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Monday, October 8, 2012

मंटो के मीराजी – ५




(पिछली किस्त से आगे)


सख्त बारिश हो रही थी, जिसके बाईस बर्क़ी गाड़ियों की नकलों-हरकत का सिलसिला दरहम-बरहम हो गया था. खुश्क दिनहोने की वजह से शहर में शराब की दुकानें बंद थीं. मुज़ाफात में सिर्फ बांद्रा ही एक ऐसी जगह थी जहां से मुक़र्ररा दामों पर वह चीज़ मिल सकती थी. मीराजी मेरे साथ था. इसके अलावा मेरा पुराना लंगोटिया हसन अब्बास भी जो देहली से मेरे साथ चंद दिन गुज़ारने के लिए आया था. हम तीनों बांद्रा उतर गए और डेढ़ बोतल रम खरीद ली. वापस स्टेशन पर आए तो राजा मेंहदी अली खान मिल गया. मेरी बीवी लाहौर गयी हुई थी, इसलिए प्रोग्राम यह बना कि मीराजी और राजा रात मेरे ही हाँ रहेंगे.


एक बजे तक राम के दौर चलते रहे. बड़ी बोतल ख़त्म हो गयी. राजा के लिए दो पैग काफी थे. उनको ख़त्म करने के बाद वह एक कोने में बैठ गया और फ़िल्मी गीत लिखने की प्रैक्टिस करता रहा. मैं, हसन अब्बास और मीराजी पीते और फज़ूल-फ़ुज़ूल बातें करते रहे जिनका सर था न पैर. कर्फ्यू के बाईस बाज़ार सुनसान था. मैंने कहा अब सोना चाहिए. अब्बास और राजा ने मेरे इस फैसले पर साद किया. मीराजी न माना. अद्धे की मौजूदगी उसके इल्म में थी, इसलिए वह और पीना चाहता था. मालूम नहीं क्यों मैं और अब्बास जिद में आ गए और हमने वह अद्धा खोलने से इनकार कर दिया. मीराजी ने पहले मिन्नतें कीं फिर हुक्म देने लगा. मैं और अब्बास इंतिहा दर्जे के सिफ्ले हो गए. हमने उस से ऐसी बातें कीं कि उनकी याद से मुझे नदामत महसूस होती है. लड़-झगड़ कर हम दूसरे कमरे में चले गए.


मैं सुबहखेज़ हूँ. सबसे पहले उठा और साथ वाले कमरे में गया. मैंने रात को राजा से कह दिया था कि वह मीराजी के लिए स्ट्रेचर बिछा दे और ख़ुद सोफे पर सो जाए. राजा स्ट्रेचर में लबालब भरा था मगर सोफे पर मीराजी मौजूद नहीं था. मुझे सख्त हैरत हुई. गुसलखाने और बावर्चीखाने में देखा. वहां भी कोई नहीं था. मैंने सोचा शायद वह नाराजी की हालत में चला गया है. चुनांचे वाकियात मालूम करने के लिए मैंने राजा को जगाया. उसने बताया कि मीराजी मौजूद था. उसने ख़ुद उसे सोफे में लिटाया था. हम यह गुफ्तगू कर ही रहे थे कि मीराजी की आवाज़ आई : मैं यहाँ मौजूद हूँ.


वह फर्श पर राजा मेंहदी अली खान के स्ट्रेचर के नीचे लेटा हुआ था. स्ट्रेचर उठाकर उसको बाहर निकाला गया. रात की बात हम सबके दिल-ओ-दिमाग़ में औद कर आई लेकिन किसी ने उस पर तब्सिरा न किया. मीराजी ने मुझसे आठ आने लिए और भारी भरकम बरसाती उठाकर चला गया. मुझे उस पर बहुत तरस आया और अपने पर बहुत गुस्सा. चुनांचे मैंने दिल ही दिल में ख़ुद को बहुत लानत-मलामत की कि मैं रात को एक निकम्मी-सी बात पर उसको दुःख पहुँचाने का बाईस बना.


इसके बाद भी मीराजी मुझसे मिलता रहा. फिल्म इंडस्ट्री के हालात मुन्कलिब हो जाने के बाईस मेरा हाथ तंग हो गया था. अब मैं हर रोज़ मीराजी की शराब का खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकता था. मैंने उस से कभी इसका ज़िक्र नहीं किया लेकिन उसको इल्म हो गया था. चुनांचे एक दिन मुझे मालूम हुआ कि उसने शराब छोड़ने के क़स्द से भंग खानी शुरू कर दी है.


भंग से मुझे सख्त नफरत है. एक-दो बार इस्तेमाल करने से मैं उसके ज़िल्लत आफ़रीं नशे और उसके रद्द-ए-अमल का तज़रबा कर चुका हूँ. मैंने मीराजी से जब उसके बारे में गुफ्तगू की तो उसने कहा : नहीं ... मेरा ख़याल है यह नशा भी कोई बुरा नहीं. इसका अपना रंग है, अपनी कैफियत है, अपना मिजाज़ है.


