Sunday, August 7, 2011

एक पुरानी किताब की कविताएँ (२) नेत्रसिंह असवाल..

इस श्रृंखला की पिछली कविता यहाँ पढी जा सकती है
यहाँ
साफ़ कर दूं कि समकालीन कविता पर मेरी जानकारी नहीं के बराबर है, और इस किताब की कविताएँ और कवि मेरे लिए नए हैं धिकतर (किताब में नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, शमशेर आदि की भी एक एक कविता है,) लेकिन उस समय के नए कवियों की भरमार है इसलिए यहाँ सिर्फ अपनी पसंद की कविताएँ लगा रहा हूँ नेत्रसिंह असवाल को इंटरनेट पर ढूँढने पर सिर्फ यह पता चला कि वे गढवाली के एक बड़े कवि हैं चूंकि कविता किताब में 'गढवाली कविता' के नाम से छपी है, इसलिए शायद यह एक अनुवाद है... शायद हमारे पाठकों में से किसी के पास मूल कविता हो, अगर मिल जाए तो क्या कहना !
यह कविता किसी भयावह गहरी अंधेरी खाई की ओर नहीं ले जाती बल्कि ठेठ देशी- रास्तों पर नयी उमंग/नयी इबारत के साथ चलने को उकसाती है..

'गढवाली कविता'
- नेत्रसिंह असवाल

मैं चाहता हूँ -
कि मेरे देश का हर व्यक्ति कवि हो
और हर कवि के काँधे पर हल हो
तब कविता पर कोई भूत नहीं चढ़ पाएगा
मैं चाहता हूँ- कि मेरे देश का हर पत्थर भगवान हो
बेशक हो पर गोबर-गणेश हो
हो तो ऐसा हो- जिससे वक़्त पड़ने पर
तोड़े जा सकें -नरभक्षी बाघ के दांत
चील-कौवों के पर
सियार- लोमड़ों के सर
जो बढ़कर थाम ले ढहते घर की दीवार को

अपने ही घर में पराई हुई
मुर्गी-सी कुड़-कुडा रही है ज़िंदगी
कविता-खोया हुआ चूजा हो सकती है
डायन-सी मंडरा रही बाज़ हो सकती है
मुच्छड़ कसाई हो सकती है
कविता-गुबरौटी हो सकती है
जिससे माँ रोज़ सुबह
नन्हे-मुन्ने भैया का पेशाब किया हुआ फर्श
और देवता का थान लीपती है

कविता-हल का फाल हो सकती है
जिससे खेत की एक एक गाँठ- खोलती है
कविता - हल की सीम
के साथ-साथ
बोया जाता बीज हो सकती है
या पीछे-पीछे ढेम फोड़ती
किसानों की आँखों का सपना, ओंठों का गीत
कुदाली का संगीत
या हथेली पर फूट- फूट आया, जलता छाला हो सकती है
कविता-खेत के एक कोने से दूसरे कोने तक
पाटा फेरना हो सकती है !

बग़ैर जाने, ये लोग, बचा रहे हैं संसार को

सच्चे लोग

- होर्हे लुई बोर्हेस


एक आदमी जो, जैसा वॉल्टेयर ने चाहा था, अपने बग़ीचे की देखभाल करता है
एक वह जो इसलिए कृतज्ञ है कि धरती पर संगीत का अस्तित्व है
वह जो प्रसन्नता के साथ एक शब्द की उत्पत्ति की बाबत खोज करता है
दक्षिणी कैफ़े में एक जोड़ा, शतरंज की एक ख़ामोश बाज़ी का लुत्फ़ उठाता हुआ
रंग और आकृति के बारे में विचारमग्न एक कुम्हार
एक टाइपोग्राफ़र जो इस कविता को जमा रहा है, और शायद अभी खुश नहीं हुआ है
एक स्त्री और एक पुरुष जो पढ़ रहे हैं एक लम्बी कविता की अन्तिम तीन पंक्तियां
वह जो दुलरा रहा है किसी पशु को
वह जो अपने साथ हुए अन्याय को न्यायोचित ठहरा रहा है या ऐसा करने की कोशिश कर रहा है
वह जो आभारी है स्टीवेन्सन के अस्तित्व के लिए
बग़ैर जाने, ये लोग, बचा रहे हैं संसार को.

