भारतीय प्रेस परिषद एक बार फिर कागज़ी शेर साबित हुआ है. पेड न्यूज छापने वाले कॉर्पोरेट मीडिया के दबाव में अपनी ही कमेटी की रिपोर्ट पर पर्दा डाल दिया है. इस रिपोर्ट में चुनावों के दौरान नेताओं और राजनीतिक दलों से पैसा लेकर ख़बर छापने वाले प्रकाशनों के नाम गिनाये गए हैं और उनकी आलोचना की गई है.
ये बात तो पहले से ही जग ज़ाहिर थी कि प्रेस परिषद अपनी जांच में भले ही किसी मीडिया हाउस को दोषी पा ले, उसके पास उचित दंडात्मक कार्रवाई के अधिकार नहीं हैं. अब जिस तरह से पेड न्यूज़ वाली रिपोर्ट दबाई गई है उससे पता चलता है कि इस संस्था की आंतरिक संरचना ही कॉर्पोरेट हितों की रक्षा करने वाली है.
प्रेस परिषद ने पेड न्यूज़ पर हो-हल्ला मचने पर स्व प्रेरणा से जांच के लिए एक सब-कमेटी गठित की थी. इस कमेटी में वरिष्ठ पत्रकार प्रंजॉय गुहा ठकुरता और के श्रीनिवास रेड्डी शामिल थे. कड़ी मेहनत के बाद इस कमेटी ने पेड न्यूज़ से संबंधित इकहत्तर पृष्ठों की एक रिपोर्ट तैयार की थी. हाव करप्शन इन द इंडियन मीडिया अंडरमाइन्स डेमोक्रेसी (भारतीय मीडिया में भ्रष्टाचार और लोकतंत्र का क्षय) नाम से जैसे ही ये रिपोर्ट तैयार हुई प्रेस परिषद में बैठे मीडिया घरानों के प्रतिनिधियों में खलबली मच गई. उन्होंने इस रिपोर्ट को सामने न आने देने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया. आख़िरकार वे अपनी करतूत में सफ़ल रहे और इकहत्तर पृष्ठ की रिपोर्ट दबा दी गई. उसके बदले में तीस जुलाई को प्रेस परिषद ने सरकार को बारह पृष्ठों की एक संक्षिप्त रिपोर्ट सौंपी. जिसमें पेड न्यूज़ छापने वाले मीडिया घरानों का नाम नहीं छापा गया. पूरी रिपोर्ट का ज़िक्र सिर्फ़ फुटनोट में किया गया. उसमें बताया गया है कि वो रिपोर्ट प्रेस परिषद के पास सुरक्षित है. परिषद ने रिपोर्ट को अपनी वेब साइट पर भी नहीं डाला है. इस तरह रिपोर्ट क्यों नहीं सार्वजनिक की गई है इस बात को बड़ी चालाकी से छुपा लिया गया है.
प्रेस परिषद की संक्षिप्त रिपोर्ट में पहली बार पेड न्यूज़ को परिभाषित किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक़ कोई भी समाचार या विश्लेषण अगर पैसे या किसी और तरफ़दारी के बदले किसी भी मीडिया (इलेक्ट्रोनिक या प्रिंट) में जगह पाता है तो उसे पेड न्यूज़ की श्रेणी में रखा जाएगा. कोई बच्चा भी समझ सकता है कि सिर्फ़ परिभाषित करने से पेड न्यूज़ को नहीं रोका जा सकता है. जब तक इसके आर्थिक-राजनीतिक पहलुओं की सही पड़ताल नहीं की जाएगी तब तक इसे रोकना लगभग असंभव है. प्रंजॉय वाली रिपोर्ट में भले ही ऐसे सभी कारणों की पड़ताल न की गई हो लेकिन इसमें वर्तमान हालात पर कुछ ठोस सवाल ज़रूर उठाये गए हैं.
मूल रिपोर्ट में पाया गया है कि मीडिया घराने अपने आर्थिक स्वार्थों को ध्यान में रखकर संपादकीय विभाग को कमज़ोर बना रहे हैं, जिस वजह से पत्रकारों पर प्रबंधन के लोग हावी हो रहे हैं. रिपोर्ट में पत्रकारों के काम करने के हालात और काम की सुरक्षा की व्यवस्था करने के लिए भी ठोस कदम उठाने की बात कही गई है. सुझाव दिया गया कि पत्रकारों को ठेके पर रखने की प्रथा समाप्त हो और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को मज़बूत किया जाए. जिससे समाचारों के चयन और प्रस्तुतिकरण में आर्थिक पक्ष हावी न होने पाए. रिपोर्ट में माना गया है कि ऐसा करने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रतता और पत्रकारों की नौकरी की सुरक्षा की गारंटी हो पाएगी. सरकार को दी जाने वाली रिपोर्ट से ये बात भी ग़ायब कर दी गई है.
प्रंजॉय गुहा ठकुरता कहते हैं कि उन्हें आख़िर वक़्त तक भरोसा था कि मूल रिपोर्ट संक्षिप्त रिपोर्ट के साथ अनुलग्नक (एनेक्सचर) के तौर पर ज़रूर डाली जाएगी. लेकिन प्रकाशक लॉबी के दबाव की वजह से ऐसा नहीं हो पाया. वे अफ़सोस जताते हैं कि सरकारी पैसे से उन्होंने छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद रिपोर्ट तैयार की थी. उस रिपोर्ट के साथ प्रेस परिषद में इस तरह का मज़ाक होना जनता के साथ धोखा है.
पेड न्यूज़ की विस्तृत रिपोर्ट पर तीस जुलाई को परिषद के सभी सदस्यों की बैठक बुलाई गई थी. कुछ सदस्य इससे जानबूझ कर ग़ायब रहे तो कुछ कोई भी पक्ष लेने से बचते रहे. ऐसा करने वाले मुख्य लोगों में कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों से जुड़े नेता हैं. बहस के दौरान उस दिन तीस में से चौबीस सदस्य ही बैठक में पहुंचे. प्रेस परिषद के चेयरमैन जस्टिस जीएन रे चाहते हुए भी बैठक में विस्तृत रिपोर्ट को सार्वजनिक कराने पर सहमति नहीं बना पाए. हालांकि मीटिंग में हाथ खड़े कर सबने रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और न करने को लेकर अपनी राय दी. रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के पक्ष में सिर्फ़ नौ लोग थे. इनमें जस्टिस जीएन रे, प्रंजयॉय गुहा ठकुरता, कवि-पत्रकार विष्णु नागर, इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन के एसएन सिंहा, मातृभूमि के संवाददाता एमके अजीत कुमार, द हिंदू के जी प्रभाकरन, पीटीआई के वीएस चंद्रशेखर और असम ट्रीव्यून के कलवम बरूआ शामिल थे.