उसने भंग के नशे की खुसूसियत पर एक लेक्चर-सा देना शुरू कर दिया अफ़सोस है कि मुझे पूरी तरह याद नहीं कि उसने क्या कहा था. उस वक़्त मैं अपने दफ्तर में था और आठ दिनके एक मुश्किल बाब की मंज़रनवीसी में मशगूल था मेरा दिमाग़ एक वक़्त में सिर्फ एक काम करने का आदी है वह बातें करता रहा और मैं मनाज़िर सोचने में मशगूल रहा.


भंग पीने के बाद दिमाग़ पर क्या गुजरती है, मुझे इसके मुताल्लिक सिर्फ इतना ही मालूम था कि गिर्द-ओ-पेश की चीज़ें या तो बहुत छोटी हो जाती हैं या बहुत बड़ी. आदमी हद से ज्यादा ज़कीउलहिस हो जाता है. कानों में ऐसा शोर मचता है जैसे उनमें लोहे के कारखाने खुल गए हैं. दरिया पानी की हलकी सी लकीर बन जाते हैं और पानी की हल्की सी लकीरें बहुत बड़े दरिया. आदमी हंसना शुरू करे तो हंसता ही जाता है, रोये तो रोते नहीं थकता.


मीराजी ने उस नशे की जो कैफियत बयान की वह मेरा ख़याल है इस से बहुत मुख्तलिफ थी. उसने मुझे उसके मुख्तलिफ मदारिज़ बताए थे. उस वक़्त जब कि वह भंग खाए हुए था, गालिबन लहरों की बात कर रहा था : लो वह कुछ गड़बड़ सी हुई ... कोई चीज़ इधर-उधर की चीज़ों से मिलकर ऊपर को उठी ... नीचे आ गयी ... फिर गड़बड़ सी हुई ... और आहिस्ता आहिस्ता आगे बढ़ने लगी ... दिमाग़ की नालियों में रेंगने लगी ... सरसराहट महसूस हो रही है ... पर बड़ी नर्म-नर्म ... पहले नून था ... पूरे ऐलान के साथ ... अब यह गुनने में तब्दील हो रहा है ... धीरे धीरे ... हौले-हौले ... जैसे बिल्ली गुदगुदे पंजों पर चल रही है ... ओह, जोर से मियाऊँ हुई ... लहर टूट गयी ... गायब हो गयी ...और वह चौंक पड़ता.


थोड़े वक्फे के बाद वह यही कैफियत नए सिरे से महसूस करता : लो अब फिर नून के ऐलान की तैयारियां होने लगीं ... गड़बड़ शुरू हो गयी है ... आसपास की चीज़ें यह ऐलान सुनने के लिए जमा हो रही हैं  ... कानाफूसियाँ हो रही  ... हो  ... ऐलान हो  ... नून ऊपर को उठा, आहिस्ता आहिस्ता नीचे को  ... फिर वही गड़बड़ ... वही  ... आसपास की चीज़ों के हुजूम में नून ने अंगड़ाई ली और रेंगने  ... गुन्ना खिंचकर लम्बा हो रहा है ... कोई उसे कूट रहा है, रुई के हथौड़ों से  ... ज़र्बें सुनाई नहीं देतीं, लेकिन उनका नन्हा मुन्ना पर से भी हल्का लम्स महसूस हो रहा  ... गूं, गूं, गूं  ... जैसे बच्चा मान का दूध पीते पीते सो रहा है  ...  ठहरो दूध का बुलबुला बन गया  ... लो वह फट भी  ...और वह फिर चौंक पड़ता.


मुझे याद है मैंने उस से कहा था कि वह अपने इस तज़रबे अपनी इस कैफियत को अशआर में मिनो-अन बयान करे. उसने वादा किया था. उसने उधर तवज्जोह दी या भूल गया.   


कुरेद कुरेद कर मैं किसी से पूछा नहीं करता. सरसरी गुफ्तगुओं के दौरान में मीराजी से मुख्तलिफ मौजुओं पर तबादला-ए-खयालात होता था, लेकिन उसकी जातियात कभी मारिज़-ए-गुफ्तगू में नहीं आई थीं -  एक मर्तबा मालूम नहीं, किस सिलसिले में उसकी इजाबत-ए-जिन्सी के ख़ास ज़रिये का ज़िक्र आ गया. उसने मुझे बताया इसके लिए अब मुझे खारिजी चीज़ों की मदद लेनी पड़ती है ... मिसाल के तौर पर ऐसी टांगें जिन पर से मैल उतारा जा रहा है ... खून में लिथड़ी हुई खामोशियाँ ...


 यह सुनकर मैंने महसूस किया था कि मीराजी की जलालत अब इस इन्तहा को पहुँच गयी है कि उसे खारिजी ज़राए की इमदाद तलब करनी पड़ गयी है अच्छा हुआ जो वह जल्दी मर गया क्योंकि उसकी ज़िन्दगी के खराबे में और ज्यादा खराब होने की गुंजाइश नहीं रही थी. अगर वह कुछ देर से मरता तो यकीनन उसकी मौत भी एक दर्दनाक इब्हाम बन जाती.


(समाप्त)

Sunday, October 7, 2012

मंटो के मीराजी – ४



(पिछली किस्त से आगे)

मैंने मीराजी से उसके कलाम के मुताल्लिक दो-तीन जुमलों से ज्यादा कभी गुफ्तगू नहीं की. मैं उसे बकवास कहा करता था और वह उसे तस्लीम करता था. उन तीन गोलों और मोटे-मोटे दानों की माला को मैं उसका फ्रॉड कहता था. इसे भी वह तस्लीम करता था हालांकि हम दोनों जानते थे कि ये चीज़ें फ्रॉड नहीं हैं.