(वॉल्टेयर - फ़्रांसीसी इतिहासकार, दार्शनिक जो धर्म और व्यवसाय की स्वतन्त्रता के पक्षधर थे, स्टीवेन्सन - आर. एल. स्टीवेन्सन - मशहूर अंग्रेज़ी उपन्यासकार)

रहीम फ़हीमः आत्मा को खोजता ध्रुपद

मरहूम उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर को याद कर रहे हैं शिवप्रसाद जोशी


रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर नई दिल्ली के एक आलीशान इलाक़े की बरसाती पर रहते थे उन दिनों. साल 1998 था या 99 जब उनसे मुलाक़ात हुई थी. ज़ी न्यूज़ के लिए उन पर एक स्पेशल रिपोर्ट करने गया था. मेरे साथ चीफ़ कैमरामैन मैथ्यु थे. जो धुरंधर टीवी कैमरामैन रहे हैं. कैमरा ही उस बरसाती के उस एक कमरे में बैठे उस परिवार उस साजोसामान उस बेरौनकी के बीच की रौनक और उस ज़िंदगी की कठिनाई को सामने ला पाता.

रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर, ध्रुपद के बेजोड़ गायक तो थे ही वो एक बहुत विनम्र और धैर्य भरे इंसान भी थे. उनकी शख़्सियत ही लगता था धीरज का एक बहुत निराला थाट था. उनके मुंह में पान था, उनकी पत्नी पलंग के एक कोने पर बैठी थीं. सामान एक के ऊपर एक रखा था, कुछ बिखरा हुआ था और न जाने क्यों उस बिखराव में भी एक करीनापन सा दिखता था. एक कोने में तानपुरा था. ऐसा लगता था कि संगीत ने जैसे उस कमरे को एक जादू में बांधा हुआ है. उन्होंने कहा तक़लीफ़ के लिए माफ़ करेंगे पर क्या करें यही इंतज़ाम है.

क्यों है. वो इन हालात में क्योंकर हैं. सब कुछ पूछा था. वे जवाब याद नहीं आते. बहुत ज़ोर डालने पर भी कुछेक बातें याद रह गई हैं. उस ढेरों सामान और सम्मान के बीच उनकी उपस्थिति उनका बैठना और आवाज़ की विराटता ही याद है. अंततः सब कुछ संगीत में ही घुलमिल कर एक बहुत विशिष्ट अनुभव का हिस्सा बन गया है. फ़हीम जी से कुछ गाने का अनुरोध भी किया गया था. उन्होंने बताया था कि सरकार को अर्ज़ियां आदि दी गई हैं. ढंग के मकान की ज़रूरत भी शायद बताई गई थी.

वे शायद बरसात के दिन थे. बारिश कुछ ही देर पहले छूटी थी और छत पर इधर उधर पानी पसरा हुआ था. गोल गोल इकट्ठा हुआ पानी. उस घर में एक टूटा हुआ आईना भी था. बरसाती के बाहर खुले में एक झूला भी पड़ा था. उसका पेंट उखड़ा हुआ था और लोहा काला पड़ गया था. लेकिन उस पर करीने से गद्दी और मसनद रखी थी. फ़हीम जी को उस पर भी बैठने की ग़ुज़ारिश की गई. और मैथ्यु ने बेमिसाल कटअवेज़ बनाए. उनके हावभाव और मुद्राएं आसमान में इधर उधर फैले बादलों और उस नीलेपन के नीचे जैसे नाद को ही खोजती थीं. उन कटअवेज़ में फ़ॉर्मुले नहीं थे, वे उनके आसपास वंदना भाव से जमा नहीं किए गए थे. इस अनुशासन के लिए मैंने बाद में मैथ्यु को बधाई दी. वो सीखने लायक काम था.