तटस्थ रहने वालों में लोकसभा में बीजेपी के सदस्य अनंत कुमार, प्रेस काउंसिल की सचिव विभा कुमार और राज्य सभा में बीजेपी सदस्य प्रकाश जावड़ेकर का नाम शामिल है. इतनी महत्वपूर्ण बैठक से जान-बूझकर अनुपस्थित रहने वालों में कांग्रेस के लोकसभा सदस्य विलास मुट्टेमवार, कांग्रेसी राज्य सभा सदस्य के केशव राव, राष्ट्रवादी कांग्रेस के लोकभा सदस्य संजय दीना पाटिल, बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के मिलन कुमार डे, साहित्य अकादमी के ललित मंगोत्रा और वर्किंग न्यूज़ कैमरा मैन असोसिएशन के जोगेंद्र चावला थे.
प्रकाशक लॉबी की तरफ़ से रिपोर्ट का विरोध करने वालों में बोम्बे समाचार के हरमुसजी सुसरवानजी कामा, फिल्मी दुनिया के विजय कुमार चोपड़ा, SaryuTat Se से सुमन गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार मिहिर गंगोपाध्याय, मुजफ्फ़रनगर बुलेटिन के संपादक उत्तम चंद्र शर्मा, जन मोर्चा के शीतला सिंह, एशियन डिफेंस न्यूज़ के योगेश चंद्र हालन, अमरावती मंडल के अनिल गुंजल किशोर अग्रवाल, जन्मभूमि प्रवासी वीकली के कुंदन रमन लाल व्यास, तेज़ वीकली के रमेश गुप्ता और अरुण प्रभा के सुशील झलानी शामिल थे. इन सभी की आपत्ति थी कि प्रकाशन संस्थान का नाम लेने की कोई ज़रूरत नहीं है. साथ ही ये लोग वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को लागू करने का भी विरोध कर रहे थे. यहां पर वे प्रेस काउंसिल के ज़िम्मेदार सदस्य के तौर पर बात करने की बजाय कॉर्पोरेट मीडिया के दलालों की भाषा में बात कर थे.
प्रेस परिषद की संरचना को देखें तो इनमें से ज़्यादातर लोग मीडिया घरानों के प्रभाव वाले ही होते हैं. हालांकि इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट का कोई पूर्व न्यायाधीश करता है और इसके बीस सदस्य प्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो इसमें बहुमत हमेशा मालिकों के पक्ष में झुका हुआ ही होता है. क्योंकि संपादक, समाचार पत्रों के मालिक और प्रबंधक मिलकर परिषद में जो बहुमत बनाते हैं उसमें श्रमजीवी पत्रकार और आम जनता की बात कहीं खो-सी जाती है. इसके अलावा इसमें संसद के दोनों सदनों से भी पांच सदस्य भी होते हैं. वर्तमान रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में ये पांचों सांसद पेड न्यूज़ की रिपोर्ट को सार्जनिक करने के पक्ष में कितने थे ये बात सामने आ चुकी है. कहने को साहित्य अकादमी, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया की तरफ़ से भी एक-एक सदस्य इसमें शामिल होता है लेकिन उनकी नियुक्ति भी अक्सर सरोकारों की वजह से कम संपर्कों की वजह से ही ज़्यादा होती है. इस लिहाज से अगर देखा जाय तो वर्तमान संरचना वाली प्रेस काउंसिल से बहुत ज़्यादा उम्मीद पालना मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने की तरह ही है.
पेड न्यूज़ पर विस्तृत रिपोर्ट को सार्वजनिक न किए जाने की बात सीपीएम सांसद बृंदा करात राज्य सभा में भी उठा चुकी हैं लेकिन उसका भी कोई ठोस असर होता नहीं दिखता. रिपोर्ट की कॉपी हालांकि हमारे पास है लेकिन इसे प्रेस परिषद की तरफ़ से आधिकारिक तौर पर जारी किया जाता तो इसका ज़्यादा न सही थोड़ा बहुत असर तो होता ही. इसे प्रेस परिषद की तरफ़ से उन मीडिया घरानों की आधिकारिक आलोचना माना जाता और सरकार की भी इस सिलसिले में कोई न कोई कदम उठाने के लिए ज़रूर सोचना पड़ता. ऐसा न होने के पीछे के कारण देखें तो लगता है कि कॉर्पोरेट का हमारी सामाजिक-राजनीतिक संस्थाओं में हस्तक्षेप कितना ज़्यादा बढ़ गया है. इस पूरे घटनाक्रम से ये बात बिल्कुल साफ़ हो जाती है कि हमेशा मुनाफ़े पर नज़र रखने वाले मीडिया घरानों को अगर इस तरह खुली छूट दी जाती रही तो आने वाले दिनों में भारतीय मीडिया अपने पतन के और ज़्यादा प्रतिमान गढ़ेगा.
(मूल रूप से समयांतर में प्रकाशित)
Wednesday, September 8, 2010
अल रबवेह - भाग एक
इन दिनों महमूद दरवेश से सम्बन्धित जो भी मिलत है उसे पढ़ता जाता हूं और जितना बन सके अनुवाद भी करता जाता हूं. दरवेश की आख़िरी दो ख़ासी लम्बी कविताओं के जॉन बर्जर और रेमा हम्मामी के द्वारा किए गए अनुवाद दो बरस पहले ’म्यूरल’ नाम से छपे हैं.
इस सत्तरेक पन्ने की किताब की भूमिका प्रस्तुत है - पाठकों को इस से इज़राइल और फ़िलिस्तीन के मौजूदा हालातों को समझ पाने में काफ़ी मदद मिलेगी
वहां से लौटने के बाद, जिसे हालिया समय तक, भविष्य का फ़िलिस्तीन राष्ट्र माना जा रहा था, और जो फ़िलहाल दुनिया का सबसे बड़ा क़ैदख़ाना (गाज़ा) और दुनिया का सबसे बड़ा वेटिंग रूम (पश्चिमी तट) है, मुझे एक सपना आया.
मैं अकेला था, कम्रर तक निर्वस्त्र, एक रेगिस्तान में आख़िरकार किसी दूसरे के हाथ ने ज़मीन से थोड़ी सी धूलभरी मिट्टी खोदकर निकाली और उसे मेरी छाती पर दे मारा. यह एक आक्रामक नहीं उदारतापूर्ण कृत्य था. मिट्टी और कंकड़ मुझे छूने से पहले कपड़े (सम्भवतः सूत) की फटी पट्टियों में तब्दील हो गए, जिन्होंने मेरे श्रोणिस्थल को चारों तरफ़ से लपेट लिया. उसके बाद ये फ़टी हुई चीथड़ा पट्टियां फिर से बदलीं और और शब्दों और वाक्यांशों में तब्दील हो गईं. इन्हें मैंने नहीं उस जगह ने निर्मित किया था. इस स्वप्न को याद करते हुए मेरे दिमाग में एक आविष्कृत शब्द चला आया - लैन्ड्स्वैप्ट. लैन्ड्स्वैप्ट एक ऐसी जगह या जगहों का वर्णन करता है जहां से सारी मूर्त-अमूर्त चीज़ें बुहार कर हटा दी गई हों, उड़ा दी गई हों, सब कुछ सिवा धरती के , जिसे छुआ जा सकता है.