एक दफा उसके हाथ में तीन के बजाय दो गोले देख कर मुझे बहुत ताज्जुब हुआ. जब इसका इज़हार किया तो मीराजी ने कहा : बरखुरदार का इंतकाल हो गया है ... मगर अपने वक़्त पर एक और पैदा हो जाएगा.

मैं जब तक बम्बई में रहा यह दूसरा बरखुरदार पैदा न हुआ. या तो अम्मा हव्वा अक़ीम हो गयी थीं या बाबा आदम मर्दनखेज़ नहीं रहे थे. यह रही-सही खारिजी तस्लीम भी टूट गयी थी. और यह बुरी फ़ाल थी. बाद में मुझे मालूम हुआ कि मीराजी को इसका अहसास था. चुनांचे जैसा कि सुनाने में आया है उसने उसके बाकी के दो अक़नूम भी अपने हाथ से अलहदा कर दिए थे.

मुझे मालूम नहीं मीराजी घूमता-घामता कब बंबई पहुंचा मैं उन दिनों फिल्मिस्तानमें था. जब वह मुझसे मिलने के लिए आया, बहुत खस्ता हालत में था. हाथ में तीन गोले बदस्तूर मौजूद थे. बेसीदा-सी कापी भी थी जिसमें गालिबन मीरा का कलाम उसने अपने हाथ से लिखा हुआ था. साथ ही एक अजीब शक्ल की बोतल थी जिसकी गर्दन मुडी हुई थी. इसमें मीराजी ने शराब दाल रखी थी. बवक्त-ए-तलब वह उसका काग खोलता और एक घूँट चढ़ा लेता था.

दाढ़ी गायब थी. सर के बाल बहुत हलके थे मगर बदन की गिलाज़त बदस्तूर मौजूद थी. एक पैर का चप्पल दुरुस्त हालत में मौजूद था दूसरा मरम्मत तलब था. यह कमी उसने पाँव पर रस्सी बांधकर दूर कर रखी थी. थोड़ी देर इधर-उधर की बातें हुईं. उन दिनों गालिबन आठ दिनकी शूटिंग हो रही थी. उसकी कहानी मेरी थी जिसके लिए दो-एक गानों की ज़रुरत थी. इस ख़याल से कि मीराजी को कुछ रूपये मिल जाएं, उस से यह गाने लिखने को कहा जो उसने वहीं बैठे बैठे लिख दिए, मगर खड़े-खड़े किस्म के, निहायत वाहियात जो यक्सर गैरफ़िल्मी थे. मैंने जब उसको अपना फ़ैसला सुनाया तो वह खामोश रहा. वापस जाते हुए उसने मुझ से साढ़े सात रूपये तलब किये कि उसे एक अद्धा लेना था.

इसके बाद बहुत देर तक उसको साढ़े सात रूपये देना मेरा फ़र्ज़ हो गया. मैं ख़ुद बोतल का रसिया था. यह मुंह न लगे तो ली पर क्या गुज़रती है इसका मुझे बखूबी इल्म था. इसी लिए मैं उस रकम का इंतजाम किये रखता. सात रुपये में राम का अद्धा आता था बाकी आठ आने उसके आने-जाने के लिए होते थे.

बारिशों का मौसम आया तो उसे बड़ी दिक्कत महसूस हुई. बंबई में इतनी शदीद बारिश होती है कि आदमी की हड्डियां तक भीग जाती हैं. उसके पास फालतू कपडे नहीं थे इसलिए यह मौसम उसके लिए और भी ज्यादा तकलीफदेह था. इत्तेफाक से मेरे पास एक बरसाती थी जो मेरा एक हट्टा-कट्टा फ़ौजी दोस्त सिर्फ इसलिए मेरे घर भूल गया था कि वह बहुत वजनी थी और उसके कंधे शल कर देती थी. मैंने उसका ज़िक्र मीराजी से किया और उसके वज़न से भी उसे आगाह कर दिया. मीराजी ने कहा : कोई परवा नहीं ... मेरे कंधे उसका बोझ बर्दाश्त कर लेंगे.चुनांचे मैंने वह बरसाती उसके हवाले कर दी जो सारी बरसातों उसके कन्धों पर रही.

मरहूम को समंदर से बहुत दिलचस्पी थी. मेरा एक दूर का रिश्तेदार अशरफ है. वह उन दिनों पायलट था. जुहू में समंदर के किनारे रहता था. वह मीराजी का दोस्त था. मालूम नहीं उनकी दोस्ती की नीना क्या थी क्योंकि अशरफ को शेर-ओ-शायरी से दूर का भी वास्ता नहीं है. बहरहाल मीराजी उसके हाँ रहता था और दिन को उसके हिसाब से पीता था.

अशरफ जब अपने झोंपड़े में नहीं होता था तो मीराजी साहिल की नर्म-नर्म और गीली-गीली रेत पर वह बरसाती बिछाकर लेट जाता और मुब्हम शेर-ए-फिक्र किया करता था.

