ले आया। १५५ कवियों की कविताएँ हैं इसमें... कुछ नामी और कुछ जिन्हें नहीं जानता। वैसे इसमें समकालीन कविता पर एक लेख हैं उसे पढ़कर अच्छा नहीं लगा..(अपनी समझ कोई बहुत तगड़ी नहीं है लेकिन रघुवीर सहाय, धूमिल और कुंवर नारायण को एक झटके में रिजेक्ट कर देना हजम नहीं हुआ) लेकिन कुछ अच्छी कविताएँ इसमें मिली। अभी अभी राजेश जोशी जी की एक जबरदस्त कविता अनुनाद पर पढी थी, इसलिए कुछ उसी धरातल पर उनकी एक कविता इस संग्रह से लगा रहा हूँ...
बिजली सुधारने वाले
- राजेश जोशी
अक्सर झड़ी के दिनों में
जब सन्नाट पड़ती है बौछार
और अंधड़ चलते हैं
आपस में गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं
कई तार या कोई नंगा तार
बिजली के खम्बे पर पानी में भीगता
चिंगारियों में चटकता है
एक आग के फूल-सा झरता है
अचानक
उमड़ आयी अँधेरे की नदी में
मोहल्ले के मोहल्ले
घुप्प अँधेरे में डूब जाते हैं
वे आते हैं
बिजली सुधारने वाले
पानी से तरबतर टोप लगाए।
पुरानी बरसाती की दरारों और कालर
से रिसता पानी उन्हें अन्दर तक
भिगो चुका होता है।
भींगते-भागते वे आते हैं
अँधेरे की दीवार में
अपनी छोटी-सी टार्च से
छेद करते हुए।
वे आते हैं
हाथों पर रबर के दास्ताने चढ़ाए
साइकिल पर लटकाए एल्युमिनियम की
फोल्डिंग नसैनी लकड़ी की लम्बी छड़
और एक पुराने झोले में
तार,पेंचकस,टेस्टर
और जाने क्या-क्या भरे हुए-वे आते हैं
खम्बे पर टिकाते हैं
अपनी नसैनी को लंबा करते हुए
और चीनी मिट्टी के छोटे-छोटे कानों को
उमेठते एक-एक कर खींचते हैं
देखते हैं, परखते हैं
और फिर क़स देते हैं
किसी में एक पतला-सा तार
और एक बार फिर
जगमग हो जाती है
हर एक घर की आँख
वे अपनी नसैनी उतारते हैं
और बढ़ जाते हैं
अगले मोहल्ले की तरफ
अगले अंधेरों की ओर
अपनी सूची में दर्ज शिकायतों पर
निशान लगाते हुए....
(पुनश्च: जब 'नसैनी' जैसे शब्द, जो अपने मध्य-प्रदेशीय बचपन का एक हिस्सा है, को कविता में देखता हूँ, तो अनायास ही अपनी लगने लगती है, आश्चर्य है॥ :))