**
रामल्ला के पश्चिमी बाहरी इलाक़े में एक छोटी सी पहाड़ी है - अल रबवेह. यह टोक्यो स्ट्रीट के आख़िरी छोर पर है. इस पहाड़ी की चोटी के नज़दीक कवि महमूद दरवेश दफ़्न हैं. यह कोई कब्रिस्तान नहीं है.
सड़क का नाम टोक्यो स्ट्रीट इस लिए है कि यह शहर के सांस्कृतिक केन्द्र को जाती है, जो कि पहाड़ी की तलहटी पर है और जिसे जापान की आर्थिक मदद की मेहरबानी से बनाया गया था.
दरवेश ने इसी सांस्कृतिक केन्द्र में आख़िरी बार अपनी कविताएं सुनाई थीं - हालांकि किसी को भी गुमान न था कि ऐसा आख़िरी बार हो रहा है. सन्ताप के क्षणों में "आख़िरी" शब्द का क्या मतलब हो सकता है?
हम उनकी कब्र देखने गए. एक पत्थर लगा दिया गया था. खुदी हुई धरती अब भी नंगी थी. शोकाकुल लोगों ने वहां हरे गेहूं की बालियां चढ़ा रखी थीं - जैसी उन्होंने अपनी एक कविता में इच्छा ज़ाहिर की थी - वहां लाल एनीमोन के फूल थे, कागज़ के टुकड़े और फ़ोटोग्राफ़.
वे चाहते थे उन्हें गैलिली में दफ़नाया जाए जहां वे जन्मे थे और जहां उनकी माता अब भी रहती हैं, लेकिन इज़राइलियों ने इसकी इजाज़त नहीं दी.
***
उनके अन्तिम संस्कार के समय यहां अल रबवेह में दसियों हज़ार लोग इकठठा हुए थे. छियानवे साल की उनकी माता ने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा "वह आप सब का बेटा है."
(जारी)
इस सत्तरेक पन्ने की किताब की भूमिका प्रस्तुत है - पाठकों को इस से इज़राइल और फ़िलिस्तीन के मौजूदा हालातों को समझ पाने में काफ़ी मदद मिलेगी
वहां से लौटने के बाद, जिसे हालिया समय तक, भविष्य का फ़िलिस्तीन राष्ट्र माना जा रहा था, और जो फ़िलहाल दुनिया का सबसे बड़ा क़ैदख़ाना (गाज़ा) और दुनिया का सबसे बड़ा वेटिंग रूम (पश्चिमी तट) है, मुझे एक सपना आया.
मैं अकेला था, कम्रर तक निर्वस्त्र, एक रेगिस्तान में आख़िरकार किसी दूसरे के हाथ ने ज़मीन से थोड़ी सी धूलभरी मिट्टी खोदकर निकाली और उसे मेरी छाती पर दे मारा. यह एक आक्रामक नहीं उदारतापूर्ण कृत्य था. मिट्टी और कंकड़ मुझे छूने से पहले कपड़े (सम्भवतः सूत) की फटी पट्टियों में तब्दील हो गए, जिन्होंने मेरे श्रोणिस्थल को चारों तरफ़ से लपेट लिया. उसके बाद ये फ़टी हुई चीथड़ा पट्टियां फिर से बदलीं और और शब्दों और वाक्यांशों में तब्दील हो गईं. इन्हें मैंने नहीं उस जगह ने निर्मित किया था. इस स्वप्न को याद करते हुए मेरे दिमाग में एक आविष्कृत शब्द चला आया - लैन्ड्स्वैप्ट. लैन्ड्स्वैप्ट एक ऐसी जगह या जगहों का वर्णन करता है जहां से सारी मूर्त-अमूर्त चीज़ें बुहार कर हटा दी गई हों, उड़ा दी गई हों, सब कुछ सिवा धरती के , जिसे छुआ जा सकता है.
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रामल्ला के पश्चिमी बाहरी इलाक़े में एक छोटी सी पहाड़ी है - अल रबवेह. यह टोक्यो स्ट्रीट के आख़िरी छोर पर है. इस पहाड़ी की चोटी के नज़दीक कवि महमूद दरवेश दफ़्न हैं. यह कोई कब्रिस्तान नहीं है.
सड़क का नाम टोक्यो स्ट्रीट इस लिए है कि यह शहर के सांस्कृतिक केन्द्र को जाती है, जो कि पहाड़ी की तलहटी पर है और जिसे जापान की आर्थिक मदद की मेहरबानी से बनाया गया था.
दरवेश ने इसी सांस्कृतिक केन्द्र में आख़िरी बार अपनी कविताएं सुनाई थीं - हालांकि किसी को भी गुमान न था कि ऐसा आख़िरी बार हो रहा है. सन्ताप के क्षणों में "आख़िरी" शब्द का क्या मतलब हो सकता है?
हम उनकी कब्र देखने गए. एक पत्थर लगा दिया गया था. खुदी हुई धरती अब भी नंगी थी. शोकाकुल लोगों ने वहां हरे गेहूं की बालियां चढ़ा रखी थीं - जैसी उन्होंने अपनी एक कविता में इच्छा ज़ाहिर की थी - वहां लाल एनीमोन के फूल थे, कागज़ के टुकड़े और फ़ोटोग्राफ़.
वे चाहते थे उन्हें गैलिली में दफ़नाया जाए जहां वे जन्मे थे और जहां उनकी माता अब भी रहती हैं, लेकिन इज़राइलियों ने इसकी इजाज़त नहीं दी.
***
उनके अन्तिम संस्कार के समय यहां अल रबवेह में दसियों हज़ार लोग इकठठा हुए थे. छियानवे साल की उनकी माता ने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा "वह आप सब का बेटा है."
(जारी)
Tuesday, September 7, 2010
महमूद दरवेश बता रहे हैं कविता से कैसे पैदा की जाती है उम्मीद
पिछली सदी के महानतम कवियों में शुमार महमूद दरवेश ने, अपनी मृत्यु से एक साल पहले दिये गए एक साक्षात्कार में किसी पत्रकार के एक सवाल के जवाब में कहा था:
"जब उम्मीद न भी हो, हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उसका आविष्कार और उसकी रचना करें. उम्मीद के बिना हम हार जाएंगे. उम्मीद ने सादगीभरी चीज़ों से उभरना चाहिये. प्रकृति की महिमा से, जीवन के सौन्दर्य से, उनकी नाज़ुकी से. केवल अपने मस्तिष्क को स्वस्थ रखने की ख़ातिर आप कभी कभी ज़रूरी चीज़ों को भूल ही सकते हैं. इस समय उम्मीद के बारे में बात करना मुश्किल है. यह ऐसा लगेगा जैसे हम इतिहास और वर्तमान की अनदेखी कर रहे हैं. जैसे कि हम भविष्य को फ़िलहाल हो रही घटनाओं से काट कर देख रहे हैं. लेकिन जीवित रहने के लिए हमें बलपूर्वक उम्मीद का आविष्कार करना होगा."