उन दिनों हर इतवार को जुहू जाना और दिन भर पीना मेरा मामूल-सा हो गया था. दो तीन दोस्त इकट्ठे होकर सुबह निकल जाते और सारा दिन साहिल पर गुजारते. मीराजी वहीं मिल जाता. ऊटपटांग किस्म के मशागिल रहते. हमने इस दौरान में शायद ही कभी अदब के बारे में गुफ्तगू की हो. हम मर्दों और औरतों के तीन चौथाई नंगे जिस्म देखते थे, दही-बड़े और चाट खाते थे, नारियल के पानी के साथ शराब मिलाकर पीते थे और मीराजी को वहीं छोड़कर वापस घर चले आते थे.

अशरफ कुछ अरसे बाद मीराजी का बोझ महसूस करने लगा था. वह ख़ुद पीता था पर अपनी मुक़र्ररी हद से आगे नहीं बढ़ता था, लेकिन मीराजी के मुताल्लिक उसे शिकायत थी कि वह अपनी हद से गुज़रकर एक और हद कायम कर लेता है. जिसकी कोई हद नहीं होती बेहोश पड़ा है मगर और मांगे जा रहा है. अपनी इस तलब का दायरा बना लेता है और भूल जाता है कि यह कहाँ से शुरू हुई थी और इसे कहाँ ख़त्म होना था.

मुझे उसकी शराबनोशी के इस पहलू का इल्म न था लेकिन एक दिन इसका तजरिबा भी हो गया जिसको याद कर के मेरा दिल आज भी अफसुर्दा हो जाता है.    
  
(जारी. अगली किस्त में समाप्त.)    

Saturday, October 6, 2012

मंटो के मीराजी – ३





(पिछली किस्त से आगे)


किसी भी औरत से इश्क़ किया जाए तिगड्डा एक ही किस्म का बनता है.  हुस्न, इश्क़ और मौत. आशिक़, माशूक और वस्ल. मीरा से सनाउल्लाह का विसाल, जैसा कि जानने वालों को मालूम है, न हुआ या न हो सका. इस होने या न हो सकने का रद्द-ए-अमल मीराजी था. उसने मुआश्के में शिकस्त खा कर उस तसलीस के टुकड़ों को इस तरह जोड़ा था कि उनमें एक सालिमियत आ गयी थी, मगर असलियत मस्ख हो गयी थी. वह तीन नोकें जिनका रुख़ ख़त-ए-मुस्तक़ीम में एक दूसरे की तरफ होता है, दब गयी थीं. विसाल-ए-महबूब के लिए अब ये लाजिम नहीं था कि महबूब मौजूद हो. वह ख़ुद ही आशिक़ था, ख़ुद ही माशूक और ख़ुद ही विसाल.


मुझे मालूम नहीं उसने लोहे के ये गोले कहाँ से लिए थे. ख़ुद हासिल किए थे या उसे कहीं पड़े हुए मिल गए थे. मुझे याद है एक मर्तबा मैंने उनके मुताल्लिक बम्बई में उससे इस्तिफ़सार किया था तो उसने सरसरी तौर पर इतना कहा था : मैंने ये ख़ुद पैदा नहीं किए, अपने आप पैदा हो गए हैं.


फिर उसने उस गोले की तरफ इशारा किया जो सबसे बड़ा था : पहले यह वुजूद में आया था. इसके बाद यह दूसरा जो इस से छोटा है. इसके पीछे यह कोचक.


मैंने मुस्करा कर उस से कहा था : बड़े तो बाबा आदम अलैहस्सलाम हुए. ख़ुदा उनको वह जन्नत नसीब करे जिससे वह निकाले गए थे ... दूसरे को हम अम्मा हव्वा कह लेते हैं और तीसरे को उनकी औलाद.


मेरी इस बात पर मीराजी खूब खुल कर हंसा था मैं अब सोचता हूँ तो मुझे उन तीन गोलों पर सारी दुनिया घूमती नज़र आती है. तस्लीस क्या तख्लीक़ का दूसरा नाम नहीं? वह तमाम मुसल्लसें जो हमारी ज़िन्दगी का उकलीदीस हैं मौजूद हैं क्या उनमें इंसान की तख्लीक़ी कुव्वतों का निशान नहीं हैं?   


ख़ुदा, बेटा और रूहुलकुदूस : ईसाइयत के अक़ानीम त्रिशूल, महादेव का सह शाखा भला तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश : आसमान, ज़मीन और पाताल खुश्की, तरी और हवा तीन बुनियादी रंग : सुर्ख, नीला और ज़र्द. फिर हमारे रुसूम और मजहबी अहकाम यह तीजे, सोम और तलैडिया. वुज़ू में तीन मर्तबा हाथ मुंह धोने की शर्त. तीन तलाक़ें और सह गुना मुआनके. और जुए में नर्दबाज़ी के तीन पांसों के तीन नुक़ते यानी तीन काने. मौसीकी की तिय्ये हयात-ए-इंसानी के मलबे को अगर खोद कर देखा जाए तो मेरा ख्याल है ऐसी कई तस्सीसें मिल जाएंगी, इसलिए कि उसके तवालुद और तनासुल के अफ़ाल का महवर भी आज़ा-ए-सुलासा है.