हम संगीत के साथ जीवन की संगति के बारे में अपनी रिपोर्ट बनाना चाहते थे. इस संगति में शख़्सियत को भी आना था. फ़हीम जी का चौड़ा ललाट ऊपर की ओर काढ़े बाल और होंठो के कोनों पर पान की लाली और आवाज़ में पैनापन, और पारदर्शिता और बहाव.

रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर के बाज़ार में कम कैसेट दिखते हैं. उनमें एक बात ये थी संकोच की. दूर रहने की. लोकप्रियता की डगर पर वो कम ही दिखे. उनके लिए स्वर आत्मा का ही एक रूप था. वो उसे तलाश करते रहते थे. शायद मुश्किलों के बीच उस बरसाती में रहना भी उस विकट तलाश की एक एक्सरसाइज़ ही थी.

डागर घराने की ध्रुपद गायकी पर रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ान डागर की मुस्तैदी कुछ वैसी ही थी जैसी ख़्याल गायकी में किराना घराने की शास्त्रीयता के प्रति गंगूबाई हंगल की.

फ़हीमजी उन साधकों में से हैं जिनसे हिंदुस्तानी तहज़ीब की बुनियादी संरचना बड़े से बड़े झटके सहती और मानवीय सहिष्णु और साहसी बनी रहती आई है.

Saturday, August 6, 2011

पत्थर चाहता है अनन्त तक पत्थर बने रहना, और बाघ बाघ

बोर्हेस की यह रचना साहित्य की किस विधा या धारा से जोड़ कर देखी जानी चाहिये, मैं नहीं जानता, पर इसे पढ़ना मुझे बार-बार एक थर्राहट से भर देता है.


बोर्हेस और मैं

वह है दूसरा बोर्हेस जिस के साथ चीज़ें घटती हैं. मैं भटकता फिरता हूं बूएनोस आयरेस में और आजकल तकरीबन मिकानीकी तरीक़े से ठहरकर प्रवेशद्वार पर मेहराबदार हॉल और लोहे के गेट की जालियों को निहारता हूं - मुझे डाक की मार्फ़त बोर्हेस की ख़बरें मिलती है, मैं उसका नाम पढ़ता हूं प्रोफ़ेसरों की जीवनियों वाली एक सूची में. मुझे पसन्द हैं रेतघड़ियां,नक्शे, अट्ठारहवीं शताब्दी की मुद्रण कला, शब्द व्युत्पत्तिशास्त्र, कॉफ़ी का स्वाद और स्टीवेन्सन का गद्य - दूसरा बोर्हेस भी यही सब पसन्द करता हैं लेकिन एक अर्थहीन तरीक़े से - वह उन्हें किसी अभिनेता के औज़ारों में तब्दील कर देता है. यह अतिकथन होगा कि हमारा सम्बन्ध आक्रामक है; मैं जीवित रहता हूं, बना रहता हूं ताकि बोर्हेस अपना साहित्य बुन सके. और वह साहित्य मुझे न्यायोचित ठहराता है. मुझे यह स्वीकार करने में कोई तकलीफ़ नहीं कि उसके कुछ पन्ने ठीकठाक हैं लेकिन वे मुझे बचा नहीं पाएंगे, सम्भवतः इसलिए कि अच्छे लेखन पर किसी का अधिकार नहीं होता, उस दूसरे का भी नहीं, अधिकार सिर्फ़ भाषा और परम्परा का होता है. बाक़ी यह कि मेरा अदृश्य हो जाना पूर्वनियत है, निश्चित, और मेरा कुछ अंश दूसरे वाले में बच रहेगा. धीरे-धीरे मैं उसके आगे समर्पण कर रहा हूं हालांकि हेरफ़ेर और अतिरंजना की उसकी विकृत प्रवृत्ति को मैं साफ़-साफ़ समझता हूं. स्पिनोज़ा समझ गया था कि सारी चीज़ें वैसे ही रहना चाहती हैं जैसी वे हैं - पत्थर चाहता है अनन्त तक पत्थर बने रहना, और बाघ बाघ. मैं बना रहूंगा बोर्हेस में, स्वयं में नहीं (अगर मैं स्वयं कुछ हूं तो), तो भी मैं अपने को उसकी किताबों में कम बाक़ी चीज़ों में ज़्यादा पहचानता हूं, गिटार की परिश्रमी झंकार से भी कम. कई साल पहले मैंने स्वयं को उस से मुक्त करना चाहा था और उपनगरीय मितकों से मैं जा पहुंचा समय और अनन्त के खेल में, लेकिन अब वे बोर्हेस के खेल हैं और मुझे कुछ नई चीज़ों की बाबत सोचना पड़ेगा. इस तरह एक उड़ान है मेरा जीवन और मेरा सब कुछ बिसर जाएगा सब कुछ हो जाएगा विस्मृति का या उस दूसरे का.