जब पत्रकार ने उन से अगला सवाल किया: * आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?" तो देखिये दरवेश किस तरह परिभाषित करते हैं हमारे समय के लिए ज़रूरी कविता को.
"मैं उपमाओं का कर्मचारी हूं, प्रतीकों का नहीं. मैं कविता की ताक़त पर भरोसा करता हूं, जो मुझे भविष्य को देखने और रोशनी की झलक को पहचानने की वजहें देती है. कविता एक असल कमीनी चीज़ हो सकती है. वह विकृति पैदा करती है. इस के पास अवास्तविक को वास्तविक में और वास्तविक को काल्पनिक में बदल देने की ताक़त होती है. इसके पास एक ऐसा संसार खड़ा कर सकने की ताक़त होती है जो उस संसार के बरख़िलाफ़ होता है जिसमें हम जीवित रहते हैं. मैं कविता को एक आध्यात्मिक औषधि की तरह देखता हूं. मैं शब्दों से वह रच सकता हूं जो मुझे वास्तविकता में नज़र नहीं आता. यह एक विराट भ्रम होती है लेकिन एक पॉज़िटिव भ्रम. मेरे पास अपनी या अपने मुल्क की ज़िन्दगी के अर्थ खोजने के लिए और कोई उपकरण नहीं. यह मेरी क्षमता के भीतर होता है कि मैं शब्दों के माध्यम से उन्हें सुन्दरता प्रदान कर सकूं और एक सुन्दर संसार का चित्र खींचूं और उनकी परिस्थिति को भी अभिव्यक्त कर सकूं. मैंने एक बार कहा था कि मैंने शब्दों की मदद से अपने देश और अपने लिए एक मातृभूमि का निर्माण किया था."
"जब उम्मीद न भी हो, हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उसका आविष्कार और उसकी रचना करें. उम्मीद के बिना हम हार जाएंगे. उम्मीद ने सादगीभरी चीज़ों से उभरना चाहिये. प्रकृति की महिमा से, जीवन के सौन्दर्य से, उनकी नाज़ुकी से. केवल अपने मस्तिष्क को स्वस्थ रखने की ख़ातिर आप कभी कभी ज़रूरी चीज़ों को भूल ही सकते हैं. इस समय उम्मीद के बारे में बात करना मुश्किल है. यह ऐसा लगेगा जैसे हम इतिहास और वर्तमान की अनदेखी कर रहे हैं. जैसे कि हम भविष्य को फ़िलहाल हो रही घटनाओं से काट कर देख रहे हैं. लेकिन जीवित रहने के लिए हमें बलपूर्वक उम्मीद का आविष्कार करना होगा."
जब पत्रकार ने उन से अगला सवाल किया: * आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?" तो देखिये दरवेश किस तरह परिभाषित करते हैं हमारे समय के लिए ज़रूरी कविता को.
"मैं उपमाओं का कर्मचारी हूं, प्रतीकों का नहीं. मैं कविता की ताक़त पर भरोसा करता हूं, जो मुझे भविष्य को देखने और रोशनी की झलक को पहचानने की वजहें देती है. कविता एक असल कमीनी चीज़ हो सकती है. वह विकृति पैदा करती है. इस के पास अवास्तविक को वास्तविक में और वास्तविक को काल्पनिक में बदल देने की ताक़त होती है. इसके पास एक ऐसा संसार खड़ा कर सकने की ताक़त होती है जो उस संसार के बरख़िलाफ़ होता है जिसमें हम जीवित रहते हैं. मैं कविता को एक आध्यात्मिक औषधि की तरह देखता हूं. मैं शब्दों से वह रच सकता हूं जो मुझे वास्तविकता में नज़र नहीं आता. यह एक विराट भ्रम होती है लेकिन एक पॉज़िटिव भ्रम. मेरे पास अपनी या अपने मुल्क की ज़िन्दगी के अर्थ खोजने के लिए और कोई उपकरण नहीं. यह मेरी क्षमता के भीतर होता है कि मैं शब्दों के माध्यम से उन्हें सुन्दरता प्रदान कर सकूं और एक सुन्दर संसार का चित्र खींचूं और उनकी परिस्थिति को भी अभिव्यक्त कर सकूं. मैंने एक बार कहा था कि मैंने शब्दों की मदद से अपने देश और अपने लिए एक मातृभूमि का निर्माण किया था."
किसे कहते हैं निर्वासन
* आप पहले भी इस ठिकाने पर निज़ार सीरियाई कवि निज़ार क़ब्बानी ( 21 मार्च 1923 - 30 अप्रेल1998 ) की कविताओं के बहुत से अनुवाद पढ़ चुके हैं जिनमें से कुछ इस ब्लाग के मुखिया अशोक पांडे ने किए है और कुछ के इस अदने से कबाड़ी सदस्य ने। मेरे लिए निज़ार की कविताओं को पढ़ना प्रेम में होना होता है। अगर अपनी हिन्दी की बात करें तो अनायास घनानंद को याद करना हो जाता है। याद है न वे क्या कहते हैं- 'अति सूधो सनेह को मारग है यहाँ नैकु सयानप बाँक नहीं'। एकदम सीधा और सरल - सा है यह रास्ता। यहाँ, इस ठौर हुशियारी और सयानेपन की कोई जगह नहीं। निज़ार के यहाँ प्रेम दिखाई देता है , उनके यहाँ प्रेम में सयानेपन का कोई घालमेल नहीं , सब शुद्ध और खाँटी, निखालिस। यही कारण है कि बार - बार यह कवि अपनी ओर खींचता है और बार - बार इसकी प्रेम कवितायें आपसे रू - ब - रू कराने की इच्छा होती है। मन करता कि जो खुद को अच्छा - सा लगा है / लगता है उसे विश्व कविता के सहृदय पाठकों और प्रेमियों के साथ साझा करने में न तो संकोच करना चाहिए और न ही अनावश्यक देरी। तो आइए, आज एक बार फिर निज़ार क़ब्बानी की कविताओं के जरिए प्रेम के सहज संसार की एक छोटी - सी यात्रा करते हैं :
निज़ार क़ब्बानी की दो प्रेम कवितायें
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )
०१- समय
दो बरस..
