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Saturday, February 26, 2011

ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे



फरीदा ख़ानुम के बारे में एक पोस्ट कल कबाड़खाने में लगायी जा चुकी है | आज सुनिए उनकी आवाज में एक और खूबसूरत ग़ज़ल...



Friday, February 25, 2011

वक़्त की कैद में जिंदगी है ...


मलिका-ए-ग़ज़ल फरीदा खानुम ने कई गज़लें गायीं हैं | लेकिन जितना लोकप्रिय ये खूबसूरत गीत हुआ है, उतना उनका गाया कोई दूसरा नहीं हुआ | कलकत्ता में जन्मी फरीदा पार्टीशन के बाद लाहौर चली गयीं | फरीदा हिंदुस्तान से मिले प्यार को सर माथे लेतीं हैं | और ये भी कहती हैं कि उन्हें अगर बुलाया जाए तो उन्हें हिंदुस्तान में रहने में भी कोई गुरेज नहीं है | यहाँ ये भी ध्यान दिलाना चाहूँगा कि हिंदुस्तान को लेकर ये प्यार राहत, आतिफ जैसा प्यार नहीं है | लता मंगेशकर की बेहद मुरीद फरीदा को पाकिस्तान का दूसरा सर्वोच्च सम्मान हिलाल-ए-इम्तियाज़ भी मिला है |
बहरहाल फरीदा के इस गीत में है प्यार की बेबसी और प्रेमियों की इक बेबाक तमन्ना कि बस आज मत जाओ | संगीत कभी तुम्हे जख्म नहीं दे सकता, लेकिन उस दर्द का हल्का अहसास पैदा कर सकता है |  


Monday, April 14, 2008

आती है बात बात मुझे याद बार बार


फ़रीदा ख़ानम किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं. 'आज जाने की ज़िद ना करो' आज भी तमाम तरह की शौकिया-पेशेवर गायन महफ़िलों में बज़िद सुना-सुनाया जाता है. दाग़ देहलवी की ग़ज़ल सुनें इस दिलकश आवाज़ में:

आफ़त की शोख़ियां हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ितने खेलते हैं जल्वागाह में

वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं
मैं शाद हूं कि हूं तो किसी की निगाह में

आती है बात बात मुझे याद बार बार
कहता हूं दौड़ दौड़ के क़ासिद से राह में

इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस कदर
जो टूट कर शरीक हूं हाल-ए-तबाह में

मुश्ताक इस अदा के बहुत दर्दमन्द थे
ऐ 'दाग़' तुम बैठ गए एक आह में