हम दोनों में से किस ने लिखा है इस पन्ने को, मैं नहीं जानता.

उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर को श्रद्धांजलि


ख़लीफ़ा उस्ताद अलाहबन्दे रहीमुद्दीन ख़ान डागर के सुपुत्र पद्मभूषण उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर साहब का बीती 27 जुलाई को इन्तकाल हो गया. ध्रुपद गायन में शीर्ष स्थान रखने वाले इस ख़ानदान के इस वरिष्ठ पुरोधा के जाने से जो जगह ख़ाली हुई है उसे भरा जा सकना नामुमकिन है.

२ फ़रवरी १९२७ को राजस्थान के अलवर में जन्मे डागर साहब को पांच साल की आयु में उनके चाचा उस्ताद नसीरुद्दीन ख़ान डागर ने संगीत के शुरुआती पाठ सिखाए, उसके बाद चला पैंतीस सालों की कठिन साधना का दौर. इन पैंतीस सालों के बारे में एक दफ़ा उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर ने स्वयं कहा था "इस वक़्फ़े में मुझे सारे के सारे बावन अलंकारों, नाद योग, रुद्र वीणा और संस्कृत पर महारत हासिल करने के साथ साथ ध्रुपद-धमार को पूरी तरह साध लेना था.

ध्रुपद के बारे में वे कहा करते थे - "मेरे पूर्वज शत शास्त्री बाबा बेहराम ख़ान डागर के शाब्दों में ध्रुपद, जैसा कि हमारी डागर वाणी में प्रस्तुत किया जाता है, रागात्मक-स्वरात्मक-शब्दात्मक-वर्णात्मक-लयात्मक और रसात्मक होना चाहिए."

यकीन जानिए ध्रुपद गायकी ऐसी ही जटिल और श्रमसाध्य होती है. उस्ताद को श्रद्धांजलि के साथ उनका गाया राग शुद्ध सारंग -

बारिश एक ऐसी चीज़ है जो अतीत में घटती है - होर्हे लुई बोर्हेस


बारिश

होर्हे लुई बोर्हेस

आख़िरकार उजली हो गई दोपहर
क्योंकि बारिश गिर रही है, औचक और बारीक.
गिर रही है या गिर चुकी. इसमें कोई विवाद नहीं
कि बारिश एक ऐसी चीज़ है जो अतीत में घटती है.

इसे गिरता हुआ सुनने वाला लौटा लाता है एक समय जो खो गया था
जब एक विकट हवा उसके सामने खोलने ही को थी
एक फूल को जिसका नाम ग़ुलाब
और उसके लाल रंग के पेचीदा लालपन को

गिरती हुई जब तक कि खिड़की के हर एक शीशे को अन्धा न बना दे
एक भटके हुए उपनगर में यह बारिश
भीतर एक लता पर जीवन भर देगी काले अंगूरों में

एक आंगन था अब नहीं है.
बारिश की झड़ी से गुज़रकर आती बहुप्रतीक्षित एक आवाज़
मेरे पिता की है. कभी नहीं हुई थी उनकी मृत्यु.