उक़लीदिस में मुसल्लस बहुत अहम हैसियत रखती है. दूसरी अशकाल के मुकाबले में यह ऐसी कट्टर और बेलोच शक्ल है जिसे आप किसी और शक्ल में तब्दील नहीं कर सकते. लेकिन मीराजी ने अपने दिल-ओ-दिमाग और जिस्म में इस तिकोन को, जिसका ज़िक्र ऊपर हो चुका है, कुछ इस तरह दबाया कि उसके रुकन अपनी जगहों से हट गए, जिसका नतीज़ा यह हुआ कि आस-पास की दूसरी चीज़ें भी इस तिकोन के साथ मस्ख हो गईं और मीराजी की शायरी ज़हूर में आई.


पहली मुलाक़ात में ही उसकी-मेरी बेतकल्लुफी हो गयी थी. उसने मुझे दिल्ली में बताया था कि उसकी जिन्सी इजाबत आमतौर पर रेडियो स्टेशन के स्टूडियोज में होती है. जब वह कमरे खाली होते थे तो वह बड़े इत्मीनान से अपनी हाज़त रफा कर लिया करता था. उसकी वह जिन्सी जलालत ही, जहां तक मैं समझता हूँ, उसकी मुब्हम मंजूमात का बाईस है, वरना जैसा कि मैं पहले बयान कर चुका हूँ आम गुफ्तगू में वह बड़ा वाज़े दिमाग़ था. वह चाहता था कि जो कुछ उस पर बीती है अशआर में बयान हो जाए, मगर मुश्किल यह थी कि जो मुसीबत उस पर टूटी थी उसको उसने बड़े बेढंगे तरीके से जोड़कर अपनी निगाहों के सामने रखा था. उसको इसका इल्म था. इस ज़िम्न में वह अपनी बेचारगी अच्छी तरह महसूस करता था लेकिन आम आदमियों की तरह उसने अपनी इस कमजोरी को अपना ख़ास रंग बनाने की कोशिश की और आहिस्ता-आहिस्ता उस मीरा को भी अपनी गुमराही की सूली पर चढ़ा दिया.


बहैसियत शायर के उसकी हैसियत वही है जो सड़े-गले पत्तों की होती है, जिसे खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. मैं समझता हूँ उसका कलाम बड़ी उम्दा खाद है जिसकी इफ़ादियत एक न एक दिन ज़रूर ज़ाहिर हो के रहेगी.उसकी शायरी एक गुमराह इंसान का कलाम है जो इंसानियत की अमीक़ तरीन पस्तियों से मुताल्लिक होने के बावजूद दूसरे इंसानों के लिए ऊंची फिजाओं में मुर्ग़-ए-बाद नुमा का काम दे सकता है. उसका कलाम एक जिगसौ पज़ल है जिसके टुकड़े बड़े इत्मीनान और सुकून से देखने चाहिए.


बहैसियत इंसान वह बड़ा दिलचस्प था. परले दर्जे का मुख्लिस जिसे अपनी इस करीब-करीब नायाब सिफत का मुत्लक़न अहसास नहीं था मेरा जाती ख़याल है कि वह अशखास जो अपनी ख्वाहिशात-ए-जिस्मानी का फैसला अपने हाथों को सौंप देते हैं आमतौर पर इसी किस्म के मुख्लिस होते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि ख़ुद को सरीहन धोखा देते हैं, मगर इस फरेबदिही में जो ख़ुलूस होता है, वह ज़ाहिर है.


मीराजी ने शायरी की, बड़े ख़ुलूस के साथ. शराब पी बड़े ख़ुलूस के साथ. भंग पी वह भी बड़े ख़ुलूस के साथ. लोगों से दोस्ती की और उसे निभाया. अपनी ज़िन्दगी की एक अज़ीमतरीन ख्वाहिश को जुल देने के बाद वह किसी और से धोखा-फ़रेब करने का अहल नहीं रहा था. इस अहलियत के अखराज़ के बाद वह इस कद्र बेज़रर हो गया था कि बेमिस्रिफ सा मालूम होता था. एक भटका हुआ मुसाफिर जो नगरी नगरी फिर रहा है. मंजिलें क़दम क़दम पर अपनी आगोश उस के लिए वा करती हैं मगर वह उनकी तरफ देखे बगैर आगे निकलता जा रहा है, किसी ऐसी जगह जिसकी कोई संत है न रक़बा एक ऐसी तिकोन की जानिब जिसके अरकान अपनी जगह से हटकर तीन दायरों की शक्ल में उसके गिर्द घूम रहे हैं.


(जारी)    

Friday, October 5, 2012

मंटो के मीराजी - २



(पिछली किस्त से आगे)


क्या मीराजी उसी किस्म का दरवेश और राहिब था ...?” यह सवाल उस वक़्त और बाद में भी कई बार मेरे दिमाग में पैदा हुआ मैं अमृतसर में साईं घोड़ेशाह को देख चुका था जो अलिफ़ नंगा रहता था और कभी नहाता नहीं था. उसी तरह के और भी साईं और दरवेशमेरी नज़र से गुज़र चुके थे जो गिलाज़त के पुतले थे, मगर उनसे मुझे घिन आती थी. मीराजी की गिलाज़त से मुझे नफ़रत कभी नहीं हुई, उलझन अलबत्ता बहुत होती थी.