जबसे हुए हो तुम मेरे महबूब
प्रेम के समकालीन इतिहास के
सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठ हैं ये।
इससे आगे
और इससे पीछे के सारे पृष्ठ
कोरे है - एकदम सादे।
भूमध्यरेखाओं की निशानदेही हैं ये पृष्ठ
जो गुजरती हैं
मेरे और तुम्हारे अधरों के मध्य से।
इन्हीं से मापन होता है समय का
और इन्हीं से तय होता है
दुनिया की सारी घड़ियों का समय निर्धारण।
०२- खुशबू
जब भी तुम
होती हो यात्राओं पर
तुम्हारी खुशबू प्रश्न करती है
तुम्हारे बारे में।
एक शिशु की तरह वह जोहती है
माँ के लौटने की बाट।
तनिक सोचो
यहाँ तक कि खुशबू को पता है
कि किसे कहते हैं निर्वासन
और कैसा होता है वनवास।
Saturday, September 4, 2010
हालीना पोस्वियातोव्सका की कविता और वान गॉग का चित्र
हालीना पोस्वियातोव्सका की बहुत सी कविताओं के अनुवाद आप पहले भी पढ़ चुके हैं। आज एक खास कविता, इसमें पोलैंड की इस महान कवयित्री का जीवन और निजी अनुभव संसार तो है ही महान चित्रकार विन्सेन्ट वान गॉग का एक चित्र भी अपनी पूरी भव्यता व दिव्यता के साथ चमक रहा है।कविता का तो जैसा - तैसा अनुवाद कर दिया लेकिन चित्र का ! तो आइए ,पढ़ते - देखते हैं यह कविता और कलाकृति - सूरजमुखी :
*
हालीना पोस्वियातोव्सका की कविता
सूरजमुखी
( अनुवाद: सिद्धेश्वर सिंह)
प्रेम में डूबा हुआ
एक ऊँचा लंबा सूरजमुखी
हाँ यही तो है
उसके नाम का समानार्थी शब्द।
चौड़ी पत्तियों से झाँकती
अपनी हजारों खुली पुतलियों के साथ
वह उठाती है अपना आकाशोन्मुख शीश
और सूरज रूपान्तरित हो जाता है
मधुमक्खियों के एक छत्ते में।
नीली भिनभिनाहटों में
बदलने लगता है सूरजमुखी
चहुँदिशि फैल जाती है सुनहली दीप्ति।
फरिश्तों के
मस्तिष्क मात्र में विद्यमान वान गॉग
इसे उठाकर रोप देता है अपने कैनवस पर
और चमक बिखेरने का देता है आदेश।
Friday, September 3, 2010
उस चश्मे में दिखते हैं नाना, सज्जाद ज़हीर, फ़िराक़ गोरखपुरी, मजाज़, गोर्की, तोलस्तोय, राहुल सांकृत्यायन
कल आपने फ़रीद खां की कविता पढ़ी थी गंगा मस्जिद. आज पढ़िये उनकी एक और ज़बरदस्त कविता:
नानी का चश्मा
आसमान में टिम टिमाती नानी हँसती होंगी हमारे बचपने पर।
हाँ।
नानी का चश्मा मुझे किसी दूरबीन की तरह ही अजूबा लगता था।
मैं अक्सर उससे पढ़ने की कोशिश करता।
पर उसे लगाते ही आँखें चौन्धिया जातीं थीं।
शब्द चढ़ आते थे और आँखों की कोर से फिसल जाते थे।
तस्वीरें बोलती नहीं, दहाड़ती थीं।
आँखों पर ज़ोर पड़ता था, और मैं जल्दी से उतार कर रख देता।
आज मुझे समझ में आता है कि हमारा आकर्षण असल में चश्मा नहीं था।
उनके उस रूप में था, जो चश्मा लगाने के बाद बदल जाता था।
चश्मा लगा कर, नानी अपना शरीर छोड़ कर किसी लम्बी यात्रा पर निकल गईं दीखती थीं।
यही था हमारा वास्तविक आकर्षण।
अपने ममेरे भाई के साथ उन दिनों चश्मे का रहस्य पता करने में जुटा था।
मेरा भाई कहता था कि इसमें कहानियाँ दीखती हैं।
इसीलिए तो दादी घंटों चश्मा लगाए रखती हैं।
अख़बार और किताब तो बहाना है।
चश्मा छूने और देखने के हमारे उतावलेपन से उनका ध्यान भंग होता,
और वे चश्मे के भीतर से ही हमें देखतीं बाघ की तरह। धीर गंभीर और गहरी।
क्या वे हमें बाघ का बच्चा समझती थीं ?
एक बार टूट गया उनका चश्मा और हमने दौड़ कर उसका शीशा उठा लिया।
यह सोच कर कि शायद हमें दिख जाए कोई कहानी बाहर आते हुए।
मैं ही गया था चश्मा बनवाने।
मैंने चश्मे वाले से पूछा
कि नानी के चश्मे से हमें क्यों नहीं दीखता कुछ भी साफ़ साफ़।
चश्मे वाले ने कहा,
“हर किसी का अपना चश्मा होता है। उसकी अपनी आँख के हिसाब से।
नानी की एक उम्र है, इसीलिए इतना मोटा चश्मा लगाती हैं।
तुम अभी बच्चे हो तुम्हारा चश्मा इतना मोटा नहीं होगा”।
हम दोनों भाई सोचते थे कि कब वह दिन आयेगा, जब हम भी लगायेंगे एक मोटा सा चश्मा।
अब, इस उम्र में, नानी के देहावसान के बाद,
उस चश्मे में दिखते हैं नाना,
सज्जाद ज़हीर, फ़िराक़ गोरखपुरी, मजाज़।
गोर्की, तोलस्तोय, राहुल सांकृत्यायन।
आज़ादी की लड़ाई, मज़दूर यूनियन, इमर्जेंसी का दमन, रोटी का संघर्ष।
फ़ौज का उतरना।
रात भर शहीदों के फ़ातिहे पढ़ना।
कमरे तक घुस आए कोहरे में भी खाँस खाँस कर रास्ता बनाता एक बुद्ध।
अपने शावकों के साथ दूर क्षितिज को देखती एक बाघन अशोक राजपथ पर।
और कितने तूफ़ान !!!
कितने तूफ़ान जिसे रोक रखा था नानी ने हम तक पहुँचने से
नानी का चश्मा
आसमान में टिम टिमाती नानी हँसती होंगी हमारे बचपने पर।
हाँ।
नानी का चश्मा मुझे किसी दूरबीन की तरह ही अजूबा लगता था।
मैं अक्सर उससे पढ़ने की कोशिश करता।
पर उसे लगाते ही आँखें चौन्धिया जातीं थीं।
शब्द चढ़ आते थे और आँखों की कोर से फिसल जाते थे।
तस्वीरें बोलती नहीं, दहाड़ती थीं।
आँखों पर ज़ोर पड़ता था, और मैं जल्दी से उतार कर रख देता।
आज मुझे समझ में आता है कि हमारा आकर्षण असल में चश्मा नहीं था।
उनके उस रूप में था, जो चश्मा लगाने के बाद बदल जाता था।
चश्मा लगा कर, नानी अपना शरीर छोड़ कर किसी लम्बी यात्रा पर निकल गईं दीखती थीं।
यही था हमारा वास्तविक आकर्षण।
अपने ममेरे भाई के साथ उन दिनों चश्मे का रहस्य पता करने में जुटा था।
मेरा भाई कहता था कि इसमें कहानियाँ दीखती हैं।
इसीलिए तो दादी घंटों चश्मा लगाए रखती हैं।
अख़बार और किताब तो बहाना है।
चश्मा छूने और देखने के हमारे उतावलेपन से उनका ध्यान भंग होता,
और वे चश्मे के भीतर से ही हमें देखतीं बाघ की तरह। धीर गंभीर और गहरी।
क्या वे हमें बाघ का बच्चा समझती थीं ?