Friday, August 5, 2011

ग्रेटा गार्बो की एक फ़ोटो, एक पोस्टर और होर्हे लुई बोर्हेस का एक बयान


मैं उस (ग्रेटा गार्बो) से मोहब्बत करता था जैसा कि मेरे समय का हर आदमी करता था. "अन्ना क्रिस्टी" में ग्रेटा रात और कोहरे से निकल कर आती थी और नाविकों के एक शराबख़ाने में प्रवेश करती थी. बार का काउन्टर लम्बा था. उसने हौले हौले चलना शुरू किया ... और दुनिया भर के हम सारे पुरुष जानते थे कि उस के रुकने के बाद हम पहली दफ़ा ग्रेटा गार्बो की आवाज़ सुनेंगे, और वह ऐसा होगा मानो ख़ुद ईश्वर बोलने वाला हो. काउन्टर वाक़ई काफ़ी लम्बा था. जब वह उसके आख़िरी छोर पर पहुंची उसने अपनी ऊबड़खाबड़ आवाज़ में सिर्फ़ इतना कहा - "आई वॉन्ट अ स्कॉच ..." ... हम सब के भीतर एक झुरझुरी सी मची.

- होर्हे लुई बोर्हेस


(पोस्टर वाला फ़ोटो मशहूर फ़ोटोराफ़र इल्से बिंग का खींचा हुआ, १९३३. यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि अन्ना क्रिस्टी ग्रेटा गार्बो की पहली बोलती फ़िल्म थी.)

कला वही हरी अनन्तता है - होर्हे लुई बोर्हेस


कविता की कला

-होर्हे लुई बोर्हेस


समय और पानी से बनी एक नदी को निहारना
और याद करना समय एक और ही नदी है.
जानना कि हम भटकते फिरते हैं एक नदी की तरह
और पानी की तरह अदृश्य हो जाते हैं हमारे चेहरे.

महसूस करना कि जागना एक दूसरा ही सपना है
कि सपना न देखने के सपने और मौत
जिसका भय हमें हड्डियों में महसूस होता है वह मौत है
जिसे हर रात हम एक सपना कहते हैं.

हर दिन और बरस में देखना एक प्रतीक
आदमी के सारे दिनों और उसके बरसों का,
और बरसों की नाराज़गी को तब्दील कर देना
एक संगीत में, एक ध्वनि और एक प्रतीक में.

मौत में देखना एक सपना, सूर्यास्त में
एक सुनहली उदासी, ऐसी होती है कविता
विनम्र और अमर, कविता,
लौटती हुई, भोर और सूर्यास्त की मानिन्द.

कभी-कभी शाम को एक चेहरा होता है
ज देखता है हमें एक आईने की गहराइयों से.
कला ने होना चाहिए उसी तरह का आईना
हम में से हरेक को उसका चेहरा दिखलाता हुआ.

कहते हैं, चमत्कारों से ऊबा हुआ यूलीसिस
प्रेमातिरेक में हरे और विनम्र इथाका को देख कर
रो पड़ा था. कला वही इथाका है
एक हरी अनन्तता, न कि चमत्कार.

अन्तहीन होती है कला बहती नदी जैसी
गुज़रती हुई, तो भी बनी हुई, उसी
अधीर हेराक्लिटस के लिए एक आईना, जो है तो वही
तो भी कोई दूसरा ही, बहती हुई नदी की तरह.

(यूलीसिस - यूलिसिस ओडीसियस नामक मिथकीय यूनानी सम्राट का दूसरा नाम था. महाकवि होमर के महाकाव्य ओडिसी का नायक यूलीसिस इथाका का राजा था, इथाका - यूनान के आयोनियाई समुद्र में अवस्थित एक सुन्दर द्वीप, हेराक्लिटस - सुकरात से पहले के एक यूनानी दार्शनिक जो ब्रह्माण्ड में बदलाव को सबसे केन्द्रीय तत्व मानते थे और उन्हें अपने इस कथन के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है कि "आप एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते")

क्या कभी नहीं मिटेगी समय की भूख?


पीयर पाओलो पासोलोनी (मार्च ५ १९२२ - नवम्वर १६, १९७५) इटली की सबसे बहुमुखी प्रतिभाओं में थे. वे फ़िल्म निर्देशक, कवि, लेखक, दार्शनिक, भाषाविद, स्तम्भकार, चित्रकार और राजनैतिक कार्यकर्ता थे. ऐसी अद्वितीय सांस्कृतिक योग्यताओं से भरपूर पासोलिनी अपने समय के सबसे विवादास्पद लोगों में भी थे.’