घोड़ेशाह के क़बील के साईं आमतौर पर बक़द्र-ए-तौफीक मुगल्लज़ातबकते हैं मगर मीराजी के मुंह से मैंने कभी कोई गलीज़ कलमा न सुना. इस किस्म के साईं बज़ाहिर मुज़र्रद मगर दरपर्दा हर किस्म के जिन्सी फ़ेल के मुर्तकिब होते हैं. मीराजी भी मुज़र्रद था. मगर उसने अपनी जिन्सी तस्कीन के लिए सिर्फ अपने दिल-ओ-दिमाग को अपना शरीक-ए-कार बना लिया था. इस लिहाज़ से गो उसमें और घोड़ेशाह के क़बील के साइयों के एक गुना मुमासलत थी, मगर वह उनसे बहुत मुख्तलिफ था. वह तीन गोले था, जिनको लुढकाने के लिए उसको किसी खारिजी मदद की ज़रुरत नहीं पड़ती थी. हाथ की ज़रा सी हरकत और तखैय्युल की हल्की सी जुम्बिश से वह उन तीन अजसाम को ऊंची से ऊंची बुलंदी और नीची से नीची गहराई की सैर करा सकता था और यह गुर उसको उन्हीं तीन गोलों ने बताया था जो गालिबन उसे कहीं पड़े हुए मिले थे. उन खारिजी इशारों ही ने उस पर एक अज़ली और अबदी हक़ीक़त को मुन्कशिफ़ किया था: हुस्न, इश्क़ और मौत इस तस्लीम के तमाम उक़लीदिसी ज़ाविये सिर्फ उन तीन गोलों की मदद से उस की समझ में आए थे.लेकिन हुस्न और इश्क़ के अंजाम को चूंकि उसने  शिकस्त खुर्दा ऐनक से देखा था, जिसके शीशों में तरेड़े थे, इस लिए उसको जिस शक्ल में उसने देखा था, सही नहीं था. यही वजह है कि उसके सारे वुजूद में एक नाकाबिल-ए-बयान इब्हाम का ज़हर फैल गया था जो एक नुक्ते से शुरू होकर एक दायरे में तब्दील हो गया था, इस तौर पर कि उसका हर नुक्ता उसका नुक्ता-ए-आगाज़ है और वही नुक्ता-ए-अंजाम. यही वजह है कि उसका इब्हाम नुकीला नहीं था. उसका रुख मौत की तरफ था ण कि ज़िन्दगी की तरफ. रजाइयत की सम्त न कुनूतियत की जानिब. उसने आगाज़ और अंजाम को अपनी मुठ्ठी में इस जोर से भींच रखा था कि उन दोनों का लहू निचुड़-निचुड़ कर उसमें से टपकता रहता था. लेकिन सादियत पसंदों की तरह वाज इस से मसरूर नज़र नहीं आता था. यहाँ फिर उसके जज़्बात गोल हो जाते , उन तीन आहनी गोलों की तरह जिनको मैंने पहली मर्तबा हसन बिल्डिंग के फ़्लैट नम्बर एक में देखा था.

उसके शेर का एक मिसरा है:

नगरी नगरी फिरा मुसाफिर घर का रस्ता भूल गया.

मुसाफिर को रस्ता भूलना ही था, इसलिए कि उसने चलते वक्त नुक्ता-ए-आगाज़ पर कोई निशान नहीं बनाया था. अपने बनाए हुए दायरे के ख़त के साथ साथ घूमता वह यकीनन कई बार उधर से गुज़रा मगर उसे याद न रहा कि उसने अपना यह तवील सफ़र कहाँ से शुरू किया था. और मैं तो समझता हूँ कि मीराजी यह भूल गया था कि वह मुसाफिर है, सफ़र है या रस्ता. यह तस्लीम भी उसके दिल-ओ-दिमाग के खलियों में दायरे की शक्ल इख्तियार कर गयी थी.
उसने एक लड़की मीरा से मोहब्बत की और वह सनाउल्लाह से मीराजी बन गया. उसी मीरा के नाम की रिआयत से उसने मीराबाई के कलाम को पसंद करना शुरू कर दिया. जब उसे अपनी महबूबा का जिस्म मयस्सर न हुआ तो उसने कूज़ागर की तरह चाक घुमाकर अपने तखैय्युल की मिट्टी से शुरू-शुरू में उसी शक्ल-ओ-सूरत के जिस्म तैयार करने शुरू कर दी लेकिन बाद में आहिस्ता आहिस्ता उस जिस्म की साख्त के तमाम मुज़ैयात, उसकी तमाम नुमायाँ खुसूसियतें तेज़ रफ़्तार चाक पर घूम घूम कर नित नई हैयत इख्तियार करती गईं, सुर एक ऐसा वक़्त आया कि मीराजी के हाथ उसके तखैय्युल की नर्म नर्म मिट्टी आयर चाक मुतवातिर गर्दिश से बिलकुल बिलकुल गोल हो गए. कोई भी टांग मीरा की टांग हो सकती थी. कोई भी चीथड़ा मीरा का पैरहन बन सकता था, कोई भी रहगुज़र मीरा की रहगुज़र में तब्दील हो सकती थी, और इन्तेहा यह हुई कि तखैय्युल की नर्म-नर्म मिट्टी की सौंधी-सौंधी बास सडांध बन गयी, और वह शक्ल देने से पहले ही उसे चाक से उतारने लगा.