एक बार टूट गया उनका चश्मा और हमने दौड़ कर उसका शीशा उठा लिया।
यह सोच कर कि शायद हमें दिख जाए कोई कहानी बाहर आते हुए।
मैं ही गया था चश्मा बनवाने।
मैंने चश्मे वाले से पूछा
कि नानी के चश्मे से हमें क्यों नहीं दीखता कुछ भी साफ़ साफ़।
चश्मे वाले ने कहा,
“हर किसी का अपना चश्मा होता है। उसकी अपनी आँख के हिसाब से।
नानी की एक उम्र है, इसीलिए इतना मोटा चश्मा लगाती हैं।
तुम अभी बच्चे हो तुम्हारा चश्मा इतना मोटा नहीं होगा”।
हम दोनों भाई सोचते थे कि कब वह दिन आयेगा, जब हम भी लगायेंगे एक मोटा सा चश्मा।
अब, इस उम्र में, नानी के देहावसान के बाद,
उस चश्मे में दिखते हैं नाना,
सज्जाद ज़हीर, फ़िराक़ गोरखपुरी, मजाज़।
गोर्की, तोलस्तोय, राहुल सांकृत्यायन।
आज़ादी की लड़ाई, मज़दूर यूनियन, इमर्जेंसी का दमन, रोटी का संघर्ष।
फ़ौज का उतरना।
रात भर शहीदों के फ़ातिहे पढ़ना।
कमरे तक घुस आए कोहरे में भी खाँस खाँस कर रास्ता बनाता एक बुद्ध।
अपने शावकों के साथ दूर क्षितिज को देखती एक बाघन अशोक राजपथ पर।
और कितने तूफ़ान !!!
कितने तूफ़ान जिसे रोक रखा था नानी ने हम तक पहुँचने से
उसे हमेशा मुख़्तसर नाम से पुकारना चाहिए
अफ़ज़ाल अहमद सैयद भारतीय उपमहाद्वीप के चुनिन्दा बड़े शायरों में हैं. उनकी कुछ कविताओं से आपका परिचय कबाड़खाने में पहले करवा चुका हूं. आज पढ़िये उनकी एक और कविता:
जिससे मोहब्बत हो
जिससे मोहब्बत हो
उसे निकाल ले जाना चाहिए
आख़िरी कश्ती पर
एक मादूम होते शहर से बाहर
उसके साथ
पार करना चाहिए
गिराए जाने की सजा पाया हुआ एक पुल
उसे हमेशा मुख़्तसर नाम से पुकारना चाहिए
उसे ले जाना चाहिए
जिंदा आतिशफ़सानों से भरे
एक ज़जीरे पर
उसका पहला बोसा लेना चाहिए
नमक की कान में
एक अज़ीयत देने की कोठरी के
अन्दर
जिससे मोहब्बत हो
उसके साथ टाइप करनी चाहिए
दुनिया की तमाम नाइंसाफियों के खिलाफ
एक अर्ज़दाश्त
जिसके सफ़हात
उदा देने चाहिए
सुबह
होटल के कमरे की खिड़की से
स्वीमिंग पूल की तरफ
(मादूम - ख़त्म, आतिशफसानों - ज्वालामुखियों, जज़ीरा - द्वीप, कान - खदान, अज़ीयत - यन्त्रणा)
बाकी कविताओं के लिंक ये रहे
शायरी मैंने ईजाद की
अगर कोई पूछे
जिससे मोहब्बत हो
जिससे मोहब्बत हो
उसे निकाल ले जाना चाहिए
आख़िरी कश्ती पर
एक मादूम होते शहर से बाहर
उसके साथ
पार करना चाहिए
गिराए जाने की सजा पाया हुआ एक पुल
उसे हमेशा मुख़्तसर नाम से पुकारना चाहिए
उसे ले जाना चाहिए
जिंदा आतिशफ़सानों से भरे
एक ज़जीरे पर
उसका पहला बोसा लेना चाहिए
नमक की कान में
एक अज़ीयत देने की कोठरी के
अन्दर
जिससे मोहब्बत हो
उसके साथ टाइप करनी चाहिए
दुनिया की तमाम नाइंसाफियों के खिलाफ
एक अर्ज़दाश्त
जिसके सफ़हात
उदा देने चाहिए
सुबह
होटल के कमरे की खिड़की से
स्वीमिंग पूल की तरफ
(मादूम - ख़त्म, आतिशफसानों - ज्वालामुखियों, जज़ीरा - द्वीप, कान - खदान, अज़ीयत - यन्त्रणा)
बाकी कविताओं के लिंक ये रहे
शायरी मैंने ईजाद की
अगर कोई पूछे
Thursday, September 2, 2010
आज अट्ठारह साल बाद, मैं फिर खड़ा हूँ उसी मीनार पर।

मुझे भाई फ़रीद खां के बारे में ज़्यादा क्या कुछ नहीं पता. अभी कुछ देर पहले फ़ेसबुक पर लखनऊ वाले नवीन दा से बात हो रही थी. उन्होंने इस कविता का लिंक दिया.
तुरन्त फ़ेसबुक पर ही फ़रीद खां साहेब को सम्पर्क किया, इस कविता को छापने की इजाज़त मांगी जो उन्होंने बड़ी सहृदयता के साथ तुरन्त दे दी. भले काम में देर नहीं करनी चाहिये. सो पेश है यह कविता जो नोस्टैल्जिया, समाज, मन, समय, बदलाव, व्यक्ति वग़ैरह कितने कितने आयामों को बड़ी सादगी से छू जाती है. इसे पहली बार पढ़ते हुए मुझे राही मासूम रज़ा की कविता "गंगा और महादेव" याद आती रही.