पासोलिनी की एक कविता आप को इस लिए पढ़ा रहा हूं कि "इल पोस्तिनो" फ़िल्म के नायक और मेरे प्रियतम अभिनेताओं में से एक मासीमो त्रोइसी ने एकाधिक साक्षात्कारों में पासोलिनी को अपना पसन्दीदा कवि बताया था. आज पासोलिनी की कविता की एक झलक. लम्बी पोस्ट शीघ्र -


चुराए गए दिन

हम जो निर्धन हैं, बहुत कम वक़्त होता है हमारे पास
यौवन और सौन्दर्य के लिए
वैसे आप लोगों का काम हमारे बग़ैर भी चल सकता है.

ग़ुलाम बना देता है हमारा जन्म हमें!
तितलियां जिनका सारा सौन्दर्य नोच लिया
और दफ़ना दिया गया समय की कोष में

धनवान कोई हरज़ाना नहीं देते हमारे समय का
सौन्दर्य से चुराए गए वे दिन
जो हमारे थे और हमारे पुरखों के

क्या कभी नहीं मिटेगी समय की भूख?

Thursday, August 4, 2011

मैं धन्धे का भविष्य बचा रहा हूं

यह वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की ताज़ातरीन कविता है और अब तक अप्रकाशित. एक ऐसे पहलू को छूती जिस से आम तौर पर हमारे कविगण अक्सर बच कर निकल जाना बेहतर समझते हैं.


धन्धे का भविष्य

बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाते आतंकी से
आतंकी दोस्त ने कहा - "अपना अन्त बेहद क़रीब समझो
तुम अपने धर्म से भटक गए हो"

बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाते आतंकी ने कहा -
"धन्धा सब सिखा देता है
मैं इन्सानियत फैलाने के लिए औलादें नहीं बचा रहा."

"बच्चे नहीं होंगे तो मानव-बम किसे बनाओगे
मैं धन्धे का भविष्य बचा रहा हूं."

निज़ार क़ब्बानी की एक और प्रेम कविता


जब मैंने तुमसे कहा था


जब मैंने तुमसे कहा था
"मैं तुमसे प्यार करता हूं"
मैं जानता था
कि मैं एक कबीलाई कानून के ख़िलाफ़
तख़्तापलट का नेतृत्व कर रहा था,
कि मैं बजा रहा था बदनामी की घन्टियां.
मैं सत्ता हथियाना चाहता था
ताकि जंगलों में
पत्तियों की संख्या बढ़ा सकूं
मैं सागर को बनाना चाहता था और अधिक नीला
बच्चों को और अधिक निष्कपट.
मैं बर्बर युग का ख़ात्मा करना चाहता था
और क़त्ल करना आख़िरी ख़लीफ़ा का.
जब मैंने तुम्हें प्यार किया
मेरी मंशा यह थी
कि हरम के दरवाज़ों को तहस-नहस कर डालूं
स्त्रियों के स्तनों की रक्षा कर सकूं
पुरुषों के दांतों से:
ताकि उनके कुचाग्र
हवा में ख़ुश होकर नाच सकें.

जब मैंने तुमसे कहा था
"मैं तुमसे प्यार करता हूं"
मैं जानता था
आदिम लोग मेरा पीछा करेंगे
ज़हरीले भालों के साथ
धनुष-बाणों के साथ.
मेरी फ़ोटो चस्पां कर दी जाएगी हर दीवार पर
मेरी उंगलियों के निशान बांट दिए जाएंगे
तमाम पुलिस स्टेशनों में,
बड़ा ईनाम दिया जाएगा उसे
जो मेरा सिर पहुंचाएगा उन तलक
जिसे वे शहर के प्रवेशद्वार पर टांगेंगे
एक फ़िलिस्तीनी सन्तरे की तरह


जब तुम्हारा नाम लिखा था मैंने
ग़ुलाबों की कापियों में
सारे अनपढ़ों
सारे बीमार और नपुंसक पुरुषों ने
उठ खड़े होना था मेरे ख़िलाफ़
जब मैंने तय किया आख़िरी ख़लीफ़ा का क़त्ल करना
घोषणा करने को
प्यार के राज्य की स्थापना की
जिसकी मलिका का ताज तुम्हें पहनाया
मैं जानता था
सिर्फ़ चिड़ियां
गाएंगी मेरे साथ क्रान्ति के बारे में.