पहले मीरा बुलंद बाम महलों में रहती थी. मीराजी ऐसा भटका कि रास्ता भूलकर उसने नीचे उतरना शुरू कर दिया. उसको इस गिरावट का मुतलक़न अहसास न था. इसलिए कि उतराई में हर कदम पर मीरा का तखैय्युल उसके साथ था, जो उसके जूतों के तलवों की तरह घिसता चला गया. पहले मीरा आम महबूबाओं की तरह बड़ी खूबसूरत थी लेकिन यह खूबसूरती हर निस्वानी पोशाक में मलबूस देख-देख कर कुछ इस तौर पर उसके दिल-ओ-दिमाग पर मस्ख हो गयी थी कि उसके सही तसव्वुर की अलमनाक जुदाई का भी मीराजी को अहसास न था. अगर अहसास होता तो इतने बड़े अलमिये के जुलूस के चंद गैर मुबहम निशानात उसके कलाम में मौजूद होते, जो मीरा से मोहब्बत करते ही उसके दिल-ओ-दिमाग से निकलना शुरू हो गए थे.

हुस्न, इश्क़ और मौत. यह तिकोन पिचक कर मीराजी के वजूद में गोल हो गयी थी. सिर्फ यही नहीं दुनिया की हर मुसल्लस उसके दिल-ओ-दिमाग में मुदव्वर हो गयी थी. यही वजह है कि उसके अरकान-ए-सुलासा कुछ इस कदर आपस में गडमड हो गए थे कि उनकी तरतीब दरहम बरहम हो गयी थी. कभी मौत पहले, हुस्न आखीरऔर इश्क़ दरम्यान में. कभी इश्क़ पहले, मौत उसके बाद और हुस्न आखीर में. और यह चक्कर ना महसूस तौर पर चलता रहता था.

(जारी)              
            

Thursday, October 4, 2012

मंटो के मीराजी -१




सआदत हसन मंटो के इस संस्मरण को मैं कभी भूल नहीं सका. उर्दू के जिन नामी शायर मीराजी की याद में लिखा गया यह संस्मरण आप के वास्ते पेश है, उनकी एक ग़ज़ल नगरी नगरी फिरा मुसाफिर घर का रस्ता भूल गया" को अपने अलबम हसीन लम्हेमें गुलाम अली ने गाया था.

तीन गोले

हसन बिल्डिंग के फ़्लैट नम्बर एक में तीन गोले मेरे सामने मेज़ पर पड़े थे. मैं गौर से उनकी तरफ देख रहा था और मीराजी की बातें सुन रहा था. इस शख्स को पहली बार मैंने यहीं देखा. गालिबन सन चालीस था. बंबे छोड़कर मुझे देहली आए कोई ज्यादा अरसा नहीं गुजरा था. मुझे याद नहीं कि वह फ़्लैट नम्बर एक वालों का दोस्त थे, या ऐसे ही चला आया था. लेकिन मुझे इतना याद है कि उसने यह कहा था कि उसको रेडियो स्टेशन से पता चला था कि मैं निकल्सन रोड पर हसन बिल्डिंग में रहता हूँ.

इस मुलाक़ात से क़ब्ल मेरे और उसके दरम्यान मामूली से ख़त-ओ-किताबत हो चुकी थी. मैं बंबई में था, जब उसने अदबी दुनियाके लिए मुझसे एक अफ़साना तलब किया था. मैंने उसकी ख्वाहिश के मुताबिक़ अफ़साना भेज दिया, लेकिन साथ ही यह भी लिख दिया कि उसका मुआवजा मुझे ज़रूर मिलना चाहिए. इसके जवाब में उसने एक ख़त लिखा: मैं अफ़साना वापस भेज रहा हूँ इसलिए कि अदबी दुनियाके मालिक मुफ्तखोर किस्म के आदमी हैं.” – अफ़साने का नाम मौसम की शरारतथा. इस पर उसने एतिराज़ किया था कि उस सरारत का मौजूं से कोई ताल्लुक नहीं, इसलिए उसे तब्दील कर दिया गया जाए. मैंने इसके जवाब में उसको लिखा: मौसम की शरारत ही इस अफसाने का मौजूं है. मुझे हैरत है यह तुम्हें क्यों नज़र न आई.मीराजी का दूसरा ख़त आया जिसमें उसने अपनी गलती तस्लीम कर ली और अपनी हैरत का इज़हार किया कि मौसम की शरारत में वह मौसम की शरारतमैं क्यों देख न सका.      

मीराजी की लिखाई बहुत साफ़ और वाज़े थी. मोटे ख़त के निब से निकले हुए बड़े सही निशस्त के हुरूफ़, तिकोन की सी आसानी से बने हुए, हर जोड़ नुमायाँ मैं इस से बहुत मुतास्सिर हुआ था. लेकिन अजीब बात यह है कि मुझ इस में मौलाना हामिद अली खान मुदीर हुमायूँकी खत्ताती की झलक नज़र आई. यह हल्की सी मगर काफी मरई मुमासलत-ओ-मुशाबहत अपने अन्दर क्या गहराई रखती है इसके मुताल्लिक मैं अब भी गौर करता हूँ तो मुझे कोई ऐसा शोशा या नुक्ता सुझाई नहीं देता जिस पर मैं किसी मुफूज़े की बुनियादें खड़ी कर सकूं.