भाई फ़रीद खां का धन्यवाद. पेश है एक सुन्दर कविता:
गंगा मस्जिद
यह बचपन की बात है, पटना की।
गंगा किनारे वाली ‘गंगा मस्जिद’ की मीनार पर,
खड़े होकर घंटों गंगा को देखा करता था।
गंगा छेड़ते हुए मस्जिद को लात मारती,
कहती, “अबे मुसलमान, कभी मेरे पानी से नहा भी लिया कर”।
और कह कर बहुत तेज़ भागती दूसरी ओर हँसती हँसती।
मस्जिद भी उसे दूसरी छोर तक रगेदती हँसती हँसती।
परिन्दे ख़ूब कलरव करते।
इस हड़बोम में मुअज़्ज़िन की दोपहर की नीन्द टूटती,
और झट से मस्जिद किनारे आ लगती।
गंगा सट से बंगाल की ओर बढ़ जाती।
परिन्दे मुअज़्ज़िन पर मुँह दाब के हँसने लगते।
मीनार से बाल्टी लटका,
मुअज़्ज़िन खींचता रस्सी से गंगा जल।
वुज़ू करता।
आज़ान देता।
लोग भी आते,
खींचते गंगा जल,
वुज़ू करते, नमाज़ पढ़ते,
और चले जाते।
आज अट्ठारह साल बाद,
मैं फिर खड़ा हूँ उसी मीनार पर।
गंगा सहला रही है मस्जिद को आहिस्ते आहिस्ते।
सरकार ने अब वुज़ू के लिए
साफ़ पानी की सप्लाई करवा दी है।
मुअज़्ज़िन की दोपहर,
अब करवटों में गुज़रती है।
गंगा चूम चूम कर भीगो रही है मस्जिद को,
मस्जिद मुँह मोड़े चुपचाप खड़ी है।
गंगा मुझे देखती है,
और मैं गंगा को।
मस्जिद किसी और तरफ़ देख रही है।
06/12/2010
(मुअज़्ज़िन - आज़ान देने वाला)
डायनोसॉर असल में इस वजह से धरती से ग़ायब हुए
गैरी लार्सन के कार्टूनों से आपको पहले एक पूरी सीरिज़ के माध्यम से परिचित करवा चुका हूं.
आज उनका एक लाजवाब कार्टून:
आज उनका एक लाजवाब कार्टून:
ए’न्ट नो क्योर फ़ॉर लव
मेरे सर्वप्रिय गीतकार गायकों में से एक लेनर्ड कोहेन से सुनिये मेरा एक प्रिय गीत ’आएम योर मैन’ अल्बम से.

ये रहे बोल:
I loved you for a long, long time
I know this love is real
It don't matter how it all went wrong
That don't change the way I feel
And I can't believe that time's
Gonna heal this wound I'm speaking of
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
I'm aching for you baby
I can't pretend I'm not
I need to see you naked
In your body and your thought
I've got you like a habit
And I'll never get enough
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
All the rocket ships are climbing through the sky
The holy books are open wide
The doctors working day and night
But they'll never ever find that cure for love
There ain't no drink no drug
(Ah tell them, angels)
There's nothing pure enough to be a cure for love
I see you in the subway and I see you on the bus
I see you lying down with me, I see you waking up
I see your hand, I see your hair
Your bracelets and your brush
And I call to you, I call to you
But I don't call soft enough
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
I walked into this empty church I had no place else to go
When the sweetest voice I ever heard, whispered to my soul
I don't need to be forgiven for loving you so much
It's written in the scriptures
It's written there in blood
I even heard the angels declare it from above
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
All the rocket ships are climbing through the sky
The holy books are open wide
The doctors working day and night
But they'll never ever find that cure,
That cure for love

ये रहे बोल:
I loved you for a long, long time
I know this love is real
It don't matter how it all went wrong
That don't change the way I feel
And I can't believe that time's
Gonna heal this wound I'm speaking of
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
I'm aching for you baby
I can't pretend I'm not
I need to see you naked
In your body and your thought
I've got you like a habit
And I'll never get enough
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
All the rocket ships are climbing through the sky
The holy books are open wide
The doctors working day and night
But they'll never ever find that cure for love
There ain't no drink no drug
(Ah tell them, angels)
There's nothing pure enough to be a cure for love
I see you in the subway and I see you on the bus
I see you lying down with me, I see you waking up
I see your hand, I see your hair
Your bracelets and your brush
And I call to you, I call to you
But I don't call soft enough
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
I walked into this empty church I had no place else to go
When the sweetest voice I ever heard, whispered to my soul
I don't need to be forgiven for loving you so much
It's written in the scriptures
It's written there in blood
I even heard the angels declare it from above
There ain't no cure,
There ain't no cure,
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
There ain't no cure for love
All the rocket ships are climbing through the sky
The holy books are open wide
The doctors working day and night
But they'll never ever find that cure,
That cure for love
Wednesday, September 1, 2010
कृष्ण का बचपन देखकर लगता है कि अपना तो यूं ही गुज़र गया
परमप्रिय मित्र और शानदार कवि-पत्रकार सुन्दर चन्द ठाकुर की यह कविता उसके दूसरे संग्रह एक दुनिया है असंख्य से ली गई है और ख़ास आज के ही दिन लगाने के वास्ते बचा रखी थी.

कृष्ण और मैं
कृष्ण का बचपन देखकर लगता है कि अपना तो यूं ही गुज़र गया
कुछ भोलेपन कुछ निरीहता में
शैतानियां मैंने भी कम नहीं कीं
घरवालों से छुपकर नदी में तैरने जाता रहा
मां को एक दिन जब मालूम चला
लाल कर डाले उसने मेरे पैर बिच्छू घास से
फिर वह ख़ुद भी लगी रोने
वह जानती थी कि हर साल नदी किसी - न - किसी को लील जाती है
पता नहीं उसने मुझपर ग़ुस्सा निकाला या नदी पर
बचपन में ग़फ़लत में रहा कि मैं इन्सान नहीं भगवान हूं
अपने इस यक़ीन को परखने के वास्ते
मैंने कंचों का निशाना लगाने का खेल कई बार खेला
मन ही मन हर बार यही सर्त लगाकर कि अगर सारे निशाने सही लगे
तो निर्विवाद मैं अपनी नज़र में हूंगा भगवान
मैंने अपनी इसी ख़ब्त में कई दुपहरें बरबाद कर डालीं
मगर असल जीवन में मेरे कृष्ण जैसा ऐश्वर्य नहीं, बहुत थीं दुश्वारियां
बचपन में दही-दूध को मेरा भी जी ललचाता था
मगर दिल्ली की तंग गलियों में जहां
इमली तोड़ते और गन्ने चुराते बचपन के कई बरस
जब पिताजी फ़ौज में सिपाही थे
और मां गांव छोड़कर देश की राजधानी में आई
सहमी और उतनी ही विस्मित एक मृगनयनी
उन दिनों मैं नुक्कड़ की हलवाई की दुकान से महीने में एकाध बार
अपनी फटी नेकर में थिरकता-नाचता हुआ लाने जाता था दही
रसमलाई तो चखी मैंने कई सालों बाद
नौकरी से मिलने वाली तनख़्वाह का भी जब सुरूर ख़त्म हो चुका था
कृष्ण की तरह मैं भी गया गायों के संग बनकर ग्वालबाल
यह उन दिनों की बात है जब मूंछों की झांइयां दिखना शुरू ही हुई थीं
पिता ने मानसिक सन्तुलन खो जब छोड़ दी थी नौकरी
और मां को चूल्हे की लकड़ियों के लिए जंगल में भटकना पड़ता था
उसने तब बेचकर अपने सारे गहने ख़रीद ली थी दो गायें
मगर उनके लिये घास ख़रीदने की हमारी कूव्वत न थी
सो स्कूल से लौट रोज़ ले जाता मैं उन्हें एक हरे पहाड़ पर
लेकिन मेरे पास कोई बांसुरी न थी न उसे बजाने का हुनर
कि उसकी तान सुनकर चली आतीं मेरे पास ग्वालबालाएं
अलबत्ता मेरे साथ पड़ोस में रहने वालि एक हम म्र लड़की ज़रूर होती थी
काम के बोझ से इस क़दर टूटी हुई
कि पेड़ की छांह में हवा के पहले ही झोंके में ग़श खाकर सो जाती थी
यानी लगभग वैसे ही बचपन और किशोर वय से गुज़रते हुए भी
कन्हैया के जीवन जैसा न बन पाया मेरा जीवन
जवानी की तो बात ही क्या की जाए
क्योंकि वहां कृष्ण की हज़ारों रानियों का एक ऐसा वृत्तान्त है
जो उस युग में भी असम्भव प्रतीत होता है, इस युग की क्या बात
और अभी तो बाक़ी है महाभारत की पूरी कथा
जिसमें कृष्ण अर्जुन को दिखाते हैं अपना विश्वरूप
एक गीता का मसौदा तैयार होता है
ये बात दीगर है कि इन दिनों महानगर ही क्या
छोटे क़स्बों, गांवों या कहीं भी आप रहें, जीवन महाभारत से कम नहीं.