Wednesday, August 3, 2011

एक पुरानी किताब की कविताएँ...(१) (राजेश जोशी)

इस बार छुट्टियों में घर पर हमेशा की तरह पुरानी अलमारियां टटोलते हुए एक किताब हाथ लगी.."आठवें दशक के सशक्त जनवादी कवि और प्रतिबद्ध कविताएँ' -सम्पादक स्वामी शरण स्वामी। (अगस्त 1982)अब चूंकि इधर कुछ दिनों से कबाड़खाना पर आकर कविताएँ पढ़ने लगा हूँ, इसलिए माँगकर किताब साथ दिल्ली ले आया१५५ कवियों की कविताएँ हैं इसमें... कुछ नामी और कुछ जिन्हें नहीं जानतावैसे इसमें समकालीन कविता पर एक लेख हैं उसे पढ़कर अच्छा नहीं लगा..(अपनी समझ कोई बहुत तगड़ी नहीं है लेकिन रघुवीर सहाय, धूमिल और कुंवर नारायण को एक झटके में रिजेक्ट कर देना हजम नहीं हुआ) लेकिन कुछ अच्छी कविताएँ इसमें मिलीअभी अभी राजेश जोशी जी की एक जबरदस्त कविता अनुनाद पर पढी थी, इसलिए कु उसी धरातल पर उनकी एक कविता इस संग्रह से लगा रहा हूँ...

बिजली सुधारने वाले
- राजेश जोशी

अक्सर झड़ी के दिनों में

जब सन्नाट पड़ती है बौछार
और अंधड़ चलते हैं
आपस में गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं
कई तार या कोई नंगा तार
बिजली के खम्बे पर पानी में भीगता
चिंगारियों में चटकता है
एक आग के फूल-सा झरता है
अचानक
उमड़ आयी अँधेरे की नदी में
मोहल्ले के मोहल्ले
घुप्प अँधेरे में डूब जाते हैं
वे आते हैं
बिजली सुधारने वाले
पानी से तरबतर टोप लगाए।

पुरानी बरसाती की दरारों और कालर
से रिसता पानी उन्हें अन्दर तक
भिगो चुका होता है।

भींगते-भागते वे आते हैं
अँधेरे की दीवार में
अपनी छोटी-सी टार्च से
छेद करते हुए।

वे आते हैं
हाथों पर रबर के दास्ताने चढ़ाए
साइकिल पर लटकाए एल्युमिनियम की
फोल्डिंग नसैनी लकड़ी की लम्बी छड़
और एक पुराने झोले में
तार,पेंचकस,टेस्टर
और जाने क्या-क्या भरे हुए-वे आते हैं
खम्बे पर टिकाते हैं
अपनी नसैनी को लंबा करते हुए
और चीनी मिट्टी के छोटे-छोटे कानों को
उमेठते एक-एक कर खींचते हैं
देखते हैं, परखते हैं
और फिर क़स देते हैं
किसी में एक पतला-सा तार

और एक बार फिर
जगमग हो जाती है
हर एक घर की आँख
वे अपनी नसैनी उतारते हैं
और बढ़ जाते हैं
अगले मोहल्ले की तरफ
अगले अंधेरों की ओर
अपनी सूची में दर्ज शिकायतों पर
निशान लगाते हुए....


(पुनश्च: जब 'नसैनी' जैसे शब्द, जो अपने मध्य-प्रदेशीय बचपन का एक हिस्सा है, को कविता में देखता हूँ, तो अनायास ही अपनी लगने लगती है, आश्चर्य है॥ :))