हसन बिल्डिंग के फ़्लैट नंबर एक में तीन गोले मेरे सामने पड़े हुए थे और मीराजी लम-तड़ंगे और गोल-मटोल शेर कहने वाला शाइर मुझसे बड़े सही क़द-ओ-क़ामत और बड़ी सही नोक-पलक की बातें कर रहा था, जो मेरे अफसानों के मुताल्लिक थीं. वह तारीफ कर रहा था, न तन्कीस. एक मुख़्तसर सा तब्सिरा था एक सरसरी सी तनक़ीद थी मगर उस से पता चलता था कि मीराजी के दिमाग में मकड़ी के जाले नहीं. उसकी बातों में उलझाव नहीं था, और यह चीज़ मेरे लिए बाइस-इ-हैरत थी, इस लिए कि उसकी अक्सर नज्में इबहाम और उलझाव की वजह से हमेशा मेरी फहम से बालातर रही थीं. लेकिन शक्ल-ओ-सूरत और वज़ा-क़ता के एतिबार से वह बिलकुल ऐसा ही था, जैसा उसका बेकाफ़िया मुब्हम क़लाम.

नून मीम राशिद बेकाफ़िया शाइरी का इमाम माना जाता है. उसको देखने का इत्तिफ़ाक़ भी देहली में ही हुआ था. उसका क़लाम मेरी समझ में आ जाता था सुर उसको एक नज़र देखने से उसकी शक्ल-सूरत भी मेरी समझ में आ गयी थी. चुनांचे मैंने एक बार रेडियो स्टेशन के बरामदे में पड़ी हुई बगैर मडगार्डों की साइकिल देख कर उस से अज-राहे-मज़ाक कहा था लो, यह तुम हो और तुम्हारी शायरी.लेकिन मीराजी को देख कर मेरे जेहन में सिवाय उसकी मुब्हम नज्मों के और कोई सूरत नहीं बनती थी.

मेरे सामने मेज़ पर तीन गोले पड़े थे. तीन आहनी गोले, सिगरेट की पन्नियों में लिपटे हुए. दो बड़े एक छोटा मैंने मीराजी की तरफ देखा. उसकी आँखें चमक रही थीं और उनके ऊपर उसका बड़ा भूरे बालों से अटा हुआ सर यह भी तीन गोले थे. दो छोटे-छोटे और एक बड़ा. मैंने यह मुमासलत महसूस की तो उसका रद्द-ए-अमल मेरे होठों पर मुस्कराहट से नमूदार हुआ मीराजी दूसरे का रद्द-ए-अमल ताड़ने में बड़ा होशियार था. उसने फौरन ही अपनी शुरू की हुई अधूरी बात छोड़कर मुझ से पूछा क्यों भईया, किस बात पर मुस्कराए?”

मैंने मेज़ पर पड़े हुए उन तीन गोलों की तरफ इशारा किया. अब मीराजी की बारी थी. उस के पतले पतले होंठ महीन-महीन भूरी मूंछों के नीचे गोल-गोल अंदाज़ में मुस्कराए.

उसके गले में मोटे-मोटे गोल मनकों की माला थी जिसका सिर्फ बालाई हिस्सा कमीज़ के खुले हुए कालर से नज़र आता था मैंने सोचा : इस इंसान ने अपनी क्या हैबत-ए-कज़ाई बना रखी है लम्बे लम्बे गलीज़ बाल जो गर्दन से नीचे लटकते थे फ्रेंच कट सी दाढी, मैल से भरे हुए नाखून सर्दियों के दिन थे. ऐसा मालूम होता था महीनों से उसके बदन ने पानी की शकल नहीं देखी.

यह उस ज़माने की बात है जब शायर, अदीब और एडीटर आम तौर पर लांड्री में नंगे बैठ कर डबल रेट पर अपने कपड़े धुलवाया करते थे और बड़ी मैली कुचैली ज़िन्दगी बसर करते थे मैंने सोचा, शायर मीराजी भी उसी किस्म का शायर और एडीटर है लेकिन उसकी गिलाज़त उसके लम्बे बाल उसकी फ्रेंच कट दाढी गली की माला और वह तीन आहनी गोले, मआशी हालात के मजहर मालून नहीं होते थे. उनमें एक दरवेशानापण था, एक किस्म की राहिबयत जब मैंने राहिबयत के मुताल्लिक सोचा तो मेरा दिमाग रूस के दीवाने राहिब रास्पोटीन की तरफ चला गया. मैंने कहीं पढ़ा था कि वह बहुत गिलाज़त का उसको कोई अहसास ही नहीं था. उसके नाखूनों में भी हर वक़्त में भी हर वक़्त मैल भरा रहता था. खाना खाने के बाद उसकी उंगलियाँ लिथड़ी होती थी. जब उसे उनकी सफाई मतलूब होती तो वह उंगलियाँ पास बैठी शहजादियों और रईसज़ादियों की तरफ बढ़ा देता. जो उनकी तमाम आलूदगी अपनी ज़बान से चाट लेती थी.


(जारी)