(फ़ोटो http://www.travelblog.org से साभार)

कृष्ण और मैं
कृष्ण का बचपन देखकर लगता है कि अपना तो यूं ही गुज़र गया
कुछ भोलेपन कुछ निरीहता में
शैतानियां मैंने भी कम नहीं कीं
घरवालों से छुपकर नदी में तैरने जाता रहा
मां को एक दिन जब मालूम चला
लाल कर डाले उसने मेरे पैर बिच्छू घास से
फिर वह ख़ुद भी लगी रोने
वह जानती थी कि हर साल नदी किसी - न - किसी को लील जाती है
पता नहीं उसने मुझपर ग़ुस्सा निकाला या नदी पर
बचपन में ग़फ़लत में रहा कि मैं इन्सान नहीं भगवान हूं
अपने इस यक़ीन को परखने के वास्ते
मैंने कंचों का निशाना लगाने का खेल कई बार खेला
मन ही मन हर बार यही सर्त लगाकर कि अगर सारे निशाने सही लगे
तो निर्विवाद मैं अपनी नज़र में हूंगा भगवान
मैंने अपनी इसी ख़ब्त में कई दुपहरें बरबाद कर डालीं
मगर असल जीवन में मेरे कृष्ण जैसा ऐश्वर्य नहीं, बहुत थीं दुश्वारियां
बचपन में दही-दूध को मेरा भी जी ललचाता था
मगर दिल्ली की तंग गलियों में जहां
इमली तोड़ते और गन्ने चुराते बचपन के कई बरस
जब पिताजी फ़ौज में सिपाही थे
और मां गांव छोड़कर देश की राजधानी में आई
सहमी और उतनी ही विस्मित एक मृगनयनी
उन दिनों मैं नुक्कड़ की हलवाई की दुकान से महीने में एकाध बार
अपनी फटी नेकर में थिरकता-नाचता हुआ लाने जाता था दही
रसमलाई तो चखी मैंने कई सालों बाद
नौकरी से मिलने वाली तनख़्वाह का भी जब सुरूर ख़त्म हो चुका था
कृष्ण की तरह मैं भी गया गायों के संग बनकर ग्वालबाल
यह उन दिनों की बात है जब मूंछों की झांइयां दिखना शुरू ही हुई थीं
पिता ने मानसिक सन्तुलन खो जब छोड़ दी थी नौकरी
और मां को चूल्हे की लकड़ियों के लिए जंगल में भटकना पड़ता था
उसने तब बेचकर अपने सारे गहने ख़रीद ली थी दो गायें
मगर उनके लिये घास ख़रीदने की हमारी कूव्वत न थी
सो स्कूल से लौट रोज़ ले जाता मैं उन्हें एक हरे पहाड़ पर
लेकिन मेरे पास कोई बांसुरी न थी न उसे बजाने का हुनर
कि उसकी तान सुनकर चली आतीं मेरे पास ग्वालबालाएं
अलबत्ता मेरे साथ पड़ोस में रहने वालि एक हम म्र लड़की ज़रूर होती थी
काम के बोझ से इस क़दर टूटी हुई
कि पेड़ की छांह में हवा के पहले ही झोंके में ग़श खाकर सो जाती थी
यानी लगभग वैसे ही बचपन और किशोर वय से गुज़रते हुए भी
कन्हैया के जीवन जैसा न बन पाया मेरा जीवन
जवानी की तो बात ही क्या की जाए
क्योंकि वहां कृष्ण की हज़ारों रानियों का एक ऐसा वृत्तान्त है
जो उस युग में भी असम्भव प्रतीत होता है, इस युग की क्या बात
और अभी तो बाक़ी है महाभारत की पूरी कथा
जिसमें कृष्ण अर्जुन को दिखाते हैं अपना विश्वरूप
एक गीता का मसौदा तैयार होता है
ये बात दीगर है कि इन दिनों महानगर ही क्या
छोटे क़स्बों, गांवों या कहीं भी आप रहें, जीवन महाभारत से कम नहीं.
(फ़ोटो http://www.travelblog.org से साभार)
रोहित उमराव के कैमरे से सारस - ४
अब देखिये सारस के नन्हे बच्चों के पैदा होने और उनकी देखरेख में जी जान से लगे प्रसन्न दम्पत्ति को.
आम तौर पर सारस या कोई भी पक्षी किसी को भी, ख़ास तौर पर मनुष्य को अपने पास नहीं आने देता. सन्तति विकसित होते समय तो तो कतई नहीं. लेकिन इतने दिनों लगातार उस जगह जा कर रोहित ने सारस दम्पत्ति से बाक़ायदा दोस्ती गांठ ली और बहुत करीब जाकर नन्हे सारस के दुर्लभ फ़ोटो भी खींचे. इस शानदार काम के लिए रोहित को बधाई.
बच्चे बहुत नन्हे हैं सो उन्हें ठीक से देखने के लिए हर फ़ोटो पर क्लिक कर के बड़ा कर देख सकते हैं.







आम तौर पर सारस या कोई भी पक्षी किसी को भी, ख़ास तौर पर मनुष्य को अपने पास नहीं आने देता. सन्तति विकसित होते समय तो तो कतई नहीं. लेकिन इतने दिनों लगातार उस जगह जा कर रोहित ने सारस दम्पत्ति से बाक़ायदा दोस्ती गांठ ली और बहुत करीब जाकर नन्हे सारस के दुर्लभ फ़ोटो भी खींचे. इस शानदार काम के लिए रोहित को बधाई.
बच्चे बहुत नन्हे हैं सो उन्हें ठीक से देखने के लिए हर फ़ोटो पर क्लिक कर के बड़ा कर देख सकते हैं.



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